नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने केरल की बाढ़ को गंभीर प्राकृतिक आपदा घोषित किया है. इससे पहले केरल हाई कोर्ट को केंद्र ने सूचित किया कि राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है. कांग्रेस और दूसरे दल राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग कर रहे थे.
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि पिछले एक सप्ताह में बाढ़, बारिश और भूस्खलन के कारण हुए नुकसान को देख यह निर्णय लिया गया. जब किसी आपदा को दुर्लभ गंभीर/गंभीर प्रकृति का घोषित किया जाता है तो राज्य सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर मदद दी जाती है. केंद्र राष्ट्रीय आपदा कोष से भी अतिरिक्त मदद देने पर विचार कर रहा है. केरल में रविवार को बारिश थमने से लोगों ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन अभी भी उनकी कठिनाई जस की तस है. सभी जिलों में जिलाधिकारी व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं.
केंद्रीय मंत्री जे अल्फोंस ने कहा कि इस मुसीबत के समय में मछुआरे सबसे बड़े हीरो बनकर उभरे हैं. बचाव अभियान के दौरान उन्होंने अपनी करीब 600 नावें मदद के लिए दी. बाढ़ के कारण किसी भी घर में बिजली नहीं है, न ही अन्य तरह की सुविधाएं हैं. अभी सबसे ज्यादा वहां पर इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, कारपेंटर की जरूरत है. अभी वहां खाना और कपड़े की जरूरत नहीं है.छह और शव मिलेराज्य में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से सात लाख 24 हजार से ज्यादा विस्थापित लोगों को 5,645 राहत शिविरों में रखा गया है.
एर्नाकुलम जिले के पारूर में रविवार रात छह और शव मिले हैं. स्थानीय विधायक वीडी सतीशन ने बताया कि इसके साथ ही आठ अगस्त से शुरू हुए बाढ़ से मरने वालों की संख्या 216 पहुंच गई है. विमान सेवा शुरूकई दिनों के बाद राज्य में विमान सेवा बहाल हुई है. कोचीन हवाई अड्डा बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब गया था जिससे सेवा बंद करनी पड़ी थी. अब कोच्चि नौसैनिक अड्डे से विमान सेवा शुरू की गई है. महामारी रोकने में जुटा केंद्रकेंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि केंद्र की ओर से केरल को पूरी मदद दी जा रही है. राज्य में करीब 3757 मेडिकल कैंप लगाए गए हैं, जिसमें 90 किस्म की दवाइयां भेजी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि महामारी को फैलने से रोकने की तैयारी की जा रही है. केंद्र सरकार ने 100 मीट्रिक टन दालों के अलावा आवश्यक दवाइयां भेजी हैं.
सर्वाधिक प्रभावित स्थानों जहां लोग पिछले तीन दिनों से भोजन या पानी के बिना फंसे हुए हैं, उनमें चेंगन्नूर, पांडलम, तिरुवल्ला और पथानामथिट्टा जिले के कई इलाके, एर्नाकुलम में अलुवा, अंगमाली और पारावुर में शामिल हैं. केरल सरकार ने बाढ़ से कुल 19,500 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया है.
बारिश से राहत के बाद सभी जिलों में जारी किया गया रेड अलर्ट वापस ले लिया गया है. मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में भारी बारिश से राहत का दावा किया है. इसके बाद भी राज्य में जान-माल का जो नुकसान हुआ है, उससे केरल और वहां के लोगों का जीवन पटरी पर लौटने में काफी समय लग सकता है.
राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा, ‘हमारी सबसे बड़ी चिंता लोगों की जान बचाने की थी. लगता है कि इस दिशा में काम हुआ. शायद यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है, जिससे भारी तबाही मची है. इसलिए हम सभी प्रकार की मदद स्वीकार करेंगे.’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशवासियों से अप्रत्याशित बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहे केरल की मदद करने की अपील की है. सरकार्यवाह सुरेश भैय्या जोशी ने कहा है कि यद्यपि केंद्र सरकार और राज्य सरकार सहित कई सामाजिक संगठन युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन संकट अतिविकट होने के चलते सभी को इसके लिए आगे आना होगा.
उन्होंने कहा कि केरल भयानक संकट के कगार पर खड़ा है. इसे राष्ट्रीय आपदा बताते हुए कहा कि इसमें जहां अभी तक सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं वहीं लाखों लोग बेघर हो चुके हैं. सेना, राष्ट्रीय आपदा बल, केंद्र और राज्य सरकारों सहित सामाजिक संगठनों के प्रयासों की सराहना करते हुए जोशी ने कहा कि संकट विकट है और साधन सीमित हैं. ऐसे में संघ धार्मिक, सामाजिक सहित सभी देशवासियों से अपील करता है कि वे केरल के लोगों के साथ खड़े हों और पीडि़तों की बढ़-चढ़कर हरसंभव सहायता करें.
इसे भी पढ़े-वनांचल क्षेत्र कुई में आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दिए जाने वाले राशन में कटौती- दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast


बताया गया है कि हैलिना का परीक्षण उसकी पूरी रेंज में किया गया. यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा और टेस्ट के दौरान इसने अपने हर टारगेट को हासिल किया. सभी पैरामीटर को टेलिमेटरी स्टेशन, ट्रैकिंग सिस्टम और हेलिकॉप्टर के जरिए मापा गया.
प्रोफेसर संजय ने वाजपेयी को लेकर दो पोस्ट लिखा. अगर इन दोनों पोस्टों को देखें तो इसमें वही लिखा है, जो सच है और किसी भी गलत भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है. बावजूद इसके उनपर हमला किया गया.
प्रोफेसर संजय कुमार ने अपने ऊपर हुए हमले का आरोप वीसी अरविंद अग्रवाल पर लगाया है. मोतिहारी थाने में की शिकायती में उन्होंने आरोप लगाया है कि आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की वजह से उन्हें पहले भी धमकी मिलती रहती है. मुझपर फेसबुक कमेन्ट को बहाना बना कर हमला किया गया है. हमला करने वाले कुलपति के निकट के लोग है. जिन्हें कुलपति ने रैगिंग कमेटी में शामिल कर रखा है.
तो वहीं स्वामी अग्निवेश ने आरोप लगाया कि दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि देने के दौरान उनके साथ मारपीट की गई. स्वामी अग्निवेश को इससे पहले झारखंड में भी निशाना बनाया जा चुका है. सवाल है कि विचारों की भिन्नता पर किसी पर जानलेवा हमले का बढ़ता चलन कितना जायज है.
गोपाल राम के गांव में लगभग 20 घरों को वन विभाग की तरफ से खाली करने की नोटिस मिला है. इसी गांव की सुनती देवी बताती हैं कि अधिकारी केस करने की धमकी देते हैं. चार लोगों पर केस भी हो गया है. यहां के किसानों की करीब 50 एकड़ जमीन है, जिसे वन विभाग ने खाली करने को कहा है. कान्हा चट्टी प्रखंड के छेवटा गांव के जुलाल दांगी, आगे जीवन कैसे यापन करेंगे, इसे लेकर चिंता में हैं. वो कहते हैं, “हमारे पूर्वजों ने ज़मींदार से 44 हुकुमनामा पर ज़मीन लिया था. 1957 से लेकर 2012 तक रसीद भी कटी, लेकिन इसके बाद से रसीद कटनी बंद हो गई. अब वन विभाग कोई कागज़ को नहीं मान रहा. जबरन ज़मीन अपने कब्जा में ले रहा है.” जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन इस बाबत बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं होने की दलील देते हैं. हालांकि वे ये भी मानते हैं, “कागज़ात को जांचने का काम तो भू-अर्जन पदाधिकारी का ही होता है, लेकिन गांव में अधिकतर लोगों ने फर्जी तरीके से कागज़ात बना रखा है.”
छेवटा के ही कई आदिवासी परिवार इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. यहां के लोगों कहना है कि उनके एक घर पर वन विभाग ने पोकलेन तक चला दिया है. शांता और बिछू देवी कहती हैं, “हमलोगों ने भी ठान लिया है कि ज़मीन किसी भी क़ीमत पर खाली नहीं करेंगे क्योंकि इसके सारे कागज़ात हमारे पास हैं.” वन क़ानून के जानकार और झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बासु मलिक कहते हैं, “वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत तीन पीढ़ी से रहते आ रहे लोंगों को काफ़ी अधिकार प्राप्त हैं. कोई पर्चा-रसीद धारक या जिनके पास कागज़ात नहीं भी है, वो भी ज़मीन पर दावा कर सकते हैं. इसके लिए लिए क़ानून में प्रावधान है. इसके लिए गांव सभा और आसपास के लोगों को स्वीकृति देनी पड़ती है कि ये यहां तीन पीढ़ी से रहते आ रहे हैं.” बासु ये भी कहते हैं कि ग्रामीणों के पास जो पर्चा है, वो गैरमजरुआ ख़ास ज़मीन का है और उसकी रसीद भी कटती थी, लेकिन राज्य में नई सरकार ने इसे साल 2015 के बाद से बंद कर दिया है. वो कहते हैं, “अब ऐसा लगता है कि सरकार इसे जंगल और सरकारी ज़मीन बताकर अपने कब्जा में लेना चाह रही है.”
पकरिया और ढड़हा गांव की अधिकांश आबादी और इससे पीड़ित परिवार दलित और आदिवासी है, जिनकी 250 से एकड़ से अधिक की ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. यहां के कई किसानों ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और कई अन्य इसकी तैयारी कर रहे हैं. चतरा प्रखंड के ही गोडरा, लूपुंगा और लातबेर गांव में ये आंकड़ा तकरीबन 400 के करीब है, जहां के किसानों और ग्रामीणों को वन विभाग की तरफ से कोई नोटिस तो नहीं मिला है. लेकिन सर्वेयर ने ये बताकर, उनकी ज़मीन का रजिस्ट्रेशन नहीं किया है कि ये वन भूमि की ज़मीन है और इसे लेकर किसी भी समय नोटिस या खाली करवाया जा सकता है. लेकिन इस पूरे मामले पर चतरा के ज़िलाधिकारी जीतेंद्र कुमार सिंह सिर्फ ये कहते हुए अपनी बात खत्म कर देते हैं कि इस मामले वो देख रहे हैं. चतरा के सांसद सुनील कुमार सिंह ने इस बारे में बीबीसी को बताया कि ये मामला उनके संज्ञान में है. वो इसे लेकर संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं. वो कहते हैं, “वन अधिकारियों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं कर रहे हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को भयभीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य ये है कि प्रभावित लोगों की न तो अपत्ति दर्ज की जा रही है और न उनका पक्ष सुना जा रहा है.”
किसान भले ही चाहे जो भी दलील दें लेकिन एलआरडीसी अनवर हुसैन कहते हैं, “बहुत से ग्रामीणों की रसीद फ़र्ज़ी हैं. ये लोग अंचल स्तर के कर्मचारियों से सांठगांठ कर फ़र्ज़ी ढंग से रसीद कटाते आए हैं. रही बात पर्चे की तो ये अनुमंडल से मिलता है, जिसे जांचा जाना चाहिए कि कब, कैसे और किस आधार उन्हें ज़मीन का पर्चा दिया गया है.” दूसरी तरफ़ आदिवासी किसानों को ज़मीन खाली करने को लेकर मिले नोटिस के बारे में डीएफओ आरएन मिश्रा ने भी साफ़ तौर से इंकार किया. किसानों के मकानों पर पोकलेन चलाने वाले आरोप को भी निराधार बताते उन्होंने कहा, “तीन-चार गांव में पोकलेन चला, लेकिन किसी भी आदिवासी के गांव या घर पर नहीं.”
पाकिस्तान के प्रमुख उर्दू और अंग्रेज़ी अख़बारों ने अपनी वेबसाइट पर वाजपेयी के निधन की ख़बरों को प्रमुखता से छापा है.
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट की हैडलाइन है – “इमरान खान ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में वाजपेयी की भारत-पाक रिश्तों की कोशिशों की सराहना की.”
साल 2001 में आगरा शहर में उन्होंने पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ शिखर वार्ता की थी. दोनों देश किसी ज्वाइंट स्टेटमेंट पर राज़ी नहीं हो पाए थे और सम्मेलन को असफल करार दिया गया था. लेकिन वाजपेयी की छवि और बेहतर हुई.
ओली ने कहा कि भारत और दुनिया ने अपना बड़ा नेता खो दिया और नेपाल ने अपना सच्चा दोस्त और शुभचिंतक.
अफ़ग़ानिस्तान के नेताओं ने भी वाजपेयी के निधन पर दुख जताया. पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई और भारत में अफ़गानिस्तान की राजदूत शाइदा अब्दली ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.
ममता को उसके माता-पिता ने अपने रिश्तेदारों से गोद लिया था जब वह एक साल की थी. उसे प्यार था सुमिन से जो उन्हीं के यहां किराये के कमरे पर रहता था. ममता एक जाट परिवार से थीं जो हरियाणा में एक अगड़ी जाति मानी जाती है. वहीं सुमिन वाल्मिकी जाति से है जो एक अनुसूचित जाति है.
पुलिस में दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक ममता 2017 में अपने प्रेमी सुमिन के साथ घर से चली गई और दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली. तब सुमिन की उम्र 26 साल थी और ममता के पिता के आरोप के मुताबिक तब ममता की उम्र 17 साल थी.
सुमिन के छोटे भाई दिनेश ने बताया कि वे लोग ममता का दाह-संस्कार करना चाहते थे लेकिन गांव की पंचायत ने मना कर दिया क्योंकि खाप के सिस्टम के हिसाब से आठ गांवों में भाईचारा है और लड़का और लड़की के गांव इन्हीं आठ गांवों में आते हैं.
इस गांव के सरपंच तो नहीं मिले लेकिन उन्होंने फ़ोन पर कहा कि उनके भाई और बेटे से इस मामले पर जानकारी ले ली जाए. सरपंच के भाई अतर सिंह ने बताया कि क्योंकि मामला आठ गांव के भाईचारे का था और ममता के यहां दाह-संस्कार पर विवाद हो सकता था, इसलिए पंचायत ने मना कर दिया. साथ ही उन्होंने दिनेश की कही बात भी दोहराई कि जाट लड़का अगर अनुसूचित जाति की लड़की से शादी कर ले तो पंचायत को ऐतराज़ नहीं होता लेकिन लड़की के ऐसा करने पर विवाद हो जाता है. वो कहते हैं कि पहले हरिजनों और जाटों का भाईचारा होता था लेकिन अब कोई ऐसा नहीं मानता. सरपंच के बेटे सहदेव ने बीच में कहा कि वो भी एक अनुसूचित जाति की लड़की से शादी करना चाहते थे लेकिन घरवाले नहीं माने और फिर अरेंज मैरिज हुई.
हरियाणा की महिला आयोग की अध्यक्षा प्रतिभा सुमन ने बताया कि उन्होंने प्रशासन को लिख कर दिया था कि ममता की अंतिम क्रिया आयोग करना चाहता है.
“जिन मां-बाप ने अपनी बेटी की जान ले ली, उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए उसकी अंतिम क्रिया का.”
प्रतिभा सुमन बताती हैं कि ग्रामीण स्तर पर इन बुराइयों को ढंकने में सरपंचों की अहम भूमिका होती है.
वो खुद एक घटना के बारे में बताते हुए रोने लगती हैं कि एक गांव में एक सरपंच के परिवार ने ही अपने घर की बहू को ईखों में ले जाकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया क्योंकि वो अपने पति की ज़्यादतियों से परेशान थी और उसे छोड़ किसी और पुरुष के साथ रहना चाहती थी. इस अपराध में उस महिला के बेटे भी शामिल थे.
महिला आयोग की सदस्यों ने ही ममता की अर्थी को कंधा दिया और पूरी अंतिम क्रिया की.
वैसे संजय कुमार की फेसबुक प्रोफ़ाइल पर अब ये पोस्ट नज़र नहीं आ रही है. मृत्युजंय कुमार बताते हैं, “हमलोग पोस्ट तो नहीं ही हटाते. इस पोस्ट पर जितनी गालियां पड़ी थीं उसे देखते हुए फ़ेसबुक ने इसे स्पैम में डाल दिया होगा. इन पोस्टों के चलते ही संजय पर शुक्रवार को ही हमला हो गया.”
इमरान के शपथ ग्रहण में देश-विदेश से मेहमान पहुंचे हैं इनमें भारत के क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं.
रायपुर| बसपा सुप्रीमो मायावती ने निर्देश दिया है कि सितंबर से पहले पार्टी प्रदेश में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर ले। इतना ही नहीं सेक्टर और ब्लॉक लेवल पर भी चुनावी टीम इस अवधि के अंदर तैयार ली जाए। सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में छग बसपा के छह प्रभारी तीसरी समीक्षा बैठक करेंगे। हालांकि इससे पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ उनकी बैठक की संभावना भी है। पार्टी ने चुनाव के मद्देनजर संगठन में बड़ा बदलाव किया है। जिसके बाद प्रदेश को चार जोन में बांटा गया है। पहले पार्टी पांच जोन के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। जोन एक में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर को रखा गया है। जबकि जोन दो में कोरबा और सरगुजा की लोस और विस सीटें हैं। जोन तीन में महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव और जोन चार में बस्तर,कांकेर की सीटें रखी गई है। इसी के मुताबिक पार्टी चुनावी गतिविधियां संचालित करेगी। चारों जोन में प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ स्थानीय पदाधिकारी भी होंगे। वहीं जोन की टीम की मॉनिटरिंग प्रदेश प्रभारियों के जिम्मे होंगी। बसपा के फिलहाल छह प्रदेश प्रभारी हैं।
Ø बात 1984-1989 के दौर की है जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे. तब भारत में इस बीमारी के लिए उत्तम चिकित्सा व्यस्था उपलब्ध न थी. और आर्थिक वजहों से वाजपेयी अमेरिका जा पाने में सक्षम नहीं थे.
Ø जब अटलजी पहली बार सांसद बने थे तो वह वक्त सांसदों की ऐश का वक्त नहीं था. सुविधाएं भी काफी कम थी. भाजपा नेता जगदीश प्रसाद माथुर और अटलजी दोनों एक साथ चांदनी चौक में रहते थे. दोनों साथ-साथ पैदल ही संसद जाते-आते थे. छह महीने बाद अटलजी ने रिक्शे से चलने को कहा तो माथुरजी को आश्चर्य हुआ. असल में उस दिन उन्हें बतौर सांसद छह महीने की तनख्वाह एक साथ मिली थी. अटलजी के लिए यही उनकी ऐश थी.
Ø वाजपेयी भी नेहरू जी की काफी इज्जत करते थे. 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है. वाजपेयी ने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था. वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था.
Ø बात 1996 की है. वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. तब नरसिम्हा राव ने चुपके से वाजपेयी के हाथ में एक पर्ची पकड़ाई. इस तरह कि कोई देख न पाए. इस पर्ची में राव ने वे तमाम बिंदु लिखे थे जो वह खुद बतौर प्रधानमंत्री करना चाहते थे, किंतु चाहकर भी न कर पाए. आज के दौर में इस तरह की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती.