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प्रेम की सज़ा मौत

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में एक दलित युवक की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसे ऊंची जाति की लड़की से प्यार था। तो वहीं उत्तर प्रदेश के बांदा में एक युवती की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक दलित युवक से प्यार करती थी।

भारत में आज भी दलित युवक को प्रेम करने का अधिकार नहीं है? वह भी तब जब सामने कोई उससे कथित ऊंची जाति की लड़की हो।

यह सवाल इसलिए क्योंकि हाल ही में देश के दो अलग-अलग राज्यों से आई दो घटनाओं ने एक बार फिर जाति और प्रेम के टकराव की भयावह तस्वीर सामने रख दी है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में एक दलित युवक की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसे ऊंची जाति की लड़की से प्यार था। तो वहीं उत्तर प्रदेश के बांदा में एक युवती की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक दलित युवक से प्यार करती थी।

टिहरी गढ़वाल में 18 साल के दलित युवक केतन लाल का कसूर सिर्फ इतना था कि उसकी दोस्ती एक सवर्ण समाज की लड़की से थी। लड़की के घरवालों ने उसे धोखे से घर बुलाया और फिर उसे इस बात की सजा दी गई कि उसने एक सवर्ण लड़की से प्यार कैसे कर लिया। इसके नाखून उखाड़े गए, उसके पैरों में कील ठोकी गई और उसके गुप्तांगों को घायल कर दिया गया। केतन की इस तरह की गई हत्या दलितों के प्रति उस सवर्ण परिवार की घृणा दिखाने के लिए काफी है।

 दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की है। यहां ओबीसी समाज की एक बालिग लड़की दलित युवक से प्रेम करती थी। परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। कुछ दिन पहले दोनों साथ रहने के लिए घर से चले गए थे। परिवार की शिकायत के बाद पुलिस उन्हें पकड़कर थाने ले आई। लड़की ने लड़के के साथ रहने की बात कहते हुए पिता से पुलिस से की गई शिकायत वापस लेने की विनती की। लेकिन जिस थाने में कानून और सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए था, वहीं लड़की के पिता ने अपनी बेटी पर चाकू से हमला कर उसकी जान ले ली। यानी एक पिता ने एक बेटी की जान इसलिए ले ली; क्योंकि उसने अपनी पसंद से प्रेम करने का साहस किया था। बल्कि उससे भी आगे एक दलित युवक से प्रेम किया था।

यानी साफ है कि जब बात रिश्तों की आती है और सामने दलित लड़का या लड़की होती है तो उसे न तो सवर्ण पिता स्वीकार करता है और ना ही पिछड़े समाज का पिता। हैरानी की बात यह है कि इन घटनाओं के बाद भी समाज का एक बड़ा हिस्सा चु्प्पी साधे रहता है। कुछ लोग इसे परिवार की इज्जत का सवाल बता देते हैं, कुछ इसे सामाजिक परंपरा का नाम दे देते हैं।

जून के दूसरे हफ्ते में घटी टिहरी और बांदा की ये दोनों घटनाएं केवल अपराध नहीं हैं। वे हमें आईना दिखाती हैं। और उस आईने में आज भी जाति भारत में सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। हैरानी की बात यह है कि इसको लेकर आज भी समाज से लेकर सरकार तक सभी खामोश है।

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