केरल में भारतीयों की मदद करना चाहते हैं पाकिस्तान के पीएम इमरान खान

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान बाढ़ प्रभावित केरल को किसी भी तरह की मानवीय सहायता मुहैया कराने के लिए तैयार है. साथ ही उन्होंने विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित लोगों को शुभकामनाएं भेजीं.

केरल में आठ अगस्त से मूसलाधार बारिश के कारण 230 से अधिक लोग मारे गए हैं और कम से कम 10.10 लाख लोग अभी भी शिविरों में रह रहे हैं. पिछले सप्ताह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले खान ने केरल के लोगों के प्रति ट्वीटर पर अपना समर्थन व्यक्त किया है.

खान ने एक ट्वीट किया, ‘‘पाकिस्तान के लोगों की तरफ से भारत में केरल में बाढ़ के कारण तबाही झेलने वालों के प्रति प्रार्थना और शुभकामनाएं व्यक्त करता हूं. हम किसी भी तरह की मानवीय सहायता मुहैया कराने के लिए तैयार हैं.’’

कई देशों ने केरल में बाढ़ राहत अभियानों के लिए सहायता देने की घोषणा की है. संयुक्त अरब अमीरात ने करीब 700 करोड़ रुपया सहायता की पेशकश की है. इसके अलावा कतर ने करीब 35 करोड़ रुपये और मालद्वीव ने 35 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की है.

Read it also-सामाजिक बहिष्कार के बाद करीब 300 दलित परिवारों ने अपनाया बौद्ध धर्म, भाजपा को वोट न देने की खाई शपथ
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

छत्तीसगढ़: BSP ने की बड़ी बैठक, कहा- बिना हमारे नहीं बनेगी सरकार

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है. मंगलवार को रायपुर में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की बैठक न्यू राजेंद्र नगर स्थित गुरु घासीदास सांस्कृतिक भवन में हुई. प्रदेश प्रभारी अशोक सिद्धार्थ ने विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर तैयारी करने के निर्देश दिए.

उन्होंने कहा कि बसपा के बिना कोई सरकार नहीं बनेगी. चुनाव में कांग्रेस सहित अन्य दलों के साथ गठबंधन के सवाल पर प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश वाजपेयी ने कहा कि पार्टी सुप्रीमो मायावती इस पर फैसला लेंगी, बसपा कार्यकर्ता 90 सीटों को लेकर तैयार हैं.

बैठक में प्रदेश प्रभारी अशोक सिद्धार्थ राज्यसभा सांसद, एमएल भारती, भीम राजभर, अजय साहू, विधायक केशव चंद्रा, पूर्व विधायक दाउराम रत्नाकर, दुजराम बौद्ध, बसपा के पर्व विधायक कामदा जोल्हे, पूर्व विधायक लाल साय खूंटे, पूर्व विधायक रामेश्वर खूंटे, सदानंद मार्कण्डेय, एमपी मधुकर, जिला अध्यक्ष, जोन प्रभारी, विधानसभा प्रभारी, संभावित टिकट के दावेदार भी पहुंचे हैं.

अशोक ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता ईमानदारी व निष्ठा से कार्य करेंगे. 10 से 15 विधायक जीत जाए तो मजबूर सरकार बनेगी, 15 साल में विकास नहीं, बेहाल से लोग छत्तीसगढ़ में परेशान हैं.

छत्तीसगढ़ बसपा प्रभारी राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ का कहना है कि छत्तीसगढ़ में सीटों की स्थिति का आकलन कर पूरी रिपोर्ट मायावती को देंगे. उसके बाद ही वह किसी गठबंधन पर विचार मायावती ही करेंगी. कांग्रेस के साथ या अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन का फैसला मायावती ही करेंगी.

उन्होंने कहा, “वैसे, बसपा सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है. बसपा का वोटर कहीं नहीं जाता, वो बसपा को ही वोट देगा. अजीत जोगी की नई पार्टी से हमारे वोटबैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कांग्रेस कितनी सीट हमें देना चाहती है ये भी मायने नहीं रखता. बगैर बसपा के, राह मुश्किल है. कर्नाटक में क्या हुआ सबको पता है.”

सिद्धार्थ ने विपक्ष के गठबंधन को अपवित्र कहने वाली भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि वह पहले अपने गिरेबान पर झांककर देख ले.

Read it also-बीबीएयू के छात्रों ने पीएच.डी.हिन्दी के रिजल्ट में धांधली का लगाया आरोप
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

गुजरात पुलिस ने बैन की सचिवालय में दलित कार्यकर्ताओं की एंट्री!

गुजारत पुलिस पर आरोप है कि वो अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों के कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर ब्लैकलिस्ट कर गांधीनगर स्थित राज्य के सचिवालय में आने-जाने से रोक रही है. जिन लोगों को सचिवालय में घुसने से रोका गया उनमें दलित अधिकारों के एक्टिविस्ट किरीट राठौर, दलित नेता जिग्नेश के सहयोगी सुबोध परमार और सफाईकर्मियों के नेता विनूभाई जापड़िया शामिल हैं.

किरीट राठौर बताते हैं, “ मैं दो दशकों से दलित अधिकारों के लिए काम करता हूं. 18 मई को मैं सचिवालय में पास बनवा कर जा रहा था. गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने कहा कि मेरा नाम ब्लैकलिस्ट में है. मुझे झटका लगा. मैंने इसकी शिकायत सामाजिक न्याय विभाग से की.”

उनका कहना है, “एक बार फिर मेरी आरटीआई की अपील पर 12 जून को सुनवाई होनी थी. उस समय भी मुझे घुसने दिया गया. चार घंटे थाने में रोके जाने के बाद मुझे जाने दिया गया. जबकि मेरे पास अपील में आने का सरकारी कागज था. मेरे लिए कहा गया कि मैं आत्महत्या कर सकता हूं. जबकि 14 अप्रैल को मैंने अंदर जाने से रोके जाने पर आंदोलन की बात कही थी. आखिर कैसे मुझे सचिवालय में प्रवेश करने से स्थाई तौर पर रोका जा सकता है.”

किरीट को अभी तक वो लिस्ट नहीं दी गई कि किन लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है.

वडगांव से विधायक जिग्नेश मेवाणी के नजदीकी सहयोगी सुबोध परमार का नाम भी ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया है. सुबोध परमार ने न्यूज 18 को बताया कि दो महीने पहले जब वे सचिवालय में जा रहे थे तब उन्हें रोका गया. उन्होंने भी आईटीआई के तहत आवेदन दे कर पूछा है कि उन्हें किस नियम के तहत प्रवेश से रोका गया है.

मेवाणी का कहना है, “आखिर दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को क्यों सचिवालय में जाना पड़ता है? क्योंकि उनकी बात नहीं सुनी जाती. जब मैं विधानसभा में दलितों की आवाज उठाता हूं तो माइक की आवाज बंद की जाती है. जब वे सचिवालय में अपनी बात रखने आते हैं तो उनको ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है.”

संपर्क किए जाने पर सचिवालय, सुरक्षा शाखा के पुलिस उपाधीक्षक बीए चुड़ास्मा से संपर्क किए जाने पर उन्होंने इस तरह की किसी भी ब्लैकलिस्ट से इनकार किया.

उनका कहना है, “वैसे सचिवालय में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री कैबिनेट के मंत्री और दूसरे मंत्रियों के कार्यालय है. इनकी सुरक्षा के लिहाज से जो लोग आत्मदाह जैसी घोषणाएं करते हैं उन्हें तभी प्रवेश दिया जाता है, जब उनसे लिखवा लिया जाता है कि वे ऐसा नहीं करेंगे और जरूरत पड़ने पर उनके साथ पुलिस वालों को भी लगाया जाता है.”

Read it also-महिला टीचर ने दलित बच्चों को चप्पलों की माला पहना मैदान में घुमाया
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

मुजफ्फरनगर में दलितों और ठाकुरों में जमकर संघर्ष

यूपी में मुजफ्फरनगर जिले के गांव मढ़करीमपुर में वैन खड़ी करने को लेकर दलित और ठाकुरों में संघर्ष हो गया. मारपीट, पथराव और फायरिंग से गांव में दहशत फैल गई. हालात को काबू करने के लिए पहुंची पुलिस पर भी पथराव किया गया. पुलिस ने लाठियां फटकार कर भीड़ को खदेड़ा. संघर्ष में महिला समेत कई लोग घायल हो गए.

पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों से 15 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर चार लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. इस मामले को लेकर दलित समाज के लोगों ने एसएसपी दफ्तर पर हंगामा किया और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की. एसपी सिटी ने सीओ खतौली से जांच कराने का आश्वासन देकर उनके गुस्से को शांत किया. इस घटना के बाद से गांव में तनाव व्याप्त है.

खतौली कोतवाली क्षेत्र के गांव मढ़करीमपुर में बुधवार देर रात ठाकुर बेगराज सिंह के घर पर छठी का कार्यक्रम चल रहा था. दलित सतपाल के पुत्र अमित, रवि और सुमित ने रास्ते में वैन खड़ी कर दी. रास्ते से वैन हटाने को लेकर उनसे बेगराज की कहासुनी हो गई. इस दौरान बेगराज के प्रोग्राम में शामिल होकर घर लौट रहे एक युवक का सतपाल के पुत्रों से कंधा टकराने पर विवाद हो गया. कहासुनी के बाद दोनों समाज के लोग आमने सामने आ गए. देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच पथराव और फायरिंग शुरू हो गई. पथराव में पड़ोसी जयभगवान के घर की सीमेंट की चादरें भी टूट गई. सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया. इस पर भीड़ ने पुलिस पर भी पथराव कर दिया. पुलिस ने लाठियां फटकार करके भीड़ को खदेड़ कर स्थिति को नियंत्रित किया.

इस खूनी संघर्ष में एक पक्ष से सतपाल, उसकी पत्नी रमेशो, रवि व अमित और दूसरे पक्ष से शिवकुमार व रामभूज सहित कई लोग घायल हो गए. पुलिस ने घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया. पुलिस ने दोनों पक्षों से रवि, अमित, शिवकुमार व रामभूल को हिरासत में ले लिया है. पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों से 15 लोग शिवकुमार, लोकेश, श्रवण, राजू, रामभूल, गुल्लू, राहुल, कपिल, देवेंद्र, सतपाल, अमित, रवि, सुमित, अजीत, राहुल के विरुद्ध संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है.

खतौली इंस्पेक्टर अंबिका प्रसाद भारद्वाज ने बताया कि रास्ते में वैन खड़ी करने के विवाद में दोनों दोनों पक्षों के बीच संघर्ष हुआ. पुलिस पर भी हमला किया गया. पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके चार आरोपियों को जेल भेज दिया है, बाकी की तलाश की जा रही है. गांव में फिलहाल शांति है, फिर भी एहतियातत पुलिस तैनात की गई है.

Read it also-दलित महिला को हैंड पंप से पानी पीना पड़ा भारी, स्थानीय बदमाशों ने की बुरी तरह पिटाई
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

दलित संगठनों की 25 अगस्त को महाबैठक

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती (फाइल फोटो)।

दलित संगठन एक बार फिर सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. दलित संगठनों ने 25 अगस्त को एक बैठक का आह्वान किया है, जिसमें वे एससी-एसटी संशोधन एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर फैसला लेंगे. मंगलवार को दो वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान की बहाली को चुनौती दी है.

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती ने कहा कि उन्होंने याचिका की कापी के लिए आवेदन किया है. साथ ही वे सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में एक कैविएट दायर करने की भी योजना बना रहे हैं, ताकि सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत इनका भी पक्ष सुन सके. भारती ने कहा कि आगामी 25 अगस्त को 25-30 दलित संगठनों की बैठक बुलाई है, जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भारती का कहना है कि संसद में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निरोधक बिल पास कराने के बाद उनकी मांग पूरी हो गई थी, जिसके चलते 9 अगस्त का बंद रद्द कर दिया गया था. भारती का आरोप है कि सरकार ‘छद्म’ तरीके से यह सब करवा रही है. उनका कहना है कि सरकार एक तरफ तो खुद को दलित समर्थक पेश करना चाहती है, लेकिन दूसरी तरफ डबल गेम खेल रही है. उन्होंने बताया कि वे दोनों याचिकाकर्ताओं की ‘असलियत’ का पता लगा रहे हैं. भारती का कहना है कि वे अपनी लड़ाई सड़क, संसद और कोर्ट में लड़ने के लिए तैयार हैं.

गौरतलब है कि मानसून सत्र में एसटी संशोधन कानून 2018 को लोकसभा और राज्यसभा ने पास कर दिया था और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में निर्देश दिया था कि इस एक्ट के तहत दर्ज शिकायतों पर किसी को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. इस बदलाव के विरोध में दलित संगठनों ने 20 मार्च 2018 को देशव्यापी प्रदर्शन किया था.

Read it also-अब मीडिया सरकार की नहीं बल्कि सरकार मीडिया की निगरानी करती है: पुण्य प्रसून बाजपेयी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

दलित परिवारों के सामाजिक बहिष्कार के मामले ने तूल पकड़ा

बाड़मेर। सीमावर्ती बाड़मेर जिले के कालुड़ी गांव के 70 दलित परिवारों के कथित सामाजिक बहिष्कार का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. दलित समुदाय ने जहां आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किए जाने पर महापड़ाव की चेतावनी दी है. वहीं दूसरे पक्ष ने मामले को झूठा बताते हुए कहा है कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

विशेष के लोगों द्वारा 70 दलित परिवारों के कथित सामाजिक बहिष्कार का है. दलित समुदाय की ओर से इस बारे में बालोतरा थाने में करीब 17 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है. यह मामला 16 अगस्त को दर्ज कराया गया था, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. गिरफ्तारी नहीं होने से नाराज दलित समाज के लोगों ने 25 अगस्त से महापड़ाव की चेतावनी दी थी. हालांकि गुरुवार को पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के समझाने के बाद महापड़ाव को स्थगित कर दिया है.

समुदाय ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की गई तो वे महापड़ाव करने को मजबूर होंगे. वहीं दूसरी जाति के लोग भी लामबंद हो गए हैं, जिन्होंने सोमवार को बाड़मेर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन कर इस मामले को झूठा बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की. प्रदर्शन में आहोर से विधायक शंकर सिंह राजपुरोहित भी शामिल हुए. दलित परिवारों का आरोप है कि जाति विशेष के लोगों द्वारा सामाजिक बहिष्कार के बाद गांव में उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है, जिससे उनका जीना दुश्वार हो गया है. इस बीच तनाव को देखते हुए पुलिस ने गांव में एक अस्थायी चौकी बनाकर पुलिस बल तैनात कर दिया है.

दोनों पक्षों के बीच तनाव का कारण वर्ग विशेष के कुछ युवाओं द्वारा दलित समुदाय पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी किया जाना बताया गया. पुलिस के मुताबिक सोशल साइट पर जातिगत टिप्पणी के बाद बायतु के रावताराम ने दूसरे समुदाय के दो युवकों पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज करा दिया. बालोतरा वृताधिकारी विक्रमसिंह भाटी ने बताया कि मामला दर्ज कर जांच की जा रही हैं. उन्होंने बताया कि गांव में किसी भी विवाद से बचने के लिए अस्थायी पुलिस चौकी बनाई गई है.

इसे भी पढ़े-राजस्थान में राजपुरोहितों ने दलितों को गांव से निकाला
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का 95 वर्ष की उम्र में हुआ निधन,

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन दिल्ली के अस्पताल में बुधवार देर रात को हो गया. नैयर 95 वर्ष के थे और आखिरी वक्त वह लेखन और पत्रकारिता से जुड़े रहे. उनका अंतिम संस्कार आज एक बजे दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान गृह में होगा. आपातकाल के दौरान नैयर को सरकार के खिलाफ लेख लिखने के कारण जेल भी जाना पड़ा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ पत्रकार के निधन पर शोक जताते हुए ट्वीट किया. पीएम ने आपातकाल में सरकार के खिलाफ मुखर आवाज उठाने के लिए नैयर के योगदान की सराहना की और उन्हें श्रद्धांजलि दी.

नैयर 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे. 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था. पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के कारण 1997 में उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया था. नैयर ने देश-विदेश के मशहूर अखबारों के लिए संपादकीय और लेख लिखे.

नैयर ने कई किताबें भी लिखीं और उनकी आत्मकथा भी काफी चर्चित रही थी. उनकी आत्मकथा ‘बियांड द लाइंस’ अंग्रेजी में छपी थी. बाद में उसका हिंदी में अनुवाद, एक जिंदगी काफी नहीं नाम से प्रकाशित हुआ. उन्होंने इसके अतिरिक्त कई किताबें ‘बिटवीन द लाइं,’, ‘डिस्टेंट नेवर : ए टेल ऑफ द सब कान्टिनेंट’, ‘इंडिया आफ्टर नेहरू’, ‘वाल एट वाघा, इण्डिया पाकिस्तान रिलेशनशिप’, ‘इण्डिया हाउस’ जैसी कई किताबें भी लिखीं.

Read it also-पोखरण में एक और कामयाबी, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल ‘हेलिना’ का सफल परीक्षण
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

मायावती ने चौटाला को बांधी राखी, दूसरे भाई बने बिहार के राज्यपाल

बहुजन समाज का एक हिस्सा भले ही सोशल मीडिया पर रक्षा बंधन के खिलाफ अभियान छेड़ चुका है, बसपा प्रमुख मायावती ने इंडियन नेशनल लोकदल के नेता अभय सिंह चौटाला को राखी बांध कर उन्हें अपना राखी भाई बना लिया है. इस बंधन के साथ हरियाणा में बसपा और आईएनएलडी के बीच गठबंधन और मजबूत हो गया है. अभय सिंह चौटाला ने 22 अगस्त को बसपा प्रमुख से उनके दिल्ली स्थित आवास पर मुलाकात की.

इस मुलाकात में बसपा प्रमुख मायावती ने 25 सितंबर को पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के जन्मदिवस के अवसर पर इंडियन नैशनल लोकदल (आईएनएलडी) द्वारा गोहाना में ‘सम्मान दिवस’ समारोह में शामिल होने का न्यौता भी स्वीकार कर लिया है. बैठक को लेकर हरियाणा के नेता विपक्ष अभय सिंह चौटाला ने बताया कि बहनजी ने सहर्ष ‘सम्मान दिवस’ का न्योता स्वीकार कर लिया है और वह इस अवसर पर लोगों को संबोधित भी करेंगी. बीएसपी सुप्रीमो से मुलाकात के बाद अभय सिंह चौटाला ने कहा –

“दोनों दलों के बीच हुए गठबंधन के बाद, यह पहला मौका होगा जब दोनों दलों के नेता एक मंच से जनता को संबोधित करेंगे. इस गठबंधन से हरियाणा की सभी जातियों और समुदाय के बीच पारंपरिक एकता और सम्मान की भावना स्थापना होगी, जिसमें पिछले कुछ समय से दरार डालने के प्रयास किए जा रहे हैं.” बता दें कि हरियाणा की प्रमुख विपक्षी आईएनएलडी का कुछ समय पहले ही बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन हुआ है. दोनों दलों ने आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ने का फैसला लिया है.

तो वहीं मायावती के चौटाला को राखी बांधने की चर्चा लुटियन जोन में चल रही है. इससे पहले मायावती ने भाजपा नेता लालजी टंडन को राखी बांधी थी. तो वहीं लालजी टंडन भी बसपा प्रमुख मायावती को अपनी बहन मानते रहे हैं. मायावती ने लगातार कई सालों तक टंडन को राखी बांधी. पार्टी भले दोनों की अलग-अलग रही लेकिन दोनों के रिश्ते में कभी खटास नहीं आई.

Read it also-वनांचल क्षेत्र कुई में आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दिए जाने वाले राशन में कटौती
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

तो इसलिए भारत सामाजिक अन्यायमुक्त नहीं हो पाया

7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद धीरे-धीरे अगस्त ‘सामाजिक न्याय के माह’ के रूप में स्थापित होते गया है . इस माह पूरे देश में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों द्वारा सामाजिक न्याय पर असंख्य संगोष्ठियां आयोजित होती हैं. यह चलन हर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है. इस वर्ष भी अगस्त माह में देश के कोने- कोने में सामाजिक न्याय पर असंख्य संगोष्ठिया हुईं और आगामी 25 अगस्त को बी.पी. मंडल , जिनकी अध्यक्षता में ही 20 दिसंबर, 1978 को चार सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ था, की जयंती के अवसर पर बड़े पैमाने पर भारी संख्या में इस मुद्दे पर संगोष्ठियाँ आयोजित होने की ख़बरें आ रही हैं. बहरहाल गत 19 अगस्त को दिल्ली के मशहूर कांस्टीट्यूशन क्लब में इस किस्म की एक बड़ी संगोष्ठी में इस लेखक को भी शिरकत करने का अवसर मिला , जिसमें हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने सामाजिक अन्याय पर एक सवाल खड़ा कर श्रोताओं को विस्मित कर दिया था.

उन्होंने अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा था, ‘हम सभी यहाँ सामाजिक न्याय के सिपाही बैठे हुए हैं.पर, सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते हुए हमने यह समझने का गंभीर प्रयास ही नहीं किया कि सामाजिक अन्याय था ,इसलिए उसे दूर करने के लिए हमें सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. सामाजिक अन्याय के उत्पत्ति के कारण को ठीक से न समझ पाने के कारण ही आज हम सामाजिक न्याय की लड़ाई लगभग हार चुके हैं : सामाजिक अन्यायकारी वर्गों का दबदबा कायम हो चुका है.यह एक नया सवाल था, जिसे सुनने की मैं अरसे से प्रतीक्षा कर रहा था. मेरा भी दृढ विश्वास रहा है कि सामाजिक अन्याय को ठीक से न समझ पाने के कारण ही देश का आरक्षित वर्ग आरक्षण बचाने, निजी क्षेत्र, न्यायपालिका, प्रमोशन में आरक्षण बढ़ाने के नाम पर सामाजिक न्याय की सिमित लड़ाई में व्यस्त रहा और आज शासको द्वारा साजिश करके सरकारी नौकरिया ख़त्म किये जाने से वह गुलाम वर्ग में तब्दील होने जा रहा है.

बहरहाल सामाजिक अन्याय को लेकर सवाल उठाने वाले विद्वान वक्ता ने इसकी उत्पत्ति का जो कारण बताया, उससे लगा ,उन्होंने खुद ही इस पर पर्याप्त चिंतन नहीं किया है .उन्होंने सामाजिक अन्याय का कारण ज्योतिबा फुले की इस कविता-विद्या बिना मति गयी,मति बिना नीति गई ;नीति बिना गति, गति बिना वित्त गया; बिना वित्त शुद, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किया- में ढूंढते हुए ‘अविद्या’ को ही मुख्य कारण बताया. अर्थात शासकों द्वारा बहुजनों को अज्ञान बना कर ही सामाजिक अन्याय को जन्म दिया गया, जिससे निजात दिलाने के लिए बहुजन महापुरुषों ने अपने-अपने स्तर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी. निसंदेह सामाजिक अन्याय की सृष्टि में भारत में वंचित जातियों का शिक्षा के क्षेत्र से बहिष्कार एक अन्यतम कारण रहा .लेकिन सामाजिक अन्याय तो एक वैश्विक परिघटना रही है और भारत से बाहर दुनिया में और कहीं वंचितों को शिक्षा से पूरी तरह बहिष्कृत नहीं किया गया , बावजूद इसके वहां भी सामाजिक अन्याय का अध्याय सृष्ट हुआ. ऐसे में वंचितों का शिक्षा से बहिष्कार समाजिन अन्याय का मूल कारण नहीं माना जा सकता. बहरहाल सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों के लिए सामाजिक अन्याय के तह में जाना जरुरी था, जो नहीं किया गया गया.

अगर भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नेता, एक्टिविस्ट और प्रोफ़ेसर सामाजिक अन्याय के मूल को समझने का गंभीर प्रयास किये होते तो पाते कि नस्ल,लिंग,धर्म,भाषा,क्षेत्रादि के आधार पर विभाजित समाज के विभिन्न सामाजिक समूहों में से कुछेक का शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय कहलाता है.इस लिहाज से दुनिया में स्त्री के रूप में विद्यमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही.सर्वाधिक अन्याय के शिकार समुदायों में अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत तथा भारत के बहुजन रहे. यदि मानव जाति के इतिहास के सर्वाधिक वंचित तबकों- प्राचीन रोम के प्लीबीयंस-नाइट्स-दास,यूरोप की सामंतवादी व्यवस्था के कृषक दास, अमेरिका-अफ्रीका इत्यादि के अश्वेत, मलेसिया-न्यूजीलैंड-आस्ट्रेलिया इत्यादि के मूलनिवासियों , भारत के दलित-आदिवासी –पिछड़ों इत्यादि की दुर्दशा के मूल में जाएँ तो पता चलेगा इन सभी में एक खास साम्यता रही. वह यह कि सभी को ही कमोबेश शक्ति के उपरोक्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी न देकर ही उन्हें सामाजिक अन्याय का शिकार बनाया गया .

सम्पूर्ण इतिहास में जिन्हें शक्ति के स्रोतों से दूर धकेल कर अशक्त बनाया गया,उनमें सर्वाधिक अभागे रहे भारत के बहुजन, विशेषकर दलित .सामाजिक अन्याय का शिकार बनाये गए दूसरे देशों के वंचितों को न तो शिक्षालयों से दूर रखा गया और न ही देवालयों से: राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियाँ भी उनके लिए पूरी तरह निषिद्ध नहीं रहीं. यह दुर्भाग्य एकमात्र दलितों के हिस्से में आया. बहरहाल पूरी दुनिया में शासकों की साजिश से अशक्त बनाये गए तबकों के पक्ष में लेखक-पत्रकार-साहित्यकार –सोशल एक्टिविस्ट और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने जो अभियान चलाया, उसका चरम लक्ष्य रहा: शक्ति के स्रोतों में उनको वाजिब हिस्सेदारी दिलाना. इस अभियान से आज की तारीख में भारत के शुद्रातिशूद्रों को छोडकर सामाजिक अन्याय का शिकार बनाये गए विश्व के बाकी समुदाओं के जीवन में चमत्कारिक बदलाव आ चुका है.इससे सर्वाधिक उपकृत होने वाले समूहों को यदि चिन्हित किया जाय तो अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के दलित अर्थात काले शीर्ष पर नजर आयेंगे है.

अमेरिका के जो अश्वेत दास-प्रथा से मुक्त होने के सौ साल बाद भी दलितों से कहीं ज्यादा बदहाली में थे,1970 के दशक में वहां आंबेडकरी आरक्षण से उधार ली हुई सर्वव्यापी आरक्षण वाली डाइवर्सिटी पालिसी ने उनके जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव ला दिया है.आज अमेरिका में सर्वत्र उनकी हिस्सेदारी दिख रही है.वे फिल्म और टीवी के सितारे हैं,वे बड़े-बड़े उद्योगपतियों में शुमार हैं.वे बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीइओ हैं.नासा से लेकर हार्वर्ड और वालमार्ट से हॉलीवुड:जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां उनकी प्रभावी उपस्थिति न दिख रही हो.इस बीच उनके मध्य का ही एक व्यक्ति अमेरिका का प्रेसिडेंट तक बन चुका का है.जहाँ तक दक्षिण अफ्रीका के गोरों द्वारा शासित मंडेला के लोगों का सवाल है ,1994 में रंग-भेदी सत्ता के अवसान के बाद के दो दशकों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया है.कभी जिन 9-10 प्रतिशत गोरों का वहां शक्ति के स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हुआ करता था, आज वे तमाम क्षेत्रों में अपने सख्यानुपात पर सिमटते जाने से दुखी होकर वहां से पलायन करते जा रहे हैं. गोरो का एकमात्र कब्ज़ा कब्ज़ा बचा था भूमि पर. किन्तु फरवरी 2018 में दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने एक कठोर निर्णय लेते हुए, जिन 9-10 प्रतिशत गोरों की वहां की जमीन पर 72 प्रतिशत कब्ज़ा था,उसे बिना मुआवजा दिए अपने कब्जे में ले लिया है. अब वह जमीन सदियों के शोषित-वंचित बहुसंख्य कालों के मध्य बांटी जा रही है .

बहरहाल बहुत पहले संवैधानिक अधिकार मिलने के बावजूद भारत के बहुजनों की स्थिति अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कालों के मुकाबले अत्यंत कारुणिक है: इनमें नाममात्र का ही बदलाव आया है.आज भी हजारों साल पूर्व की भांति उद्योग—व्यापार पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा वर्ण-व्यवस्था के विशेषाधिकारयुक्त तबकों का ही है.पूरे देश में आज जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हुए हैं,उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स उन्ही के हैं.पॉश कालोनियों में आज भी किसी दलित-आदिवासी-पिछड़े को वास करते देखना अचम्भे जैसा लगता है.मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग माल्स में 80-90 प्रतिशत से ज्यादा दुकानें इन्ही की हैं.चार से लेकर आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है ,उनमे प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियाँ उन्हीं की ही होती हैं.देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल उन्हीं के हैं.फिल्म और मनोरंजन उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा उन्हीं का है .संसद-विधानसभाओं में बहुजनों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो,पर मत्रिमंडलों में 90 प्रतिशत वे ही हैं. मंत्रिमंडलों के लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले प्रायः 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं.शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार ज्ञान –उद्योग,फिल्म-मीडिया मठ -मंदिरों इत्यादि पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का बेहिसाब वर्चस्व आँख में अंगुली डाल कर बताता है कि भारत में हजारों वर्ष पूर्व की भांति सामाजिक अन्याय की धारा आज भी जोर-शोर से प्रवाहमान है.

अब यहाँ स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होता है कि धरती की छाती पर एकमात्र भारत में क्यों सामाजिक अन्याय की धारा हजारों साल पूर्व की भाँति आज भी कायम है?इसके दो कारण हैं. एक तो यह कि डॉ आंबेडकर की भाषा मे यहाँ का प्रभु वर्ग न सिर्फ सामाजिक विवेक, बल्कि देश-प्रेम से भी से भी शून्य है, इस कारण इस स्वार्थी वर्ग को इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि इस भयावह अन्याय के के कारण देश टूट सकता है: डॉ.आंबेडकर के शब्दों में लोकतंत्र का ढांचा विस्फोटित हो सकता है. अब जहाँ तक वंचित वर्गों का सवाल है, सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहने के कारण इन वर्गों से फुले,शाहूजी,आंबेडकर, पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, नामदेव ढसाल ,कांशीराम इत्यादि जैसे सर्वोच्च स्तर के चिन्तक व बहुजन मुक्तिकामियों का उदय न हो सका. मुख्यतः आंबेडकरी रिजर्वेशन का लाभ उठाकर अधिकारी-प्रोफ़ेसर-डॉक्टर बन कर कुछ मुखर बने ये आन्दोलनकारी समाज विज्ञानं के अध्ययन में अपनी उर्जा का पर्याप्त निवेश न कर सके . इसलिए सामाजिक अन्याय की उत्पत्ति और निवारण का सही सूत्र भी न समझ सके.अपने अधकचरे ज्ञान और संघर्ष के जज्बे के अभाव में सामाजिक न्याय के आन्दोलन के नाम पर आरक्षण और संविधान वचाने तथा निजी क्षेत्र-न्यायपालिका-प्रमोशन की लड़ाई में समाज का मूल्यवान समय व धन का निवेश करवाते रहे. उधर सामाजिक विवेकशून्य जन्मजात शोषक वर्ग निजीकरण-उदारीकरण और भूमंडलीकारण, विनिवेशीकरण को हथियार बनाकर आरक्षित वर्गों, विशेषकर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले सबसे मुखर समूह दलितों को नए सिरे गुलाम बनाने का लक्ष्य पूरा कर लिया है. लेकिन आज जबकि 21वीं सदी के सभ्यतर युग में जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत किये गए शेष विश्व के वंचित तबके प्रायः अपना वाजिब हक़ पा चुके हैं:भारत के सामाजिक न्यायवादी नेताओं-एक्टिविस्टों और बुद्धिजीवियों ने उनसे सबक लेते हुए शक्ति के सभी स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई ही नहीं लड़ा . वे आज भी कागजों की शोभा बन चुके आरक्षण को बचाने अर्थात नौकरियों में बहुजनों को हिस्सेदारी दिलाने में उलझाये हुए हैं.इस कारण ही भारत सामाजिक अन्याय की धारा आज भी सदियों की भाँति प्रवाहमान है.

Read it also-झंडा अशुद्ध हो जाएगा, कहकर दलित सरपंच को झंडा फहराने से रोका
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

रजवार विद्रोह के नायकों को सम्मान दिलाने आए वंशज

1

प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के 160 साल और देश की आजादी के 70 साल बाद भी आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कई नायक पीछे छूट गए. न ही उनके नाम पर कोई मूर्ति स्थापित की जा सकी और न ही उनके परिजनों की खोज खबर ली गई. जबकि भारत के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन में नवादा के जवाहिर रजवार, एतवा रजवार औऱ फतेह रजवार की उल्लेखनीय भूमिका रही है. ऐसे गुमनाम नायकों की भूमिका का जिक्र ब्रिटिश दस्तावेजो में भी उपलब्ध है. ऐसे गुमनाम नायकों को पहचान दिलाने का काम बिंबिसार फाउंडेशन कर रही है. संस्था मेसकौर प्रखंड के सीतामढ़ी के राजवंशी ठाकुरबाड़ी परिसर में गुमनाम नायकों की मूर्ति स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है. फाउंडेशन की पहल पर जल्द ही तीनों नायकों की सांकेतिक मूर्ति स्थापित होने वाली है. अगर इन नायकों की बात करें तो जवाहिर रजवार नारदीगंज प्रखंड के पसई गांव के रहनेवाले थे, जबकि एतवा रजवार गोविंदपुर के कर्णपुर के रहने वाले थे. वहीं फतेह रजवार भी नवादा से जुड़े थे. इनके संघर्ष की कहानी का जिक्र ब्रिटिश दस्तावेजों के अलावा बिहार-झारखंड के स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक, पटना केपी जायसवाल शोध संस्थान से प्रकाशित प्रज्ञा भारती जैसे किताबों में मिलती है. इन नायकों ने भारत पर अंग्रेजी शासन के दौरान उन्हें खूब परेशान किया था. सरकारी कचहरी, बंगले, जमींदार और उसके कारिंदे की संपत्ति विद्रोहियों के निशाने पर थी. विद्रोहियों को जब भी अंग्रेजों के खिलाफ मौका मिलता वो घटना को अंजाम देने से नहीं चूकते थे. तब अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह पर काबू पाने के लिए विद्रोहियों को चोर औऱ डकैत जैसा नाम देना शुरू कर दिया ताकि आम जनता विद्रोहियों को समर्थन देना बंद कर दे. अंग्रेज इनके विद्रोह से खासे परेशान हो गए. आखिरकार अंग्रेजों ने इनको पकड़ने की मुहिम शुरू कर दी. 27 सितंबर 1957 को जब जवाहिर रजवार अपने करीब 300 अन्य साथियों के साथ विद्रोह की रणनीति बना रहे थे, तभी अंग्रेज सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया. इस हमले में जवाहिर रजवार के चाचा फागू रजवार की मौत हो गई और कई अन्य विद्रोहियों के साथ जवाहिर भी जख्मी हो गए. बाद में जख्मी जवाहिर की मौत हो गई. इसके पहले 12 सितंबर 1957 को एतवा की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज और जमींदारों की सेना की एतवा और विद्रोहियों से मुठभेड़ हो गई. इस लड़ाई में एतवा तो बच निकले लेकिन उनके 10-12 साथी शहीद हो गए. थके अंग्रेजों ने एतवा की गिरफ्तारी के लिए 200 रुपये का इनाम घोषित कर दिया. 9 अप्रैल 1963 को करीब दस हजार पुलिस मिलिट्री और जमींदार की फौज ने एतवा रजवार को गिरफ्तार करने के लिए अभियान चलाया, लेकिन एतवा बच निकले. इसके बाद वीर नायक एतवा रजवार के नेतृत्व में 10 सालों तक छिटपुट विद्रोह चलता रहा. बिंबिसार फाउंडेशन इन नायकों को और उनके शानदार इतिहास को सहेजने की कोशिश में जुटा है.

अशोक प्रियदर्शी Read it also-दलित महिला को हैंड पंप से पानी पीना पड़ा भारी, स्थानीय बदमाशों ने की बुरी तरह पिटाई
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

बीबीएयू के छात्रों ने पीएच.डी.हिन्दी के रिजल्ट में धांधली का लगाया आरोप

हिंदी विभाग, बी.बी.ए.यु. लखनऊ में पीएच.डी. चयन का फाइनल रिजल्ट घोषित किया गया, जिसमें साक्षात्कार के स्तर पर एस.टी./एस. सी./ओ.बी.सी. छात्रों के साथ भेद-भाव करते हुए बड़े पैमाने पर धांधली की गई. ज्ञात हो कि विश्वविद्यालय द्वारा पीएच.डी. में चयन के लिए लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार लिया गया था. लिखित परीक्षा में पहले दूसरे और तीसरे स्थान पर सामान्य वर्ग के विद्यार्थी थे, जिनमें 2 का चयन कर लिया गया. उसके बाद चौथे से नौवें स्थान तक सभी ओ.बी.सी. अभ्यर्थी थे.जिसमें किसी का चयन नहीं किया गया, सीधे 10वें स्थान के सामान्य विद्यार्थी का चयन किया गया. पुनः 11वें स्थान से 17 स्थान तक के ओ.बी.सी./एस.सी./एस.टी. अभ्यर्थियों को छोड़कर केवल 3 सामान्य अभ्यर्थियों में 2 का चयन कर लिया गया. इससे साफ़ पता चलता है कि साक्षात्कार में पूर्वाग्र से ग्रसित होकर चयन समिति ने चुन-चुनकर सामान्य अभ्यर्थियों को ज्यादा अंक दिए हैं. सूत्रों से पता चला है कि हिंदी विभाग के अध्यक्ष सहित साक्षात्कार समिति के सभी सदस्य जो नंबर दे रहे थे वे सवर्ण थे.

महोदय जैसा कि आप जानते हैं विश्वविद्यालय में 100 नम्बर का इंट्रेन्स टेस्ट होता है . छात्र के प्राप्तांक का 80% रिटेन का अंक, Net&JRF है तो 5 अंक, UG प्रथम श्रेणी में है तो 2 नम्बर, द्वितीय श्रेणी में है तो 1 अंक मिलता है . इसी तरह PG प्रथम श्रेणी में है तो 3 नम्बर, द्वितीय श्रेणी में है तो 2 अंक मिलता है . साक्षात्कार 10 नम्बर का है . जिसमें रिसर्चर प्रपोजल का 5 नम्बर और मौखिक अभिव्यक्ति हेतु 5 अंक निर्धारित किया गया है . इस 10 नम्बर के साक्षात्कार में अनारक्षित मेरिट में आने वाले ST,SC,OBC, छात्रों को अधिकतर 1 नंबर दिया . उन सवर्ण छात्रों को जिनका एडमिशन पीएच.डी.में नहीं लेना था अधिकतम 3 अंक दिया गया है . इसका परिणाम यह हुआ कि रैंक नम्बर 4 से रैंक नम्बर 16 तक आने वाले SC,ST,OBC छात्र अंतिम मेरिट से बाहर हो गए हैं . कुलपति महोदय यह व्यवहार अन्यायपूर्ण है.हमारी मांग है कि इस रिजल्ट को तत्काल रद्द कर पुन: साक्षात्कार कराया जाय और एक पारदर्शी परिणाम घोषित किया जाए.

धर्मवीर यादव गगन

Read it also-यूपी में भी मुजफ्फरपुर जैसा कांड, मायावती ने खोला मोर्चा

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

जानिए, आखिर RSS ने क्यों बुलाना पड़ा ‘दलित चिंतन बैठक’

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे पास आ रही है, दलित वोटों को लेकर घमासान तेज हो गया है. 2014 के चुlनाव में अगर भाजपा जीत पाई तो उसकी एक बड़ी वजह यह रही कि दलितों और पिछड़ों ने भाजपा को खुल कर समर्थन दिया था. हालांकि उत्तर प्रदेश के दलित बसपा के पीछे गोलबंद रहें लेकिन उसके बाहर भाजपा दलित वोटों को हासिल करने में सफल रही थी.

लेकिन पिछले कुछ दिनों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को दलितों से जुड़े कई मुद्दों पर आलोचना का शिकार होना पड़ा है. बीते वक्त में रोहित वेमुला की सांस्थानिक आत्महत्या, सहारनपुर की घटना और एससी-एसटी एक्ट में संशोधन की कोशिश के बाद दलित भाजपा से दूर हुए हैं. भाजपा को लेकर दलितों का गुस्सा हरियाणा में अत्याचार के खिलाफ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के दौरान भी देखने को मिला जब बौद्ध धर्म अपनाने के बाद लोगों ने भाजपा को वोट न देने की शपथ खाई थी.

यही वजह है कि अब भाजपा और संघ यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि देश का दलित वोटर उनसे क्यों नाराज है? और उन्हें कैसे दुबारा अपने पाले में लाया जा सकता है. खबर है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा समर्थित थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन दलित चिंतन के मुद्दे पर एक बैठक बुलाने की तैयारी में है. यह बैठक जल्द ही बुलायी जा सकती है और यह बैठक अलग-अलग सेशन में आयोजित की जाएगी.

इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी के महासचिव राम माधव करेंगे. इन बैठकों में भाजपा सांसद, पार्टी के बड़े पदाधिकारी और दलित समुदाय से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होंगे.

खबर है कि इस बैठक में यह टटोलने की कोशिश की जाएगी कि आखिर दलित समाज भाजपा को लेकर गुस्से में क्यों है? खबर है कि बैठक में रोहित वेमुला की आत्महत्या, चंद्रशेखर रावण पर रासुका लगाने और उसे लगातार बढ़ाते रहने के मुद्दे के प्रभाव पर भी चर्चा होगी. दलित चिंतन बैठक ऐसे समय में किया जा रहा है जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. लोकसभा चुनाव को लेकर भी भाजपा घबराई हुई है. देखना होगा कि आखिर इस चिंतन का नतीजा क्या निकलता है?

Read it also-उत्तराखंड के विद्यालयी शिक्षा महानिदेशक के आरक्षण पर बयान से बवाल
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast
 

राजस्थान में राजपुरोहितों ने दलितों को गांव से निकाला

राजस्थान के बाड़मेर जिले में राजपुरोहित समुदाय द्वारा 70 दलित परिवारों को गांव से बहिष्कृत करने का मामला सामने आया है. यह घटना बाड़मेर के कालुदी गांव की है, जो कि बाड़मेर के जिला प्रमुख का भी घर है.

दरअसल गांव के रहने वाले दिनेश उर्फ दाना राम मेघवाल ने बीते 16 अगस्त को बलतोरा पुलिस थाने में एक एफआईआर दर्ज करायी थी. अपनी शिकायत में दिनेश ने गांव के राजपुरोहित समुदाय द्वारा गांव के 70 दलित परिवारों का बहिष्कार करने की बात कही गई है.

एफआईआर के अनुसार, राजपुरोहित समुदाय के कुछ युवकों ने सोशल मीडिया पर दलितों के खिलाफ अपमानजनक बातें लिखी थीं. जिसके बाद नजदीक के ही बैती गांव के निवासी रावतराम ने राजपुरोहित समुदाय के इन युवकों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा दिया था. इस बात से नाराज होकर राजपुरोहित समुदाय ने इस संबंध में एक बैठक बुलायी और इस बैठक में गांव के 70 दलित परिवारों को गांव से बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया.

पुलिस ने राजपुरोहित समुदाय के 17 लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, 143, 341, 3(1) और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है. बाड़मेर के एसपी मनीष अग्रवाल ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं. फिलहाल गांव में पुलिस तैनात कर दी गई है. लेकिन गांव से बहिष्कार के बाद दलित परिवारों को सार्वजनिक कुओं का इस्तेमाल नहीं करने दिया जा रहा है. साथ ही दलित परिवारों के दुकानों से सामान लेने और अपने बच्चों को स्कूल भेजने पर भी पाबंदी लगा दी गई है. है.

समाज के भीतर आये दिन होने वाली ऐसी घटनायें बड़ा सवाल खड़ा करती हैं.

Read it also-‘दलित बहू स्वीकार पर दलित को बेटी नहीं देंगे’
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

दलित महिला को हैंड पंप से पानी पीना पड़ा भारी, स्थानीय बदमाशों ने की बुरी तरह पिटाई

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक शर्मनाक घटना सामने आई है जहां एक दलित महिला को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने एक सार्वजनिक हैंड पंप से पानी पी लिया. यह घटना भोजपुर इलाके की है. आरोप है कि एक दलित महिला जब भोजपुर में एक सार्वजनिक हैंड पंप से पानी पीने गई तो स्थानीय गुंडों ने उसकी पिटाई कर दी. फिलहाल यूपी पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. यह घटना 17 अगस्त की बताई जा रही है.

घटना को लेकर मुराबाद के एसपी विशआल यादव ने कार्रवाई का भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘इस मामले की चांज की जा रही है और दोषी जल्द ही गिरफ्तार किए जाएंगे. गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा में काफी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.’

बीते दिनों एक दलित युवक की शादी उत्तर प्रदेश में कई महीनों तक सिर्फ कुछ लोगों की दबंगई की वजह से रुकी हुई थी. 27 वर्षीय दलित युवक की शादी सिर्फ इसलिए रुकी हुई थी क्योंकि उसकी बारात ठाकुरों के इलाके से नहीं गुजर सकती है.

कासगंज में लड़की के गांव वाले ठाकुर समुदाय ने अपने इलाके से बारात को ले जाने से मना कर दिया था जिसके बाद दोनों की शादी अटकी पड़ी थी.

दलित युवक संजय कुमार ने अपनी शादी के लिए सरकार के सभी कार्यालयों, डीजीपी, मुख्यमंत्री से लेकर एससी/एसटी आयोग और यहां तक कि स्थानीय अखबारों तक में अपनी बात रखी लेकिन किसी ने उसकी मदद उस वक्त नहीं की.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह युवक शादी के बारात को अपनी दुल्हन के गांव में ले जाने के लिए मदद मांग रहा है जो कि ठाकुरों के वर्चस्व का इलाका था.

युवक ने कहा कि क्या वह हिंदू नहीं है? उसने प्रखंड विकास परिषद के एक सदस्य से कहा, ‘जब हमारा संविधान कहता है कि हम सभी बराबर हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हम सभी हिंदू हैं वे हिंदूवादी पार्टी को लीड करते हैं तो मैं ऐसी चीजों का सामना क्यों कर रहा हूं?’

संजय ने कहा, ‘क्या तब मैं हिंदू नहीं हूं? एक संविधान के द्वारा लोगों के लिए शासन करने का नियम अलग-अलग नहीं हो सकता है.’

गुजरात के ऊना से लेकर महाराष्ट्र तक और यूपी से लेकर झारखंड तक उच्च जाति के कुछ लोगों दलितों को निशाना बना देते हैं. हाल ही में यूपी में एक दूल्हे को घोड़े पर बैठकर शादी में जाने के लिए पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ी थी.

Read it also-महिला टीचर ने दलित बच्चों को चप्पलों की माला पहना मैदान में घुमाया
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

महिला टीचर ने दलित बच्चों को चप्पलों की माला पहना मैदान में घुमाया

हरियाणा में सरकारी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार देने के दावे कितने सही हैं उसकी एक बानगी गांव सागरपुर के स्कूल में उस समय देखने को मिली. यहां कुछ बच्चें स्कूल चप्पल पहनकर पढाई करने के लिए पहुंचे थे. लेकिन स्कूल में सविता नामक टीचर ने बच्चों को इसी बात को लेकर प्रताड़ित किया और उनके गले में उन्हीं की चप्पलों की माला पहना दी और ग्राऊंड का चक्कर भी लगवाया.

छात्रों का आरोप है कि उनको स्कूल के चक्कर भी लगवाए और धमकी भी दी कि अगर आगे से ऐसा किया तो फिर से सजा दी जाएगी. वहीं इस घटना के सामने आने के बाद दलित परिवारों में रोष देखने मिला. तो वहीं गांव के कुछ दबंगो ने आरोपी टीचर को निर्दोष बताते हुए मामले को दबाने की कोशिश की.

लेकिन पीड़ित दलित छात्राओं ने भरी भीड़ में आरोपी महिला टीचर का नाम लेते हुए बताया की टीचर ने उसके बाल बांधने वाले रिबन से चप्पलों की माला बना कर उनके गले में डाली थी. र इस घटना के बारे में अपने परिजनों को न बताने की भी धमकी दी थी. वहीं आरोपी टीचर का कहना है कि उसने केवल चप्पल की माला पहनाने की बात कही थी.

वहीं स्कूल की प्रिंसिपल टीचर की गलती को स्वीकार रही है. उनका कहना है मामला शनिवार का है लेकिन उनको कल ही पता चला है. कुछ ग्रामीण उनके पास आए थे तो टीचर ने उनके सामने माफी मांगी थी और आगे से ऐसा ना करने की बात भी कही थी. आगे से ऐसा ना हो उसका ध्यान रखा जाएगा.

इसे भी पढ़े-पुलिस ने जारी की उमर खालिद के हमलावर की तस्वीर
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

अब योगी राज में एक दरोगा की हत्या…

रायबरेली। उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हथियारबन्द बेखौफ हत्यारों ने नलकूप पर सो रहे दरोगा की धारदार हथियार से हत्याकर मौत के घाट उतार दिया. हत्यारों की क्रूरता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हत्या के बाद वे दरोगा का गुप्तांग भी काटकर उठा ले गए. हत्या की घटना की खबर समूचे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई. घटनास्थल पर बेकाबू हुई भीड़ ने चार घंटे तक लखनऊ-इलाहाबाद नैशनल हाइवे को जाम कर दिया. रोड जाम को हटाने में पुलिस के पसीने छूट गए. मृतक दारोगा के भाई की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और छानबीन में जुट गई है.

नलकूप के चौकीदार गुरु प्रसाद निवासी मझिगवां करन के अनुसार, रात करीब 10 बजे करीब आधा दर्जन लोग वहां पहुंचे और बरामदे में सो रहे दरोगा धर्मेन्द कुमार गौतम (48) पुत्र धनश्याम पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. चौकीदार ने बताया कि हत्यारों ने उनकी आंख में पट्टी बांधकर दूसरे कमरे में बंद कर दिया और दरोगा को मौत के घाट उतार दिया. बताया जाता है कि दरोगा धर्मेन्द्र कुमार अमेठी जनपद में सर्विलांस सेल में तैनात थे और दो दिन की छुट्टी पर घर आए हुए थे. मृतक दरोगा का मूल निवास हरचंदपुर थाना क्षेत्र का मझिगवां करन गांव है और वर्तमान में उनका परिवार सीएचसी बछरावां के निकट रहता है.

दरोगा धर्मेन्द्र कुमार की नृशंस हत्या की खबर सुबह करीब 4 बजे चौकीदार गुरु प्रसाद द्वारा उनके परिजनों को दी गई. घटना की जानकारी होते ही पास-पड़ोस के गांवों के सैकड़ों लोग घटनास्थल पर पहुंच गए. आक्रोशित लोगों ने लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग को जामकर दिया और पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाए. घटना की सूचना पर पहुंची पुलिस अधीक्षक सुजाता सिंह व बछरावां विधायक रामनरेश रावत ने लोगों को समझा बुझाकर शांत कराया और जाम खिलवाया.

मृतक के भाई वीरेन्द्र कुमार गौतम जिला पंचायत सदस्य बछरावां ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ थाने में तहरीर दी है. पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है. घटना को लेकर क्षेत्र मे भय एवं दहशत का माहौल बना हुआ है. पुलिस घटना की छानबीन में जुट गई है.

दरोगा की हत्या के समय कमरे में बंद चौकीदार कमरे के बाहर कैसे निकला और पूरी रात गुजारने के बाद सुबह 4 बजे परिजनों को सूचना देने पहुंचा? रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक चैकीदार कहां रहा? यह सब जांच के विषय हैं.

इसे भी पढ़े-हैंडपंप लगवाकर विधायक ने की दलित परिवार की मदद, पानी पिलाकर पूरी की प्रतिज्ञा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

मुंबई: बहुमंजिला इमारत में लगी आग, 4 की मौत, 16 घायल

मुंबई। मुंबई के परेल इलाके में क्रिस्टल टावर में लगी आग को बुझा लिया गया है फायर बिग्रेड की दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया. घटना में 4 लोगों की मौत हो गई है जबकि 16 लोग घायल हो गए हैं. मरने वालों में एक महिला और एक बुजुर्ग शामिल हैं. घायलों को केईएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है. यह आग इस रिहाइशी बिल्डिंग की 12वीं और 13वीं मंजिल पर लगी थी. जिस जगह यह बिल्डिंग है वो हिंदमाता सिनेमा के नजदीक है.

आग लगने की सूचना फौरन दमकल विभाग को दी गई. जानकारी मिलते ही दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंच गई हैं और 2 घंटे बाद आग पर काबू पा लिया. दमकल की 10 गाड़ियां आग पर काबू पाने की कोशिश में जुटी हुई थी.

जानकारी के मुताबिक, जिस टावर में आग लगी थी, वो 15 मंजिला इमारत है. आग कैसे लगी इसका अभी पता नहीं चल सका है. फायर ब्रिगेड फंसे लोगों को बचाने का काम कर रही थी. कई लोगों को इमारत से सुरक्षित बाहर निकाला गया है.

इस आग को थर्ड लेवल का बताया जा रहा था, जो बहुत खतरनाक मानी जाती है. बताया जा रहा है कि आग ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ रही थी. 10 से 12 गाड़ियां आग बुझाने का काम कर रही थी. क्रेन के जरिए लोगों को को बचाने का काम किया जा रहा था. बचाए गए लोग काफी डरे हुए हैं. जिन्हें इमारत से निकाला गया है उनमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल है. बताया जा रहा है कि परेल के हिंदमाता इलाके में यह इमारत 4 साल पहले ही बनी थी. प्रारंभिक रूप से आग का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है.

गौरतलब है कि जून के महीने में आरटीआई से मिली जानकारी में पता चला था कि मुंबई में पिछले 6 साल में आग की 29,140 घटनाएं रेकॉर्ड की गई हैं. इस आग में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

 
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

अपने फैन् के कहने पर इस एक्टर ने की केरल बाढ़ पीड़ितों 1 करोड़ रुपय आर्थिक मदद

0

बाढ़ के चलते केरल में आम लोगों की जिंदगी बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में फिल्मस्टार्स की ओर से मिल रही मदद सुकून देने वाली है. जी हां, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, शाहरुख खान और ऋतिक रोशन समेत कई बॉलीवुड एक्टर्स ने बाढ़ प्रभावितों के लिए आर्थिक मदद की है. इस लिस्ट में नया नाम जुड़ा है एक्टर सुशांत सिंह राजपूत का जिन्होंने केरल में बाढ़ प्रभावितों के लिए करीब एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद की है.

दरअसल, सुशांत ने ये फैसला अपने एक फैन के कहने पर लिया. सोशल मीडिया पर उनके एक फैन शुभम रंजन ने कहा था कि वह केरल की बाढ़ पीड़ितों की मदद करना चाहता है, लेकिन उसके पास पैसे नहीं है. इस पर सुशांत सिंह राजपूत ने अपने फैन की ओर से 1 करोड़ रुपए मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा किए हैं.

फैन के लिए लिखा ये मैसेज… सुशांत ने अपना वादा पूरा करते हुए 1 करोड़ रुपए दान किए और इसके बाद सोशल मीडिया पर लिखा- ‘मेरे दोस्त शुभम रंजन जैसा कि मैंने वादा किया था, जो तुम चाहते थे वह काम हो गया है. तुमने मुझे यह करने के लिए प्रेरित किया और मुझे तुम पर गर्व है. तुमने ये तब किया जब इसकी वास्तव में जरूरत थी. ढेर सारा प्यार..’.

2013 में आई केदारनाथ आपदा पर बेस्ड सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म भी रिलीज हो रही है. इस फिल्म में सारा अली खान नजर आने वाली है. पहले सारा इसी फिल्म से डेब्यू करने वाली थी, लेकिन अब यह फिल्म 2019 में रिलीज होनी है. सुशांत इन दिनों कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की फिल्म ‘किज्जी और मनय’ की शूटिंग कर रहे हैं. इस फिल्म से मुकेश डायरेक्शन में अपना डेब्यू करने जा रहे हैं. इसके अलावा उनके पास ‘सोन चिरैया’ जैसी फिल्म भी है.

बता दें कि दक्षिण भारत का राज्य केरल पिछले कई दिनों से बाढ़ की चपेट में है. बाढ़ के चलते केरल में आम लोगों का जन-जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. आपदा की इस घड़ी में सरकार के साथ ही कई आम लोग भी केरल में बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए आगे आए हैं. इनमें फिल्म जगत की भी कई मशहूर हस्तियां हैं, जिन्होंने आगे बढ़कर बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में आर्थिक मदद भिजवाई है. केरल में बाढ़ के चलते 300 से ज्यादा लोग अब तक अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि लाखों बेघर हो गए हैं.

Read it also-केरल की बाढ़ को केंद्र सरकार ने गंभीर आपदा घोषित किया, राष्ट्रीय स्तर पर मिलेगी मदद
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

28 अगस्त को होगा भारत बंद, व्यापारियों ने किया ऐलान

नई दिल्ली।  28 अगस्त को देश भर के व्यापारी पूरे देश में भारत बंद रखेंगे. फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट डील के विरोध में अखिल भारतीय व्यापारी संघ (कैट) ने इस बात की घोषणा करते हुए कहा कि यह डील खुदरा व्यापारियों को भुखमरी के कगार पर ला देगी.

कैट के सचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सरकार ई-कॉमर्स कंपनियों को बढ़ावा दे रही है, जिससे खुदरा व्यापारियों की कमर टूट रही है. ऑनलाइन कंपनियां ज्यादातर ग्राहकों को काफी बड़ा डिस्काउंट देती है, जिससे उन्हें नुकसान होने पर भी डर नहीं रहता है.

कैट ने कहा है कि वो भारत बंद के अलावा इस डील के विरोध में 15 सितंबर से पूरे देश में रथ यात्रा भी शुरू होगी. इस रथ यात्रा के समापन पर 16 दिसंबर को एक बड़ी रैली का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें पूरे देश के व्यापारी संगठन हिस्सा लेंगे.

कैट की यह आम सभा नागपुर में आयोजति की गई थी, जिसमें देश भर के 200 व्यापारी संगठनों ने हिस्सा लिया था. व्यापारियों ने फैसला किया है कि आगामी 28 अगस्त को बंद के दौरान सभी व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों को बंद रखेंगे और अपने-अपने जिलों में ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे.

अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट ने रविवार को कहा था कि उसने भारतीय कंपनी फ्लिपकार्ट के साथ लगभग 16 अरब डॉलर का सौदा पूरा कर लिया है और अब उसके पास फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी है. वॉलमार्ट के इस निवेश में फ्लिपकार्ट के कारोबार को रफ्तार देने को नई इक्विटी फंडिंग के लिए 2 अरब डॉलर का निवेश भी शामिल है.

इस वर्ष मई में तय किया गया यह महासौदा भारतीय खुदरा बाजार का अब तक का सबसे विशाल सौदा है, साथ ही यह वॉलमार्ट द्वारा किया गया सबसे बड़ा अधिग्रहण भी है जो कि कंपनी को अपने प्रतिस्पर्धी अमेजन से मुकाबला करने में मदद करेगा.

Read it also-एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को नीतीश कुमार ने दिया बड़ा तोहफा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

सामाजिक बहिष्कार के बाद करीब 300 दलित परिवारों ने अपनाया बौद्ध धर्म, भाजपा को वोट न देने की खाई शपथ

नई दल्ली। हरियाणा के हिसार में जून 2017 में गांव भाटला में हैंडपंप से पानी भरने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बौद्ध धर्म परिवर्तन तक पहुंच गया. भाटला में सोमवार को गुरू रविदास मंदिर में कार्यक्रम का आयोजन कर करीब 150 अनुसूचित परिवार के लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन करते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया. इसमें रोहनात से आए दलित समुदाय के 22 लोग भी शामिल हुए.

धर्म अपनाने से पहले बौद्ध भिक्षुओं ने अनुसूचित वर्ग के लोगों को धर्म दीक्षा दी. उत्तराखंड व सहारनपुर से आए बौद्ध भंतों धर्म सागर, भंते आनंद सागर व भंते निर्भय सागर ने धर्म दीक्षा की प्रक्रिया संपन्न करवाई. इस दौरान उन्होंने भविष्य में कभी बीजेपी को वोट न देने की शपथ भी ली.

धर्म परिवर्त्तन के कार्यक्रम को लेकर रविवार रात से ही तैयारियां शुरू कर ली गई थी. सुबह 10:30 बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. दिनेश खापड़ ने समारोह की अध्यक्षता की व श्रवण थुराना ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत की. वक्ताओं ने अपने संबोधन में इस धर्म पविरर्तन के लिए भाजपा सरकार को जिम्मेवार ठहराया. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने ऐसे अधिकारियों की भर्ती की है, जो दलितों का उत्पीडऩ कर रहे है.

धर्म सागर, भंते आनंद सागर व भंते निर्भय सागर ने कहा रोहनात गांव के लोगों की जमीन 1857 के गदर के बाद अंग्रेजों ने दूसरे गांवों के लोगों को नीलाम कर दी थी. जिसे वापस पाने के लिए करीबन 150 दलित परिवार पिछले 50 साल से सरकार के साथ लड़ाई लड़ रहे हैं. शहीदों के वंशज होने के बावजूद भी उन्हें आज तक अपनी जमीन वापस ना मिली है. उनकी मांगे नहीं मानी गई तो वह भी आने वाले समय में अपने गांव रोहनात में भी बौद्ध धर्म ग्रहण करने का काम करेंगे.

15 जून 2017 माह में गांव भाटला में हैंडपंप से पानी भरने को लेकर दो जातियों के युवाओं में विवाद हो गया था. अगस्त माह में किसी ने दलित समुदाय के बहिष्कार की मुनादी करवा दी. जिसके बाद मामला बढ़ता गया. 2 सितंबर को हाइकोर्ट की ओर से निर्देश के बाद सेशन जज गांव का दौरा करने पहुंचे थे. एससी-एसटी आयोग की टीम तो कभी हाईकोर्ट से कमीश्नर ने गांव में पहुंच कर दौरा किया था. इस मामले में एससी एसटी कमीशन में तथा हिसार अदालत में भी केस चल रहा है.

रजत कल्सन ने कहा मौजूदा सरकार नफरत के सहारे अपनी राजनीतिक चला रही है. इसी राजनीति के चलते हुए हरियाणा को तीन बार आग के हवाले कर चुकी है. उन्होंने कहा कि आने वाले समय मे अन्य जिलों में भी सरकार की दलित विरोधी मानसिकता के चलते इस तरह के बोद्ध धर्म ग्रहण कार्यक्रम के आयोजन किये जाएंगे. बीजेपी को वोट ने करने की शपथ कराई जाएगी. जल्दी ही हांसी में भी 500 दलितों को बौद्ध धर्म ग्रहण कराया जाएगा. उन्होंने दावा किया कि सोमवार को 300 परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया है.

Read it also-धर्मांतरित आदिवासियों को भी मिलता रहेगा आरक्षण का लाभ : केंद्र सरकार
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast