लॉकडाउन में आदिवासी और उनकी मुसीबतें

– सुमित वर्मा कोरोना संक्रमण (COVID-19) के कारण लॉकडाउन देश और राज्यों में सबसे ज्यादा परेशानी में आदिवासी समुदाय के लोग हैं. इनमें से ज्यादातर कभी खेतों में तो कभी शहरों में मजदूरी करते हुए जीवनयापन करने वाले हैं. इनके पास न तो खेती वाली बड़ी जमीनें हैं और न ही रोजगार का कोई दूसरा साधन. इनमें से जो अभी भी शहरों में फंसे हैं, उनके सामने दो जून की रोटी का सवाल है और जो अपने गांव घर तक लौट आए हैं, उनमें से ज्यादातर के सामने भी रोजी-रोटी का संकट है. गांवों में, जंगलों में, अपने डेरों, कस्बों, ढानों, मजरे और टोलों में रहने वाले ये लोग इन दिनों भारी मुसीबत में जी रहे हैं. उनका वर्तमान तो जैसे-तैसे कट रहा है, लेकिन आने वाले बारिश के मौसम में और उसके साथ आर्थिक मंदी के दौर में उनका गुजर-बसर कैसे होगा? सरकारी मदद उन तक कब और कितनी पहुंचेगी और तब तक उनकी स्थिति-परिस्थितियां कैसी हो चुकी होंगी, इस पर विचार जरूरी है. संक्रमण, कोरोना, लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंस और क्वारंटाइन जैसी चीजों से बेखबर रहा आदिवासी समुदाय अपनी रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति तक नहीं कर पा रहा. आम दिनचर्या में लगने वाली चीजों के लिए साप्ताहिक बाजार, शहरों से आने वाले छोटे व्यवसायियों पर निर्भर रहने वाले जनजाति समुदाय के लोगों तक सरकारी मदद-राहत उतनी मात्रा में नहीं पहुंच पा रही है, जितना उसका प्रचार-प्रसार हो रहा है. कई राज्यों में राहत सामग्री घोटाला आदि भी जल्द सामने आ जाए, तो हैरानी नहीं होगी. यह तो भला हो कि समय, रबी की फसल का है. गेहूं की कटाई में लगे कुछ मजदूरों को काम मिल गया है तो कुछ इस मौसम ने आम, महुआ जैसे फल आदिवासियों को दे दिए हैं. चिंता है कि आने वाले बारिश के दिनों में जब आदिवासी को कहीं काम नहीं मिल सकेगा तब संकटमोचन कौन होगा? सरकारी मदद, ऊंट के मुंह में जीरा बात करें, भारत के हृदय प्रदेश, मध्य प्रदेश की तो यहां, सरकार गिराने और बनाने के खेल ने आदिवासियों को हमेशा ही हाशिए पर रखा है. एक-दो नामों को छोड़ दें तो यह वर्ग हमेशा से सही नेतृत्व से वंचित बना हुआ है. चुनावों के दौरान राजनीतिक दल तमाम लुभावने वादे करते हैं, लेकिन सरकार बन जाने के बाद न तो पक्ष और न ही विपक्ष आदिवासियों की ओर ध्यान देता है. आदिवासियों के मुद्दे आज भी वैसे ही चिंताजनक हैं, जैसे दशकों पहले हुआ करते थे. कोरोना वायरस के कारण उपजी बीमारी के इस दौर में भी आदिवासी लाचार, मजबूर और तंगहाली में जी रहे हैं. एक खबर की बानगी देखिए, मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बैतूल के चिचोली विकासखंड के सुदूर आदिवासी अंचल टोकरा के ग्राम मालीखेड़ा में जब आदिवासियों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने राशन के लिए गुहार लगाई. बमुश्किल उन तक कुछ सरकारी राशन पहुंचा. फोटो खिंचवाने और राशन देने की रस्मों के बाद वे अपने पेट की आग बुझा पाए. हालात फिर वही पुराने जैसे हैं. कमोबेश ऐसा ही हाल सभी आदिवासी क्षेत्रों का है. कुछ जगह वन विभाग, पुलिस विभाग या पंचायत विभाग के माध्यम से आदिवासियों तक राशन पहुंचाया जा रहा है, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरा जितना ही है. सरकारी अमला भी अपनी तासीर नहीं छोड़ रहा तो आदिवासियों की बसाहटें भी दुर्गम स्थानों पर हैं, जहां पहुंच पाना कुछ कठिन होता है. सरकार की प्राथमिकता में नहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासी दो पाटों के बीच पिस रहे हैं. सरकारी दुश्वारियां और नक्सलियों के बीच आदिवासी अपने घर, अपने कस्बों और अपनी ही धरती पर लाचार हैं. कोरोना महामारी के इस दौर में कहीं आदिवासियों तक सरकारी मदद-राहत और जानकारियां नहीं पहुंच पाती हैं, तो कहीं सरकारी नियम कानून उनके लिए दुविधा बन जाते हैं. नक्सलियों के डर की आड़ में अधिकारी-कर्मचारी भी गांव-गांव तक जाने से बचते हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो आदिवासी और उनकी समस्याएं कभी, किसी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहीं. शहरों, कार्यकर्ताओं, पार्टी, स्वजनों और खुद के विकास में उलझे नेता-अफसरों ने कभी आदिवासियों की दिक्कतों को समझने तक की जहमत नहीं की. इन दिनों सीमावर्ती आंध्र प्रदेश के इलाकों में मिर्ची तुड़ाई के लिए गए आदिवासियों को वापस अपने गांव आने के लिए कोई साधन नहीं मिला. ये उनकी जीवटता थी कि बीच जंगल वाले रास्ते से कई किलोमीटर पैदल चलते हुए वे अपने गांव पहुंचे. ऐसा देखा जाए तो राजधानी रायपुर से करीब 500 किमी दूर बसे इन आदिवासियों ने बिना उफ किए पहले अपना चेकअप कराया और उसके बाद ही अपने घरों में दाखिल हुए. चेकअप के दौरान भी सोशल डिस्टेंसिंग और सुरक्षा के लिए गमछे का उपयोग किया. प्रकृति ही सहारा आदिवासियों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मनीष भट्ट बताते हैं कि कोरोना के इस दौर में तो छोड़िए आम दिनों में भी हालात बदतर रहते हैं. सरकारें चाहें जितने दावे कर लें, कभी कोई योजना आदिवासियों तक सही मायनों में नहीं पहुंच पाती. बंदरबांट तो अभी भी चल रही है. लेकिन आदिवासियों की खाद्य समझ और प्रकृति से उनका सीधा संबंध ही इन दिनों बड़ा सहारा है. सबसे बड़ी बात है, जादुई फसल महुआ का मौसम होना, इसके सहारे कुछ दिन जरूर कट जाएंगे. कुछ गेहूं की कटाई से काम मिल जाएगा, लेकिन बारिश के दिनों में तो हालात बिगड़ेंगे ही. कुछ आदिवासियों ने अपने आंगन में सब्जी-भाजी आदि उगा रखी है, जिससे उनका काम चल रहा है. आदिवासी, सरकार या किसी से भी फ्री में कुछ नहीं लेते हैं, यह उनका स्वाभिमान है. यदि वे कुछ लेने भी आएंगे तो उसकी भरपाई के लिए कुछ न कुछ दे जाते हैं. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए सही मायनों में काफी कुछ करना बाकी है. झारखंड, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों के आदिवासियों की हालत भी ऐसी ही है. राजस्थान में भी आदिवासी समाज को लॉकडाउन से जूझना पड़ रहा है. गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान से जुड़ा राजस्थान का बांसवाड़ा जिले में भी आदिवासियों को पेट भरने के लिए समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. इन दिनों में प्रकृति से मिलने वाली साग-भाजियों से गुजारा चल रहा है. आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा के लिए उनका अपना सदियों पुराना प्रबंधन है. वे थोड़ी बहुत खेती, सब्जी-भाजी, जंगली जड़ी-बूटी, वनोपज, पशुपालन और उनके उत्पाद से गुजर बसर कर लेते हैं. लेकिन रोजगार की तलाश में गुजरात और मध्यप्रदेश जाने वाले आदिवासी मजदूरों के सामने आने वाले दिन चुनौती भरे होंगे. डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं. यह न्यूज 18 से साभार प्रकाशित किया जा रहा है।

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी और आरक्षित वर्ग का आपसी द्वंद

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने आंध्र प्रदेश में पिछले दस साल से लागू व्यवस्था को बदल दिया है। तो वहीं जजों की बेंच ने जजमेंट के दौरान आरक्षण को लेकर जो बातें कही है, उससे आरक्षित वर्ग में बेचैनी शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आंध्र प्रदेश के संदर्भ में आया है। जहां के कुछ जिलों में अनुसूचित जनजातियों के लिए सौ फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। शीर्ष अदालत ने हालांकि अब तक नौकरी पाए लोगों की नौकरी बहाल रखने का आदेश दिया है, जो बड़ी राहत है। दरअसल सन् 2000 में आंध्र प्रदेश ने कुछ अनुसूचित जनजाति बहुल जिलों में टीचर की पोस्ट के लिए 100 फीसदी आरक्षण दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 22 अप्रैल को इस पर सुनवाई करते हुए इसे असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया। पांच सदस्यीय बेंच का नेतृत्व अरुण मिश्रा कर रहे थे। इस पीठ में जस्टिस अरुण मिश्रा के अलावा जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत शरण, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस अनिरुद्ध बोस शामिल थे। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमाम राज्य सरकारों को चेताया कि भविष्य में कोई भी राज्य कभी भी आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज़्यादा नही कर सकता। 152 पन्नों के जजमेंट में पांच जजों की पीठ ने कई ऐसी बातें भी कही है, जिससे एससी-एसटी वर्ग के भीतर बेचैनी शुरू हो गई है। कोर्ट ने यह कह कर नई बहस शुरू कर दी है कि- आरक्षण का फायदा उन लोगों को नहीं मिल रहा है, जिन्हें सही मायने में इसकी जरूरत है। आरक्षण का लाभ उन ‘महानुभावों’ के वारिसों को नहीं मिलना चाहिए जो 70 वर्षों से आरक्षण का लाभ उठाकर धनाढ्य की श्रेणी में आ चुके हैं। हम वरिष्ठ वकील राजीव धवन की इस दलील से सहमत है कि आरक्षित वर्गों की सूची पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जजों की संविधान पीठ ने कहा- ऐसा नहीं है आरक्षण पाने वाले वर्ग की जो सूची बनी है वह पवित्र है और उसे छेड़ा नहीं जा सकता। आरक्षण का सिद्धांत ही जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाना है। सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की सूची फिर से बनानी चाहिए। सरकार का दायित्व है कि सूची में बदलाव करे जैसा कि इंद्रा साहनी मामले में नौ सदस्यीय पीठ ने कहा था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ की एक और टिप्पणी भी आरक्षण के ढांचे को बदलने में उसकी उत्सुकता की ओर इशारा कर रहा है। पीठ ने कहा- ऐसा देखने को मिला है कि राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए आयोग की रिपोर्ट में सूची में बदलाव की सिफारिश की गई है। आयोग ने सूची में किसी जाति, समुदाय व श्रेणी को जोड़ने या हटाने की सिफारिश की है। जहां ऐसी रिपोर्ट उपलब्ध है वहां राज्य सरकार मुस्तैदी दिखाकर तार्किक तरीके से इसे अंजाम दे। संविधान पीठ ने जो टिप्पणियां और सुझाव दिए हैं, वह तब आए हैं, जब कुछ दिन पहले ही कोर्ट कह चुका है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत की इन टिप्पणियों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोर्ट आरक्षण के मूल सिद्धांतों में बदलाव क्यों चाहता है, और उसके लिए बेचैन क्यों है। दूसरी बात कि क्या सच में अब वक्त आ गया है, जब आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए और जो लोग आरक्षण लेकर संपन्न हो गए हैं, उन्हें अब आरक्षण छोड़ देना चाहिए? दरअसल आरक्षित वर्ग के भीतर भी ऐसी आवाजें उठती रहती हैं। आरक्षण मिलने के बाद दलितों में भी एक छोटा तबका ऐसा तैयार हो गया है, जो अमीर है। जिसे व्यवस्था का लगातार फ़ायदा हो रहा है। हालांकि ये दलितों की कुल आबादी का महज़ 10 फ़ीसदी है। बाबासाहेब आम्बेडकर ने कल्पना की थी कि आरक्षण की मदद से आगे बढ़ने वाले दलित, अपनी बिरादरी के दबे-कुचले वर्ग की मदद करेंगे। ऐसा हुआ तो लेकिन ऐसा सोचने वालों की संख्या बहुत कम है। हुआ ये है कि तरक्की पा चुका दलितों का एक बड़ा हिस्सा, दलितों में भी सामाजिक तौर पर ख़ुद को ऊंचे दर्जे का समझने लगा है। दलितों का ये क्रीमी लेयर बाक़ी दलित आबादी से दूर हो गया है। कई तो अपनी पहचान छुपाकर रह रहे हैं। ऐसे में जिन लोगों तक अभी आरक्षण नहीं पहुंचा है, वह अक्सर आगे बढ़ चुके लोगों से आरक्षण छोड़ने की मांग करते हैं। उनके तर्कों को देखिए-Baba Saheb Ambedkar
  • जो लोग अपने जीवन में सफल हैं और जिनके बच्चे अच्छी नौकरियों में आकर लाखों कमा रहे हैं, उन परिवारों को अब आरक्षण छोड़ देना चाहिए।
  • जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं, उनके बच्चों को आरक्षण नहीं लेना चाहिए। क्योंकि वह गैर आरक्षित श्रेणी में प्रतियोगिता के लिए काबिल होते हैं।
  • जिस तरह एक आरक्षित वर्ग का युवक तमाम सुविधाओं में पढ़ने वाले गैर आरक्षित वर्ग के सुविधा संपन्न युवक से कमतर होता है, उसी तरह सुविधा संपन्न आरक्षित वर्ग का युवक भी उससे बेहतर है। ऐसे में उसके सामने वही चुनौती होती है, जिसकी वजह से आरक्षण दिया गया है।
  • प्रारंभिक तौर पर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में क्रिमिलेयर का सिद्धांत लागू किया जा सकता है, ताकि इन नौकरियों में सिर्फ आर्थिक तौर पर पिछड़े आरक्षित श्रेणी के युवकों को ही मौका मिले।
  • जो भी व्यक्ति सिविल सेवा, प्रोफेसर्स, एमबीबीएस डॉक्टर, सांसद जैसे ग्रेड ‘ए’ की नौकरी में है, उनके बच्चों को वही सुविधाएं और शिक्षा मिलती है, जो गैर आरक्षित वर्ग के संपन्न लोगों को मिलती है। ऐसे में उनके परिवार की अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिले। हां, अगर उस परिवार में अगली गैर आरक्षण वाली पीढ़ी सफल नहीं होती है तो फिर उसकी अगली पीढ़ी को आरक्षण दिया जा सकता है।
तो वहीं आरक्षित श्रेणी के भीतर एक वर्ग ऐसा भी है, जो आरक्षण के भीतर क्रीमीलेयर की बहस को खारिज करता है। वह आरक्षण को पूरे आरक्षित वर्ग के लिए जरूरी बताता है। वह मानता है कि आरक्षण पूरे समुदाय के लिए है, और सभी को मिलना चाहिए। अब उसके तर्क को देखते हैं-
  • आरक्षण में किसी तरह के क्रीमीलेयर के विरोधियों का तर्क है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है और यह यथास्थिति में कायम रहना चाहिए।
  • उनका तर्क होता है कि समाज का बड़ा तबका काफी पीछे है। ऐसे में तमाम नौकरियों के लिए उनमें योग्यता नहीं होती है। ऐसे में अगर कथित क्रीमीलेयर वर्ग नहीं रहेगा तो सारी नौकरियों की सीटें खाली रह जाएंगी।
  • उनका यह भी तर्क होता है कि सिर्फ किसी एक पीढ़ी के आगे बढ़ने से यह मान लेना की उसे आरक्षण की जरूरत नहीं है, गलत होगा।
ये तमाम बहस पिछले एक दशक में बढ़ी है। हालांकि इस बीच एक सच यह भी है कि 1997 से 2007 के बीच के दशक में 197 लाख सरकारी नौकरियों में 18.7 लाख की कमी आई है। ये कुल सरकारी रोज़गार का 9.5 फ़ीसद है। इसी अनुपात में दलितों के लिए आरक्षित नौकरियां भी घटी हैं। इसलिए आने वाले वक्त में सरकारी नौकरियों की लड़ाई का कोई फायदा नहीं होने वाला। लेकिन आरक्षण को लेकर जो बहस चल रही है, अब आगे बढ़ चुके वर्ग को अपने ही गरीब भाईयों के बारे में जरूर सोचना चाहिए।

पालघर हिंसा के दोषी वो, जिन्होंने इंसान को इंसान का दुश्मन बन जाने दिया

मुंबई से 125 किमी दूर पालघर में एक भयानक घटना हुई है। गढ़चिंचले गांव के पास हत्यारी भीड़ ने दो साधुओं और एक कार चालक को कार से खींच कर मार डाला। इनमें से एक 70 वर्षीय महाराज कल्पवृक्षगिरी थे। उनके साथी सुशील गिरी महाराज और कार चालक निलेश तेलग्ने भी भीड़ की चपेट में आ गए। तीनों अपने परिचित के अंतिम संस्कार में सूरत जा रहे थे। मौके पर पुलिस पहुंच गई थी भीड़ को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन भीड़ ने उल्टा पुलिस पर ही हमला कर दिया। पुलिस पीड़ितों को अस्पताल ले जाना चाहती थी तो भीड़ औऱ उग्र हो गई। पुलिस की गाड़ी तोड़ दी। पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। किसी तरह अस्पताल लाया गया जहां उन्हें मृत घोषित किया गया। महाराष्ट्र पुलिस ने हत्या के आरोप में 110 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस घटना के बाद बवाल मचा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार से रिपोर्ट तलब कर ली है, तो सोशल मीडिया पर भी बवाल मचा है। जहां लोग इस घटना की निंदा कर रहे हैं तो वहीं एक बड़े वर्ग के निशाने पर सांप्रदायिकता के विरोधी लोग भी हैं। सेकुलर समर्थकों से इस मामले पर उनकी राय मांगी जा रही है। यूं तो इस घटनाक्रम को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस मामले में एक पक्ष यह भी है कि हमला करने वाले और जिनकी इस हमले में जान गई है, दोनों एक ही धर्म से ताल्लुक रखने वाले लोग हैं। महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने इस बात की पुष्टि की है। इस कारण यह मामला धार्मिक और सांप्रदायिक होने से बच गया है। हालांकि इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर देश में यह नौबत क्यों आन पड़ी है कि कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को पीट कर मार डाल रहा है। लोगों को यह हिम्मत कहां से मिल रही है कि वह अगर किसी व्यक्ति को पीट कर मार भी डालें तो कानून कुछ नहीं करेगा। क्योंकि पहलू खान से लेकर तमाम मामलों में तो कुछ ऐसा ही दिखा है। अगर कोई गुनहगार है भी तो किसको हक है कि उसे पीट कर मार डाले। समाज के बीच गलतफहमियां हो जाती है। किसी व्यक्ति के बारे में भी गलत शक हो जाता है। उसके साथ कई बार मारपीट की घटना भी घटती है, लेकिन किसी को इतना पीटना कि उसकी जान चली जाय यह अमानवीय है। अगर सरकारें और प्रशासन ने पहले इस तरह के मामलों में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की होती तो आज पालघर की घटना भी नहीं होती। क्योंकि जब जनता को यह यकीन हो जाता है कि ‘भीड़’ के रूप में वह कोई भी गलत काम कर सकते हैं तो फिर उसे सही और गलत का फर्क समझ में नहीं आता। वह सही और गलत जानने की कोशिश भी नहीं करता। इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल सरकारों पर है, जिन्होंने इस तरह का माहौल बन जाने दिया। उस प्रशासन पर है, जिसने सत्ता के दबाव में ही सही इंसान को इंसान का दुश्मन बनने से नहीं रोका। खून के छींटे सफेदपोशों के सफेद कुर्ते पर है।

कोटा में कोरोना और लॉकडाउन की ऐसी तैसी

अपने टी. वी. स्क्रीन पर नजर डालिए, कोटा में हजारों छात्र बस पकड़े के लिए उमड़ पड़े हैं, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग, न को कर्फ्यू न धारा 144. कर्नाटक के कलबुर्गी में सिद्ध लिंगेश्वर मंदिर में हजारों की भीड़ आप देख चुके हैं। उनके लिए कोई नियम नहीं। हां मामला अगर मुसलमानोंसे जुड़ा होता है या मेहनतकश गरीबों से तो बड़ा मुद्दा बन चुका होता। पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के लिए कोई नियम नहीं। कार्पोरेट घरानों, फिल्मी सितारों, खेल सितारों, नौकरशाहों और अन्य लोगों के बेटे-बेटियों को कैसे देश लाया गया। यह सब धीरे-धीरे सामने आ रहा है, इसमें से कुछ को तो बिना जांच के सीधे उनके घर भेज दिया गया है। मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य सचिव के बेटे और उनकी मां ने तो मध्य प्रदेश के पूरे स्वास्थ्य महकमें के बड़े अधिकारियों को कोरोना के चपेट में ला दिया। अमीरो के लिए किए गए विशेष इंजताम पर मध्यवर्ग उंगली उठा रहा था और उसे भी खुश करने की कोशिश हो रही है, उसका एक प्रमाण कोटा से 30 हजार भावी डाक्टर-इंजीनियरों को लाने की तैयारी है, जिसमें 8 हजार उत्तर प्रदेश के हैं। इसके उलट आप ने देखा होगा कि एक प्रवासी मजदूर रो-रोकर कह रहा था कि मेरे पिता जी की मौत हो गई है, मां अकेली है, मुझे जाने दीजिए। पुलिस उस पर लाठियां भांज रही थी। एक बूढ़ा प्रवासी मजदूर राशन लेने गया, उसे बुरी तरह पीटा गया। मुंबई में किस तरह घर जाने के लिए बेताब प्रवासी मजदूरों की पिटाई हुई। ऐसे अनेकों रूला देने वाले दृश्य हैं। सारे नियम, सारे डंडे, सारी गालियां, सारे अपमान, सारे अभाव और सारे दुख मेहनतकश लोगों के लिए। मेहनकशों की स्थिति देखकर बार-बार मार्क्स के कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र का यह कथन याद आ रहा है, मेहनतकशों तुम्हारे खून-पसीने से ही दुनिया का सारा वैभव रचा गया है, ये सारी अट्टालिकाएं तुमने खड़ी की हैं, तुम्हारे की खून-पसीने को निचोड़ कर ये बड़े-बड़े पूंजीपति बने हैं, तुम्हारे की खून-पसीने की कमाई से अमीरजादे विलासिता और अय्याशी करते हैं और उसी का टुकड़ा मध्यमवर्ग पाता है, इसके बदले में अमीरजादों की चाटुकारिता करता और उनकी ओर ही देखता है। सारी सरकारें इन्हीं अमीरों-पूंजीपतियों की मैनेंजिंग कमेटी की तरह काम करती हैं, जो काम तो उच्च मध्यवर्ग के लिए करती है, कुछ मध्यवर्ग को भी दे देती हैं और बार-बार नाम लेती हैं, मेहनतकश गरीबों का, क्योंकि उनका वोट हासिल करना है और सबसे बड़ी जरूरत उनके श्रम को निचोड़ने की है, क्योंकि मजदूरों का श्रम निचोड़े बिना वैभव और विलासिता की उनकी दुनिया एक दिन भी नहीं टिक सकती। मोदी जी के 6 वर्षों का सारा कार्यकाल यह बताता है कि उनके सिर्फ और सिर्फ दो एजेंडे हैं। पहला कार्पोरेट की जेब भरना और उच्च मध्यवर्ग की खुशहाली अय्याशी एव विलासिता को बनाए रखना और मध्यवर्ग को कुछ टुकड़े फेंक देना और मेहनतकश मजदूरों को देने के नाम हिंदुत्व की चाशनी और मुसलमानों से घृणा करना सीखाना। मोदी का दूसरा काम है। हिंदू राष्ट्र के नाम पर उच्च जातीय द्विज मर्दों का बहुजनों और महिलाओं पर वर्चस्व कायम रखना। भारत का उच्च मध्यवर्ग, मध्यवर्ग और कार्परेट-पूंजीपतियों का बहुलांश- उच्च जातियों से बना हुआ है। यह ब्राह्मणवाद-पूजीवाद का गठजोड़ हैं, मेहनतकशों का शोषण और उनके प्रति घृणा जिसका बुनियादी लक्षण है।
  • लेखक डॉ. सिद्धार्थ वरिष्ठ पत्रकार हैं।

कैसा समाज चाहते थे डॉ. आंबेडकर

14 अप्रैल 2020 को बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की 129वी जयंती थी,जो एक अवसर था उनके विचारों, योगदान, दर्शन और आदर्शों को पुनः स्मरण कर अपनी आज की समकालीन चुनौतियों के समक्ष रख कर समझने का और कम से कम इस यक्ष प्रश्न का उत्तर लेने का कि आखिर कैसा समाज चाहते थे डॉ आंबेडकर? मूल रूप से डॉ. आंबेडकर की प्रेरणा के कई स्रोत रहे है, उसमें से सबसे मुख्य है, 1789 की फ़्रेंच क्रांति जिसके फलस्वरूप “उदारता, समानता और बंधुत्व” जैसे विचार संसार के सामने आये। डॉ. आंबेडकर के “आदर्श समाज” की अवधारणा को अगर हम टटोले तो उनके अनुसार किसी भी समाज की आधारशिला या संरचना इन तीन स्तंभों पर टिकी होनी चाहिए। क्योंकि उनके दर्शन में मानव कल्याण मुक्ति और उत्थान की विशेष प्रधानता थी, और उसके लिए यह बेहद आवश्यक है कि वह इतना स्वतंत्र हो की वो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके, उसे समाजिक क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिले और बिना किसी भेदभाव के तो साथ ही किसी भी समाजिक सौहार्द और सहयोग के बिना किसी मानव का कल्याण नहीं हो सकता, अतः बंधुत्व/ भाईचारा भी उस समाजिक संरचना की आधारशिला होनी चाहिए। डॉ. आंबेडकर के समूल जीवन दर्शन के भी ये तीन शब्द अभिन्न अंग बन गए और फिर किसी भी साहित्य, समाजिक परंपरा, प्रक्रिया या व्यवस्था या विचार के मूल्यांकन करते वक्त किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व उन्होंने उसको इन तीन शब्दों की कसौटी पर रख कर ही अपना विश्लेषण दिया। नेहरू के शब्दों में संविधान की आत्मा कही जाने वाली प्रस्तावना में भी यह तीन शब्द अपनी संवैधानिक और सार्वभौमिक महत्व के साथ विद्यमान है। डॉं. आंबेडकर अपने आदर्श समाज में जाति के जंजाल से मुक्ति चाहते थे क्योंकि जाति व्यवस्था के समाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव उन तीन प्रमुख विचारों के खिलाफ जाते है। जाति व्यवस्था ने स्वतंत्रता की जगह गुलामी, दासता और कदम कदम पर व्यवस्था के नाम पर बंधन ही बांधे, समानता की जगह भेदभाव और कुछ जातियों की वरीयता ने ले ली और सामाजिक बंधुत्व तो दूर दूर तक नहीं था बल्कि छुआछूत और जातीय वैमनस्य हावी था। इस व्यवस्था के चलते समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग केवल जन्म के आधार पर युग युगांतर से आर्थिक उपेक्षा, समाजिक बहिष्करण, शैक्षणिक अयोग्यता के शिकार होने के साथ साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया जिसके परिणामस्वरूप वह वर्ग एक आभावग्रस्त जीवन जीने के अलावा आजीवन एक हेयदृष्टि से समाज की अगड़ी जातियों के द्वारा देखा जाता रहा, जिसने उसको हतोत्साहित कर उसके सोचने समझने निर्णय लेने की शक्ति को क्षीण करता गया। अतः डॉ. आंबेडकर ने अपने विभिन्न भाषणों और लेखों में जाति विनाश की बात तार्किक रूप से की और इसको समाप्त करने हेतु अंतरजातीय विवाह और सामूहिक भोजन को प्रोत्साहन देने के अलावा, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने की वकालत भी की। उनके मत से समाज का संचालन किसी वेद पुराण ग्रन्थ शास्त्र के अनुसार नहीं बल्कि तर्क के आधार पर होनी चाहिए, क्योंकि बहुमत की कुप्रथाएं और जाति समर्थक रीतियाँ ये सब समाजिक वैधता इन ग्रंथो से ही प्राप्त करते है। उन्होंने ही जाति के इस दंश से निकलने के लिए पहले ‘मूकनायक’ फिर ‘बहिष्कृत भारत’ जैसी पत्रिकाएं निकाली, 20 मार्च 1927 में महाड़ सत्याग्रह करते हुए अछूतों को एक सार्वजनिक जलाशय से जल पीने के प्रतिबंध को तोड़ने का आव्हान करते है, इसी कारण 20 मार्च को भारत मे समाजिक सशक्तिकरण दिवस भी मनाया जाता है। तो दलितों के लंदन की गोलमेज सम्मेलन में न केवल दलितों का प्रतिनिधित्व किया बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने हेतु अलग निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव भी रखा। तो साथ ही बाद के शैक्षणिक और रोजगार के अवसर में आरक्षण की व्यवस्था में एक बड़ा योगदान डॉ. आंबेडकर का ही था। डॉ. आंबेडकर को केवल जाति के आयाम पर मानव कल्याण के रूप में आरेखित कर समझना उनके योगदान और विचारों को सीमित करना होगा। डॉ. आंबेडकर के वंचित की परिभाषा में दलितों के साथ-साथ महिलाएं भी आती थी। उनके अनुसार भारतीय समाज में महिलाओं के साथ कुछ कम भेदभाव और अत्यचार नहीं हुआ है। डॉ आंबेडकर का ही कहना था कि मैं किसी भी समाज की प्रगति का मूल्यांकन उस समाज की महिलाओं की प्रगति के आधार पर करूँगा। वह डॉ. आंबेडकर ही थे जिन्होंने सर्वप्रथम मातृत्व लाभ बिल को बॉम्बे विधान परिषद में वर्ष 1928 में पेश किया, और यह तर्क रखा कि एक महिला को संतान के जनन के पूर्व और उसके उपरांत आराम की आवश्यकता होती है, अतः उसे उसकी छूट मिलनी चाहिए। डॉ आंबेडकर ने ही वायसराय के कार्यपालिका परिषद के श्रम मंत्री रहते हुए पुरुष और स्त्री दोंनो को समान कार्य समान वेतन का प्रस्ताव रखा। वह डॉ. आंबेडकर ही थे जिन्होंने महिला के सशक्तिकरण और स्वतंत्रता के मार्ग को प्रशस्त करने वाले हिन्दू कोड बिल को पेश किया और (जिसमें महिलाओं को संपत्ति के अधिकार, अंतरजातीय विवाह को कानूनी वैधता, तलाक का अधिकार, पुरुषों की बहुविवाह समाप्ति आदि शामिल था। सदन में इसके लगातार विरोध के चलते निराश होकर उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा तक दे दिया। ग्रन्विल ऑस्टिन के शब्दों में भारत के प्रथम समाजिक दस्तावेज कहें जाने वाले संविधान को बनाने वाली संविधान सभा की ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष पद बनने का अवसर बाबासाहब आंबेडकर के हाथों लगा तो उन्होंने एक ऐसे संविधान के प्रारूप का शिल्प तैयार किया जो यक़ीनन स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के स्तम्भों पर टिका हुआ था। हर तरह के भेदभाव से मुक्ति, छुआछूत पर प्रतिबंध, धार्मिक व वैयक्तिक स्वतंत्रता, महिलाओं व समाज के पिछड़े तबकों के लिए विशेष प्रावधान की व्यवस्था, दासता और शोषण युक्त मजदूरी से मुक्ति आदि की बात करने वाले प्रावधान शामिल थे। तो जीवन के अपने अंतिम वर्ष में डॉ आंबेडकर ने बौध्द धर्म अपना कर के यह भी स्पष्ट किया कि जिस आदर्श समाज की संकल्पना की बात वह करते हैं, वह उन्हें हिन्दू धर्म के बजाय बुद्ध के धर्म में दिखता है वह निजी जीवन में भी धर्म परिवर्तन से पूर्व भी गौतम बुद्ध से और उनके दर्शन से काफी प्रेरित थे, और उनके इस धर्म परिवर्तन के चलते भारी मात्रा में उनके अनुनायिनो ने भी पहले उनके साथ फिर बाद में धर्म परिवर्तन किया। यह सिलसिला आज भी जारी है। आज समकालीन दौर में भी जब हम मानव की प्रगति के बड़े-बड़े उदाहरण पेश करते हैं तो वहाँ आज भी कभी गुजरात के लिम्बोदरा गांव में मूंछ रखने पर दो दलित युवकों को पीटा जाता है, तो अपने विवाह में घोड़ी चढ़ने पर रतलाम मध्यप्रदेश के दलित युवक पर पत्थर फेंके जाते है। ऊपरी जात वालो के सामने खाना खा लेने पर गुजरात में जितेंद्र की हत्या कर दी जाती है, तो दलित घर की लड़कियों को अगवा कर ले जाना, उनका बलात्कर करना आज भी एक आम और साधारण घटना है। 2010 में NHRC के अनुसार हर 18 मिनट में एक दलित पर अपराध किया जाता है। महिलाओं की स्थिति भी कोई कम बदतर नहीं है। जहां संसद में महिलाओं के एक तिहाई आरक्षण का बिल आज भी लटका हुआ है तो वही महिलाओं पर अत्याचार, बलात्कार और शोषण एक नया तरह का “नॉर्मल” बन कर उभरा है, जहाँ NCRB के 2018 का आंकड़ा बताता है कि हर 15 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है, तो थॉमस रेउटर्स संस्थान ने भारत को दुनिया में महिलाओं के लिए चौथी सबसे असुरक्षित जगह बताई है। ऐसे भयावह विभत्स दौर में डॉ. आंबेडकर अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं और उनकी बात बार-बार जहन में आती है जो उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि हम राजनीतिक रूप से तो अब एक व्यक्ति एक मत के अधिकार के दृष्टि से तो समान है, लेकिन समाजिक और आर्थिक असमानता अभी भी विद्यमान है, जिसकी खाई को हमें पाटना है और एक समतामूलक स्वतंत्र समाज का निर्माण करना है।
  • लेखक सौरभ दूबे जवाहर लाल नेहरू विवि में एम.ए. राजनीतिक विज्ञान के छात्र हैं। संपर्क- Saurabh.aishwary@gmail.com

अंबेडकरी आंदोलन से दूर सफाई कामगार जातियां

  • संजीव खुदशाह
वैसे तो दलितों में विभिन्न जातियां होती है। विभिन्न जातियों के पेशे भी भिन्न भिन्न होते है। लोकिन पूरी दलित जातियों के बड़े समूह को दो भागों में बांट कर देखा जाता रहा है। पहला चमार दलित जातियां जो मरी गाय की खाल निकालती और उसका मांस खाती थी। दूसरा सफाई कामगार जातियां जो झाड़ू लगाने से लेकर पैखाना सिर पर ढोने का काम करती रही है। यदि अंबेडकरी आंदोलन के पि‍रप्रेक्ष्य  में देखे तो चमार दलित जातियां आंदोलन के प्रभाव में जल्दीं आयी और तरक्की‍ कर गई। वही़ सफाई कामगार दलित जातियां अंबेडकरी आंदोलन में थोड़ी देर से आयी या कहे बहुत कम आई और पीछे रह गई। आइये आज इसके विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हैं। क्या है अंबेडकर का प्रभाव (आंदोलन) सन् 1930 में डॉ. आंबेडकर ने देखा की दलितों के साथ बेहद भेदभाव हो रहा है। उनका शोषण नहीं रूक रहा है। तो उन्होंने दलितों से दो अपील की (1) अपना गांव या मुहल्ले  छोड़ दो, शहर में बस जाओं (2) अपना गंदा पुश्तैनी पेशा छोड़ कोई दूसरा पेशा अपनाओ। इन दो अह्वान का असर यह हुआ की शोषण की शिकार दलित जातियों के कुछ लोग अपने गांव को छोड़ कर शहर में आ बसे। इसके लिए उन्हें उच्च जाति के लोग उन्हें गांव छोड़कर जाने नहीं देना चाहते थे। इससे उनकी सुविधाओं और आराम पसंद जिदगी के खलल पैदा हो सकती थी। उनके घर बेगारी कौन करेगा? कौन उनके मरे जानवरों को फेकेगा? दूसरा काम यह हुआ की दलित जातियां मरे जानवरों को फेकने चमड़े निकालने का काम करने से इनकार कर दिया। इसका असर यह हुआ की गांव में दलितों के साथ मार पीट की गई। दलितों की भूखे मरने की नौबत आ गई। बावजूद इसके बहुसंख्यक दलितों ने अपना रास्ता  नही छोड़ा। डॉ. आंबेडकर के आह्वान पर कायम रहे। गौरतलब है ऐसा करने वाली दलित जातियां चमार वर्ग की थी। सफाई कामगारों ने डॉ. आंबेडकर के दोनों आह्वान का पालन नहीं किया। न वे आज भी कर रहे है। आज भी वे अपनी जातिगत गंदी बस्ति‍यों में रहते हैं और अपना वही पुराना गंदा पेशा अपनाए हुये हैं। इसके क्या कारण हैं यह ठीक-ठीक बताना बेहद कठिन है, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों को देखकर कुछ निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। उन्होंने डॉ. आंबेडकर के आह्वान को नहीं माना इसके निम्न कारण हो सकते हैं। 1) सुविधा- उन तक बात नहीं पहुची होगी की अपने शोषणकारी गांव को छोड़ दिया जाय। उस समय (1930) सफाई कामगार जातियां ज्यादातर शहरों में निवास करती थी। वैसा कष्टकारी जीवन उन्हें देखने को नहीं मिला जैसा गांव में दलितों को मिलता है। इसलिए उनको शहर में रहने के करण गांव छोड़ने का प्रश्न नहीं उठता। रही बात उनकी गंदी बस्‍तियों को छोड़ने की तो उन्होंने इसलिए नहीं छोड़ा होगा क्योंकि उन्हें गांव के बनिस्पत कष्ट या शोषण कम रहा होगा। बात जो भी हो यह एक सच्चाई है कि सफाई कामगारों ने अपनी गंदी बस्तियों को नहीं छोड़ा। 2) आत्म-सम्मान नहीं जगा– गंदे पेशे को छोड़ने का आह्वान भी सफाई कामगारों ने अनसुना कर दिया। इसका कारण था उनकी आर्थिक स्थिति, अंग्रेजों/ अफसरों से निकटता जो उन्हें सुविधाभोगी बनाती थी। वे अफसरों की तिमारदारी से लेकर सभी गंदे काम करते थे। वे झाड़ु लगाते, नाली साफ करते, मैला ढोते, उनकी जूठन खाते। उन्हें कभी अपना आत्म-सम्मान खोने का, अपना अपमान होने का एहसास नहीं हुआ। यही सब बाते उन्हें पुश्तैनी पेशे पर एकाधिकार रखने हेतु प्रेरित करती थी। इसलिए उन्होंने डॉ. आंबेडकर के इस आह्वान को भी नहीं माना। 3) सामाजिक नेतृत्व– शुरू से आज तक सफाई कामगार जातियों में जो सामाजिक नेतृत्व मिला चाहे वो जाति पंचायत के रूप में रहा या किसी धार्मिक नेता के रूप में, उन्होंने हमेशा सफाई कामगारों का शोषण किया। उन्हे डॉ. आंबेडकर के विरुद्ध भड़काया। कहा कि वे सिर्फ चमारो के नेता हैं। इस काम में हिन्दूवादी लोग/ राजनीतिक पार्टियां मदद करती रही। सामाजिक नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए नये-नये गुरूओं की पूजा करने लगे, जैसे वाल्मीकि, सुदर्शन, गोगापीर, मांतग, देवक ऋषि आदि आदि। वे सारे काम इन समाजिक नेताओं द्वारा किये गये जो इन्हे अंबेडकरी आंदोलन से दूर रखे जाने के लिए किए जाने जरूरी थे। इसका एक बड़ा कारण गांधी का प्रभाव भी रहा है। 4) गांधी का प्रभाव- इसी दौरान (1932) गांधी ने हरिजन सेवा समिति का गठन किया। वे हरिजन नामक अंग्रेजी पत्र प्रकाशित करते थे। इसके केन्द्र में उन्होंने सफाई कामगारों को रखा। वे हिन्दूवादी थे और वे नहीं चाहते थे कि दलित इस पेशे को छोड़े। उन्होंने उल्टे यह कहा कि ‘यदि मेरा अगला जन्म होगा तो मै एक भंगी के घर जन्म लेना पसंद करूगा।‘’ इसका प्रभाव यह पड़ा की सफाई कामगार अपने पेशे के प्रति झूठे उत्साह से भर गये। आत्मसम्मान के उलट अपने आपको फेविकोल से इस पेशे से जोड़ लिया। अब प्रश्न उठता है कि सफाई कामगारों में आत्मसम्मान कब जागेगा। कब वे अपना पुश्तैनी पेशा एवं गंदी बस्तियां छोड़ेगे। कब अंबेडकरी आंदोलन से जुड़ेगे? 1) सफाई कामगारों के बर्बादी का कारण सामाजिक नेता- सफाई कामगारों का सबसे बड़ा नुकसान उनके ही समाजिक नेताओं ने किया। इतिहास गवाह है कि किसी भी सामाजिक नेता ने डॉं. आंबेडकर के दोनों आह्वान को पूरा करने में कोई रूची नहीं दिखाई। उल्टे वे पार्टी का टिकट पाने और पद पाने के निजी लालाच में डॉ. आंबेडकर के विरुध लोगों को भड़काते रहे। यह प्रकिया आज भी जारी है। 2) धर्मान्धता– यह देखा गया है कि जो दलित जातियां पिछड़ेपन या गरीबी का शिकार रही हैं वे अति धार्मिकता से ग्रसि‍त रही है। सफाई कामगारों के साथ भी यही हुआ। जातीय शोषण से परेशान होकर यदि कोई धर्मांतरण करना चाहता तो उसे किसी काल्पनिक गुरू के सहारे धर्माधता में ढकेल दिया जाता। वे गरीब होने के बावजूद सारे कर्म काण्ड कर्ज लेकर करते। भले ही बच्चों को शिक्षा देने के लिए पैसे न हो। आज भी धर्मांधता सफाई कामगारों के पिछड़ेपन का एक बड़ा करण है। 3) नशा- सफाई कामगार के परिवार ज्यादतर नशे के गिरफ्त में होते है। नशे के कारण वे अपने पेशे आत्म-सम्मान के बारे में सोच नहीं पाते है। नशा करना, घर की महिलाओं से या आपस में झगड़ना उनकी दैनिक दिनचर्या का अहम हिस्सा है। 4) आलस– आमतौर पर सफाई कामगारों द्वारा यह सुना जाता है कि अपना वाला काम करो बड़े मजे हैं। रोज सुबह एक दो घंटा काम करों। दिन भर का आराम। यह देखा गया है कि इस काम में मेहनत कम होने के कारण लोग इस काम को छोड़ना नहीं चाहते। दूसरा कारण यह है कि घरों में सेफ्टी टैक साफ करने के ऊंचे दाम मिलते हैं। अगर एक दिन में दो घरों का काम मिल गया तो इतने पैसे आ जाते है कि एक हफ्ता काम करने की जरूरत नहीं पड़ती। शहरकरण ने आम लोगों को इस काम के ऊंचे दाम देने के लिए मजबूर किया है। तो प्रश्न यह उठता है कि सफाई कामगार कब अपनी गंदी बस्ती और गंदे पेशे को छोड़ेगा? यह तभी होगा जब वह अंबेडकरी आंदोलन से जुड़ेगा। सामाजिक नेता, धर्मांधता, नशे के गिरफ्त से बाहर निकलेगा और आलस को त्यागेगा। उसे खुद सोचना होगा कि क्यों वह आज तक इतना पिछड़ा है। पेरियार कहते हैं कि जिस समाज का आत्मसम्मान नहीं होता वह कीड़ों के एक झुण्ड के बराबर है। इसलिए आत्मसम्मान जगाना होगा। इस काम में समाज के ही अंबेडकरवादी पेरियार वादी बुद्धिजीवियों सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे आना होगा तभी इस समाज में आत्म-सम्मान जागेगा और सफाई कामगार समुदाय अंबेडकरी आंदोलन से जुड़ेगा।
  • लेखक संजीव खुदशाह अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े हैं। सफाई कर्मचारियों पर उनकी लिखी पुस्तक काफी चर्चित है।
  • नोट- डॉ. आंबडेकर और वाल्मीकि समाज पुस्तक मंगवाने के लिए यहां क्लिक करें

डॉ. आंबेडकरः फादर ऑफ मार्डन इंडिया

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण में विभिन्न युग-पुरुषों का योगदान रहा। लेकिन कुछ ऐसे युग-पुरुष भी हुए जिन्होंने प्रचलित व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आया हो। ऐसे ही युग-पुरुषों में बाबा भीमराव अंबेडकर का नाम महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में प्रचलित सामाजिक बुराइयों के प्रति छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध से लेकर कई युग प्रवर्तको द्वारा विरोध का स्वर मुखर किया गया। प्राचीन काल का भक्ति आंदोलन हो या मध्यकाल का भक्ति काल चाहे वह सगुण धारा हो या वह निर्गुण लगभग सभी महापुरुषों के द्वारा भेदभाव वाली सामाजिक व्यवस्था का विरोध किया गया। इसके उपरांत 18वीं शताब्दी में भारत के सामाजिक धार्मिक पुनर्जागरण के काल में भी इन सामाजिक भेदभावपूर्ण व्यवस्था का विरोध किया गया। लेकिन इन सब में बाबासाहब भीमराव अंबेडकर ही एक ऐसे युग-पुरुष हुए जिन्होंने सदियों पुरानी भेदभाव पूर्ण भारतीय समाज के स्वरूप को काट कर अलग कर दिया एवं एक नए भारत के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। भारत के संविधान निर्माता, चिंतक और समाज सुधारक डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू में 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई रामजी सकपाल था। वे अपने माता-पिता की 14वीं और अंतिम संतान थे।  1907 में पास की मैट्रिक परीक्षा उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट हाई स्कूल में दाख़िला लिया। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने अंबेडकर की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें छात्रवृति की सुविधा दी। 1912 में राजनीति विज्ञान और अर्थशात्र में विषय में स्नातक की डिग्री हांसिल की। साल 2013 में वह कोलंबिया युनिवर्सिटी चले गए। इसके उपरांत 1915 में उन्होंने अपनी स्नातकोत्तर (एम॰ए॰) परीक्षा पास की और 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी किया एवं 1923 में डॉक्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री से भी नवाज़े गए। 1920 के दशक के में उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध राजनीतिक क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रखर करते हुए दलित वर्ग के उद्देश्यों के समर्थन के लिए ‘मूक नायक’ नाम से साप्ताहिक शुरू किया। उन्होंने भारत के राज्य सचिव एस मोंटग और विठलभाई पटेल से मुलाकात कर भारत में अछूतों की समस्या पर विचार विमर्श किया। 1926 में अंबेडकर को बम्बई विधानपरिषद के लिए मनोनीत किया गए। इन्होंने 1927 मे ‘बहिष्कृत भारत’ नाम का एक अखबार भी शुरू किया एवं साथ में ही 1927 में महार सत्याग्रह का भी आवाहन किया। इन्होंने तात्कालिक व्यवस्था रीति रिवाज, जाति व्यवस्था एवं परंपराओं का विरोध करते हुए मनुस्मृति का बहिष्कार किया। इसके साथ ही उन्होंने तात्कालिक शीर्ष क्रम के नेताओं को जाति व्यवस्था के मुद्दे पर उदासीनता के कारण उनकी आलोचना भी की। शीर्ष क्रम के नेताओं की उदासीनता के कारण बाबा भीमराव आंबेडकर का विरोध और भी मुखर होने लगा। इस बीच डॉ. आंबेडकर ने दोहरे निर्वाचन की मांग तेज कर दी, जिसे अंग्रेजी सरकार ने मान भी लिया। तब इसके विरोध में गांधीजी भूख हड़ताल पर चले गए। इससे बाबासाहब आंबेडकर पर चौतरफा दबाव बढ़ने लगा, जिसके फलस्वरूप 24 सितंबर 1932 को उन्होंने गांधीजी के साथ पूना पैक्ट समझौता किया। इसके अंतर्गत विधान मंडलों में दलितों के लिए सुरक्षित स्थान बढ़ा। इस समझौते में बाबासाहब आंबेडकर ने दलितों को कम्यूनल अवॉर्ड में मिले अलग निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, बदले में कम्युनल अवार्ड से मिली 78 आरक्षित सीटों की बजाय पूना पैक्ट में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 148 करवा ली। 1940 के दशक में वो संविधान निर्माता के तौर पर सामने आए। 29 अगस्त 1947 को उन्हें नए संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। आज़ादी मिलने के बाद वो पहली सरकार में देश के पहले क़ानून मंत्री बनाए गए। सन् 1951 में उन्होंने संसद में हिन्दू कोड बिल पेश किया। हिन्दू कोड बिल के ज़रिए महिलाओं को सम्पति का अधिकार और तलाक जैसे अधिकार देने की डॉ आंबेडकर वक़ालत कर रहे थे लेकिन कई मामलों में असहमति होते देख कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया था। डॉ आंबेडकर ने ये इस्तीफ़ा अनुसूचित जातियों के प्रति सरकार की उदासीनता और हिन्दू कोड बिल पर मंत्रिमंडल के साथ मतभेदों के कारण दिया था। इंडिया आफ्टर गांधी’ में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि- जवाहरलाल नेहरू और डॉ भीमराव आंबेडकर हिंदुस्तान में यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करवाना चाहते थे। लेकिन जब इस मुद्दे पर बहस छिड़ी तो संविधान समिति लगभग बिखर सी गई। बाद में उन्होंने प्रचलित जाति व्यवस्था के शोषण के स्वरूप विरोध प्रकट करते हुए अपने अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर 1956 को अपने कई अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। बाबासाहब आंबेडकर के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विचार राजनीतिक क्षेत्रः वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के हिमायती थे, जिसमें राज्य सभी को समान राजनीतिक अवसर दे तथा धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। उनका यह राजनीतिक दर्शन व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों पर बल देता है। समानता को लेकर विचारः डॉ. आंबेडकर समानता को लेकर काफी प्रतिबद्ध थे। उनका मानना था कि समानता का अधिकार धर्म और जाति से ऊपर होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना किसी भी समाज की प्रथम और अंतिम नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सामाजिक क्षेत्रः डॉ. आंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज में सुधार के लिए समर्पित था। उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का विशद अध्ययन कर यह बताने की चेष्टा भी की कि भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था, जाति-प्रथा तथा अस्पृश्यता का प्रचलन समाज में कालांतर में आई विकृतियों के कारण उत्पन्न हुई है, न कि यह यहाँ के समाज में प्रारम्भ से ही विद्यमान थी। इन आधारों पर बाबासाहब आंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा तथा अस्पृश्यता का खुलकर विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विचारः डॉ. आंबेडकर भारतीय समाज में स्त्रियों की हीन दशा को लेकर काफी चिंतित थे। उनका मानना था कि स्त्रियों के सम्मानपूर्वक तथा स्वतंत्र जीवन के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हमेशा स्त्री-पुरुष समानता का व्यापक समर्थन किया। यही कारण है कि उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री रहते हुए ‘हिंदू कोड बिल’ संसद में प्रस्तुत किया और हिन्दू स्त्रियों के लिए न्याय सम्मत व्यवस्था बनाने के लिए इस विधेयक में उन्होंने व्यापक प्रावधान रखे। शिक्षा संबंधित विचारः उनका विश्वास था कि शिक्षा ही व्यक्ति में यह समझ विकसित करती है कि वह अन्य से अलग नहीं है, उसके भी समान अधिकार हैं। उन्होंने एक ऐसे राज्य के निर्माण की बात रखी, जहाँ सम्पूर्ण समाज शिक्षित हो। वे मानते थे कि शिक्षा ही व्यक्ति को अंधविश्वास, झूठ और आडम्बर से दूर करती है। शिक्षा का उद्देश्य लोगों में नैतिकता व जनकल्याण की भावना विकसित करने का होना चाहिए। शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो विकास के साथ-साथ चरित्र निर्माण में भी योगदान दे सके। अधिकारों को लेकर विचारः डॉ. आंबेडकर अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों पर बल देते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को न सिर्फ अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए जागरूक होना चाहिए, अपितु उसके लिए प्रयत्नशील भी होना चाहिए, लेकिन हमें इस सत्य को नहीं भूलना चाहिए कि इन अधिकारों के साथ-साथ हमारा देश के प्रति कुछ कर्त्तव्य भी है। श्रमिक वर्ग के लिए कार्यः उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए उल्लेखनीय कार्य किये। पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था। इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ। इसके अलावा उनके प्रयासों से मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम तथा मुआवजा आदि से भी सुधार हुए। उल्लेखनीय है कि उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान के लगभग ज्यादातर श्रम कानून बाबासाहब के ही बनाए हुए हैं, जो उनके विचारो को जीवंतता प्रदान करते हैं। इस प्रकार बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने ना केवल पिछड़े वर्ग के वंचित लोगों कि ना केवल आवाज बने बल्कि उन्हें उनका अधिकार दिलाने में भी महती भूमिका निभाई। उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक बुराइयों जैसे- छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया। इस दौरान बाबासाहब ने विशेषकर महिलाओं, गरीब, दलितों और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे। इसके साथ ही उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण की रूपरेखा भी तैयार की। क्या दुनिया के इतिहास में कोई ऐसा भी  छात्र होगा जो अपनी जाति के कारण क्लास के अंदर ना जा पाया  हो वो दुनिया का बेहतरीन स्कॉलर अपनी कड़ी मेहनत के बल पर  बनकर   उसी देश का संविधान लिखे। संभव नहीं लगता। चाहे अमानवीय मनुस्मृति को ध्वस्त करना, दुनिया में पानी पीने के लिए पहला सत्याग्रह करना हो, पैसे के अभाव में बच्चे तक का सही इलाज नहीं करा पाएं हो, पढ़ने के लिए पैसे के मोहताज हो लेकिन बाद में प्राबल्म ऑफ रुपी नाम से ऐसा शोध किया हो, जिस पर रिजर्व बैंक बन गया। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने डॉ. आंबेडकर को अपना गुरु माना था। लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यक्ति ने अपना सारा जीवन मानवता के लिए समर्पित कर दिया हो, उसके साथ इतिहास ने इतनी बेईमानी क्यों की? क्या यह डॉ. आंबेडकर की जाति के कारण नहीं किया गया? आज कोरोना वायरस से लोग सोशल डिस्टेंसिंग कर रहे हैं, लोग तीन हफ्ते में ही ऊब गए हैं. वहीं समाज का एक बड़ा हिस्सा सदियों से सोशल डिस्टेंसिंग में जी रहा है, उसकी तकलीफ को कौन समझेगा। क्या अब भी महामानव डॉ. आंबेडकर को फादर ऑफ मार्डन इंडिया के रूप में जाना जाएगा? क्या इतिहास उनके साथ अब भी न्याय करेगा। लेखकः मनोज कुमार, ADJ, Sitapur (UP)

गिरफ्तारी से पहले दलित बुद्धिजीवी आनंद तेलतुंबड़े का खुला खत

भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े ने बाबासाहब आंबेडकर की जयंती के दिन दोपहर को एनआईए के सामने सरेंडर कर दिया. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, आनंद तेलतुंबड़े को एनआईए ने गिरफ़्तार किया है, पीटीआई के मुताबिक आनंद तेलतुंबड़े को अदालत ने 18 अप्रैल तक नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी की कस्टडी में भेज दिया है. आत्मसमर्पण करने से पहले आनंद तेलतुंबड़े ने अंग्रेज़ी में एक खुला खत लिखा है, बीबीसी हिन्दी वेबसाइट ने उसका संपादित हिंदी अनुवाद कर प्रकाशित किया है। वह पत्र हम बीबीसी से साभार प्रकाशित कर रहे हैं. आप भी पढ़ें-

“मुझे पता है कि बीजेपी-आरएएस के सुनियोजित शोर और उनकी सेवक मीडिया के दौर में मेरी यह चिट्ठी कहीं खो जाएगी लेकिन मुझे लगता है कि आपसे बात करनी चाहिए, मुझे मालूम नहीं है कि मुझे आपसे बात करने का दूसरा मौका मिले या न मिले.

अगस्त 2018 में जब पुलिस ने गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट के फैकेल्टी हाउसिंग परिसर के मेरे घर पर छापा मारा उसके बाद से मेरी दुनिया पूरी तरह लड़खड़ा गई है. मेरे साथ ऐसी चीज़ें होने लगीं हैं जिनके बारे में मैंने दुस्वप्न में भी नहीं सोचा था. हालांकि मुझे पता था कि मेरे व्याख्यानों के आयोजकों से पुलिस मेरे बारे में पूछताछ करके उन्हें डराती है. मुझे लगा कि वे मेरे भाई और मुझे लेकर शायद गफ़लत में हैं, मेरा वह भाई जो वर्षों पहले हमारे परिवार से अलग हो गया था. जिन दिनों मैं आईआईटी खड़गपुर में पढ़ा रहा था, बीएसएनएल के एक अधिकारी ने मुझे फ़ोन करके अपना परिचय दिया, और बताया कि मेरा फ़ोन टैप किया जा रहा है. मैंने उसका शुक्रिया अदा किया, लेकिन इसके बाद मैंने कुछ नहीं किया, अपना सिम भी नहीं बदला.

इस तरह की घुसपैठ से मैं थोड़ा परेशान हुआ लेकिन मैंने खुद को समझाया कि पुलिस को शायद समझ में आ जाए कि मैं एक सामान्य व्यक्ति हूँ और मेरे व्यवहार में कुछ भी ग़ैरकानूनी नहीं है. पुलिस आम तौर पर जनता के अधिकारों की बात करने वालों को नापसंद करती है क्योंकि वे पुलिस के रवैए पर सवाल उठाते हैं. मैंने कल्पना की कि मेरे साथ ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मैं उसी बिरादरी का हूँ. मैंने अपने आपको एक बार फिर समझाया कि मैं इस भूमिका में ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता ये बात वो लोग समझ जाएँगे क्योंकि मैं अपनी पूर्णकालिक नौकरी में बहुत व्यस्त हूँ.

लेकिन मेरे इंस्टीट्यूट ने निदेशक ने जब सुबह-सुबह फ़ोन करके मुझे बताया कि पुलिस ने परिसर पर छापा मारा है और वे मुझे ढूँढ रहे हैं, तब कुछ सेकेंड के लिए मैं बिल्कुल अवाक रह गया. कुछ ही घंटे पहले दफ़्तर के काम से मैं मुंबई पहुँचा था और मेरी पत्नी पहले से ही आई हुई थी. उसी दिन कई और लोगों के घरों पर छापे और गिरफ़्तारी की खबर के बारे में पता चला तो मैं सदमे में आ गया, मुझे लगा कि मैं किस्मत से बाल-बाल बच गया हूँ.

पुलिस को यह पता था कि मैं कहाँ हूँ और वे मुझे गिरफ़्तार कर सकते थे, लेकिन यह वही बता सकते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया. उन्होंने सिक्यूरिटी गार्ड से जबरन डुप्लीकेट चाभी लेकर हमारा घर खोला, वीडियो बनाया और घर पर दोबारा ताला लगा दिया. यहीं से हमारी मुसीबतों का दौर शुरू हुआ.

वकीलों की सलाह के बाद मेरी पत्नी अगली फ़्लाइट से गोवा पहुँचीं और उन्होंने बिचोलिम थाने में शिकायत दर्ज कराई कि हमारा घर हमारी गैर-मौजूदगी में पुलिस ने खोला है इसलिए अगर उन्होंने वहाँ कुछ प्लांट कर दिया हो तो हम उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं होंगे. उन्होंने अपने नंबर भी दिए ताकि तफ़्तीश के लिए पुलिस हमें फ़ोन कर सके. माओवादी कहानी की शुरूआत से ही पुलिस अजीब तरीके से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने लगी. साफ़ तौर पर इसका मकसद मेरे और गिरफ़्तार किए गए दूसरे लोगों के ख़िलाफ़ जनता में पूर्वाग्रह को बढ़ावा देना था, इसमें मीडिया मददगार की भूमिका निभा रहा था. 31 अगस्त 2018 को पुलिस ने ऐसे ही एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक चिट्ठी पढ़ी, जिसके बारे में बताया गया कि उसे गिरफ़्तार किए गए एक व्यक्ति के कंप्यूटर से बरामद किया गया है, इस चिट्ठी को मेरे ख़िलाफ़ सबूत के तौर पर पेश किया गया. इस चिट्ठी में अस्त-व्यस्त ढंग से एक एकेडेमिक कॉन्फ्रेंस की जानकारी डाली गई थी जिसमें मैंने हिस्सा लिया था, यह जानकारी अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेरिस की वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध थी. शुरू में तो मैं इस पर हँसा लेकिन बाद में मैंने उस पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल मानहानि का मुक़दमा करने का फ़ैसला किया, और मैंने 5 सितंबर 2018 को महाराष्ट्र सरकार को प्रक्रिया के तहत एक चिट्ठी भी लिखी. आज तक महाराष्ट्र सरकार का कोई जवाब नहीं मिला है. जब हाइकोर्ट ने फटकार लगाई तब जाकर पुलिस के प्रेस कॉन्फ्रेंस होने बंद हुए. जब पुणे पुलिस ने मुझे ग़ैर-कानूनी तरीके से गिरफ़्तार किया, उस वक्त मुझे सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण हासिल था, हिंदुत्व के साइबर गिरोह ने मेरे विकीमीडिया पेज से छेड़छाड़ की. यह एक पब्लिक पेज है और मुझे वर्षों तक इसके बारे में जानकारी नहीं थी. पहले तो उन्होंने मेरे बारे में लिखी सारी बातें मिटा डालीं, फिर लिखा गया, “इसका एक माओवादी भाई है, इसके घर पर छापा मारा गया था, इसे माओवादियों के साथ संबंधों की वजह से गिरफ़्तार किया गया है.” वगैरह… कुछ छात्रों ने मुझे बाद में बताया कि जब भी उन्होंने मेरे पेज को ठीक करने की कोशिश की या पेज को एडिट करना चाहा, गिरोह दोबारा आ जाता था और सब कुछ डिलीट करके अपमानजनक चीज़ें डाल देता था. आख़िरकार, विकीमीडिया को बीच में आना पड़ा, और मेरा पेज उनके कुछ नेगेटिव कमेंटों के साथ किसी तरह स्टेबलाइज़ हुआ. इसके बाद मीडिया में हमलों की शुरूआत हुई, आरएसएस से जुड़े नक्सल मामलों के कथित विशेषज्ञों ने हर तरह की अनर्गल बातें कीं. इंडिया ब्रॉडकास्टिंग फ़ाउंडेशन से भी मैंने चैनलों के ख़िलाफ़ शिकायत की लेकिन एक मामूली जवाब तक नहीं मिला. इसके बाद अक्तूबर 2019 में पेगासस जुड़ी ख़बर सामने आई कि सरकार ने मेरे फ़ोन में एक खतरनाक इसराइली स्पाइवेयर डाल दिया था. इस पर मीडिया में थोड़ी देर के लिए तो हंगामा हुआ लेकिन यह गंभीर मामला भी अपनी मौत मर गया. मैं एक साधारण आदमी हूँ जो अपनी रोटी ईमानदारी से कमाता है और अपनी जानकारी से लोगों की हरसंभव मदद अपनी लेखनी के ज़रिए करने की कोशिश करता है. मेरा पाँच दशकों का बेदाग रिकॉर्ड है, मैंने कॉर्पोरेट दुनिया में, एक शिक्षक, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी के तौर पर अलग-अलग भूमिकाओं में देश की सेवा की है. मेरे लेखन की लंबी सूची है जिसमें 30 से अधिक किताबें हैं, ढेर सारे शोध पत्र, लेख, कॉलम और इंटरव्यू हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुए हैं. उन सबमें हिंसा या विध्वंस का कोई समर्थन आपको नहीं मिलेगा. लेकिन मेरे जीवन के अंतिम सालों में बहुत ही दमनकारी यूएपीए कानून के तहत मुझ पर गंभीर अपराध के आरोप लगाए जा रहे हैं. मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति सरकारी प्रोपगैंडा और सरकार-सेवक मीडिया का मुक़ाबला नहीं कर सकता. इस मामले के विवरण इंटरनेट पर बिखरे पड़े हैं, और वे इस बात के लिए काफ़ी हैं कि कोई भी यह समझ सकता है कि यह फर्ज़ी और आपराधिक ढंग से मनगढंत मामला है. एआईएफ़आरटीई की वेबसाइट पर इस मुक़दमे का सारांश पढ़ा जा सकता है. आपके लिए मैं उसे यहाँ रख रहा हूँ. पुलिस ने पाँच पत्रों के आधार पर यह केस तैयार किया है, ये पत्र गिरफ़्तार किए गए दो लोगों के कंप्यूटरों से बरामद किए गए थे, इस तरह के कुल 13 पत्रों की बरामदगी की बात कही गई थी. मेरे पास से कुछ बरामद नहीं किया गया. पत्रों में “आनंद” लिखा है जो भारत में एक बहुत ही आम नाम है लेकिन पुलिस बिना किसी शक या सवाल के उस आनंद की पहचान मेरे बतौर कर रही है. इन पत्रों के स्वरूप और उनकी सामग्री चाहे कुछ भी हो, इसे जानकार खारिज कर चुके हैं, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस भी इसमें शामिल हैं. पूरी न्यायपालिका में वे अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने सबूतों के प्रकार पर ग़ौर किया. इन पत्रों में ऐसी कोई बात नहीं लिखी है जिसे किसी भी तरह से किसी मामूली अपराध से भी जोड़ा जा सके. लेकिन दमनकारी यूएपीए कानून की आड़ में ये सब कुछ कर रहे हैं जो बचाव का कोई रास्ता नहीं देता, मैं जेल भेजा जा रहा हूँ. केस को आप इस तरह समझ सकते हैं. अचानक एक पुलिस दल आपके घर आता है, बिना कोई वारंट दिखाए आपके पूरे घर को बिखेरकर रख देता है. अंत में आपको गिरफ़्तार करके एक पुलिस लॉकअप में रखा जाता है. कोर्ट में वे कहते हैं कि एक चोरी के मामले (या कोई और मामला) की जाँच के दौरान, फलाँ शहर (भारत का कोई भी शहर) में एक कंप्यूटर या पेन ड्राइव फलाँ व्यक्ति (कोई भी नाम) से मिला. इसमें किसी प्रतिबंधित संगठन के किसी सदस्य की लिखी हुई चिट्ठियाँ मिली हैं जिसमें अमुक नाम है, और पुलिस के हिसाब से वह अमुक व्यक्ति आप ही हैं, कोई और नहीं. वे आपको एक गहरी साज़िश के भागीदार की तरह पेश करेंगे. अचानक आप पाएँगे कि आपकी पूरी दुनिया उलट-पुलट हो गई है. आपकी नौकरी चली गई है, परिवार का घर छिन गया है, मीडिया आपको बदनाम कर रही है और आप इस सबको रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते. पुलिस अदालत को राज़ी करने के लिए सीलबंद लिफ़ाफ़े पेश करेगी कि आपके ख़िलाफ़ पहली नज़र में मामला बनता है इसलिए गिरफ़्तार करके आपसे पूछताछ की अनुमति दी जाए. जज यह दलील नहीं सुनेंगे कि कोई सबूत नहीं है, वे कहेंगे कि सुनवाई में देखा जाएगा. कस्टोडियल पूछताछ के बाद आपको जेल भेज दिया जाएगा. आप ज़मानत की अर्ज़ी लगाएँगे और अदालतें उसे रद्द कर देंगी. इस तरह के मामलों में ऐतिहासिक तौर पर डेटा यही दिखाता है कि व्यक्ति को ज़मानत मिलने या दोषमुक्त साबित होने में 4 से 10 साल तक का समय लगता है. और ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है. ‘राष्ट्र’ के नाम पर ऐसा दमनकारी कानून लागू करके बेकसूर लोगों से उनकी नागरिक स्वतंत्रता और सभी संवैधानिक अधिकार छीन लेने को वैधानिक मान्यता मिल जाती है. अंध राष्ट्रवाद को राजनीतिक वर्ग ने हथियार बना लिया है और उसके ज़रिए लोगों का ध्रुवीकरण करके प्रतिरोध को ख़त्म किया जा रहा है. इस सामूहिक उन्माद में तर्क को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी गई है, शब्दों के अर्थ उलट गए हैं, देश को बर्बाद करने वाले देशभक्त और निस्वार्थ सेवा करने वाले देशद्रोही बना दिए गए हैं. मैं अपने भारत को बर्बाद होते हुए देख रहा हूँ. मैं बहुत क्षीण आशा के साथ इस संकट के समय में आप सबको लिख रहा हूँ. मैं एनआईए की कस्टडी में जा रहा हूँ. मैं नहीं जानता कि आपसे दोबारा कब बात कर पाऊँगा. मैं उम्मीद करता हूँ कि आप बोलेंगे, और अपनी बारी आने से पहले बोलेंगे”. –आनंद तेलतुंबड़े

यहां बाबासाहब आंबेडकर की जयंती online मनाईए, विश्व रिकार्ड बनाईए

लॉकडाउन के दौर में बाबासाहब डॉ. आंबेडकर की जयंती को ऑनलाइन मचाने की धूम है। दुनिया भर में फैले अम्बेडकरवादी बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती को अपने-अपने तरीके से ऑनलाइन रूप में मना रहा है। इस दौरान ऑनलाइन प्लेटफार्म का सहारा लेकर दुनिया भर के अम्बेडकरवादी आपस में जुड़कर संवाद कर रहे हैं। नैक्डोर नाम के संगठन ने अम्बेडकर जयंती को मनाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है, इसमें आप संसद भवन में लगी बाबासाहेब की प्रतिमा पर फूल-माला पहनाकर बाबासाहेब को नमन कर सकते हैं. संस्था के अशोक भारती ने अपील की है कि इस तरह हम एक विश्व रिकार्ड बना सकते हैं। दलित दस्तक/ बहुजन टुडे भी आपसे आग्रह करता है कि आप दुनिया के चाहे जिस हिस्से में हैं, बाबासाहेब को नमन करिए। लिंक नीचे हैं, इस लिंक पर क्लिक कर आप अम्बेडकर जयंती के मौके पर बाबासाहेब को नमन कर सकते हैं। इस लिंक पर क्लिक करिए, बाबासाहेब के सामने मोमबत्ती जलाइए, उन्हें फूल माला पहनाइए  

डॉ. आंबेडकर की लोकतांत्रिक दृष्टि

  • कँवल भारती
डॉ. आंबेडकर की विचारधारा के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं- एक लोकतान्त्रिक, और दूसरा वर्गीय. पहले उनके लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण को लेते हैं. जिस दौर में हिन्दू महासभा के नेता, आज़ादी के बाद के भारत के लिए, हिन्दू राज की वकालत कर रहे थे, हिंदुओं को काल्पनिक राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रहे थे, और मुसलमानों को पृथक राष्ट्र बताकर उनके विरुद्ध पूरे देश में नफरत फैला रहे थे, राजनीति के उस निर्णायक दौर में डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की थी कि- “अगर हिन्दू राज की स्थापना सच में हो जाती है, तो निस्संदेह यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा. चाहे हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दूधर्म स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के लिए एक खतरा है. यह लोकतंत्र के लिए असंगत है. किसी भी कीमत पर हिन्दू राज को स्थापित होने से रोका जाना चाहिए.” इसी के साथ, अंग्रेजों से सत्ता का हस्तांतरण किए जाने के अवसर पर उन्होंने घोषणा की थी- “भारत में सच्चा लोकतंत्र केवल गैर-ब्राह्मणों के हाथों में सुरक्षित रह सकता है. डॉ. आंबेडकर के लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण को समझने के लिए इन दोनों घोषणाओं को समझना आवश्यक है. बेहतर होगा, कि इसे आज़ादी के बाद जो लोकतंत्र स्थापित हुआ, उसके व्यवहार से समझा जाए. लोकतान्त्रिक भारत का प्रथम राष्ट्रपति एक सौ एक ब्राह्मणों के पैर धोकर अपनी गद्दी पर बैठा, और स्वतंत्र भारत के सभी राज्यों के प्रथम मुख्यमंत्री ब्राह्मण नियुक्त किए गए. जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, जहाँ मेहरचंद महाजन प्रधानमंत्री थे, जो वैश्य थे. अपवाद के लिए भी किसी राज्य में कोई गैर-ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं था. मंत्रिमंडलों में भी नब्बे फीसदी ब्राह्मण थे. कहने को भारत में लोकतंत्र कायम हुआ था, पर वास्तव में लोकतंत्र की आड़ में बाकायदा हिन्दू राज कायम किया जा चुका था, जिसके खतरे की चेतावनी डा. आंबेडकर दे चुके थे. याद रहे, ब्राह्मण राज ही हिन्दू राष्ट्र की बुनियाद है। आरएसएस जिस हिन्दू राज को स्थापित करने के लिए आठ-नौ दशकों से मेहनत कर रहा था, उसका पथ-प्रशस्त असल में कांग्रेस ने ही किया था. कांग्रेस के नेताओं में पैर से लेकर सिर की चुटिया तक वर्णव्यवस्था समाई हुई थी. कांग्रेस की ब्राह्मण सरकारों ने वर्णव्यवस्था को बनाए रखने में सारी ताकत लगाई. उन्होंने कोई धर्मनिरपेक्ष राज्य कायम नहीं किया, वरन अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दू राज ही कायम किया था. नगर-नगर में रामलीला कमेटियों का गठन कांग्रेस ने ही कराया था. लगभग सभी कमेटियों के अध्यक्ष कांग्रेसी थे. आज वे कमेटियां आरएसएस के हाथों में हैं. यही नहीं, कांग्रेस ने ही तुलसी और पुराणों के राम को घर-घर में पहुँचाया. उसने ही रामचरितमानस की चतुश्शती धूमधाम से मनाई. कांग्रेस के कार्यकाल में ही कबीर और रैदास को ठिकाने लगाने का काम ब्राह्मणों ने किया. बहुजन आलोचक चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने 1966 में इस विषय पर “लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही” नाम से एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था, ‘आजकल ब्राह्मणशाही को बल पूंजीपतियों से मिलता है, नेताओं से मिलता है, प्रशासकों से मिलता है और पूरी कोशिश यह हो रही है कि ब्राह्मणी संस्कृति को भारत का राष्ट्र-धर्म और राष्ट्रीय संस्कृति बना दिया जाए.’ यह आज भी सच है. आज ब्राह्मणशाही का संचालक आरएसएस और उसकी राजनीतिक पार्टी भाजपा है. एक पार्टी के रूप में कांग्रेस अपनी करनी की सजा भोग रही है, पर उसके ब्राह्मण तथा सामंती नेता भाजपा में सत्ता-सुख भोग रहे हैं. कांग्रेस की ब्राह्मणशाही ने शोषण की जो खाई दलित वर्गों के लिए खोदी थी, उसे आरएसएस-भाजपा की ब्राह्मणशाही और भी चौड़ी कर रही है. देश के बौद्धिकों ने डॉ. आंबेडकर की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, उसी का परिणाम है कि भारत में लोकतंत्र तो है, पर वह ब्राह्मणवाद से पीड़ित है. उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में स्वतंत्रता, संपत्ति और खुशहाली का अधिकार प्रत्येक नागरिक को होता है, परन्तु लोकतंत्र ने सबसे ज्यादा इसी अधिकार का दमन किया. इस लोकतंत्र ने, स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए भी, गरीबों, दलितों और वंचितों की आर्थिक विषमताओं को लगातार बढ़ाया है. जिस लोकतंत्र की बुनियाद ही गलत है, उससे गरीबों के हित में कुछ करने की उम्मीद नहीं की जा सकती. लोकतंत्र के ब्राह्मणवादी ढांचे में आज भी शासन और प्रशासन के नब्बे फीसदी लोग सामंती प्रवृत्ति के हैं और जन्मजात गरीब-विरोधी हैं. डॉ. आंबेडकर की विचारधारा का दूसरा आयाम वर्गीय दृष्टिकोण है. उन्होंने कहा था कि दलितों और मजदूर वर्गों के प्रधान शत्रु दो हैं- ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद. इन दोनों का खत्मा किए बगैर दलितों और मजदूर वर्गों के दुखों का खात्मा नहीं हो सकता. किन्तु इन दोनों दुश्मनों का अंत तभी हो सकता है, जब इसके लिए दलित और मजदूर वर्ग अपनी लड़ाई को वर्गीय बनाएगा. क्या ऐसा होगा? लेकिन ऐसा नहीं लगता कि ब्राह्मणवाद दलित वर्ग की लड़ाई को वर्गीय बनने देगा, क्योंकि इसी के विरुद्ध तो ब्राह्मणवाद को पूंजीवाद पाल-पोस रहा है.
  • लेखक कँवल भारती वरिष्ठ साहित्यकार हैं। 

कोरोना संकट और आंबेडकरवाद

आज 14 अप्रैल है। इस दिन भारत समेत पूरे विश्व में आंबेडकर जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। किन्तु इस बार हर्षोल्लास सिरे से गायब रहेगा। वजह कोरोना है! कोरोना से पूरा विश्व आतंकित है और इससे बचने के लिए ‘सोशल डिस्टेन्सिग’ का पालन कर रहा है, जिसका अपवाद भारत भी नहीं है। सोशल डिस्टेन्सिंग को कामयाब बनाने के भारत में लॉकडाउन चल रहा है, जिसको 03 मई तक जारी रखने की घोषणा की गयी है। किन्तु इसके प्रकोप को देखते हुये कई राज्य सरकारें इसे 30 अप्रैल तक जारी रखने का निर्णय ले चुकी है। ऐसे में विभिन्न आंबेडकरवादी शख्सियतें आंबेडकर जयंती के दिन हर्षोल्लास से विरत रहने की अपील करने के लिए पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। इस मामले में इनकी भावना का सही प्रतिबिम्बन प्राख्यात आंबेडकरवादी डॉ. एम.एल. परिहार के इन शब्दों में हो रहा है। ‘कोरोना क्राइसिस के कारण मानवता संकट में है। सभी वॉरियर्स अपनी जान जोखिम में डालकर मानवता की महान सेवा कर रहे हैं। गरीब, किसान, मजदूर , बेरोजगार मुश्किलों की दोहरी मार झेल रहे हैं। ऐसे दुख की घड़ी में कुछ लोग जिद पर अड़े हुए हैं कि वे अंबेडकर जयंती घर में धूमधाम से मनाएंगे, घर को दियों से चमकाएंगे। पिछले दिनों जब दूसरे लोगों ने ताली-थाली बजाई, फिर दिये जलाए तो इन्होंने जोरदार विरोध किया, अंधभक्त कहा। लेकिन अंबेडकर जयंती की बात आई तो कहते हैं, हम तो दिये जलाएंगे, खुशी मनाने में क्या हर्ज है? लेकिन इनका तो कुछ नहीं बिगड़ना है, गालियों के वार तो बाबासाहेब पर ही होंगे। सिर्फ एक दिन दो दिये जलाने, गले में नीला दुपट्टा लटकाने या ‘जय भीम’ चिल्लाने से कोई अंबेडकरी नहीं हो जाता, अंबेडकर को तो आचरण में उतारना पड़ता है. भाइयों! निवेदन है कि जिद ना करो। हालात को समझो। मुश्किलों से जूझ रहे लोगों की पीड़ाओं का एहसास करो। यह उमंग व उत्सव का समय नहीं है। अध्ययन व संकट से उबरने के चिंतन का समय है। गवर्नमेंट व मेडिकल साइंस की गाइडलाइन पर चलने का समय है। गरीब व दुखी लोगों की मदद करने का समय है। यदि मनाना ही है तो धन, भोजन व शिक्षा का दान कर मनाओ। घर की मुंडेर पर दो दिये जला कर कौन सा किला फतह कर लोंगे। याद रखो, किसी भी धर्म, कौम व मान्यताओं में अंधभक्ति व कट्टरता उसके पतन का कारण होती हैं। इसलिए इस बार अंबेडकर जयंती पर खुशियां मना कर मानवता के मसीहा का अपमान मत करो। दूसरों के लिए उन्हें घृणा का पात्र मत बनाओ। बाबासाहेब तो हमेशा कहते रहे कि मेरा जन्मदिन मत बनाओ, बल्कि समाज व देश हित में मेरे बताए मार्ग पर चलो। इस विपदा में दिये जलाकर जन्मदिन मनाने की बात करने वाले अधिकतर वही लोग हैं जो सिर्फ एक दिन की औपचारिकताएं पूरी कर साल भर पै बैक टू सोसाइटी के तहत कुछ नहीं करते हैं। उलटा बारह महीने दूसरों को कोसते रहते हैं। यह भी सभी जानते हैं कि ये लोग अंबेडकर जयंती के दिन दिये जलाने की बात उनके प्रति सम्मान या कोई वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से नहीं कर रहे हैं बल्कि इनका असली मकसद तो दूसरों को चिढ़ाना है। इन्हें भी दूसरों की तरह ही अंधभक्त बनना है, होड़ करनी है। सामाजिक, वैचारिक व आर्थिक प्रगति की बजाय नेगेटिविटी व नासमझियों में होड़ करनी हैं। विडंबना यह है कि बाबासाहेब को पढ़े, जाने और माने बिना बहुजन समाज में हर जगह ऐसे लोग है जो अपनी नासमझियों के कारण पूरे समाज को बदनाम करते हैं और अंबेडकर को घृणा का पात्र बना रहे हैं। अब तो बुद्ध को भी इन्होंने अपने लपेटे में ले लिया है। आज जरूरत इस बात की है कि बाबासाहेब की देश को खुशहाल करने वाली मानवतावादी विचारधारा को शांति, भाईचारा व सौहार्द भाव से समाज में फैलाई जाए ताकि उनके प्रति लोगों में व्याप्त गलत धारणाएं व घृणा का भाव खत्म हो और समाज व देश के लिए किए गए महान योगदान को जानकर देश का हर नागरिक उस सच्चे राष्ट्रप्रेमी भारतरत्न को नमन करें।’ लगता है परिहार जैसे लोगों ने जो संदेश देने का प्रयास किया है, वह रंग ला रहा है। इन पंक्तियों को लिखे जाने के दौरान मेरी नज़र प्रखर आंबेडकरवादी गिरीश अंजान के एक पोस्ट पड़ी,जिसे कईयों के साथ मैंने भी शेयर किया। अंजान ने लिखा है,’आज कोरोना कहर से देश में सैकड़ों, दुनियाँ में लाखों लोग जिंदगी गवां चुके हैं। देश में हज़ारों जिंदगी-मौत से लड़ रहे हैं, लाखों-करोड़ों लोग भूँखे, बेघर और बहुत तक़लीफ़ में हैं। अतः कोरोना त्रासदी के बीच हम सब ने करुँणा के सागर बाबा साहेब की जयंती के लिए फैसला लिया है कि इस वर्ष हम घरों में सजावट नहीं करेंगे.. मंगलगीत नहीं गायेंगे, खुशियां नहीं मनाएंगे, धूमधाम से सेलिब्रेट नहीं करेंगे,बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ बहुत सादगी और संजीदगी से जयन्ती मनाएंगे।’ अंजान के पोस्ट को जिस पैमाने पर लाइक – शेयर किया गया है, उसके आधार पर आशावादी हुआ जा सकता है कि इस बार आंबेडकर जयंती सादगी और संजीदगी से मनेगी।बहरहाल परंपरा के विपरीत सादगी और संजीदगी से बाबा साहब की जयंती मनाने की मानसिक प्रस्तुति लेते समय यह ध्यान रखना होगा कि जिस कोरोना ने मक्का- मदीना, वैटिकन सिटी तथा भारत के चार धाम जैसे धार्मिक केन्द्रों को बंद करा दिया है, वह पहले से ही संकट में घिरे आंबेडकरवाद को और संकटग्रस्त करने जा रहा है। इस बात का आंकलन करने के लिए जरा आंबेडकरवाद को ठीक से समझ लेना होगा। वैसे तो आंबेडकरवाद की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभीन्न समाज विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति,नस्ल,लिंग,इत्यादि जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय की खाई में धकेले गए मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का प्रावधान करने वाला सिद्धांत ही आंबेडकरवाद है.इस वाद का औंजार है: आरक्षण, जो सबसे पहले दलित आदिवासियों के हित में प्रयुक्त हुआ: बाद में इसके दयरे में ओबीसी भी आ गए। उसके बाद ही आंबेडकरवाद नित नई ऊंचाइयां छूते चला गया तथा दूसरे वाद इसके समक्ष म्लान पड़ते गए. किन्तु यही इसके लिए काल भी बन गया। मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही वर्ण-व्यवस्था का जो सुविधाभोगी तबका पूना-पैक्ट के जमाने से आरक्षण का विरोधी रहा, वह एक बार फिर शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गया। यहीं से भारत में वर्ग संघर्ष की नए सिरे से शुरुआत हुई और 24 जुलाई,1991 को लागू हुई नव उदरवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के तमाम दल अपने-अपने तरीके से अपने वर्ग- शत्रुओं(बहुजनों) को फिनिश करने में जुट गए। इस दिशा में जितना काम नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी ने और मनमोहन सिंह ने 20 सालों में किया, नरेंद्र मोदी ने उससे कहीं ज्यादा पिछले छः सालों में कर डाला है। मोदी नें जिस निर्मम तरीके से वर्ग-शत्रुओं को फिनिश करने में अपनी तानाशाही सत्ता का इस्तेमाल किया है, उससे टॉप की 10 प्रतिशत जन्मजात सुविधाभोगी जातियों का देश की प्रायः 90% धन-दौलत दौलत पर कब्ज़ा हो गया । इनके साथ 90% वंचित आबादी जहां मात्र 10% धन पर वहीं आंबेडकर के लोग 1% धन-संपदा पर जीवन वसर करने के लिए विवश हो गए हैं। आंबेडकर के लोगों के लिए जो सरकारी नौकरियां धनार्जन का एकमात्र स्रोत थीं, वह काफी हद तक रुद्ध कर दिया गया है। यह स्रोत पूरी तरह रुद्ध हो जाय इसलिए मोदी लाभजनक सरकारी उपक्रमो सहित हास्पिटल, रेलवे, उड्डयन, इत्यादि वे ढेरों क्षेत्र निजी हाथों में देने का प्रयास कर रहे हैं, जहां आरक्षित वर्गों को जॉब मिलता है। इसी योजना के तहत ही गत फरवरी के उत्तरार्द्ध में जब कोरोना भारत में दस्तक देना शुरू किया था, मोदी मंत्रिमंडल ने दो दर्जन सरकारी उपक्रमो को निजी हाथों में देने के प्रस्ताव पर मोहर लगा दिया। अब आरक्षित वर्गों से किसी को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर इत्यादि बनते देखना एक सपना बनने जा रहा है। यह सब हालात बतातें है कि मोदी राज में आंबेडकरवाद बुरी तरह संकटग्रस्त हुआ है, जिसमें कोरोना कोढ़ में खाज बनता नजर आ रहा है। कोरोना से भारत विभाजन के दौरान हुये पलायन के जिस दुखद दृश्य की अवतारणा हुई, उसके पीछे वर्ग-शत्रुओं को फिनिश करने की मोदी की खतरनाक रणनीति की अनदेखी नहीं की जा सकती। लॉक डाउन की घोषणा के बाद यातायात की अनुपलब्धता के कारण हमने जो भूखे-प्यासे लाखों गरीब, युवा- बूढ़ों- बच्चों, अंधों-विकलांगो और स्त्री- पुरुषों को सौ-सौ, हजारों किलो मीटर दूर अवस्थित उनके गावों के लिए पैदल मार्च का जो दृश्य देखा, वह किसी को भी अप्रत्याशित नहीं लगा। कारण, इन लोगों के दुरावस्था की पूरी अनदेखी का जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा किया, उसकी परिणतिस्वरूप भारत विभाजन के वर्षों पुराने दृश्य की अवतारणा होनी ही थी, जो हुई भी। इसका कारण यह रहा जिन लाखों लोगों को दिल्ली- मुंबई जैसे महानगरों से हजारों किलोमीटर दूर अवस्थित गावों के लिए पैदल मार्च करना पड़ा, उनमे 90 प्रतिशत से अधिक लोग उस बहुजन समाज से रहे, जिन्हें गुलामों की स्थिति में पहुंचाने का कोई भी अवसर मोदी गंवाना नहीं चाहते। जिस तरह कोरोना से उद्योग-धंधे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं, उससे तय सा दिख रहा है कि कोरोना वायरस से कहीं ज्यादा लोग, आर्थिक कारणों से तबाह होंगे और तबाह होने वाले लोग बहुजन समाज से होंगे: इक्के-दुक्के ही सवर्ण समाज के लोग तबाह होने वालों के दायरे मे आएंगे। लॉकडाउन के बाद के हुये कुछ अध्ययन इसकी ओर ही संकेत कर रहे हैं। हाल में 3196 प्रवासी मजदूरों पर हुये अध्ययन की जो रिपोर्ट जनसमक्ष आई है, उससे पता चलता है कि इनमें 31 प्रतिशत लोग कर्ज में हैं और कोरोना के कारण रोजगार खत्म होने के चलते वे इसकी भरपाई नहीं कर पाएंगे। सर्वे में यह भी सामने आया है कि 42 प्रतिशत घरों मे एक दिन का भी राशन नहीं है। यदि लॉकडाउन 21 दिन से आगे बढ़ता है तो 66 फीसद लोग अपना घर नहीं चला पाएंगे। अब जबकि यह तय सा दिख रहा है कि लॉक डाउन 21 दिन से काफी आगे बढ़ जाएगा, ऐसे में जिस विशाल पैमाने पर बहुजनों के घरों के चूल्हे ठंडे होंगे, उसकी कल्पना कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की नीदें हराम हो जाएंगी।इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के श्रम निकाय ने चेतावनी दी है कि कोरोना के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोग गरीबी मे फँस सकते हैं। और गरीबी के दलदल में फँसने जा रहे इन 40 करोड़ लोगों में से कुछेक लाख को छोडकर बाकी उस अभागे बहुजन समाज से होंगे, जिसे वर्तमान सत्ताधारी वर्ग-शत्रु के रूप में ट्रीट करते हैं एवं जिनके लिए बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने अपना सर्वस्व झोंक दिया। अतः समय की मांग है कि हम आंबेडकर जयंती सादगी और संजीदगी से मनाएँ और यह दिन कोरोना संकट से सर्वाधिक प्रभावित होने जा रहे बहुजन समाज के दरिद्रतम लोगों की बेहतरी के चिंतन में लगाएँ। लेखक एच.एल. दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क- 9654816191

दलित दस्तक मैग्जीन का मार्च-अप्रैल 2020 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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[flipbook pdf=”https://www.dalitdastak.com/wp-content/uploads/2020/04/MARCH-APRIL-2020.pdf” height=”1000″ singlepage=”true”] दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2019 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने सात साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए आठवें साल का दसवां-ग्यारहवां अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है. मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

एक वायरस ने दुनिया को अछूत बना दिया

  • लेखक- अरविंद सिंह 
एक वायरस ने दुनिया को अछूत बना दिया। इंसान इंसान के साये से भी डर रहा है। अपने पड़ोसी तक को देख के नज़रें चुरा रहा है।सोचिए कि फिर वो अछूत समाज कैसे जिया होगा जिसे इसी समाज ने 5 हज़ार साल तक दलित, शोषित, नीच, शूद्र ,हरिजन और अछूत कहके हमेशा दूर रखा । और ना उसे कभी समाज ने अपनाया ना वो कभी किसी के लिए समाज का हिस्सा कहलाया। विडम्बनाओँ के भँवर में जीता ये अछूत ना जाने कब सभ्य समाज से दूर कर दिया गया ..और उसे कभी स्वीकार नहीं किया गया। आरक्षण के उसके हक़ तक को भी उसे भीख कहके दिया गया। इसी वैदिक परंपरा के पोषण में समाज का एक हिस्सा हमेशा लगा रहा और ये साबित करता रहा है की जो व्यवस्था आपको अछूत बताती है वो सही है समाज में आपका स्थान वही है और वो उचित ही है। पर वक़्त ने हमेशा इस समाज को थामे रखा है या यूँ कहे की इस समाज और इसी व्यवस्था के साथ रहने वाले हर उस छोटे आदमी ने इस सभ्य समाज की डौर को अपने संतुलन से एक ऐसे महीन धागे से बंधे रखा है अगर वो डोर टूट जाए तो आज ये सभ्य समाज औंधे मुँह गिर पड़ेगा या कहे तो अपने पतन को प्राप्त हो जाएगा। जी हाँ , वक़्त हमेशा अपने को बलवान साबित करता है और इंसान का जन्म वक़्त के साथ चलकर अपनी परिणिति प्राप्त करने के लिए हुआ है। पर शायद ऐसा इस समाज के साथ नहीं है। क्योंकि राष्ट्रीय आपातकाल के जिस विनाश की और हमारा राष्ट्र बढ़ चुका है…..मुल्क कोरोना के इस सनाट्टे में जिस तरह से घरों में बैठा हुआ है ऐसे में ये ही समाज है जिसने मुल्क को इस कठिन घड़ी में अपने जज़्बे से थामा हुआ है। वो भी तब जबकि गरीब शोषित और समाज में सबसे पिछड़ा व्यक्ति इसी समाज से ताल्लुक़ रखता है और सबसे ज़्यादा मार भी इसकी ये ही समाज झेल रहा है। वो चाहे दिहाड़ी मज़दूर हो रिक्शे खोमचे वाला हो दैनिक मज़दूर हो या फिर दुकानों पे काम करने वाला। ई -रिक्शे वाला हो या खेतिहर मज़दूर सभी तो पिछड़े समाज से ही आतें हैं। बावजूद इसके झाड़ू वाला …कूड़े वाला …सड़कों पर सफ़ाई करने वाले सरकारी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी , सभ्य समाज के रहने वाले लोगों के घरों को केमिकल से सेनेटाइज करने वाले कर्मचारी। ड्राईवर चालक हर वो व्यक्ति जो समाज में पिछड़ा है  ….वो इस महामारी में उसी समाज के लिए जी जान से लगा है जिस समाज ने उसे कभी मूल्यवान नहीं समझा । देश के सबसे बड़े संकट काल में भी अपने पिछड़ेपन अपनी ग़रीबी को भूल के भी ये सभ्य समाज का अंतिम व्यक्ति ही जो दिन रात खड़ा है। बिना किसी उम्मीद के निडर। इस भयवाह काल में सबसे ज़्यादा चूल्हा भी इसका ठंडा है । हाथ में बच्ची का शव लेकर मीलों पैदल भी इसी समाज के लोग चल रहें हैं। टीवी दिखा रहा है बता रहा है पर ये गुहार कभी नहीं लगा रहा की एक ताली इनके नाम एक दिया इनके भी नाम। आज हम उसी उच्च समाज को एक दूसरे से विमुख देख रहें हैं। कोरोना काल ने इंसान को इंसान की सही औकात का पता बता दिया है और उसे ये भी बता दिया है की जाति से …क़र्म से …वर्ण से …व्यक्ति अछूत नहीं होता बल्कि एक इंसानी नाफ़रमानी और ज़िद से भी प्रयोगशालाओं में बने वायरस के प्रसार से भी आदमी अछूत बन सकता है। और जब ये फैलता है तो इसी समाज का वो अंतिम व्यक्ति ही इस से लौहा लेने को अपने सर पे सूती पुराने चिथड़े से बना धाटा मार के निकलता है क्योंकि उसके नसीब में कोई मास्क नहीं है। ऐसे सभ्य समाज के लिए जो वक़्त बदल जाने पर एक बार फिर से उसे दुतकारने के लिए तैयार बैठा है।
  • लेखक अरविंद सिंह पत्रकारिता से जुड़े हैं।

शिवाजी को दुनिया के सामने ज्योतिबाराव फुले लेकर आए थे

वंचित तबके को सशक्त बनाने में अहम किरदार निभाने वाले राष्ट्रपति ज्योतिबा फुले की आज 193वीं जयंती है। महान समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी जोतिबा राव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। वही पुणे जो पेशवाई का गढ़ रहा है। और जहां के बारे में कुख्यात है कि यहां दलितों को कमर में झाड़ू और गले में मटका लटका कर चलना पड़ता था। महामना फुले माली समाज से थे। महिलाओं की शिक्षा के लिए उनका योगदान उल्लेखनीय है। ब्राह्मणों और पुरोहितों की व्यवस्था का उन्होंने खुल कर विरोध किया और बिना उनके विवाह-संस्कार शुरु करवाया। और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। आज यह आंदोलन जोर पकड़ चुका है। वह संभवतः भारत के पहले समाजसेवक हैं, जिन्होंने बाल-विवाह का विरोध किया और विधवा-विवाह का समर्थन किया। वह अछूत समझे जाने वाले दलित वर्ग की स्वतंत्रता और समानता के प्रबल समर्थक थे। जब लोग दलितों की परछाई से कतराते थे, जोतिबा फुले ने अपने घर का पानी उनके लिए खोल दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया गया और बाद में ब्राह्मणों के दबाव में पिता ने घर से निकल जाने को कहा। उन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्ग के लिए ब्रिटिश शासन से भी टकराने  से गुरेज नहीं किया।  इस खबर में हम आपको उनके ब्रिटिश शासन से भिड़ने के दो किस्से सुनाएंगे, साथ ही शिवाजी महाराज से जुड़ा एक और किस्सा जिसे समाज का बड़ा वर्ग नहीं जानता। लोग आज शिवाजी की विरासत पर दावा तो करते हैं लेकिन बहुतों को यह पता नहीं है कि शिवाजी को दुनिया के सामने लाने वाले ज्योतिबाराव फुले ही थे। लेकिन शिवाजी महाराज के किस्से से पहले दो और घटनाएं जो यह बताती है कि ज्योतिबा फुले का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही देश की व्यवस्था को बेहतर बनाने में कितना बड़ा योगदान था। एक किस्सा 1876 से 1880 तक भारत के वायसराय रहे लॉर्ड लिटन से जुड़ा है। 1878 में उसने वर्नाक्युलर ऐक्ट पास करके प्रेस की आजादी पर खत्म करने की कोशिश की। इस कानून के तहत देसी भाषा में छपने वाले समाचारपत्रों पर कुछ रोक लगा दी गई। तब ज्योतिबा फुले के संगठन सत्यशोधक समाज के जरिए दीनबंधु समाचार पत्र निकलता था। इसके जरिए प्रेस की आजादी छीनने के प्रतिबंध का काफी विरोध किया गया। इस प्रतिबंध के 2 साल बाद 1880 में लिटन को पूना आना था। पूना नगरपालिका का तत्कालीन अध्यक्ष लॉर्ड लिटन का भव्य स्वागत करना चाहता था। ज्योतिबा फुले नगरपालिका के सदस्य थे। वह इससे असहमत थे कि टैक्सपेयर्स का पैसा लिटन जैसे आजादी के विरोधी व्यक्ति पर खर्च किया जाए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि लिटन की बजाय उस पैसे को पूना के गरीब लोगों की शिक्षा पर खर्च किया जाए। पूना नगरपालिका में उस समय 32 नामित सदस्य थे जिनमें से अकेले ज्योतिबा फुले थे उस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। एक और ऐसा मौका आया था जब ब्रिटिश राजकुमार के सामने गरीब किसानों की आवाज उठा कर सबको हैरत में डाल दिया। ज्योतिबा फुले के एक दोस्त थे जिनका नाम हरि रावजी चिपलुनकर था। उन्होंने महारानी विक्टोरिया के पोते ब्रिटिश राजकुमार और उसकी पत्नी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। उस कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले को भी जाना था। उस भव्य आयोजन में जहां तमाम लोग हीरे-मोती के गहने और शानदार वस्त्र पहन कर गए थे, ज्योतिबा फुले कार्यक्रम में किसानों जैसा कपड़ा पहनकर गए। इस पर सभी लोगों की नजर उनकी ओर टिक गई। तब ज्योतिबा फुले ने राजकुमार से कहा कि अगर राजकुमार वाकई में इंग्लैंड की महारानी की भारतीय प्रजा की स्थिति जानना चाहता है तो वह आसपास के गांवों का दौरा करे। उन्होंने राजकुमार को अछूतों के बीच भी जाने का सुझाव दिया। ताकि राजकुमार उनकी दयनीय स्थिति को समझ सकें। उन्होंने राजकुमार से आग्रह किया कि वह उनके संदेश को महारानी विक्टोरिया तक पहुंचा दे और गरीब लोगों को उचित शिक्षा मुहैया कराने का बंदोबस्त करे। ज्योतिबा फुले के इस भाषण से समारोह में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए थे। अब आते हैं शिवाजी महाराज से जुड़े किस्से पर। आज पूरे महाराष्ट्र की राजनीति, छत्रपति शिवाजी महाराज के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन इस बात की जानकारी बहुत कम ही लोगों को है कि पेशवाओं ने उनके इतिहास को पूरी तरह दफन कर दिया था। उन्हें दोबारा महाराष्ट्र में स्थापित करने का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा जोतीराव फुले को ही जाता है। धनंजय कीर द्वारा महात्मा जोतीराव फुले की लिखी जीवनी “महात्मा जोतीराव फुले, भारत की सामाजिक क्रांति के पितामह” में इसका वर्णन साफ मिलता है।  इसमें उन्होंने लिखा है- फुले ने छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगढ़ का बड़े ही आदर और उत्सुकता से दौरा किया। वो जोतीराव ही थे, जिन्होंने पहली बार छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधी को खोजा था, जो कि सूखे पत्तों और पत्थरों से ढकी पड़ी थी। उन्होंने शिवाजी पर एक गाथा भी लिखी और जून 1869 को प्रकाशित की। उस गाथा का शीर्षक था, “शिवाजी महाराज का जीवन काव्य गीत में।” आज महाराष्ट्र के तमाम राजनीतिक दल शिवाजी की विरासत पर दावा करते हैं, लेकिन तमाम नेता इस इतिहास का जिक्र करने से कतराते हैं। लेकिन बाबासाहेब आंबेडकर ज्योतिबा फुले की महानता और समाजिक कामों से काफी प्रभावित थे। यही वजह रही कि उन्होंने ज्योतिबा फुले को अपना गुरु माना। मनुवादी मीडिया और भारत के जातिवादी समाज ने हमेशा से ज्योतिबा फुले की महानता और उनको कामों की अनदेखी की है। लेकिन भारत का बहुजन समाज देश के इस महान क्रांतिकारी और समाजसेवक को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित और सम्मानित करता है।

कोराना काल में नफ़रत व भेदभाव

हमारी संचित नफरतें कोराना के कुदरती कहर के वक्त भी उसी तरह प्रकट हो रही है ,जैसे सामान्य दिनों में होती रहती है, वैसे भी जाति और धर्म आधारित घृणायें तात्कालिक नहीं होती है, यह हमारे देश में लोगों के दिल, दिमाग में व्याप्त है, उसे थोडा सी हवा मिले तो अपने सबसे शर्मनाक स्तर पर बाहर आ जाती है. इन दिनों में कईं तबके कोराना जन्य नफरत से प्रताड़ित है, कोराना का वायरस तो फेफड़ों को इन्फेक्ट कर रहा है, पर साम्प्रदायिकता व जातिवाद का वायरस दिमाग को बुरी तरह से इन्फेक्ट किये हुए हैं. सामने भयावह मौत का खतरा होने के बावजूद भी लोग अपने जाति दंभ और मजहबी मूर्खताओं को बचाने में जी जान लगा रहे हैं, इससे यह साबित होता है कि लोगों को मरना मंजूर है पर सुधरना स्वीकार नहीं है. क्या कोराना जैसी वैश्विक महामारी से भारतीय समाज कोई सीख ले रहा है या वह उतना ही अहमक बना हुआ है, जितना बना रहने की उसकी क्षमता है, क्या हम इस दौर में सोच पा रहे हैं कि कोराना जैसे अदृश्य दुश्मन के सामने विश्व की तमाम सत्ताओं ने घुटने टेक दिए हैं, राष्ट्रवाद व नकली सरहदों की फर्जी अवधारणायें भूलुंठित है, धर्मसत्ताओं ने अपनी प्रासंगिकता खोना प्रारम्भ कर दिया है, काबा हो या काशी, वेटिकन हो या बोधगया सबकी तालाबंदी हो गई है, कोई पोप, कोई पीर, कोई शंकराचार्य, कोई महामंडलेश्वर, कोई परमपूज्य, कोई पंडित, कोई मुल्ला, कोई पादरी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है. इन्सान को बरगलाने वाले इन लोगों के पास इन्सान को बचाने का कोई मैकेनिज्म नहीं है, फिर भी कुछ धर्मस्थल अज्ञान बाँट रहे हैं, जहालत परोस रहे हैं, लेकिन ये लोगों को कोराना से संक्रमित होने से नहीं बचा पा रहे है, अपने आपको सर्वशक्तिमान समझ बैठे मनुष्य को कोराना ने आईना दिखा दिया है कि उसकी औकात क्या है? बावजूद इसके भी जिन लोगों के दिमाग में नफ़रत व भेदभाव का गोबर भरा हुआ है, वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे है, भारत का नरभक्षी मिडिया और उसके रक्तपिपासु एंकर अपना वही हिन्दू मुसलमान का भौंडा राग अलाप रहे है, प्रलय के क्षणों में भारत के जातिवादी और घनघोर मिडिया का यह प्रलाप स्वयं में ही एक महामारी है, जिसकी कोई वेक्सिन नहीं बन पायेगी, कईं बार तो लगता है कि इस मनुधारा (मनुस्ट्रीम) मिडिया में अधिकांश मनोरोगी घुस आये हैं और अब ये लाइलाज है. कोराना के इस संकट काल में जिस भारतीयता व इन्सानियत की उम्मीद की जानी चाहिए, उसकी अनुपस्थिति चिंतित कराती है, जिस तरह की खबरें आ रही है, वे हैरान और परेशान करने वाली है. बस्ती के भानपुर सोनहा में जिन कोराना संदिग्धों को क्वार्न्टीन करके लाया गया, वहां का रसोइया अनुसूचित जाति का था, तो उच्च जाति के तुच्छ दंभ से ग्रसित जातिवादियों ने उसके हाथ का खाना खाने से इंकार कर दिया, हालाँकि कोराना को उनका उच्च वर्ण और उपरी जाति होना भी नहीं रोक पा रहा है, सब समान रूप से संक्रमित हो रहे हैं, पर जाति के वायरस से पहले से ही इन्फेक्टेड सवर्ण हिन्दू अब भी सुधरने की इच्छा नहीं रखते हैं, इसका ज्वलंत उदहारण कोराना के हॉटस्पॉट के रूप में उभरे भीलवाड़ा जिले के गंगापुर थाना क्षेत्र के जयसिंहपुरा गाँव में सामने आया है जहाँ पर एक दलित आंगनबाड़ी सहायिका और उसका किराणा व्यवसायी पति जातीय घृणा के शिकार हुए हैं, महिला को अनुसूचित जाति का होने की वजह से घर में घुसने व पोषाहार बनाने से मना किया गया है और उसके पति की दुकान पर जा कर उससे मारपीट की गई, दुकान में लगी डॉ आंबेडकर की तस्वीर को तोड़ा गया, जातिगत गाली गलौज किया गया. पीड़ित पारस सालवी ने बताया कि गाँव के सवर्ण लोग हम पर कोराना फ़ैलाने का आरोप लगा कर अत्याचार कर रहे है, घटना की रिपोर्ट दी गई है, पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है. तब्लीग जमात के बहाने मिडिया और सत्ता तंत्र ने जो विमर्श खड़ा किया है, उसके नतीजे अब आम मुसलमानों को भुगतने पड़ रहे हैं, राजस्थान के विभिन्न इलाकों से आई खबरे वाकई शर्मनाक है, जहाँ पर मुस्लिमों के साथ भेदभाव व कोराना के कोरियर बन जाने का सरेआम आरोप लगाते हुए उनके उत्पीडन की घटनाएँ हो रही है. ऐसी घटनाओं के बढ़ने से चिंतित जन संगठनों ने राजस्थान सरकार को एक संयुक्त ज्ञापन दिया है, जिसमें बताया गया कि जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र की हाऊसिंग कालोनी तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मुस्लिम व्यापारियों को फल व सब्जी बेचने से रोका जा रहा है, जोधपुर के नागोरी गेट इलाके में मुस्लिम मजदूरों पर उनके हिन्दू पड़ौसियों ने मध्य रात्रि में यह कहते हुए मारपीट व गाली गलौज किया कि वे कोराना संक्रमण फ़ैलाने में लगे हैं, हालाँकि तुरंत पुलिस आई और इन मजदूरों को अन्यत्र शिफ्ट किया गया है, लेकिन ऐसी घटनाओं का बढ़ते जाना कोराना की आड़ में मॉब लिंचिंग का खतरा पैदा कर देती है. भरतपुर के जनाना हॉस्पिटल में परवीना नामक गर्भवती मुस्लिम महिला को एडमिट नहीं किया जाना और उसे जयपुर रेफर कर देने के बाद रास्ते में प्रसव हो जाने से नवजात की मौत जैसी शर्मनाक घटना पर तो राज्य सरकार के पर्यटन मंत्री विश्वेन्द्र सिंह खुद भी अफ़सोस जता चुके हैं, हालाँकि प्रशासन व जनाना अस्पताल के डॉक्टर्स इसे बेबुनियाद बता रहे हैं. तब्लीग जमात की निंदनीय घटना के बाद से सोशल मिडिया पर जमातियों द्वारा थूंकने, अश्लील बर्ताव करने, मुस्लिम व्यापारी द्वारा कथित रूप से फलों के थूंक लगाकर बेचने और मेडिकल टीमों पर हमलों की अफवाहों को नियोजित तरीके से फैलाया जा रहा है, ताकि मुसलमानों के प्रति द्वेष का भाव और सघन हो तथा बहुसंख्यक आबादी उनका आर्थिक बहिष्करण शुरू कर दें, नफरत के कारोबारी इस तरह के प्रोपेगंडा करने में बहुत माहिर है, इस बीच इंदौर जैसी दुखद घटनाएँ भी हुई हैं, जहाँ स्वास्थ्यकर्मियों पर पथराव व उनको भगाने का शर्मनाक कृत्य हुआ है, अच्छी बात यह रही कि मुस्लिम समाज ने बड़े पैमाने पर पहल करते हुए सार्वजनिक रूप से इस घटना के प्रति शर्मिंदगी जाहिर की और बाकायदा विज्ञापन छपवा कर माफ़ी मांगी, इसका सुखद परिणाम रहा, अविश्वास का अँधेरा छंटा और मेडिकल टीम वापस उन इलाकों में जाकर अपना काम सुचारू कर पाई, लेकिन तब्लीग जमात और इंदौर जैसी घटनाओं की आड़ में कईं फर्जी वीडियो फैलाये गए है ताकि लोग एक दुसरे से नफरत करने लगे, यह स्थिति भयावह है. कोराना से जंग बहुत महत्वपूर्ण लडाई है, जिससे केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया लड़ रही है, यह किसी एक देश अथवा एक धर्म या एक जाति संप्रदाय की वजह से नहीं फ़ैल रहा है, न ही कोई शुद्ध खून का दावा करने वाले कथित उच्च लोग इससे बच रहे है, इसकी चपेट में अमीर–गरीब, हिन्दू-मुसलमान, यहूदी, जैन बौद्ध, ईसाई, आस्तिक नास्तिक सब है, इसलिए किसी एक कौम, एक जगह, एक हॉस्पिटल, एक जाति, एक विचार या विश्वास पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपने भीतर बसी नफरत का प्रकटीकरण मत कीजिये, कोराना के सामने इस वक्त सब निहायत ही निरे असहाय इन्सान मात्र है, बस इन्सान बने रहिये, एक दूसरे की मदद कीजिये, शायद मानव प्रजाति यह जंग जीत ले, इस जंग के फ्रंट पर लड़ रहे लोगों के प्रति और इसकी दवा खोज रहे वैज्ञानिकों के प्रति हिकारत, नफरत व भेदभाव का भाव मत लाइए, क्योंकि आपका अज्ञान आपको नहीं बचा सकेगा, अब भी अंतिम उम्मीद विज्ञान से ही है. देर सवेर वही बचायेगा. (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र पत्रकार है.)

बहनजी का बेहतर कदम

  • राजकुमार
ये थोड़ा और पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन देर से ही सही बसपा प्रमुख मायवती ने देशहित और मानव हित में एक बड़ा फैसला लिया है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने अपनी पार्टी के सभी विधायकों को विधायक निधि से कोरोना से लड़ने के लिए एक-एक करोड़ रुपये देने की अपील की। इसको लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहन मायावती को धन्यवाद दिया है। दरअसल बहनजी ने 3 अप्रैल को ट्विट में कहा कि “देशभर में कोरोना वायरस की महामारी के प्रकोप के मद्देनजर खासकर यूपी के बीएसपी विधायकों से भी अपील है कि वे भी पार्टी के सभी सांसदों की तरह अपनी विधायक निधि से कम से कम 1-1 करोड़ रु अति जरूरतमन्दों की मदद हेतु जरूर दें। बीएसपी के अन्य लोग भी अपने पड़ोसियों का जरूर मानवीय ध्यान रखें। बहनजी ने एक अन्य ट्वीट में कहा कि, ‘केन्द्र सरकार से भी अपील है कि विश्व बैंक से मिले 100 करोड़ डालर की कोरोना सहायता को विशेषकर स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने में उचित इस्तेमाल करे ताकि कोरोना के प्रकोप को रोका जा सके। जनता से भी अपील है कि वे आपदा की इस घड़ी में सरकार का सहयोग करें।’ दरअसल तमाम लोग यह सवाल उठा रहे थे कि कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा गरीबों और कमजोर वर्गों की जिंदगी प्रभावित हुई है। देश के तमाम हिस्सों से भी सबसे ज्यादा लोग पूर्वांचल के ही पलायन हुए हैं। ऐसे में सबकी नजर उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव जबकि बिहार में तेजस्वी यादव पर थी। हालांकि बसपा के सांसद और विधायकों ने खुद ही इस आपदा में अपना सहयोग देना शुरू कर दिया था। तो वहीं आम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े तमाम अन्य संगठन भी लोगों की मदद कर रहे थे। लेकिन अब मायावती की अपील के बाद बाकी बचे विधायक भी अपना योगदान देंगे जिससे पार्टी लोगों से जुड़ेगी। दूसरी ओर बसपा कार्यकर्ताओं से अपने पड़ोसियों की मदद की अपील करना भी एक महत्वपूर्ण कदम है। जाहिर है कि इससे बसपा कार्यकर्ता और नेता खुल कर जरूरतमंदों की मदद करेंगे।
  • लेखक राजकुमार अम्बेडकरी मूवमेंट से जुड़े हैं।

जयंती विशेषः सामंती दमन के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक थे बाबा चौहरमल

आज महाबली बाबा चौहरमल की जयंती है। चौहरमल का जन्म बिहार में मोकामा अंचल क्षेत्र के शंकरवाड़ टोला में हुआ था। तब इस क्षेत्र को मगध के नाम से जाना जाता था। उनका जन्म दुसाध ज़ाति के एक किसान परिवार में 04 अप्रैल 1313, तदनुसार चैत्र पूर्णिमा को हुआ था। इनके पिता बन्दीमल और माता रघुमती थी। इनका कर्मस्थान मोकामा ताल के चाराडीह में था औऱ इससे 14 किलोमीटर दूर तुरकैजनी गांव में इनका ननिहाल था। समाज हित हेतु ब्राह्मणी और सामंती ताकतों से लगातार संघर्षरत रहने के कारण इन्हें चारडीह,-तुरकैजनी भाग दौड़ करना पड़ता था। इनका ससुराल मोकामा ताल के खुटहा (बड़हिया) गावँ में था। इनकी जीवनसंगिनी, ससुरसल के लोग और इनके वंशज के सम्बंध में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। चौहरमल सामंती दमन के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। उन्होंने चाराडीह में सामन्तो द्वारा की गई आर्थिक नानाबन्दी का संगठन बना कर कड़ा मुकाबला किया और अपने लोगों को संकट से बचाया। वे चाराडीह में सामुहिक खेती-किसानी शुरू कर उस इलाके के लोगों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। गियासुद्दीन मुहम्मद बिन तुगलक ने चौहरमल को 100 बिगहा खेती योग्य भूमि का भूमि-पट्टा दिया था जिस पर भूमिहार सामन्तो की नज़र गड़ी थी। चौहरमल ने सामन्तो के अत्याचार से लोहा लेने हेतु चाराडीह को युद्ध कला ज्ञान हासिल करने का प्रशिक्षण केंद्र बनाया था जिसमे वे अस्त्र संचालन का प्रशिक्षण देते थे। चौहरमल साम्प्रदायिक सौहार्द के भी प्रतीक थे। बिहार शरीफ के बड़ी दरगाह में हज़रत मखदूम साहब के मज़ार के बगल में  चौहरमल का भी मज़ार है। इनके मज़ार पर उर्दू में चुल्हाय लिखा हुआ है। इससे पता चलता है कि मुस्लिम समाज मे भी चौहरमल पूज्य थे। विहार शरीफ में चौहरमल को अदब से चुल्हाय वीर कहा जाता है। मखदूम एक सूफी संत थे जो चौहरमल के समकालीन और कल्याणमित्र थे। दोनों मिल कर मानवतावादी संदेशों को आसपास के क्षेत्रों में फैलाते थे। बिहार शरीफ में पंचाने नदी के किनारे बसा कोसुत गावँ में  निर्मित चौहर विहार में उनके अनुयायी शील के प्रतिक लंगोटा चढ़ाते हैं। चौहरमल को मोकामा के आस पास के लोग लोक-देवता और कुल-देवता  के रूप में पूजते हैं। घर आंगन में मिट्टि की गुम्बदाकार पिंडी बना कर उनकी पूजा होती है। बौद्ध संस्कृति में यही पिंडी स्तूप कहलाता है जिसमें बुद्धों और बोधिसत्वों का अस्थि भस्म रखा हुआ होता है। चाराडीह में उनका विहार है जहां प्रत्येक साल चैत्र माह में एक हप्ते का विशाल मेला लगता है। चौहरमल मेले में विभिन्न क्षेत्रों से 10 लाख से ज्यादा लोग आते हैं। यहां भी इनकी पिंडी है जिसकी पूजा कई सालों से होती आ रही है । बाद में यहां एक आदमकद प्रतिमा भी स्थापित किया गया है। कुछ लोग चौहरमल के ब्राह्मणीकरण का भी प्रयास करते हैं और बताते है कि उनके पास चमत्कारिक शक्तिया थी। परंतु यह सत्य नहीं है। वे महामानव थे और अपने मंगल कृत्यों से पूजित हैं। मोकामा के आसपास रेशमा-चौहरमल नाटक बहुत प्रसिद्ध है जिसके माध्यम से उनके कृतित्व को दर्शाया जाता है। महाबली चौहरमल पर बहुत कम ही लिखा गया है। जो भी लिखा गया है वह बौद्धिकता और वैज्ञानिकता से कोसों दूर है। उनका  शरीरान्त 120 वर्ष की आयु में 01 नवम्बर 1433 को हुआ था। कपिल स्वरूप बौद्ध के फेसबुक वॉल से, बाबाचौहर मल पर सम्यक प्रकाशन ने पुस्तक प्रकाशित की है।

God is a virus

Written by- Dr Ruha Shadab Let us assume good intention. Let us assume that the Government of India (GoI) is not fudging its numbers. Let us assume that GoI is not under-testing and instead assume that the most-at-risk are being tested. This means that a country of 1.3 billion has had only 1,300 cases of Corona virus with 35 deaths (at the time of written this article). With 15,000 tests conducted, the confirmed-to-tested ratio is similar to Malaysia’s. India came down heavy and hard in its response. The Prime Minister (PM) is apologetic about the hardship the poorer have had to go through with the enforcement of a sudden 21-day lock down (enforced on March 24th). No policy is perfect, and public health asks for difficult trade-offs. Was there a smarter way of declaring a nationwide lock down in a country: a way that could lessen the blow on a population where two-thirds households have around Rs 9,000 (~$125) in savings? The Union (= federal) government and numerous State governments in India, have come out with a plethora of supportive measures to tide over this crisis. As a welfarist economy, the focus has been on strengthening safety nets for the most vulnerable. Union government/agency’s measures The first few responses were to send advisories to students studying in the US. Circulars from the Consul General of New York encouraged students to not travel to India. These circulars were being generated on a daily basis, till they suddenly dried up. Indian students go to the US after collecting a lot of paperwork. The Ministry of External Affairs should compile an email address book of such students, for the future, to expedite communication with this group. Students, far from home and family, need to be assuaged by their country’s representative and simple circulars can be reassuring. A systematic way of having these messages passed on, and not instead solely relying on chatty WhatsApp groups should be one of the small revamps of our diaspora outreach. Especially, since things escalated to the point of international flights to India completely being canceled and visas of all non-nationals be rendered invalid. On the Sunday prior to the start of the lockdown, the Prime Minister of India suggested a citizen’s curfew, meant to be voluntary, just for 14 hours, with an allotted time for citizens to clap for those on the front lines of working to control Coronavirus. A number of countries have had a “clap for essential services workers” moment, some are even doing it repeatedly. This could be seen as a primer for the announcement that would come in 48 hours: necessary preparation for a massive country. After March 24th, the Finance Minister came armed with an arsenal of supportive measures, which leveraged existing schemes/yojanas: Free distribution of food grains and pulses to 800 million people (under PM Gareeb Kalyan Yojana); Rs 1,500 (~$20) to 200 million women’s accounts to help with running their households (Jan Dhan Yojana); A Rs 2,000 ($27) payment to 87 million farmers (under PM Kishan Yojana); Free cooking gas cylinders for 83 million below-poverty-line families (under Ujjawala scheme); A Rs20 ($0.30) increase in the daily wage under the country’s flagship employment guarantee scheme (MNREGA) which has 50 million workers; Up to Rs 2 million in collateral-free loans for 6.3 million Self-Help Groups (SHGs). More ministries and agencies have chimed in: Hospitals meant for Railways’ employees have been opened up for other central government employees (the Indian railways, IR, employ 1.5 million people and as a public sector undertaking, have parallel social security services, such as a hospital network). IR has also doubled up some train coaches as isolation wards for Coronavirus patients. NITI Aayog, the PM-chaired government think tank, is developing an App: CoWin-20. It is meant to inform users of possible contact with a Covid-19 patient. “Start Up India”, a program run by the Ministry of Commerce, has created an innovation challenge to tackle a host of issues ranging from supply constraints of medical equipment to fake news detection. The Self4Society, a platform hosted by the Ministry of Electronics and Information Technology, helps organize Initiatives for social work. Tackling Coronavirus has taken the lead in the plethora of work streams available. With over 90,000 individuals and 3800 organizations registered on this platform donating, volunteering, or contributing in four major areas: medical equipment, public awareness, logistics, and assisting local government, Self4Society has helped channelize the citizenry’s desire to help the nation with the pandemic. State government’s measures Health is in the list of “State subjects” in the Indian constitution, making it the prerogative of the State governments. There has been a robust response at this level, and even down to the level of municipalities. For instance, home-delivery of vegetables to residents of a municipality of Kalburgi, Karnataka; approval by Uttar Pradesh (UP), Punjab, Haryana and Chandigarh to designate spots for road-side vendors of perishables. UP has 12000 vendors approved. This particular state, of 200 million, has a huge size of migrant workers who travel far and wide outside of the state to work. Tens of thousands, if not hundreds of thousands, were struggling to get back home under the lockdown (Why they didn’t stay put in their city of work? No money, no security, no safety net, no savings. These migrant workers are mostly ones that live off making meagre daily profits). The UP government deployed a thousand buses to help ferry these workers to their native districts in the state. Down south, in Maharashtra, which receives a lot of migrants, announced that Covid-19 patients would get free treatment (under Mahatma Jyotiba Phule Jan Arogya Yojana). Even further south, Kerala, which is the poster child of good public health programs and practices, beside checking all the right boxes on what to do in the time of a pandemic, has gone above and beyond to address collaterals, such as tasking local governments to take care of starving stray dogs and monkeys. Anticipating the impact of closure of alcohol shops during the lockdown, Kerala has strengthened its de-addiction centers. While some of these measures should be permanently engrained in our governance structures, some measures taken, need to be critically reexamined for their propensity for misuse. While the Union government has encouraged States to use a precolonial law (Epidemic Act 1897) to enforce quarantine, a legal tool with a clear implementation and accountability framework should eventually replace it. In a nation where religion is often one’s premier identity, only the wrath of god can lead to a reimagining of public health systems. A stagnated level of government expenditure on health (hovering around 1.1% of GDP for over a decade) has been a constant complaint of experts. The aforementioned financial support measures, by the Union government, come up to 1% of the GDP, as compared to the double digits seen else (Malaysia announced a
Dr Ruha Shadab
stimulus equal to 17% of its GDP). However, regardless of comparative figures, cushioning the blow of a lockdown and a lockdown itself, are not sustainable measures for the pandemic. The future needs a public health system in India that is dynamic, hyper-responsive, globally well-integrated, and optimally resourced. Maybe god is a virus, and Covid-19 will strengthen the one thing we all need: healthcare. Dr Ruha Shadab Public Service Fellow and Master Candidate, 2020 Harvard University, Kennedy School of Government ruha_shadab@hks.harvard.edu

मोदी जी, हम ऐसा करते हैं कि आपकी तस्वीर फ्रेम करवा कर घर में टांग लेते हैं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लॉकडाउन के बीच एक बार फिर जनता को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अपने भाषण में एक बार फिर से शिगूफा छोड़ते हुए लोगों से आगामी रविवार 5 अप्रैल को रात 9 बजे, 9 मिनट के लिए घर की बत्तियां बंद कर घर के बाहर दीया, टार्च, मोमबत्ती आदि किसी चीज को जलाकर रोशनी करने को कहा। पीएम मोदी का कहना था कि इससे गरीबों के जीवन का अंधकार दूर होगा और देश में कोरोना के कारण जो अंधकार फैला है वह दूर होगा। अब तक लॉकडाउन के 9 दिनों के बीच ये तीसरी बार है, जब प्रधानमंत्री ने जनता को संबोधित किया है। कोरोना वायरस के बाद लॉकडाउन के बीच देश भर में जिस तरह से लाखों लोग पलायन कर गए, देश के तमाम राज्यों में जिस तरह गरीबों के बीच भगदड़ मची, लोग रोजी-रोटी और रोजगार के संकट से जूझने लगे, देश के मध्यम वर्ग में भी अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ऐसी किसी बात पर चर्चा नहीं कर देश की जनता को दीया जलाने के कर्मकांड की ओर धकेलना समझ से परे है। सोशल मीडिया पर इसकी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त हुई है। पीयूष मित्रा ने जो लिखा, आप खुद देखिए- मेरी तरह के कुछ बेवकूफ लोग सोच रहे थे कि – टेस्ट की संख्या बढ़ाने पर बात होगी। – डॉक्टरों के पीपीई की संख्या बढ़ने का ऐलान होगा। – लॉक डाउन की समीक्षा और आगे की योजना पर बात होगी। – ठप पड़े रोजी रोजगार के बारे में बात होगी। – बच्चों की पढ़ाई लिखाई पर बात होगी। – गेंहू की कटनी का समाधान बताया जाएगा। यहां तो पंडित जी, एक और कर्मकांड थमा गए। अब समझ आ रहा है कि यह देश क्यों इतना कर्मकांडी है। वैसे हर चतुर सरकार बेवकूफ जनता के साथ यही व्यवहार करती है। उसे इवेंट और एंटरटेनमेंट में उलझा देती है, ताकि उसकी कमजोरियों पर बातचीत कम हो। पत्रकार सुमित चौहान लिखते हैं- मैं सार्वजनिक माफी मांगना चाहता हूं। ये मेरी गलती है कि मैंने देश के प्रधानमंत्री से इस संकट में कुछ राहत भरी पहल की उम्मीद की… अगर मैं अपना पुराना स्टैंड लेकर ही उनका वीडियो देखता तो निराश नहीं होता… वो एक अव्वल जोकर हैं और वो इस जोकरगिरी में मुझे कभी निराश नहीं करते। मैं आगे से इसी स्टैंड के साथ उनका वीडियो संदेश देखूंगा। शायद थोड़ी कम तकलीफ होगी। तो वहीं पत्रकार प्रीती नाहर ने लिखा है- ये प्रधानमंत्री नहीं सुधरेगा! थाली वाला आईडिया काम नहीं आया तो अब 5 अप्रैल को लाइट बंद करके दिया जलाए सारा देश। सारे अंधविश्वास इसी वक्त आजमाने हैं इसको। दरअसल लोगों का यह गुस्सा गलत नहीं है। देश अभी भयंकर स्वास्थ सेवाओं की कमी से जूझ रहा है। बेरोजगारी का संकट मुंह बाए खड़ा है। कोरोना की वजह से भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पलायन देखने में आया है। देश की अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिर पड़ी है। लोगों की जान सांसत में है। पूरा देश डरा हुआ है। कोरोना पोजिटिव पाए गए लोगों की जांच करने वाले स्वास्थकर्मियों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अच्छा होता प्रधानमंत्री उन्हें दिलासा देते। अच्छा होता कि वह कंपनियों से कहते कि किसी युवा को नौकरी से नहीं निकालना है। अच्छा होता वो पलायन कर गए लाखों लोगों को भरोसा देते कि वो उनके लिए बेहतर देश बनाएंगे। अच्छा होता कि वो लोगों को यह बताते कि देश में स्वास्थ सेवाओं की अभी क्या स्थिति है। कोरोना से लड़ने के लिए उनकी क्या तैयारी है। यही बताते कि देश भर के कितने लोगों ने प्रधानमंत्री राहत मदद कोष में योगदान दिया है। यही बता देते कि मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर उन्होंने क्या बात की, और राज्यों की क्या तैयारियां हैं। यही बताते कि पार्टी लाइन से अलग होकर देश के सभी राज्यों की सरकारें कैसे एक साथ मिलकर इस खतरे को रोक देंगी। अगर वो इतना कुछ कर पाते तो भारत के लोगों में एक भरोसा जगता। वरना अगर थाली और ताली ही बजवानी है और दीया जलाने की अपील ही करनी है तो मोदी जी हम ऐसा करते हैं कि आपकी तस्वीर फ्रेम करवा कर घर में टांग लेते हैं। एक मोदी चालीसा भी बंटवा दीजिये, उसमें ये निर्देश दे दीजिए कि साल के 365 दिन हमें क्या-क्या करना है। आप भी निश्चिंत, आपकी रियाया (जनता) भी निश्चिंत। … हद है, बत्ती जला कर आप गरीबों के जीवन से अंधकार मिटाएंगे।

आनंद तेलतुंबडे पर गिरफ्तारी की तलवार, रिहाई के लिए दिग्गजों ने चलाया अभियान

अंतरराष्ट्रीय स्तर के दलित विद्वान आनंद तेलतुंबडे और गौतम नवलखा को गिरफ्तारी से बचाने के लिए भारत सहित दुनिया भर के विद्वान सामने आए हैं। इन लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर इन दोनों की गिरफ्तारी नहीं करने की अपील की है। इस अभियान में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान से लेकर एक्टिविस्ट और राजनीतिज्ञ तक शामिल हैं। जिन प्रमुख लोगों ने इस ऑनलाइन पिटिशन में हस्ताक्षर किया है, उनमें नोम चोमस्की, गायत्री स्पिवक, सुखदेव थोराट, कॉर्नेल वेस्ट, एंजेला डेविस, क्षम सावंत, रामचंद्र गुहा, प्रकाश अंबेडकर, अरुंधति रॉय, आनंद पटवर्धन, रॉबिन डी.जी. केली आदि शामिल हैं। इस ऑनलाइन अभियान में अब तक पांच हजार से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किया है। विगत 16 मार्च को भीमा कोरेगांव मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं गौतम नवलखा और आनंद तेल्तुम्बडे की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने उन्हें सरेंडर करने के लिए तीन हफ्ते का वक्त दिया था, जो 6 अप्रैल को पूरा हो रहा है। कोर्ट ने उन्हें अपने पासपोर्ट भी सरेंडर करने को कहा है। बता दें कि पुणे की पुलिस ने कोरेगांव भीमा गांव में एक जनवरी, 2018 को हुई हिंसा की घटना के बाद गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबडे और कई अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ माओवादियों से कथित संपर्क रखने के आरोप में मामला दर्ज किया था। हालांकि दोनों ने पुलिस के इन आरोपों से इंकार किया था और अदालत में अपील की थी। पुणे की सत्र अदालत से राहत नहीं मिलने पर गौतम नवलखा और आनंद तेल्तुम्बडे ने गिरफ्तारी से बचने के लिए पिछले साल नवंबर में बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। वहां से भी राहत नहीं मिलने पर उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ इन दोनों ने शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने भी उन्हें राहत देने से इंकार करते हुए सरेंडर करने को कहा है। इस मामले में आनंद तेलतुंबडे के वकील कपील सिब्बल हैं। ऐसे में अब सिविल सोसाइटी के लोगों ने ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान चलाकर सरकार और कोर्ट पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। उनकी गिरफ्तारी का विरोध करते हुए जो तर्क दिया गया है, वह देखिए। ————————- हम नीचे हस्ताक्षरित व्यक्ति और संगठन प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबडे और गौतम नवलखा की आसन्न गिरफ़्तारी और उनकी छवि को धूमिल करने के प्रयासों की निंदा करते हैं। इन दोनों की गिनती भारत के सबसे प्रमुख नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों में होती है। 26 मार्च, 2020 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. तेलतुंबडे और श्री नवलखा की अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी। अब उनके पास 6 अप्रैल, 2020 तक पुलिस के सामने ‘समर्पण’ का समय है। हम पूरी शिद्दत के साथ मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के बेंच से कोविड- 19 महामारी के ख़तरे और उससे डॉ. तेलतुंबडे और श्री नवलखा के जीवन को होने वाले नुक़सान का संज्ञान लेने का अनुरोध करते हैं। दोनों वरिष्ठ नागरिक हैं और उन्हें पहले से ही कुछ बीमारियाँ हैं जो उनके जेल जाने पर संक्रमण के सर्वाधिक ख़तरे को पैदा कर देंगी। इस समय उनका बंदी बनाया जाना उनके स्वास्थ्य और जीवन दोनों के लिए ख़तरनाक होगा। हम न्यायिक पदाधिकारियों से अपील करते हैं कि वे कम से कम गिरफ़्तारी के अपने आदेश को इस तरह से बदल दें कि वह इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट के पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद लागू हो, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन को कोई ख़तरा न रहे। आप भी नीचे दिये लिंक पर जाकर पिटिशन साइन कर सकते हैं। https://indiacivilwatch.org/statement-hindi/