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बुद्ध और बौद्ध धम्म का अनुयायी होने का मतलब

गौतम बुद्ध इस तथ्य के ऐतिहासिक जीवन्त प्रतीक हैं कि मनुष्य अपनी मनुष्यता का किस हद तक विस्तार कर सकता है, किन मानवीय ऊंचाईयों को छू सकता है और मानवीय संवेदना किन गहराईयों को नाप सकता है। कैसे एक इंसान लाखों नहीं, करोड़ों लोगों को मनुष्यता का मार्ग दिखा सकता है, मानवीय ऊंचाईयों को छूने के लिए प्रेरित कर सकता है, मानवीय संवेदना की गहराईयों में डुबकी लगाने के लिए तैयार कर सकता और कैसे एक ऐसे समाज की रचना के लिए प्रेरित कर सकता है, जहां मनुष्य-मनुष्य के बीच नातों का आधार मानवीय समता हो और दिलों को दिलों से जोड़ने का आधार बंधुता की भावना हो। बुद्ध का अनुयायी होने मतलब है कुछ चीजों को शिद्दत से अपनाना। जिसमें सबसे पहला तत्व है, मनुष्य-मनुष्य के बीच समता और बंधुता की भावना। सबके लिए न्याय यानि न्याय की सार्वभौमिक स्वीकृति। जिसके लिए प्राणी मात्र के प्रति प्रेम और करूणा जरूरी है। हर कहीं और हर स्तर पर न्याय, न्याय, न्याय। मनुष्य मात्र के साथ न्याय, प्राणी मात्र के साथ न्याय। सबकुछ नित परिवर्तनशील और सब कुछ नित प्रवाहमान है, कुछ भी स्थिर नहीं, कुछ भी अंतिम नहीं है, सृष्टि के इस तथ्य की पूर्ण स्वीकृति। हर चीज को तर्क और लोककल्याण की कसौटी पर कसना, यहां तक की बुद्ध और उनके वचनों को भी, स्वयं बुद्ध भी का ऐसा कहना था। कोई भी चीज तर्क की कसौटी से परे नहीं है। हर किताब, हर परंपरा और हर वचन-कथन को तर्क और लोककल्याण की कसौटी पर कसना। स्वयं बुद्ध, बुद्ध धम्म और बुद्ध के बचनों को भी तर्क और लोकल्याण की कसौटी पर कसना और जरूरत पड़ने उसमें परिवर्तन और संशोधन करना तथा उसे नया रूप देना, जैसे डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धम्म के जिस स्वरूप को अपननाया उसने नया नाम नवयान दिया और उसे अपनाया। कोई भी चीज तर्क और लोककल्याण की कसौटी से ऊपर नहीं है। न स्वयं बुद्ध और अन्य कोई। बुद्ध की संवेदना, वैचारिक विरासत और उनकी सार्वभौमिक न्याय, समता और बंधुता की मानवीय विरासत से नाता जुड़े बिना भारत की न्याय की परंपरा, समता की परंपरा, बंधुता की परंपरा के साथ नाता नहीं जोड़ा जा सकता। भारत की प्रगतिशील परंपरा की जड़ों से नहीं जुड़ा जा सकता है। बुद्ध से नाते कायम किए बिना भारत को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक, न्याय, समता और बंधुता आधारित भारत में तब्दील नहीं किया जा सकता है। मध्यकाली बर्बर मूल्य-मान्यताओं और विचारों से पिंड़ नहीं छुड़ाया जा सकता है। बुद्ध से जुड़ने का मतलब है, न्याय की भारतीय विरासत की जड़ों के साथ जुड़ना, मनुष्य मात्र के प्रति बंधुता की गहरी भावना की विरासत के साथ जुड़ना और उस चिंतन एवं विचार प्रक्रिया के साथ जुड़ना पूरी तरह वैज्ञानिक है और तर्कों एवं तथ्यों पर आधारित और जिसका केंद्र लोककल्याण है। बुद्ध का अनुयायी होने का मतलब है, कुछ चीजों को छोड़ना। हर तरह की पारलौकिक शक्ति का नकार। परलोक में नहीं, बिलकुल नहीं, लोक में विश्वास, पूरी तरह लोक में विश्वास। परमात्मा का नकार और उसके अंश के रूप में आत्मा का नकार। अंतिम सत्य का दावा करने वाली किताबों का नकार। पुनर्जन्म का नकार और पुनर्जन्म आधारित कर्मफल के सिद्धांत का नकार। स्वर्ग का नकार और नरक का नकार। जन्ननत का नकार और जहन्नुम का नकार। स्वर्ग की अप्सराओं का नकार और जन्नत की हूरों का नकार। वर्ण-जाति व्यवस्था और उस पर आधारित श्रेणीक्रम का पूरी तरह नकार। स्त्री-पुरूष के बीच अधीनता और वर्चस्व के रिश्ते के हर रूप का नकार। वर्ण-श्रेष्ठता या द्विज श्रेष्ठता के हर दावे का नकार। वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृतसत्ता को मान्यता प्रदान करने वाली हर धार्मिक-साहित्यिक किताब का नकार और हर उस व्यक्तित्व का नकार, जो अधीनता और वर्चस्व के किसी रूप का समर्थन करता हो। वर्ण-जाति व्यवस्था और स्त्रियों पर पुरूषों के वर्चस्व के किसी भी दावे का समर्थन करने वाले महान से महान कही जाने वाले शख्सियत का नकार। तर्कहीन आस्था एवं विश्वास का नकार और लोककल्याण की कसौटी पर खरा न उतरने वाले हर विचार एवं मूल्य का नकार। हर चमत्कार और अंधविश्वास का नकार। उन सभी संस्कारों और मूल्यों का नकार जो मनुष्य-मनुष्य के बीच समता और बंधुता के रिश्ते को कमजोर बनाते हों। अन्याय के हर रूप और हर तरीके का नकार, चाहे वह दुनिया के किसी कोने में हो और चाहे किसी के साथ हो, चाहे किसी रूप में हो। भारत का वह युग उन्नति और समृद्धि का युग रहा है, जो युग बुद्ध से जुड़ा हुआ था। भारत का हर वह क्षेत्र सापेक्षिक तौर पर न्यायपरक और प्रगतिशील था और है, जिसने बुद्ध के साथ अपना नाता कायम किया। भारत के सबसे न्यायप्रिय नायक वे हुए हैं, जिन्होंने बुद्ध से अपना नाता जोड़ा, चाहे डॉ. आंबेडकर हो, नेहरू हों या राहुल सांकृत्यायन या कोई और। बुद्ध का मार्ग न्याय का मार्ग है, बुद्ध की विरासत ही समता की विरासत है, बुद्ध की परंपरा ही प्रगतिशील चिंतन परंपरा है, बुद्ध की बंधुता की भावना ही मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी भावना है।

भविष्य के अंबेडकर को पहचानने का वक्त

इंसानी सभ्यता की सेहत एक छोटे से सूत्र पर टिकी है। जब भी इंसानों ने मिलकर काम किया, जब भी श्रमिक को उसका उचित फल मिला, जब भी मेहनत और उसके मुआवजे, या कर्म और कर्मफल के बीच सीधा रिश्ता बना, तब-तब समाज देश और सभ्यता आगे बढ़ी। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने इस न्याय को बनाए रखा, उन्होंने शहर बसाए, व्यापार किया, ज्ञान रचा और नई पीढ़ियों को एक बेहतर दुनिया सौंपी। दूसरी तरफ़ जिन समाजों ने जन्म को कर्म से बड़ा माना, जिन्होंने किसी के श्रम की गरिमा को उसके वंश से तय किया, वे समाज भीतर से खोखले होते गए, चाहे उनकी बाहरी चमक कितनी भी तेज़ रही हो।
डॉ. अंबेडकर इसी ऐतिहासिक सच्चाई को अपने जीवन और विचार का केंद्रीय सूत्र बनाकर चले। उन्होंने देखा कि भारतीय समाज में एक ऐसी संरचना गहराई से जड़ें जमाए बैठी है जो इंसान की पहचान को उसके जन्म से तय करती है, उसकी क्षमता और परिश्रम को नहीं। इस संरचना ने न केवल श्रम की क़ीमत की अनदेखी की बल्कि श्रमिक के ‘इंसान होने’ पर ही सवाल खड़े कर दिए। अंबेडकर ने तर्क, इतिहास और कानून की भाषा में यह साबित किया कि कोई भी व्यवस्था जो जन्म को योग्यता का आधार बनाए, वह न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि मानव सभ्यता के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी है।
भारत के मध्यकालीन और ग़ुलाम भारत तक के इतिहास में एक जिंदा बौद्धिक और आध्यात्मिक धारा रही है जिसने इस सवाल पर बहुत ज़ोर दिया है। इस धारा के चिंतकों और साधकों ने, चाहे वे किसी भी पंथ या क्षेत्र से आए हों, एक बात समान रूप से कही कि इंसान की श्रेष्ठता उसके कुल या जाति से नहीं, उसके कर्म और आचरण से तय होती है।
जन्मजात श्रेष्ठता पर खड़ी परम्परा के ख़िलाफ़ एक ऐसी परम्परा भी रही है जिसने अपनी आजीविका, अपने शिल्प और अपने दैनिक श्रम को ही साधना का माध्यम बनाया। उस परम्परा में कपड़ा बुनना, चमड़ा सिलना, घड़े बनाना और भक्ति एक साथ चलते थे। मिट्टी सानना और मन को माँजना एक ही क्रिया थी। यह एक क्रांतिकारी दर्शन था जो उस समय की प्रभुत्वशाली व्याख्याओं को चुनौती दे रहा था। गोरख, कबीर, रैदास और नानक सहित भक्ति काल के सारे संत इसी परंपरा के वाहक हैं। अंबेडकर इसी परंपरा के आधुनिक उत्तराधिकारी हैं, हालांकि उनकी भाषा नई है, वो कानूनी, मेथोडॉलॉजिकल और वैज्ञानिक भाषा है।
अंबेडकर ने देखा कि जन्म को आधार बनाकर किया गया सामाजिक विभाजन एक गहरा मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक षडयंत्र है। इसमें पीड़ित इंसान को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उसके शोषण या बदहाली का जिम्मेदार वो ख़ुद है। हर पीढ़ी में उसे कथा सुनाई जाती है कि उसके पिछले जन्मों के कर्म के कारण वो तकलीफ़ में है। ये बड़ी मजेदार तरकीब है जो केवल भारत में पायी जाती है। इसे कर्म का सिद्धांत कहते हैं, असल में भारत के दुर्भाग्य की जड़ ये कर्म का सिद्धांत ही है, इसी में से आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत निकलता है। कर्म, आत्मा और पुनर्जन्म – ये एक ही जहरीली पोटली के चट्टे बट्टे हैं।
अंबेडकर कहते हैं कि जो व्यवस्था पीड़ित को ही दोषी ठहराए, वह किसी भी सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकती। आप आज अपने आसपास के समाज को, सड़कों को, नदियों को पब्लिक स्पेस की गंदगी प्रदूषण और भयानक अव्यवस्था को देख लीजिए, आपको समझ आयेगा कि अंबेडकर के कहने का क्या मतलब है।
सौभाग्य से अंबेडकर की उच्च शिक्षा यूरोप अमेरिका में हुई। वे सच्चे अर्थों में नए विचारों से परिचित हुए।
सन 1913 में एक युवा भीमराव न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुँचे। विषय अर्थशास्त्र था लेकिन जो चीज़ उनके भीतर सबसे गहरी उतरी वह दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जान डेवी की कक्षाओं से आई। डेवी कहते थे कि फिलॉस्फी का मकसद विचारों की असमानी उड़ान भर नहीं है। जो विचार असल ज़िंदगी में काम न आए, जो इंसान की तकलीफ को कम न कर सके वो विचार भला किस काम का?
यह बात अंबेडकर के भीतर घर कर गई। ठीक से देखिए, यही बात बुद्ध ने कही थी, अगर हवा हवाई दार्शनिक बातें जीवन का दुख दूर ना कर सके तो उन बातों का क्या मूल्य है? इसीलिए अंबेडकर ने हर फिलोसफी और फ़िलोसोफ़र से से एक ही सवाल पूछा – “क्या तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा सिस्टम इंसान को इंसान के पास लाता है या दूर करता है?”
अब आप सोचिए भारत के ज्ञान और ज्ञानियों से इसका क्या उत्तर मिला होगा उन्हें?
जान डेवी की एक बात और थी जो अंबेडकर के लिए बहुत जरूरी कसौटी बन गई। डेवी ने लिखा था कि लोकतंत्र केवल गवर्नेंस का एक सिस्टम नहीं है, बल्कि यह एक साझेदारी और संवाद पर खड़ी जीवन शैली है। जिसमें एक दूसरे से जुड़े हुए अनुभव होते हैं, जहाँ अपने साथी के प्रति सम्मान और आदर की भावना होती है। अंबेडकर ने इसी बात को संविधान की आत्मा बनाया। स्वतंत्रता और समानता की बात तो बहुत लोग करते थे, लेकिन बंधुत्व अंबेडकर का अपना शब्द था। उन्होंने कहा था कि बिना बंधुत्व के बाकी दोनों मूल्य कागज़ पर लिखे अक्षर मात्र हैं। यही सांझापन लोकतंत्र की जान है और आज इसी पर सबसे ज़्यादा हमले हो रहे हैं। भारत से लेकर पश्चिम एशिया तक, अमेरिका से लेकर यूरोप तक, और हर देश के अपने अंदरूनी जीवन में भी।
अब भारत से और आज के दौर से से आगे निकलकर भविष्य के अंबेडकर को पहचानिए।
आजकल AI और मशीन लर्निंग का भौकाल बना हुआ है। जल्दी ही हम जातिवाद और पूंजीवाद के एक भयानक नए और साझे अवतार से टकराने वाले हैं। ये नया राक्षसी अवतार श्रम और इंसानी गरिमा के पूरे ढाँचे को हिला देगा। आज भी आप इसके असर देख सकते हैं। आगे तो भयानक तांडव होने वाला है। वे काम जो ऐतिहासिक रूप से समाज के सबसे वंचित वर्गों के पास थे, जो उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र साधन थे, वे तेज़ी से मशीनें हड़प लेंगी। आज ही देख लीजिए, गड्ढे खोदने वालों का सारा काम जेसीबी मशीन ने ले लिया है। छत की ढलाई में पहले पचास मज़दूर एकसाथ दिन भर काम करते थे, एक मशीन तीन घंटे में कर देती है।
अब एक नए तरह के “यूजलेस क्लास” का जन्म होने वाला है। इस लोगों की किसी को ज़रूरत नहीं होगी। ना ये कुछ बना सकते हैं ना कुछ खरीद सकते हैं। और सबसे ख़तरनाक बात कि ये कुछ नया सीख भी नहीं सकते। अब इनका क्या किया जाये? क्या कोई नई बीमारी या छोटा मोटा युद्ध या बड़ा दंगा फैलाकर इन्हें ख़त्म कर दिया जाये? या इनकी खोपड़ियों में कुछ डालकर इन्हें ज़ोंबी बना दिया जाये? ये कोई साइंस फिक्शन का सवाल नहीं है, ये निकट भविष्य में करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ा एक बड़ा सवाल है।
यहाँ मजे की बात ये है कि जो वर्ग पहले जन्म आधारित भेदभाव के कारण नीच या अछूत बनाये गए थे, अब उन्हीं को ये नई व्यवस्था “यूजलेस क्लास” में सबसे पहले तब्दील करेगी । उन्हें पहले “नीच जन्म” बताकर बेकार घोषित किया जाता था, अब बाज़ार उन्हें आर्थिक रूप से उपयोग/अनुपयोग के आधार पर बेकार साबित करने वाला है। गौर से देखिए, बस भाषा बदली है, तर्क वही है। और जरा कल्पना कीजिए इन लोगों की संख्या कितनी होगी? पूरे यूरोप की आबादी से भी ज़्यादा होगी। इससे भी अधिक खतरनाक बात ये है कि AI वाला सिस्टम जिस स्रोत से ज्ञान हासिल कर रहा है वो स्रोत ख़ुद तमाम भेदभाव के ज़हर से भरा है।
जिन सोशल मीडिया फीड्स, टेक्स्ट, वीडियो, रिपोर्ट्स, राजनीतिक विश्लेषणों आदि पर आजकल इसकी ट्रेनिंग चल रही है उसमें इतिहास के सबसे बदबूदार अध्याय जस के तस शामिल हैं। जब कोई एल्गोरिदम यह तय करता है कि किसे कर्जा मिलेगा, किसे नौकरी मिलेगी, किसी नामी इंस्टिट्यूट या यूनिवर्सिटी में किसे प्रवेश मिलेगा तब ये फ़ैसला कैसे होगा? एल्गोरिदम इंसानी करतूतों से ही सीख रहा है कि कौन ऊँचा है कौन नीचा है। जाति, जेंडर और क्लास सहित तमाम आधारों पर चलने वाली बदमाशियों एल्गोरिदम्स की खोपड़ी में भी घुस चुकी हैं।
पहले एक आदमी का चेहरा या नाम देखकर दूसरा आदमी भेदभाव करता था। अब AI से एल्गोरिदम एक सेकंड में करोड़ों लोगों को हमेशा के लिए दौड़ से ही बाहर कर देगा। यह शुरू हो चुका है। अब आने वाले समय में यही सबसे बड़ा खतरा है। अब अंबेडकर के योगदान पर फिर से विचार कीजिए। आपको भविष्य के अंबेडकर नजर आने लगेंगे। जब भेदभाव किसी इंसान के चेहरे के पीछे से काम करता था तो उसे चुनौती दी जा सकती थी, उसके ख़िलाफ़ आंदोलन हो सकता था, उसके ख़िलाफ़ कोर्ट जा सकते थे। लेकिन अब उस भेदभाव ने एक एल्गोरिदम का अवतार धर लिया है। अब उसे पहचानना भी कठिन है टक्कर देने की तो बात ही छोड़िये।
कबीर रैदास और अंबेडकर ने जिस अदृश्य दीवार को पहचाना था, आज वह दीवार डिजिटल कोड में तब्दील हो गई है।
वैश्विक स्तर पर देखिए आज क्या हो रहा है? आँख खोलकर देखिए एक उन्नत तकनीक जब अय्याश और अनैतिक लोगों के हाथ में जाती है तो क्या होता है। उनके हाथों में आने के बाद सबसे उन्नत तकनीक दमन का सबसे ख़तरनाक उपकरण बन जाती है। आज AI आधारित निगरानी और आक्रमण के सिस्टम्स को देखिए, वे पहले की तुलना में हज़ारों गुना जहरीले बन गए हैं। और तुर्रा ये कि यह सब विकास, सुरक्षा और आधुनिकता के नाम पर हो रहा है। यहीं अंबेडकर की प्रासंगिकता अपने सर्वोच्च रूप में सामने आती है।
अंबेडकर ने कहा था कि किसी भी व्यवस्था को परखने की एकमात्र कसौटी यह है कि वह इंसान की गरिमा को बढ़ाती है या घटाती है। यह सवाल आज AI के नीति निर्माताओं से भी पूछा जाना चाहिए। अंबेडकर ने यह भी कहा था कि शिक्षा केवल सूचना प्रदान करने का माध्यम नहीं है, वह नैतिक चेतना के निर्माण का माध्यम है। आज 21वीं सदी में इस शिक्षा में डिजिटल साक्षरता, एल्गोरिदम की समझ और तकनीकी अधिकारों की जानकारी भी शामिल होनी चाहिए। अंबेडकर का “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” का सूत्र आज भी उतना ही सटीक है, बस संघर्ष का क्षेत्र बदल गया है।
सन 1952 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अंबेडकर को मानद डॉक्टरेट देने के लिए बुलाया था। जान डेवी उस वक्त अंतिम साँसें ले रहे थे। उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। लेकिन डेवी का वह विचार ज़िंदा रहा जो कहता था कि संवाद ही सभ्यता है, साझापन ही लोकतंत्र है। अंबेडकर ने इसे बुद्ध के धम्म में और भी गहराई से महसूस किया । अब संघ क्या होता है? संघ यानी मिलकर जीने का अभ्यास। करुणा क्या है? करुणा यानी दूसरे का दर्द अपना दर्द मानना। यह डेवी के लोकतंत्र का ही बौद्ध रूप था, लेकिन जड़ें और भी पुरानी थीं, और शाखाएँ और भी विस्तृत।
Baba Saheb Ambedkarआज भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि वह अपनी सामाजिक और तकनीकीगत नीतियों का निर्माण किस मूल्यबोध या नैतिकता से करे? क्या भारत में कुछ नैतिकता बची है? अंबेडकर का लेखन इस दिशा में बहुत काम का है। सन 1947 में मिली राजनीतिक आज़ादी असल में सच्ची आज़ादी की पहली सीढ़ी थी। सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी न्याय की वह वृहत्तर स्वतंत्रता अभी आनी बाकी है जिसका सपना अंबेडकर ने देखा था। वह स्वतंत्रता जन्म से नहीं, गरिमा से परिभाषित होगी। वह केवल भारत की नहीं, समस्त मानवता की होगी। और उस आज़ादी के रास्ते में अंबेडकर एक मशाल की तरह हैं जो बुझाई नहीं जा सकती।

अंबेडकरवादी इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन को केंद्रीय मंत्री नीतिन गडकरी ने क्यों भेजा है 50 करोड़ का मानहानि नोटिस, जानिये पूरा मामला

नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री नीतीन गडकरी से जुड़ी ‘द कारवां’ की एक रिपोर्ट को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। बीफ कारोबार में गडकरी और उनके परिवार से संबंधित कंपनियों के शामिल होने संबंधी द कारवां के आरोप वाले रिपोर्ट पर द कारवां को मानहानि का नोटिस भेजने के बाद अब इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर वीडियो बनाने वाले बहुजन समाज के इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन को 50 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस थमाया गया है। साथ ही नागपुर में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इसके बाद यह बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। इसकी सूचना खुद मुकेश मानव ने 26 मार्च को एक्स पोस्ट पर दी।

 

दरअसल यह सारा विवाद शुरू हुआ, कारवां पत्रिका की रिपोर्ट में हुए खुलासे से। रिपोर्ट में दावा किया गया कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की पारिवारिक कंपनी एक गोमांस एक्सपोर्टर कंपनी से जुड़ी हुई है। पत्रिका ने अपनी जांच में पाया कि मांस व्यापार करने वाले रेंबल जो अब वेनाड फूड है, का सियान एग्रो एंड इंफ्रास्ट्रक्चर से गहरा संबंध है, जो गडकरी की कंपनी है। रिपोर्ट के अनुसार, सियान एग्रो के प्रबंध निदेशक नितिन गडकरी के पुत्र निखिल गडकरी हैं।

पत्रकार कौशल श्राफ की इस रिपोर्ट के अनुसार- रेंबल के अधिकांश शेयरधारकों और निदेशकों को गडकरी परिवार के स्वामित्व वाली या उनके द्वारा समर्थित कंपनियों द्वारा फंड किया जाता है। इसके बदले में गो मांस के व्यापार से जुड़ी कंपनी के पूर्व और वर्तमान शेयर धारकों ने गडकरी की कंपनी सियान एग्रो में निवेश किया है। रिपोर्ट कहती है कि, गो मांस व्यापार कंपनी रेंबल को सहकारी बैंक से बड़े लोन पास हुए हैं और उस बैंक की अध्यक्ष नितिन गडकरी की पत्नी कंचन गडकरी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गो मांस व्यापार कंपनी रेंबल के प्रबंध निदेशक महेश कुमार बालकृष्ण पिल्लई पहले गडकरी की स्वामित्व वाली कंपनी सियान कैपिटल के निदेशक थे। 1 मार्च 2026 को कारवां पत्रिका में प्रकाशित यह रिपोर्ट काफी विस्तृत है।

मीडिया वेबासाइट भड़ास फॉर मीडिया ने मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया है कि कारवां की रिपोर्ट के बाद कंपनी ने न सिर्फ कड़ी आपत्ति जताई बल्कि CIAN एग्रो ने कारवां को लगभग 50 करोड़ रुपये के मानहानि हर्जाने का कानूनी नोटिस भेजा। कंपनी का कहना है कि रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोप झूठे, भ्रामक और निराधार हैं तथा इससे कंपनी की प्रतिष्ठा और कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा है।

कंपनी की ओर से जारी नोटिस में कहा गया है कि- CIAN एग्रो का बीफ या किसी भी गोमांस से जुड़े कारोबार से कोई संबंध नहीं है। कंपनी के पास इस तरह के किसी व्यापार, प्रोसेसिंग या निर्यात का न तो लाइसेंस है और न ही कोई व्यावसायिक गतिविधि। कंपनी का मुख्य कारोबार सब्जियां, मसाले, खाद्य तेल और अन्य कृषि उत्पादों से जुड़ा है।

खबरों के मुताबिक कंपनी ने पत्रिका से रिपोर्ट वापस लेने और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। मामले में आगे दीवानी और आपराधिक कार्रवाई की संभावना भी जताई गई है।

अभी गडकरी और कारवां का विवाद थमा भी नहीं था कि इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन ने इसी रिपोर्ट के आधार पर वीडियो बनाया, जिसके बाद उनको भी 50 करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस भेजकर मामला दर्ज कर लिया गया है। इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन ने इसको लेकर सवाल उठाया है और 50 करोड़ की मानहानि के पीछे की कहानी बताई है। मुकेश का आरोप है कि ऐसा इथोनॉल के मुद्दे पर गडकरी की पीआर टीम के भांडेफोड़ के कारण हुआ है। मुकेश के मुताबिक-

याद है पिछले साल गडकरी जी इथोनॉल का प्रचार कर रहे थे? उस दौरान गडकरी की PR टीम ने मुझे मेल किया और बोला कि आप वीडियो करके एथनॉल के फायदे गिनाइये आपको भी बाकी इंफ़्लुएंसर्स की तरह पैसा मिलेगा। मैंने एथनॉल पर पेड वीडियो न करके, लोगों को वीडियो के माध्यम से बता दिया कि गडकरी जी इन्फ़्लुएंसर्स को पैसे देकर इथोनॉल का प्रचार करवा रहे हैं। यह देखो मुझे भी दे रहे थे।

वो वीडियो सोशल मीडिया पर 2.5-3Cr लोगों ने देखा था। विपक्ष के नेता ने उस वीडियो को शेयर किया था। उस वीडियो के बाद गडकरी ने आजतक के मंच पर बोला था कि एथनॉल और उन्हें बदनाम करने के लिए पेड वीडियो करवाए जा रहे हैं। उनकी टीम के मेल में जो पैसे ऑफर हुए थे वो और उनकी टीम की मेरे साथ हुई चैट मेरे पास मौजूद थी। ऐसे में उस वीडियो के लिए तो मेरे ख़िलाफ़ FIR और डिफ़ैमशन करवा नहीं सकते थे। इसलिए वो मौक़ा खोज रहे थे। वो मौक़ा मिला तब जब मैंने कारवाँ की रिपोर्ट को कोट करते हुए नितिन गडकरी के परिवार का BEEF के बिज़नेस से संबंधित होने पर वीडियो बनाया।

फिलहाल इस मुद्दे में अंबेडकरवादी इन्फ्लुएंसर के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई से मामला सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा है। हर किसी के इस मुद्दे को लेकर अपने तर्क हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब नीतिन गडकरी और उनकी कंपनी CIAN एग्रो जब कारवां को मानहानि का नोटिस भेज चुकी है और उसने अपनी रिपोर्ट को गलत नहीं माना है, ना ही किसी अदालत ने उस रिपोर्ट में दिये तथ्यों को गलत ठहराया है, तो आखिर उस रिपोर्ट के आधार पर वीडियो स्टोरी करने वाले मुकेश मानव के खिलाफ कार्रवाई का आधार क्या है?

महान सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश की आवश्यकता

ashokमहान सम्राट असोक (लगभग 304–232 ईसा पूर्व) मौर्य वंश के महान शासक थे। वे पितामह चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र और सम्राट बिन्दुसार के पुत्र थे। लगभग 268 ईसा पूर्व उन्होंने गद्दी संभाली और भारत के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक का संचालन किया। उनके शासनकाल में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुए। महान सम्राट असोक का नाम केवल भारत तक सीमित नहीं है। उनका योगदान विश्व इतिहास में शांति, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के आदर्श स्थापित करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कलिंग युद्ध और अहिंसा की नीति महान सम्राट असोक के शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ कलिंग युद्ध (लगभग 262–261 ई.पू.) था। इस युद्ध में हुई भयंकर हिंसा और जनहानि ने सम्राट असोक को गहरा आघात पहुँचाया। युद्ध के बाद उन्होंने जीवन और शासन में अहिंसा और धर्म (धम्म) की नीति अपनाने का निर्णय किया। उनकी धम्म नीति के मुख्य सिद्धांत थे- • अहिंसा और करुणा- सभी जीवों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण • धार्मिक सहिष्णुता- विभिन्न धर्मों का आदर और सम्मान • जनकल्याणकारी शासन- स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर बल • नैतिक और ईमानदार प्रशासन- भ्रष्टाचार और अन्याय से दूर शासन इन सिद्धांतों ने महान सम्राट असोक को न केवल भारतीय इतिहास में, बल्कि विश्व के महान शासकों में भी एक अद्वितीय स्थान दिलाया। आधुनिक भारत में असोक के प्रतीक 1. राष्ट्रीय प्रतीक और राजमुद्रा भारत की राजमुद्रा सीधे सम्राट असोक के सारनाथ स्तंभ से ली गई है। चार शेर चारों दिशाओं की ओर देख रहे हैं, जो साहस, शक्ति, सतर्कता और एकता का प्रतीक हैं। राजमुद्रा आज सरकारी कागजात, कानून, अधिनियम और संवैधानिक दस्तावेजों पर अंकित होती है। यह भारत की राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाती है।
  1. असोक चक्र और राष्ट्रीय ध्वज भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बीच में स्थित असोक चक्र में 24 किरणें हैं। यह न्याय, सत्य, कर्म और समय की निरंतर गति का प्रतीक है। यह चक्र भारत के संविधान की विचारधारा और राष्ट्र की आधुनिक पहचान से जुड़ा हुआ है।
  1. अशोका हॉल और अन्य प्रतीक भारत के राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में एक विशेष हॉल का नाम अशोका हॉल रखा गया है। यह हॉल उच्च स्तरीय समारोहों और शपथ ग्रहण कार्यक्रमों के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, सरकारी और संवैधानिक प्रतीकों में असोक का योगदान लगातार दिखाई देता है।
  1. सेना में अशोक चक्र भारत में सेना और नागरिक क्षेत्र में उच्चतम सम्मान के रूप में “अशोक चक्र” दिया जाता है। यह सम्मान साहस, पराक्रम और सर्वोच्च देशभक्ति के लिए प्रदान किया जाता है। परमवीर चक्र के उपरांत अशोक चक्र सेना का सर्वोच्च युद्ध और वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने देश की रक्षा में अद्वितीय बहादुरी और त्याग का परिचय दिया। इस प्रकार, असोक का नाम न केवल शासन और धर्म के क्षेत्र में, बल्कि देश की रक्षा और वीरता के क्षेत्र में भी सर्वोच्च प्रतीक बन चुका है।
सम्राट असोक की जयंती और अवकाश की बहस 1. वर्तमान स्थिति कुछ साल पहले बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने सम्राट अशोक जयंती पर बिहार में अवकाश घोषित किया था। इसके अलावा आज तक सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश घोषित नहीं किया गया है। यह कई विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विडंबना और ऐतिहासिक उपेक्षा के रूप में देखा जाता है। हालांकि, उनकी जयंती “धम्म दिवस” के रूप में मनाई जाती है, लेकिन यह केवल स्मरण और समारोह तक सीमित रहता है। इस अवसर का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान को समझाने और उनके आदर्शों को फैलाने के लिए किया जा सकता है।
  1. सम्राट असोक की जयंती पर अवकाश का औचित्य सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना एक सकारात्मक कदम होगा। इससे न केवल उनके योगदान और आदर्शों को व्यापक स्तर पर सम्मान मिलेगा, बल्कि जनता और युवाओं में धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा, न्याय और सामाजिक सहिष्णुता जैसे मूल्यों की जागरूकता भी बढ़ेगी।
अवकाश के माध्यम से सरकारी और शैक्षणिक संस्थान विशेष कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, जैसे: •असोक चक्र और धम्म नीति पर संगोष्ठी • छात्र सत्र और शैक्षणिक प्रदर्शनी • सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रेरक भाषण यह देशभर में उनके जीवन और विचारों को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करेगा और युवा पीढ़ी को नेतृत्व और नैतिक शासन के मूल्य सिखाने में सहायक होगा। इसके अतिरिक्त, यह अवकाश भारत की विश्वगौरव और ऐतिहासिक विरासत को भी उजागर करेगा। सम्राट असोक के प्रतीक जैसे अशोक चक्र, राजमुद्रा, अशोका हॉल और सेना में अशोक चक्र पुरस्कार के महत्व को जनता के बीच समझाने का अवसर मिलेगा। इस प्रकार अवकाश केवल छुट्टी नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा और सामाजिक प्रेरणा का दिन बन सकता है। विश्व के प्रति योगदान सम्राट अशोक का योगदान केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। उनके कार्यों और विचारों ने विश्व स्तर पर शांति, अहिंसा और धर्मनिरपेक्ष शासन के आदर्श स्थापित किए। (1) वैश्विक दृष्टि • सम्राट असोक का शासन धर्मनिरपेक्षता और मानवता के प्रति प्रतिबद्ध था। • उनके विचार आज भी संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शिक्षा संस्थानों में अध्ययन का विषय हैं। • विश्व इतिहास में अशोक को एक नैतिक, न्यायप्रिय और अहिंसावादी शासक के रूप में स्मरण किया जाता है। (2) राष्ट्रीय अवकाश का वैश्विक महत्व सम्राट अशोक की जयंती पर अवकाश देने से भारत विश्व स्तर पर शांति, न्याय और धर्मनिरपेक्षता का प्रेरक देश के रूप में अपनी पहचान मजबूत करेगा। यह कदम न केवल इतिहास का सम्मान है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सीख और प्रेरणा भी प्रदान करेगा। (3) समाज और सरकार के लिए संदेश सम्राट असोक की जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करने से इतिहास और संस्कृति का सम्मान बढ़ेगा। समाज में धर्मनिरपेक्षता, न्याय और अहिंसा का संदेश फैलाएगा। युवाओं में नेतृत्व, नैतिकता और जनकल्याण के मूल्य विकसित होंगे। इसके अलावा सेना में अशोक चक्र सम्मान जैसी वीरता और साहस के प्रतीकों का महत्व भी जनसामान्य तक पहुंचेगा। सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि वे अशोक के योगदान को भुलाए नहीं, बल्कि इसे राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाएं। सम्राट असोक का मूल्यांकन करने से साफ पता चलता है कि उन्होंने अहिंसा और शांति को स्थायी रूप से स्थापित किया, धर्मनिरपेक्ष शासन और न्याय की नींव डाली। भारत और विश्व इतिहास में अमूल्य योगदान दिया। देशभक्ति और वीरता के प्रतीक के रूप में अशोक चक्र सम्मान स्थापित किया। फिर भी, उनकी जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश न होना उनके महत्व और योगदान के अनुरूप नहीं है। यह समय की मांग है कि भारत सरकार और राज्य सरकारें सम्राट अशोक की जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करें, ताकि उनके आदर्शों और प्रतीकों का सम्मान पूरे समाज में दृढ़ता से बना रहे।
इस आलेख के लेखक संजय गजभिये हैं।  

ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का लाभ, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति का नहीं माना जाएगा। उसे SC/ST एक्ट के तहत न तो संरक्षण मिलेगा, और न ही एससी-एसटी को मिलने वाला आरक्षण। मंगलवार 24 मार्च को इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुना दिया है।

 जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि संविधान के अनुसार जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, वह अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति के पास SC प्रमाणपत्र हो, लेकिन उसने ईसाई धर्म अपना लिया है, तो केवल प्रमाणपत्र होने से उसे अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। अदालत ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद SC दर्जा समाप्त माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के फैसले को सही ठहराया। उक्त मामला पादरी चिंताडा आनंद से जुड़ा था। पादरी आनंद ने आरोप लगाया था कि अक्कला रामिरेड्डी ने उसे जातिसूचक गालियां दी और भेदभाव किया। आनंद की शिकायत पर पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट के तहत FIR दर्ज की थी। आरोपी रामिरेड्डी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर FIR रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट के जस्टिस एन. हरिनाथ ने FIR रद्द करते हुए कहा था कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए वे अनुसूचित जाति का दावा नहीं कर सकते और SC/ST एक्ट का लाभ नहीं ले सकते।

दरअसल भारत का संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जातियों के बारे में उल्लेख किया गया। 1950 में जब राष्ट्रपति ने सूची को जारी किया, तो उसमें सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को ही एससी की सूची में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में सिख और बौद्ध धर्म के लोग भी एससी की श्रेणी में शामिल कर लिए गए। सिखों को 1956 में और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को 1990 में एससी की श्रेणी में शामिल किया गया। हिन्दू धर्म से धर्मांतरित होकर ईसाई धर्म अपनाने वाला दलित वर्ग भी खुद के लिए लंबे समय से अनुसूचित जाति के दर्जे की मांग कर रहा था। जिसे अब झटका लग गया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दलित समाज के एक बड़े हिस्से ने सही ठहराया है और इसका स्वागत किया जा रहा है। तो वहीं ईसाई धर्म अपनाने वालों का अपना तर्क है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित ईसाइयों को मिलने वाले आरक्षण को लेकर बहस खत्म हो गई है।

दिल्ली में भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 शुरू, 18 से 30 मार्च तक होगा यह शानदार महोत्सव

नई दिल्ली। भारत जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (टीआरआईएफईडी) भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर 18 से 30 मार्च 2026 तक सुंदर नर्सरी, नई दिल्ली में भारत जनजाति महोत्सव 2026 का आयोजन कर रहा है। इस महोत्सव में देश भर से आदिवासी कारीगरों, उद्यमियों और सांस्कृतिक कलाकारों को एक साथ लाया जाएगा। इस उत्सव का उद्घाटन केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री श्री जुअलओराम द्वारा जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में 18 मार्च, 2026 को सुंदर नर्सरी, नई दिल्ली में किया गया।

यह उत्सव प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे से रात 8:00 बजे तक जनता के लिए खुला रहेगा। इसका उद्देश्य कला, हस्तशिल्प, हथकरघा, व्यंजन और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के माध्यम से आदिवासी भारत की विविध परंपराओं, रचनात्मकता और उद्यमशीलता की भावना का एक जीवंत अनुभव प्रदान करना है।

भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 में आदिवासी कला का भव्य प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें भारत भर के 78 वन धन विकास केंद्रों (VDVK) और 310 कुशल कारीगरों के 200 से अधिक चुनिंदा स्टॉल शामिल होंगे। आगंतुक 120 आदिवासी व्यंजन प्रस्तुतियों के माध्यम से “वन से थाली तक” आंदोलन का अनुभव कर सकते हैं और 17 लाइव प्रदर्शनों के दौरान पारंपरिक शिल्पकला की जटिल प्रक्रिया को देख सकते हैं। उत्सव के माहौल को और भी जीवंत बनाने के लिए, शाम को 400 से अधिक कलाकार पारंपरिक नृत्य और संगीत प्रस्तुत करेंगे, जो एक अविस्मरणीय सांस्कृतिक यात्रा का अनुभव प्रदान करेगा।

भारत ट्राइब्स बिजनेस कॉन्क्लेव, जो 19 से 27 मार्च 2026 तक आयोजित किया जाएगा, नीति निर्माताओं, उद्योगपतियों और जनजातीय उद्यमों के लिए टिकाऊ वस्त्र, जनजातीय खाद्य प्रणालियों और नैतिक विलासिता बाजारों पर उच्च स्तरीय चर्चा करने का एक प्रमुख मंच होगा। यह बहु-दिवसीय कार्यक्रम नवाचार, स्वदेशी ज्ञान के संरक्षण और जनजातीय युवाओं और महिलाओं के कौशल विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करेगा, जिनका उद्देश्य समुदाय-आधारित जनजातीय पर्यटन और उद्यम विकास के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना है। इस पहल का एक महत्वपूर्ण आकर्षण 24 मार्च 2026 को आयोजित होने वाला सीएसआर कॉन्क्लेव है, जिसे विशेष रूप से कॉर्पोरेट संस्थानों और जनजातीय उद्यमियों के बीच की खाई को पाटने और स्थायी साझेदारी और टिकाऊ आजीविका सृजित करने के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी का लाभ उठाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 का एक प्रमुख आकर्षण RISA पहल है, जिसमें सुश्री अंजू मोदी, श्री मनीष त्रिपाठी, श्री गौरव जय गुप्ता, श्री संदीप खोसला और सुश्री समीरा दलवी जैसे प्रख्यात डिजाइनर आदिवासी कारीगरों के साथ मिलकर काम करते हैं। समकालीन डिजाइन को एरी सिल्क, कोटपैड कॉटन और डोंगरिया कढ़ाई जैसी प्राचीन परंपराओं के साथ मिलाकर, RISA स्वदेशी वस्त्रों को वैश्विक फैशन जगत में एकीकृत करता है। इस महोत्सव का उद्देश्य भारत के आदिवासी समुदायों की रचनात्मकता, स्थिरता और उद्यमशीलता की क्षमता को बढ़ावा देना है, साथ ही आदिवासी कारीगरों और उद्यमों के लिए अधिक दृश्यता और बाजार के अवसर प्रदान करना है।


पीआईबी दिल्ली द्वारा प्रकाशित 

मा. कांशीराम की जयंती से पहले सियासत तेज, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का बड़ा फैसला

नई दिल्ली/ लखनऊ। बसपा सरकार में बने मान्यवर कांशीराम जी शहरी आवास योजना से अवैध कब्जा हटाकर दलित समाज के लोगों को दिया जाएगा। इसकी घोषणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की है। इससे अब 15 मार्च को मान्यवर कांशीराम की जयंती से पहले बसपा से दलित वोट छीनने की सियासत तेज हो गई है।

दरअसल साल 2007 से 2012 की बसपा सरकार में तात्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने एक शानदार फैसला लिया था। गरीबों को घर मुहैया कराने का फैसला। दरअसल यह सपना मान्यवर कांशीराम का था तो उस योजना को नाम दिया गया ‘मान्यवर कांशीराम जी शहरी गरीब आवास योजना’।

बीएसपी सरकार द्वारा मान्यवर श्री कांशीराम जी शहरी गरीब आवास योजना के तहत केवल दो चरण में ही डेढ़ लाख से अधिक पक्के मकान दिए गए तथा सर्वजन हिताय गरीब आवास मालिकाना हक योजना के तहत काफी परिवारों को लाभ मिला। लाखों भूमिहीन परिवारों को जमीन भी दी गई। लेकिन बाद के दिनों में या तो मान्यवर कांशीराम जी शहरी आवास योजना के तहत मिले मकान आवंटित नहीं किये गए या फिर उस पर अवैध कब्जे हो गए।

15 मार्च को मान्यवर कांशीराम की जयंती के ठीक पहले जब सपा और कांग्रेस उनकी जयंती को जोर-शोर से मनाने की तैयारी कर रहे हैं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक बड़ा फैसला किया है। उन्होंने मान्यवर कांशीराम जी शहरी आवास योजना से अवैध कब्जा हटाकर दलित समाज के लोगों को देने का आदेश दिया है। मंगलवार 10 मार्च को मुख्यमंत्री ने कैबिनेट की बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए कि जितने भी कांशीराम आवास में अवैध कब्जे हैं उन्हें तत्काल खाली कराया जाए। इन्हें रंगवा-पुतवाकर आर्थिक रूप से कमजोर दलित परिवारों को दिया जाए।

बता दें कि बसपा सरकार में गरीबों के लिए सस्ती दरों पर घर व फ्लैट देने के लिए कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना शुरू हुई थी। कई नगरीय निकायों में कांशीराम आवास बने हुए हैं। कई जिलों में इन आवासों पर अवैध कब्जे हो गए हैं। इन्हें ही मुख्यमंत्री ने खाली कराकर पात्रों को देने के निर्देश दिए हैं। इससे बेघर दलितों के बीच एक नई उम्मीद जगी है।

इससे पहले बीते साल बुलंदशहर में भी मायावती सरकार द्वारा बनाए गए कांशीराम आवासीय योजना के फ्लैटों को गरीबों को किफायती किराए पर देने की खबर आई थी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक,सदर तहसील के पास साल 2010 में बने 400 फ्लैट पिछले 15 सालों से खाली पड़े थे, उसको अफोर्डेबल रेंटल स्कीम के तहत सिर्फ 1000 रुपए के मासिक किराये पर गरीब परिवारों को आवंटित किये जाने की पहल की गई थी।

बता दें कि मान्यवर कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना तात्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के शासन काल में द्वारा 2008-09 में मायावती के कार्यकाल में शुरू की गई एक कल्याणकारी योजना है। इसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सस्ती दर पर पक्के घर उपलब्ध कराना था, जिसमें दलितों को प्राथमिकता दी जाती थी। इसमें 50% घर SC/ST के लिए आरक्षित किए गए थे, जबकि शेष 50% अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए होते हैं।

हालांकि जिस तरह तमाम दल इस बार मान्यवर कांशीराम जी कि विरासत पर दावा कर दलितों को लुभाने की कोशिश में जुटे हैं, उसका किसको कितना लाभ मिलेगा, या फिर वो बसपा के साथ बने रहेंगे, यह 2027 के चुनावी नतीजे तय करेंगे।

कर्नाटक के गडग में सरकार ने दलितों के लिए अलग से खुलवाई नाई की दुकान

AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीरगडग (कर्नाटक)। कर्नाटक के गडग जिले के शिंगतलूर गांव में दलित समुदाय के लोगों के लिए एक नई नाई की दुकान खोली गई है। गांव के दलितों का कहना था कि उन्हें कई सालों से ऊँची जाति के नाई बाल काटने और शेविंग करने से मना कर देते थे। इसी शिकायत के बाद सामाजिक कल्याण विभाग, तालुक प्रशासन, तालुक पंचायत, दलित संगठनों और शिवशरण हड़पदा अप्पन्ना समाज ने मिलकर यह पहल की। इस दुकान को ‘अस्पृश्यता खत्म करो और समरस गांव बनाओ’ अभियान के तहत शुरू किया गया है।

सामाजिक कल्याण विभाग ने पड़ोसी गांव टिप्पापुर के रहने वाले बसवराज हड़पदा को यह दुकान दी है। अब वे गांव में ही लोगों के बाल काटेंगे और शेविंग करेंगे।

गांव के लोगों का कहना है कि पहले दलित परिवारों को बाल कटवाने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता था। इससे उन्हें परेशानी और खर्च दोनों उठाने पड़ते थे। बताया जाता है कि वीरभद्रेश्वर देव की पालकी यात्रा से जुड़ी कुछ परंपराओं के बाद हड़पदा समुदाय के लोगों को नाई सेवा देना बंद कर दिया गया था।

स्थानीय दलितों ने कई बार अधिकारियों को शिकायत दी। इसके बाद प्रशासन ने दखल दिया और अब गांव में यह नई दुकान शुरू की गई है। गांव के कुछ लोग इसे अच्छा कदम बता रहे हैं, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह भी सोचने की बात है कि आज भी लोगों को बुनियादी सेवाओं के लिए अलग इंतजाम करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि असली बदलाव तब होगा जब हर गांव में सभी को बराबरी से सेवा मिले।

मान्यवर कांशीराम जयंती को सपा मनाएगी PDA दिवस, बहनजी ने अखिलेश यादव को घेर

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने ऊपर से दलित विरोधी तमगे को हटाने के लिए तमाम कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि बसपा सुप्रीमो बहन मायावती उन्हें दलित हितैषी होने का तमगा नहीं लेने देगी। ताजा घटनाक्रम में समाजवाद पार्टी द्वारा मान्यवर कांशीराम की जयंती 15 मार्च को पीडीए दिवस मनाने की घोषणा के बाद बसपा सुप्रीमों ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बहनजी ने एक बयान जारी कर सपा को जमककर घेरा है और इसे राजनीतिक नाटकबाजी ठहराया है। बहनजी का कहना है कि ऐसा कर सपा उपेक्षित वर्गों के वोटों के स्वार्थ में कर रही है, जैसे अन्य राजनीतिक दल करते हैं। बहनजी ने याद दिलाया कि बसपा ने मान्यवर श्री कांशीराम जी के सम्मान में यकासगंज का नाम जब कांशीराम नगर कर दिया था और इसको जिला मुख्यालय का दर्जा दिया था तो अखिलेश यादव ने इसका नाम बदल दिया था।

बहनजी ने सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि जब मान्यवर श्री कांशीराम जी की ख़्वाहिश के मुताबिक बी.एस.पी. की सरकार ने जब पूर्वांचल में वाराणसी के पास भदोही में महान संतगुरु के नाम पर संत रविदास नगर नाम से नया ज़िला बनाया, तो उसे भी सपा सरकार ने अपनी जातिवादी व बी.एस.पी. विरोधी रवैया अपनाते हुए जिले का नाम वापस बदल दिया था।

बहुजन समाज को समाजवादी पार्टी की घोषणाओं से सावधान रहने की अपील करते हुए बहनजी ने मान्यवार कांशीराम जी के नाम से लखनऊ में उर्दू-फारसी अरबी यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की याद दिलाते हुए भी अखिलेश यादव को जमकर घेरा। यही नहीं, बहनजी ने सहारनपुर में भी मान्यवर श्री कांशीराम जी के नाम पर बनाये गये सरकारी अस्पताल का नाम भी सपा सरकार ने बदल देने का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि क्या यही सपा का मान्यवर श्री कांशीराम जी के प्रति आदर व सम्मान है?  

बहनजी के इस हमले से साफ है कि वह बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम पर अपना दावा किसी के लिए भी छोड़ने के पक्ष में नहीं है। खासकर समाजवादी पार्टी के लिए जिसने अपने शासन काल में मान्यवर कांशीराम सहित तमाम बहुजन नायकों को सम्मान देने में जमकर न सिर्फ कोताही बरती बल्कि उन्हें अनदेखा किया। अपने शासनकाल में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव ने जो किया, दलित समाज का बड़ा वर्ग उसे भूलने के मूड में नहीं है।

आरक्षण पर यूजीसी ने जारी किया नया नियम

दिल्ली। भारत के विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी के साथ भेदभाव को रोकने को लेकर यूजीसी की नई गाईडलाइन के विवाद के बीच यूजीसी ने अब आरक्षण को लेकर एक नए नियम की घोषणा की है। इस नियम से एससी, एसटी और ओबीसी को आने वाले दिनों में यूनिवर्सिटी के भीतर जायज प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद बढ़ी है। आरक्षण को लेकर नया नियम लागू करते हुए यूजीसी ने कहा है कि विश्वविद्यालयों को अब 45 दिन या उससे अधिक की किसी भी नियुक्ति पर आरक्षण देना होगा।

इसको लेकर यूजीसी ने सभी राज्यों व विश्वविद्यालयों को पत्र लिखा है। आरक्षण का यह नया नियम सभी केंद्रीय यूनिवर्सिटी के साथ राज्य व डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी और लॉ यूनिवर्सिटी में भी लागू होगा।

यूजीसी के सचिव प्रो. मनीष जोशी ने आरक्षण के इस नए नियम के संबंध में सभी संबंधित शिक्षण संस्थानों को पत्र लिखा है। इसमें साफ कहा गया है कि यदि कोई भी नियुक्ति 45 दिन या उससे ज्यादा के लिए है तो देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को उसमें आरक्षण के मानकों का पालन करना होगा। उन्होंने पत्र में लिखा है कि राज्य सरकार व विश्वविद्यालयों को यह सख्ती से सुनिश्चित करना होगा कि इन नियुक्तियों में आरक्षण के तहत एससी, एसटी व ओबीसी अभ्यर्थियों को लाभ मिले।

यूजीसी के इस नए नियम से आरक्षित वर्गों को अपना हक मिलने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि इस बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि आरक्षण को लेकर तमाम नियम मौजूद होने के बावजूद एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण का कोटा पूरा नहीं होता है। ऐसे में यूजीसी के सामने इस नए नियम की घोषणा करने से आगे इसको लागू करने की भी चुनौती होगी।

बुद्ध शरण हंस की स्मृति में पटना में श्रद्धांजलि सभा

पटना। विगत दिनों अंबेडकर मिशन पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ अंबेडकरवादी बुद्ध शरण हंस का परिनिर्वाण हो गया था। तब से उनके प्रशंसकों में उनके सम्मान और याद में एक श्रद्धांजलि सभा के आयोजन की चर्चा हो रही थी। 15 फरवरी 2026 को पटना के दारोगा राय पथ अवस्थित बुद्ध विहार में यह सभा आयोजित हुई। इस दौरान बिहार और देश के तमाम हिस्सों से उनके पाठक और प्रशंसक इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान बुद्ध शरण हंस जी कि प्रतिमा का अनावरण किया गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए मैंने बताया कि हंस साहब की पहचान मुख्यतः ब्राह्मणवाद के यम के रूप रही है, किंतु वह इससे आगे की चीज थे। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के 1938 वाले मनमाड़ भाषण से प्रेरित होकर अपने चिंतन को सामाजिक कष्टों के निवारण से आगे बढ़कर बहुजन के आर्थिक कष्टों के निवारण पर केंद्रित किया था, जिसका सबूत 1977 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘शोषितों की समस्या है”, जिसमें उन्होंने बहुजन की आर्थिक मुक्ति का 50 साल आगे का विजन प्रस्तुत किया था। बहुजनों की आर्थिक मुक्ति के लिए ही, वह डायवर्सिटी मिशन से जुड़े। आज भारतीय राजनीति पूरी तरह डायवर्सिटी पर केंद्रित है और इसका बड़ा श्रेय बुद्ध शरण हंस साहब को जाता है।

बिहार के बाहर से आए मशहूर लेखक डॉ विजय कुमार त्रिशरण, डॉ . सिद्धार्थ रामू, पीएल आदर्श सहित पटना के प्रख्यात शिक्षाविद प्रो रमाशंकर आर्या, पूर्व आयकर कमिश्नर व आंबेडकरवादी वीरेंद्र कुमार, विधायक ललन कुमार, प्रो हुलेश मांझी, मा. केदार मांझी, प्रो अमित पासवान, मा. संतोष पासवान सहित अन्य अनेक गणमान्य शख्सियतों ने हंस साहब के व्यक्तित्व और योगदान पर रोशनी डाला। कार्यक्रम की शुरुआत सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में उनकी प्रतिमा का अनावरण करके हुआ।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ कि बुद्ध विहार में परिनिवृत डॉ. करुणाकर के साथ हंस साहब की भी प्रतिमा स्थापित की जाएगी। मंच संचालन परिनिवृत बुद्ध शरण हंस साहब की विरासत को आगे बढ़ा रहीं जया कुमारी यशपाल ने किया।

बोधगया में उच्च शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन पर ऐतिहासिक सम्मेलन

बोधगया। बिरसा फुले आंबेडकर समता फाउंडेशन (BPASF) के तत्वावधान में देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB), दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), पंजाब तथा मगध विश्वविद्यालय से आए विद्वान, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता बोधगया में एक ऐतिहासिक तीन दिवसीय सम्मेलन के लिए एकत्र हुए हैं। यह सम्मेलन 7 फरवरी से 9 फरवरी तक अंतरराष्ट्रीय ध्यान केंद्र, बोधगया में आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम आलोचनात्मक अकादमिक विमर्श और सामाजिक आंदोलनों को एक साझा मंच पर लाकर समानता, न्याय और दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन में उच्च शिक्षा की भूमिका पर गंभीर मंथन का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
इस सम्मेलन में देश के प्रमुख और प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की सक्रिय भागीदारी रही। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. हरिश वानखेड़े, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सुकुमार तथा पंजाब से प्रो. जसवंत राय जैसे प्रमुख वक्ताओं ने अपने व्याख्यानों और सत्रों के माध्यम से समकालीन उच्च शिक्षा, जाति, सामाजिक न्याय और बहुजन विमर्श पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। इन प्रमुख वक्ताओं के विचारों ने सम्मेलन के बौद्धिक एजेंडे को दिशा दी और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न को अकादमिक केंद्र में स्थापित किया।
इन प्रमुख वक्ताओं के साथ-साथ देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से आए अन्य प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं और स्वतंत्र विद्वानों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। इन विद्वानों ने जाति, शिक्षा, प्रतिनिधित्व, ज्ञान-न्याय, बहुजन अध्ययन, लोकतंत्र और सामाजिक असमानताओं जैसे विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए, जिससे यह सम्मेलन बहुस्तरीय और बहुविषयक अकादमिक संवाद का सशक्त मंच बना।
इस सम्मेलन का केंद्रीय उद्देश्य सामाजिक चेतना का निर्माण करना और फुले-आंबेडकरवादी आंदोलन को सशक्त करना है, जिसमें शिक्षा और अकादमिक जगत को सामाजिक परिवर्तन के प्रभावशाली औज़ार के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। आयोजकों के अनुसार यह केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गहराई से जमी असमानताओं और बहुजन समुदाय के विरुद्ध जारी बहिष्करण की संरचनाओं को चुनौती देने वाला एक सचेत राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक हस्तक्षेप है।
बाद के सत्रों में बहुजन समुदाय के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच, प्रतिनिधित्व, संरचनात्मक भेदभाव, प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों की चुनौतियाँ, आर्थिक असुरक्षा, जाति-आधारित भेदभाव और विश्वविद्यालयों में व्याप्त संस्थागत बहिष्करण जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध, सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण स्थल भी हैं।
महत्वपूर्ण रूप से, यह सम्मेलन अपने दृष्टिकोण को “सामाजिक न्याय से सामाजिक परिवर्तन” की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में प्रस्तुत करता है। प्रतिभागियों ने कहा कि वर्तमान संदर्भ में शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि बहुजन समुदाय के लिए स्थायी समानता, गरिमा और बंधुत्व के निर्माण का सामूहिक उपकरण माना जाना चाहिए।
उद्घाटन सत्र और समापन सत्रों में वक्ताओं ने गौतम बुद्ध, संत रविदास, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बिरसा मुंडा, डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम की वैचारिक परंपरा से प्रेरणा लेते हुए मानव गरिमा, सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए इस विरासत की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
बिरसा फुले आंबेडकर समता फाउंडेशन (BPASF) ने शोध, अकादमिक विमर्श और सामाजिक आंदोलनों को जोड़ने वाले मंचों के निर्माण के प्रति अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराया है और भविष्य में इस प्रकार के और व्यापक राष्ट्रीय स्तर के अकादमिक-सामाजिक हस्तक्षेप जारी रखने की घोषणा की है।
इस ऐतिहासिक सम्मेलन के आयोजन की ज़िम्मेदारी शोधार्थियों और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की एक सक्रिय टीम ने संभाली है। आयोजन टीम में अखिलेश कुमार, प्रकाश प्रियदर्शी, रूपक, संदीप, दयाशील और मनीष शामिल हैं। आयोजक टीम ने सीमित संसाधनों के बावजूद इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित कर अकादमिक और सामाजिक आंदोलनों के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित किया है।

रिपोर्ट- अखिलेश कुमार, शोध छात्र, जामिया मिल्लिया इस्लामिया 

सतेन्द्र सिंह ने 9 घंटे तैरकर पार किया न्यूजीलैंड का 24 किमी का कुक स्ट्रेट, एशिया में बनाया रिकार्ड

न्यूजीलैंड/दिल्ली। पद्मश्री और प्रतिष्ठित नार्वे तेनजिंग अवार्ड से सम्मानित सत्येंद्र सिंह लोहिया ने न्यूजीलैंड में कुक स्ट्रेट विजय कर लिया है। लगातार 9 घंटे 22 मिनट तैरते हुए सतेन्द्र सिंह ने 24 किलोमीटर का सफर तय किया। इस दौरान पानी का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस था। खास बात यह है कि सत्येन्द्र सिंह ऐसा करने वाले एशिया के पहले दिव्यांग तैराक हैं। कुक स्ट्रेट न्यूज़ीलैंड के नॉर्थ आइलैंड और साउथ आइलैंड के बीच स्थित है। यह समुद्री मार्ग अत्यंत ठंडे पानी, तेज़ धाराओं और चुनौतीपूर्ण मौसम की परिस्थितियों के लिए विश्व भर में जाना जाता है। यह लक्ष्य विश्व की कठिनतम ओपन वॉटर तैराकियों में गिनी जाती है। यह विजय हासिल करने के बाद सत्येन्द्र ने भारत के तिरंगे के साथ ही बाबासाहेब के चित्र वाला ‘जय भीम’ का झंडा भी लहराया।

मध्यप्रदेश के रहने वाले सत्येन्द्र सिंह इससे पहले भी कई उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। दिव्यांग जनों की श्रेणी में साल 2019 में सत्येन्द्र को नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। सत्येंद्र सिंह लोहिया इससे पूर्व विश्व की कई प्रतिष्ठित समुद्री तैराकियों के लक्ष्य को सफलता पूर्वक हासिल कर चुके हैं। इसमें, इंग्लिश चैनल (इंग्लैंड), कैटालिना चैनल (अमेरिका), नॉर्थ चैनल (आयरलैंड–स्कॉटलैंड) को सफलतापूर्वक पार कर चुके हैं। उनकी हालिया उपलब्धि पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सतेन्द्र सिंह को बधाई दी है।

इस उपलब्धि के बाद सत्येन्द्र सिंह ने दलित दस्तक से बातचीत करते हुए कहा कि- “मेरे लिए यह तैराकी केवल एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि उन करोड़ों दिव्यांग साथियों के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।”

हालिया उपलब्धि ने निश्चित तौर पर भारत के लाल सत्येंद्र सिंह ने इस उपलब्धि से न सिर्फ दिव्यांग समाज को प्रेरणा दी है, बल्कि भारत का नाम और तिरंगा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और ऊंचा कर दिया है। दलित दस्तक ने साल 2019 में ही सत्येन्द्र के भीतर छुपी प्रतिभा को सम्मान देते हुए अपनी मैगजीन के कवर पेज पर न सिर्फ तस्वीर प्रकाशित की थी, बल्कि उनके संघर्षपूर्ण जीवन पर कवर स्टोरी भी प्रकाशित किया था।

महाराष्ट्र के आदिवासी युवक शंकर भील को अमेरिकी यूनिवर्सिटी से 75 लाख की फेलोशिप

जलगांव/ महाराष्ट्र। महाराष्ट्र के रहने वाले 26 साल के आदिवासी समाज के युवा शंकर भील का चयन पीएचडी के लिए अमेरिकी के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में हुआ है। सैन डिएगो में स्थित इस यूनिवर्सिटी से वह एथेनिक स्टडीज की पढ़ाई करेंगे। शंकर को 9 महीने के लिए 71 हजार डॉलर की फंडिंग मिली है। भारतीय रुपये में यह 70-75 लाख के करीब होती है। अरुण को पहले 9 महीने के लिए फैलोशिप मिली है, फेलोशिप के बाद पहले दो साल कोर्स वर्क होगा, फिर एग्जाम और फिर रिसर्च का काम होगा। शंकर यह रिसर्च करेंगे कि आदिवासियों की जमीन किस तरह गैर आदिवासियों के हाथों में चली गई।

शंकर महाराष्ट्र के जलगांव जिले के एक छोटे से गांव नागझिरी के रहने वाले हैं। करीब 100 लोगों के घर वाले इस गांव में ज्यादातर लोग दिहारी मजदूरी करते हैं। कई लोग बंधुआ मजदूरी भी करते हैं। शंकर के मां और भाई अब भी मजदूरी करते हैं। शिक्षा की बात करें तो इस गांव में शंकर और उनके भाई को मिलाकर कुल चार बच्चों ने ही बारहवीं तक की पढ़ाई की है। इसमें भी शंकर इकलौते हैं, जिन्होंने बारहवीं से आगे की पढ़ाई की है।

12वीं पास करने के बाद शंकर ने पुणे से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उनका चयन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स कोर्स के लिए हुआ। शंकर की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब शंकर बहुजन इकोनॉमिक्स ग्रुप से जुड़े। यह ग्रुप वंचित समाज के छात्रों को मेंटरशिप देता है। इससे जुड़ने के बाद शंकर ने पीएचडी की तैयारी की।

शंकर के पिता अरुण बुधा भिल मजदूर थे। जब शंकर 11वीं में थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई। बावजूद इसके शंकर ने हिम्मत नहीं हारी। शंकर अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपनी मां सिंधू बाई भिल को देते हैं, जिन्होंने शंकर के हौसलों को टूटने नहीं दिया, जिससे शंकर बड़े सपने देख सके।

इस सफर में शंकर को सिर्फ आर्थिक दिक्कतों का ही नहीं बल्कि सामाजिक पहचान के कारण ताने भी झेलने पड़े। बीबीसी ने शंकर की इस कामयाबी पर एक स्टोरी की है। उस स्टोरी में शंकर ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा- लोगों कहते हैं कि मैं एसटी वर्ग से हूं इसलिए मुझे आरक्षण का फायदा मिला। लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बेंगलुरु एक निजी यूनिवर्सिटी है। वहां कोई आरक्षण नहीं है। अब मैं अमेरिका जा रहा हूं, वहां भी कोई आरक्षण नहीं है।

बात-बात पर आरक्षण वाला होने का दर्द झेलने वाले शंकर अरुण भिल अपने रिसर्च के जरिये आदिवासी समाज के दर्द और संघर्ष को आवाज देना चाहते हैं।

ओडिसा में आंगनबाड़ी में दलित को कुक बनाए जाने पर विरोध में उतरे सवर्ण

केंद्रपाड़ा। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में एक दलित लड़की को आंगनबाड़ी सेंटर का कुक बनाए जाने के बाद यह सेंटर तीन महीने तक बंद रखना पड़ा। दरअसल, दलित समाज की लड़की को आंगनवाड़ी सेंटर का कुक बनाने पर तमाम मां-बाप ने अपने बच्चों को वहां भेजना ही बंद कर दिया। इससे 60 बच्चों का भविष्य संकट में है। नवंबर 2025 में राजनगर ब्लॉक में घड़ियामाला ग्राम पंचायत के नुआगांव सेंटर में सरमिस्ता सेठी को आंगनवाड़ी हेल्पर के तौर पर अपॉइंट किया था।

इसके तुरंत बाद गांव की कमेटी ने दलित के अपॉइंटमेंट के विरोध में बच्चों को आंगनवाड़ी सेंटर भेजना ही बंद कर दिया। यही नहीं ग्रेजुएट होने के बावजूद सिर्फ अपनी जातीय पहचान के चलते सरमिस्ता सेठी को ऊंची जाति के मां-बाप से खुले तौर पर विरोध का सामना करना पर रहा है। इस गांव में करीब 45 परिवार रहते हैं, जिनमें सात दलित परिवार भी शामिल हैं। राजनगर ब्लॉक के चीफ डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर (सीडीपीओ) दीपाली मिश्रा जो खुद सवर्ण समाज से हैं, उनके समझाए जाने के बावजूद ऊंची जाति के लोग अपने बच्चों को सेंटर भेजने के लिए तैयार नहीं हैं और खिंचतान बनी हुई है।

बिहार में दलितों की शिक्षा बेहाल

पटना। बिहार में एससी-एसटी के लिए अवासीय स्कूल चलते हैं। हाल ही में आई रिपोर्ट के मुताबिक इन स्कूलों में शिक्षकों के 60 प्रतिशत पद खाली हैं। इसकी वजह से पंद्रह हजार से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई छूट गई है। दरअसल एससी-एसटी कल्याण विभाग द्वारा बिहार में 91 रेजिडेंशियल स्कूल चलाए जाते हैं। इसमें लड़कों के लिए 50, लड़कियों के लिए 37 और 4 अवासीय स्कूल में लड़के-लड़की दोनों पढ़ते हैं। इन स्कूलों में 44, 240 स्टूडेंट्स पढ़ सकते हैं। लेकिन वर्तमान में सिर्फ 29,202 स्टूडेंट ही पढ़ रहे हैं। यानी 30 प्रतिशत यानी 15,038 स्टूडेंट कम।

बता दें कि इन स्कूलों में क्लास-1, 6 और क्लास 11 में ही एडमिशन होता है। जो आंकड़ें आए हैं, वो निश्चित तौर पर चौंकाने वाले हैं। बिहार विधानसभा से पहले दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन नैक्डोर ने एक रिपोर्ट जारी किया था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि-  नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में बिहार में 62% दलित निरक्षर हैं।  रिपोर्ट में बताया गया था कि बिहार में दलितों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत 66.1% के मुकाबले केवल 55.9% है।  दलित महिलाओं में साक्षरता दर मात्र 43.4% है, जबकि पुरुषों में यह 66.5% है।  दलितों के सबसे पिछड़े समूह मुसहर समुदाय में साक्षरता दर 20% से भी कम है, जो देश के किसी भी जातीय समूह में सबसे निम्न स्तरों में से एक है।

 

उच्च शिक्षा में दलितों की भागीदारी बेहाल है। ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (2021-22) के अनुसार, विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों और शिक्षकों का हिस्सा क्रमशः 5.7% है, जबकि उनकी जनसंख्या 19.65% है। बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री लखेन्द्र रौशन हैं। बिहार में फिलहाल बजट सत्र चल रहा है, इस दौरान सरकार फिर बजट लाएगी और तमाम वादे और दावे करेगी। लेकिन क्या इस ओर किसी का ध्यान जाएगा।

बिहार में जातिवाद का गजब मामला, पूरे गांव के ब्राह्मणों पर एफआईआर

दरभंगा। बिहार के दरभंगा जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक गांव में सभी ब्राह्मणों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई है। मामला कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र के हरिनगर गांव का है। गांव के 70 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज हुई है। ये सभी ब्राह्मण जाति से हैं, जिसके बाद बहस शुरू हो गई है।

FIR की कॉपी के अनुसार, हरिनगर गांव के निवासी अशर्फी पासवान ने कुशेश्वरस्थान थाने में आवेदन दिया , जिसके आधार पर यह केस हुआ है। आरोप में पांच साल पुराना मजदूरी का 2.50 लाख रुपये मांगने पर ब्राह्मण समाज द्वारा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल और मारपीट का आरोप लगाया गया है। इस संबंध में जो वीडियो सामने आया है, उसमें ब्राह्मण समाज के लोगों द्वारा पासवान समाज के टोले पर हमला करने का वीडियो साफ दिख रहा है।

इस बारे में 30 जनवरी 2026 को एक पंचायत हुई थी। इसी दौरान हंगामा शुरू हो गया। आरोप है कि इसके दूसरे दिन 31 जनवरी की सुबह जब अशर्फी पासवान का बेटा विक्रम घर की ओर आ रहा था तो हेमंत झा, ओमप्रकाश झा आदि ने मिलकर लाठी-डंडे, लोहे की रॉड से हमला कर दिया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

https://x.com/i/status/2019124998729003182

एफआईआर में पहला आरोपी हेमंत झा को बनाया गया है। और साथ में करीब 70 लोगों का नाम एफआईआर में है। तो 150 अज्ञात लोगों के नाम हैं। इस पूरे मामले में स्थानीय SDPO प्रभाकर तिवारी का कहना है कि घटना में 10 से अधिक लोग घायल हो गए थे। 12 लोगों को हिरासत में लिया गया है। पुराने विवाद में मारपीट हुई है।

हालांकि अपनी तरह की इस अनोखी घटना के सामने आने के बाद बहस छिड़ गई है। कहा जा रहा है कि गांव का पूरा ब्राह्मण समाज दोषी कैसे हो सकता है? कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्राह्मण समाज के स्थानीय लोगों का तर्क है कि एफआईआर में नामजद अधिकतर ब्राह्मण दिल्ली मुंबई में मजदूरी और अपने परिवार का पेट पालन हेतु नौकरी कर रहे हैं। फिर सबको दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।

अगर यह तर्क सही है तो यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की जांच पर उठता है कि जब एफआईआर में दर्ज नाम वाले ब्राह्मण समाज के लोग दिल्ली और मुंबई में नौकरी करते हैं तो आखिर उनके नाम एफआईआर में क्यों है? और अगर गांव का हर ब्राह्मण दोषी है तो यह जातिवाद का गंभीर मामला है। क्योंकि वैसे भी पहले दलितों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखना, फिर बाद के दिनों में उनसे बेगारी करने का एक लंबा इतिहास तो मिलता ही है।

गुजरात में फिर घोड़ी को लेकर बवाल, जातिवादियों को इंसान से ज्यादा घोड़ी क्यों है प्यारी?

पाटण, गुजरात। एक फरवरी को जब देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में देश का बजट पेश कर रही थीं, और उसके ठीक बाद मीडिया से लेकर सत्ता पक्ष और खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इसको साल 2047 के भारत की स्वर्णिम तस्वीर बताई जा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात से एक खबर आई।

गुजरात के पाटन जिले में घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने के कारण जातिवादी गुंडों ने दलित समाज के युवा पर तलवार से हमला कर दिया। विशाल चाबड़ा नामक युवा घोड़ी पर बारात लेकर निकला। इसी बीच बारात जब चंद्रुमना गांव पहुंची तो जातिवादी गुंडों ने बारात को घेर लिया। उन्होंने वही दकियानुसी तर्क दोहराया कि आखिर दलित समाज का दूल्हा घोड़ी पर बारात कैसे निकाल सकता है।

गुजरात और राजस्थान में जातिवादियों द्वारा अपना अहम और वर्चस्व दिखाने के लिए ऐसी घटना को अंजाम देना एक घटिया प्रथा सी बनती जा रही है। फरवरी 2024 में गांधीनगर में चड़ासना गांव में दलित दूल्हे विकास चावड़ा के साथ घोड़ी से खींचकर मारपीट की गई थी। तो वहीं 2020 में बनासकांठा में सेना के जवान की बारात पर सिर्फ इसलिए पथराव किया गया क्योंकि वह घोड़ी पर बैठा था। इसी तरह 18 जून 2018 को बीबीसी में प्रकाशित खबर के मुताबिक गुजरात के माणसा तहसील के पारसा गांव में बारात लेकर पहुंचे दलित युवक को जातिवादी गुंडों ने घोड़ी से नीचे उतार दिया।

आप खबर के नीचे आखिर में मीडिया में प्रकाशित उन खबरों में देख सकते हैं कि यह कोई अकेली घटनाएं नहीं है, बल्कि यह कथित अगड़ी जातियों के बीच बड़ी बीमारी बनती जा रही है। यह बीमारी गुजरात और राजस्थान के बाद हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी पहुंच गई है। वहां से भी ऐसी कई खबरें सामने आ चुकी है।

सवाल है कि भारत की सरकार देश को तो साल 2047 के विकसित और शानदार भारत का सपना दिखा रही है, लेकिन क्या वह देश की आजादी के 100 साल बाद 2047 में जातिवादी भारत को भी देखना चाहेगी, अगर नहीं तो देश की 25 फीसदी से अधिक आबादी को जिस जातिवाद के सवाल से हर रोज जूझना पड़ता है, उस सवाल के हल पर बात क्यों नहीं करना चाहती। क्योंकि अगर जातिवाद पर गंभीर चर्चा शुरू नहीं हुई तो देश भले ही 2047 में आजादी के 100 साल का जश्न मना रहा होगा, देश के दलितों और आदिवासियों की एक बड़ी आबादी को अगर जातिवादी घटनाओं से छुटकारा नहीं मिलता, समानता नहीं मिलती तो उनके लिए यह जश्न अधूरा ही रहेगा। सवाल यह भी है कि आखिर एक वर्ग को इंसान से ज्यादा घोड़ी क्यों प्यारी है?

जानिये, धर्मगुरु दलाई लामा को क्यों मिला है ग्रैमी अवार्ड

नई दिल्ली। धर्मगुरु दलाई लामा को शांति, करुणा और मानव मूल्यों के संदेश को वैश्विक मंच तक पहुँचाने के लिए प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें उनके ऑडियो एल्बम ‘Meditations: The Reflections of His Holiness the Dalai Lama’ के लिए मिला है।

दलाई लामा को यह अवार्ड 1 फरवरी 2026 को आयोजित 68वें ग्रैमी अवार्ड समारोह के दौरान ‘बेस्ट ऑडियो बुक, नरेशन एंड स्टोरीटेलिंग’ कैटेगरी में प्रदान किया गया। इस एल्बम में दलाई लामा के ध्यान, शांति और करुणा पर आधारित विचारों को ऑडियो रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसने दुनियाभर के श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया है।

इस एल्बम का संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खानऔर उनके दोनों बेटों अमन अली बंगश एवं अयान अली बंगश ने तैयार किया है। संगीत और आध्यात्मिक विचारों के इस अनूठे संगम ने एल्बम को वैश्विक पहचान दिलाई। ग्रैमी अवार्ड को संगीत और ऑडियो जगत का सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान माना जाता है। इस सम्मान को प्राप्त करने के बाद दलाई लामा ने इसे पूरी मानवता को समर्पित करते हुए कहा कि शांति और करुणा ही दुनिया को बेहतर बना सकती है।

गौरतलब है कि दलाई लामा को इससे पहले 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। ग्रैमी अवार्ड मिलना उनके संदेशों की वैश्विक स्वीकार्यता और प्रभाव का एक और महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है।

यूजीसी गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट का रुख और वंचित समाज की चिंताएं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों पर गुरुवार को रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि- नए नियमों में “अस्पष्टता” है और उनका दुरुपयोग हो सकता है।

उन्होंने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें, जो इस मुद्दे की जांच कर सके। कोर्ट ने इन नियमों के लागू होने पर फ़िलहाल रोक लगा दी, और सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों में खामियों को भरने पर विचार कर सकती है।

मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि-

ऐसा प्रतीत होता है कि नए नियमों का मसौदा तैयार करते समय कुछ पहलुओं की नज़रअंदाज़ किया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी और इसे रोहित वेमुला की मां की ओर से 2012 के यूजीसी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका के साथ सुना जाएगा।

बता दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव ख़त्म करने के लिए 13 जनवरी को यूजीसी गाइडलाइन 2026 जारी किया था। इसका उद्देश्य हाइअर एजुकेशन में समानता को बढ़ाना है ताकि किसी भी वर्ग के छात्र,छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके। नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक इक्विटी कमेटी बनाई जाएगी जिसमें ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होगा। ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी। इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क था कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकते हैं।

दोनों पक्षों की बात को समझने के लिए दलित दस्तक ने इस बारे में कई एक्सपर्ट से बात की थी। इस चर्चा को दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल पर प्रसारित किया गया था। एक बातचीत हमने सुप्रीम कोर्ट की वकील दिशा वाडेकर के साथ की थी। दिशा वाडेकर रोहित वेमुला और पायल तडवी की मां द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर मामले में वकील हैं। और यूजीसी की नई गाइड लाइन उसी पृष्ठभूमि से निकली है। उसका लिंक नीचे है-

तो दूसरी बातचीत हमने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. विक्रम हरिजन से की थी और एससी-एसटी समाज की राय को समझने की कोशिश की थी। उसका लिंक नीचे है-
फिलहाल इस मामले में दोनों पक्षों के बीच बहस जारी है। अब देखना होगा कि 19 मार्च को कोर्ट अपनी सुनवाई में क्या कहती है।