मध्यप्रदेश में जमीन पट्टा न मिलने से परेशान आदिवासी समाज

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मध्यप्रदेश का मण्डला जिला एक आदिवासी बाहुल्य है। जो पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। इस जिले में बसे आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख साधन खेती है। लेकिन, सहजता से खेती कर पाना इतना सरल नहीं है, यह हमें मण्डला जिले का मोहगांव ब्लॉक बताता है। इस ब्लॉक के 12 गाँव में आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी लोग पीढ़ियों से राजस्व और वन भूमि पर खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों को आजतक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) प्रदान नहीं किये गये हैं। भूमि के पट्टे ना मिलने से आदिवासी और अन्य परंपरागत निवासी सरकार की किसान सम्मान निधि, कृषि क्षतिपूर्ति जैसी अन्य योजनाओं से वंचित रह जाते है। वहीं, पट्टा न मिलने से लोग जमीन पर आधिकारिक हक भी नहीं जता पाते।

ऐसे में यहां के निवासियों ने दखल रहित भूमि अधिनियम 1970 के प्रावधान के तहत एक अभियान चलाकर कलेक्टर के नाम 300 व्यक्तिगत ज्ञापन सौंपा है। किसानों के इन ज्ञापनों को जब हम देखते और अध्ययन करते हैं, तब ज्ञापन में उल्लेखित जानकारी का अंश कुछ इस प्रकार उल्लिखित मिलता है:-

मैं सियाराम झारिया पिता राम कृपाल, ब्लॉक मोहगांव, जिला मंडला मध्यप्रदेश का मूल निवासी हूं। मैं राजस्व भूमि विगत 50 वर्षो, पीढ़ियों से काबिज होकर मकान बनाकर रहा हूं। मेरे पास अजीविका का यही मात्र एक साधन है। …. श्रीमान जी से प्रार्थना है कि, हमारी अर्जी को संज्ञान में लेते हुए, मध्यप्रदेश सरकार की मंशा अनुसार उचित जांच कराकर (भू-अधिकार पत्र) दिलाने का कष्ट करें। जिससे हम अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छे से कर सकें। जगह काबिज अनुमानित रकबा 1 एकड़ है।

ऐसा ही, वर्णन 300 किसानों ने अपने ज्ञापनों में किया है। कलेक्टर के नाम पट्टा प्राप्ति का ज्ञापन सौपने वाले कुछ किसानों से हमने बात की। जिनमें से एक किसान सहदेव कुमार भवेदी भी है। इनका कहना है कि,‘जब मैं पैदा नहीं हुआ था, तब से हमारी इस जमीन पर हम खेती करते आ रहे हैं। हमें इस गैर पट्टा वाली जमीन पर किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता है। हमारी सरकार से मांग है कि हमारी जमीन का पट्टा बनाये। पट्टा ना होने से गांव वाले कहते हैं पट्टा है नहीं, जमीन पर कब्जा किये हो। ऐसे में लड़ाई के हालात बन जाते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में सहदेव कुमार भवेदी सहित अन्य किसानों के स्वतंत्रता और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्य प्रभावित नहीं होते?

किसानों की काबिज भूमि के पट्टे प्राप्ति का अभियान चलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा का कहना है कि, ‘यह कहानी मंडला जिले के मोहगांव ब्लॉक के 12 गाँवों की है। जहां पीढ़ियों से लोग काबिज भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें अब तक पट्टा नहीं मिला। जिससे किसानों को कृषि योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिलता। सिन्हा आगे कहते हैं, ‘मेरे ख्याल से मध्यप्रदेश में अगर सर्वे किया जाए, तो ऐसे हजारों परिवार मिलेगें। जो कि पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें पट्टे नहीं मिले।

इस पूरे मामले में सरकार का रुख सरकार पर कई सवाल खड़े करता है। मध्य प्रदेश सरकार जो शहरों में बसाहट है; उसकी नजूल भूमि का पट्टा देने की तो बात कर रही है, लेकिन ग्रामीण इलाको में जो लोग खेती करते आ रहे हैं, उनके पट्टे के बारें में अभी तक सरकार का कोई जवाब नहीं आया। प्रभावित परिवारों का सवाल है कि क्या पीढ़ियों से खेती कर रहे लोगों को पट्टा ना मिलना और उनका जवाब ना आना लोगों के विश्वास और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट पैदा नहीं करता?

जमीन पट्टों के संबंध में कानून की बात करें तब वन अधिकार अधिनियम 2006 आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन संसाधन भूमि अन्य के अधिकारों की मान्यता प्रदान करता है। यह कानून व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों को जमीन और जंगल का हकदार बताता है। मुख्यत: ग्रामसभा को दावों और अधिकारों की प्रक्रिया चलाने के लिए मजबूत करता है। ऐसे ही, पेसा एक्ट जो जल, जंगल और जमीन के अधिकार और आदिवासियों को मजबूत बनाने की बात करता है। इन दोनों अधिनियम के सहारे ही आदिवासी एवं अन्य मूलनिवासी लोग जमीन पट्टों की माँग करते हैं। लेकिन, उनकी यह मांग अक्सर ज्ञापनों और फ़ाइल्स में सिमट कर रह जाती है।

मंडला में जमीन पट्टे की समस्या इतनी व्यापक है कि वन भूमि अधिकार पत्र हासिल करने के लिए आदिवासी वर्ग के लोगों ने कलेक्टर के अलावा अन्य अधिकारियों को व्यक्तिगत के अलावा सामूहिक आवेदन भी लिखे। इन्हीं आवेदनों में से एक आवेदन अनु-विभागीय अधिकारी मंडला को लिखा गया। आवेदन का कुछ अंश इस प्रकार हैं-

यह आवेदन मध्यप्रदेश सरकार की मंशा अनुसार 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व से वनभूमि में काबिज लोगों को वन अधिकार पत्र दिलाए जाने के संदर्भ में है। आवेदन में वर्णित है कि हम समस्त आवेदक गण ग्राम सिमैया, ग्राम पंचायत सिंगापुर, जिला मंडला के मूल निवासी हैं। हम पिछली कई पीढ़ियों से गांव में निवास और खेती करते आ रहे हैं। जिससे हमारे परिवार का पालन पोषण होता है।

पत्र में आगे जिक्र है कि, सन् 2006 में वन अधिकार अधिनियम आने से हमने दावा फार्म भरा है। वन अधिकार पत्र हेतु 2010 से निरंतर कार्यवाही चल रही है। जबकि ग्राम सभा से संकल्प पारित करवाकर एवं गांव के बुजुर्गों का कथन एवं सभी साक्ष्य लगाकर दावा पेश कर चुके हैं। इस वन भूमि को कृषि योग्य बनाने में हमारा काफी श्रम व धन लगा हुआ है।
पत्र में आगे वर्णित है: काबिज वन भूमि का संबंधित विभाग द्वारा भौतिक निरीक्षण किया जा चुका है।

फिर, पत्र में लिखा गया कि महोदय जी से निवेदन है कि हम सभी दावेदारों की अर्जी को अपने संज्ञान में लेते हुए हमें वन अधिकार पत्र दिलाने की कृप्या करें। इन वन अधिकार दावेदारों में बलमत, इमरत, चरणलाल और मनीराम सहित 12 लोगों के नाम शामिल है। वन अधिकार पत्र की मांग को लेकर इसी तरह चुभावल ग्राम पंचायत के आदिवासी लोगों ने सामूहिक आवेदन कलेक्टर (मंडला) को लिखा। इस आवेदन पत्र में राजकुमार, लल्लु, सुखदेव और बुधियाबाई सहित 11 लोगों के नाम दर्ज हैं।

अब सवाल यह है कि इतनी कार्यवाही करने और भूमि के भौतिक निरीक्षण के बावजूद पट्टा ना दिया जाना, क्या किसानों की विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14) को नजर अंदाज नहीं करता?

वहीं, मंडला से करीब 50 किमी दूर एक गाँव है ओढ़ारी। यहाँ बसनिया बांध (अनुमानित लागत 2700 करोड़ रुपए) प्रस्तावित है। बांध में 31 गाँव डूब क्षेत्र में आएंगे। इसमें ग्राम ओढ़ारी भी शामिल है। इस गाँव (ओढ़ारी) के भूतपूर्व सरपंच लम्मू सिंह माराबी सहित कुछ आदिवासी लोगों का दावा है कि, ‘गाँव में लगभग 60 प्रतिशत लोग 80-90 वर्षों (दादा-परदादा) के समय से वन और राजस्व भूमि पर खेती करते आ रहें हैं। लेकिन हमलोगों को अब तक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) नहीं मिला। हमने कई बार पट्टे की मांग की, पर पट्टा नहीं मिला।’

जमीन पट्टे से जुड़े इस मामले में ‘दलित दस्तक’ ने वन विभाग का पक्ष जानना चाहा। वन विभाग का रवैया टाल-मटोल वाला रहा। विभाग का कहना था कि ‘अभी उन लोगों को कोई यहां से भगा नहीं रहा है। जब भगायेगा तो देखा जायेगा।’
लेकिन श्याम सिंह टेकाम सहित अन्य आदिवासियों का इस मामले में अलग मत है। वर्तमान स्थिति का जिक्र करते हुए वो कहते हैं कि, ‘आज की स्थिति यह है कि बसनियाँ बांध ओढ़ारी ग्राम में प्रस्तावित किये जाने से हमारा पट्टा भी गया और जमीन (जीविका का एक मात्र साधन) भी जा रही ऐसे में हमारी जीविका पर सीधा संकट पैदा हो जायेगा।

ओढ़ारी ग्रामवासियों ने यह भी कहा कि,‘पटटे की समस्या केवल हमारे गांव की ही नहीं, बल्कि हमारे आस-पास धनगांव, चिमकाटोला, रम्पुरा, बिलगड़ा जैसे अन्य आदिवासी गांव की भी है। ओढ़ारी या अन्य ग्रामवासियों की जमीन यदि बसनिया बांध डूबती है और उन्हें पट्टा ना होने से मुआवजा नहीं मिलता। तब क्या इन ग्रामवासियों के आर्थिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का हनन नहीं होगा?

मध्य प्रदेश में जमीन पट्टों के इन मामलों को विधानसभा में मंडला के क्षेत्रीय (निवास विधानसभा) विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले ने उठाया था। लेकिन, समाधान योग्य कोई जवाब नहीं आया। विधायक अशोक मर्सकोले द्वारा विधानसभा में यह सवाल उठाया गया था। उन्होंने पूछा था कि, क्या राजस्व मंत्री महोदय यह बताने की कृप्या करेंगे कि शासकीय राजस्व भूमि पर विगत कई वर्षो से खेती करते आ रहे काश्तकारों को पट्टा देने की क्या कार्य योजना और प्रावधान है? उन्होंने राज्य सरकार से भूमि काबिज गरीब किसानो को पट्टा देने के आदेशों की जानकारी भी मांगी थी।

तब इस सवाल को लेकर राजस्व मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत का जो जवाब आया; उसे देखना भी जरूरी है। उनका कहना था कि मध्यप्रदेश नजूलनिर्वर्तन नियम 2020 के अध्याय-7 कंडिका 128 से 136 में प्रावधान किये गये हैं। म.प्र. नजूल निर्वर्तन नियम 2020 के प्रभावी होने से पूर्व में जारी सभी निर्देश निरस्त हो गये है। इसी तरह पट्टों की समस्या को लेकर पहले भी अन्य विधायक भी विधानसभा में सवाल पूछ चुके। भू-अधिकार समस्या बरकरार है।

जब हमने विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले से जमीन पट्टों के बारें में बातचीत की। तब विधायक मर्सकोले का कहना था कि ‘राजस्व के वो पट्टे राजस्व विभाग के अंतर्गत आते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कई सालों से लोगों ने कब्जा किया है, जिनका निराकरण होना है। मगर शासन स्तर पर कार्यवाही या फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसलिए वो पट्टे नहीं मिल रहे। और ऐसा ही प्रकरण वन अधिकार के पट्टों जैसा है।’
विधायक अशोक मर्सकोले आगे कहते हैं कि, ‘…पिछली बार मैंने (पट्टा समस्या को लेकर) विधानसभा में प्रश्न लगाया था, तब उसके उत्तर में नजूल भूमि का ही जिक्र किया गया। जमीन पट्टों के ये प्रकरण यहीं तक सीमित नहीं, ये बहुत बड़े स्तर पर हैं।’

वास्तव में आदिवासी वर्ग को पट्टे ना मिल पाने की यह कहानी केवल मंडला जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश के गुना और विदिशा जिले में भी आदिवासी समूह ऐसी ही मुश्किल से जूझ रहा है। गुना जिले के सहरिया आदिवासियों को वन भूमि पट्टों की प्राप्ति हेतु देश व्यापी संगठन एकता परिषद के गुना केंद्र ने मई 2022 को एक ज्ञापन पत्र कलेक्टर के नाम लिखा। पत्र में बताया गया कि वन अधिकार कानून 2006 के तहत 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज हितग्राहियों ने (भूमि) अधिकार पाने के लिए आनलाईन आवेदन किये हैं। यह आवेदन वर्तमान में ब्लॉक स्तरीय कमेटी व जिला स्तरीय कमेटी के पास लंबित हैं। इस पत्र में आगे पट्टों सहित आदिवासियों की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं के समाधान की मांग की गयी।

एक परिषद के जिला संयोजक सूरज सहरिया ने हमें एक सूची भी सौंपी। सूची में दावा किया गया कि गुना जिले की बम्हौरी तहसील में ही आदिवासी वर्ग के 2822 वन अधिकार दावे निरस्त किये गये। वहीं, अन्य परंपरागत दावों की निरस्ती का आंकड़ा 4679 (बम्हौरी तहसील) है। वहीं; एमपी वन मित्र पोर्टल कि रिपोर्ट मार्च 2022 के अनुसार गुना जिले की पांच तहसीलों क्रमशः आरोन, गुना, चाचैड़ा, बम्हौरी और राघौगढ़ में आदिवासी वर्ग के 6202 वन अधिकार दावे निरस्त किये गये।

जब हमने विदिशा जिले में आदिवासी लोगों से जमीन पट्टों की समस्या को लेकर मुलाकात की। तब गंजबासौदा तहसील के रातन सिंह सहरिया सहित कई आदिवासी लोगों ने बताया कि हम सालों से वन भूमि पर खेती करते आ रहें हैं, मगर अबतक किसी भी कृषि योजना का फायदा नहीं मिला। वन भूमि की खेती के नाम पर कुछ साल पहले हम लोगों को एक सरकारी पत्र बस दिए गए थे। क्या इन लोगों के साथ संविधान की प्रस्तावना में, आर्थिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का पालन हुआ? शायद उतना नहीं जितना जरूरी था।

जब आदिवसियों को दिए इन पत्रों को हम देखते और अध्ययन करते है, तब हमें पत्रों में ऊपरी भाग पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्यप्रदेश शासन और प्रति (प्राप्तकर्ता) का नाम लिखा मिलता है। पत्र में आगे वर्णित किया गया कुछ अंश ऐसे है- आप विगत कई वर्षों से वनभूमि का उपयोग करते रहें है, परंतु आपको उस पर कोई हक नहीं मिल सका। पहली बार मेरी सरकार ने आपके दावे को स्वीकार कर वन भूमि पर आपको अधिकार पत्र दिया है। अब आप अपनी भूमि को बिना किसी रुकावट के उपयोग कर सकते हैं। भूमि पर आपका अधिकार सुरक्षित रहेगा और आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ लें सकेगीं। यह पत्र, अक्टूबर, 2009 का लिखा है। लेकिन, पत्र में यह नहीं लिखा है की प्राप्तकर्ता को कितनी जमीन दी गई है।

मध्यप्रदेश में जमीन पट्टे की मांग सिवनी (पांचवीं अनुसूची क्षेत्र) जिले से भी उठ रही है। जिले की जनपद पंचायत घंसौर, ग्राम पंचायत बखारी माल और धूमामाल के बरगी बांध विस्थापितों ने एक पत्र, दिनांक 22-02-2023 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम लिखा है। पत्र में कहा गया कि, वन अधिकार कानून 2006 के तहत पूर्व से काबिज दावेदारों को जांच उपरांत भू-अधिकार पत्र प्रदान किये जाएंगे। इस पत्र के जरिए प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि ना मिलने जैसी कई मूलभूत समस्याओं के समाधान की मांग की गयी।

मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय के जमीन पट्टों की समस्या इतनी विकट है कि बड़वानी (पांचवी अनुसूची क्षेत्र) जैसे जिले में जायस (जय आदिवासी युवा शक्ति) संगठन करीब तीन सप्ताह तक जमीन पट्टों को लेकर धरना प्रदर्शन कर चुका है। लेकिन, बड़वानी की हालत यह है कि जिले की जनपद पंचायत निवाली के वन अधिकार अधिनियम अंतर्गत 683 भू-अधिकार पत्र दावों को वर्ष 2019 में निरस्त किया गया। वहीं, पिछले साल 2022 में निवाली के 690 भू-अधिकार दावे निरस्त हुए।

जब हम मध्यप्रदेश स्तर पर वनाधिकार दावों की निरस्ती देखते हैं, तब हमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जून 2020 में दिया वह बयान याद आता है, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि, ‘प्रदेश में 3 लाख 58 हजार 339 वन अधिकार दावों को निरस्त किया जाना दर्शाता है कि अधिकारियों ने काम को गंभीरता से नहीं लिया। अधिकारी माइंडसेट बना ले, गरीब के अधिकारों को वो छीनने नहीं देंगे।’

सीएम ने कलेक्टर और वन मण्डल अधिकारियों से यह भी कहा था कि ‘कोई भी आदिवासी जो 31 दिसम्बर 2005 को या उससे पहले से भूमि पर काबिज है उसे अनिवार्य रूप से भूमि का पट्टा मिल जाए। कोई पात्र आदिवासी पट्टे से वंचित न रहे। काम मे थोड़ी भी लापरवाही हुई तो सख्त कार्यवाही होगी। सीएम का कहना था कि आदिवासी समाज का ऐसा वर्ग है जो अपनी बात ढंग से बता भी नहीं पाता ऐसे में उन से पट्टों के साक्ष्य मांगना और उसके आधार पर पट्टों को निरस्त करना गलत है।’

वहीं, हम राष्ट्रीय स्तर पर भू-अधिकार दावे निरस्ती का जब रिकार्ड देखते हैं। तब हमें ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि, मई 2015 तक सरकार को 44 लाख वन अधिकार दावे प्राप्त हुए, लेकिन, इसमें 17 लाख लोगों को ही अधिकार पत्र प्राप्त हुआ। ऐसे में, जब हम देश में दायर किए गए वन अधिकार दावों की स्थिति देखते हैं तो जनजातीय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, नवम्बर 2022 तक, वनाधिकार कानून 2006 के अंतर्गत 42,97,245 व्यक्तिगत दावे प्राप्त हुए। जिनमें 21,46,782 (करीब 50%) दावों को भूमि अधिकार प्राप्त हुआ। वहीं, 1,69,372 सामुदायिक दावें प्राप्त हुए, जिसमें 1,02,889 (करीब61%) दावों को भू-अधिकार मिला। आगे, 14 दिसम्बर 2022 को जनजातीय मंत्रालय की तरफ से पेश किए गए डेटा से पता चला कि, जून 2022 तक दायर दावों में से करीब 50 फीसदी दावों का ही निपटारा हुआ है।

विचारणीय है कि एक तरफ आदिवासी वर्ग सालों से जमीन पट्टों की मांग करता आ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ लाखों भू-अधिकार दावें निरस्त हो रहें हैं और दावों का निपटारा भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थति में, आदिवासी वर्ग के गरिमा पूर्ण जीवन जीने की आजादी, न्याय, विश्वास, समता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट बरकरार है। आदिवासी वर्ग को लेकर हमें बार-बार सुनने मिलता हैं कि,‘‘जल, जंगल और जमीन, ये हैं आदिवासी के अधीन, लेकिन हकीकत बिल्कुल इससे उलट है। आदिवासी वर्ग आज भी भूमि जैसे अन्य संसाधनिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

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