रिटायर के बाद एक और जज ने उठाया न्यायपालिका पर सवाल

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देश की न्याय व्यवस्था के भीतर किस कदर सत्ताधारियों और पूंजीपतियों ने अपनी पैठ बना ली है, यह आए दिन सामने आ रहा है। इससे न्यायपालिका के भीतर बैठे कई न्यायधीश भी परेशान है। लेकिन उनका गुस्सा तब बाहर आता है, जब वो रिटायर हो जाते हैं। ऐसे ही बुधवार को रिटायर हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने फेयरवेल के दौरान अपने संबोधन में न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए है। उन्होंने कहा कि देश का लीगल सिस्टम अमीरों और ताकतवरों के पक्ष में हो गया है। जज शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छुपा सकते। उन्हें समस्याएं पहचाननी होंगी और उनसे निपटना होगा। जस्टिस गुप्ता का फेयरवेल वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हुआ।

इस दौरान जस्टिस गुप्ता ने कहा कि कोई अमीर सलाखों के पीछे होता है तो कानून अपना काम तेजी से करता है लेकिन, गरीबों के मुकदमों में देरी होती है। अमीर लोग तो जल्द सुनवाई के लिए उच्च अदालतों में पहुंच जाते हैं लेकिन, गरीब ऐसा नहीं कर पाते। दूसरी ओर कोई अमीर जमानत पर है तो वह मुकदमे में देरी करवाने के लिए भी उच्च अदालतों में जाने का खर्च उठा सकता है।

बकौल जस्टिस दीपक वर्मा, ‘आप देखते हैं कि देश को न्यायपालिका पर बड़ा विश्वास है। मेरा मतलब है कि, हम ऐसा बार बार कहते हैं लेकिन उसी समय हम शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छुपा सकते और कहें कि न्यायपालिका में कुछ नहीं हो रहा है। हमें समस्याएं पहचाननी होंगी और उनसे निपटना होगा। इस संस्थान की ईमानदारी ऐसी है कि उसे किसी भी हालत में दांव पर नहीं लगाया जा सकता।’

जस्टिस दीपक गुप्ता ने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की थी। 2004 में वह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट मे जज बने थे। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। तीन साल से अधिक समय तक शीर्ष अदालत में जज रहे।

हालांकि यहां एक बड़ी दिक्कत जजों के सवाल उठाने के तरीके पर भी है। तमाम जज नौकरी में रहने के दौरान चुप्पी साधे उसी व्यवस्था का हिस्सा बने रहते हैं और सवाल उठाने से बचते हैं। उनकी चुप्पी तब टूटती है, जब वो उस व्यवस्था से बाहर आ जाते हैं, ऐसे में उनके बयान से बस एक सनसनी भर होता है और फिर चीजें अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। सवाल यह है कि न्यायपालिका का हिस्सा होने के दौरान तमाम न्यायाधीश इसके खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं खोलते। क्योंकि जब तक न्यायधीश संख्या बल में साथ आकर पुरजोर तरीके से न्याय व्यवस्था के भीतर की खामियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, तब तक स्थिति में बहुत सुधार नहीं आएगा।

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  1. अशोक जी आपने सही सवाल थाय है कि कोई भी जज सेवा में रहते कोई सवाल नहीं उठता। हालांकि सवाल बहुत बड़ा है।

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