केरल की बाढ़ को केंद्र सरकार ने गंभीर आपदा घोषित किया, राष्ट्रीय स्तर पर मिलेगी मदद

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने केरल की बाढ़ को गंभीर प्राकृतिक आपदा घोषित किया है. इससे पहले केरल हाई कोर्ट को केंद्र ने सूचित किया कि राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है. कांग्रेस और दूसरे दल राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग कर रहे थे.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि पिछले एक सप्ताह में बाढ़, बारिश और भूस्खलन के कारण हुए नुकसान को देख यह निर्णय लिया गया. जब किसी आपदा को दुर्लभ गंभीर/गंभीर प्रकृति का घोषित किया जाता है तो राज्य सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर मदद दी जाती है. केंद्र राष्ट्रीय आपदा कोष से भी अतिरिक्त मदद देने पर विचार कर रहा है. केरल में रविवार को बारिश थमने से लोगों ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन अभी भी उनकी कठिनाई जस की तस है. सभी जिलों में जिलाधिकारी व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं.

केंद्रीय मंत्री जे अल्फोंस ने कहा कि इस मुसीबत के समय में मछुआरे सबसे बड़े हीरो बनकर उभरे हैं. बचाव अभियान के दौरान उन्होंने अपनी करीब 600 नावें मदद के लिए दी. बाढ़ के कारण किसी भी घर में बिजली नहीं है, न ही अन्य तरह की सुविधाएं हैं. अभी सबसे ज्यादा वहां पर इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, कारपेंटर की जरूरत है. अभी वहां खाना और कपड़े की जरूरत नहीं है.छह और शव मिलेराज्य में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से सात लाख 24 हजार से ज्यादा विस्थापित लोगों को 5,645 राहत शिविरों में रखा गया है.

एर्नाकुलम जिले के पारूर में रविवार रात छह और शव मिले हैं. स्थानीय विधायक वीडी सतीशन ने बताया कि इसके साथ ही आठ अगस्त से शुरू हुए बाढ़ से मरने वालों की संख्या 216 पहुंच गई है. विमान सेवा शुरूकई दिनों के बाद राज्य में विमान सेवा बहाल हुई है. कोचीन हवाई अड्डा बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब गया था जिससे सेवा बंद करनी पड़ी थी. अब कोच्चि नौसैनिक अड्डे से विमान सेवा शुरू की गई है. महामारी रोकने में जुटा केंद्रकेंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि केंद्र की ओर से केरल को पूरी मदद दी जा रही है. राज्य में करीब 3757 मेडिकल कैंप लगाए गए हैं, जिसमें 90 किस्म की दवाइयां भेजी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि महामारी को फैलने से रोकने की तैयारी की जा रही है. केंद्र सरकार ने 100 मीट्रिक टन दालों के अलावा आवश्यक दवाइयां भेजी हैं.

सर्वाधिक प्रभावित स्थानों जहां लोग पिछले तीन दिनों से भोजन या पानी के बिना फंसे हुए हैं, उनमें चेंगन्नूर, पांडलम, तिरुवल्ला और पथानामथिट्टा जिले के कई इलाके, एर्नाकुलम में अलुवा, अंगमाली और पारावुर में शामिल हैं. केरल सरकार ने बाढ़ से कुल 19,500 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया है.

बारिश से राहत के बाद सभी जिलों में जारी किया गया रेड अलर्ट वापस ले लिया गया है. मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में भारी बारिश से राहत का दावा किया है. इसके बाद भी राज्य में जान-माल का जो नुकसान हुआ है, उससे केरल और वहां के लोगों का जीवन पटरी पर लौटने में काफी समय लग सकता है.

राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा, ‘हमारी सबसे बड़ी चिंता लोगों की जान बचाने की थी. लगता है कि इस दिशा में काम हुआ. शायद यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है, जिससे भारी तबाही मची है. इसलिए हम सभी प्रकार की मदद स्वीकार करेंगे.’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशवासियों से अप्रत्याशित बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहे केरल की मदद करने की अपील की है. सरकार्यवाह सुरेश भैय्या जोशी ने कहा है कि यद्यपि केंद्र सरकार और राज्य सरकार सहित कई सामाजिक संगठन युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन संकट अतिविकट होने के चलते सभी को इसके लिए आगे आना होगा.

उन्होंने कहा कि केरल भयानक संकट के कगार पर खड़ा है. इसे राष्ट्रीय आपदा बताते हुए कहा कि इसमें जहां अभी तक सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं वहीं लाखों लोग बेघर हो चुके हैं. सेना, राष्ट्रीय आपदा बल, केंद्र और राज्य सरकारों सहित सामाजिक संगठनों के प्रयासों की सराहना करते हुए जोशी ने कहा कि संकट विकट है और साधन सीमित हैं. ऐसे में संघ धार्मिक, सामाजिक सहित सभी देशवासियों से अपील करता है कि वे केरल के लोगों के साथ खड़े हों और पीडि़तों की बढ़-चढ़कर हरसंभव सहायता करें.

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एशियन गेम्स : भारत को मिला तीसरा गोल्ड मैडल,16 साल के शूटर सौरभ चौधरी ने साधा सोने पर निशाना

नई दिल्ली। एशियाई खेलों में मंगलवार को भारत के लिए एक अच्छी खबर आई. एशियाई खेलों में भारत की झोली में शूटर सौरभ चौधरी ने भारत को गोल्ड पदक दिलवाया. देश के लिए गोल्ड जीतने वाले सौरभ सिर्फ 16 साल के हैं.सौरभ मेरठ के कलीना गांव के रहने वाले हैं.

जीतू राय की जगह सौरभ को एशियाई खेलों में भेजा गया है. 10 मीटर एयर पिस्टल में सौरभ ने 586 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया है. भारत के एक अन्य निशानेबाज अभिषेक वर्मा ने भी क्वालीफाई कर लिया है. वह 580 अंकों के साथ छठे स्थान पर रहे.अभिषेक वर्मा को ब्रांज मैडल मिला.

सौरभ ने क्वालिफिकेशन के दौरान 99, 99, 93, 98, 98, 99 के शॉट्स जमाते हुए 586 का स्कोर किया. उन्होंने तीन बार 99 का स्कोर किया और कोरिया के जिन जिंगोह को पीछे छोड़ा, जिन्होंने 584 का स्कोर किया.

सौरभ ने इस साल की शुरुआत में 10 मीटर एयर पिस्टल में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा था. उन्होंने जर्मनी के सुस में हुए आईएसएसएफ जूनियर वर्ल्ड कप के फाइनल में 243.7 का स्कोर किया था, जो जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना.

इसके पहले बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट ने भारत के लिए गोल्ड मैडल जीता है. सौरभ चौधरी को सरकार ने 50 लाख रुपए और सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है.

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उत्तराखंड के विद्यालयी शिक्षा महानिदेशक के आरक्षण पर बयान से बवाल

नई दिल्ली। भाजपा सरकार में एक खास जाति से ताल्लुक रखने वाले अधिकारी भी अपने विभागीय मामलों पर भाजपा और संघ की भाषा बोलने लगे हैं. यहां तक की ये राजनीतिक बयानबाजी करने तक से नहीं चूक रहे हैं तो वहीं संविधान की अनदेखी भी कर रहे हैं. उत्तराखंड के विधालयी शिक्षा के महानिदेशक ने ऐसा ही एक बयान दिया है, जिसके बाद उनके ही शिक्षा विभाग में खासा रोष है. दरअसल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शिक्षा महानिदेशक की लिखित भाषण की प्रति उनके ऑफिस ने माध्यमिक और प्रारंभिक शिक्षा सहित तमाम शिक्षा परिषदों को भेजा. साथ ही इस भाषण की प्रति को राज्य के सभी विद्यालयों और कार्यालयों में उपलब्ध कराने का फरमान जारी किया. लेकिन इस भाषण में जो लिखा था, उससे शिक्षा विभाग के भीतर ही विवाद हो गया है. विधालयी शिक्षा के महानिदेशक ने अपने भाषण में आरक्षण को लेकर विवादास्पद बात कही है. साथ ही संघ की भाषा का भी इस्तेमाल किया है. स्वतंत्रता दिवस के भाषण में महानिदेशक आईएएस आलोक शेखर तिवारी ने आरक्षण को अतिवादी कह दिया. तो वहीं संघ और भाजपा के प्रचलित शब्द सामाजिक समरसता का भी जिक्र किया. महानिदेशक तिवारी ने अपने भाषण में क्या कहा है, ……

“आज देश के सम्मुख क्षेत्रवाद, भाषावाद, बेरोजगारी, पर्यावरण, जल संरक्षण, आरक्षण, असमान क्षेत्रीय विकास के साथ-साथ आतंकवाद,नक्सलवाद जैसे अतिवादी विचारों से निपटने की चुनौती है. इन चुनौतियों का सामना राष्ट्र, समर्थ नागरिकों के माध्यम से कर सकता है.”

देखा आपने महानिदेशक आलोक शेखर तिवारी ने आतंकवाद और नस्लवाद के साथ आरक्षण को रखते हुए आरक्षण को अतिवादी विचार कहा है. तो वहीं इससे निपटने के लिए समर्थ नागरिकों की बात कही है. यहां महानिदेशक तिवारी किन ‘समर्थ नागरिकों’ की बात कह रहे हैं. यह भी देखना जरूरी है.

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पोखरण में एक और कामयाबी, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल ‘हेलिना’ का सफल परीक्षण

नई दिल्ली। भारत ने रविवार को स्वदेशी गाइडेड बम-एसएएडब्ल्यू और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल ‘हेलिना’ का राजस्थान के पोखरण में अलग-अलग फायरिंग रेंज में सफल परीक्षण किया.

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, चांधण रेंज में वायु सेना के विमान से स्मार्ट एंटी एयरफिल्ड वीपन (एसएएडब्ल्यू) का सफल परीक्षण हुआ. इसका परीक्षण रविवार को दोपहर दो बजे किया गया.

बताया गया है कि हैलिना का परीक्षण उसकी पूरी रेंज में किया गया. यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा और टेस्ट के दौरान इसने अपने हर टारगेट को हासिल किया. सभी पैरामीटर को टेलिमेटरी स्टेशन, ट्रैकिंग सिस्टम और हेलिकॉप्टर के जरिए मापा गया.

मिसाइल को लॉन्च करने से पहले इनफ्रेयर्ड इमेजिंग सीकर (IIR) के जरिए ऑपरेट किया गया. ये सबसे एडवांस एंटी टैंक सिस्टम है. मिशन के लॉन्च के दौरान डीआरडीओ, भारतीय सेना के अधिकारी मौजूद रहे.

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रिषभ पंत में दिखी धोनी की झलक, पहले ही टेस्ट मैच में बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

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नई दिल्ली। पहले दो टेस्ट गंवाने के बाद टीम इंडिया ने तीसरे टेस्ट में इंग्लैंड को घेर लिया है. दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक उसने दो विकेट पर 292 रन बना लिए थे. टीम इंडिया के इस शानदार प्रदर्शन के बीच अपना डेब्यू टेस्ट खेल रहे रिषभ पंत छाए हुए हैं. उन्होंने बल्लेबाजी के बाद विकेटकीपिंग में भी अपना जलवा दिखाया है और वो धोनी के नक्शेकदमों पर दिखाई दे रहे हैं.

रिषभ पंत को बतौर बल्लेबाज काफी ऊपर आंका जाता है लेकिन अपने डेब्यू टेस्ट में उन्होंने बतौर विकेटकीपर भी खुद को साबित कर दिया. तीसरे टेस्ट की पहली पारी में रिषभ पंत ने 5 कैच लपक इतिहास रच दिया.

रिषभ पंत पहले भारतीय विकेटकीपर हैं जिन्होंने डेब्यू टेस्ट की पहली पारी में ही पांच कैच लपके हैं. उनसे पहले ऑस्ट्रेलिया के दो विकेटकीपरये कारनामा कर चुके हैं. 1966 में टेबर और 1978 में जे मैक्लेन ने डेब्यू टेस्ट की पहली पारी में 5 कैच लपके थे.

रिषभ पंत दुनिया के सबसे युवा विकेटकीपर हैं जिसने किसी इंटरनेशन मैच की पारी में 5 कैच लपके हैं. इससे पहले ये रिकॉर्ड इंग्लैंड के क्रिस रीड के नाम था. उस वक्त रीड की उम्र 20 साल 325 दिन थी.

आपको बता दें इससे पहले रिषभ पंत ने छक्का लगाकर अपना खाता खोला था. वो भारत के पहले खिलाड़ी हैं जिसने टेस्ट क्रिकेट में छक्के से अपना खाता खोला है. वैसे पंत से पहले दुनिया के 11 खिलाड़ी ये कारनामा कर चुके हैं.

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बनेगा ‘बंटी और बबली’ का सीक्वल, तय हुई है यह जोड़ी

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नई दिल्ली। वर्ष 2005 में पुराने लव बर्ड्स अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी ने फिल्म ‘बंटी और बबली’ से बॉक्स-ऑफिस पर धमाल मचा दिया था. चोरी करता यह कपल लोगों के लिए फेवरेट कपल बन चुका था. खास बात यह कि इसमें ऐश्वर्या का अभिषेक और अमिताभ के साथ स्पेशल आइटम सांग ‘कजरारे कजरारे’ भी था.

अब खबर है कि निर्माता ‘बंटी और बबली’ का सीक्वेल बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं और दर्शकों को उत्साहित करने के लिए खुशखबरी यह है कि इस बार भी बड़े परदे पर फिल्म के सीक्वेल में वही जोड़ी नज़र आ सकती है. जीं हां, अभिषेक और रानी एक बार फिर अपनी ही फिल्म के सीक्वेल में साथ नज़र आने वाले हैं.

क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘बंटी और बबली’ के सीक्वेल के लिए आदित्य चोपड़ा ने स्क्रिप्ट तैयार कर ली है. फिल्म को पहले शाद अली ने निर्देशित किया था. इस बार फिल्म को कौन डायरेक्ट करेगा यह तय नहीं हुआ है. फिल्म को यशराज फिल्म्स ही निर्मित करेंगे. इस सीक्वेल में अभिषेक और रानी 10 साल बाद साथ नज़र आएंगे. इसके पहले उन्होंने युवा, हम तुम, बस इतना सा ख्वाब है, कभी अलविदा ना कहना जैसी फिल्मों में काम किया है.

इस सीक्वेल के लिए यह जोड़ी और निर्माता सभी बहुत खुश और उत्साहित हैं. फैंस को याद होगा कि अभिषेक और रानी के पहले रोमांस के बहुत चर्चे थे. हालांकि इसके बाद अभिषेक ने ऐश्वर्या से शादी कर ली. वहीं रानी ने निर्माता आदित्य चोपड़ा से शादी कर ली. रानी की आखिरी फिल्म ‘हिचकी’ को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था. वहीं अभिषेक बच्चन फिल्म ‘मनमर्ज़ियां’ में नज़र आने वाले हैं. वे अनुराग कश्यप की ‘गुलाब जामुन’ में भी ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के साथ नज़र आएंगे.

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चुनावी राज्यों में नहीं होगा बसपा-कांग्रेस गठबंधन!

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नई दिल्ली। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की संभावना लगभग खत्म हो गई है. दोनों दलों के करीबी सूत्रों के मुताबिक इन तीनों चुनावी प्रदेशों में दोनों दल अब अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे. इसके साथ ही पिछले काफी वक्त से दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभवना खत्म हो गई है.

कांग्रेस मीडिया में लगातार यह बयान दे रही थी कि बसपा से बातचीत जारी है. लेकिन बसपा ने कभी भी किसी बातचीत की पुष्टि नहीं की. इस बीच पिछले कुछ दिनों से गठबंधन को लेकर किसी तरह का कोई बयान भी सामने नहीं आया. बसपा प्रमुख मायावती जहां सम्मानजनक सीटों की बात कर रही थीं तो कांग्रेस पैकेज डील की. लेकिन गठबंधन की सुगबुगाहट के एक महीने बाद भी दोनों दल किसी फैसले पर नहीं पहुंच पाएं.

बसपा सूत्रों के मुताबिक अब गठबंधन की संभावना खत्म है और बसपा अपने बूते चुनावी तैयारियों मे जुट गई है. इस बात के संकेत इससे भी मिलते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों को सितंबर से पहले प्रदेशों में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर लेने का फरमान जारी किया है. इतना ही नहीं बसपा सेक्टर और ब्लॉक स्तर पर भी इस अवधि के अंदर अपनी टीम तैयार करने में जुट गई है.

“दलित दस्तक” को मिली सूचना के मुताबिक तीनों प्रदेशों मे लगे पार्टी के पदाधिकारियों से प्रत्याशियों की सूची फाइनल करने को कही गई है. बसपा तीनों प्रदेशों में हर सीट पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी में है. जहां पार्टी का प्रत्याशी मजबूत नहीं है, वहां जमीनी कार्यकर्ता को चुनाव में उतारने की तैयारी है.  कांग्रेस-बसपा के बीच गठबंधन नहीं हो पाने की सूचना से खासकर भाजपा उत्साहित है. दोनों दलों के अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में भाजपा को फायदा मिलना तय है.

वाजपेयी पर लिखने के कारण बिहार में प्रोफेसर की जान लेने की कोशिश

नई दिल्ली। जब वाजपेयी की अंत्योष्ठी पर एक धड़ा उनके प्रधानमंत्री काल में लिए गए जनविरोधी फैसलों को गिनवा रहा था, उनके समर्थकों को मिर्ची लग रही थी. कहा जा रहा था कि आज के दिन जब वाजपेयी की मृत्यु हुई है, उनके विरोध में बात नहीं करनी चाहिए. लेकिन इसी दौरान दो ऐसी घटनाएं घटी, जिसे भी नहीं होना चाहिए था, लेकिन वह हुई. बिहार के मोतिहारी स्थित सेंट्रल युनिवर्सिटी के प्रोफेसर संजय कुमार को वाजपेयी को लेकर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी के कारण मारपीट का सामना करना पड़ा. संजय कुमार का कहना है कि शुक्रवार यानि कल 17 अगस्त को जब वो अपने निवास पर कुछ काम कर रहे थे. तभी राहुल आर. पाण्डेय, अमन बिहारी वाजपेयी, तथा शन्नी वाजपेयी के नेतृत्व में 20-25 लोगों द्वारा उनपर हमला कर दिया. इस दौरान उनसे जमकर अभद्रता की गई और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए. हमलावरों का आरोप था कि वाजपेयी के खिलाफ प्रोफेसर ने अभद्र शब्दों का प्रयोग कर सोशल मीडिया पर लिखा है. जिससे उन्हें आधात पहुंचा है. अब यह भी देख लेते हैं कि आखिर प्रोफेसर संजय ने क्या लिखा?

प्रोफेसर संजय ने वाजपेयी को लेकर दो पोस्ट लिखा. अगर इन दोनों पोस्टों को देखें तो इसमें वही लिखा है, जो सच है और किसी भी गलत भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है. बावजूद इसके उनपर हमला किया गया. प्रोफेसर संजय कुमार ने अपने ऊपर हुए हमले का आरोप वीसी अरविंद अग्रवाल पर लगाया है. मोतिहारी थाने में की शिकायती में उन्होंने आरोप लगाया है कि आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की वजह से उन्हें पहले भी धमकी मिलती रहती है. मुझपर फेसबुक कमेन्ट को बहाना बना कर हमला किया गया है. हमला करने वाले कुलपति के निकट के लोग है. जिन्हें कुलपति ने रैगिंग कमेटी में शामिल कर रखा है. तो वहीं स्वामी अग्निवेश ने आरोप लगाया कि दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि देने के दौरान उनके साथ मारपीट की गई. स्वामी अग्निवेश को इससे पहले झारखंड में भी निशाना बनाया जा चुका है. सवाल है कि विचारों की भिन्नता पर किसी पर जानलेवा हमले का बढ़ता चलन कितना जायज है.

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झारखंडः 600 किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट

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झारखंड के चतरा ज़िले के किसानों के सामने चिंता और चुनौती दोनों ही एक साथ आ पड़ी है. चिंता इस बात की है कि अगर वे अपनी ज़मीन और घर से बेघर हो गए तो कहां जाएंगे, और चुनौती ज़मीन को कैसे बचाएंगे? क्योंकि किसानों के अनुसार उनके पास जिस ज़मीन पर ‘मालिकाना दावा’ करने के कागज़ात हैं, वो वन विभाग की नज़र में मान्य नहीं हैं. दरअसल, चतरा के कई गांवों के किसान और ग्रामीणों पर वन विभाग का दबाव है कि वो जल्द-जल्द से मकान और ज़मीन खाली करें, नहीं तो खाली करवाया जाएगा. वन विभाग ने इस बाबत गांव वालों को नोटिस भी भेजा है. इसी वजह से 600 से भी अधिक किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है. चतरा के ज़िला वन अधिकारी (डीएफओ) का कहना है कि वन भूमि को लेकर जो कार्रवाई हो रही है वो सरकार के निर्देश पर है.

गांव वालों की शिकायतें

इनकी 1400 एकड़ से भी अधिक ज़मीन को वन विभाग ने वन भूमि बताकर खाली करने का नोटिस भेजा है. जबकि किसान इन जमीनों पर पूर्वजों के समय से रहते आने की बात कह रहे हैं. लावालौंग प्रखंड के पतरातू गांव के तुलसीदास कहते हैं, “एक साल पहले रेंजर ने आकर हमारी जमीन पर वन विभाग का पिलर गाड़ दिया. विरोध करने पर कहा कि इस पिलर को सिर्फ निशान के तौर पर गाड़ रहे हैं, इससे कोई दिक्कत नहीं होगी. इस साल जून में आकर अधिकारी कहते हैं कि ये वन भूमि है इसपर खेती नहीं करना है और घर भी खाली करो.” विनोद दास कहते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ी से रहता आ रहा है. उनके पास जमीन का पर्चा, रसीद और नक्शा भी है, पर वन विभाग मानने को तैयार नहीं है. 60 वर्षीय गोपाल राम के मुताबिक वह बाप-दादा से इसी जमीन से गुजर-बसर करते आ रहे हैं. अगर उनसे उनकी ज़मीन छीन ली जाएगी, तो परिवार को लेकर वो कहां जाएंगे. डीएफओ आरएन मिश्रा कहते हैं, “हमें सरकार की तरफ से निर्देश दिया गया है कि सभी वन भूमि चिन्हित कर उसे अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए. जिन जगहों पर वन भूमि चिन्हित हुई, वहां के ग्रामीणों को समय दिया गया है कि वे ज़मीन के पेपर दिखाएं और अपना पक्ष रखें.”

वन विभाग का नोटिस

गोपाल राम के गांव में लगभग 20 घरों को वन विभाग की तरफ से खाली करने की नोटिस मिला है. इसी गांव की सुनती देवी बताती हैं कि अधिकारी केस करने की धमकी देते हैं. चार लोगों पर केस भी हो गया है. यहां के किसानों की करीब 50 एकड़ जमीन है, जिसे वन विभाग ने खाली करने को कहा है. कान्हा चट्टी प्रखंड के छेवटा गांव के जुलाल दांगी, आगे जीवन कैसे यापन करेंगे, इसे लेकर चिंता में हैं. वो कहते हैं, “हमारे पूर्वजों ने ज़मींदार से 44 हुकुमनामा पर ज़मीन लिया था. 1957 से लेकर 2012 तक रसीद भी कटी, लेकिन इसके बाद से रसीद कटनी बंद हो गई. अब वन विभाग कोई कागज़ को नहीं मान रहा. जबरन ज़मीन अपने कब्जा में ले रहा है.” जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन इस बाबत बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं होने की दलील देते हैं. हालांकि वे ये भी मानते हैं, “कागज़ात को जांचने का काम तो भू-अर्जन पदाधिकारी का ही होता है, लेकिन गांव में अधिकतर लोगों ने फर्जी तरीके से कागज़ात बना रखा है.”

सरकारी ज़मीन बताकर

छेवटा के ही कई आदिवासी परिवार इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. यहां के लोगों कहना है कि उनके एक घर पर वन विभाग ने पोकलेन तक चला दिया है. शांता और बिछू देवी कहती हैं, “हमलोगों ने भी ठान लिया है कि ज़मीन किसी भी क़ीमत पर खाली नहीं करेंगे क्योंकि इसके सारे कागज़ात हमारे पास हैं.” वन क़ानून के जानकार और झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बासु मलिक कहते हैं, “वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत तीन पीढ़ी से रहते आ रहे लोंगों को काफ़ी अधिकार प्राप्त हैं. कोई पर्चा-रसीद धारक या जिनके पास कागज़ात नहीं भी है, वो भी ज़मीन पर दावा कर सकते हैं. इसके लिए लिए क़ानून में प्रावधान है. इसके लिए गांव सभा और आसपास के लोगों को स्वीकृति देनी पड़ती है कि ये यहां तीन पीढ़ी से रहते आ रहे हैं.” बासु ये भी कहते हैं कि ग्रामीणों के पास जो पर्चा है, वो गैरमजरुआ ख़ास ज़मीन का है और उसकी रसीद भी कटती थी, लेकिन राज्य में नई सरकार ने इसे साल 2015 के बाद से बंद कर दिया है. वो कहते हैं, “अब ऐसा लगता है कि सरकार इसे जंगल और सरकारी ज़मीन बताकर अपने कब्जा में लेना चाह रही है.”

 पतरातू गांव में तकरीबन 55 एकड़ ऐसी ज़मीन है जिसे वन विभाग वन भूमि बता रहा है. चतरा प्रखंड के पकरिया और ढड़हा गांव में 100 से भी अधिक परिवार इसकी जद में है. यहां के प्रदीप उरांव बताते हैं कि कई घरों को वन विभाग ने जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, और उसी दौरान उनकी ज़मीनों पर पिलर गाड़ा गया था. इस गांव में किसानों के पास ज़मीन का पर्चा भी है और रसीद भी. यहां हर परिवार के पास दो से तीन एकड़ ज़मीन है, जिसपर पर वो वर्षों से खेती करते आ रहे हैं. हालांकि डीएफओ का ये कहना है कि जिन जगहों पर वन विभाग की तरफ से ग़लत पिलर गाड़ दिया गया, उसे हटा भी दे रहे हैं. दस्तावेज़, रसीद के बावजूद जमीन को वन भूमि क्यों बताया जा रहा है के प्रश्न पर, डीएफ़ओ कहते हैं कि उनमें अधिकतर ग्रामीणों के पास फ़र्ज़ी कागज़ात हैं. जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन सलाह देते हैं, “वन अधिकारी और पीड़ित दोनों को ही इसे लेकर ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी के कार्यलाय में अपील करनी चाहिए.” गांव वालों के लिए ऐसी ही सलाह डीएफ़ओ आरएन मिश्रा की भी है, “अगर उन्हें लगता है कि ग़लत किया गया है तो वे डीसी और न्यायालय में अपील कर सकते हैं.”

दलित और आदिवासी

पकरिया और ढड़हा गांव की अधिकांश आबादी और इससे पीड़ित परिवार दलित और आदिवासी है, जिनकी 250 से एकड़ से अधिक की ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. यहां के कई किसानों ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और कई अन्य इसकी तैयारी कर रहे हैं. चतरा प्रखंड के ही गोडरा, लूपुंगा और लातबेर गांव में ये आंकड़ा तकरीबन 400 के करीब है, जहां के किसानों और ग्रामीणों को वन विभाग की तरफ से कोई नोटिस तो नहीं मिला है. लेकिन सर्वेयर ने ये बताकर, उनकी ज़मीन का रजिस्ट्रेशन नहीं किया है कि ये वन भूमि की ज़मीन है और इसे लेकर किसी भी समय नोटिस या खाली करवाया जा सकता है. लेकिन इस पूरे मामले पर चतरा के ज़िलाधिकारी जीतेंद्र कुमार सिंह सिर्फ ये कहते हुए अपनी बात खत्म कर देते हैं कि इस मामले वो देख रहे हैं. चतरा के सांसद सुनील कुमार सिंह ने इस बारे में बीबीसी को बताया कि ये मामला उनके संज्ञान में है. वो इसे लेकर संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं. वो कहते हैं, “वन अधिकारियों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं कर रहे हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को भयभीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य ये है कि प्रभावित लोगों की न तो अपत्ति दर्ज की जा रही है और न उनका पक्ष सुना जा रहा है.”

हार मानकर छोड़ दिया है…

कान्हा प्रखंड के भांग कुरकुट्टा गांव में 14 किसान परिवार हैं, जिनकी 40 एकड़ ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. वहीं, चतरा प्रखंड के पावो गांव के आदिवासी किसानों का कहना है कि उनकी ज़मीन पर 2005 में ही वन विभाग ने ट्रेंच (ज़मीन काट देना) कर वृक्षा रोपण शुरू कर दिया था. इस बारे में मदन मुंडा कहते हैं कि उनके पास पर्चा, रसीद सब है. इसी को आधार बनाकर लोग हाईकोर्ट तक गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अंत में हार मानकर छोड़ दिया है. सुनील कुमार सिंह का कहना है, “ज़मीन का कागज़ात चेक करना वन अधिकारी काम नहीं है बल्कि एलआरडीसी, सीओ और डीसी का है. वन अधिकारी की तरफ से जिला प्रशासन के साथ बिना समन्वय बनाए ही कागज़ात को फ़र्ज़ी बताना अधिकारियों की मनमानी है. वन अभ्यारण्य इको ज़ोन सेंसेटिव बनाने का जो ड्राफ्ट तैयार हुआ, उसके पहले पन्ने पर लिखा हुआ है कि प्रभावित ग्रामीणों के साथ बातचीत की जाएगी, जो नहीं की जा रही है.”

सवाल पुनर्वास का भी है

किसान भले ही चाहे जो भी दलील दें लेकिन एलआरडीसी अनवर हुसैन कहते हैं, “बहुत से ग्रामीणों की रसीद फ़र्ज़ी हैं. ये लोग अंचल स्तर के कर्मचारियों से सांठगांठ कर फ़र्ज़ी ढंग से रसीद कटाते आए हैं. रही बात पर्चे की तो ये अनुमंडल से मिलता है, जिसे जांचा जाना चाहिए कि कब, कैसे और किस आधार उन्हें ज़मीन का पर्चा दिया गया है.” दूसरी तरफ़ आदिवासी किसानों को ज़मीन खाली करने को लेकर मिले नोटिस के बारे में डीएफओ आरएन मिश्रा ने भी साफ़ तौर से इंकार किया. किसानों के मकानों पर पोकलेन चलाने वाले आरोप को भी निराधार बताते उन्होंने कहा, “तीन-चार गांव में पोकलेन चला, लेकिन किसी भी आदिवासी के गांव या घर पर नहीं.”

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अटल बिहारी वाजपेयी पर दुनिया भर के अख़बारों ने क्या छापा

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भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री के निधन की खब़र को मीडिया ने अच्छा-ख़ासी जगह दी है. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी को पाकिस्तान की मीडिया ने दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कवायद का श्रेय दिया है. पाकिस्तान की मीडिया ने अपने देश के विदेश मंत्रालय और निर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के श्रद्धांजलि संदेश भी छापे हैं.

चीन की एक मीडिया आउटलेट ने इस बात को प्रमुखता से छापा कि कैसे वाजपेयी की नीति शुरूआत में चीन को एक ख़तरे के रूप में देखती थी लेकिन बाद में व्यावहारिक हो गई.

बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की मीडिया ने भी उनके निधन पर रिपोर्ट लिखी है.

पाकिस्तान के प्रमुख उर्दू और अंग्रेज़ी अख़बारों ने अपनी वेबसाइट पर वाजपेयी के निधन की ख़बरों को प्रमुखता से छापा है. द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट की हैडलाइन है – “इमरान खान ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में वाजपेयी की भारत-पाक रिश्तों की कोशिशों की सराहना की.”

साल 1999 में वाजपेयी अमृतसर से बस में पाकिस्तान के शहर लाहौर गए थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को गले लगाया था. दोनों देशों के लिए ये ऐतिहासिक पल था.

साल 2001 में आगरा शहर में उन्होंने पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ शिखर वार्ता की थी. दोनों देश किसी ज्वाइंट स्टेटमेंट पर राज़ी नहीं हो पाए थे और सम्मेलन को असफल करार दिया गया था. लेकिन वाजपेयी की छवि और बेहतर हुई.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपनी श्रद्धांजलि संदेश में कहा है कि वाजपेयी एक स्टेट्स्मैन थे जिन्होंने भारत-पाक संबंधों को सुधारने में योगदान दिया और हमेशा ‘सार्क’ के समर्थक रहे. बहुत से उर्दू अख़बार जैसे जंग, जसारत, जिन्ना, डेली एक्सप्रेस और दुनिया ने भी उनके निधन की ख़बर को छापा है. दुनिया अख़बार की सुर्ख़ी थी – “पाकिस्तान ने वाजपेयी के निधन पर जताया शोक.” उर्दू टीवी चैनल डॉन न्यूज़ ने उनके 1999 में पाकिस्तान दौरे की तस्वीरें वॉइसओवर रिपोर्ट में पेश की. रिपोर्ट में बताया गया कि वाजपेयी दोनों देशों के रिश्तों में सुधार चाहते थे जिसके लिए उन्होंने कोशिशें भी की.

चीन की ज़्यादातर मीडिया ने शंघाई की ‘द पेपर’ वेबसाइट के श्रद्धांजलि लेख को शेयर किया है. राष्ट्रवादी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी इसी को जगह दी है. पुरानी सरकारी मीडिया खबरों के हवाले से वेबसाइट के लेख में बताया गया है कि वाजपेयी की चीन को पहले ख़तरे की तरह देखते थे, अमरीका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी और 1998 में सत्ता में आने के बाद परमाणु बम बनाया. लेकिन वेबसाइट के मुताबिक वाजपेयी ने बाद में व्यवहारिक राह अपना ली. उन्होंने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना, दोनों देशों की सीमा के मुद्दे को बातचीत से सुलझाया और आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया. जून 2003 में अपने चीन दौरे पर वाजपेयी ने ऐतिहासिक ज्वाइंट डेक्लेरेशन भी साइन की. बाकी क्षेत्रों में ऐसी रही कवरेज बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की प्रमुख मीडिया ने अपनी-अपनी वेबसाइट पर वाजपेयी के निधन की ख़बर को जगह दी. हिमालयन टाइम्स ने छापा है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने गुरूवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रद्धांजलि संदेश भेजा था और उनसे फ़ोन पर भी बात की थी.

ओली ने कहा कि भारत और दुनिया ने अपना बड़ा नेता खो दिया और नेपाल ने अपना सच्चा दोस्त और शुभचिंतक. अफ़ग़ानिस्तान के नेताओं ने भी वाजपेयी के निधन पर दुख जताया. पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई और भारत में अफ़गानिस्तान की राजदूत शाइदा अब्दली ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

अफ़गानिस्तान के मुख्य कार्यकारी अब्दुल्लाह ने ट्वीट किया, “मेरे साथ सभी अफ़गानिस्तानी भारत और पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के परिवार और मित्रों के दुख में शरीक है. उनका जाना एक बड़ी क्षति है. वो हम अफगानियों के बुरे वक्त में हमारे साथ खड़े रहे. उनकी आत्मा को शांति मिले.”

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‘दलित बहू स्वीकार पर दलित को बेटी नहीं देंगे’

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“उनकी छोरी थी, मार दी..कोई जुल्म नहीं करया. मार दी ते बढ़िया करया. पांच-छह और ऐसा कर दें तो छोरियां डरण लाग जांगी, भाजेंगी नहीं.”

ममता की पड़ोस की बुज़ुर्ग महिला मुझसे ये बातें कह रहीं थी. वही महिला जो ममता से शायद रोज़ मिलती होंगी. वही महिला जिसने बचपन से ममता को बड़े होते देखा. ममता वही लड़की है जिसे हरियाणा के रोहतक में दो बाइक सवारों ने लघु सचिवालय के सामने आठ अगस्त को दिन-दहाड़े गोली मार दी थी. इस हत्या के आरोप में ममता के माता-पिता पुलिस हिरासत में हैं. मंगलवार (14 अगस्त) को उसके रिश्ते के एक भाई और दोनों शूटर्स को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया.

लेकिन मामला इतना ही नहीं है और इसलिए यहां खत्म भी नहीं हो जाता. सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों को ऐतराज़ रहा कि लड़की की जाति न लिखी जाए. कई लोग कहते रहे कि लड़के ने लड़की को बहलाया-फ़ुसलाया. कई उनकी उम्र के अंतर पर भी ज़ोर देते रहे. लेकिन ऐसे लोग कम नहीं हैं जो साफ़ कह रहे हैं कि ये हत्या जायज़ है.

क्यों मारी गई ‘ममता’?

ममता को उसके माता-पिता ने अपने रिश्तेदारों से गोद लिया था जब वह एक साल की थी. उसे प्यार था सुमिन से जो उन्हीं के यहां किराये के कमरे पर रहता था. ममता एक जाट परिवार से थीं जो हरियाणा में एक अगड़ी जाति मानी जाती है. वहीं सुमिन वाल्मिकी जाति से है जो एक अनुसूचित जाति है. पुलिस में दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक ममता 2017 में अपने प्रेमी सुमिन के साथ घर से चली गई और दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली. तब सुमिन की उम्र 26 साल थी और ममता के पिता के आरोप के मुताबिक तब ममता की उम्र 17 साल थी.

दोनों ने शादी करते ही हाई कोर्ट में अपनी सुरक्षा के लिए याचिका लगाई. लेकिन ममता के पिता के आरोप के बाद पुलिस ने पाया कि ममता ने अपने आधार कार्ड में गड़बड़ी की है. पुलिस ने जालसाज़ी के आरोप में सुमिन और उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया और कोर्ट ने ममता को करनाल शहर के नारी निकेतन भेज दिया. पिछले सात महीनों से सुमिन के साथ-साथ उसके पिता भी इसी जालसाज़ी के आरोप में जेल में हैं. इस बीच ममता 18 साल की हो गई और सुमिन के साथ जीवन बिताने के फ़ैसले पर अड़ी रही. आठ अगस्त को सुमिन पर लगे मुकदमे की तारीख़ पर ममता दो पुलिसकर्मियों के साथ रोहतक कोर्ट आई थी. जब वो बाहर निकली तो दो बाइकसवारों ने उस पर गोलियां चला दीं. उसके साथ आए सब-इंस्पेक्टर की भी मौत हो गई. पुलिस ने तुरंत उसके माता-पिता और जन्म देने वाले माता-पिता को कथित ‘ऑनर किलिंग’ के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. वैसे जब इस केस से जुड़े लोगों से बात हुई तो मामला ‘कथित’ नहीं लगा.

ममता की शादी की तैयारियां की जा रही थीं

श्याम कॉलोनी में ममता का बड़ा सा घर सुनसान पड़ा था. दरवाज़ा खटखटाने पर उसकी भाभी बाहर आई. उन्हें अपना परिचय दिया तो वो बिना कुछ कहे अंदर चली गईं. उनके बच्चे ने कहा कि हमको बात नहीं करनी. पड़ोस में बात करने की कोशिश की तो एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं पता. जब पुलिस आई, तभी पता चला कि कुछ हुआ है. गली में दो घर छोड़ कर रहने वाली ये महिला कह रही थीं कि वो अभियुक्त मां-बाप का पूरा नाम भी नहीं जानतीं. तभी एक और महिला वहां आईं और मुझे ममता और उसके परिवार के बारे में बताने लगीं. उन्होंने बताया कि वो पहले ममता के माता-पिता के साथ कोर्ट भी जा चुकीं हैं. बातों-बातों में उनके मुंह से निकल गया कि पिछले साल ममता का रिश्ता हो रहा था और रस्म के लिए लोग आने वाले थे. वो बोलीं, “जिसको बट्टा लगता है, उनकी खाट खड़ी होती है. उनका कलेजा फटता है. छोटी बात नहीं है. मारना मजबूरी हो जाती है. मेरी लड़की करती ऐसा तो मैं भी मार देती.” जब मैंने उनसे पूछा कि शादी तो हो ही गई थी, कथित बट्टा तो लग ही गया था तो फिर मारने से हासिल क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि ‘अगर वो वाल्मीकि लड़का हमारी गली में उसको लेकर घूमने लग जाता तो?’

उन्होंने माना कि अगर लड़का अपनी जाति का होता तो शादी करने में बुराई नहीं थी. इन बुज़र्ग महिला की बातों से पता चला कि ममता की किसी और से शादी की तैयारियां हो रही थीं. तो क्या इसी वजह से आनन-फ़ानन में उसे घर से बिना बताए जाना पड़ा और शादी कर ली? इसके अलावा सबसे बड़ा मसला सुमिन का जाति से वाल्मीकि होना था. 15 मिनट की रिकॉर्डेड बातचीत में लड़की और लड़के की उम्र में अंतर या लड़की के करियर की बात उन्होंने नहीं की.

पंचायत ने किया अंतिम क्रिया से इनकार

ममता का शव अस्पताल में लावारिस था. माता-पिता जेल में थे. रोहतक शहर से 3-4 किलोमीटर दूर सिंहपुरा गांव में सुमिन का घर है. जब वहां पहुंची तो एक पुलिसकर्मी ने दरवाज़ा खोला. ममता की हत्या के बाद से ही वहां पुलिस सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. मुझे पता चला कि सुबह ही इसी गांव में ममता पर गोली चलाने वाले लोग पकड़े गए हैं.

सुमिन के छोटे भाई दिनेश ने बताया कि वे लोग ममता का दाह-संस्कार करना चाहते थे लेकिन गांव की पंचायत ने मना कर दिया क्योंकि खाप के सिस्टम के हिसाब से आठ गांवों में भाईचारा है और लड़का और लड़की के गांव इन्हीं आठ गांवों में आते हैं.

दिनेश ने ये भी बताया कि जब सुमिन को जालसाज़ी के आरोप में थाना ले जाया गया था तब खुद एसएचओ ने कहा कि ‘जाट की लड़की को लेकर गए हो, बस ये मसला है और गड्ढ़ी खेड़ी वाले (अभियुक्त पिता का गांव) तुम्हें मारेंगे.’ उन्होंने कहा, “भाई को समझाया था कि ग़लत हुआ है क्योंकि ये लोग हमारी जाति वालों को अपनाएंगे नहीं.” “यहां जाट बिरादरी के लोगों ने अंतरजातीय शादी की है. एक बहू धानक(अनुसूचित जाति) जाति की भी है लेकिन ये लोग कहते हैं कि हम ला सकते हैं लेकिन तुम ऐसा नहीं कर सकते.” मैंने उनसे पूछा कि जाट तो कहते हैं कि दलितों और जाटों में भाईचारा होता है, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘ऐसा होता तो फिर ये विरोध होता ही क्यों, हमारे घर में सब कुछ है, सब सुविधा है, हमारे भी दो हाथ-पैर हैं.’ सुमिन के पिता 23 साल तक भारतीय सेना में रहे हैं.

दलित बहू तो ठीक लेकिन दलितों को नहीं देंगे बेटी

इस गांव के सरपंच तो नहीं मिले लेकिन उन्होंने फ़ोन पर कहा कि उनके भाई और बेटे से इस मामले पर जानकारी ले ली जाए. सरपंच के भाई अतर सिंह ने बताया कि क्योंकि मामला आठ गांव के भाईचारे का था और ममता के यहां दाह-संस्कार पर विवाद हो सकता था, इसलिए पंचायत ने मना कर दिया. साथ ही उन्होंने दिनेश की कही बात भी दोहराई कि जाट लड़का अगर अनुसूचित जाति की लड़की से शादी कर ले तो पंचायत को ऐतराज़ नहीं होता लेकिन लड़की के ऐसा करने पर विवाद हो जाता है. वो कहते हैं कि पहले हरिजनों और जाटों का भाईचारा होता था लेकिन अब कोई ऐसा नहीं मानता. सरपंच के बेटे सहदेव ने बीच में कहा कि वो भी एक अनुसूचित जाति की लड़की से शादी करना चाहते थे लेकिन घरवाले नहीं माने और फिर अरेंज मैरिज हुई.

महिलाओं ने की ममता की अंतिम क्रिया

हरियाणा की महिला आयोग की अध्यक्षा प्रतिभा सुमन ने बताया कि उन्होंने प्रशासन को लिख कर दिया था कि ममता की अंतिम क्रिया आयोग करना चाहता है. “जिन मां-बाप ने अपनी बेटी की जान ले ली, उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए उसकी अंतिम क्रिया का.” प्रतिभा सुमन बताती हैं कि ग्रामीण स्तर पर इन बुराइयों को ढंकने में सरपंचों की अहम भूमिका होती है. वो खुद एक घटना के बारे में बताते हुए रोने लगती हैं कि एक गांव में एक सरपंच के परिवार ने ही अपने घर की बहू को ईखों में ले जाकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया क्योंकि वो अपने पति की ज़्यादतियों से परेशान थी और उसे छोड़ किसी और पुरुष के साथ रहना चाहती थी. इस अपराध में उस महिला के बेटे भी शामिल थे. महिला आयोग की सदस्यों ने ही ममता की अर्थी को कंधा दिया और पूरी अंतिम क्रिया की.

कहाँ हैं हरियाणा के युवा नेता?

हरियाणा की ऑनर किलिंग मामलों में एक बात हमेशा नज़र आती है कि सभी राजनीतिक दल इस के ख़िलाफ़ बयान देने से बचते हैं. इस वक़्त हरियाणा में युवा नेताओं की पूरी खेप तैयार हो रही है लेकिन वे भी इस तरह की घटनाओं पर बोलने से कतराते हैं. महिला मुद्दों पर सालों से काम कर रही जगमति सांगवान राष्ट्रीय मीडिया में एक जाना-माना नाम है. वो कहती हैं, “नेताओं के लिए ये खापें और जातिवादी लोग एक वोट बैंक हैं और इसलिए ये ख़ुद को इन मसलों से दूर रखते हैं” “ज़रूरत तो हमारे युवाओं को एक स्वर में इन घटनाओं की निंदा करने की है. लेकिन जब हम लोग कॉलेजों में जाकर प्रेम-विवाह को लेकर छात्रों की राय पूछते हैं तो वो कहते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं लेकिन वही बच्चे अपने घरों में, गाँवों में जाकर कुछ और कहने लगते हैं. उनमें वही बात आ जाती है कि मेरी बहन ऐसा कैसे कर लेगी!” जगमति कहती हैं कि जहां इतने लोग प्यार में एक-दूसरे को धोखा देते हैं, यहां इस लड़के ने शादी ही तो की है और प्यार की वजह से ही जेल भी काट रहा है

सुमिन के घर में पुलिस सुरक्षा दी गई है

नाबालिग़ की अपनी मर्ज़ी से की गई शादी वैध भारत के कानून के मुताबिक़ बाल-विवाह या नाबालिग़ का विवाह गैर-कानूनी है. लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक अगर ये शादी हो जाती है तो उसे अवैध नहीं माना जाएगा. लड़की चाहे तो इसे बालिग़ होने पर अवैध मान सकती है और तलाक़ का आधार बना सकती है. अगर वो बालिग़ होने पर अपनी शादी खत्म नहीं करना चाहती है तो ये विवाह कानून की नज़र में वैध है.

साभार: बीबीसी Read it also-‘ लोकतंत्र का भविष्य समन्वय में है संघर्ष में नहीं ’
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बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की मॉब लिंचिंग की कोशिश

बिहार के मोतिहारी ज़िले में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय कुमार पर शुक्रवार को कुछ लोगों ने जानलेवा हमला किया है.घायल हालत में उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल (पीएमसीएच) रेफ़र किया गया है, जहां उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है. उनके सहकर्मी मृत्युंजय कुमार ने बीबीसी से बताया, “इमरजंसी वार्ड में हैं, उनकी जांच हो रही है. सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड हुए हैं, रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं मृत्युंजय कुमार के मुताबिक एक ही राहत की बात है कि रात तीन बजे के बाद से संजय बेहोश नहीं हुए हैं, पहले तो थोड़ी थोड़ी देर में वे बेहोश हो जा रहे थे.

उधर दूसरी ओर महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ ने संजय कुमार पर हुए जानलेवा हमले की निंदा करते हुए अपना बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है, “एक कथित फ़ेसबुक पोस्ट को बहाना बनाकर अराजक तत्वों ने मॉब लिंचिंग के रुप में एक साजिश के तहत डॉ. संजय पर हमला किया और उन्हें ज़िंदा जलाने की कोशिश की. एक शिक्षक को सरेआम मारने-जलाने का तांडव होता है और कुलपति महोदय शिक्षक को देखने तक नहीं आते.”

मॉब लिंचिंग की कोशिश

संजय कुमार की ओर मोतिहारी के नगर थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी मॉब लिंचिंग की कोशिश की गई, पेट्रोल डालकर ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई. संजय कुमार ने 12 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है, पुलिस ने मामला दर्ज करके मामले की जांच शुरू कर दी है लेकिन संजय कुमार की ओर से कहा जा रहा है कि पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है और मॉब लिंचिंग की कोशिश को देखते हुए धारा 307 के तहत मुक़दमा दर्ज नहीं किया है.

मोतिहारी के पुलिस अधीक्षक उपेंद्र कुमार शर्मा ने बीबीसी को बताया, “उनकी शिकायत के बाद पुलिस मामले की जांच कर रही है. धारा 307 के तहत तभी मुक़दमा दर्ज हो सकता था, जब उनके शरीर पर उस तरह की इंजरी होती, वैसी इंजरी थी नहीं. लेकिन जितने तरह के मामले हो सकते थे, वो सब लगाए गए हैं. इस मामले में अभी तक किसी को गिरफ्तारी नहीं हुई है.”

स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय के मुताबिक ये घटना शुक्रवार दोपहर लगभग एक बजे की है. लेकिन पुलिस ने घटना के करीब सात-आठ घंटे बाद प्राथमिकी दर्ज की.

हमले की वजह क्या?

संजय कुमार पर हमले की वजह क्या इसको लेकर अब तक दो बातें सामने आई हैं. संजय कुमार ने स्थानीय पुलिस के पास जो प्राथमिकी दर्ज कराई है उसमें भी सोशल पोस्ट को हमले की वजह बताया है. हमले से ठीक पहले उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद दो पोस्ट लिखे थे जो अटल समर्थकों को नागवार लग सकता है.

अपनी एक पोस्ट में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को संघी कहा है, जिन्होंने अपनी भाषण देने की कला से हिंदुत्व को मिडिल क्लास के बीच सेक्सी बना दिया. वहीं एक दूसरी पोस्ट में संजय ने लिखा है कि भारतीय फासीवाद का एक युग समाप्त हुआ.

वैसे संजय कुमार की फेसबुक प्रोफ़ाइल पर अब ये पोस्ट नज़र नहीं आ रही है. मृत्युजंय कुमार बताते हैं, “हमलोग पोस्ट तो नहीं ही हटाते. इस पोस्ट पर जितनी गालियां पड़ी थीं उसे देखते हुए फ़ेसबुक ने इसे स्पैम में डाल दिया होगा. इन पोस्टों के चलते ही संजय पर शुक्रवार को ही हमला हो गया.”

विश्वविद्यालय की राजनीति

वैसे केवल सोशल पोस्ट ही हमले की वजह रही हो ऐसा भी नहीं है. दरअसल संजय कुमार बीते कुछ महीनों से विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ संघर्ष करते आ रहे थे. मृत्युंजय कुमार ने बताया कि वे लोग विभिन्न मुद्दों पर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ 29 मई से ही शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठे हुए हैं.

मृत्युंजय कुमार का दावा है कि यही बात विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोगों को पसंद नहीं आ रही थी. ऐसे में विश्वविद्यालय कैंपस की आपसी राजनीति और जोर अजमाइश की इस हमले में अहम भूमिका रही होगी. इस बात की तस्दीक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ की ओर से जारी बयान से भी होती है.

संजय कुमार ने पुलिस के पास दर्ज अपनी शिकायत में ये कहा है कि उनके साथ मारपीट करने वाले लोग उन्हें इस्तीफ़ा देने और यहां से भागने की बात कह रहे थे.

लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर बिहार सरकार पर सवालिया निशान लगा दिया है. पहले से मुज़फ़्फ़रपुर बालिक गृह कांड से शर्मसार राज्य प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. विपक्षी दल इस मसले को मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे. मॉब लिंचिंग की इस कोशिश पर कांग्रेस के विधायक शकील अहमद ख़ान ने स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय से कहा है, ”इस प्रकरण को देखकर लगता है कि बिहार में भी मॉब लिंचिंग की शुरुआत हो गई है. प्रशासन इस घटना को छिपाने का प्रयास कर रहा है. हमने इस घटना की जांच की मांग की है.”

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पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री बने इमरान ख़ान

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इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए हैं. उन्होंने शनिवार को एक पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह में इमरान खान की पत्नी बुशरा मेनका भी शामिल हुईं. इमरान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ़ ने इस बाबत ट्वीट किया.

तहरीक ए इंसाफ़ ने लिखा कि हमने बहुत समय से इस वक्त का इंतजार किया है.

25 जुलाई को हुए चुनाव में पीटीआई पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी हालांकि अपने दम पर सरकार बनाने में यह कुछ सीटों से चूक गई. मतों के जादुई आंकड़े को छूने के लिए पीटीआई नेतृत्व ने कथित रूप से मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान (एमक्यूएम-पी), ग्रैंड डेमोक्रेटिक एलायंस (जीडीए), पीएमएल-कैद (पीएमएल-क्यू) और बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) के साथ साथ निर्दलियों से संपर्क साधा था.

इमरान को बहुमत मिला

पाकिस्तान में भारत के उलट सदन में बहुमत पहले साबित करना होता है. पाकिस्तान की संसद में 173 बहुमत का आंकड़ा होता है और संसद में हुई वोटिंग में इमरान ख़ान को इससे तीन अधिक यानी 176 वोट मिले हैं. नेशनल असेंबली में हुई वोटिंग में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को 176 जबकि उनके विरोधी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष शहबाज शरीफ़ को केवल 96 वोट मिले.

इमरान के शपथ ग्रहण में देश-विदेश से मेहमान पहुंचे हैं इनमें भारत के क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं.

चुनाव में जीत के बाद इमरान ने क्या कहा था?

चुनाव में बड़ी जीत के बाद इमरान ख़ान प्रेस ने कॉन्फ़्रेंस किया. उसमें उन्होंने कहा कि 22 साल की लड़ाई के बाद मुझे उस मुकाम पर पहुंचाया है. उन्होंने कहा, “मैंने चुनावों में जो वादा किया था उसे पूरा करूंगा. 22 साल पहले मैं क्यों सियासत में आया था? मैं ये समझता हूं कि मेरे मुल्क की जो ताक़त थी, जिस तरह से देश विकास कर रहा था वो नीचे आया. मैं चाहता था कि हमारा देश फिर से बड़ा बने.”

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वनांचल क्षेत्र कुई में आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दिए जाने वाले राशन में कटौती

छत्तीसगढ़। वनांचल क्षेत्र कुई में आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दी जाने वाली 42 क्विंटल चावल के स्थान पर केवल 27 क्विंटल चावल दिया गया है। इस तरह 15 क्विंटल चावल की कटौती कर दी गई है। कटौती के संबंध में कोई जानकारी नहीं है, इससे परेशानी बढ़ गई है।

कुकदूर में आदिवासी बालक छात्रावास, नवीन आदिवासी बालक छात्रावास, ठक्कर बापा आदिवासी बालक छात्रावास और कुई के आदिवासी कन्या छात्रावास, आदिवासी बालक आश्रम और आदिवासी कन्या आश्रम संचालित हैं। इन छात्रावास व आश्रम में कुल 300 बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। नियमत: छात्रावास एवं आश्रमों में रहने वाले छात्रों को प्रति छात्र, प्रतिदिन 500 ग्राम के हिसाब से पूरे माह के लिए सोसाइटी में रियायत दर पर हर माह चावल आवंटन दिया जाता है।

पुराना आदिवासी बालक छात्रावास को 6 के स्थान पर 4 क्विंटल ही दिया गया

नवीन आदिवासी बालक छात्रावास अधीक्षक रामगोपाल वर्मा ने बताया कि अगस्त माह में मिलने वाला चावल 7 क्विंटल 30 किलो के स्थान पर 5 क्विंटल, पुराना आदिवासी बालक छात्रावास कुकदूर को 6 क्विंटल के स्थान पर 4 क्विंटल, ठक्कर बापा आदिवासी बालक छात्रावास कुकदूर को 4 क्विंटल 50 किलो के स्थान पर 3 क्विंटल, आदिवासी कन्या छात्रावास कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5क्विंटल 50 किलो, आदिवासी बालक आश्रम कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5 क्विंटल, आदिवासी कन्या आश्रम कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5 क्विंटल चावल ही दिया गया है। इसकी वजह से वहां के प्रभारियों की परेशानी बढ़ गई है।

यहां दर्ज बच्चों की संख्या

संस्था संख्या बच्चों की संख्या

कुई 2 आश्रम व 1 आश्रम 180 बच्चे

कुकदुर 03 छात्रावास 120 बच्चे

ऐसी कटौती समझ से परे है

अधीक्षिकों का कहना है कि अगस्त माह में पूरे माह स्कूल लगा है। चावल की मात्रा में 15 क्विंटल की कटौती समझ से परे है। अगस्त भर बच्चे छात्रावास में रहेंगे, तो खाएंगे क्या। छात्रावास अधीक्षक श्री वर्मा ने कहा अगस्त महीने की कटौती की गई चावल नहीं दिया तो खुले दुकान से ऊंचे दर पर खरीदना होगा।

बाद में आएगा तो फिर देंगे

सोसाइटी को अगस्त माह का कटौती कर चावल मिला है, उतना छात्रावास अधीक्षकों को दे दिया गया है। बाद में चावल आएगा, तो उन्हें फिर से दिया जाएगा। राकेश यादव, विक्रेता, आ.से स.समिति कुई कुकदुर

समय पर उठाव नहीं कर रहे

समय पर चावल का उठाव नहीं किया जा रहा है। इसे देखकर चावल आवंटन में कटौती की गई है। कीर्ति कौशिक, फूड इंस्पेक्टर पंडरिया

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बसपा ने प्रदेश को चार जोन में बांटा, प्रदेश प्रभारियों की बैठक में हुआ फैसला

रायपुर| बसपा सुप्रीमो मायावती ने निर्देश दिया है कि सितंबर से पहले पार्टी प्रदेश में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर ले। इतना ही नहीं सेक्टर और ब्लॉक लेवल पर भी चुनावी टीम इस अवधि के अंदर तैयार ली जाए। सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में छग बसपा के छह प्रभारी तीसरी समीक्षा बैठक करेंगे। हालांकि इससे पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ उनकी बैठक की संभावना भी है। पार्टी ने चुनाव के मद्देनजर संगठन में बड़ा बदलाव किया है। जिसके बाद प्रदेश को चार जोन में बांटा गया है। पहले पार्टी पांच जोन के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। जोन एक में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर को रखा गया है। जबकि जोन दो में कोरबा और सरगुजा की लोस और विस सीटें हैं। जोन तीन में महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव और जोन चार में बस्तर,कांकेर की सीटें रखी गई है। इसी के मुताबिक पार्टी चुनावी गतिविधियां संचालित करेगी। चारों जोन में प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ स्थानीय पदाधिकारी भी होंगे। वहीं जोन की टीम की मॉनिटरिंग प्रदेश प्रभारियों के जिम्मे होंगी। बसपा के फिलहाल छह प्रदेश प्रभारी हैं।

सितंबर में तीसरी समीक्षा बैठक

सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में तीसरी समीक्षा बैठक होगी। जिसमें प्रदेश प्रभारी संगठन के स्तर पर दिए गए निर्देश के आधार पर हुए कामों की प्रगति का रिव्यू करेंगे। कार्यकर्ताओं को सभी 90 सीटों पर तैयारियां करने के लिए कहा है। प्रदेश प्रभारियों की बैठक में हुआ फैसला।

लोकसभा की भी तैयारी

विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर फोकस करने को कहा गया है। पहले बसपा जिलावार विधानसभा सीटों के आधार पर तैयारियां करती थी। लेकिन इस बार लोकसभा क्षेत्र में आने वाली सीटों के मुताबिक चुनाव की रणनीति बनाई जाएगी। प्रभारियों ने कहा कि अब इसी पैटर्न पर तैयारियां करना है।

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इस देशभक्त के लिए आप क्या कहेंगे

सर से लेकर पांव तक बागौर देखा जाए, तो मैले कुचैले कपड़ों के भीतर बसाता गन्धाता जीर्ण होता शरीर जो नहाने पर गीला ही हो पाता होगा, भीगे हुए तो अरसे गुजर चुके होंगे. शायद कोई भिखारी है या घरवालों की ओर से तिरस्कृत ,सभ्य कहलाए जाने वाले समाज का ही हिस्सा. जिसके पास हर रोज ढेरों ढेर दिक्कतें आती जाती होंगी.

मैं किसी की आस्था पर कोई सवाल नहीं उठा रही पर ये इंसान मुझे खुद से, औरों से कई गुना बेहतर लगा. इसके कपड़े और हाथ मे लटका थैला गवाह है कि इसका ठिकाना कोई फुटपाथ होगा , खुले आसमान के तले इसकी हर रात गुजरती होगी. जिंदगी समाज और देश को कोसने की कई मज़बूत वजह होंगी इसके पास. पर इसने इस पल को अनदेखा करने के बजाय इसका सम्मान अपनी पूरी शिद्दत से किया.

दूर से ही लकदक करते , नागरिक कहलाए जाने वाले सभ्य लोगों द्वारा आरोहित झंडे को नमन करते वक्त इसने अपने पांव की चप्पलें तक उतार दीं, शायद इस लिए कि इसके भीतर कृतज्ञ भाव का प्रत्यक्ष रूप अपने असल मे जीवित है……

ऐसा हम सब अपने पूजाघरों में करते हैं, आस्था डर या सदियों की पिलाई गयी घुट्टी के चलते हमारी आदत है मन बेमन अपने इष्ट के समक्ष नंगे पांव रहने की.

इस मासूम इंसान की उस चाह को मेरा नमन , जो इन साफ कपड़ो वाले झुंड का हिस्सा बनना चाह रही होगी.

इस इंसान के सलीके को नमन , जिसने लाखों तहज़ीब शुदा इंसानों को बिना शब्द बता दिया कि तहज़ीब किसी आला दर्जे के कॉवेन्ट की बपौती नहीं.

लेखक- Anu Verma के फेसबुक पोस्ट से

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अटलजी को लेकर बहुजनों और सवर्णों में वैचारिक टकराव कितना जायज

अटल बिहारी वाजपेयी का लंबी बीमारी के बाद 16 अगस्त को निधन हो गया. कहा जा रहा है कि उनके साथ एक युग का अंत हो गया. इसकी वजह शायद यह है कि अटल जी आज के दौर के इकलौते व्यक्ति थे, जिनके साथ उस दौर के तमाम नेताओं और पत्रकारों का अपना कोई न कोई किस्सा जुड़ा है. वाजपेयी के गुजर जाने के बाद तमाम लोग उन बातों का भी जिक्र कर रहे हैं जिससे एक बड़े समाज को धक्का लगा था.

बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से और सवर्ण बुद्धिजीवियों के बीच अटल जी को लेकर सोशल मीडिया पर वैचारिक बहस भी छिड़ गई.

अटलजी को याद करते हुए बहुजन समाज कई ऐसी बातों का जिक्र कर रहा है, जिससे सवर्ण समाज गुस्से में है. मसलन, वाजपेयी ने अपने शासन में पेंशन योजना को खत्म कर दिया, जिसका खामियाजा देश के नौकरीपेशा मध्यम वर्ग को आज तक भुगतना पर रहा है. अटल जी के शासन में ही सरकारी कंपनियों को धड़ाधड़ बेचा गया. तो ऐसे ही उनके शासनकाल में संविधान समीक्षा की कोशिश भी की गई थी, जिसकी वजह से देश का एक बड़ा समाज उनका विरोधी रहा. मंडल कमीशन के खिलाफ निकाली गई सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा को भी हरी झंडी वाजपेयी जी ने ही दिखाई. इस यात्रा के रास्ते में हुए दंगों में कई लोगों की जान चली गई थी. गुजरात के दंगों के समय भी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे, लेकिन उन्होंने मोदी के खिलाफ कोई भी कठोर निर्णय नहीं लिया. कहा जाता है कि उन्हें मना लिया गया, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर वो मान कैसे गए. अयोध्या की कहानी अलग है.

परमाणु विस्फोट को अटलजी ने “बुद्ध मुस्कुराए” कहा. चूंकि बुद्ध शांति के अग्रदूत हैं और दुनिया भर में माने जाते हैं. परमाणु विस्फोट जैसी घटना से बुद्ध का नाम जोड़ने से बौद्ध मत को मानने वाले तमाम देशों के लोगों ने वाजपेयी के इस कथन को गलत बताया था.

लेकिन इस सबके अलावा भी अटल जी से जुड़े कई किस्से हैं. हम आपको ऐसे ही चुनिंदा किस्से सुना रहे हैं, जिससे आप अटल जी के व्यक्तित्व के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं.

Ø बात 1984-1989 के दौर की है जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे. तब भारत में इस बीमारी के लिए उत्तम चिकित्सा व्यस्था उपलब्ध न थी. और आर्थिक वजहों से वाजपेयी अमेरिका जा पाने में सक्षम नहीं थे.

यह बात राजीव गांधी तक पहुंची. एक दिन राजीव गांधी ने उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया और कहा कि उन्हें भारत की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल के साथ संयुक्त राष्ट्र भेजा जा रहा है. राजीव गांधी ने वाजपेयी से कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस मौके का लाभ लेते हुए वे न्यूयॉर्क में अपना इलाज भी करवा लेंगे. इस तरह वाजपेयी न्यूयॉर्क गए और उनका इलाज हो सका. जब तक राजीव गांधी जिंदा रहे दोनों में से किसी ने इस बात को सार्वजनिक नहीं किया. बाद में राजीव गांधी की मौत पर प्रतिक्रिया देते हुए अटल जी ने खुद इस बात का जिक्र किया था कि वे जिंदा हैं तो सिर्फ राजीव गांधी की वजह से.

Ø जब अटलजी पहली बार सांसद बने थे तो वह वक्त सांसदों की ऐश का वक्त नहीं था. सुविधाएं भी काफी कम थी. भाजपा नेता जगदीश प्रसाद माथुर और अटलजी दोनों एक साथ चांदनी चौक में रहते थे. दोनों साथ-साथ पैदल ही संसद जाते-आते थे. छह महीने बाद अटलजी ने रिक्शे से चलने को कहा तो माथुरजी को आश्चर्य हुआ. असल में उस दिन उन्हें बतौर सांसद छह महीने की तनख्वाह एक साथ मिली थी. अटलजी के लिए यही उनकी ऐश थी.

Ø चुनाव हारने के बाद अटलजी फिल्म देखने चले जाते थे. लालकृष्ण आडवाणी ने एकबार एक किस्सा सुनाया था. उसके मुताबिक, दिल्ली में नयाबांस का उपचुनाव था. हमने बड़ी मेहनत की, लेकिन हम हार गए. हम दोनों खिन्न थे. दुखी थे. अटलजी ने मुझसे कहा कि चलो, कहीं सिनेमा देख आएं. अजमेरी गेट में हमारा कार्यालय था और पास ही पहाड़गंज में थिएटर. नहीं मालूम था कि कौन-सी फिल्म लगी है. पहुंचकर देखा तो राज कपूर की फिल्म थी- ‘फिर सुबह होगी’. मैंने अटलजी से कहा, ‘आज हम हारे हैं, लेकिन आप देखिएगा सुबह जरूर होगी.’

Ø वाजपेयी भी नेहरू जी की काफी इज्जत करते थे. 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है. वाजपेयी ने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था. वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था.

Ø जब अटल बिहारी वाजपेयी संसद पहुंचे और धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ती रही तो कहा जाने लगा था कि हिन्दी में वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है. वाजपेयी जब लोकसभा में बोलते तो हर कोई उनको ध्यान से सुनता था. नेहरू भी. किंगशुक नाग की वाजपेयी पर लिखे एक किताब के मुताबिक एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, “इनसे मिलिए. ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं. हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ.” तो वहीं एक बार एक दूसरे विदेशी मेहमान से नेहरू ने वाजपेयी का परिचय संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था.

Ø बात 1996 की है. वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. तब नरसिम्हा राव ने चुपके से वाजपेयी के हाथ में एक पर्ची पकड़ाई. इस तरह कि कोई देख न पाए. इस पर्ची में राव ने वे तमाम बिंदु लिखे थे जो वह खुद बतौर प्रधानमंत्री करना चाहते थे, किंतु चाहकर भी न कर पाए. आज के दौर में इस तरह की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती.

Ø अटल जी ने हमेशा पत्रकारों और आलोचकों को संबल दिया. वह आलोचनाओं से घबराते नहीं थे, बल्कि उसका स्वागत करते थे. आज के दौर में जिस तरह मीडिया पर लगातार पाबंदियां लगाई जा रही है, अटल जी के समय ऐसा नहीं था. उन्होंने अपने खिलाफ या सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को कभी रोका-टोका नहीं, बल्कि उनकी हौंसला अफजाई की. अटल जी को अपना गुरू बताने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनसे यह बात सिखनी चाहिए.

Read it also-दुनिया भर के अम्बेडकरवादियों को जोड़ने वाले राजू कांबले नहीं रहें
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दुनिया भर के अम्बेडकरवादियों को जोड़ने वाले राजू कांबले नहीं रहें

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नई दिल्ली। अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन (AIM) के संस्थापक राजू कांबले नहीं रहें. 16 अगस्त को कनाडा के वैंकुअर में उनका निर्वाण हो गया. वह पिछले 20 सालों से कनाडा में ही रह रहे थे. राजू कांबले दुनिया भर के अम्बेडकरवादियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी थे. उनके जाने से दुनिया के तमाम देशों में रहने वाले अम्बेडकरवादियों को गहरा झटका लगा है. पेशे से साइंटिस्ट राजू केमिकल इंजीनियर थे.

4 जनवरी 1954 को नागपुर में जन्में राजू कांबले एक सामान्य पृष्ठभूमि के थे. लेकिन बाबासाहेब की बातों को आत्मसात कर जीवन में संघर्ष करते हुए उन्होंने प्रोफेशनल और सोशल लाइफ में बुलंदियों को छुआ. वे आजीवन बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के प्रयास में जुटे रहें. उन्होंने अलग-अलग देशों में फैले दलितों को एक साथ जोड़ने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन के जरिए उन्होंने दुनिया के कई देशों में डॉ. अम्बेडकर कन्वेंशन आयोजित किया. इसमें मलेशिया के क्वालालंपुर में 1998 और 2011 में जबकि फ्रांस के पेरिस में 2014 में कार्यक्रम आयोजित किया गया था. 2018 में अम्बेडकर कन्वेंशन के लिए जापान को चुना गया है, जिसका आयोजन 22-23 सितंबर को होना था. AIM के जरिए वो यूएस, कनाडा, जापान, मिडिल ईस्ट सहित पूरे युरोपिय देशों में फैले अम्बेडकरवादियों को एक मंच पर ले आएं. इसमें जहां अच्छे पदों पर रहने वाले अधिकारी थे तो साधारण काम करने वाले लोग भी थे.

बहुत ऊंचाईयों पर पहुँचने पर भी वे कभी अपने समाज से नहीं कटे बल्कि समाज के लिए समर्पित रहे और जमीनी स्तर पर जाकर दलित एक्टिविज़्म के लिए कार्य किया. उनका मानना था कि हर बहुजन को बाबासाहेब को पढ़ना चाहिए. इसके लिए वो लोगों को किताबें उपलब्ध कराते रहे. वे हमेशा स्टूडेंट्स को विदेश जाकर पढ़ने और खुद को सक्षम बनाकर समाज के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते थे. उनका पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित रहा. राजू भाऊ का जाना अम्बेडकरी आंदोलन के लिए एक अपूर्णीय क्षति है.

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well Know ambedkarite Rajkumar Kamble no more

New Delhi: Rajkumar Daulatrao Kamble was born on January 4, 1954 in Nagpur, Maharashtra, India. A fearless visionary, Raju Kamble, as he was known more popularly, was a towering Ambedkarite who was relentless in his commitment to take forward the caravan of justice for all oppressed castes. Raju Kamble was the glue that bound all international Ambedkarites together. His magnetic personality, erudite and cultured demeanor, selflessness, infallible commitment towards the Dalit cause and last but not the least, tremendous Ambedkarite knowledge electrified our movement.

It is a testimony to Raju Kamble’s unparalleled contribution to our struggle that he never retreated from the battle to end caste apartheid but rather brought the movement to the globe inspiring NRI Ambedkarites for decades to unite and forge into a formidable force outside India. This also includes the seeds he sowed for promoting Buddhism as a facet of India’s heritage and creating a global cultural platform for Ambedkarites.

A scientist by training, Raju Kamble was a successful Chemical Engineer who did his B.Tech in Chemical Engineering from LIT, Nagpur and a postgraduate degree in chemical Engineering from IISc, Bangalore, INDIA. His work as a Senior Process Engineer in the field of oil exploration, oil refining and petrochemicals for the last 37 years gave him the opportunity to work across the world – from the U.S.A, Canada, Italy, U.A.E and Malaysia.

Raju Kamble was defined by his activism and it was through his tireless commitment that he was able to co-found Dr. Ambedkar International Mission Inc. (AIM) It was his belief that Dalits of the diaspora had powerful responsibility to payback to society and remain committed to Ambedkar’s vision wherever they are in the world. This commitment, rooted in love for all Ambedkarite people, helped AIM grow its international impact for the last 24 years. Through AIM he organized several international Dr. Ambedkar conventions beginning in Kuala Lumpur, Malaysia (1998) and (2011), and Paris, France (2014), and an upcoming convention in Japan (2018) for which his work was in full swing. It was through his leadership that AIM grew to having chapters all around the world including US, Canada, Japan, Middle East, and across Europe.

He was also instrumental in setting up an annual Dr. Ambedkar Memorial Lecture at Columbia University, the alma mater of Dr.Ambedkar, from 2009 in collaboration with South Asia Institute/Barnard College, Columbia University. He also organized in 2013 an International Conference at Barnard College, Columbia University, New York, to commemorate 100 years of arrival of Dr. Ambedkar to Columbia University in 1913, a landmark turning point, in the liberation of untouchables in India. These efforts also included Dr. Ambedkar memorial lectures through Canada most notably at the University of Calgary. He also worked closely with international Buddhists to host a groundbreaking International Buddhist conference in Nagpur that helped connect international Buddhists from around the world. Finally, his last jewel in his cap was the International Conference at Barnard College, Columbia University to commemorate 125th Birth Anniversary of Dr.Ambedkar – a milestone event in 2016 that still continues to impact Ambedkarites today.

Throughout all of this work Raju Kamble with his exemplifying mentorship connected Dalits of all nationalities to cultivate a global network of Ambedkarite movement. His hospitality was legendary and there was never a gathering too far or time too inconvenient for him to create any opportunities for the Ambedkarite community. He was so committed to the life and writings of B. R. Ambedkar that he kept a supply of his books and would ship them anywhere in the world so that Ambedkar’s words could travel the world. In addition to AIM, he mentored and lifted up leaders from many other Ambedkarite organizations including but not limited to Nagloka, Ambedkar Association of North America, Ambedkar Buddhist Association of Texas, Ambedkar International Center, Equality Labs, Friends for India’s Education, International Commission on Dalit Human Rights, Ambedkar King Study Circle, India Solidarity Network, Boston Study Group, and Federation of Ambedkarite and Buddhist Organisations UK. The strength and diversity in the Global Ambedkarite community is due in no small part to his humility in investing and building a new generation of Dalit leadership around the world.

Beyond his public works, Raju Kamble personally supported many Dalit students in their studies offering them scholarships and helping them with their test preparation fees so that promising students from across India could pursue education and better lives for themselves, their families, and their communities. It was a powerful testament to his legacy that many of these students continued to excel onward in their fields through the significant financial, emotional, and inspirational support he offered.

As we consider the impossible world where we must continue forward in this work without Rajkumar Kamble, we want to honor and remember how his legacy lives on in all of us. His unfortunate and untimely demise leaves a huge void in our movement. But we should keep him in our thoughts and draw motivation from his life and continue to strive in taking Babasaheb’s caravan further, as a fitting tribute to him and his values which he instilled in many of us as a mentor.

With deep love and gratitude, the Global Ambedkarite community salutes him and his timeless example. He is survived by his wife Nanda and two daughters, Prachi and Shaily. His work is due in no small part to the enormous love, compassion, and faith of these incredible women. His and his family’s personal sacrifices have ensured that the Ambedkarite movement outside India has blossomed over the years, and in his memory we will continue to grow it until we indeed see the end of Caste Apartheid once and for all. In honor of this tremendous man and his remarkable family, we offer them our deepest respect and gratitude. Wishing them only love and peace as we hold them all in our thoughts in this very difficult time.

इसे भी पढ़े-अटल जी की कविता…. ठन गई … मौत से ठन गई

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बहनजी ने यूं किया अटलजी को याद

अटल जी के साथ बसपा संस्थापक मा. कांशीरामजी और बसपा प्रमुख मायावती (फोटोः इंडियन एक्स्प्रेस)

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर दुख जताया है. उन्होंने इसे देश के लिए अपूरणीय क्षति बताया है. पूर्व प्रधानमंत्री को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वाजपेयी अनेक मौकों पर पार्टी हित से ऊपर उठकर समाज व देशहित में काम करने वाले नेताओं में से एक थे.

सुश्री मायावती ने कहा- “वे देश के एक ऐसे नेता थे जो भारतीय जनसंघ व बाद में इसके नए अवतार बीजेपी में रहने के बावजूद व्यापक स्तर पर सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे. उन्होंने पार्टी व सरका में रहते हुए अनेक मौकों पर पार्टी हित से ऊपर उठकर समाज व देश की भलाई के लिए काम करने का प्रयास किया.”

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कवि मन के श्री वाजपेयी काफी प्रतिभावान व धनी व्यक्तित्व के मालिक थे. उनके बारे में कहा जाता था कि वे सही सोच वाले गलत पार्टी के नेता थे. बसपा प्रमुख ने कहा कि देश के सांसद, केंद्रीय मंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में भी उनके अमूल्य योगदान को लोग लगातार याद करते रहे हैं और आगे भी उन्हें इसके लिए याद करते रहेंगे.

पूर्व प्रधानमंत्री के पिछले कई सालों से सक्रिय राजनीति से दूर रहने का जिक्र करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि अगर वे स्वस्थ्य रहते तो भाजपा शायद कभी इतनी जनविरोधी, संकीर्ण, संकुचित, अहंकारी व विद्वेषपूर्ण नीति वाली पार्टी नहीं हो सकती थी जितनी की आज हर तरफ नजर आती है और जिससे देश में हर तरफ शांति व सद्भाव के बजाय हिंसा व अफरातफरी का माहौल है. इसलिए भी उन्हें व उनके कार्यकाल को लोग और भी ज्यादा याद करते रहे और आगे भी उन्हें इसलिए याद रखा जाएगा.

गौरतलब है कि इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती ने कल (16 अगस्त) पूर्व प्रधानमंत्री को देखने और हाल जानने के लिए एम्स भी पहुंची थी.