अभय कुमार
(अभय कुमार जेएनयू से पी.एच.डी. हैं. इनकी दिलचस्पी माइनॉरिटी और सोशल जस्टिस से जुड़े सवालों में हैं. आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं)
अभय कुमार
– सुभाष गाताडे
तेरह साल का एक वक्फा़ गुजर गया जब थोरात कमेटी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी. याद रहे सितम्बर 2006 में उसका गठन किया गया था, इस बात की पड़ताल करने के लिए कि एम्स अर्थात आल इंडिया इन्स्टिटयूट आफ मेडिकल साईंसेस में अनुसूचित जाति जनजाति के छात्रों के साथ कथित जातिगत भेदभाव के आरोपों की पड़ताल की जाए। उन दिनों के अग्रणी अख़बारों में यह मामला सूर्खियों में था। / देखें, द टेलीग्राफ 5 जुलाई 2006/
आज़ाद भारत के इतिहास में वह अपने किस्म की पहली रिपोर्ट रही होगी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर सुखदेव थोरात तथा अन्य दो सदस्यों ने मिल कर, इस अग्रणी संस्थान में आरक्षित श्रेणी के छात्रों को झेलने पड़ते भेदभाव के परतों को नोट किया था। / https://thedeathofmeritinindia.wordpress.com/2011/05/17/prof-thorat-committee-report-on-caste-discrimination-in-aiims-new-delhi-2007/)
तमाम छात्रों और अध्यापकों के साथ बात करने के बाद अपनी रिपोर्ट में उन्होंने जो पाया था, वह विचलित करनेवाला था:
– 72 फीसदी अनुसचित जाति/जनजाति के छात्रों ने इस बात का उल्लेख किया था कि अध्ययन के दौरान उन्हें किसी न किसी किस्म के भेदभाव का सामना करना पड़ा था
– जाति आधारित भेदभाव की छात्रावासों के अन्दर भी मौजूदगी। होस्टल में रहनेवाले अनुसूचित तबके के 88 फीसदी छात्रों ने बताया कि कि किन विभिन्न तरीकों से वह सामाजिक अलगाव का अनुभव करते हैं।
– कमेटी ने इस बात का भी उल्लेख किया कि संस्थान के अनुसूचित तबके के अध्यापकों को भी भेदभाव से रूबरू होना पड़ता है।
वही विगत माह इसी संस्थान में एक महिला डॉक्टर द्वारा की गयी खुदकुशी की कोशिश- जिसकी वजह उसे कथित तौर पर झेलनी पड़ी यौनिक और जातिगत प्रताड़ना थी- दरअसल इसी बात की ताईद करती है कि समस्या अभी भी गहरी है और थोरात कमेटी की अहम सिफारिशों के बाद भी जमीनी हालात में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है।
हम याद कर सकते हैं कि थोरात कमेटी ने इस बात की सिफारिश की थी कि सामाजिक वातावरण की पड़ताल करने के लिए छात्रों, रेसिडेन्ट डॉक्टरों और फैकल्टी की साझा कमेटियां बनायी जाए; सामाजिक सदभाव बहाल करने के लिए नीति और प्रणाली विकसित की जाए; एक समान अवसर कार्यालय का गठन किया जाए ताकि आरक्षित श्रेणी के छात्रों से जुड़े सभी मसलों पर बात की जा सके; सांस्कृतिक गतिविधियों तथा खेलकूद में शामिल होने के लिए ऐसे छात्रों को प्रोत्साहित किया जाए; सीनियर रेसिडेन्ट और फैकल्टी के चयन के लिए आरक्षण की रोस्टर प्रणाली कायम की जाए और इस बात पर भी जोर दिया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय संस्थान के अन्दर आरक्षण के अमल पर बारीकी से देखरेख करे।
(https://thedeathofmeritinindia.wordpress.com/2011/05/17/prof-thorat-committee-report-on-caste-discrimination-in-aiims-new-delhi-2007/)
प्रस्तुत मामले में यह जानना और विचलित करनेवाला है कि इस आत्यंतिक कदम उठाने के पहले पीड़िता डॉक्टर ने अपने संस्थान के कर्णधारों को बार बार लिखा था, अपनी बात रेसिडेन्ट डॉक्टर एसोसिएशन को भी पहुंचायी थी, जिन्होंने इस सम्बन्ध में संबंधित अधिकारियों को मेमोरेन्डम भी दिया था। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो प्रशासन ने इस मुददे के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता का परिचय नहीं दिया या शायद डॉक्टर की शिकायत में जिन वरिष्ठों के नाम आक्रांताओं पर दर्ज थे, उनके खिलाफ कार्रवाई करने में उसने संकोच किया तथा मामले को रफा दफा करना चाहा।
क्या इसे प्रशासन की जाति दृष्टिहीनता कहा जा सकता है या हाशिये के छात्रों के वाजिब सरोकारों की जानबूझ कर गयी अनदेखी कहा जा सकता है? निश्चित ही एम्स के प्रशासन द्वारा जिस बेरूखी का परिचय दिया गया वह कोई अपवाद नहीं है। हम इसे उच्च शिक्षण संस्थानों में व्यापक पैमाने पर देख सकते हैं।
अभी पिछले ही साल पायल तडवी नामक अनुसूचित तबके से जुड़ी प्रतिभाशाली एवं सम्भावनाओं से भरपूर डॉक्टर ने, जो मुंबई के एक कॉलेज कम अस्पताल में पोस्टग्रेजुएशन की तालीम ले रही थी- उसने अपने वरिष्ठों के दुर्व्यवहार से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। (22 मई 2019) अगर 26 साल की वह प्रसूति रोग विशेषज्ञ जिंदा रहती तो वह भील-मुस्लिम समुदाय की पहली महिला डॉक्टर बनती।
एम्स की पीड़िता डॉक्टर की तरह पायल ने भी कॉलेज/अस्पताल के कर्ताधर्ताओं के साथ अपनी सवर्ण सहयोगियों और अपनी रूममेटस से जातीय प्रताडना की शिकायत बार बार की थी। उसने बताया था कि डॉ. हेमा आहुजा, डॉ भक्ति मेहरा और डॉ अंकिता खंडेलवाल नामक यह त्रायी डॉ. पायल को न केवल बार बार अपमानित करती थी बल्कि सर्जरी करने से भी रोकती थी। उसे निरंतर जिस प्रताड़ना का शिकार होना पड़ रहा था उसके बारे में उसने अपने माता पिता से तथा डाक्टर पति सलमान तडवी को भी जानकारी दी थी।
(https://www.sabrangindia.in/article/opinion-was-dr-payal-tadvi-victim-hate-crime, https://www.indiatoday.in/india/story/payal-tadvi-suicide-chargesheet-shows-accused-doctor-denied-her-mandatory-medical-leave-1574199-2019-07-27)
पिछले साल किसी अख़बार ने डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या के बाद प्रोफेसर थोरात का साक्षात्कार लिया था जिसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह ऐसी संस्थानों में हाशिये के छात्रों के प्रति एक किस्म का ‘दुजाभाव’ मौजूद रहता है और यह सवाल पूछा था ‘‘विगत दशक में ऐसे अग्रणी शिक्षा संस्थानों में अध्ययनरत 25-30 छात्रों ने आत्महत्या की है, मगर सरकारों ने शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की समाप्ति के लिए कोई ठोस नीति निर्णय लेने से लगातार परहेज किया है।’ (https://www.newindianexpress.com/cities/delhi/2019/may/31/there-is-bitterness-towards-quota-students-thorat-1983949.html)
शुद्धता और प्रदूषण का वह तर्क- जो जाति और उससे जुड़े बहिष्करण का आधार है, आई आई टी जैसे संस्थानों में भी बहुविध तरीकों से प्रतिबिम्बित होता है।
दो साल पहले आई आई टी मद्रास सूर्खियों में था जब वहां शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के लिए मेस में अलग अलग प्रवेश द्वार बनाये जाने का मामला सूर्खियों में था, जिसे लेकर इतना हंगामा हुआ कि संस्थान को यह निर्णय वापस लेना पड़ा। इस पूरे मसले पर टिप्पणी करते हुए अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्कल- जो संस्थान के अन्दर सक्रिय छात्रों का समूह है, ने कहा था-
दरअसल ‘आधुनिक’ समाज में जाति कुछ अलग ढंग से भेस बदल कर आती है। आई आई टी मद्रास में वह मेस में अलग प्रवेश द्वार, शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के लिए अलग अलग बर्तन, खाने पीने के अलग अलग टेबिल और हाथ धोने के अलग बेसिन के तौर पर प्रतिबिम्बित होती है।
यही वह समय था जब आई आई टी पर ही केन्द्रित एक अध्ययन सुर्खियों में आया था जिसमें आई आई टी में जाति और प्रतिभातंत्रा के आपसी रिश्ते पर रौशनी डाली गयी थी।
अपने निबंध ‘एन एनोटोमी ऑफ द कास्ट कल्चर एट आई आई टी मद्रास’ में अजंता सुब्रम्हणियम, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सोशल एन्थ्रोपोलोजी की प्रोफेसर हैं और जो आई आई टी में जाति और मेरिटोक्रेसी/प्रतिभातंत्रा की पड़ताल कर रही हैं,
(http://www.openthemagazine.com/article/open-essay/an-anatomy-of-the-caste-culture-at-iit-madras) उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि किस तरह ‘‘जाति और जातिवाद ने आई आई टी मद्रास को लम्बे समय से गढ़ा है, और जिसका आम तौर पर फायदा ऊंची जातियों ने उठाया है’। वह संकेत देती हैं कि ‘जब तक 2008 में ओबीसी आरक्षण लागू नहीं हुआ था तब तक जनरल कैटेगेरी अर्थात सामान्य श्रेणी से कहे जाने वाले 77.5 फीसदी एडमिशन में’ अधिकतर ऊंची जातियों का दबदबा रहता था। उनके मुताबिक ‘‘न केवल छात्रा बल्कि आई आई टी मद्रास की फैकल्टी में भी उंची जातियों का वर्चस्व था, जहां एक तरफ जनरल कैटेगरी से जुड़े 464 प्रोफेसर्स थे वहीं ओबीसी समुदाय से 59, अनुसूचित तबके से आनेवाले 11 तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले 2 प्रोफेसर थे।’
जनवरी 2016 में रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या इसी सिलसिले का एक और सिरा था। अकादमिक संस्थानों में गहरे में धंसे जातिगत पूर्वाग्रहों के बारे में इस मेधावी छात्र ने, जो छात्र आन्दोलन की अगुआई भी कर रहा था – महसूस किया था:
‘‘किस तरह एक व्यक्ति का मूल्य उसकी फौरी पहचान तक या नजदीकी संभावना तक न्यूनीकृत किया जाता है। एक अदद वोट तक, एक नम्बर तक, एक वस्तु तक। कभी भी मनुष्य को एक मन के तौर पर समझा नहीं गया।’’
(https://thewire.in/caste/rohith-vemula-letter-a-powerful-indictment-of-social-prejudices)
हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के उस बेहद प्रतिभाशाली छात्र ने, जो कार्ल सागान की तरह विज्ञान लेखक बनना चाहता था और जो अम्बेडकर स्टुडेंटस एसोसिएशन का हिस्सा था, उसे विश्वविद्यालय ने अगस्त 2015 में उसके अन्य पांच साथियों के साथ अन्यायपूर्ण ढंग से निलंबित किया था। वजह बनायी गयी थी कि हिन्दुत्व दक्षिणपंथ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ हुआ उनका विवाद।
रोहित की इस अनपेक्षित मौत के बाद- जिसे ‘संस्थागत हत्या’ के तौर पर सम्बोधित किया गया, का घटनाक्रम बिल्कुल अनपेक्षित था और जो अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है।
इसने राष्ट्रीय आक्रोश को जन्म दिया और एक तरह से समूचे भारत में छात्रों के अन्दर का आक्रोश सड़कों पर उतरा जिसका फोकस था इस प्रतिभा सम्पन्न युवा की ‘संस्थागत हत्या’ के मामले में न्याय दिलाना। स्त्री विरोधी यौन हिंसा के मामले में बने निर्भया अधिनियम/एक्ट की तर्ज पर उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक तौर पर वंचित/उत्पीड़ित तबकों से आने वाले छात्रों की उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए रोहित एक्ट बनाने की मांग उठी। इसका फोकस था शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव से मुक्ति दिलाने का उपकरण बनना तथा इस बात को सुनिश्चित करना कि जो कोई भी ऐसा कोई कदम उठाता है उसे अभूतपूर्व सज़ा मिले।
सवाल आज भी यह मौजूं है कि आखिर सामाजिक तौर पर वंचित एवं उत्पीड़ित तबकों से आनेवाले ऐसे कितने छात्रों को, जो शेष मुल्क के लिए एक रोल मॉडल बन सकते हैं – अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी ताकि शेष समाज इस मामले में अपनी बेरूखी और शीतनिद्रा से जागे। क्या शेष समाज का यह फर्ज़ नहीं बनता कि वह इस पूरे मामले में आत्मपरीक्षण करे और यह देखे कि वह ऐसे अपमानों/इन्कारों/मौतों में किस हद तक संलिप्त है या नहीं है। मशहूर कवयित्री मीना कंडास्वामी ने रोहित की मौत के बाद जो लिखा था वह आज भी मौजूं है: ‘एक दलित छात्रा की आत्महत्या कोई निजी पलायन की रणनीति नहीं होती, दरअसल वह उस समाज के शर्म में डूबने की घड़ी होती है, जिसने उसे समर्थन नहीं दिया।’
(https://kafila.online/2016/01/29/condemning-caste-discrimination-in-higher-education-centres-that-led-to-rohiths-untimely-death-students-of-delhi-school-of-economics-delhi-university/)
यह जानना और अधिक विचलित करने वाला हो सकता है कि वक्त़ के साथ जाति उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव की ऐसी घटनाओं में हम कोई कमी नहीं पा रहे हैं, बल्कि उनका सामान्यीकरण हो चला है। राज्य के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका और यहां तक कि न्यायपालिका भी – इस मामले में असफल होते दिखते हैं।
जातिगत भेदभावों, उत्पीड़नों के इस विकसित गतिविज्ञान का एक अहम पहलू यह है कि मुल्क में जबसे हिन्दुत्व वर्चस्ववादी विचारों/ जमातों का प्रभुत्व बढ़ा है, हम ऐसी घटनाओं में भी एक उछाल देखते हैं। यह कोई संयोग की बात नहीं है कि केन्द्र में तथा कई सूबों में भाजपा के उभार के साथ हम यही पा रहे हैं कि किस तरह वे ‘सुनियोजित तरीकों से दलितों के मामलों में सकारात्मक कार्रवाइयों /एफर्मेटिव एक्शन और उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के अस्तित्वमान प्रावधानों को कमजोर करने में मुब्तिला हैं। दलितों-आदिवासियों पर अत्याचारों को रोकने के लिए बने 1989 के अभूतपूर्व कानून के प्रावधानों को कमजोर करने के लिए मोदी हुकूमत और उससे सम्बद्ध अफसरानों ने समझौतापरस्ती का परिचय दिया है। याद रहे कि 2018 में जब इसके प्रावधानों का मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया तब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने बाकायदा अदालत में बयान दिया कि इस कानून का दुरूपयोग हो रहा है। इतना ही नहीं जब द्विसदस्यीय सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने इसकी धाराओं को कमजोर करने का निर्णय सुनाया, तब मोदी सरकार ने अदालत के इस कदम को चुनौती देने वाली समीक्षा याचिका तक दाखिल नहीं की थी।
(https://kafila.online/2018/05/28/statement-on-atrocities-on-dalits-new-socialist-initiative/)
हम लोग इस बात के भी गवाह रह चुके हैं कि किस तरह भाजपा सरकार ने ‘‘विश्वविद्यालयों में दलितों की नियुक्ति को बढ़ावा देने वाले कानूनी प्रावधानों को कमजोर किया।’ /-वही-/ दरअसल, मोदी सरकार के पहले चरण में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यह आदेश पारित किए कि शिक्षा संस्थानों में आरक्षण रोस्टर का आधार विश्वविद्यालय नहीं बल्कि विभाग होगा। इसका नतीजा यह सामने आया था कि मध्यप्रदेश के इंदिरा गांधी नेशनल ट्राईबल यूनिवर्सिटी ने जब 52 फैकल्टी पदों के लिए विज्ञापन जारी किया तब इसमें महज एक पद आदिवासियों के लिए आरक्षित रखा गया था।
इस बात में कोई आश्चर्य जान नहीं पड़ता कि एफर्मेटिव एक्शन के प्रावधानों पर जारी इस संगठित हमलों की परिणति ऐसे अग्रणी संस्थानों में हाशिये के तबकों से आनेवाले छात्रों की संख्या की गिरावट में भी देखी जा रही है।
देश के अग्रणी विश्वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कहानी इसे बखूबी बयान करती है। याद रहे कि इस विश्वविद्यालय ने एक ऐसी अनोखी आरक्षण प्रणाली लगभग दो दशक पहले कायम की थी जिसके चलते न केवल पिछड़े जिलों बल्कि समाज के कमजोर तबकों, सामाजिक एवं धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले छात्रों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी देखी गयी थी। आप माने या न मानें इसने विश्वविद्यालय के स्वरूप को गुणात्मक तौर पर परिवर्तित कर दिया था।
‘‘अगर हम 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट को पलटें तो पाते हैं कि कुल 7,677 छात्रों में से दलित बहुजन तबकों से आनेवाले छात्रों की तादाद 3,648 थी। अनुसूचित जाति के 1,058 छात्र, अनुसूचित जनजाति के 632 छात्र और अन्य पिछड़ी जाति से आने वाले 1948 छात्र थे। अगर सीधी सरल जुबां में कहें तो गैरउच्चजाति से आनेवाले छात्रों की तादाद स्थूल रूप में 50 फीसदी थी। अगर हम अन्य वंचित समूहों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को शामिल करें तो ऊंची जाति तथा तबके से आने वाले छात्र यहां अल्पमत में हैं’
और यह भी जाहिर है कि विश्वविद्यालय द्वारा हाल में जो बदलाव लाए जा रहे हैं और जिसके तहत उसकी अनोखी आरक्षण प्रणाली पर भी पुनर्विचार शुरू हो चुका है, हम अंदाज़ा ही लगा सकते हैं कि इसका विश्वविद्यालय परिसर की सामाजिक संरचना पर बेहद विपरीत नकारात्मक प्रभाव पड़नेवाला है।
कोरोना के बहाने भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों में जो मजदूर विरोधी बदलाव किये हैं, उन्हें श्रम सुधार का नाम दिया जा रहा है. सच्चाई यह है कि किसी भी तरह से ये बदलाव श्रम सुधार नहीं बल्कि मोदी सरकार की सरपरस्ती में यह मजदूरों को बंधुआ बना देने का घिनौना षड़यंत्र है. पूरी दुनिया में साल 2019 के अंत में पैदा हुए कोरोना वायरस ने कोहराम मचा रखा है. पुष्ट आंकड़ों के अनुसार लगभग साढ़े तैंतालीस लाख (4342565) लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं. मानवता के दुश्मन इस वायरस ने अबतक लगभग तीन लाख लोगों की जान ले ली है. अकेले भारत में ही आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 80 हजार से ज्यादा संक्रमित मरीज हैं और मरने वालों की संख्या चार हजार से ऊपर पहुँच गयी है. ये कोई अंतिम आंकड़ा नहीं है बल्कि प्रतिदिन यह ग्राफ उपर की तरफ बढ़ रहा है. दुनिया भर में विभिन्न सरकारों ने कोरोना से जंग को अपनी पहली प्राथमिकता पर रखा है.
एक तरफ दुनिया कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए हरसम्भव प्रयास कर रही है, वहीं भारत में केंद्र और कुछ राज्य सरकारें इस मुश्किल समय का लाभ षड्यंत्रकारी गुप्त एजेंडों को लागू करने के लिए उठा रही हैं. प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में खुलकर यह स्वीकारा है कि “हम आपदा को अवसर में बदल रहे हैं.” दलील यह दी जा रही है कि कोरोना संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन से होने वाले कारोबारी और औद्योगिक घाटों को पूरा करने के लिए यह श्रम सुधार किया जा रहा है. जिस समय भारत का मजदूर सड़कों पर भूखे-प्यासे तकलीफों की इन्तहां झेलकर अपनी मिट्टी की तरफ पलायन कर रहा है, उसी समय सरकार ने उनकी पीठ पर श्रम कानूनों को निरस्त करके छूरा घोंपा है. सदियों की लड़ाई के बाद इन मजदूरों के पुरखों ने जो श्रमिक अधिकार हासिल किये थे, उनको अध्यादेश लाकर एक झटके में खत्म कर देने का कुकर्म इस देश में किया गया है. इन श्रमिक अधिकारों को हासिल करने के लिए ना जानें कितने खून बहे और न जानें कितनीं जानें गयीं हैं.
इस तथाकथित श्रम सुधार में मजदूरों के उन अधिकारों को निरस्त किया गया है जिनकी बदौलत वे अपने साथ हुए अन्याय को श्रम अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक चुनौती दे सकता था. इन कानूनों में समान वेतन, न्यूनतम वेतन, ट्रेड यूनियन बनाने का हक़, औद्योगिक नियोजन एवं विवाद, काम के घंटे, अवकाश, मध्यान्ह अवकाश, श्रमिक सुरक्षा, कैंटीन सुविधा, ठेका मजदूर के अधिकार, अन्तर्राज्यीय प्रवासी मजदूरों के अधिकार, कर्मचारी भविष्य निधि कमचारी राज्य बीमा, बोनस, असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े अधिकार शामिल हैं. विडम्बना यह है कि जिन कानूनों का कोरोना से कोई सरोकार नहीं है उसे भी लॉकडाउन के नाम पर अप्रभावी बना दिया गया है. 1976 में लागू हुए “समान वेतन अधिनियम” में यह प्रावधान था कि एक ही काम के लिए श्रमिकों को अलग-अलग वेतन नहीं दिया जा सकेगा. इस कानून की वजह से पूंजीपति या फैक्ट्री मालिक समान काम के लिए मजदूरों को अलग-अलग वेतन पर नियुक्त नहीं कर सकता था. मतलब स्त्री हो या पुरुष, कम मजबूर हो या अधिक सबको समान काम के लिए समान वेतन मिलेगा. कोरोना के बहाने उत्तर प्रदेश में इस कानून को भी तीन सालों के लिए निरस्त कर दिया गया है, जो कतई तर्कसंगत फैसला नहीं है.
श्रम कानूनों की धार को कुंद करने में भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के साथ-साथ कांग्रेस द्वारा शासित राज्य राजस्थान भी शामिल है. कर्नाटक में तो बिल्डरों और ठेकेदारों के साथ बैठक करने के बाद मुख्यमंत्री ने वहाँ से चलने वाले श्रमिक स्पेशल ट्रेनों पर ही रोक लगवा दिया ताकि प्रवासी मजदूर अपने गाँव वापस न जा सकें. इन सभी राज्यों में काम के घंटे को 8 से बढ़ाकर 12 कर दिया गया है. इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि इससे उद्योग जगत के रुके हुए पहिये को गति मिलेगी. सवाल यह है कि आखिर यह कौन सा विकास का इंजन है जो मजदूरों के खून से चलता है? उत्तर प्रदेश में अध्यादेश से पहले 38 श्रम कानून लागू थे. इनमें से कुछ कानूनों को छोड़कर जिनमें 1976 का बंधुआ मजदूर अधिनियम, 1923 का कर्मचारी मुआवजा अधिनियम और 1966 का अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम शामिल है, 35 कानूनों को हजार दिनों के लिए निरस्त कर दिया गया है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी बयान में यह कहा गया है कि “महिलाओं और बच्चों से संबंधित कानूनों के प्रावधान जैसे कि मातृत्व अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम और मजदूरी भुगतान अधिनियम के धारा 5 को बरकरार रखा है, जिसके तहत प्रति माह 15,000 रुपये से कम आय वाले व्यक्ति के वेतन में कटौती नहीं की जा सकती है.” इस अध्यादेश के बाद कई अहम श्रमिक कानून अब निष्प्रभावी हो गए हैं, इनमें मिनिममवेज (न्यूनतम मजदूरी) एक्ट काफी अहम है जिसके मुताबिक एक तय न्यूनतम राशि मजदूरों को देना अनिवार्य था. सभी उद्योग इसी के तहत ही श्रमिक व मजदूरों का भुगतान करते थे लेकिन अब सब अपनी सुविधानुसार करेंगे.
जब बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने काम के घंटे को घटा कर 12 से 8 किया था तब मजदूरों के वेतन को नहीं घटाने की सिफारिश की थी लेकिन मोदीकाल में जिस तथाकथित श्रम सुधार में काम के घंटे को वापस बढ़ाकर 8 से 12 किया जा रहा है, इस समय वेतन को बढ़ाने की कोई बात नहीं की जा रही है. इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि यह मजदूरों की सरकार न होकर मालिकों की सरकार है. काम के घंटे को बढ़ाना एक अमानवीय फैसला है. 1886 में जब शिकागो में काम के घंटे को लेकर आन्दोलन हुआ था तब श्रमिकों ने “8 घंटा काम, 8 घंटा आराम और 8 घंटा मनोरंजन” के नारे के साथ अपनी जान की बाजी लगाकर इस अधिकार को प्राप्त किया था. मोदीराज में काम के घंटे को बढ़ाकर 12 किये जाने से शिकागो के शहीदों का अपमान हुआ है.
कोरोना तो एक बहाना है, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही श्रम कानूनों पर हमला तेज कर दिया गया था. 44 केन्द्रीय श्रम कानूनों को विलय करके 4 श्रम संहिताओं में बदलने की पहल मोदी सरकार ने पहले ही शुरू कर दी थी. लगातार यह कुत्सित प्रयास जारी है कि कैसे ट्रेड यूनियनों की दखल को कम किया जाए और मजदूरों के शोषण का खुला खेल शुरू हो. इसके लिए कोरोनाकाल से पहले ही मोदी सरकार ने लम्बे संघर्ष और शहादत के बल पर हासिल किये गए श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव शुरू कर दिया था. जानकार बताते हैं कि 2014 में सरकार बनाने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व भ्रमण पर निकल पड़े लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कोई विशेष पूंजीनिवेश भारत में लेकर नहीं आ सके.
आत्मनिर्भरता का नया नारा देने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार ने कोरोना से पहले बहुत तेजी से लाभ कमाने वाली सरकारी कम्पनियों को निजी हाथों में बेचने का काम शुरू कर दिया था. अब जैसा कि प्रधानमंत्री अपने राष्ट्र के नाम सन्देश में बोल चुके हैं कि आपदा को अवसर में बदलना है, तो कोरोना के बहाने मजदूरों के शोषण के नये युग का आगाज होते हम देख रहे हैं. पूरी दुनिया की कम्पनियां जो एशिया में चीन को अपना व्यापारिक केंद्र मानतीं थीं, अब कोरोना के बाद बहुत तेजी से अपना कारोबार चीन से समेट रहीं हैं. सम्भवतः केंद्र सरकार इस उम्मीद में बैठी हो कि श्रम कानूनों में ढील देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत की तरफ आकर्षित किया जा सकेगा.
बहरहाल, श्रम कानूनों में किये गये मजदूर विरोधी बदलावों से श्रमिकों के शोषण के एक नये युग का आग़ाज हो गया है, जिसमें मजदूरों के खून से देश के विकास का इंजन चलाने की तैयारी की गयी है. ये बदलाव देश के कामगारों को बंधुआ मजदूरी करने के लिए बाध्य कर देंगें. इतिहास के पन्नों पर काली स्याही से यह बात दर्ज की जायेगी कि भारत में संघर्षों और शहादतों की कीमत पर मजदूरों ने जो अधिकार हासिल किये थे, मोदीकाल में वे अधिकार कोरोना के बहाने श्रम सुधार के नाम पर निरस्त कर दिए गये और मजदूरों को गुलामी की राह पर धकेल दिया गया.
लेखक सुशील कुमार स्वतंत्र भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिल्ली राज्य परिषद के सदस्य और ट्रेड यूनियन नेता हैं।
अमेरिका में सक्रिय संगठन अम्बेडकर एसोसिएशन ऑफ नार्थ अमेरिका यानी AANA ने साल 2020 के लिए अपने अवार्ड की घोषणा कर दी है. इस साल चार अवार्ड की घोषणा की है. इसमें आईपीएस अधिकारी और तेलंगाना सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सेक्रेट्री डॉ. आर.एस. प्रवीण को इस साल का डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल अवार्ड दिया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ता और पेशे से वकील मंजुला प्रदीप को सावित्रीबाई फुले इंटरनेशनल अवार्ड के लिए चुना गया है. जबकि डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड वरिष्ठ पत्रकार और भीम पत्रिका के संपादक एल.आर. बाली को दिया गया है. AANA ने मूकनायक के शताब्दी वर्ष पर “Mooknayak” Excellency in Journalism Award शुरु किया है. इस कैटेगरी का पहला अवार्ड “दलित दस्तक” को दिया गया है.
डॉ. आर.एस. प्रवीण का चुनाव तेलंगाना सोशल वेलफेयर एजुकेशनल सोसाइटी के जरिए वंचित समाज के बच्चों की शिक्षा के लिए किए गए महत्वपूर्ण काम के लिए किया गया है. डॉ. प्रवीण स्वैरो नेटवर्क के फाउंडर भी हैं. जहां तक मंजुला प्रदीप की बात है तो वो एक मानवाधिकार कार्यककर्ता हैं और उन्होंने कास्ट एंड जेंडर डिसक्रिमिनेशन यानी जाति और लिंग के आधार पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ न सिर्फ अपनी आवाज बुलंद की है, बल्कि लड़ाई भी लड़ी है. वह नवसृजन ट्रस्ट की पूर्व एक्जीक्यूटीव डायरेक्टर रह चुकी हैं. यह ट्रस्ट दलित अधिकारों के लिए काम करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था है. तो वहीं एल.आर. बाली द्वारा जीवन भर बाबासाहेब के सिद्धांत पर चलते हुए सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने के कारण लाइफ टाइम अचिवमेंट अवार्ड के लिए चुना गया है.
जबकि पत्रकारिता के क्षेत्र में मूकनायक एक्सिलेंसी इन जर्नलिस्म अवार्ड दलित दस्तक को मिला. AANA के मुताबिक “दलित दस्तक” को यह अवार्ड प्रिंट और डिजिटल मीडिया के जरिए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के विजन पर चलते हुए समाज के आखिरी छोड़ पर खड़े लोगों को जागरूक करने और उनकी आवाज को उठाने के लिए दिया गया है. दलित दस्तक एक मासिक पत्रिका, यू-ट्यूब चैनल और वेबसाइट है. दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने इस सम्मान के लिए AANA को धन्यवाद दिया है. उन्होंने कहा कि यह दलित दस्तक के सभी पाठकों और दर्शकों का सम्मान है. उन्होंने अपनी टीम को भी धन्यवाद दिया. खास बात यह है कि इस अवार्ड के लिए सभी का चयन वोटिंग के जरिए हुआ है.
जहां तक ‘दलित दस्तक’ को यह सम्मान मिलने की बात है तो यह अम्बेडकरवादी सिद्धांतों पर चलने वाली मीडिया संस्था के लिए एक बड़ा सम्मान है. क्योंकि खौस तौर से हिन्दी जानने-समझने वाले अम्बेडकरवादियों के बीच दलित दस्तक ने अपना एक मुकाम बनाया है. खबरों की बाढ़ में और सनसनी के वक्त में दलित दस्तक ने अपनी सधी हुई पत्रकारिता के जरिए अपने पाठकों का भरोसा जीता है. अपने पाठकों का यही भरोसा दलित दस्तक की सबसे बड़ी पूंजी है. यह सम्मान मैं दलित दस्तक के सभी पाठकों, दर्शकों और अपनी पूरी टीम को समर्पित करता हूं.
देश के बहुसंख्य आमजन-मेहनतकशों के लिए ऐसी सरकार, ऐसे राज्य के बने रहने का तर्क (Raison d’être) खत्म हो गया है। कोरोना की आपदा तो वैश्विक है, लेकिन इससे जिस तरह हमारे देश में निपटा जा रहा है, उसने मजदूरों की जिस दिल दहला देने वाली अकल्पनीय यातना को जन्म दिया है, उसका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है। आने वाले कल कोई संवेदनशील इतिहासकार/पत्रकार/साहित्यकार जब इन दुःख की इन महागाथाओं, शासकों की अनन्त क्रूरता और मजदूरों की अदम्य जिजीविषा को लिपिबद्ध करेगा तो वह विश्व इतिहास का मानव पीड़ा का सबसे महाकाव्य बन जायेगा। आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी के हम साक्षी है।
आज बस सभी सम्भव तरीकों से मरने के लिए उन्हें छोड़ दिया गया है- भूख से, बीमारी से, घर की अनंत यात्रा के बीच रास्ते में बेदम होकर दम तोड़ते, भूखे पेट जेल जाते पुलिस की मार खाते, ट्रेन से कटकर, हाइवे पर कुचलकर, पुलिस की मार से नदी में कूदकर, आत्महत्या कर… और अंत में कोरोना से भी सबसे ज्यादा वही मरेंगे क्योंकि उनके पास अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता देने वाला भोजन व ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ मेंटेन कर सकने लायक घर में रहने की न सुविधा है, न प्राइवेट इलाज के खर्च लायक औकात, न प्राथमिकता में अच्छा सरकारी इलाज-आईसीयू, वेंटिलेटर पाने की हैसियत।
आज जब 50 दिनों से अधभूखे-प्यासे, जीवन की भयानक असुरक्षा, अपनों की चिंता में डूबे मजदूर, अपने गाँव लौटना चाह रहे हैं, तो उन्हें सभी सम्भव तरीकों से रोकने की, हतोत्साहित करने की साजिश की जा रही है, ताकि मुनाफाखोरी का पहिया चलता रहे। आज वे चीख चीख कर कह रहे हैं कि अगर उन्हें अपने काम की जगह पर भर पेट भोजन मिलता रहता तो वे इतनी अपार तकलीफें झेलते हुए ‘रोटी की जगह पुलिस के लट्ठ खाते हुए’, दुधमुंहे बच्चों, गर्भवती पत्नियों के साथ हजारों किमी की जानलेवा असुरक्षित यात्रा पर कत्तई न निकलते, जब वे गुहार लगा रहे कि, ‘हमें सरकार से कुछ नहीं चाहिए, न रोटी, न पैसा, बस हमें घर/गाँव जाने दिया जाय’, जब वे चरम हताशा में चीत्कार कर रहे हैं कि या तो’ हमें गाँव जाने दो या गोली मार दो’। अपनी सारी दौलत के सृजनहार जिन मजदूरों को उनके मालिक और सरकार भरपेट भोजन न दे सकी और उन्हें गांवों की ओर भागने के लिए मजबूर कर दी, उन्हें महान दार्शनिक प्रधानमंत्री जी दर्शन समझा रहे हैं कि यह मानव स्वभाव है कि वह अपने गाँव जाना चाहता है।
उनके इस मौलिक रहस्योद्घाटन की तुलना उनके ही दूसरे ऐसे ही सुभाषित से की जा सकती है जब उन्होंने बताया था की सीवर साफ करने वाले मजदूर को उसमें आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है। आज ऐसा लग रहा है, जैसा मजदूरों के लिए राज्य अस्तित्वहीन हो चुका है और अपने ही राष्ट्र में वे बेगाने हो गए हैं, ‘उदार’ भारतीय राज्य में श्रमिकों की रक्षा के लिए बने सारे संवैधानिक प्रावधान, नियम-कानून, सारी संवैधानिक संस्थाएं मजदूरों के लिए अर्थहीन हो गयी हैं। आज जब अप्रत्याशित, अकल्पनीय विपत्ति का पहाड़ उनके ऊपर टूट पड़ा है, तब, कोई उनको नहीं बचा पाया, न राष्ट्रवाद, न लोकतंत्र, न संविधान।
बेहयाई और क्रूरता की हद तो यह है कि एक ऐसे समय में जब उन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत है, उनसे उनकी सेवा- सुरक्षा के न्यूनतम संवैधानिक, कानूनी सुरक्षा कवच को भी छीना जा रहा है।
यह संविधान की धारा 21 के तहत उन्हें प्राप्त गरिमामय जीवन के अधिकार का भी निषेध है, जिसे देश के संविधान के अनुसार आपातकाल में भी नहीं छीना जा सकता। डॉo आंबेडकर ने कभी कहा था कि लागू करने वाले बुरे हों तो अच्छा संविधान भी बुरे नतीजे देगा।
पर हमारा गणतंत्र इतना अशक्त क्यों निकला, इसकी संस्थाएं इतनी लिजलिजी क्यों हैं, जो अपने सबसे कमजोर नागरिकों को उनके सबसे बुरे वक्त में जीवन की न्यूनतम सुरक्षा भी न दे पायीं, यह system इतना अमानवीय क्यों है? खूबसूरत जुमलों की आड़ में छिपाई गयी भारतीय राज्य की क्रूर वर्गीय सच्चाई सात पर्दों को फाड़कर सामने आ चुकी है, हमारे शासक आभिजात्य की श्रमिको के प्रति सदियों की संचित घृणा और पूंजी की मुनाफाखोरी की कभी न मिटने वाली हवस का क्रूर कॉकटेल है यह। कल तक जिन्हें गलतफहमी थी कि यह महज मुसलमानों के खिलाफ है, आज वे आंख खोल कर देख लें कि आज इसके निशाने पर कौन है। कल सबका नम्बर आएगा।
आज इस देश के मेहनतकशों को चाहिए एक नया गणतंत्र। इस औपचारिक गणतंत्र को वास्तविक गणतंत्र बनाने की लड़ाई ही आज का एजेंडा है- इस एजेंडा में सबसे ऊपर होगी मेहनतकशों की गरिमा, उनकी आजीविका और स्वास्थ्य की सुरक्षा !!
मनुवादी मानसिकता से सभी लोग परिचित हैं। मनुवादी आए दिन दलितों-पिछड़ों को प्रताड़ित करते हैं। ऐसे में हमारे लोग प्रताड़ित किए जाते हैं। ऐसे में समाज सिर्फ मनुवादी व्यवस्था द्वारा किए गए कार्य के प्रति प्रतिक्रिया देने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। लेकिन हमें यह बात समझनी होगी कि समाज प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं है। समाज का निर्माण समाज के अनुपात में नहीं किया गया है। उसके कुछ मूलभूत कारण हैं, जिन्हें जानना जरूरी है। आज हमारे पास बहुत सारे संगठन हैं और सारे संगठनों का उद्देश्य सामान्यतः व्यवस्था परिवर्तन है. व्यवस्था परिवर्तन कैसे होता है, व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा, इसके लिए कौन सी गतिविधियों को चलाना पड़ेगा, कैसे रणनीति बनानी पड़ेगी, इसको विस्तार से समझने की जरुरत है.
मुझे लगता है आज तक सिर्फ मान्यवर कांशीराम को छोड़कर कोई भी रणनीति बनाने में सक्षम नहीं हो पाया है, क्योंकि रणनीति जब तक सही नहीं होगी उसका क्रियान्वयन एवं उसके परिणाम उसके अनुरूप नहीं होंगे। इसीलिए हमको सबसे पहले हमारे समाज में जो भी संगठन चल रहे हैं और चूंकि क्योंकि समाज उन्हें खाद पानी दे रहा है इसलिए उन्हें उनके दायित्व के बारे में समझाना होगा, उनकी रणनीति के बारे में उनसे खुलकर बहस करनी होगी। इस पर मंथन करना होगा कि समाज के लिए ऐसी कौन सी रणनीति बनानी चाहिए जिससे इस देश में समता, स्वतंत्रता, बंधुता स्थापित हो सके।
यह एक गंभीर विषय है। समता क्या होती है, उसके क्या मायने हैं, स्वतंत्रता क्या होती है, उसको कैसे समझना चाहिए, और बंधुत्व क्या होती है, ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जिन्हें समाज को समझने की जरूरत है। हमारा समाज असंगठित समाज है जिसका मुकाबला संगठित समाज से है। असंगठित और संगठित समाज के बीच में यह महत्वपूर्ण अंतर है कि असंगठित समाज में लोग अपने अधिकारों को नहीं जानते, जबकि संगठित समाज अपने अधिकारों को लेने के लिए संगठित है। ज्यादातर लोग प्रायः संगठित और असंगठित के बीच का अंतर नहीं समझ पाते, इसीलिए हमें रणनीति बनानी होगी
मनुवादी व्यवस्था जिन आधारों पर टिकी है, उन आधारों को समाज में से हटाना पड़ेगा, तभी इसे ध्वस्त करना संभव है। इसके लिए एक वृहद कार्यक्रम की जरूरत है। आज समाज में बहुत सारे संगठन एवं चमचे टाइप के नेता पैदा हो रहे हैं, जिनका उद्देश्य सिर्फ अपना भरण-पोषण और ख्याति प्राप्त करना है। ऐसे में अगर समाज को इस दलदल से निकालना है तो प्रबुद्ध लोगों को संकल्प के साथ एक साथ आना होगा, रणनीति बनानी होंगी। अभी समाज जब कोई प्रतिक्रिया देता है, कई संगठन अलग-अलग रूप से उसका विरोध करते हैं, जिससे हमारी खिल्ली उड़ कर रह जाती है। समाज को सही दिशा देने का कार्य समाज के उन प्रबुद्ध लोगों का है जो समाज के हित में चिंतन मनन करते हैं और जो समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।
मान्यवर कांशीराम जी के बाद Transactional Leadership भी सही से कार्यरत नहीं है। इसीलिए आज फिर से Transformational Leadership की जरुरत है, जिसे विकिसत करना होगा। हमें बहुत चिंतन मनन से कार्य करने की आवश्यकता है। अलग-अलग रूप से प्रबल प्रबुद्ध लोग कार्य करते हैं तो यह साफ़ झलकता है कि वह इगो स्टेटस में फंसे हुए हैं, जबकि ट्रांसफॉरमेशनल लीडरशिप के लिए Self Reliant Status (स्वयं पर विश्वास) की आवश्यकता है।
Self reliant अवस्था के लिए self enhancement (आत्म वृद्धि), Self verification (स्वयं सत्यापन), Self evaluation (स्वयं का मूल्यांकन) की जरूरत है, जिसके परिणाम स्वरुप Self esteem (आत्म सम्मान), Self efficiency (खुद की क्षमता), Emotional stability (भावनात्मक स्थिरता), lead by example (मिसाल पेश करना), perseverance (दृढ़ता), due diligent (सही मूल्यांकन) जैसे गुण स्थापित होते हैं।
जब इस तरह से प्रबुद्ध लोग तैयार होंगे तभी मिलकर संघ का निर्माण कर सकेंगे। मानव जीवन में व्यक्तिगत रूप से किसी में कोई बड़ी शक्ति नहीं होती, शक्ति को सिर्फ समूह द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। संघ निर्माण की प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है।
आज मनुवादी व्यवस्था तेजी से कार्य कर रहे हैं और बहुजन सिर्फ तमाशाबीन बन कर देख रहे हैं। हमारा विरोध भी बहुत निम्न दर्जे का होता है, इसे आसानी से भूलाया जा सकता है। लाखों की संख्या में जो मजदूर लोग सड़कों पर अपने घर जा रहे हैं वे कोई और नहीं बल्कि उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा एससी एसटी ओबीसी समाज के ही हैं। 99 फीसदी जो लोग आज व्यवस्था से प्रताड़ित है, वह इन्ही वर्गों से आते हैं। मनुवादी रामराज्य की बात करते हैं और हमें यह याद रखना चाहिए कि शूद्रों के मौलिक अधिकार राम राज्य में वर्जित थे। इतिहास में वर्णित है कि शूद्र ऋषि शंबूक के तपस्या करने के कारण राम द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी।
बड़ी विडंबना है कि वह द्रोणाचार्य अवॉर्ड देते हैं, जबकि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा इसलिए ले लिया था कि वह एक निम्न जाति था इसलिए वह धनुर्धर नहीं बन सकता था। सत्ताधारी इतनी विषमता वाली चीजों को समाज में स्थापित कर रहे हैं और हम उनके इस निर्णय को रोकने में सक्षम नहीं है। अगर उन्हें रोकना है तो हमें एक रणनीति पर कार्य करना होगा क्योंकि हम संवैधानिक व्यवस्थाओं पर चलने वाले लोग हैं, इसीलिए हमारी रणनीति भी संवैधानिक व्यवस्थाओं के दायरे में रहकर ही मनुवादी व्यवस्था को परास्त करना होगा।
आज जिस कार्य की जरूरत है, जिस रणनीति की जरूरत है, उसे क्रियान्वित करना होगा। मसलन, हमें आज egalitarian (समानाधिकारवादी) संकल्पना को समझना होगा। पैतृक कर की व्यवस्था के लिए बहुजन समाज को आवाज बुलंद करना ही होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे एससी एसटी ओबीसी समाज को एक साथ लाया जा सकता है। सवर्ण समाज को पैतृक कर से सबसे ज्यादा मार पड़ेगी।
समाज की व्यवस्था सामाजिक ढांचे एवं योजनाओं द्वारा ही निर्धारित होती हैं। इस मनुवादी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए बहुजनों को design thinking पर कार्य करने की आवश्यकता है। आज की डिज़ाइन व्यवस्था सवर्ण के हित में है। इसे बदलने से ही सर्वजन का हित साधा जा सकता है। मनुवादी लगातार कार्यरत हैं और हम सोच रहे हैं कि हमें क्या करना होगा और उसी विरोधाभास में उलझ जाते हैं। देशव्यापी कार्यक्रम जिसे पुरे देश में साझा किया जा सके ऐसे कार्यक्रम से ही बहुजन एकता बनना संभव है।
लोग धन संचय में लगे हैं। भ्रष्टाचार की जड़े देश में इसीलिए मजबूत है क्योंकि लोग एक पीढ़ी के लिए नहीं सोचते बल्कि सात पीढ़ियों को सुरीक्षित करना चाहते हैं। अगर इन व्यवस्थाओं को नहीं बदला गया तो अंबानी, अडानी का बेटा हमेशा आगे रहेगा। अमेरिका में 50%, जापान में 70%, यूरोप में 40-50% पैतृक सम्पति कर की व्यवस्था है। भारत में यह नहीं लगाया जाता जिससे लोग खुलेआम धन संचय में लगे हैं। मेरे अनुसार इन गतिविधियों को देश में चलाने की जरूरत है।
मध्यप्रदेश शिवपुरी में एक दलित युवक को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि उसने गाँव में बाबासाहेब की प्रतिमा लगवाई और बुद्ध पूर्णिमा मनाई। बुद्ध पूर्णिमा 7 मई को थी। युवक का नाम गजराज जाटव है। जातिवादियों ने पहले युवक का अपहरण किया, फिर कुछ समय बाद जान से मार दिया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस मामले की लीपापोती में लगी है। सूचना है कि भाई गजराज जाटव के पांच बच्चे हैं। सभी लड़कियां हैं। सबसे बड़ी बच्ची की उम्र 10 साल की है। गजराज जाटव एक उत्साही अम्बेडकरवादी युवक था, जो बाबासाहब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध में विश्वास रखता था। घटना पर तमाम अम्बेडकरवादी पहुंच गए हैं। मौजूद अम्बेडकरवादी पुलिस से आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग कर रही है।
इसको दूसरे तरीके से देखेंगे तो शिवपुरी में सिर्फ जगराज जाटव की हत्या नहीं हुई, बल्कि बाबासाहब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध में आस्था रखने वाले हर किसी के सम्मान को रौंदा गया। और ऐसा आए दिन होता है। देश के हर हिस्से में बाबासाहब की मूर्तियां तोड़ी जाती हैं। गाड़ियों पर ‘जय भीम’ लिखवाने को लेकर अम्बेडकरी समाज के युवाओं के साथ मार-पीट होती है। और कई मामलों में उनकी हत्या भी हो जाती है। गजराज जाटव की हत्या भी ऐसा ही है।
सोचने वाली बात यह है कि किसी जीते-जागते व्यक्ति में इतना ज्यादा जातिवाद कैसे भर जाता है कि वो किसी की हत्या ही कर दे। संभव है कि यह जातीय खुन्नस है और अम्बेडकरवादी युवा गजराज जाटव पहले से ही जातिवादियों के निशाने पर होंगे। मुझे नहीं पता कि सवर्ण जातिवादी इतनी नफरत कहां से लाते हैं? किस धार्मिक उन्माद में वो किसी को अपनी आस्था मानने पर हत्या कर देते हैं। मैं इस घटना पर सवर्ण जातिवादियों को कुछ नहीं कहूंगा, क्योंकि वो शायद वही कर रहे हैं, जो उनके बाप-दादाओं ने उन्हें सिखाया है। लेकिन यहां सवाल यह है कि हम क्या करते हैं?
देश के हर हिस्से में होने वाली इन घटनाओं पर हम पीड़ित परिवार के साथ कितना खड़ा होते हैं। हर शहर में अम्बेडकरवादी संगठन है, वकील हैं, दो-चार अधिकारी हैं। इस नाते हमारी जिम्मेदारी है कि पीड़ित व्यक्ति के साथ खड़े हों। अगर पीड़ित की मृत्यु हो जाती है तब तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऐसी घटनाओं में स्थानीय वकीलों को पीड़ित व्यक्ति और उसके परिवार के साथ खड़ा होना चाहिए। पीड़ित को न्याय दिलवाना चाहिए। अम्बेडकरवादी संगठनों को पीड़ित व्यक्ति की आर्थिक मदद करनी चाहिए। अगर हम एकजुट होकर पीड़ित की मदद करने को तैयार रहेंगे तभी अम्बेडकरवाद आगे बढ़ेगा। क्योंकि जिस व्यक्ति के साथ मार-पीट होती है या फिर उसकी हत्या कर दी जाती है, उसका कसूर बस इतना भर होता है कि वह दलित समाज का व्यक्ति है। उसका कसूर बस इतना होता है कि वह अम्बेडकरवाद का झंडा थामे है और बाबासाहब डॉ. आंबेडकर की विचारधारा को बढ़ाने में लगा है। ऐसे हर व्यक्ति के प्रति पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होती है, हम सबको यह जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
क्या गजराज जाटव के परिवार के साथ खड़े होने की जिम्मेदारी अम्बेडकरी समाज की नहीं है। क्या समाज को गजराज जाटव के परिवार की आर्थिक मदद नहीं करनी चाहिए, और पूरे समाज को मिलकर हत्यारों को सजा नहीं दिलवानी चाहिए, जिससे गजराज जाटव का बलिदान व्यर्थ न जाए।
– –
मसीह एक ईसाई था और मोहम्मद एक मोहम्मद था। यह अनुयायी थे जिन्होंने उन्हें बौद्ध, ईसाई और मोहम्मडन बनाया। ज्यादातर मामलों में यह राजनेता और योद्धा थे जिन्होंने धर्म की भावना को मार दिया और अपने उद्देश्य के लिए खोल की पूजा करने लगे। उसने अपने फायदे के लिए धर्म का शोषण किया। धर्म धीरे-धीरे राजनेता और योद्धा की हाथ की नौकरानी बन गया। यह अज्ञानी है जो धर्म और राजनीतिक पंथ की रक्षा में सबसे कट्टर सेनानी बन जाता है। यह एक ही समय ताकत और किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी कमजोरी है। लोगों का एक छोटा सा हिस्सा धार्मिक सिद्धांत में गंभीरता से रुचि रखता है। अधिकांश लोगों को धर्म या किसी भी राजनीतिक सिद्धांत में गंभीरता से दिलचस्पी नहीं है। उनमें इच्छाशक्ति और समझ की कमी है। खुद को ऊंचा करने के बजाय वे धर्म के स्तर को अपने पैरों के नीचे लाने का प्रयास करते हैं। क्या वे समझ नहीं पाते हैं या वे अभ्यास करना मुश्किल हो जाता है। वे स्वीकार करते हैं और अभ्यास करते हैं जो उन्हें समझने और अनुसरण करने और उन्हें आनंद देने के लिए आसान है। जिन धर्मों ने जनता के लिए एक आसान रास्ता तैयार किया है वे उन लोगों की तुलना में अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं जो अध्ययन, अभ्यास, बलिदान और ज्ञान की मांग करते हैं।
सबसे आसान पालन हिंदू धर्म है। एलियट के शब्दों का उपयोग करने के लिए, “यह एक जंगल है।” आप किसी भी बात पर विश्वास करने या अविश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं। जो आवश्यक है वह अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों, जाति और समारोहों के अनुरूप है और उसे हिंदू कहने की इच्छा है। संगठित धर्मों, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म और इस्लाम के बीच अनुशासन का कुछ हिस्सा कायम है। लेकिन बहुसंख्यक ईसाई और मुस्लिम अपने धर्मों की परवाह नहीं करते। अन्य धर्मों के अनुयायियों की तरह वे भी मानते हैं कि केवल पुराने रीति-रिवाजों का पालन करना ही धर्म है। सबसे ज्यादा परेशानी खुद धर्मों और धर्मगुरुओं ने पैदा की है। हमें नहीं पता कि क्राइस्ट ने ऐसा कहा या नहीं लेकिन ईसाई पुस्तकों में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति मेरे माध्यम के बिना प्रभु के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता है। भागवत गीता के कृष्ण ने कहा,” मैं भगवान हूं। मेरे पास आओ और मेरे नाम पर कुछ भी करो और मैं तुम्हें बचाऊंगा। ” उन्होंने दावा किया कि वे भगवान, उद्धारकर्ता हैं।
एक अच्छा ईसाई वह है जो बाइबल में परमेश्वर के वचन को मानता है, वह प्रभु यीशु मसीह में विश्वास रखता है और उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करता है। एक व्यक्ति बहुत नैतिक हो सकता है लेकिन अगर वह बाइबल में विश्वास नहीं करता है और प्रभु यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं करता है, तो वह एक अच्छा ईसाई नहीं माना जाता है। इसी तरह, एक अच्छा मुसलमान वह है जो ईश्वर के साथ-साथ कुरान में भी विश्वास करता है, पैगंबर मोहम्मद को ईश्वर द्वारा भेजे गए अंतिम पैगंबर के रूप में स्वीकार करता है, जो अपने संदेश के साथ, दिन में पांच बार प्रार्थना करता है, मक्का का हज करता है। एक हिंदू के लिए एक अच्छा हिंदू होने के लिए कोई आज्ञा नहीं है और न ही कठिन और कड़े नियमों का पालन करने के लिए। वह नास्तिक या अज्ञेयवादी हो सकता है, वह मूर्तिपूजक हो सकता है, आस्तिक या मूर्तिभंजक; वह किसी भी पुस्तक, शास्त्र, धार्मिक शिक्षण या दर्शन में विश्वास नहीं कर सकता है, वह एक हिंदू भी हो सकता है, भले ही वह एक जाति का हो और अपनी जाति के हुक्म का पालन करता हो। उसे जाति व्यवस्था में विश्वास करना होगा।
दूसरी ओर, एक अच्छा बौद्ध वह नहीं है जो सही ढंग से सुत्त का पाठ करता है, बुद्ध की मूर्ती के समक्ष मोमबत्तियाँ और अगरबत्ती की छड़ी जलाता है, सारनाथ, श्रावस्ती, गया और कुसिनारा जैसे पवित्र स्थानों पर जाता है; भिक्षुओं के सामने श्रद्धापूर्वक झुकता है, कभी-कभी ‘दाना’ देता है, और इस संतुष्टि के साथ सोता है कि उसने धम्म के प्रति अपना कर्तव्य निभाया है। अन्य धर्मों के विपरीत बौद्ध धर्म ईश्वर, उसके नबियों, अवतारों, मोक्ष, नर्क और स्वर्ग, मोक्ष और क्षमा, प्रार्थनाओं, उपवासों, बलिदानों को व्यर्थ संस्कार मानता है।
बौद्ध धर्म आस्था नहीं है। यह नैतिकता और व्यवहार का धर्म है। बुद्ध ने कभी भी सर्वज्ञ होने का दावा नहीं किया और न ही अपनी शिक्षाओं को महत्व दिया। “सब कुछ बदल जाता है,” उन्होंने कहा, “बदलाव के लिए प्रकृति का नियम है।” उन्होंने अपनी शिक्षाओं को आंकने की एक कसौटी रखी। उन्होंने कुछ सिद्धांतों को भी रखा। उन्होंने लोगों से आस्था पर कुछ भी स्वीकार न करने का आह्वान किया। उनका धर्म कई लोगों की भलाई के लिए था और सभी के भले के लिए था। उनका धर्म अपने आप में अंत नहीं था, बल्कि स्वयं को ऊंचा उठाने के लिए एक सहायता के रूप में था। एक नाव की ‘धम्म’ की तुलना करते हुए, उन्होंने कहा कि नाव का स्थान पानी में था और इसका उद्देश्य यात्रियों को नदी से पार ले जाना था। उन्होंने उन लोगों को तिरस्कृत किया जिन्होंने नाव को अपने सिर पर ढोया था।
‘त्रिशरण’, ‘पंच शील’ और ‘अष्टांग मार्ग’ उनकी धार्मिक कथाओं के महत्वपूर्ण आधार थे। वे पुनरावृत्ति के लिए सरल लेकिन कार्रवाई में समझने और अनुवाद करने में मुश्किल हैं। फिर भी वे ‘आज्ञा’ नहीं थे, लेकिन केवल स्वेच्छा से पढ़ाया जाना स्वीकार किया गया था। उनका अनुपालन न करने से शाप और अपमान नहीं होता था। बुरे विचारों से पैदा हुए बुरे कर्मों के कारण दुख होता है। अच्छे कर्मों ने अच्छे परिणाम दिए। हम बुरे कामों के कारण होने वाले दर्द को दूर नहीं कर सकते हैं और न ही हम पापों के बुरे प्रभाव को कम कर सकते हैं। सबसे अच्छा हम अधिकतर अच्छे कर्म करके बुरे कर्मों के प्रभाव को कम कर सकते हैं। यदि हम में से हर कोई अपने पड़ोसियों के बारे में अच्छा सोचता है और अच्छा करता है, तो इसका परिणाम अच्छा होगा और चारों ओर खुशी होगी। मन शरीर को आदेशित करता है। मन को नियंत्रित और संस्कारित करना होगा। मन शरीर को नियंत्रित करता है। शरीर मन को नियंत्रित नहीं करता है। अकेले ज्ञान को पर्याप्त नहीं माना जाता है। यह सही इरादे के साथ सही कार्रवाई है जो सबसे ज्यादा मायने रखती है।
लाखों नामचीन ईसाई, मुसलमान, सिख, शिंतोवादी, ताओवादी, पारसी और कन्फ्यूशियस हैं। इसी तरह, लाखों नामचीन बौद्ध हैं, जिन्हें अपने पूर्वजों या माता-पिता की संपत्ति की तरह अपना धर्म विरासत में मिला है। वे हमेशा अपने धर्मों के अच्छे प्रतिनिधि नहीं हो सकते हैं।
एक अच्छा बौद्ध वह है जो संस्कृति के उच्च स्तर को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है, वह सच्चा, ईमानदार, ईमानदार साहसी, दयालु और सहनशील है। उसके पास नैतिकता का बहुत उच्च स्तर होना चाहिए। उसे अपने साथ-साथ अपने आसपास के लोगों को भी ऊँचा उठाने की कोशिश करनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति वास्तव में अकेले में महान नहीं हो सकता है। बौद्ध धर्म व्यक्तिवाद का विरोध करता है। एक अच्छा बौद्ध स्वार्थी नहीं हो सकता। वह हठधर्मी नहीं हो सकता। वह सभी के लिए दया और प्रेममय दयालुता के साथ एक तर्कसंगत व्यक्ति है।
यदि कोई धम्म की पुस्तकों को पढ़ता है और बुद्ध द्वारा प्रदान किए गए सत्य पर चिंतन करता है, तो वह एक अच्छा बौद्ध हो सकता है। उसे बुद्ध की महान शिक्षाओं का ध्यान और आत्मसात करना सीखना चाहिए। उसे ईमानदारी से उन महान और उदात्त सिद्धांतों को रोजमर्रा की जिंदगी में अमल करने की कोशिश करनी चाहिए। उसे सतर्क रहना चाहिए और धर्म पर किताबों में लिखी हर बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए। उसे इस बात का न्याय करना चाहिए कि क्या यह स्वयं के लिए भी अच्छा है और कितने के लिए भी।
यह प्रारंभ में अच्छा है, मध्य में अच्छा है और अंत में अच्छा है।
कर्म शब्दों से अधिक जोर से बोलते हैं। व्यक्ति को हमेशा अपने विचारों, कर्मों और शब्दों पर पहरा देना चाहिए। जब संदेह में हो तो हमेशा धम्म की मशाल को प्रकाशित करना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या विशेष अधिनियम धम्म की शिक्षाओं के अनुरूप होगा।
एक अच्छे बौद्ध को हमेशा सतर्क रहना चाहिए और ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो धम्म, उनके शिक्षक भगवान बुद्ध और संघ के लिए बुरा नाम ला सकते हैं।
धार्मिक समाजों को उनके व्यवहारों के आधार पर आंका जाता है न कि उनके प्रवचनों के माध्यम से।
यदि हम केवल सभी अपने हित को ही ध्यान में नहीं रखते हैं, लेकिन कई लोगों की भलाई और खुशी के लिए काम करते हैं, तो सेवा और प्रेमपूर्ण दया के माध्यम से सभी जीवित प्राणियों के दुखों को दूर करने का आदर्श रखते हुए हम इस जगह को एक सच्चा स्वर्ग बना सकते हैं कवियों और दार्शनिकों की कल्पना ने उनकी कविताओं और पुस्तकों में जो कुछ बनाया या प्रस्तुत किया है, उससे बेहतर और वास्तविक है। यह एक अच्छे बौद्ध का आदर्श होना चाहिए। जो कोई भी बुद्ध के उपदेश के अनुरूप इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए काम करता है वह वास्तव में एक अच्छा बौद्ध है।
श्रोत: भीम पत्रिका: दिसम्बर, 1973, खंड। 2।

देश की न्याय व्यवस्था के भीतर किस कदर सत्ताधारियों और पूंजीपतियों ने अपनी पैठ बना ली है, यह आए दिन सामने आ रहा है। इससे न्यायपालिका के भीतर बैठे कई न्यायधीश भी परेशान है। लेकिन उनका गुस्सा तब बाहर आता है, जब वो रिटायर हो जाते हैं। ऐसे ही बुधवार को रिटायर हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने फेयरवेल के दौरान अपने संबोधन में न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए है। उन्होंने कहा कि देश का लीगल सिस्टम अमीरों और ताकतवरों के पक्ष में हो गया है। जज शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छुपा सकते। उन्हें समस्याएं पहचाननी होंगी और उनसे निपटना होगा। जस्टिस गुप्ता का फेयरवेल वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हुआ।
इस दौरान जस्टिस गुप्ता ने कहा कि कोई अमीर सलाखों के पीछे होता है तो कानून अपना काम तेजी से करता है लेकिन, गरीबों के मुकदमों में देरी होती है। अमीर लोग तो जल्द सुनवाई के लिए उच्च अदालतों में पहुंच जाते हैं लेकिन, गरीब ऐसा नहीं कर पाते। दूसरी ओर कोई अमीर जमानत पर है तो वह मुकदमे में देरी करवाने के लिए भी उच्च अदालतों में जाने का खर्च उठा सकता है।
बकौल जस्टिस दीपक वर्मा, ‘आप देखते हैं कि देश को न्यायपालिका पर बड़ा विश्वास है। मेरा मतलब है कि, हम ऐसा बार बार कहते हैं लेकिन उसी समय हम शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छुपा सकते और कहें कि न्यायपालिका में कुछ नहीं हो रहा है। हमें समस्याएं पहचाननी होंगी और उनसे निपटना होगा। इस संस्थान की ईमानदारी ऐसी है कि उसे किसी भी हालत में दांव पर नहीं लगाया जा सकता।’
जस्टिस दीपक गुप्ता ने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की थी। 2004 में वह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट मे जज बने थे। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। तीन साल से अधिक समय तक शीर्ष अदालत में जज रहे।
हालांकि यहां एक बड़ी दिक्कत जजों के सवाल उठाने के तरीके पर भी है। तमाम जज नौकरी में रहने के दौरान चुप्पी साधे उसी व्यवस्था का हिस्सा बने रहते हैं और सवाल उठाने से बचते हैं। उनकी चुप्पी तब टूटती है, जब वो उस व्यवस्था से बाहर आ जाते हैं, ऐसे में उनके बयान से बस एक सनसनी भर होता है और फिर चीजें अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। सवाल यह है कि न्यायपालिका का हिस्सा होने के दौरान तमाम न्यायाधीश इसके खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं खोलते। क्योंकि जब तक न्यायधीश संख्या बल में साथ आकर पुरजोर तरीके से न्याय व्यवस्था के भीतर की खामियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, तब तक स्थिति में बहुत सुधार नहीं आएगा।
हेमंत सोरेन ने वह कर दिखाया है, जो किसी दूसरे राज्य का मुख्यमंत्री नहीं कर सका। जब लॉकडाउन के कारण तमाम राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूर परेशान होकर अपनी सरकारों से घर वापस बुलाने की गुहार लगा रहे हैं, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपने प्रदेश के मजदूरों को वापस बुलाने का सबसे पहले इंतजाम किया। कुछ मुख्यमंत्रियों ने उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के उन बच्चों को बुलाने में तो रुचि ली जो बाहर पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन मजदूरों के बारे में सभी चुप्पी साधे थे। लेकिन हेमंत सोरेन को मजदूरों की भी फिक्र थी।
एक मई की आधी रात को 1200 मजदूरों को लेकर पहली ट्रेन रांची से सटे हटिया स्टेशन पर पहुंची। ये मजदूर तेलंगाना के लिंगमपल्ली से चली स्पेशन ट्रेन से हटिया पहुंचे थे। रात सवा ग्यारह बजे ट्रेन जब हटिया स्टेशन पर रुकी तो मजदूरों की आंखों में खुशी और सुकून के आंसू थे। मजदूरों की चेहरे की चमक में पिछले 40 दिनों की सारी मुश्किलें छिप गईं। स्टेशन पर इन मजदूरों का मेहमानों की तरह स्वागत हुआ, राज्य सरकार के अधिकारियों ने इन्हें गुलाब के फूल दिए और इनके लिए खाने की व्यवस्था की।
इन सभी मजदूरों को सैनिटाइज बसों से इनके गांव भेजा जा रहा है। इससे पहले स्टेशन पर सभी का चेक अप भी हुआ। रांची के डिप्टी कमिश्नर महिमापत राय के मुताबिक, इनके जिलों में पहुंचने पर एक बार फिर इनका चेक अप होगा। इसके बाद इन्हें होम क्वारनटीन किया जाएगा।
इन यात्रियों की व्यवस्था को देखने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी हटिया स्टेशन पहुंचे थे। हेमंत सोरेन की खुशी उनके ट्विटर हैंडल पर दिखी, उत्साहित मुख्यमंत्री ने लिखा- स्वागत है साथियों। यहां तक की स्वागत में बैनर तक लगाए गए। और मजदूरों के घर आने पर उन्हें जोहार कहा गया।
यह सच है कि लॉक डाउन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे मजदूर कमजोर वर्ग के लोग हैं। और वंचित समाज से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति की मुसीबत उस समाज का मुख्यमंत्री ही समझ सकता है। हेमंत सोरेन का कहना है कि वो अन्य मजदूरों को भी जल्दी ही उनके घर भेजेंगे। हेमंत सोरेन को सलाम है। 

सर्वविदित है कि हिन्दू धर्म पर एक कुलीन वर्ग का कब्ज़ा है। चंद मुट्ठी भर कुलीन वर्ग के लोग हजारों बरसों से हिन्दुओं के सभी संस्थानों और लाखों मंदिरों पर चौकड़ी मार के बैठे हैं। किसान, दस्तकार, मज़दूर, आदिवासी के लिए इनके दरवाज़े आदिकाल से बंद हैं। इन सभी कमेरे वर्गों को मंदिर में जाने और दान देने का अधिकार तो है, लेकिन धर्म की सत्ता पर, शंकराचार्य या मठाधीश बनने पर, धर्म की आय और प्रबंध के मामले में ये लोग इक्कीसवीं सदी में भी अछूत और बहिष्कृत हैं। अक्सर मंदिरों के गर्भगृह में भी इनका प्रवेश वर्जित ही रहता है।
आज कल पूरा विश्व कोविद-19 की महामारी से जूझ रहा है। दिल्ली में कई गुरूद्वारे हैं। चलिए, उनमें से हम एक का ज़िक्र करते हैं। नाम है गुरुद्वारा बंगला साहिब। यह गुरुद्वारा प्रतिदिन चालीस हज़ार भूखे जरूरतमंद लोगों को भोजन मुहैया करा रहा है। इस भोजन पैकेट में रोटी, चावल, दाल, सब्जी, परसादा (सूजी का हलवा) होता है। राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल के डॉक्टरों और नर्सों को जब उनके मोहल्ले वालों ने उनके घरों से गाली गलोच करके भग़ा दिया, तब इसी गुरूद्वारे ने उनको पनाह दी। दिल्ली पुलिस ने इनके कामों की सराहना करते हुए अपनी 50 मोटर साइकिलों पर सवार हो कर इस गुरूद्वारे की सायरन बजाते हुए परिक्रमा की और सल्यूट किया। यहाँ तक कि देश के प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा कि, “हमारे गुरूद्वारे लोगों की सेवा करने में असाधारण काम कर रहे हैं। उनकी करुणा प्रशंसनीय है।” और यह बात केवल गुरुद्वारा बंगला साहिब तक ही सीमित नहीं है। देश के हजारों गुरुद्वारों में ऐसी ही व्यवस्था चल रही है। मानव जाति पर आई विपदा में वे अपना अद्वितीय योगदान दे रहे हैं।
जो सेवा कार्य सिखों के गुरुद्वारों से हो रहा है, क्या वैसा कुछ हिन्दू के मंदिरों द्वारा हो रहा है? याद रखिये कि गुरुद्वारों के लंगर भोजन का लाभ ले रहे लोगों में 99% गैर-सिख हैं। क्या हिन्दू मंदिरों से हिन्दुओं के लिए भी कुछ मिल रहा है? शायद इक्का-दुक्का जगह हो, लेकिन आम तौर पर मंदिरों के किवाड़ बंद हैं। कोविद-19 की महामारी के खिलाफ जंग में हमारे मंदिर आम तौर पर नदारद और गायब हैं। वो लोग जो इन मंदिरों और संस्थानों को अपने नागपाश में ज़कडे और पकड़े हुए हैं, इस त्रासदी में वो ढूँढने पर भी नज़र नहीं आते।
क्या हिन्दू मंदिरों में संसाधनों की कमी है? क्या मंदिरों के पास धन नहीं है? एक समाचार के अनुसार केरल के श्री पदमनाभास्वामी मंदिर के पास एक लाख छियासठ हज़ार एक सौ अट्ठासी करोड़ रूपए (166188 करोड़ रूपए) की कीमत का सोना है। तिरुपति बालाजी मंदिर की वार्षिक आय 650 करोड़ रूपए है, शिरडी के साईं बाबा मंदिर की वार्षिक आय 360 करोड़ रूपए है, वैष्णो देवी मंदिर की वार्षिक आय 500 करोड़ रूपए है। इसके अलावा देश में 12 लाख मंदिरों में सैंकड़ों ऐसे हैं जिनके भण्डार में करोड़ों रूपए हैं। आज जब हिन्दू गरीब, दलित, पिछड़ा, आदिवासी बीमारी, भूख और गरीबी से मर रहा है तो क्या यह पैसा उनके काम आ रहा है? शिरडी के साईं बाबा की जो जानकारी मेरे पास है उसके अनुसार बाबा फ़कीर थे। दो जोड़ी कपड़े थे, सर पर भी फटा-पुराना कपड़ा बांधते थे। दिन भर जो उनके मुरीद उनको भेंट करते थे, रात सोने से पहले बाबा सब जरूरत मंदों में बाँट देते थे। उनका फरमान था कि रात सोने से पहले भण्डार में अन्न का एक भी दाना नहीं होना चाहिए। रात को सोते समय बिलकुल फक्कड़ होना है। यदि आज आप शिरडी जाएँ तो वहां बाबा सिर पर सोने का मुकुट पायेंगे, मंदिर की दीवारों और खम्बों पर सोने का पत्र चढ़ा है, गुम्बद पर सोने का पत्र चढ़ा है। बाबा के फलसफे, विचार और सोच की सरे आम धज्जियाँ उड़ाईं जा रही हैं।
2017-18 की एक रिपोर्ट के अनुसार गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर की वार्षिक आय 12 करोड़, 94 लाख, 21 हज़ार, 454 रूपए थी। इसके अलावा 691 ग्राम सोना दान में प्राप्त हुआ, 49 किलो 982 ग्राम चाँदी दान में प्राप्त हुई। अब जानिये कि इसका खर्च कैसे हुआ? 83% धन पुजारियों के पास गया। 15% भाग मंदिर के रख-रखाव व्यवस्थापन वाली देवस्थान समिति को मिला और 2% चैरिटी कमिश्नर की कचहरी में जमा हुआ। (स्त्रोत: गुजरात समाचार पेपर 8 अप्रैल 2018 पेज नंबर 5 पर)। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट जो 16 नवम्बर 2016 को प्रकाशित हुई, उसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि यदि केवल दस मंदिर की जमा पूँजी लोक कल्याण में लगा दी जाय तो भारत की गरीबी, सदा-सदा के लिए दूर हो जाएगी। यानी भारत एक गरीब लोगों का अमीर देश है। भारत की गरीबी कृत्रिम है, मानव निर्मित है। यदि मंदिरों में जमा धन का सदुपयोग हो जाए तो गरीबों की, किसान, दस्तकार, मजदूर, आदिवासी की गरीबी तत्काल ख़त्म हो जायेगी। भारत एक समृद्ध, सशक्त और खुशहाल देश बन जाएगा।
फिर ऐसा क्यों नहीं होता? क्या यह संभव है? यदि हाँ तो कैसे? इस सब का इलाज़ हिन्दू धर्म के लोकतांत्रिकरण में है! चलिए हम फिर से सिख धर्म और गुरुद्वारों पर आते हैं। 1920 तक यानी सौ बरस पहले तक सिख धर्म में भी यही कुछ होता था जैसा हिन्दू धर्म में होता है। 12 अक्टूबर 1920 को सिखों के पिछड़े वर्ग का एक संगठन “ खालसा बिरादरी’ ने जलियांवाला बाग़, अमृतसर में एक दीवान (धार्मिक सभा) बुलाया जिसमें खालसा कॉलेज के छात्रों और अध्यापकों ने भी हिस्सा लिया। वहां से ये सब लोग (संगत) स्वर्ण मंदिर गयी। स्वर्ण मंदिर में इन्होने कढा परसाद और अरदास अर्पण किया जिसे वहां उपस्थित पुरोहितों ने अस्वीकार कर दिया क्योंकि भेंट करने वाले अछूत थे।
वहीँ पवित्र पुस्तक गुरु ग्रन्थ साहिब से वह स्तोत्र दिखाया गया जो परसाद और अरदास का समर्थन करता था। आखिर कार पुरोहितों को झुकना पड़ा। उसी वक़्त संगत अकाल तख़्त गयी, जहाँ इन्हें देख वहां के पुरोहित भाग खड़े हुए और संगत ने अपना जत्थेदार अकाल तख़्त पर नियुक्त कर दिया। उसके बाद एक एक गुरुद्वारा को महंतों, पुजारियों, मठाधीशों से कब्ज़ा छुड़ाने की मुहिम शुरू हो गयी। मुहीम अहिंसक थी लेकिन कब्ज़ादारों ने कहीं कहीं झगड़ा भी किया। तरन तारण में दो अकालियों की हत्या गयी। 20 फ़रवरी 1921 को ननकाना साहिब में 200 सिख स्वयं सेवकों की हत्या महंत नारायण दास द्वारा भाड़े के हत्यारों द्वारा करा दी गयी। लेकिन अंततः मुट्ठी भर स्वार्थी तत्वों द्वारा गुरुद्वारों का कब्ज़ा छुड़ा लिया गया।
आज शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति तमाम गुरुद्वारों को अपने नियंत्रण में रखती है। सभी सिख पुरुष और महिलाओं को मतदाताओं के रूप में ‘सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925’ के अंतर्गत पंजीकृत किया जाता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को सिखों की संसद भी कहा जाता है। जो भी दान आता है उसके खर्चे पर इस समिति द्वारा नियंत्रण किया जाता है। एक रूपया भी किसी व्यक्ति की जेब में नहीं जाता। अनेकों शिक्षण संस्थानों, मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल और चैरिटेबल ट्रस्ट इसके द्वारा संचालित होते हैं। गुरुद्वारों का लंगर भी चलता है। आज एक आम सिख की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति एक आम हिन्दू से कहीं बेहतर है तो उसके पीछे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति द्वारा संचालित संस्थानों का भी योगदान है। यह सब सिख धर्म के लोकतांत्रिकरण का परिणाम है।
हमारे देश के अनेकों बुद्धिजीवियों का मानना है कि जिस दिन हिन्दू धर्म का भी लोकतांत्रिकरण हो जाएगा, तब जो गरीब, किसान, मजदूर, आदिवासी हिन्दू हैं उनकी भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थिति में जबरदस्त सुधार आ जायेगा। आईये हम सभी हिन्दू धर्म के लोकतांत्रिकरण के लिए काम करें और हिन्दू मंदिर व संस्थानों से कुलीन तंत्र का कब्ज़ा हटा कर लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम करें। जय हिन्द!
– लेखक अनिल जयहिंद एक स्वतंत्र लेखक और सोशल एक्टिविस्ट हैं। ये उनके निजी विचार हैं।
Blessed is the birth of the Buddha; blessed is the discourse on the Noble Law; blessed is the harmony of the spiritual community; blessed is the devotion of those living in brotherhood; blessed is the spiritual effort of the united. – The Dhammapada.
Since May of 1999, the United Nations (UNO) has declared Vesak, or Buddha Purnima, marking the Birth, Enlightenment and Parinibbana of Buddha, an official international Vesak Day. Vesak is the day, the Buddhist regard as the most important day in their religious calendar. This auspicious day fall on the full moon day during lunar month that corresponds the month of April or May.
On Saturday May 9th, 2020, Ambedkar International coordination Society(AICS),Canadaalong with North American Ambedkarite and Buddhist organizationshumbly request to join first official Cyber celebration on Vesak Day-Buddha Poornima.
Online zoom link https://zoom.us/j/5677014594
This is the first Cyber Celebration on the occasion of International Vesak Day is an important day for Buddhist communities across the world.
This is the first time that all the Buddhist brothers and sisters of different countries will be called together for cybercelebration (online Celebration) Vesak Day-Buddha Poornima.
Cyber celebration mission is to inspire and motivate people to come together as one human family to generate inner peace and create a boundless world landscape of compassion, integrity, harmony, love and peace.In the 21st century CE, it is estimated that over 600 million (9-10% of the world population) people practice Buddhism
Vesak Day-Buddha Poornima attract Buddhist practitioners and community members from various ethnic group like Vietnam, Lao, Thai land, Taiwan, Myanmar,Mongolia, Nepal, Bhutan, Tibet, Japan, Korea, Sri Lankan, India, Bangladeshi, Cambodia, Singapore, China, Australia, New Zealand, Europe, Canada and America.
It marks the three most important events in Buddha’s life: his birth, Enlightenment and passed away of Nibbana.
Each year, International Vesak Day commemorates to Buddha,Dhamma and Sangha.
In general, Buddha Purnima is celebrated by paying a visit to common Viharas, where Buddhists observe a longer than usual and full-length Buddhist Sutta which is similar to a service. Usually dressed in white attire, Buddhists refrain from eating non-vegetarian food. Keer is considered as one of the most auspicious porridge on this day. The statue of Buddha is placed in a basin filled with water decorated with flowers. People visit Viharas to symbolize this day as a pure and new beginning.
Buddhist teachings provide guidance around non-violent action to work for universal peace throughout the world.
Reporter: Er. Mahesh Wasnik
Automotive Engineer-Detroit, Michigan, USA
दरिया भी मैं दरख्त भी मैं,
झेलम भी मैं, चेनाब भी मैं…
दैर हूँ हरम भी हूँ…
शिया भी हूँ सुन्नी भी हूँ…
मैं हूँ पण्डित…
मैं था..मैं हूँ …और मैं ही इरफ़ान रहूँगा…
मीरा नायर की ‘सलाम बोम्बे’ में सड़क पर बैठा एक राइटर जो लोगों के लिए चिट्ठियाँ लिखने का काम करता था कौन जानता था कि एक दिन वो इरफ़ान मुंबई सिनेमा की इस सड़क से उठकर उस मुक़ाम पर पहुँच जाएगा की वो दुनिया के फ़िल्म इतिहास की अब तक सबसे बेहतरीन फ़िल्मों ‘स्लमडॉग मिलेनियर, लाइफ़ आफ पाई और जुरासिक पार्क’ का हिस्सा बनेगा। वो इरफ़ान अब नहीं रहे। या यूँ कहें की अब कोई इरफ़ान ना आएगा। दो साल तक कैंसर से जूझने के बाद ‘इंग्लिश मीडियम’ से शानदार वापसी करके इरफ़ान ने ये दिखा दिया था की उन्हें इरफ़ान क्यों कहतें हैं। शायद माँ की असमय मौत और अंतिम समय में लॉकडाउन की वजह से उन तक ना पहुँच पाने की टीस इरफ़ान को घर कर गयी। पिछले सप्ताह ही उन्हें कोकिलाबेन हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था और 29 अप्रैल, 2020 को भारतीय सिनेमा से इरफ़ान का साया उठ गया।
ऐसे में जब सारी दुनिया मौत के भयानक साये में जी रही है इरफ़ान जैसे शानदार अदाकार का हमारे बीच से यूँ बिना कुछ शानदार कहे चले जाना एक ख़ालीपन छोड़ जाता है, और छोड़ जाता है कभी ना भरने वाला घाव। इरफ़ान को शब्दों में पिरोना आसान नहीं, क्योंकि ‘सलाम बॉम्बे’ के बेनाम सड़कछाप लेटर राइटर को पहचान दिलवाना जबकि आपके सामने नाना पाटेकर और रघुवीर यादव जैसे कलाकार हों से लेकर ‘इंग्लिश मीडियम’ के चंपक हलवाई तक इरफ़ान जैसा सफ़र बहुत कम लोगों को नसीब होता है। ना केवल भारतीय टीवी, सिनेमा बल्कि दुनिया भर के सिनेमा के लोग इरफ़ान की शानदार डायलाग़ डिलीवरी और उनके बोलने के अंदाज को कई दशकों तक ना भूल पाएँगे। इरफ़ान होना आसान नहीं है ना वो अंदाज और जज़्बा पैदा करना जिनसे बनता है अदाकार और शानदार फ़नकार। एक एक डायलॉग जैसे कई हज़ार खून के कतरों को जला जला कर उन्होंने बोला होगा।
फ़िल्म ‘हासिल’ में इलाहाबाद के होस्टल के जीवन को जीवंत कर देने वाले कट्टे लेके चलने वाले एक गुंडे के किरदार को लोग आज भी याद रखते हैं, ये इरफ़ान ही कर सकते थे। डॉ चंद्रप्रकाश के ‘चाणक्य’ में सेनापति भद्रसाल का तमतमाया चेहरा अगर आपको याद हो तो वो इरफ़ान ही थे जिसे देख कर सिरहन पैदा होती थी। नीरजा गुलेरी के ‘चंद्रकांता’ में बद्रीनाथ और सोमनाथ के जीवंत किरदार हो या फिर दूरदर्शन की टेली फ़िल्म ‘लाल घास पे नीले घोड़े’ में लेनिन का किरदार। सब जगह वो इरफ़ान ही था जो बता रहा था की कोई है इस सिनेमा की निरंतरता को और इसके किरदारों को स्थायित्व देने के लिए ताकि बरसों बरस कोई ये ना कहा की भारत में कलाकार नहीं होते। भारत एक खोज में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं।
1988 में टीवी की दुनिया से निकल कर इरफ़ान ने फ़िल्मों में पहला कदम रखा फ़िल्म थी मीरा नायर की सलाम बोम्बे। फ़िल्म जब पर्दे पर आयी तो मीरा नायर ने उनका फ़िल्म से रोल काफ़ी काट दिया था पर मीरा शायद रोल एडिट कर सकती थी पर इरफ़ान की क़िस्मत को नहीं उसे तो कुछ और ही मंज़ूर था। फ़िल्म को दुनिया भर में वाहवाही मिली और इरफ़ान का फुठपाथ पर बैठे एक लेखक का छोटा सा रोल बहुत कुछ कह गया था जिसे अब एक लम्बा सफ़र तय करना था।
2004 आते आते इरफ़ान काफ़ी सारे रोल कर चुके थे पर पहचान और वाहवाही मिली उन्हें ‘मक़बूल’ से। इस साल आयी इस फ़िल्म को इरफ़ान की मुंबई की मसाला फ़िल्मों का एंट्री गेट भी कहा जाता है। विशाल भारद्वाज ने कल्पना की थी की सेक्सपीयर के मैक्बेथ को कैसे स्क्रीन पर उतारा जाए और फिर 2004 में रच डाला मक़बूल। इरफ़ान मक़बूल में जिसके सामने थे वो थे पंकज कपूर जिन्हें भारतीय सिनेमा एक ऐसे अभिनेता के रूप में जानता है जो किसी परिचय के मोहताज नहीं। पंकज कपूर जहांगीर खान और इरफ़ान मक़बूल। एक इतिहासिक किरदार मैक्बेथ को इरफ़ान ने एक गैंगस्टर के रूप में जिस शानदार अदाकारी से सामने रखा वो भारतीय सिनेमा के डार्क फ़िल्मों में एक मिसाल है जबकि आपके सामने दो और बेहतरीन कलाकार तब्बू और पीयूष मिश्रा हों पर वो इरफ़ान ही क्या जो बता ना सके की वो इरफ़ान क्यों है। लाल बड़ी नशे से भरी आँखें जो मुहँ से पहले ही आँखों से डायलॉग बोलने की कला इरफ़ान की थी वो शायद कोई ना कर पाए।
इससे पहले वो आर्ट फ़िल्मों में ही अपने अभिनय से लोगों को लुभा रहे थे पर आर्ट फ़िल्में देखने वाला समाज बहुत कम था। और इरफ़ान को एक जोनर में बांध रखना उतना ही मुश्किल भी। ये इरफ़ान की आँखे का ही जादू था की जो डायलोग से पहले बोल पड़ती थीं और लोग उनकी इस अदा के क़ायल होते जा रहे थे। और यही वजह थी कि फ़िल्म ‘हासिल’ में निभाए उनके इलाहाबादी गुंडई के जिवंत किरदार को उनको पहला बेस्ट विलेन फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। जो इलाहाबाद मेरठ या लखनऊ के छात्रावासों के जीवन को थोड़ा भी जानता होगा वो इरफ़ान के इस किरदार का क़ायल हुए बिना नहीं रह होगा।
2007 में ‘मेट्रो’ फ़िल्म के लिए भी उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर का अवार्ड मिला जिसमें वो मोंटी नाम के एक ऐसे किरदार को निभाए जो उम्र बीत जाने पर कैसे भी एक टीवी प्रडूसर से शादी करने के लिए बेताब था। साथ ही इस साल उन्हें सम्मान मिला ‘नेमसेक’ नाम की फ़िल्म के लिए भी जिसने उन्हें विश्वव्यापी पहचान दिलवायी। इस साल उन्होंने दो और विदेशी फ़िल्मों ‘ए मायटी हार्ट’ और ‘दा दर्जलिंग लिमिटेड’ में किरदार निभाया और अब इरफ़ान की पहचान अंतरराष्ट्रीय अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी। डैनी बोयल की ऑस्कर फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ में इरफ़ान के निभाए इंस्पेक्टर के किरदार और फ़िल्म के अन्य किरदारों को स्क्रीन ऐक्टर गिल्ड अवार्डस फ़ोर आउट्स्टैंडिंग परफ़ॉरमैन्स अवार्डस से नवाज़ा गया। डैनी बोयल ने तब इरफ़ान के लिए कहा था कि ये एक ऐसा अभिनेता है जो किसी भी किरदार की असली आत्मा बन जाता है और उसे फिर अपने अंदर केंद्रित करके जीवंत करता है।
इस बीच इरफ़ान ने उस रोल को निभाया जो भारतीय फ़िल्म इतिहास में एक नज़ीर बन गया है। 2012 में तिग्मांसु धूलिया ने जनसत्ता अख़बार के पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर के सुझाव पर बीहड़ के एक डैकेत की कहानी उठायी जो ‘पान सिंह तोमर’ की कहानी के रूप पे पर्दे पर आयी और छा गयी। पान सिंह तोमर में बोला गया उनका संवाद काफ़ी फ़ेमस हुआ कि ‘बीहड़ में बाग़ी होतें हैं डैकेत मिलते हैं पर्लियामेंट में’। ‘देश के लिए दौड़े तो कोई नहीं पूछता था अब डैकेत बन गए तो हर कोई नाम जप रहा है’। एक डकैत का दौड़ के प्रति जज़्बा जिस शानदार तरीक़े से इरफ़ान ने स्क्रीन पर जिया वो क़ाबिले तारीफ़ है। इसी साल इरफ़ान बच्चों की दुनिया की सबसे प्रसिद्ध सीरीज़ ‘स्पाइडर मैन’ में डॉक्टर रजित राथा का किरदार निभाए और ‘लाइफ़ आफ पाई’ जैसी ऑस्कर फ़िल्म में पाई के वयस्क रोल भी इरफ़ान खान के खाते में ही दर्ज हो गया। ये इरफ़ान ही थे जिन्हें वर्ल्ड सिनेमा में भारतीय कलाकार के रूप में बड़े बड़े किरदार निभाने का मौक़ा मिला।
इसके बाद आयी ‘लंच बॉक्स’ ने तो इस अभिनेता का एक अलग ही किरदार दिखायी दिया। ये इरफ़ान ही थे जिन्होंने लंच बॉक्स में 60 के हो चुके फ़र्नांडिस के किरदार को जीवंत किया वो तब जब भारतीय सिनेमा में एक शर्त लगी थी की क्या नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी के रूप में भारतीय सिनेमा को उसका नया इरफ़ान मिल गया है। ऐसे समय में इरफ़ान ने नवाजुद्दीन के साथ फ़िल्म करना गवारा किया और फ़िल्म के साथ इतिहास बना दिया। दुनिया भर में इरफ़ान की इस फ़िल्म ने वाहवाही और ढेरों अवार्डस बटोरे और साथ ही पक्का किया इरफ़ान बनाया नहीं जा सकता बल्कि इरफ़ान तो पैदा होतें है। इन दोनो के किरदारों को समझने के लिए आप एक युट्यूब फ़िल्म हाई वे भी याद कर सकते हैं। इरफ़ान का निभाया ‘सात खून माफ़’ का निमफोमैनियाक शायर का किरदार सच में आपको नफ़रत से भर देता है।
2015 में आयी ‘पीकु’ में इरफ़ान शताब्दी के सबसे बड़े कलाकार अमिताभ बच्चन के सामने एक देशी अंदाज वाले ट्रैवल कम्पनी के मालिक और फिर एक टैक्सी ड्राइवर के रूप में जिस तरह से डायलॉग बोल रहे थे वो शानदार था और इसकी वजह है कि इस फ़िल्म के लिए उन्हें ढेरों अवार्डस और वाहवाही मिली। इस साल वो गुंडे और हैदर में भी नज़र आए और साथ ही किरदार निभाया जुरासिक वर्ल्ड सीरीज़ की फ़िल्म में भी। आरुषि हत्याकांड पर बनी तलवार फ़िल्म में सीबीआई अफ़सर के अश्वनि कुमार किरदार से उन्होंने साबित कर दिया की वो क्यों बेस्ट हैं। 2015 में ऐश्वर्य के साथ जज़्बा और फिर टॉम हेक्स के साथ नज़र आए थ्रिलर हॉलीवुड फ़िल्म इन्फ़र्नो में।
2017 में इरफ़ान ने एक बार फिर से हल्ला बोल किया और हिंदी मीडियम जैसी छोटे से बजट की फ़िल्म से देश भर के घर घर में पहुँच गए। चाँदनी चौक के एक कारोबारी के हिंदी भाषी किरदार को उन्होंने अमर कर दिया जिसके लिए उन्हें बेस्ट अभिनेता का फिल्मफेअर अवार्डस मिला।साथ ही क़रीब क़रीब सिंगल फ़िल्म से एक अजीब कशिश वाले आशिक़ का किरदार भी इरफ़ान के हिस्से आया। इसके बाद ब्लैकमेल और फिर कारवाँ आयी जिसमें वो एक अलग ही रूप में नज़र आए। इन तमाम कामों के लिए भारत सरकार ने उन्हें उनके इसी योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा था।
इंग्लिश मीडियम उनकी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई जो उन्होंने अपनी बीमारी कैंसर से उबरने के बाद पूरी की और एक बार फिर से एक ठेठ राजस्थानी मिठाई वाले चम्पक की भूमिका को निभाया और उसी किरदार के साथ अपने अभिनय को अमर कर इस दुनिया के पर्दे से अपने पैर हटा लिए। इरफ़ान की निजी ज़िंदगी बहुत सरल सी थी पत्नी सुतपा सिकदर उनकी एनएसडी के दिनों की साथी थी जिनसे उन्होंने 1995 में शादी की। दो बच्चे बाबिल और अयान है।
इरफ़ान आज हमारे बीच नहीं हैं और वो भी ऐसे वक़्त जब उन्हें देने के लिए चार कंधे भी सरकारी हुक्म से तय हुए होंगे कितना टीस भरा ये सफ़र है उसके लिए, जिसने अपने अभियन से लाखों प्रशंसकों का स्टैंडिंग ओविशन पाया। इरफ़ान के बोले गए संवाद लिखता तो कोई राइटर होगा की ये मुहँ से बोले जाएँगे पर वो इरफ़ान थे जो इन्हें पहले आँखों से बोलते थे फिर वो संवाद इतिहास बन जाते थे। कैंसर से लड़ते हुए उन्होंने हिम्मत दिखायी और उसे पराजित करके शानदार वापसी की। पर इरफ़ान हमेशा चौंकाते रहे और आज फिर चौंका के चले गए।
इरफ़ान को कुछ हज़ार शब्दों में लिखना आसान नहीं और ये हो भी नहीं सकता। आप आसमान को उतना ही देख सकते हैं जितना वह आपकी आँखों में समाएगा, उतना नहीं जितना बड़ा वो सच में होता है। शुक्रिया इरफ़ान, मेरी आँखों को आज उस वक़्त भिगो देने के लिए जब मैं ख़ुद मौत के साये में जी रहा हूँ। पता नहीं कल क्या होगा पर आज का दिन और आने वाला हर दिन मैं तुम्हें ज़रूर याद रखूँगा। और याद रखूँगा हर वो किरदार जिसने तुम्हें इरफ़ान बनाया । 54 साल

मशहूर एक्टर इरफान खान नहीं रहे। कल अचानक तबियत बिगड़ने से वो अस्पताल में आईसीयू में भर्ती हुए थे। और आज उनकी मौत की खबर आ गई। फिल्म निर्देशक सुजीत सरकार ने ट्विट कर इसकी जानकारी दी है। इरफान पिछले काफी समय से कैंसर से पीड़ित थे और लंदन में उनका इलाज चल रहा था। पिछले दिनों वह भारत लौट आए थे और कहा जा रहा था कि वो स्वस्थ हो गए हैं। लेकिन अचानक उनके जाने की खबर आ गई। बीते दिनों उन्हें खराब स्वास्थ्य को लेकर मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
इस खबर के आने के बाद पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज शोक में है। गीतकार जावेद अख्तर ने कहा है कि इरफान जल्दी चले गए। वो अभी बहुत कुछ कर सकते थे। एक बड़ा एक्टर हमारे बीच से चला गया।
इरफान खान को लेकर बॉलीवुड डायरेक्टर और प्रोड्यूसर सुजीत सरकार ने सबसे पहले ट्वीट कर जानकारी दी। उन्होंने लिखा- “मेरे प्रिय मित्र इरफान। आप लड़े और लड़े और लड़े। मुझे आप पर हमेशा गर्व रहेगा। हम फिर से मिलेंगे। सुतापा और बाबिल के प्रति संवेदना।
साल 2018 में इरफान खान को पता चला था कि वह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित हैं। इस बीमारी के इलाज के लिए इरफान खान लंदन भी गए थे और करीब साल भर इलाज कराने के बाद वह वापस भारत लौटे थे।
इरफान खान की मम्मी सईदा बेगम का राजस्थान में कुछ दिनों पहले ही निधन हो गया था। लॉकडाउन के कारण इरफान खान अपनी मम्मी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे। उनको वीडियो कॉल के जरिए ही अपनी मम्मी का अंतिम दर्शन करना पड़ा था।
इरफान का जन्म 7 जनवरी 1967 में राजस्थान में हुआ था। उन्होंने एनएसडी से ट्रेनिंग ली थी। वह उस दौर के अभिनेता हैं, जब चाणक्य सिरियल चला करता था। उन्होंने चाणक्य में काम भी किया था। वह सन् 2000 के बाद लोकप्रिय होने लगे। फिल्म ‘हासिल’ के लिये उन्हे वर्ष 2004 में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था।
उन्होंने ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ और ‘द अमेजिंग स्पाइडर मैन’ फिल्मों में भी काम किया था। 2011 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में इरफ़ान खान को फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ में अभिनय के लिए श्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिया गया। हाल ही में उनकी फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम रिलिज हुई थी, जिसकी काफी सराहना हुई। एक शानदार अभिनेता को दलित दस्तक का नमन।
1918 के स्पैनिश फ़्लू में सर्वाधिक मौतें भारत में हुई थी प्रति एक हज़ार 60 लोग मारे गए थे पूरे देश में डेढ़ करोड़ से दो करोड़। हाल ऐसा था कि आगे के वर्षों में भारत में अप्रत्याशित तौर पर जन्मदर घट गयी। बात यह नही कहनी थी बात यह थी कि मरने वालों में ज़्यादातर आदिवासी, दलित, निम्न मध्यवर्गीय और ग़रीब तबक़ा था। जो बचे रह गए उनके पास संसाधन थे, पैसे थे।
इतिहासकार जेएन हेज़ की किताब ‘Epidemics and Pandemics: Their Impacts on Human History’ पढ़ रहा हूँ। मन बेहद भारी है। हेज़ कहता है कि पश्चिम ने 1918 के इनफ़्लुएंज़ा में हुई मौतों को इसलिए भुला दिया क्योंकि सबसे ज़्यादा भारत और अफ़्रीका में मौतें हुई थी। लेकिन सच यह भी है कि उस वक़्त की तरह आज भी हम सवर्ण एलिट मध्यमवर्गीय सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी जान बचाना चाहते हैं।
देश में कोरोना पर बात हो रही है लेकिन उस भुखमरी पर बात नही हो रही जो कोरोना से ज़्यादा तेज़ गति से ग़रीबों वंचितों को मार रही है। दो नम्बर की कमाई करके बच्चों को कोटा पढ़ने भेजने वाले परिजनों के लिए बसे भेजी जा रही है,ग़रीब की 8 साल की बेटी सैकड़ों किमी पैदल चलकर सड़क पर गिरकर मर जा रही।
यह तय है कि लॉकडाउन हटने के बाद का समाज और ज़्यादा विभाजित होगा। उद्योगों की हालत ख़स्ता होगी और खेती किसानी के ढंग बदलेंगे। नि:संदेह मज़दूर अपने काम की ज़्यादा क़ीमत माँगेगा जैसा कि हर महामारी के दौरान या बाद में होता रहा है। यह देखना है कि सरकार इन बेहद कठिन चुनौतियों से कैसे निपटती है? याद रखिएगा महामारियाँ माफ़ नही करती।
Awesh Tiwari के फेसबुक पोस्ट से साभार
कोरोना के कारण देश की अर्थव्यवस्था को हुए भारी नुकसान को सुधारने के लिए राजस्व सेवा के 51 अफसरों ने अमीरों पर आयकर टैक्स बढ़ाने की सिफारिश की है। इन 51 IRS ने फोर्स 1.0 नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया कि 1 करोड़ रुपये से ज्यादा आमदनी वालों पर टैक्स को 30 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया जाए। 5 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वालों पर वेल्थ टैक्स लगाने का सुझाव दिया गया है, जबकि 10 लाख रुपये से अधिक आमदनी वालों से 4 प्रतिशत वन टाइम कोरोना सेस वसूले जाने का सुझाव है।
इन अधिकारियों ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट के जरिए यह सुझाव तो देश हित में दिया था, लेकिन उनका यही सुझाव अब उनके गले की हड्डी बन गया है। केंद्र सरकार ने इस पर भारी नाराजगी जताते हुए इसे गलत कहा है। तो केंद्र की नाराजगी के बाद प्रत्यक्ष टैक्स नीतियों के लिए सर्वोच्च नीति बनाने वाली संस्था केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी (CBDT) ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए अधिकारियों पर जांच शुरू कर दी है।
हालांकि अधिकारियों पर इस कार्रवाई के विरोध में आवाजें उठने लगी है। आईए देखते हैं कि आखिर इस रिपोर्ट में क्या है, जिससे अधिकारियों को लगता है कि ऐसा कर के देश की अर्थव्यवस्था सुधारी जा सकती है। जबकि सरकार इस रिपोर्ट के बाद भड़की हुई है। इस रिपोर्ट में चार मुख्य सुझाव दिये गए हैं। खासतौर पर गरीबों के हित की और अमीरों से ज्यादा टैक्स लेने की बात कही गई है।
(1) सुपररिच पर टैक्स 30 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत- IRSA यानी राजस्व सेवा संघ के इन अफसरों ने तीन महीने के लिए देश के धनाढ्य लोग जिन्हें सुपररिच की श्रेणी में रखा जाता है, उन पर 30 की बजाय 40 प्रतिशत सुपर रिच टैक्स लगाने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुपर रिच टैक्स या वेल्थ टैक्स में से किसी एक विकल्प पर भी आगे बढ़ा जा सकता है। गौर हो कि वेल्थ टैक्स को खत्म किया जा चुका है।
(2) विदेशी कंपनियों पर सरचार्ज बढ़ाने का सुझाव- रिपोर्ट में एक अवधि के लिए देश में काम कर रही विदेशी कंपनियों पर सरचार्ज बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। अभी एक से 10 करोड़ रुपये कमाने वाली विदेशी कंपनियों पर 2 प्रतिशत और 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई पर 5 प्रतिशत सरचार्ज लगता है।
(3) गरीबों को हर महीने 5000 रुपये देने की सिफारिश- रिपोर्ट में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के परिवारों को छह महीने तक हर महीने 5000 रुपये की मदद की सिफारिश की गई है। इससे 12 करोड़ परिवारों को फायदा होगा। साथ ही यह पैसा तत्काल इकोनॉमी में आएगा।
(4) सीएसआर फंड में इंसेंटिव बढ़ाने का सुझाव- कोरोना संकट में सीएसआर गतिविधियों के लिए टैक्स इंसेंटिव बढ़ाए जाने का सुझाव दिया गया है। कंपनियों के कर्मचारी जो कोरोना से जुड़े राहत कार्यों में जुटे हैं, उन्हें मिलने वाली सैलरी को सीएसआर फंड में जोड़ा जाए। क्योंकि वे अभी मूल काम नहीं कर रहे हैं।
रिपोर्ट बनाने में किसकी भूमिका-
फोर्स 1.0 नाम की इस रिपोर्ट को 2018-2019 बैच के 15 IRS अधिकारियों ने तैयार किया है। वहीं 2015 से 2018 बैच के 23 अफसरों ने इनमें सहयोग किया है। जबकि 6 अफसर मेंटर हैं। तीन चैप्टर में बनी रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन का है। एक हिस्से में MSMI सेक्टर की वैश्विक स्टडी की गई है। रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में देश के 18 विभिन्न क्षेत्रों पर कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन के असर का अध्ययन किया गया है।
लेकिन लगता है कि अमीरों और विदेशी कंपनियों से ज्यादा टैक्स वसूलने और गरीबों को हर महीने 5000 रुपये की सहायाता वाला सुझाव केंद्र सरकार को पसंद नहीं आया है। सरकार को यह दिक्कत है कि आखिर उनके बिना कहे, ऐसा क्यों हुआ। सरकार इसे सेवा नियमों का उल्लंघन बता रही है।
और जाहिर है कि केंद्र सरकार नाराज तो फिर किसी और संस्था द्वारा रिपोर्ट की तारीफ करने का सवाल ही नहीं है, सो केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी CBDT का कहना है कि रिपोर्ट को बिना अनुमति के सार्वजनिक किया है। रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से पहले उनकी तरफ से कोई अनुमति नहीं मांगी गई थी।
लेकिन सरकार से उलट आम लोगों के बीच आईआरएस अधिकारियों के खिलाफ जांच की निंदा हो रही है। कहा जा रहा है कि अधिकारियों ने यह रिपोर्ट देश हित में ही तैयार किया है, सरकार उसे मानने या नहीं मानने के लिए आजाद है, लेकिन अधिकारियों पर कार्रवाई समझ से परे है। अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने के सुझाव पर मोदी सरकार का इस तरह भड़कना मोदी सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाती है। सवाल यह भी है कि कोरोना महामारी के वक्त भी कहीं सरकार को देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा चिंता पूंजीपतियों की तो नहीं है।