पंडवानी गायक तीजन बाई की गायिका से प्रभावित होकर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, “आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।”
यह सुनकर तीजन ने जवाब दिया था, “महाभारत नहीं करती हूँ, महाभारत की कथा सुनाती हूँ।”
उनकी पंडवानी केवल एक लोककला नहीं रही, वह एक संवाद बन गई, जहां इतिहास, स्त्री, संघर्ष और संगीत एक साथ बोलते थे। महाभारत सुनाकर दुनिया भर में शोहरत कमाने वाली तीजन बाई ने 70 साल की उम्र में 5-6 जुलाई को तड़के एम्स रायपुर में रविवार तड़के उन्होंने अंतिम सांस ली। वह पिछले छह महीने से किसी से बात नहीं कर पा रही थीं और उनका इलाज चल रहा था।
महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज, अभिनय और अनूठी प्रस्तुति के साथ मंच पर जीवंत करने की उनकी शैली ने इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसी कला की बदौलत साल 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया। तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं जिन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
तीजन बाई का जन्म मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के अटारी गांव में आठ अगस्त 1956 को हुआ था। तीजन की मां का नाम सुखवती देवी था और उनके पिता का नाम हुनुकलाल पारधी था। छत्तीसगढ़ में पारधी और देवार जैसी आदिवासी जातियां ‘पंडवानी’ का गायन करती हैं। तीजन बाई भी पराधी आदिवासी समाज में जन्मी थीं।
पंडवानी की दो शैलियां छत्तीसगढ़ में प्रचलित हैं। पहली वेदमती शैली और दूसरी कापालिक शैली। मुख्य कलाकार के साथ पांच से छह साथी कलाकारों की एक मंडली होती है। तीजन बाई ने कापालिक शैली को चुना और इस शैली में पंडवानी गाने वाली पहली महिला बनीं।
जब तीजन बाई ने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की शिक्षा लेनी शुरू की, तब उनकी उम्र मात्र नौ साल थी। उस समय समाज और परिवार ने उनका काफ़ी विरोध किया। तीजन बाई ने पंडवानी का पहला सार्वजनिक मंचन चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर किया। तब उनकी उम्र मात्र तेरह वर्ष थी। पहले मंचन के बाद वह फिर रुकी नहीं और छ्त्तीसगढ़ के तमाम शहरों में अपनी कला का प्रदर्शन करने लगी।
एक बार उन्हें भोपाल के भारत भवन से पंडवानी गाने का न्यौता मिला। यहां उनकी मुलाक़ात हबीब तनवीर से हुई। पंडवानी गायन के दौरान हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय, गायन और गर्जन को देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्हें पंडवानी गाने का मौक़ा दिलवाया। जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस तरह तीजन बाई की कला घर-घर तक पहुंची।
भारत के बाहर भी उन्होंने कई प्रदर्शन दिये। पहली बार उन्होंने पेरिस के भारत महोत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व किया तो उसके बाद उनकी पहचान ही बदल गई। पेरिस के बाद उन्होंने फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन जैसे देशों में अपनी पंडवानी की प्रस्तुति दी। इस दौरान उनकी प्रसिद्धी का आलम यह रहा कि पेरिस से एक व्यक्ति ने उनको चिट्ठी भेजी और पता लिखा- तीजन बाई, इंडिया. और मज़ेदार बात ये कि वो चिट्ठी उन तक पहुंच भी गई।
हालांकि यह सब इतना आसान नहीं था। पंडवानी गायन के कारण उन पर सामाजिक प्रतिबंध भी लगा। उन्हें अपने ही घर से निकाल दिया गया। उनके सफर में तीन जीवन साथियों ने उनका साथ छोड़ा। कई बार उन्होंने समाज के तिरस्कार का सामना किया। उन्होंने दो पुत्र और एक दत्तक पुत्री को खोया मगर इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद तीजन बाई ने पंडवानी गायन नहीं छोड़ा।
उनकी प्रतिभा को देश और दुनिया में कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। उन्हें 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी, 2003 में पद्मभूषण, 2018 में फुकुओका पुरस्कार और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 2007 में तीजन बाई को नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया। 2003 में तीजन बाई को बिलासपुर के गुरुघासीदास विश्वविद्यालय ने और 2006 में रविशंकर विश्वविद्यालय ने तीजन बाई को डी.लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 2017 में उन्हें इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ ने भी डी लिट् से सम्मानित किया।
वह भिलाई के नज़दीक गनियारी गांव के पारधी टोले में अपने घर में अपने परिवार के साथ रहती थीं। छत्तीसगढ़ के एक बेहद गरीब आदिवासी परिवार से निकल कर दुनिया भर में नाम कमाने वाली तीजन बाई को हमारी श्रद्धांजलि।

डॉ. पूजा राय पेशे से शिक्षिका हैं। भारत की सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में उनकी गहरी रुचि है। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘आधी आबादी का दर्द’ खासी लोकप्रिय हुई थी।

