आषाढ़ी पूर्णिमा पर बुद्ध ने क्या उपदेश दिया, यहां पढ़िए

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने इस दिन 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग किया था। आषाढ़ पूर्णिमा को धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन सारनाथ में सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने सारनाथ जाकर इसिपत्तन मृगदाय वन में पंचवर्गीय भिक्खुओं को प्रथम धम्म प्रवचन दे कर धम्म चक्र प्रवर्तन सूत्र की देशना की थी। बुद्ध ने पांच परिव्राजकों को संबोधित करते हुए कहा- भिक्खुओं, जो परिव्रजित हैं उन्हें दो अतियों से बचना चाहिए, पहली अति है कामभोगों में लिप्त रहने वाले जीवन की, यह कमजोर बनाने वाला है। दूसरी अति है आत्मपीड़ा प्रधान जीवन की जो कि दुःखद होता है, व्यर्थ होता है और बेकार होता है। इन दोनों अतियों से बचे रहकर ही तथागत ने मध्यम मार्ग का अविष्कार किया है। यह मध्यम मार्ग साधक को अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाला है, बुद्धि देने वाला है, ज्ञान देने वाला है, शांति देने वाला है, संबोधि देने वाला है और पूर्ण मुक्ति अर्थात निर्वाण तक पहुंचा देने वाला है। यह मध्यम मार्ग आर्य आष्टांगिक मार्ग है। इस आर्य आष्टांगिक मार्ग के अंग हैं:-
  1. सम्यक् दृष्टि
  2. सम्यक् संकल्प
  3. सम्यक् वचन
  4. सम्यक् कर्मान्त
  5. सम्यक् आजीविका
  6. सम्यक् व्यायाम
  7. सम्यक् स्मृति
  8. सम्यक् समाधि
बुद्ध ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा- भिक्खुओं, पहला आर्यसत्य यह है कि जीवन में दुःख है- जन्म लेना दुःख है, बुढ़ापा आना दुःख है, बीमारी दुःख है, मुत्यु दुःख है, अप्रिय चीजों से संयोग दुःख है, प्रिय चीजों से वियोग दुःख है, मनचाहा न होना दुःख है, अनचाहा होना दुःख है, संक्षेप में पांच स्कंधों से उपादान (अतिशय तृष्णा का होना) दुःख है। अब हे भिक्खुओं, दूसरा आर्यसत्य यह है कि इस दुःख का कारण हैः राग के कारण पुनर्भव अर्थात पुनर्जन्म होता है, जिससे इस और उस जन्म के प्रति अतिशय लगाव पैदा होता है, यह लगाव काम-तृष्णा के प्रति होता है, भव-तृष्णा के प्रति होता है और विभव तृष्णा के प्रति होता है; अब हे भिक्खुओं, तीसरा आर्यसत्य है दुःख निरोध आर्यसत्य, इस तृष्णा को जड़ से पूर्णतः उखाड़ देने से इस दुःख का, जीवन-मरण का जड़ से निरोध हो जाता है। और अब हे भिक्खुओं, चौथा आर्यसत्य है दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख से मुक्ति का मार्ग), इस दुःख को जड़ से समाप्त किया जा सकता है और जिसके लिए तथागत ने आठ अंगों वाला आर्य आष्टांगिक मार्ग खोज निकाला है जो साधक को सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि हैं। इस प्रकार हे भिक्खुओं, इन चीजों के बारे में मैंने पहले कभी सुना नहीं था, मुझमें अंतर्दृष्टि जागी, ज्ञान जागा, प्रज्ञा जागी, अनुभूति जागी और प्रकाश जागा। बुद्ध ने अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा: हे भिक्खुओं जब मैंने अपनी अनुभूति पर इन चारों आर्य सत्यों को इनके तीनों रूपों के साथ, और उनकी बारह कड़ियों के साथ, पूर्ण रूप से सत्य के साथ जान लिया, पूरी तरह समझ लिया और पूरी तरह अनुभव कर लिया, उसके बाद ही मैंने कहा कि मैंने सम्यक् सम्बोधि प्राप्त कर ली है, इस तरह मुझमें ज्ञान की अंतर्दृष्टि जागी, मेरा चित्त सारे विकारों से मुक्त हो गया है। हे भिक्खुओं जब मैंने अुपने स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभवों से और पूर्ण ज्ञान और अंतर्दृष्टि के साथ इन चारों आर्यसत्यों को जान लिया, यह मेरा अंतिम जन्म है अब इसके बाद कोई नया जन्म नहीं होगा। बुद्ध के इन चार आर्यसत्यों और आर्य अष्टांगिक मार्ग को सुनकर कौंङन्न के धर्मचक्षु जागे और उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता है, जिसका उत्पाद होता है उसका व्यय होता है। कौंङन्न के चेहरे के भावों को देखकर बुद्ध ने कहा- कौंङन्न् ने जान लिया. कौंङन्न ने जान लिया. इसलिए कौंङन्न का नाम ज्ञानी कौंङन्न पड़ गया। बुद्ध के इस उपदेश से कौंङन्न के अंदर भवसंसार चक्र, धम्म चक्र में परिवर्तित हो गया, इसलिए इस प्रथम उपदेश को धम्मचक्र प्रवर्तन सुत्त कहते हैं। पांचों भिक्खुओ ने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया और उन पांच भिक्खुओं को अपना शिष्य स्वीकार करने की प्रार्थना की, बुद्ध ने उनको अपना शिष्य स्वीकार किया इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। बुद्ध ने यह उपदेश आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन दिया था, इसलिए बौद्धों में आषाढ़ पूर्णिमा पवित्र दिन माना जाता है। इस पूर्णिमा से भिक्खुओं का वस्सावास (वर्षावास/चातुर्मास) अर्थात मानसून के महीने में एक ही स्थान पर निवास करना) आरंभ होता है, इस दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाओं द्वारा महाउपोसथ व्रत रखा जाता है। बौद्ध विहारों में धम्म देशना के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इसके लेखक आनंद श्रीकृष्ण हैं। आनंद जी, बौद्ध चिंतक एवं साहित्यकार हैं।

बार-बार झूठ क्यों बोलते हैं बाबा रामदेव

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कोरोना वायरस की दवाई के लिए दुनिया भर के डॉक्टर अभी रिसर्च कर रहे हैं। हार्वर्ड से लेकर ऑक्सफोर्ड तक को कोशिशों के बाद भी इसमें सफलता नहीं मिली है। लेकिन भारत में बाबा रामदेव और पतंजलि ने दावा कर दिया है कि उन्होंने कोरोना की दवा बना ली है। बाबा रामदेव ने 23 जून की दोपहर 1 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बात का ऐलान किया कि पतंजलि कोरोना वायरस मरीजों को ठीक करने वाली ‘कोरोनिल’ दवा बनाने में कामयाब हो गई है। लेकिन रामदेव के दावे की हवा तुरंत तब निकल गई जब ‘कोरोनिल’ को लेकर आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद) और आयुष मंत्रालय दोनों ने पल्ला झाड़ लिया। मंत्रालय ने कहा कि बाबा रामदेव ने इस बारे में जरूरी नियमोँ का पालन नहीं किया। यह सकते में डालने वाली बात इसलिए थी क्योंकि ICMR और आयुष मंत्रालय के जिम्मे किसी भी नई दवा को प्रमाणित करने का अधिकार होता है। यानी कि बाबारामदेव और पतंजलि ने बिना सरकारी अनुमति और पुष्टि को ही दवा के नाम की घोषणा कर दी। और सिर्फ घोषणा ही नहीं कि बल्कि ‘कोरोनिल’ से सात दिन के अंदर 100 फीसदी रोगियों के रिकवरी का दावा भी किया। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से मंत्रालय को बताया गया कि ये क्लीनिकल ट्रायल जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च (नेम्स) में किया गया था। हालांकि पतंजलि का यह दावा तब झूठा साबित हुआ जब राजस्थान सरकार ने बाबा रामदेव के कोरोना की दवा कोरोनिल खोजने के दावे को फ्रॉड करार दे दिया। खुद राजस्थान के स्वास्थ मंत्री रघु शर्मा ने पतंजलि के इस दावे पर सवाल उठा दिया। तो वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च विश्वविद्यालय (नेम्स) में गुना कैंट को लेकर जाने वाले जयपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी भी बाबारामदेव के दावे को झूठा बताया। पतंजलि के एक और झूठ का पर्दाफाश खुद आयुष मंत्रालय ने किया। मंत्रालय के मुताबिक आयुष मंत्रालय में पतंजलि की ओर से जो रिसर्च पेपर दाखिल किया गया है, उसके अनुसार कोरोनिल का क्लीनिकल टेस्ट 120 ऐसे मरीजों पर किया गया है, जिनमें कोरोना वायरस के लक्षण काफी कम थे। पतंजलि के दावे पर क्या कहता है हमारा कानून
  • आयुष मंत्रालय के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार पतंजलि को आईसीएमआर और राजस्थान सरकार से किसी भी कोरोना की आयुर्वेद दवा की ट्रायल के लिए परमिशन लेनी चाहिए थी, मगर बिना परमिशन के और बिना किसी मापदंड के ट्रायल का दावा किया गया है, जो कि गलत है।
  • डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी एक्ट 2005 के तहत अगर कोई व्यक्ति गलत दावा करता है तो इसे दंडनीय अपराध माना जाता है। जहां तक कोरोनिल दवाई को लेकर दावे की बात है तो वो संबंधित कानूनी प्रावधान का उल्लंघन है।
  • कानून दवा बनाने के लिए लाइसेंस देता है, दावा करने के लिए नहीं। 100% क्योर के दावे के बाद DMA कानून (डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी एक्ट 2005) को आपत्ति इसी दावे पर है। जिसमें एक साल से सात साल तक की सजा हो सकती है।
  • ये वैश्विक महामारी है लिहाजा विदेशों में भी मुकदमे दर्ज हो सकते हैं। वैसे ही जैसे अमेरिका में चीन के खिलाफ हुए हैं।
  • इस तरह का प्रचार करना कि इस दवाई से कोरोना का 100 प्रतिशत इलाज होता है, ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 का उल्लंघन है.
इन तमाम खबरों के बीच बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोई व्यक्ति या संस्थान तमाम सरकारी नियमों की अनदेखी कर कोरोना एक गंभीर बीमारी के बारे में इतना गैर जिम्मेदार कैसे हो सकता है? और सरकार इन तमाम लापरवाहियों पर आंखें कैसे मूंद रख सकती है। क्या दुनिया के किसी जिम्मेदार देश में एक महामारी से संबंधित दवा बनाने के खोखले दावे पर संबंधित व्यक्ति या संस्था पर कोई कार्रवाई नहीं होती? लेकिन अगर भारत में रामदेव और पतंजलि के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये पर सरकार ने आंखे फेर रखी है तो बड़ा सवाल सरकार पर भी है। सवाल यह भी है कि बाबा रामदेव बार-बार झूठ क्यों बोलते हैं, और बार-बार बच कर कैसे निकल जाते हैं।

रामदेव और पतंजलि के 10 झूठ, जो देश से बोला गया

कोविड-19 यानि कोरोना को मिटाने का दावा करने वाले बाबा रामदेव की दवा कोरोनिल पर राजस्थान सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने तो रामदेव को चेतावनी दी है कि हमारी सरकार महाराष्ट्र में नकली दवाओं की बिक्री की अनुमति नहीं देगी। इन राज्यों ने कहा है कि केन्द्रीय आयुष मंत्रालय की स्वीकृति के बिना कोविड-19 महामारी की दवा के रूप में किसी भी आयुर्वेदिक औषधी का विक्रय नहीं किया जा सकता। तो वहीं उत्तराखंड के आयुर्वेद ड्रग्स लाइसेंस अथॉरिटी ने रामदेव को उनकी नई दवा कोरोनिल के लिए नोटिस जारी किया है। यह नोटिस दवा के संबंध में ग़लत जानकारी देने के लिए जारी किया गया है। दरअसल बाबारामदेव और पतंजलि ने अपनी दवा को बेचने और मुनाफा कमाने के लिए अपने उपभोक्ताओं से लेकर सरकार तक से झूठ बोला। आइए एक नजर डालते हैं रामदेव और पतंजलि के 10 बड़े झूठ पर। झूठ नंबर-1 बाबारामदेव और पतंजलि ने सबसे बड़ा झूठ आयुष मंत्रालय से बोला है। आयुष के संयुक्त निदेशक डॉ वाईएस रावत ने कहा कि हमने कोरोना की दवा के लिए कोई लाइसेंस ही जारी नहीं किया। दरअसल दिव्य फार्मेसी ने इम्युनिटी बूस्टर के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था और कोरोना की दवा बना दी। झूठ नंबर-2 रामदेव और पतंजलि ने न सिर्फ बिना सरकारी मंजूरी के दवा को लोगों के सामने पेश कर दिया। और बड़े-बड़े दावे कर दिए। जबकि इस तरह का प्रचार करना कि पतंजलि की दवाई से कोरोना का 100 प्रतिशत इलाज होता है, ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 का उल्लंघन है। झूठ नंबर-3 पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से मंत्रालय को बताया गया कि ये क्लीनिकल ट्रायल जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर (निम्स) में किया गया था, लेकिन राजस्थान के स्वास्थ मंत्री रघु शर्मा ने खुद पतंजलि के इस दावे पर सवाल उठा दिया। निम्स ने भी पतंजलि के दावे को गलत बताया। झूठ नंबर-4 सामान्य परिस्थितियों में किसी दवा को विकसित करने और उसका क्लिनिकल ट्रायल पूरा होने में कम से कम तीन साल तक का समय लगता है लेकिन अगर स्थिति अपातकालीन हो तो भी तमाम जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा कर किसी दवा को बाज़ार में आने में कम से कम दस महीने से सालभर तक का समय लग जाता है। लेकिन पतंजलि ने अचानक से एक गंभीर बीमारी की दवा को लांच कर दिया। यह आश्चर्यजनक था।  झूठ नंबर-5 पहले बाबा रामदेव कह रहे थे कि नाक में सरसों का तेल डालने से कोरोना मर जाएगा। अब कह रहे हैं कि कोरोनिल आने से कोरोना मर जाएगा। अगर सरसों का तेल कोरोना मार दे रहा था तो कोरोनिल खोजने की जरूरत क्यों पड़ी। यानी की सरसों तेल से कोरोना खत्म होने की बात झूठी थी। झूठ नंबर-6 पहले रामदेव कहते थे कि वे कई असाध्य रोगों का इलाज योग से कर सकते हैं, दवा की जरूरत नहीं है। वो प्राणायाम से आजीवन स्वस्थ रहने की बात कहते थे, फिर खुद ही दवा भी बेचने लगे। लेकिन खुद बीमार होने पर रामदेव अस्पताल में भर्ती हुए, न उनकी अपनी दवाएं काम आईं, न योग। झूठ नंबर-7 पहले बाबारामदेव चैनलों पर बताते थे कि मैगी, पास्ता आदि खाने के परिणाम बेहद गंभीर होते हैं, फिर बाबा खुद मैगी से लेकर मसाला तक सब बेचने लगे। इसका मतलब यह हुआ कि मैगी और पास्ता के बारे में गलत प्रचार कर रहे थे। यानी की झूठ बोल रहे थे। झूठ नंबर-8 बाबारामदेव ने एड्स का इलाज करने का दावा किया, ऐसी दवा बनाने का दावा किया जिससे महिलाएं सिर्फ पुत्र को जन्म दे सकती हैं। कैंसर के इलाज का भी दावा किया, लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इसकी निंदा की। केंद्र सरकार ने उन्हें नोटिस थमाया। यानी कि रामदेव कई मौकों पर अपने मुनाफे के लिए झूठ बोलते रहे हैं। झूठ नंबर-9 आयुष मंत्रालय के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार पतंजलि को आईसीएमआर और राजस्थान सरकार से किसी भी कोरोना की आयुर्वेद दवा की ट्रायल के लिए परमिशन लेनी चाहिए थी, मगर बिना परमिशन के और बिना किसी मापदंड के ट्रायल का झूठा दावा किया गया। झूठ नंबर-10 बाबारामदेव ने सात दिन के अंदर 100 फीसदी रोगियों के रिकवरी का दावा भी किया। एक ऐसी बीमारी जिसको लेकर जनता के मन में भारी डर बैठा हुआ है, उसके बारे में भ्रामक जानकारी देना उपभोक्ताओं यानि देश की जनता के साथ एक भद्दा मजाक और बड़ा झूठ है। इस घटनाक्रम में आयुष मंत्रालय द्वारा दिव्य फार्मेसी को जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है। मंत्रालय का कहना है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है तो लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है। तो दूसरी ओर आचार्य बालकृष्ण की ओर से आयुष मंत्रालय को कुछ कागजात भेजने की खबरें भी आ रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पतंजलि पर 420 यानी धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए। या फिर रामदेव और पतंजलि पहले की ही तरह सरकारी शह पर इस बार भी बच कर निकलने में कामयाब हो जाएंगे।

आरक्षण खत्म होने पर दलित जातियों पर पड़ने वाला सामाजिक प्रभाव क्या होगा?

Written By- पंकज टम्टा संभवतः ‘आरक्षण’ एक ऐसा विषय है, जिसने दलित जातियों को एक साथ बांध रखा है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षण के समाप्त होते ही दलित जातियों के बने गुटों के आपसी  रिश्तों में तनाव आ जाए। बाबा साहब और समाज के नाम पर एकजुट होने के चलते दलित जातियों ने केवल अपने जातीय संगठन ही बनाये। इसमें दोष वर्तमान पीढ़ी का नहीं। यदि इतिहास में देखा जाए तो हुआ यही है कि जो भी व्यक्ति सामाजिक और राजनैतिक रूप से सबल हुआ उसने अपनी जाति को संगठित किया। कुछ हद तक इसने समाज में कुछ एक खास दलित जातियों को उनकी खोई पहचान भी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। क्योंकि अस्पृश्यता का व्यवहार सभी जातियों के साथ अलग अलग तरह से होता था। इसलिए जो संगठित हो गए उनके साथ इसकी भयावयता कुछ कम हुई। यही कारण है कि दलित जातियों ने सजातीय संगठनों में एकजुट होना सही समझा। लेकिन आरक्षण एक ऐसा विषय बना जिसने सभी दलित जातियों और उनके संगठनों को एक मंच पर आने पर मजबूर किया। संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति के रूप में जाने जाने के बावजूद भी दलित जातियां सामाजिक रूप से एक नहीं हो पाई हैं। आज भी इन जातियों में सामाजिक विभेद बहुत बड़े स्तर पर दिखता है। संविधान बनने के इतने वर्ष बाद भी सामाजिक रूप से एक न हो पाना दलित समाज की सबसे बड़ी नाकामी है।

इस नाकामी से बचने के लिए क्या किया जाए?

दलित जातियों के नाम पर बने संगठन जैसे शिल्पकार चेतना मंच, टम्टा सभा, वाल्मीकि सभा, चमार संगठन, जाटव सभा आदि दलित जातियों में विभेद करने वाले संगठनों को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इस प्रकार के शब्दों में सामाजिक रूप से पहल करते हुए पाबंदी लगाई जाए। यदि ऐसा नहीं होगा तो इसका बहुत बड़ा खामियाजा पूरे दलित समाज को तब भुगतना पड़ेगा जब हमसे आरक्षण छीन जायेगा! आरक्षण के मुद्दे पर एक होने के चलते व सामाजिक रूप से अलग -अलग रहकर हम अपने विरोधी को एक ऐसा अवसर मुहैया करा रहे हैं जब वह एक तीर से दो शिकार कर सकता है। आरक्षण के खत्म होते ही, दलितों के जातियों के आधार पर बने संगठनों के बीच आपसी वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो जाएगी। जिसमें फिर दलित जातियों के संगठन आपस में ही एक दूसरे को खत्म करने से पीछे नहीं हटेंगे। क्योंकि फिर इनके पास कहने को केवल यही आत्मसम्मान बचेगा की दलित जातियों में कौन किससे बड़ा है। इस प्रकार के संभावित वर्ग संघर्ष या यूं कहें कि दलित जातियों के बीच होने वाले जातीय संघर्ष को टाला जा सकता है। इसके लिए करना यह है कि दलित जातियों के बीच पनप रही जातीय अहम की भावना का समूल अंत कर दिया जाए, और ऐसे शब्दों का विलोप हो जो दलित जातियों में जाति भेद करते हो। मेरा ताल्लुक उत्ताखंड से है। मुझे वहां एक शब्द हमेशा से चुभता है जो है ‘शिल्पकार। कुमाऊं के दलित समाज में अब इस शब्द का विलोप हो जाना चाहिए क्योंकि यह शब्द दलित जातियों में विभेद पैदा करता है। यह कुछ दलित जातियों को श्रेष्ठ और कुछ को निकृष्ट बताता है जबकि सवर्णों की दृष्टि में सभी दलित एक समान है और वे सभी से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी वे कर सकते हैं।

यदि जातीय विभेद के शब्द ना अपनाए तो फिर क्या करे?

आज दलित समाज को ऐसी शब्दावली की जरूरत है जो जातीय विभेद न पैदा करती हो। जैसे बाबा साहब आंबेडकर के नाम की तरह जातीय नाम की जगह स्थान विशेष के नामों का प्रयोग करना। जिनसे किसी भी प्रकार के छोटे बड़े व्यवसाय का पता नहीं चलता है। ऐसे नामों का भी प्रयोग किया जा सकता है जो सभी में समान रूप से स्वीकार हो। लेकिन ऐसे नामों की खोज सभी को एक साथ मिलकर, सामाजिक रूप से एक साथ आकर करनी होगी। महज आरक्षण के मुद्दे पर एकजुट दिखने वाले दलित समाज के बारे में यह सोच लेना की समाज एक हो गया है निरी मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं है। इससे आगे चलकर अगर समाज एक होता है तो सामाजिक रूप से एक होने के बहुत से फायदे समाज को मिलेंगे। लेकिन समाजिक रूप से एक दलित समाज तभी माना जाएगा, जब दलित वर्ग के हर जाति बिरादरी के लोगो में आपस में रोटी – बेटी के संबंध स्थापित करेंगे। वरना समाज लाख ढकोसला कर ले, सामाजिक एकता का जो द्वंद है वो समाज के सामने आज नहीं तो कल आ ही जायेगा।


इस आलेख के लेखक पंकज टम्टा सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

क्या इस पितृ दिवस से आप अपने बच्चों के नाम चिट्ठी लिखना शुरू करेंगे

  Written By- अरविंद सिंह आज अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस है। मैं ऐसी पीढ़ी से आता हूं जिसके पास अपने पिता की धरोहर के रूप में उनकी लिखी सैकड़ों चिट्ठियां हैं। उनको आज भी सहेज कर रखा है मैने। मौके बेमौके पढ़ता हूं तो लगता है जैसे वे मेरी तमाम चुनौतियों का जवाब तलाश देती हैं। कुछ में वैसी ही उलाहनाएं है जो मैं अपनी बेटी से करता हूं, कुछ में वैसी ही सराहनाएं हैं। कुछ में डांट फटकार है तो कुछ में ऐसी नसीहतें जो आज भी काम आ रही हैं। लेकिन संचार क्रांति के बीच जी रही हमारी नयी पीढ़ी ऐसी चिट्ठियों से वंचित है। लेकिन उसके लिए मैं उनको दोष नहीं देता। दोषी तो मैं खुद और हमारी पूरी पीढ़ी ही है। तो क्या इस पितृ दिवस से गाहे बगाहे ही सही अपने बच्चों को आप चिट्ठी लिखना आरंभ करेगे? 1980 में पिता से अलग होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय गया तो कोई सप्ताह न जाता होगा जिसमें उनकी कोई चिट्ठी न आती रही हो। मैं भी जवाब लिखता ही था। पिताजी की हैंडराइटिंग भी बहुत अच्छी थी और उनका हर पत्र केवल घर परिवार ही नहीं पूरे इलाके का अखबार सा भी होता था। कभी कुछ रोचक चिट्ठियां साझा करूंगा लेकिन फिलहाल प्रसंग अलग है। भारतीय डाक पुस्तक मैंने लिखी तो कई खंडों में भारतीय डाक सेवा की अधिकारी श्रीमती पी गोपीनाथ से काफी मदद मिली। बाद में वे इस विभाग की सचिव भी रहीं। एक दिन बंगलूरू में पढ़ रही अपनी बेटी को एक कार्ड में कुछ खास हिदायतें हाथ से लिख कर भेजी। कुछ दिनों बाद गयीं तो देखा कि उसने अपनी पढ़ाई के टेबुल के ठीक ऊपर करीने से लगा कर रखा था। यानि रोज देखती थी उसे। चिट्ठियों की अपनी ताकत है लेकिन हम लोगों ने ही अपने बच्चों के लिए चिट्ठी लिखना बंद कर दिया है और उसके महत्व से उनको कभी बताते नहीं तो वे क्या लिखेंगे। लेकिन दुनिया के तमाम हिस्सों में चिट्ठियों को लिखने लिखाने और एक दूसरे को चिट्ठियों से जानने समझने का आंदोलन सा चल रहा है। हम सभी चिट्ठियों की कीमत को जानते हैं। एक पिता के लिखे पत्र की कीमत और ताकत क्या होती है, यह हम सबको पता है। नौजवान साथियों को समझना होगा कि चिट्ठियां मोबाइल से कितनी ज्यादा ताकवर हैं। अभी भी उनको लिखना जारी रखा जा सकता है क्योंकि वैसी ताकत आज भी किसी औऱ विधा में नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह ने यह पोस्ट फेसबुक पर लिखी थी। वहां से साभार प्रकाशित।

फादर्स डे पर पत्रकार उर्मिलेश ने अपने किसान पिता को यूं किया याद

Written By- Urmilesh सुबह-सुबह आज ‘बाबू’ की याद आई। मां-पिता के गये वर्षों गुजर गये पर हर दुख-सुख में, कोई काम करते, खेत-खलिहानों की तस्वीरें देखते या उनसे होकर गुजरते, हंसते-बोलते या अपनी तरफ का कोई खास पकवान खाते हुए, वे अक्सर ही याद आते हैं। जब मैं बहुत दुखी होता हूं, तब तो वे जरूर याद आते हैं। ऐसा लगता है, मानो वो सामने खड़े हैं और मैं उनसे अपना दुख ‘शेयर’ कर रहा हूं या दुख को स्वयं ही बुलाने वाली अपनी गलती उनके सामने स्वीकार कर रहा हूं। आज कुछ यूं हुआ कि अपनी एक पूर्व-सहकर्मी की पोस्ट देखी। उन्होंने अपने सेवानिवृत्त पिता की बागवानी और साग-सब्ज़ियों के प्रति गहरे लगाव पर लिखा था। वह पढ़ते हुए मैं अपनी स्मृतियों के बेहद खूबसूरत गलियारे की सैर करने लगा। मैं गांव की उस खंड़ी में जा पहुंचा, जिसे मौसम-बेमौसम मेरे बाबू फूल-पौधों और साग-सब्जियों से भर देते थे। मेरे बाबू बहुत छोटे और साधारण किसान थे। कम रकबे वाले। संभवतः इसी के चलते उनको खेती से ज्यादा साग-सब्जी और फल-फूल उगाने का शौक पैदा हुआ होगा। खेती से किसी तरह हमारे छोटे से परिवार का काम भर चल जाता था। उन दिनों गांव के बाहर हमारी एक खंड़ी (अहाते के लिए भोजपुरी शब्द) थी। उसमें हमारे बाबू इतनी सब्जियां उगाते थे कि मोहल्ले के कई घरों के लोग खंड़ी से बेहिचक सब्जियां तोड़ ले जाते। किसी को कभी रोका नहीं जाता। सुबह और शाम, वहीं पर पिताजी की ‘बैठकी’ जमती थी। ‌घर से चाह (चाय के लिए भोजपुरी शब्द) बनवाकर ले आने की जिम्मेदारी यदा-कदा मैंने भी निभाई थी। ‘माई’ बड़का लोटा में चाय देतीं और कपड़े में लपेटकर मैं ले जाता ताकि हाथ न जले। हरी सब्जियों के खेत या कहीं भी उगी हुई हरी सब्जियां देखकर आज भी मुझे अपने दिवंगत बाबू तुरंत याद आ जाते हैं। मेरा जन्म यूपी के गाजीपुर जिले के एक बड़ी आबादी वाले गांव के एक बहुत मामूली और छोटे किसान परिवार में हुआ। हम दो ही भाई थे। हम दोनों अपने पिता जी को शुरू से आखिर तक ‘बाबू’ और माताजी को ‘माई’ कहते थे। मेरे बाबू सरजू सिंह यादव अपने पिता यानी मेरे बाबा(पूर्वांचल में आमतौर पर दादा को बाबा कहा जाता है) राम करन यादव के इकलौते पुत्र थे। बाबा का निधन बहुत कम उम्र में हो गया था। मेरी आजी का निधन भी बहुत जल्दी हो गया। इस तरह मेरे बाबू बचपन में ही ‘टुअर ‘(अनाथ) हो गये। हम दोनों भाइयों ने सिर्फ अपने बाबा-आजी का जिक्र ही सुना, कभी उनकी तस्वीर भी नहीं देखी। उन दिनों गरीब परिवार भला कहां से फोटो खिंचवाते और वो भी क्यों? पिता निरक्षर रहे क्योंकि उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल कौन भेजता। जब वह कुछ बड़े हुए तो संयुक्त खेतिहर-परिवार में जमीन-जायदाद में वाजिब हिस्सेदारी भी नहीं मिली। पर उन्होंने उसे मुद्दा नहीं बनाया। जब उनकी शादी हुई और मेरी मां उनके जीवन में आईं तो पिता के काका जी आदि यानी पूर्व के साझा परिवार वालों ने काफ़ी कहने-सुनने के बाद थोड़ी सी खेतिहर जमीन दी। वैसे साझा परिवार के पास भी ज्यादा ज़मीन-जायदाद नहीं थी। खेती-बाड़ी के अलावा पशुपालन से वे लोग भी किसी तरह जीवन बसर कर रहे थे। पर ले-देकर खाने-पीने का कोई कष्ट नहीं था। कथित बंटवारे और शादी के बाद हमारे बाबू और माई को काफी समय कष्ट में बिताने पड़े। लेकिन दोनों ने कभी छोटे-मोटे कष्टों की परवाह नहीं की। तरह-तरह के काम-धंधे करके जीवन को सहज और सुंदर बनाने में जुटे रहे। मज़े की बात कि ग़रीबी के बावजूद मेरे मां-पिता ने हमारे पूर्व के साझा परिवार वालों की तरह कभी भी दूध-दही नहीं बेचा। खंड़ी से सब्जियां और खेत से खाने-पीने भर अनाज पैदा होता रहा। पिता जब तक स्वस्थ रहें, खंड़ी में आलू, प्याज, टमाटर, बैंगन, नेनुआ, लौकी, तरोई, लतरा, भिंडी और करैला जैसी सब्जियां और समय-समय पर केला और पपीता जैसे फल भी पैदा होते रहे। अपनी छोटी साधारण गृहस्थी में बाबू और माई को संभवतः उनके जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली, जब मेरे बड़े भाई केशव प्रसाद ने यूपी बोर्ड से मैट्रिक पास किया। वह भी अच्छे अंकों के साथ। मेरे खानदान ही नहीं, संभवतः गांव में बसे हमारे समूचे समुदाय में मैट्रिक पास करने वाले वह पहले व्यक्ति बने। गांव के एक बेहद गरीब किसान के लिए यह बड़े सपने का पूरा होना था। मेरे माई-बाबू शुरू से ही खेत बढ़ाने या ईंटे का घर बनाने की बजाय हम दोनों भाइयों को अच्छी शिक्षा दिलाने का सपना बुनते थे। पता नहीं, शिक्षा और अक्षर-ज्ञान से वंचित हमारे खानदान और समूचे समुदाय में मेरे मां-पिता को अपने दोनों बच्चों को शिक्षित बनाने का ज्ञान या विचार कहां से मिला था? एक बार मैंने अपने पिता से यह सवाल पूछा भी। संभवतः तब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए अंतिम वर्ष में था। मेरे पिता ने तनिक गर्व के साथ कहा: ‘तोहार बोड़ भाई अब ‘परफेसर’ (लेक्चरर) बन गइलें, तोहरा के ‘जज’ बनावे क मन बा। अब तोहरा के आ तोहरा भैय्या के फैसला करेके बा कि एकरा खातिर का-का पढ़े के परी। इस कइसो होई।’ मैंने मुस्कराते हुए कहा, ‘भैय्या कलक्टर बनावे चाहत बांडन और तू जज कहत बाड़अ। आ, हमार मन कुछ औरिये कहत-आ।’ उन दिनों मैं किसी उच्च शिक्षण संस्थान में अध्यापकी करते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण के एक कार्यकर्ता के तौर पर जीवन बिताने का सपना बुन रहा था। वह बात कहने के बाद अपने पिता की आंखों में मैंने खुशी और गर्व की चमक देखी। फिर कुछ ही देर बाद देखा, चश्मा उतारकर वो आंखों में छलक पड़े अपने आंसुओं को पोंछ रहे हैं। इस हालत में देख मैं भी रो पड़ा। फिर वो मुझे पुचकारने लगे। लंबी कहानी है—लेकिन इसका एक सच ये है कि मैं अपने पिता का सपना पूरा नहीं कर सका। ज़ज नहीं बना। पर अब तक अपने पिता के उस सपने में निहित उनके इच्छित मूल्यों को जीने और उन पर अमल करने में जुटा रहा हूं। अन्याय और अत्याचार के हर खूंखार अंधड़ से जूझने और उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की हरसंभव कोशिश करता आ रहा हूं। जिन दिनों मेरे पिता का निधन हुआ, मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी के साथ MA और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU ) से M।Phil करने के बाद बेरोजगार था। कई विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में इंटरव्यू देकर लगभग निराश हो चुका था। एक इंटरव्यू बंगाल के एक विश्वविद्यालय में होना था, तब तक पिता के गुजर जाने की बुरी खबर मिली। मैं उन दिनों दिल्ली की एक सरकारी कॉलोनी के एक छोटे से कर्मचारी क्वार्टर में रहता था। जीवन-यापन के लिए पत्रकारिता (फ्रीलांस) और अनुवाद आदि का काम शुरू कर चुका था। किसी तरह रूपये-पैसे का जुगाड़ कर गांव‌ पहुंचा। भैय्या नजदीक थे, इसलिए वह पहले ही पहुंच चुके थे। आजीवन यह दुख मुझे सालता रहता है कि मैं उनके अंतिम समय तक रोजगार में नहीं रहा और अपनी इच्छानुसार उनकी अच्छी देख-भाल नहीं कर सका। पंद्रह बीस दिनों बाद गांव से दिल्ली लौटा तो मैंने फिर कभी किसी शिक्षण-संस्थान में लेक्चरशिप के लिए न तो कोई नया आवेदन किया और न ही कहीं इंटरव्यू देने गया। पत्रकारिता में औपचारिक तौर पर दाख़िल होने का फ़ैसला कर लिया था। उन दिनों एक फ्रीलांसर के तौर पर ‘जनसत्ता’, और ‘प्रतिपक्ष’ आदि में खूब लिखता था। पत्रकारिता ही करनी है, इस फैसले के बाद नौकरी की सबसे पहली कोशिश ‘जनसत्ता’ और ‘अमृत प्रभात’ में की थी। दोनों जगह सफल नहीं हुआ। ‘जनसत्ता’ में तो लिखित-परीक्षा लेने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। शीर्ष निर्णयकारी-व्यक्ति ने नतीजे के बारे में पूछने पर बस इतना कहा: ‘लिखते रहिए।’ वो तो मैं पहले से ही लिख रहा था। कुछ ही समय बाद Times of India group के हिंदी अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ में नये पत्रकारों की नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षाएं हुईं। उन दिनों देश के प्रतिष्ठित पत्रकार राजेंद्र माथुर अखबार के प्रधान संपादक थे। बगैर तैयारी के परीक्षा में बैठ गया। बाद में रिजल्ट आया तो मुझे बताया गया कि जितने लोग (कुछ सौ) परीक्षा में बैठे थे, उनमें सफल अभ्यर्थियों के बीच मेरा दूसरा स्थान है। इस तरह पत्रकारिता की औपचारिक और संस्थागत शुरुआत सन् 1986 के अप्रैल महीने में ‘नवभारत टाइम्स’ के पटना संस्करण से ही हुई। इससे पहले कई छोटे-बड़े अखबारों और साप्ताहिकों के लिए जमकर लिखा या अंशकालिक तौर पर काम भी किया। ‘नवभारत टाइम्स’ में काम करते हुए ही मेरी पहली किताब ‘बिहार का सच’ (सन् 1991) में छपी। उसे अपने दिवंगत पिता को समर्पित किया। मेरे पास और था ही क्या, ‘बाबू’ की स्मृति को अपने पास सहेज कर रखने का।
यह संस्मरण वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने फादर्स डे के मौके पर अपने पिता को याद करते हुए फेसबुक पर लिखा है। उनके फेसबुक वॉल से साभार प्रकाशित।

भारत के सवर्ण क्यों नहीं अदा कर सकते अमेरिकी प्रभुवर्ग की भूमिका! 

अमेरिका के मिनीपोलिस की एक पुलिस हिरासत में गत 25 मई को श्वेत पुलिसकर्मी डेरेक चाउविन द्वारा जिस अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की घुटने से गर्दन दबाकर हत्या किए जाने का वीडियो सामने आने के बाद पिछले 52 सालों में उग्र धरना-प्रदर्शनों का जो सबसे बड़ा सिलसिला शुरू हुआ, उनको गत मंगलवार को ह्यूस्टन में दफना दिया गया। इस दौरान अमेरिका के टेक्सास के ह्यूस्टन स्थित ‘ह्यूस्टन मेमोरियल गार्डेन्स कब्रिस्तान’ में हजारों की  संख्या में जमा लोगों ने नम आंखों से उनको अंतिम विदाई दी। लोगों ने नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष जारी रखने का संकल्प भी लिया। बहरहाल फ्लॉयड तो दफन हो गए किन्तु उनकी मौत के बाद विरोध प्रदर्शनों का जो सिलसिला अमेरिका के 50 में से 40 से अधिक राज्यों के लागभग 150 शहरों तक फैला, उनमें खूब कमी नहीं आई है। आज भी ढेरों शहरों में लोग हाथों में ‘नोजस्टिस, नो पीस’ और ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ जैसे नारे लगी तख्तियाँ लिए लिए वह मंजर पैदा कर रहें हैं, जिसे देखकर मौजूदा सरकार की पेशानी पर चिंता की लकीरें और गहरी हुये जा रही है।

पुलिस सुधारों की घोषणा के लिए बाध्य हुये: डोनाल्ड ट्रम्प

इस बीच इस घटना क्रम में एक नया मोड़ यह आया है कि प्रदर्शनकारियों के बढ़ते दबाव के आगे झुकते हुये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पुलिस सुधारों की बात मान ली है। फ्लॉयड के दफनाये जाने के अगले दिन डलास में इस आशय की घोषणा करते हुये उन्होंने कहा कि,’ दो हफ्ते पहले जो कुछ हुआ उससे देश कि प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। पिछले दो हफ्तों में लोग मारे गए और यह अत्यधिक डरावना और अनुचित है। इनमें कई पुलिस  अधिकारी थे। यह बहुत ही खराब स्थिति थी। मैं इसे दोबारा नहीं देखना चाहता।.. हम उस शासकीय आदेश को अंतिम रूप देने पर काम कर रहे हैं जिसमें देशभर में पुलिस विभाग बल प्रयोग के लिए मौजूदा पेशेवर मानकों पर खरा उतर सके।‘ पुलिस सुधार की दिशा में आगे बढना निश्चय ही जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद शुरू हुये धरना प्रदर्शनों की बड़ी विजय है, क्योंकि ये धरना-प्रदर्शन पुलिस सुधारों को लेकर ही शुरू हुये थे। बहरहाल ट्रम्प द्वारा पुलिस सुधारों की घोषणा के बाद जब अमेरिका से शुरू होकर विश्व के कई देशो  तक फैले इन धरना -प्रदर्शनों का सिलसिला थम जाने की उम्मीद दिखने लगी, तभी एक और घटना सामने आ गयी।

एक और नस्लीय हत्या

ट्रम्प द्वारा पुलिस सुधारों में घोषणा के दो दिन बाद ही 12 जून को अटलांटा में एक श्वेत पुलिस अफसर द्वारा रेशर्ड ब्रुक्स नामक एक अश्वेत की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। ब्रुक्स पार्किंग में खड़ी कार में सो रहा था। पुलिस को लगा वह नशे मे हैं। पूछताछ में पुलिस से झड़प हो गयी और ब्रुक्स पुलिस अफसर का गन छीनकर भाग निकला। दूसरे अफसर ने उसका पीछा किया। इतने मे ब्रुक्स पलटा और उसने पुलिस अफसर पर गन तान दी। तभी अफसर ने उस पर गोली दाग दी। बाद में अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गयी। घटना के बाद श्वेत पुलिस चीफ एरिका शिल्ड्स ने इस्तीफा दे दिया। उसकी जगह उनके जूनियर अश्वेत पुलिस अधिकारी रॉडनी ब्रायंट की तैनाती हो गयी। उधर 13 जून को प्रदर्शनकारियों ने उस रेस्तरां में आग लगा दी, जहां ब्रुक्स को गोली मारी गयी थी। अब अटलांटा की घटना के बाद लगता है फ्लॉयड की मौत के बाद धरना-प्रदर्शनों का जो सिलसिला हुआ लगता है वह ट्रम्प द्वारा पुलिस सुधार का आश्वासन दिये जाने के बावजूद आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा।

फ्लॉयड को न्याय दिलाने के अभियान मेँ शामिल हुये विश्वविख्यात एक्टर-स्पोर्ट्समैन!

बहरहाल फ़्लॉयड की मौत के बाद जिस तरह अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया के गोरों के साथ  ढेरों देशों के नामचीन बुद्धिजीवी, संगीतज्ञ, एक्टर, स्पोर्ट्समैन अश्वेतों के समर्थन में उतर आए, उसे हमेशा याद किया जाएगा। कैसे कोई भूल पाएगा कि फ्लायड को न्याय दिलाने के अभियान में टेनिस के मौजूदा दिग्गज और बिग थ्री में शामिल रोजर फेडरर, राफेल नडाल और नोवक जोकोविक भी शामिल हुये थे। बिग थ्री से पहले कई अश्वेत खिलाड़ी भी फ्लॉयड को न्याय दिलाने के लिए आगे आए थे, जिनमें गोल्फर टाइगर वुड्स, पूर्व श्रीलंकाई क्रिकेटर कुमार संगकारा, वेस्ट इंडीज के कप्तान डरेन सामी, क्रिस गेल जैसे बड़े नाम रहे।

चुप्पी साधे रहे भारतीय फिल्मी और खेल सितारे

अब जहां तक भारत का सवाल है जॉर्ज फ्लॉयड को इंसाफ दिलाने के लिये न तो भारत के बुद्धिजीवी-एक्टिविस्ट सड़कों पर उतर रहे हैं, न ही विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर, धोनी जैसे स्पोर्ट्समैन और अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, दीपिका पादुकोण इत्यादि जैसे स्पोर्ट्स और फिल्म स्टार्स ने ही कोई बयान जारी किया। लेकिन भारत के सेलेब्रेटी स्तर के बुद्धिजीवी-एक्टिविस्ट, स्पोर्ट्समैन और फिल्म स्टार भले ही चुप्पी साधे हो, पर फ्लॉयड की मौत को लेकर भारत में भारी संख्या में लोग मुखर हुये और मुखर होने वाले अधिकांश लोग उन समुदायों से हैं, जिन्हें जाति-भेद का सामना करना पड़ता है। हालांकि अगस्त 2014 में फर्ग्यूशन के एक अश्वेत युवक को गोलियों से उड़ाने वाले श्वेत पुलिस अधिकारी डरेन विल्सन पर नवंबर 2014 में ग्रांड ज्यूरी द्वारा अभियोग चलाये जाने से इंकार करने एवं 18 मई, 2015 को 21 साल के श्वेत युवक डायलन रूफ द्वारा साउथ कैरोलिना स्थित अश्वेतों के 200 साल पुराने चर्च में गोलीबारी कर नौ लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद भी अमेरिका में बड़े  पैमाने आज जैसे धरना- प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ था। पर भारत के वंचित समुदायों के लोग आज की भांति उद्वेलित नहीं हुये। इस बार जिस मात्रा में गोरे अश्वेतों के समर्थन में उतरे वैसा पहले के आंदोलनों में नहीं दिखा। एक ऐसे दौर में जबकि मोदी के अमेरिकी क्लोन ट्रम्प अमेरिकी बहुसंख्यकों (गोरों) में अल्पसंख्यकों (अश्वेत,रेड इंडियंस, हिस्पैनिक्स,एशियन पैसेफिक) के प्रति नफरत को तुंग पर पहुंचा कर सत्ता दखल किया हो और इस नफरत की आग को जलाए रखने के लिए का लगातार सत्ता का इस्तेमाल किए जा रहा हो, गोरों का अश्वेतों के समर्थन में अभूतपूर्व संख्या में सड़कों पर उतरना और उग्र धरना- प्रदर्शन करना पूरी दुनिया के साथ भारत के लोगों को भी विस्मित किया और कुछ ज्यादा ही विस्मित किया।

फ़्लॉयड की समस्या को लेकर: पहली बार उद्वेलित हुये बहुजन

वास्तव मे अमेरिकी प्रभुवर्ग का कालों के समर्थन में उतरने ने अगर सबसे अधिक किसी  को चौकाया तो वह भारत का वंचित बहुजन समाज ही है। भारतीय लेखकों और मीडिया के सौजन्य से आम भारतीयों में यही धारणा थी कि जिस तरह भारत का प्रभुवर्ग दलितों के प्रति अमानवीय व्यवहार करते हैं, कुछ वैसा ही अमेरिका के गोरे वहाँ के अश्वेतों के साथ करते हैं। किन्तु विगत दो सप्ताह से आ रही धरना-प्रदर्शनों की खबरों ने अमेरिकी गोरों के प्रति बनाई धारणा को खंड – खंड कर दिया है। इसलिए भारतीय प्रभुवर्ग और सेलेब्रेटीज़ के खिलाफ तंज़ भरी बातों से यहाँ का सोशल मीडिया पट गया। प्राख्यात पत्रकार महेंद्र यादव ने लिखा – ‘कोरोना का डर पीछे छूट गया है।इंसानियत और नागरिक अधिकारों को बचाना ज्यादा जरूरी लग रहा है। खास बात ये है कि डेरेक को कड़ा सजा देने की मांग करने वालों में श्वेत लोग ही ज्यादा हैं। जॉर्ज फ्लॉयड की जान नहीं बचाई जा सकी, लेकिन श्वेत अमेरिकियों ने इंसानियत तो बचा ही ली। डेरेक चाउविन नौकरी से निकाला जा चुका है। 25+10=35 साल की सजा होना भी तकरीबन तय ही है। दूसरी ओर ऐसा मुल्क भी है जहां जाति पूछकर गोली मारने वाला शान से नौकरी करता है। इंस्पेक्टर से लेकर आम नागरिकों की मॉब लिंचिंग करने वालों को मंत्री माला पहनाकर सम्मानित करते हैं। हां, “खास परिस्थितियों” में एक करोड़ का मुआवज़ा और हत्या के संदेह के घेरे में आ रही मृतक की पत्नी को क्लीन चिट देते हुए क्लास वन की नौकरी दे दी जाती है।’

डॉ. आंबेडकर के अनुसार, सामाजिक विवेक से शून्य हैं हिन्दू!

बहरहाल अमेरिका के गोरे अपने यहां के अश्वेतों के प्रति क्यों करुणशील रहते हैं और भारत के सवर्ण दलितों के प्रति क्यों उदासीन रहते हैं, इस सवाल से टकराने का वर्षों पहले बलिष्ठ प्रयास डॉ. आंबेडकर ने ही किया था। स्मरण रहे ज्ञानार्जन के सिलसिले में डॉ. आंबेडकर को तीन साल अमेरिका में गुजारने का अवसर मिला। वहां रहने के दौरान ही उन्हें बुकर टी. वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन जैसे महामानवों के विषय में जानने का अवसर मिला जो बाद मेँ उनके दलित – मुक्ति आंदोलन में उतरने का अन्यतम कारण बना। गोरों के मुकाबले भारत के हिंदुओं, खासकर सवर्णों का व्यवहार कितना अमानवीय है, इसका तुलना करने का बेहतर अवसर उन्हें उसी दौरान मिला। अमेरिका और भारत के प्रभुवर्ग के क्रमशः अश्वेतों  और दलितों के प्रति सामाजिक व्यवहार और त्याग इत्यादि के विषय मेँ डॉ. आंबेडकर का अनुभव ‘बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्ग्मय’ के खंड 9 के पृष्ठ 145-156 पर ‘हिन्दू और सामाजिक विवेक का अभाव’ शीर्षक से लिपिबद्ध है। इसके पृष्ठ 156 पर दोनों देशों के प्रभुवर्ग के पार्थक्य को चिन्हित करते हुये बाबा साहेब लिखते हैं- ‘यह अंतर क्यों है? अमेरिका में लोग अपने यहाँ के नीग्रो लोगों के उत्थान के लिए सेवा और त्याग कर इतना कुछ क्यों करते हैं? इसका एक ही उत्तर है अमेरिकियों मे सामाजिक विवेक है, जबकि हिंदुओं में इसका सर्वथा अभाव है। ऐसा नहीं कि हिंदुओं में उचित- अनुचित, भला-बुरा या नैतिकता का विचार नहीं है। हिंदुओं में दोष यह है कि अन्य के प्रति उनका जो नैतिक विवेक है, वह सीमित वर्ग, अर्थात अपनी जाति के लोगों तक ही सीमित है।’
लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क- 9654816191

आरक्षण का भय और आरक्षण सूचियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता

  Written By- कैलाश जीनगर  22 अप्रैल 2020 को उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने चेब्रोलू लीला प्रसाद के वाद में आरक्षण के विषय में कुछ टिपण्णी की जो कि जल्द ही सुर्ख़ियों में छा गई और आरक्षण के विरोध में जन भावना ने एक बार फिर जोर पकड़ा। दरअसल न्यायाधीश अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उक्त वाद में ये “मत” प्रस्तुत किया है कि अनुसूचित जाति-जनजाति में अब संपन्न और सामाजिक व आर्थिक रूप से विकसित वर्ग उत्पन्न हो गया है जिसके कारण आरक्षण प्रावधानों का लाभ इन जातियों के निम्न वर्गों तक नहीं पहुँच पाता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह आरक्षण की सूचियों का पुनरिक्षण करे। चूँकि पीठ ने सरकार को इस सम्बन्ध में कोई आदेश या निर्देश जारी नहीं किये हैं इसलिए उपरोक्त कथन को केवल राय या मशवरे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में इस राय को आधार बनाकर दलितों के हितों से खिलवाड़ करने वाला कदम उठाया जा सकता है। न्यायालय का यह दृष्टिकोण आरक्षण-विरोधी तत्वों तथा दलितों के अत्यधिक पिछड़े वर्गों को लुभाने वाला हो सकता है, परन्तु इस संबंध में कोई राय बनाने से पहले इस मत का बहुआयामी परिक्षण व समीक्षा आवश्यक हैं। पहला, उपरोक्त फैसले में न्यायालय ने बिना ठोस सबूत या आंकड़े प्रस्तुत किये ये कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति में संपन्न तथा विकसित वर्ग है। जबकि सर्वज्ञात है कि सरकारी सेवाओं में उच्च स्थानों पर आज भी दलितों की संख्या नगण्य है और उन पदों पर तथाकथित “उच्च जातियों” का एकाधिकार है। उदाहरणार्थ, वर्ष 2019 में उच्चतम न्यायालय में लगभग दस वर्षों बाद एक दलित न्यायाधीश की नियुक्ति हो सकी है। हाँ, राजकीय सेवाओं के निचले तथा कुछ हद तक मध्यम स्तरीय पदों पर यक़ीनन दलित पदासीन हैं। परन्तु, ये तथ्य दलितों के संपन्न और विकसित होने का प्रमाण कतई नहीं हैं। साथ ही भेदभाव-रोधी दो अहम कानूनों (सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम व अ.जा. ज. जा. अत्याचार निवारण अधिनियम) का प्रभाव में होना तथा दलितों के विरुद्ध जाति आधारित अपराधों में वृद्धि होना (देखें, एन.सी.आर.बी. नवीनतम रिपोर्ट, 2018, सारणी 7) इस बात के ठोस सबूत हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग सामाजिक रूप से आज भी पिछड़े हैं एवं तथाकथित “सवर्णों” के निशाने पर रहते हैं। ऐसे में आरक्षण को कम करने की बजाय उसे और भी प्रभावी ढंग से लागू करने की ज़रूरत है। लेकिन आरक्षण पर नीति-निर्धारण करने वाले सरकारी संस्थान अक्सर इस ज़मीनी हकीकत को नज़रंदाज़ कर, बाहरी कारक जैसे दलितों को आरक्षण का लाभ, को ध्यान में रख कर फैसला ले लेते हैं, जो कि अन्यायकारी साबित होता है। दूसरा, दलितों के तथाकथित संपन्न भाग को आरक्षण सूची से अलग करने का न्यायालय का सुझाव इस बात की ओर इशारा करता है कि आरक्षण का मुख्य उद्देश्य आर्थिक उत्थान था, जो कि गलत है। वास्तव में अनुच्छेद 16(4) तथा संविधान सभा में इस संबंध में हुए विचार-विमर्श से ये स्पष्ट होता है कि आरक्षण का मुख्य उद्देश्य है राजकीय सेवाओं में दलितों की भागीदारी को सुनिश्चित्न करना तथा उनमें सवर्ण एकाधिकार का खात्मा करना, क्योंकि सवर्ण चयन अधिकारी जात-पांत और छुआछूत के चलते दलितों का सरकारी सेवाओं में चयन नहीं करते थे। इसलिए आरक्षण ही एक मात्र विकल्प उपलब्ध था। संविधान में इसका प्रावधान सदियों से शोषित तथा वंचित वर्ग के सामाजिक उत्थान के लिए किया गया था (देखें, सी.ए.डी., 30-11-1948, भाग 7). इंद्रा साहनी वाद (1992) के निर्णय में भी नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस बात का समर्थन किया था। अतः आरक्षण की समीक्षा का आधार दलितों की आर्थिक सम्पन्नता नहीं बल्कि प्रशासन में इनकी पर्याप्त भागीदारी, इनका सामाजिक उत्थान तथा उच्च राजकीय हल्कों में सवर्ण एकाधिकार की समाप्ति होना चाहिए। तीसरा, न्यायाधीश अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने संपन्न और विकसित लोगों को आरक्षण सूची से हटाने का सुझाव रखने के लिए इंद्रा साहनी वाद (1992) के निर्णय को बहुतायत में उद्धृत किया। परन्तु ज्ञातव्य है कि उक्त निर्णय में आर्थिक सम्पन्नता (क्रीमी लेयर) का मापदण्ड केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) के लिए सुझाया गया था। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में ये स्पष्ट किया था कि विकसित वर्ग को आरक्षण का लाभ न देने का विचार अनुसूचित जाति-जनजाति के सम्बन्ध में लागू नहीं होगा। परन्तु, इस महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर न्यायालय का ध्यान नहीं गया। अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण में “क्रीमी लेयर” सिद्धांत सर्वथा असंवैधानिक है; संविधान की मूल भावना के साथ धोखा है। चौथा, चेब्रोलू वाद में उच्चतम न्यायालय ने ये भी कहा कि आरक्षण का प्रावधान दस वर्षों के लिए किया गया था, जबकि वास्तविकता यह है कि दस वर्ष की सीमा राजकीय सेवाओं में आरक्षण के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 330, 332 व 334 के तहत लोक सभा तथा विधान सभाओं की सीटों में आरक्षण के लिए तय की गई थी। आरक्षण विरोधी इस दौर में देश के सर्वोच्च न्यायालय की ये टिपण्णी ‘आग में घी’ का काम करने जैसी प्रतीत होती है। संविधान लागू होने के 70 वर्षों बाद भी नीति-निर्धारण करने वाले निकायों में तथा अन्य उच्च सरकारी पदों पर तथाकथित सवर्ण जातियां हावी हैं। वे इस बात का पूरा प्रयास करती हैं कि उनका ये एकाधिकार समाप्त न हो। ऐसे में आरक्षण ही एकमात्र ऐसा हथियार है जिससे कि न केवल दलितों को बल्कि सरकारी संस्थानों को भी सवर्णों के चंगुल व एकाधिकार से मुक्त कराया जा सकता है। आरक्षण के प्रावधानों की यही शक्ति सवर्णों को भयग्रस्त करती है, जिसके परिणामस्वरूप वे इस यन्त्र को कमज़ोर करने में प्रयासरत हैं। वर्तमान में जबकि सरकारें भिन्न भिन्न तरीकों (जैसे आई.ए.एस. में लेटरल एंट्री, ई.डब्लू.एस. आरक्षण, सरकारी उपक्रमों का निजीकरण, उत्कृष्ट तथा तकनीकि संस्थानों में आरक्षण समाप्ति) से आरक्षण को निष्प्रभावी करने तथा उसकी बुनयादी भावना को विकृत करने में लिप्त है, उच्चतम न्यायालय की आरक्षण सूचियों पर उपरोक्त राय कईं संदेह उत्पन्न करती है। आरक्षण से वंचित अनुसूचित जाति-जनजाति के वर्गों को न्यायालय के इस लुभावने दृष्टिकोण का स्वागत करने से पहले इन आरक्षण विरोधी नीतियों को ध्यान में रखना होगा। साथ ही ध्यान में रखना होगा आरक्षित वर्ग की बढती हुई न भरी जाने वाली (बैकलॉग) रिक्तियों की संख्या को और इन रिक्तियों को कुछ वर्षों बाद अनारक्षित श्रेणी में रूपांतरित करने वाले नियमों को। आरक्षण को खोखला करने वाले ये अप्रत्यक्ष प्रयास कोई संयोग नहीं बल्कि सवर्ण एकाधिकार तथा आरक्षण से भय का परिणाम हैं। दलितों के आरक्षण से वंचित हिस्से के उत्थान में असल बाधक हैं अपर्याप्त ढांचागत सुधार। इन वर्गों तक शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार और अन्य कल्याणकारी सरकारी योजनाओं का लाभ मुश्किल से पहुँच पाता है। ये जीवनभर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में ही संघर्षरत रहते हैं। ऐसे में दलितों के नौकरी-प्राप्त समुदायों को आरक्षण सूची से हटाने पर भी इनकी स्थिति तो करीब करीब जस की तस रहने वाली है, परन्तु, इससे दलितों की सरकारी सेवाओं में भागीदारी ज़रूर और भी कम हो जाएगी और परिणामस्वरूप, सवर्णों का दमनकारी एकाधिकार और भी प्रबल हो जायेगा।
लेखक कैलाश जीनगर दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में असि. प्रोफेसर हैं। उनसे संपर्क- 9001730221 पर हो सकता है।  

आपका यूं जाना एक अंतहीन पीड़ा से भर गया: अलविदा कैलाश जी, अलविदा मित्र

– डॉ. पूनम तुषामड़ अभी हम 6 जून को सम्यक प्रकाशन के कर्मठ और जुझारू प्रकाशक शांति स्वरुप बौद्ध जी की आकस्मिक मृत्यु के शोक से उबर भी नहीं पाए थे कि 15 जून की दोपहर एक बजे हमारे अभिन्न मित्र कदम प्रकाशन के प्रकाशक, कदम पत्रिका के संपादक एवं एक जिंदादिल, कर्मठ साहित्यकार कैलाश चंद चौहान के गुजर जाने की खबर आई। यह खबर भीतर तक हिला गई, एक अंतहीन पीड़ा से भर गई। उनकी मृत्यु हार्ट अटैक से हो गई। मेरा कैलाश जी से परिचय सन् 2004 में पहली बार हुआ। तब से ही हम वैचारिक रूप से बयान पत्रिका के संपादन को लेकर मोहनदास नेमिसराय जी के साथ सक्रिय रूप में काम करने लगे थे। वे सदैव अपने सभी मित्रों की बात को बड़ी सहजता से सुनते थे और जो बात उन्हें सही नहीं लगती थी तो स्पष्ट रूप से उसपर अपनी असहमति भी ज़ाहिर कर देते थे। लेकिन सहमति असहमतियों के बीच कभी भी किसी प्रकार का मन मुटाव वे किसी से नहीं रखते थे। कैलाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। सामूहिक परिवार की आजीविका चलाने की जिम्मेदारी, बच्चों की शिक्षा दीक्षा के तमाम खर्चों का वहन करते हुए उन्होंने आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक दवाओं का प्रयोग का कोर्स भी किया। वे अपने आस-पड़ोस के जरुरतमंद लोगों को फ्री में दवाएं देते थे, अनेक मरीज़ उनकी इन सेवाओं का लाभ भी उठा चुके थे। उन्होंने अपने बच्चो को भी ये सभी कार्य सिखाए। कैलाश जी एक जगह रुकने वाले इंसान नहीं थे। समय के बदलाव और साहित्यिक अभिरुचि ने उन्हें प्रकाशन के कार्य की और उन्मुख किया। जिसका पहला सफल परिणाम ‘कदम’ पत्रिका के प्रकाशन के रूप में सामने आया, जिससे उत्साहित हो कर उन्होंने पुस्तक प्रकाशन के लिए ‘कदम प्रकाशन’ प्रारम्भ किया। जिसे अपने अथक प्रयासों और आत्मविश्वास के बल पर बहुत कम समय में खड़ा भी कर दिखाया। कदम प्रकाशन का स्टॉल इस बार के अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेले में काफी चर्चा में रहा। पुस्तक मेले के दौरान ही उन्होंने ‘कदम लाइव’ के नाम से एक यु-ट्यूब चैनल भी बनाया, जिस पर दलित आदिवासी एवं अल्पसंख्यक वर्ग से आने वाली कई जानी मानी साहित्यिक हस्तियों के साक्षात्कार भी लिए गए। अनथक कार्य करने के कारण ही कुछ समय से वो खुद पर ध्यान नहीं दे रहे थे। कैलाश जी एक सरल सीधे व्यक्तित्व के धनी इंसान थे। वे बहुत साहित्य पढ़ते थे। वे कहने से ज्यादा करने में विश्वास रखने वाले लोगों में से थे। उन्होंने कहानियों से अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत की और बाद में वे दलित साहित्य में एक उपन्यासकार के रूप में चर्चित हुए, जिनमें सबसे पहला उपन्यास ‘सुबह के लिए’ था, जो पाठकों में बेहद चर्चित रहा। उसके बाद, ‘भंवर’ तथा ‘विद्रोह’  प्रकाशित हुए। इन तीनों ही उपन्यासों पर कई शिक्षण संस्थानों में शोध हो रहे हैं।  कैलाश जी से हमारा सालों का साथ रहा है। आज जो जिस कैलाश चंद चौहान को आप और हम जानते हैं, उनका जीवन बचपन से ही बेहद कठिन स्थितियों में बीता। वे अक्सर बात करते-करते अपने अनुभव बताने लगते थे। वे बताते थे कि किस तरह वे दोनों भाई बचपन में अपनी माँ के साथ मैला उठाने, सफाई करने जाते थे। किन्तु उनकी माँ के रोबीले व्यक्तित्व के कारण उन्हें कोई बोलने का साहस नहीं करता था। दोनों भाई बहुत कम उम्र में ही गोल मार्केट के आस-पास दोपहरी में लोगों को भाग-भाग कर पानी बेचा करते थे। अन्धविश्वास इतना था कि घर में पिता की बीमारी को देवी का प्रकोप मानकर दिन-रात होने वाली पूजा उन्होंने देखी। दरअसल उनके पिता मानसिक बीमारी से पीड़ित थे। घोर गरीबी और मानसिक रोग से पीड़ित पिता की बीमारी का सही इलाज न करा पाने का दुःख उन्हें सदैव रहा। घर में पूरी रात डेरु और नगाड़े बजते थे। इसका कैलाश जी पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे हनुमान के भक्त हो गए। अंधविश्वास के कारण टोना टोटकों और गनडे-ताबीज आदि में उनका विशवास इतना हो गया की वे अपने आपको लोगों का ‘भूत’ उतारने वाले ‘भगत’ समझने लगे। लेकिन एक संगठन ‘दिशा’ के संपर्क में आने से उनकी जिंदगी बदल गई। वे अक्सर कहा करते थे कि ‘काश! दिशा संगठन वालों के संपर्क में पहले आ जाते। दरअसल ‘दिशा संगठन के अंजलि और सुभाष गाताड़े उन दिनों दलित बस्तियों में जा-जा कर लोगों के बीच में जनजागृति की बातें करते थे। अंधविश्वास और पाखंड के बारे में लोगों को समझाते थे। कैलाश जी पर धीरे धीरे उनकी बातों का प्रभाव हुआ और एक दिन उन्होंने अपने घर में एलान कर दिया कि आज से घर में किसी तरह का पूजा-पाठ और अंधविश्वास का काम नहीं होगा। उस दिन से कैलाश जी के घर में भगत सिंह सहित बाकी क्रांतिकारियों की बातें और चर्चाएं होने लगी। कैलाश जी बताते थे कि कैलाश जी की माता उनके घर में आने वाले बुद्धिजीवियों की बातें बड़े ध्यान से सुनती थी। उनकी माँ ने एक दिन कैलाश जी से कहा था “सही बात कहते तेरे दोस्त, कुछ नहीं रखा इस धोक पूजा में। तेरे पिता के पीछे कितनी पूजा करवाई, धरम करम करा, कुछ न हुआ ..बस्स! अब से कुछ नहीं करेंगे, जो होगा देखी जाएगी।” वे कहते थे कि पिता को खो देने के बाद माँ ने बड़े ही साहस से हर काम में हमारा साथ दिया कभी विरोध नहीं किया। उन्होंने अनपढ़ होते हुए भी कोशिश की कि वे सभी पुरानी परम्पराओं को तोड़ेंगी और हमारी शादी गाँव में की। और साफ़ कह दिया कि मेरी बहुएं किसी से पर्दा न करेंगी। कैलाश जी माँ के इस फैसले और उसके बाद परिवार वालों के विरोध को बताते हुए अक्सर माँ के साहस से अभिभूत नज़र आते थे। घर में बड़ा होने के कारण परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें असमय बड़ा बना दिया था। वे अपने बारे में कुछ भी बड़ी सहजता से बता देते थे। फिर चाहे माँ के साथ सफाई का काम हो, पानी बेचने का, वाशिंग पावडर बनाना, परचून की दुकान, प्रॉपर्टी डीलिंग साथ-साथ ओपन से जैसे तैसे बारहवीं पास की। बी ए में एडमिशन लिया, हालांकि ग्रेजुएशन पूरी नहीं कर सके। साथ में कंप्यूटर मैकैनिक का काम सीख लिया, फिर कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की दुकान में काम किया। मालिक ने कैलाश जी की ईमानदारी देख कर उन्हें वह दुकान सौंप दी, किन्तु उन्ही दिनों कैलाश जी को दुकान के साथ-साथ दुकान पर आने वाली कुछ पत्रिकाओं को पढ़ने का शौक हो गया। ये पत्रिकाएं सरिता, मुक्ता, गृह शोभा थी। इनमें आने वाली कहानियों से प्रेरित हो कर उन्होंने कहानियां लिखनी शुरू की, जो उन्होंने सरिता पत्रिका जो कि उन दिनों खासी चर्चित थी में अपनी कहानी ‘गाँव कि दाई’ भेजी, जो संपादक को पसंद आई और उसने छाप दी। इसके पश्चात् कैलाश जी कि रूचि लेखन की और हुई, फिर उन्होंने नियमित रूप से सरिता में अपने लेख और कहानियां भेजी जो छपती रही। फिर इसी दौरान उन्होंने अन्य साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना और उनमें लिखना प्रारम्भ किया, जिसके कारण उनकी एक साहित्यिक पहचान बनी। कथादेश, हंस, बयान, युद्धरत आम आदमी आदि अनेक पत्रिकाओं में उनके लेख और कहानियां प्रकाशित होने लगे। परिवार की आजीविका सुचारु रूप से चलती रहे इसके लिए ऑन लाइन बिज़नेस शुरू कर दिया था। जो कोरोना महामारी से पहले अच्छा चल निकला था। किन्तु जैसे-जैसे लॉक डाउन बढ़ा बिज़नेस में भी फर्क पड़ने लग गया। इन दिनों वे कहते थे कि पहले जैसा काम नहीं है। पिछले कुछ समय से अस्वस्थ रहने लगे थे, किन्तु न तो सामाजिक प्रतिबद्धता कम हुई थी और न काम करने की गति। बस अपने विषय में स्वयं कभी किसी को कुछ नहीं कहते थे। उनसे आत्मीयता का रिश्ता ऐसा था कि हम उनकी कई बातों को उनके बिना कहे ही समझ जाते थे, और वे हमारी। कैलाश जी और उनके परिवार के साथ मेरा सम्बंध घरेलु था। कम्प्यूटर की छोटी छोटी समस्याओं से लेकर कदम के कामों तक, हमारी अनेक मुलाकातें होती थी और साहित्यिक चर्चाएं भी। कभी मैं बेहद मायूस होती तो वे अपने ही अनोखे अंदाज़ में कुछ ऐसा कह देते की मैं हंस पड़ती और एक क्षण में वे सब भुला देते। ऐसे दोस्त ऐसी अच्छे सुलझे सहज इंसान दुनिया में बेहद कम होते हैं जो बिलकुल ज़मीं से उठकर वो मुकाम हांसिल करते हैं जो दूसरो के लिए प्रेरणा बने। अनेक प्रतिभाओं के धनी, हरफन मौला इंसान हमारे अभिन्न मित्र कैलाश जी, आप हमारी यादों में सदैव रहेंगे।
 डॉ. पूनम तुषामड़ एक लेखिका हैं। कैलाश चंद चौहान और कदम प्रकाशन से जुड़ी हैं।

सच जानने के हमारे अधिकार को किस एक्ट के तहत बाधित किया गया है?

प्रमोद रंजन फरवरी, 2020 में जब अखबारों में दुनिया में एक नए वायरस के फैलने की सूचना आने लगी और मेरे सहकर्मियों के बीच इसकी चर्चा होने लगी तो मैंने इन खबरों के संबंध में प्रमाणिक सूचनाएं पाने के लिए विश्व स्वास्थ संगठन की वेबसाइट का रूख किया था। यह वह समय था, जब हम मज़ाक-मज़ाक में कहा करते थे कि शायद आने वाले समय में हाथ न मिलाकर, एक दूसरे को नमस्कार करना होगा। उस समय कौन जानता था कि जल्दी ही वह दिन आने वाला है, जब ऐसे नियम बना दिए जाएंगे, जिसमें मास्क नहीं पहनने पर दंडित किए जाने का प्रावधान होगा। उस समय तक कार्यालय में उपस्थिति के लिए बायोमैट्रिक्स पंच मशीन लगाए जाने का जिक्र आने पर हम इसके औचित्य और दुष्परिणामों पर चर्चा किया करते थे। उस समय कौन जानता था कि मोबाइल फोनों में एक जासूस-एप रखना आवश्यक कर दिया जाएगा और, बायोमैट्रिक्स मशीन तो कौन कहे, हम हर प्रकार के सर्विलांस के लिए राजी हो जाएंगे। मेरे मित्रों का विशाल संसार हिंदी पट्टी की पत्रकारिता, समाज-कर्म और अकादमियों में फैला है, लेकिन इनमें एकाध को छोड़कर कोई भी नहीं है, जो इनके दूरगामी प्रभावों को लेकर चिंतित हो। एक शहर में चेहरे की पहचान करने वाली कैमरे सड़कों पर लगा दिए गए हैं, नागरिकों पर निगरानी रखने के लिए कैमरे लगे ड्रोनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारी हिंदी पट्टी में सवाल उठाने वालों की इतनी कमी क्यों है? यह कमी की ध्वनि हमारी भाषा में भी झलकती है। इसमें ऐसे शब्दों का टोटा है, जाे इस सर्वसत्तावाद सर्विलांस के खतरे को ठीक से व्यक्त कर सके। क्या इसकी जड़ें हमारे किसी छुपे हुए संस्कार में है? एक बीमारी आई, जिसे महामारी कहा गया और हम पर कथित “विशेषज्ञता” और “वैज्ञानिक-तथ्यों” की बमबारी की जाने लगी। हम घबराकर घरों में दुबक गए, लेकिन क्या हमें इस बम-बारी के स्रोत और उद्देश्यों की ओर नहीं देखना चाहिए था? हमें बताया गया कि दुनिया भर में यही हो रहा है। लेकिन इंटरनेट के जमाने में यह जानना हमारे लिए संभव नहीं था कि दुनिया में कहीं भी अपने नागरिकों पर ऐसा कहर नहीं ढाया जा रहा है। भारत के विश्वगुरू होने का सबसे अधिक दावा हिंदी पट्टी से उठता है, जिसके आधार हममें से कुछ वेदों में तो कुछ बौद्ध दर्शन में तलाशते हैं। हमने यह क्यों नहीं कहा कि हमें दूसरों का पिछलग्गू नहीं बनना है। हमें कहा गया कि यह बीमारी जानलेवा है, और हमने मान लिया। हम यह देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे कि इसी हिंदी पट्टी में टीबी, चमकी बुखार, न्यूमोनिया, मलेरिया आदि से मरने वालों की संख्या कितनी है। एक अनुमान के मुताबिक इन बीमारियों से सिर्फ हिंदी पट्टी में हर साल 5 से 7 लाख लोग मरते हैं। हमें बताया गया कि यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है, लेकिन हम यह क्यों नहीं देख रहे कि इसका आर (R) फैक्टर (संक्रमण-दर) टीबी से पांच गुणा कम है। हमें कहा गया कि इससे बहुत सारे लोग मर रहे हैं। हमने यह देखने की कोशिश क्यों नहीं की कि इन्हीं कुछ महीनों में हमारे आसपास कितने लोग कोविड से मरे और कितने लोग लॉक-डाउन से? हमें कहा गया कि यह खतरनाक है, क्योंकि यह ‘वायरस’ से होता है और लाइलाज है। हमने क्यों यह सवाल नहीं उठाया कि हिंदी पट्टी के सैकड़ों गरीब बच्चों को मारने वाला चमकी बुखार (एईएस) एवं जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) भी वायरस से होता है और यह भी लाइलाज है। कोविड-19 की अधिकतम मृत्यु दर (CFR) हमें 3 प्रतिशत से कम बताई गई, जबकि इन बुखारों में मृत्यु दर 30 प्रतिशत से भी अधिक है। हमने क्यों नहीं पूछा कि गरीबों को मारने वाली बीमारियों से संबंधित आंकड़ों को छुपाने के जो आरोप भारत सरकार पर रहे हैं, उनका सच क्या है? हम यह सवाल क्याें नहीं उठा रहे कि न्यूमोनिया, इंफ्लुएंजा और हृदय-घात आदि से मरने वालों की संख्या को क्यों कोविड-19 की मौतों में जोड़ा जा रहा है? इन भ्रामक आंकड़ों से किनके खिलाफ युद्ध लड़ा जा रहा है? हमें कहा जा रहा है कि यह विश्व स्वास्थ संगठन के दिशानिर्देर्शों पर हो रहा है। तो हम उनसे यह क्यों नहीं पूछ रहे कि इस संगठन की विश्वसनीयता कितनी है? क्या यह झूठ है कि इस संगठन पर बिग फर्मा के हितों का ख्याल रखने के आरोप हैं? इस संबंध में जर्मनी में शोधरत मेरे एक मित्र रेयाज-उल-हक एक मेल लिखा, जो लिखा है, उसे यहां दे देना प्रासंगिक होगा। उन्हाेंने मेरा ध्यान इस ओर दिलाया है कि गरीब देशों में होने वाली इन बीमारियों की विश्व स्वास्थ संगठन आदि द्वारा की जाने वाली उपेक्षा की वजह यह है कि पश्चिमी देशों ने इन बीमारियों और उनकी वजहों पर कमोबेश क़ाबू पा लिया है। साफ़ पानी की आपूर्ति, पोषण और पर्याप्त भोजन और स्वस्थ्य जीवन शैली, मज़बूत स्वास्थ्य सेवाएँ और इलाज की सुविधा से युक्त ये देश अब हैज़ा, टीबी आदि से परेशान नहीं होते। मलेरिया और यहाँ तक कि एड्स भी अब कोई बड़ी मुश्किल नहीं है इन देशों के लिए। लेकिन वे उन बीमारियों से डरते हैं जिन पर इनकी कोई पकड़ नहीं है। इसलिए ये संक्रामक सार्स और कोरोना से डर जाते हैं, क्योंकि अभी इनके पास उसका कोई उपाय नहीं है। चूंकि इन पश्चिमी देशों का दुनिया में दबदबा है, इनकी प्राथमिकताएँ सब लोगों की प्राथमिकताएँ बन जाती हैं। इसलिए अब कोरोना सबके लिए ख़तरा है। एक बार इसका टीका और इलाज इनको मिल जाने दीजिए, फिर कोरोना से कौन मरता और जीता है दुनिया में, इनको इसकी कोई परवाह भी नहीं होगी। ..आज यह यह यूरोप और अमेरिका की बीमारी है। जब तक यह चीन तक सीमित थी, इनको इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। हम उनसे क्यों नहीं पूछ रहे कि इन यूरोपीय देशों की समस्याओं को आपने हमारे सिर पर क्यों थोप दिया? इसके अलावा, हम उनसे यह भी तो पूछ सकते हैं कि आप सोशल-मीडिया पर कथित तौर पर कथित ‘इंफोडेमिक’ फैलाने वालों पर कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन उन मीडिया संस्थानों पर क्यों कोई कार्रवाई नहीं कर रहे, जो विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा कही गई बातों को चुनिंदा रूप में प्रकाशित करते हैं? पिछले चार महीने से डबल्यू.एच.ओ. कोविड-19 के संबंध में रोजना प्रेस बीफिंग करता है। इस वर्चुअल प्रेस बीफ्रिंग का प्रसारण उसके मुख्यालय, जेनेवा (स्विटज़रलैंड) से उसके सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर होता है, जिसमें दुनिया भर से पत्रकार भाग लेते हैं। इस ब्रीफिंग के दौरान संगठन के डायरेक्टर जनरल टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने जब-जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की है, तब-तब भारत के समाचार-माध्यमों में प्रसन्नता से खिली हुई खबरें विस्तार से प्रसारित हुई हैं। 30 मार्च को किसी भारतीय पत्रकार (उनका नाम फोन नेटवर्क की गड़बड़ी के कारण ठीक से सुना नहीं जा सका था) ने इस प्रेस ब्रीफिंग में डबल्यू.एच.ओ. के पदाधिकारियों से कहा कि आपको ज्ञात होना चाहिए कि भारत लॉकडाउन के दौरान अपने प्रवासी मजदूरों के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने को लेकर अभूतपूर्व मानवीय संकट देख रहा है। मैं यह जानता हूं कि आपको किसी देश विशेष पर टिप्पणी करना पसंद नहीं है,… लेकिन यह एक अभूतपूर्व मानवीय संकट है। हमारी सरकार को आपकी क्या सलाह होगी?” चूंकि इस दौरान भारत में गरीबों-मजदूरों के ऊपर जिस प्रकार की अमानवीय घटनाएं घट रहीं थीं, और उसकी जो छवियां सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आ रहीं थीं, उसने सबको मर्माहत और चौकन्ना कर दिया था। लाखों की संख्या में मजदूर, जिनमें बच्चे, बूढ़े  महिलाएं (जिनमें बहुत सारी गर्भवती महिलाएं भी थीं) सभी शामिल थे, हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों की ओर पैदल निकल पड़े थे, जिन्हें रोकने के लिए जगह-जगह सीमाएं सील की जा रहीं थीं। हजारों लोग अलग-अलग शहरों में से अपने गांवों के लिए निकलना चाह रहे थे, लेकिन पुलिस उन पर डंडे बरसा रही थी। ऐसा लग रहा था कहीं गृह-युद्ध जैसे हालात न पैदा हो जाए! डबल्यू.एच.ओ. के अधिकारी इससे संबंधित प्रश्न आने पर खुद को रोक नहीं पाए। डबल्यू.एच.ओ के एग्ज़ीक्युटिव डायरेक्टर माइकल जे. रयान ने इस प्रश्न के उत्तर में लॉकडाउन का समर्थन किया लेकिन यह भी कहा कि देशों को अपने विशिष्ट आवश्यकताओं को देखते हुए सख्त या हल्का लॉकडाउन लगाना चाहिए और हर हाल में प्रभावित लोगों के मानवाधिकार का सम्मान करना चाहिए। माइकल रयान के बाद संगठन के डायरेक्टर जनरल डॉ. टेड्रोस ने भी भावुकता भरे शब्दों में कहा कि मैं अफ्रीका से हूं, और मुझे पता है कि बहुत से लोगों को वास्तव में अपनी रोज की रोटी कमाने के लिए हर रोज काम करना पड़ता है। सरकारों को इस आबादी को ध्यान में रखना चाहिए।मैं एक गरीब परिवार से आता हूं और मुझे पता है कि आपकी रोजीरोटी की चिंता करने का क्या मतलब है ! सिर्फ जी.डी.पी. के नुकसान या आर्थिक नतीजों को ही नहीं देखा जाना चाहिए। हमें यह भी देखना चाहिए कि गली के एक व्यक्ति के लिए इसका [लॉकडाउन का] क्या अर्थ है  !..मेरी यह बात सिर्फ भारत के बारे में नहीं है,यह दुनिया के सभी देशों पर लागू होता है।विश्व स्वास्थ संगठन के इस बयान को भारतीय मीडिया में कहीं जगह नहीं मिली। लेकिन इस बयान के बाद भारत सरकार सक्रिय हुई और लॉकडाउन के दौरान उठाए गए कथित कदमों को प्रेस ब्रीफिंग में रखने के लिए डबल्यू.एच.ओ पर दबाव बनाया। परिणामस्वरूप 1 अप्रैल, 2020 की प्रेस ब्रीफिंग में डब्लूएचओ प्रमुख डॉ. टेड्रोस ने भारत सरकार द्वारा जारी किए गए राहत पैकेज के बारे में जानकारी दी। यह वह पैकेज था, जिसे भारत सरकार पांच दिन पहले 26 मार्च को ही घोषित कर चुकी थी। टेड्रोस ने कहा किभारत में, प्रधानमंत्री मोदी ने 24 बिलियन अमेरिकी डॉलर के पैकेज की घोषणा की है, जिसमें 800 मिलियन वंचित लोगों के लिए मुफ्त भोजन, राशन; 204 मिलियन गरीब महिलाओं को नकद राशि हस्तांतरण और 80 मिलियन घरों में अगले 3 महीनों के लिए मुफ्त खाना पकाने की गैस शामिल है।..इसके अलावा इंडिया टुडे के पत्रकार अंकित कुमार के एक प्रश्न के उत्तर में माइकल रयान ने कहा कि भारत में लॉकडाउन के परिणामों के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जो जोखिम में हैं उन पर लॉकडाउन के प्रभावों को सीमित करने के लिए भारत ने बड़ा प्रयास किया है। अगले दिन भारत के सभी हिंदीअंग्रेजी समाचार माध्यम इस खबर से अटे पड़े थे कि डबल्यू.एच.ओ. ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की है, और कहा है प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कोरोना के खिलाफ उठाए गए कदम अच्छे हैं। अनेक न्यूज चैनलों ने डबल्यू.एच.ओ. के वक्तव्य की रिर्पोटिंग करते हुए यहां तक कहा कि कोरोना वायरस को कैसे रोका जाए इसके लिए पी.एम. मोदी और उनके विशेषज्ञों की एक टीम लगातार काम कर रही है। 21 दिन के लॉकडाउन का फैसला भी पी.एम. मोदी ने अपनी इसी टीम की सलाह पर लिया है। प्रधानमंत्री हर रोज करीब 17-18 घंटे काम कर रहे हैं। कोरोना के खिलाफ संघर्ष में विश्व स्वास्थ संगठन भी पी.एम. मोदी और भारत की तारीफ कर चुका है।ये वही मीडिया संस्थान थे, जिन्होंने डब्लूएचओ द्वारा दी गई मानवाधिकारों का ख्याल रखने की सलाह को प्रकाशित करने से परहेज किया था। लॉकडाउन से दुनिया के अनेक देशों की बर्बादी के बाद अब विश्व स्वास्थ संगठन कह रहा है कि उसने लॉकडाउन की सलाह नहीं दी थी। हम अपनी सरकार से क्यों नहीं पूछ रहे हैं कि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाले देश में, जहां अधिकांश लोग रोज की रोटी कमा कर खाते हैं, वहां लॉकडाउन का मतलब क्या होगा, अगर आपको यह पता नहीं था, तो आपके निर्देशों के सही साबित होने की क्या गारंटी है? स्वीडन, जापान, तंजानिया, बेलारूस, निकारगुआ, यमन आदि देशों ने या तो बिल्कुल लॉकडाउन नहीं किया, या फिर ऐसे नियम बनाए, जिनसे नागरिकों की स्वतंत्रता कम से कम बाधित हो। भारत इस राह पर क्यों नहीं चला? हम क्यों नहीं पूछ रहे कि जब कई देशों ने मास्क को जनता के लिए आवश्यक नहीं बनाया है और कोविड-19 के अधिक फैलने के कोई प्रमाण नहीं हैं, तो आपके पास इसके लिए कौन-सा ‘वैज्ञानिक’ आधार है? हम क्यों नहीं पूछ रहे हैं कि क्या यह वायरस निशाचर है, जो आपने रात का कर्फ्यू लगाया है? इसका क्या वैज्ञानिक आधार है? आप क्यों भय को बरकरार रखना चाहते हैं? आप कहते हो कि आपको भारत की जनता पर भरोसा नहीं है। यह अशिक्षित, अविवेकी, अराजक है, यूरोप की तरह सभ्य नहीं है। आपके पास इसके पक्ष में क्या प्रमाण हैं? क्या यह सच नहीं है कि देशव्यापी लॉकडाउन से पहले ही भारत में लोगों ने बाहर निकलना बहुत कम कर दिया था। लॉकडाउन से पहले ही कम सवारी मिलने के कारण सैकड़ों ट्रेनें कैंसिल करनी पड़ीं थीं। यह देशवासियों के उस अनुशासन और विवेक का परिचायक था। इसके बावजूद उनपर लॉकडाउन क्यों थोपा गया? हमें यह सवाल भी अवश्य ही उठाना चाहिए कि सच जानने के हमारे जन्मसिद्ध अधिकार को किस एक्ट के तहत बाधित किया जा रहा है? हम क्यों नहीं पूछ रहे कि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का बिल एंड मिलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन से क्या रिश्ता है? कोविड-19 से संबंधित डबल्यू.एच.ओ. की जिस प्रेस बीफ्रिंग का जिक्र मैंने आरंभ में किया, उसमें 10 अप्रैल, 2020 को स्विटज़रलैंड की एक न्यूज वेबसाइट ‘द न्यू ह्यूमनटेरियन’ के संपादक और सह-संस्थापक बेन पार्कर ने बिल गेट्स के बारे में एक सवाल पूछा था। डबल्यू.एच.ओ. के पदाधिकारियों ने उनके प्रश्न का उत्तर जिस तत्परता से दिया, वह तो देखने लायक था ही, साथ ही प्रश्नकर्ता के बारे में पड़ताल से यह भी संकेत मिलता है कि कितने-कितने छद्म रूपों से बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के पक्ष में खबरों के प्रसारण को सुनिश्चित किया जा रहा है। बेन पार्कर ने पूछा थ किहम बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, वैक्सीन और आईडी 2020 नामक एक डिजिटल पहचान परियोजना के आसपास बहुतसी अफवाहों और कांस्पीरेसी थ्योरी देख रहे हैं। क्या आप इन नई भ्रामक सूचनाओं पर नजर रख रहे हैं तथा इन्हें हटाने के लिए कुछ कर रहे हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में माइकल रयान ने कहा कि हम बिल एंड मिलिंडा गेटस फाउंडेशन के कृपापूर्वक समर्थन के लिए आभारी हैं। हम निश्चित रूप से उस प्लेटफार्म को देखेंगे, जिसका आपने उल्लेख किया है। हम लगातार भ्रामक सूचनाओं से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं तथा उन्हें हटाने के लिए डिजिटल क्षेत्र की कई कंपनियों के साथ काम कर रहे हैं। बेन पार्कर के सवाल पर डॉ. टेड्रोस ने भी अपनी बात विस्तार से रखी और गेट्स की प्रशंसा के पुल बांध दिए। उन्होंने कहा कि मैं अनेक वर्षो से बिल और मिलिंडा को जानता हूं। ये दोनों मनुष्य अद्भभुत हैं।..मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि इस कोविड19 महामारी के दौरान उनका समर्थन वास्तव में बड़ा है। हमें उनसे वह सभी सहायता मिल रही है, जिनकी हमें आवश्यकता है। हमारा साझा विश्वास है कि हम इस तूफान को मोड़ सकते हैं। .. गेट्स परिवार के योगदान से दुनिया परिचित है, उन्हें प्रशंसा और सम्मान मिलना ही चाहिए  (जोर हमारा) प्रश्नकर्ता बेन पार्कर के बारे में गूगल पर सर्च करने पर पता चलता है कि उनका दुनिया भर में मानवीय संकटों से प्रभावित लाखों लोगों की सेवा में स्वतंत्र पत्रकारिताका संस्थान ‘द न्यू ह्यूमनटेरियन’ मुख्य रूप से बिल एंड मिलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के पैसे से चलता है। वह उनका सबसे बड़ा डोनर है। इसके एवज में प्रश्नकर्ता बेन पार्कर टिवीटर से लेकर अपनी वेबसाइट तक पर बिल गेट्स के पक्ष में कथित ‘फैक्ट चेकिंग’ में सक्रिय रहते हैं, ताकि गेट्स परिवार को बदनामी के गर्त से बाहर निकाला जा सके। भारत में भी इस कथित महामारी के दौर में ऐसी कथित फैक्ट चेकिंग संस्थाएं विदेशी अनुदान से तेजी से बढ़ रही हैं। हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि सच और झूठ का यह घालमेल इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है? क्या इसके लिए सिर्फ सरकार जिम्मेवार है, या हम स्वयं अपनी गुलामी के अनुबंध पर लगातार हस्ताक्षर करते जा रहे हैं?
[इस आलेख के लेखक प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और आधुनिकता के विकास  में रही है। साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएंऔर शिमलाडायरीउनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। संपर्क : +919811884495, janvikalp@gmail.com]

एक विचार की तरह याद किए जाएंगे शांति स्वरूप बौद्ध

अजय कुमार दिनांक 06 जून 2020 को सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध का परिनिर्वाण हो गया। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1949 को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने हिंदी में दलित प्रिंट के लिए के लिए एक मुक्कम्मल जगह बनायी थी। शांति स्वरूप बौद्ध डॉ. अंबेडकर के बाद की पीढ़ी के उन दलित बुद्धिजीवियों में हैं जो आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरियों में आगे आए और फिर ‘पे बैक टू सोसाइटी’ की भावना के तहत उस समाज को बेहतर और न्यायपूर्ण करने की मुहिम में जुट गए जो अपनी बाहरी और अंदरूनी संरचना में बहिष्करण और हिंसा, भेदभाव और हिंसा, गरीबी और उत्पीड़न को बढ़ावा देता है। किताबों के माध्यम से उन्होंने इसे बदल देना चाहा। केंद्र सरकार के राजपत्रित अधिकारी से इस्तीफा देकर सांस्कृतिक क्रांति के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले शांति स्वरूप बौद्ध ने अंबेडकर साहित्य और बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथों का प्रकाशन करने के उद्देश्य से सम्यक प्रकाशन की स्थापना की और दलित समाज को चेतनाशील और जागरूक करने के लिए जुट गए। उनका यह काम पारंपरिक नेताओं वाला या किसी सामाजिक संगठन की तरह का काम करने जैसा नहीं था बल्कि उन्होंने वह काम किया जिसके माध्यम से समाज में विचारों से लैस नेताओं, कार्यकर्ताओं की एक फौज खड़ी की जा सके। इस काम को करने के लिए उन्होंने साहित्य और उसके प्रचार-प्रसार को अपना कार्यभार बनाया। इस संदर्भ में शांति स्वरूप बौद्ध के कहे वे शब्द याद आते हैं- : हम अंबेडकरवादी हैं, संघर्षों के आदी हैं हम अंबेडकरवादी हैं, ये सीने फौलादी हैं अब तक जो हुआ, उसका गम नहीं अब दिखना है, किसी से कम नहीं विचारों के युद्ध में किताबों से बड़ा हथियार कोई नहीं वास्तव में जो काम कभी उत्तर भारत के मूक समुदायों को जागरूक करने के लिए स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ और फिर उनके बाद उनके शिष्य चन्द्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ किया करते थे, उस काम को आजादी के बाद बड़े पैमाने पर बढ़ाने का काम शांति स्वरूप बौद्ध ने किया। चन्द्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ ने लखनऊ में बहुजन कल्याण प्रकाशन के नाम से एक प्रिंटिंग प्रेस लगाया था जिसके माध्यम से वह यह काम किया करते थे। लेकिन उनके परिनिर्वाण के बाद यह काम बीच में ही रुक गया। इस रुके हुए काम को दिल्ली के शांति स्वरूप बौद्ध ने समझा और फिर उन्होने 1990 के दशक में इसकी शुरुवात की। शांति स्वरूप बौद्ध द्वारा स्थापित सम्यक प्रकाशन आज हिंदी में 35 पृष्ठों के हिंदी कैटलाग और अंग्रेजी में 6 पृष्ठों के कैटलाग के साथ प्रकाशन के क्षेत्र में दमदार दस्तक दे रहा है, उसने दलित प्रिंट की दुनिया को एक नया चेहरा दे दिया है। सम्यक प्रकाशन में लोकप्रिय दलित-बहुजन साहित्य से लेकर गंभीर शोधपूर्ण एवं अकादमिक लेखन और बौद्ध साहित्य की किताबें उचित और सस्ती दामों में मिल जाएंगी। स्वयं शांति स्वरूप देश के बड़े बुद्धिस्ट विद्वान थे और भारत के समाज परिवर्तन में उन्होनें बौद्ध साहित्य की भूमिका को महसूस किया था। सम्यक प्रकाशन का एक बड़ा हिस्सा बुद्ध, बौद्ध धर्म की पुस्तकों से मिलकर बनता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर विवेक कुमार ने ‘दलित दस्तक’ को दिए गए साक्षात्कार में शांति स्वरूप बौद्ध को याद करते हुए उन्हें ‘अंबेडकराइट, बुद्धिस्ट, दलित-बहुजन आंदोलन का पुरोधा’ कहा है। उन्होंने नए और युवा लेखक तैयार किए जिन्हें मुख्यधारा के प्रकाशनों में जगह नहीं मिलती थी। सम्यक प्रकाशन ने एक नए दलित बौद्धिक वर्ग का निर्माण किया। इस प्रकाशन ने पुस्तक प्रकाशन, वितरण के क्षेत्र में चली आ रही मोनोपोली को भी चुनौती दी है। सम्यक प्रकाशन के स्टाल आज देश के हर क्षेत्रीय, राष्ट्रीय पुस्तक मेलो में मौजूद रहते हैं। सम्यक प्रकाशन के स्टाल हिन्दी पट्टी के प्रमुख प्रकाशकों के बराबर की जगह की बुकिंग कराते है। कभी-कभी तुलनात्मक रूप से यह अधिक ही रहती है। दिल्ली में हर वर्ष लगने वाले विश्व पुस्तक मेले में ऐसे कम ही पाठक और साहित्यप्रेमी होंगे जो सम्यक के स्टाल पर न जाते हो नहीं तो वहाँ साहित्यप्रेमियों और पाठको की भीड़ जमा रहती है।कहते हैं कि आज डिजिटल समय में प्रकाशन उद्योग में मायूसी सी है लेकिन यदि आप सम्यक के स्टाल पर जाएँ तो वहाँ आपको कभी मायूसी हाथ नहीं लगेगी बल्कि वहाँ आपको एक नई ऊर्जा से भरपूर लोग मिलेंगे, कोई किताबें पैक करता हुआ, कोई बिल बनाता हुआ तो कोई किताबों को पाठकों से परिचय करता हुआ। सम्यक प्रकाशन में साहित्य के साथ ही अंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़ी हुई प्रतीकात्मक वस्तुएँ भी मिल जाएंगी जैसे अंबेडकर की तश्वीर के साथ प्रिंटेड टी-शर्ट, टोपी, अशोक चक्र, पेन डायरी, भीम कलेंडर, लकड़ी की बनी हुई बुद्ध और अंबेडकर की मूर्तियाँ, शादी कार्ड, सभी महापुरूषों के आकर्षक पोस्टर साइज, जय भीम कलैंडर, जय भीम डायरी, जय भीम पाकेट कलैंडर, आकर्षक नोट बुक कई प्रकार के, चाबी के छल्ले, कई प्रकार के, पंचशील झंडी के पैकेट, पंचशील झण्डे अलग अलग साइज, पंचशील पटके, शगुन के लिफाफे कई प्रकार के, कार शेड, मूर्तियां छोटी बड़ी (बुद्ध और आंबेडकर), थ्री डी पिक्चर आदि । यह प्रकाशन वास्तव में दलित सांस्कृतिक आंदोलन का विस्तार है। सम्यक प्रकाशन के पास लेखकों की एक बड़ी पूंजी है जो भारत के महानगरों से लेकर नगरों, कस्बों, अंचलों तक जाती है। यह सब हिंदी दलित प्रिंट के लिए, इक्कीसवीं शताब्दी में एक बड़ी उपलब्धि है। यह सब प्रयास ही दलित आंदोलन की निर्मिति करते हैं, उसे बनाते है। शांति स्वरूप बौद्ध इन उपलब्धियों को संभव बनाने वाले महापुरुष थे।
लेखक डॉ. अजय कुमार, शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में 2017 से 2019 के दौरान फेलो रहे हैं। वह ‘समाज विज्ञानों में दलित अध्ययनों की निर्मिति’ पर काम कर रहे थे।

ढह गया आंबेडकरी आंदोलन का एक और स्तम्भ!

विगत ढाई महीनों से कोरोना के दहशत भरे माहौल में लिखते-पढ़ते भारी राहत के साथ दिन इसलिए कट रहे थे क्योंकि अपना कोई आत्मीय – स्वजन, इसकी चपेट में नहीं आया था। किन्तु 6 जून की शाम 4 बजे जिस खबर से रूबरू हुआ, वह हमारे लिए कोरोना काल की सबसे बुरी खबर साबित हुई। शाम 4 बजे फेसबुक खोलते ही मेरी नजर डॉ कबीर कात्यायन के छोटे से पोस्ट पर पड़ी, जिसके साथ शांति स्वरूप बौद्ध व एक अन्य व्यक्ति की तस्वीर लगी थी। तस्वीरें देखकर बुरी आशंका से घिर गया। जल्दी से पोस्ट पर नजर दौड़ाया तो लिखा मिला, ’बेहद ही दुखद! आज क्या हो रहा है चारों ओर से दुखद ही दुखद समाचार मिल रहे हैं! भारतीय बौद्ध महासभा के दो बड़े स्तम्भ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार, बौद्ध विद्वान, प्रखर वक्ता, सफल प्रकाशक उद्यमी, बौद्धाचार्य शान्ति स्वरूप बौद्ध व रामपाल सिंह गौतम नहीं रहे …। खबर पढ़कर स्तब्ध रह गया। थोड़ी बाद आँखों से अविरल आँसू  बहने लगे। उसी स्थिति में अपने टाइम लाइन पर जाकर लिखा– ‘आंबेडकरी आंदोलन का एक स्तम्भ ढह गया! आंबेडकरी साहित्य प्रकाशन की सबसे बड़ी शख्सियत शांति स्वरूप बौद्ध सर हमारे बीच नहीं रहे। आँखों से आँसू निकल रहे हैं, मैं इससे ज्यादा कुछ लिखने की स्थिति में नहीं हूँ!’ कोरोना के समक्ष: जीवन युद्ध हार गए बौद्धाचार्य शांति स्वरूप बौद्ध !    पोस्ट लिखने के बाद इस विषय में विस्तार से जानने के लिए एक-एक करके प्रोफेसर विवेक कुमार, सुदेश तनवर, अशोक दास को फोन लगाया पर, दिल्ली के जिस व्यक्ति से पहले संपर्क हो सका, वह हीरालल राजस्थानी रहे। किन्तु उन्हें भी ज्यादे जानकारी नहीं  थी। उनसे बस इतनी जानकारी मिली कि बौद्ध जी का दोपहर बाद निधन हो गया और शाम 5 बजे निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार होगा। निराश होकर मैंने भारी मन से डॉ. जय प्रकाश कर्दम को फोन लगाया और संपर्क हो गया। उन्होंने बताया कि 1 जून को उन्हें  गंभीर हालत में दिल्ली के दिलशाद गार्डेन अवस्थित राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हास्पिटल में एडमिट कराया गया था। निमोनिया से उन्हे सांस लेने मे दिक्कत हो रही थी, इसलिए उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। एडमिट होने के दिन ही शाम को उन्हें कोरोना से आक्रांत होने की रिपोर्ट आ गयी। उन्हें वहाँ लगातार वेंटिलेटर पर रखा गया, किन्तु अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और आज दोपहर उनके निधन की दुखद खबर से दो चार होना पड़ा। उन्होंने इस बात के लिए अफसोस जताया कि श्मसान घाट पर सीमित व्यक्तियों की अनुमति के कारण चाहते हुये भी वहां जाकर उनको अंतिम विदाई नहीं दे सकते। उसके बाद तो हम देर तक बौद्ध जी के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते रहे। शांति स्वरूप बौद्ध से मेरी पहली मुलाक़ात    डॉ. जय प्रकाश कर्दम ही वह शख्स रहे जिन्होंने मेरा परिचय, 2 अक्तूबर, 1949 को अपने जन्म से बहुजन समाज को धन्य करने वाले इतिहास पुरुष उस शांति स्वरूप बौद्ध से कराया, जिनका नामकरण स्वयं बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने उनके जन्म के तीन दिन बाद अर्थात 5 अक्तूबर, 1949 को गुलाब सिंह से शांतिस्वरूप के रूप में किया था। 1999 के शेष दिनों में जब कर्दम साहब ने उनसे मेरा संपर्क कराया, उन दिनों वह मेरी पहली किताब ‘आदि भारत-मुक्ति: बहुजन समाज’ की भूमिका लिख रहे थे। तब तक किताब के लिए कोई प्रकाशक तय नहीं हुआ था और मुझे कम्पोजर को दस हजार रुपये भुगतान करने थे। मैंने अपनी समस्या कर्दम साहब के समक्ष रखी। उन्होंने कुछ दिनों बाद मुझे बौद्ध जी से मिलने के लिए कहा और मैं उनसे मिलने सम्यक प्रकाशन के ऑफिस पहुँच भी गया। पहली मुलाक़ात में ही उनका तेजस्वी व्यक्तित्व और आत्मीयतापूर्ण व्यवहार देखकर अभिभूत हुये बिना न रह सका। उनकी जीवंतता और ऊर्जा युवाओं को भी म्लान करती प्रतीत हो रही थी। वहाँ पहुँचकर चाय-पानी ले ही रहा था कि उन्होंने नोटों की एक गड्डी सामने रख दी और कहा,’ इसमें दस हजार हैं, ले जाइए अपना काम चलाइए और यदि कोई उपयुक्त प्रकाशक नहीं मिलता है तो मैं आपकी किताब प्रकाशित करूंगा। अभी मेरा प्रकाशन नया-नया है, इसलिए मोटी किताबें छापने से बच रहा हूँ। ‘मेरा सिर आभार से झुक गया। हालांकि वह किताब उनसे प्रकाशित करवाने की नौबत नहीं आई: उनसे मुलाक़ात के कुछ दिनों बाद ही मुझे एक प्रकाशक मिल गया। किन्तु, उस पहली मुलाक़ात के बाद हम एक दूसरे के निकट आते चले गए। निकटता इतनी बढ़ी कि उन्हें जब सन 2000 के जून में अपने बड़े बेटे की  शादी में आमंत्रित किया, वह भीषण गर्मी की उपेक्षा कर लखनऊ आकर सोत्साह विवाह सम्पन्न कराये। इसी तरह 2005 में भी वह मेरी लड़की का विवाह कार्य सम्पन्न कराने फिर लखनऊ आए। आज भी याद आता है बौद्ध जी द्वारा कराये गए : मेरी किताबों का विमोचन समारोह 2000 के अक्तूबर से मैंने सामयिक मुद्दों पर लिखना शुरू किया और देखते ही देखते दो-ढाई वर्षों में ही लेखों की संख्या एक किताब प्रकाशित करने भर की हो गयी। बौद्ध जी मेरे लेखों के मुरीद थे। जब भी कोई लेख अखबारों में छपता, वह फोन करके बधाई देने के साथ कुछ मूल्यवान सुझाव भी देते। 2003 की शुरुआत में मैंने सम्यक प्रकाशन से उन लेखों का संग्रह निकालने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा, जिसे उन्होंने सोत्साह स्वीकार कर लिया। फलतः अगस्त 2003 में ‘वर्ण- व्यवस्था: एक वितरण’ तथा ‘हिन्दू आरक्षण और बहुजन संघर्ष’ जैसी औसतन ढाई-ढाई सौ पृष्ठों की दो शानदार किताबें तैयार कर मुझे सुखद आश्चर्य में डाल दिये। ये दोनों किताबें इसलिए खास थीं क्योंकि इससे पहले किसी दलित के पत्रकारीय लेखों की ऐसी किताबें नहीं आई थीं। इन किताबों को प्रकाशित कर उन्हें भी भारी संतोष मिला था, लिहाजा उन्होंने इनका विमोचन शानदार तरीके से दिल्ली बुक फेयर में नामवर सिंह के हाथों करवाने की परिकल्पना की और नामवर सिंह जी ने चंद्रभान प्रसाद, मोहनदास नैमिशराय, डॉ. श्योराज सिंह बेचैन, डॉ. रजत रानी मीनू, रूप चंद गौतम व अन्य हस्तियों की उपस्थिति में विमोचन किया भी। उसके बाद न जाने कितनी बार मेरी किताबों का विमोचन हुआ, उसकी संख्या मुझे याद नहीं है, किन्तु बौद्ध जी द्वारा कराये गए विमोचन की यादें मेरी स्मृति में आज भी ताज़ी हैं। बौद्ध जी ने न सिर्फ मेरे लेखों को दो शानदार किताबों का रूप देकर मुझे धन्य किया था, बल्कि उनके प्रकाशकीय में मेरे पत्रकारीय कर्म को इन शब्दों में सराह कर- “एच एल दुसाध जी ऐसे अकेले रचनाकार हैं, जो विचारों का निर्माण करने वाली पक्षपाती मीडिया को आड़े हाथों लेकर, दलित- पिछड़ों के चहेते चिंतक व पत्रकार बन गए हैं। संघ परिवार का कोई भी हथकंडा अथवा उसकी कूटचाल दुसाध जी की सूक्ष्म दृष्टि से बच नहीं पायी है.. भारतीय मीडिया की अमानवीयता एवं संवेदनहीनता को दुसाध जी जैसे मजबूत जीवट वाले लेखक ही उजागर कर सकते हैं। मीडिया के क्रूर पापों पर से पर्दा हटाने के लिए मैं दुसाध जी को कोटि-कोटि साधुवाद देता हूँ।” मेरे ऊपर जिम्मेवारी का एक खूबसूरत बोझ डाल दिया। कहना न होगा बौद्ध जी द्वारा जिम्मेवारी का डाला गया मुझ पर बोझ परवर्तीकाल में पत्रकारिता के इतिहास मेँ एक अध्याय रचने का सबब बना। एक जिंदा देवी मायावती के पीछे बौद्ध जी की अद्भुत परिकल्पना!   ‘वर्ण-व्यवस्था: एक वितरण-व्यवस्था’ तथा ‘हिन्दू आरक्षण और बहुजन संघर्ष’ के बाद  बौद्ध जी ने मेरे अखबारी लेखों को लेकर एक और शानदार किताब 2005 में प्रकाशित की, जिसका नाम था,’ सामाजिक परिवर्तन और बीएसपी’। इस किताब के कई संस्करण आए और दावे के साथ कहा जा सकता है कि बसपा की राजनीति पर ऐसी दूसरी किताब आज तक नहीं आयी। किन्तु बौद्ध जी ने मेरी जो तीन किताबें प्रकाशित की थी, लेखक होने के नाते उनका अधिकांश श्रेय मुझको ही जाता था, पर, 2006 में सम्यक प्रकाशन की ओर से बसपा की राजनीति पर जो मेरी सबसे चांचल्यकर किताब आई, उसका 80 प्रतिशत श्रेय मैं बौद्ध जी को देता हूँ। वह किताब थी ‘कांशीरामवाद को साकार करती एक ज़िंदा देवी: मायावती’। यह किताब चिरकाल के लिए बसपा विरोधियों का मुंह बंद करवाने के मकसद से बौद्ध जी मुझसे लिखवाई थी, जो अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रही। इस किताब को लेकर यूपी विधानसभा में सवाल खड़े हुये तथा इसके ढेरों संस्करण प्रकाशित हुये। इस किताब के पीछे अपनी परिकल्पना का खुलासा करते हुये उन्होंने उसकी प्रकाशकीय में लिखा था।‘ इस पुस्तक के जन्म लेने का कारण भी भी बहुत रोचक रहा। मुझे ‘आज का सुरेख भारत’ नामक पत्रिका का एक अंक देखने को मिला, जिसके मुख पृष्ठ पर मायावती जी को चंडी के रूप में चित्रित किया हुआ था।उन्हीं दिनों ने बहन जी ने यह कहना जारी रखा हुआ था कि मैं ही जिंदा देवी हूँ। बस फिर क्या था ? मैंने इस विषय पर दुसाध जी को कलम चलाने का आग्रह किया। उन्होंने अपने स्वभाव के मुताबिक तुरंत ही यह पुस्तक रच डाली। इस पुस्तक के त्वरित लेखन से लेखक महोदय की बिलकुल भिन्न प्रकार की  चिंतन क्षमताओं का आभास मिलता है।‘ मैंने आलोड़न सृष्टिकारी 200 पृष्ठीय जिंदा देवी.. पुस्तक सिर्फ तीन महीने में तैयार कर दिया था। सम्यक प्रकाशन से वह मेरी आखिरी किताब थी। ज़िंदा देवी मायावती के प्रकाशन के कुछ माह बाद मेरी प्राथमिकता में डाइवर्सिटी आ गयी और जुनून की हद तक डाइवर्सिटी मिशन को आगे बढ़ाने में जुट गया। इस मकसद से ही मैंने दुसाध प्रकाशन को आगे बढ़ाने का मन बनाया। फिर तो हर साल औसतन मेरी पाँच किताबें दुसाध प्रकाशन और बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से छपने लगीं।जिंदा देवी मायावती के बाद अगर मैं डाइवर्सिटी मिशन को आगे बढ़ाने मे जुट गया तो बौद्ध जी सम्यक प्रकाशन और धम्म से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ाने मे व्यस्त हो गए। उसके बाद हमारी बहुत कम मुलाकातें होतीं। कभी किसी सेमिनार में मिल लिए तो कभी फोन पर एक दूसरे का हाल पूछ लिए। किन्तु नियमित अंतराल पर न मिल पाने के बावजूद उनकी गतिविधियों से अन्य आंबेडकरवादियों की भांति मैं भी विस्मित होता रहा। उनका काम साल दर साल चौकाते गया। आज जब उनके आकस्मिक निधन के बाद उनके कार्यों का आंकलन करता हूँ तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि मान्यवर कांशीराम और ग्रेट पैंथर नामदेव ढसाल के बाद शांति स्वरूप बौद्ध का जाना बहुजन मुव्हमेंट की सबसे बड़ी क्षति है। सम्यक प्रकाशन के जरिये देश के कोने-कोने तक पहुंचा : फुले-आंबेडकर-बुद्ध का विचार! 21 वर्ष के सेवाकाल के बाद केंद्रीय सरकार के राजपत्रित पद का मोह विसर्जित कर शेष जीवन आंबेडकरी मिशन के लिए समर्पित करने वाले बौद्ध जी आंबेडकरी मूवमेंट में योगदान का आंकलन करने पर मान्यवर कांशीराम और नामदेव ढसाल के बाद उनका ही काम मुझे  सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे जिन दुर्लभ शख़्सियतों को निकट से जानने-सुनने का सौभाग्य-लाभ हुआ, उनमेँ नामदेव ढसाल के बाद शांति स्वरूप बौद्ध जी ही सबसे खास शख्सियत रहे। आज जिस आंबेडकरी आंदोलन की पूरी दुनिया कायल है, जिसकी चर्चा सर्वत्र हो रही है, वह मुख्यतः एक वैचारिक आंदोलन है, जो साहित्य के द्वारा फैलाया जा रहा है। बहरहाल साहित्य के माध्यम से फैलने वाला आंबेडकरी आंदोलन आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसमें एकल रूप से यदि किसी व्यक्ति को चिन्हित किया जाय तो सबसे बड़ा योगदान बौद्ध जी का ही नजर आएगा। उन्होंने यह कारनामा सम्यक प्रकाशन के जरिये अंजाम दिया। मैं उन चंद लोगों में हूँ, जिन्होंने सम्यक प्रकाशन की प्रगति बहुत निकट से देखी हैं। बौद्ध जी ने महज दो दशकों मे इस संस्थान के जरिये लगभग डेढ़ हजार  किताबों का प्रकाशन किया है। बिना किसी सरकारी व संस्थागत सहयोग के अपने एकल प्रयास से यह काम देने वाले वह सम्पूर्ण भारत के संभवतः इकलौते प्रकाशक रहे।  बौद्ध जी ने सम्यक प्रकाशन के जरिये फुले- आंबेडकरी और बौद्ध विचारधारा के प्रसार में अभूतपूर्व भूमिका अदा करने के साथ ही इसके माध्यम से बहुजन लेखकों की मुख्यधारा के प्रकाशको पर से निर्भरता खत्म करने का भी ऐतिहासिक काम अंजाम दिया है। सम्यक प्रकाशन के वजूद में आने के पहले शैक्षणिक क्षेत्र से हजारों साल से बहिष्कृत शूद्रातिशूद्र समुदाय के लोग छ्पने के लिए तरस कर रह जाते थे, क्योंकि मुख्यधारा के प्रकाशक इनकी घोरतर अनदेखी करते रहे। किन्तु बौद्ध जी ने जब प्रकाशन क्षेत्र से बहिष्कृत समुदायों के लेखकों छापना शुरू किया तब, ढेरों लोग लेखक बनने का सपना देखने लगे। इससे देखते ही देखते सैकड़ों बहुजन लेखक राष्ट्रीय फ़लक पर अपनी उपस्थिती दर्ज कराने में समर्थ हुये। यही नहीं सम्यक प्रकाशन से अभिप्रेरणा पाकर दर्जनों की तादाद में नए प्रकाशक उभर आए। बौद्ध जी ने सम्यक प्रकाशन के जरिये सिर्फ किताबें ही नहीं, बल्कि लोगों को मुव्हमेंट से जोड़ने के लिए अन्य किस्म की सामग्रियाँ भी प्रकाशित किया, जिनमें कैलेंडर बहुत खास रहा। उनके द्वारा प्रकाशित कैलेंडरों ने अपने क्षेत्र मे क्रांति ही घटित कर दिया। इन कैलेण्डरों के जरिये उन्होंने बहुजन लेखकों को घर-घर तक पहुंचाने की जो अद्भुत परिकल्पना की, वह बेनजीर घटना है। मुझ जैसे ढेरों लेखकों ने कभी सपना भी नहीं देखा था कि कभी हम कैलेंडर पर छपेंगे किन्तु,बौद्ध जी ने अपनी कलात्मक सोच के जरिये वह कर दिखाया। प्रकाशक के साथ ही विरल लेखक बौद्ध जी ने तो बतौर प्रकाशक एक इतिहास ही रच दिया, जिसको अतिक्रम करने का सपना भी देखने का दुस्साहस शायद कोई नहीं करेगा। किन्तु वह महान प्रकाशक के साथ एक विलक्षण प्रतिभा के लेखक भी रहे। उन्होंने बौद्ध धम्म व सामाजिक न्याय के स्तम्भ माने जाने वाले 60 से अधिक पात्रों के जीवन बृतांत पर जो सचित्र पुस्तकें तैयार किया, वह उन्हे बहुजन साहित्य सृजन की दुनिया में एक अलग मुकाम दिलाने के लिए काफी है। सहज भाषा में घटनाओं के चित्रांकन के जरिये कम पढे़-लिखे लोगों और बच्चों तक महापुरुषों के संदेश को प्रभावी तरीके से पहुंचाने का ऐसा काम, उनके जैसा कोई जन्मजात चित्रकार और लेखक ही अंजाम दे सकता था, जो उन्होंने दिया। उन्होंने सम्यक प्रकाशन संस्थान की ओर से सहस्राधिक किताबों के साथ जो कैलेंडर, बहुजन महापुरुषों के भूरि- भूरि चित्र प्रकाशित किए उससे देश का शायद ही कोई कोना और कस्बा बचा होगा, जहां बाबा साहब, फुले और बुद्ध का संदेश न पहुंचा हो। उनके इन कामों को देखते हुये द्विधा- मुक्त चित्त से कहा जा सकता है कि उनका दुनिया से जाना कांशीराम और नामदेव ढसाल के बाद बहुजन आंदोलन की  सबसे बड़ी क्षति है।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर के चित्रकार! बहुतों को पता नहीं कि बौद्ध जी ने सम्यक प्रकाशन को धनार्जन के स्रोत के रूप में नहीं, आंबेडकरी विचारधारा के प्रसार के लिए एक मिशनरी संस्थान के रूप में विकसित किया था।उनकी आय का स्रोत चित्रकारी रही। वह खुद भी एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के चित्रकार रहे, जिनकी चित्रकारी के कद्रदान पूरी दुनिया में फैले हुये थे। उनके घर जाने पर कई बार मुझे उनके विदेशी क्लाइंटों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। मान्यवर कांशीराम ने जिन भूरि-भूरि मूलनिवासी नायकों को इतिहास के कब्र से निकालकर बहुजनों के समक्ष लाया था, उन्हें शक्ल प्रदान करने का काम बौद्ध जी के किया। उन्होंने अपनी तूलिका के जरिये संत रविदास, मातादीन भंगी, बाबा चौहरमल इत्यादि जैसे वंचित जातियों में जन्में में ढेरों नायकों को जो आकार प्रदान किया, वह आज बहुजनों के जेहन में स्थापित होते जा रहा है। समर्थ चित्रकार बौद्ध जी अपने अधीन 40-50 चित्रकारों को लेकर निर्यातयोग्त हस्तनिर्मित कला चित्रों का निर्माण करते रहे, जो न सिर्फ उनके जीविकोपार्जन बल्कि सम्यक प्रकाशन को खड़ा करने का मध्यम बना। चित्रकारों की इस टीम को लेकर उन्होंने बहुजनों को मुव्हमेंट से जोड़ने लायक भूरि–भूरि चित्रों का का भी निर्माण किया। बुद्धिज़्म के चैंपियन प्रचारक इटली के क्रांतिकारी विचारक अंटोनियो ग्राम्सी ने कहा है, ‘यदि शोषितों को शासक वर्ग से मुक्त होना है तो उन्हे वैकल्पिक सांस्कृतिक वर्चस्वता स्थापित करनी होगी।‘ भारत में बहुजनों की दुर्दशा के मूल में रही है,हिन्दू धर्म-संस्कृति। हिन्दू धर्म-संस्कृति के कारण बहुजन न सिर्फ शक्ति के स्रोतों- आर्थिक,राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक-सांस्कृतिक इत्यादि- से चिरकाल के लिए बहिष्कृत हुये, बल्कि उनकी मानवीय सत्ता मनुष्येतर प्राणी के रूप में स्थापित हुई। बहुजन विरोधी अमानवीय हिन्दू धर्म-संस्कृति का विकल्प खड़ा करने के लिए सदियों से बहुजन महापुरुष प्रयासरत रहे। स्वाधीनोत्तर भारत में मान्यवर कांशीराम की प्रेरणा से ढेरों लोग व संगठन वैकल्पिक संस्कृति खड़ा करने की दिशा में अग्रसर हुये। किन्तु, इस मामले में भी व्यक्तिगत रूप से किसी को चिन्हित करने का प्रयास हो तो बौद्ध जी ही सबसे आगे नजर आएंगे। जिन लोगों को उनकी निकटता प्राप्त हुई है,उन्हें पता है कि उनके जीवन का हर पल हिन्दू धर्म-संस्कृति की तोड़ खड़ा करने के प्रति समर्पित रहा। वे सदा इसका विकल्प बौद्ध धर्म-संस्कृति में देने के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने अपने नाम के साथ जुड़े ‘बौद्ध’ शब्द को सार्थक करने के लिए बौद्धमय भारत निर्माण में खुद को जिस हद समर्पित किया, उससे वह 21 वीं सदी के चैंपियन बौद्ध के रूप में अपनी छाप छोड़ गए।  मेरी तो धारणा है कि गत चार दशकों में भारत में बुद्धिज़्म को पॉपुलर करने के काम में वही चैंपियन रहे। उन्होंने इस काम के लिए भी सम्यक प्रकाशन और अपनी चित्रकारी का बेहतरीन इस्तेमाल किया। उनके बनाए तथागत बुद्ध के एक से बढ़कर एक चित्र घर-घर तक पहुंचे। आज बहुजनों के घरों में गौतम  बुद्ध के भांति-भांति के जो चित्र दिखते है, उनमें 90 प्रतिशत से अधिक चित्र बौद्ध जी के संस्थान के बने होते हैं। सम्यक प्रकाशन के जरिये आम जन के लायक सैकड़ों छोटे-बड़े आकार की किताबें प्रकाशित करने के साथ उन्होंने विशाल आकार के गुणवत्ता पूर्ण ऐसे कुछ ग्रंथ प्रकाशित किए हैं, जिन्हें हाथ में लेने पर गर्व की एक विचित्र अनुभूति होती है। बौद्ध जी बौद्ध इतिहास से सम्बद्ध पुस्तकों और  चित्रों का निर्माण करने के साथ ही बुद्धिज़्म के प्रसार के लिए हिन्दी त्रैमासिक धम्म दर्पण का सम्पादन भी अपने स्तर के अनुरूप किया। एक बड़े संगठनकर्ता! बहु-गुणों के धनी बौद्ध जी को कुदरत ने एक असाधारण वक्ता के गुणों से भी समृद्ध किया था और बुद्धिज़्म के प्रसार के लिए उन्होंने इस खास गुण का सदुपयोग भी खूब किया।इसके लिए उन्होंने भारत के चप्पे-चप्पे के साथ विदेशों के अनेक देशों, खास कर आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जर्मनी, हाँगकाँग, सिंगापुर, नेपाल इत्यादि की एकाधिक बार धम्म यात्राएं की। धम्म यात्राओं के क्रम में वह हर जगह धम्म प्रवचन करते। उनकी वाणी मे इतना ओज था कि लोग जोश में भरकर उन्हे मुग्धभाव से सुनते रहते। अपनी वाणी के साथ बौद्ध जी ने बुद्धिज़्म के प्रसार के लिए अपनी संगठनिक क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करते रहे। हाल के कुछ वर्षों में उन्होंने इस क्षमता का सदव्यवहार करते हुये साहित्यिक और धम्म सम्मेलनों का सिलसिला शुरू किया। उनके सम्मेलनों में देश के विभिन्न अंचलों के बहुजन लेखक,एक्टिविस्ट, सांस्कृतिक कर्मी भरी उत्साह के साथ शिरकत करते। उनके ये आयोजन पिछले आयोजन को म्लान कर नया कीर्तिमान बनाते। इन भव्य आयोजनों की विपुल सफलता को देखते हुये हम भविष्य में उनके आह्वान पर धीरे-धीरे लाखों लोगों के एक जगह असेंबल होने का सपना देखने लगे थे। किन्तु, कोरोना ने हमसे वह सपने छीन लिए। ऊर्जा में जवानों को भी म्लान करते रहने वाले बौद्ध जी की दिन चर्या और स्वास्थ्य ऐसा था कि वह हमारा मार्गदर्शन आने वाले डेढ़- दो दशकों तक बहुत आसानी से कर सकते थे। इसलिए उनके आकस्मिक निधन से पूरा बहुजन भारत स्तब्ध और शोकाकुल है। उन्होंने अपने कार्यों से हमारे दौर पर कितना असर छोड़ा था, इसका अनुमान हम देश के विशिष्ट आंबेडकरवादियों द्वारा दी गयी गयी आदरांजलि से लगा सकते हैं। आदरांजलि ! इन पक्तियों के लिखने के दौरान सुप्रसिद्ध दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद का फोन आया था। बातों के क्रम उन्होने कहा,’ क्या 50 सांसद भी एक साथ मिलकर शान्ति स्वरूप बौद्ध जी के मुक़ाबले खड़ा हो सकते थे? उन्हीं चंद्रभान जी ने बौद्ध जी के प्रति आदरांजलि देते  हुये कहा है, ’ बौद्ध जी दलितों के अशोक स्तम्भ थे। वह जब संबोधित करते थे तो उनके मस्तक पर बाबा साहब का चित्र उभरता प्रतीत होता था’। उनके आकस्मिक निधन से स्तब्ध चर्चित दलित साहित्यकार सूरज पाल चौहान का उद्गार रहा, ‘यह जानकार संज्ञाशून्य हो गया कि सम्यक प्रकाशन के शान्ति स्वरूप बौद्ध हमारे बीच नहीं रहे’‘बहुजन समाज ने अपना एक बड़ा बौद्धिक नेता खो दिया’ कहना है सुप्रसिद्ध पत्रकार उर्मिलेश का का’। महान पत्रकार दिलीप मण्डल ने उन्हे श्रद्धांजलि देते हुये कहा है-‘ उत्तर भारत, खासकर हिन्दी पट्टी में बौद्ध धर्म के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभाने वाले बौद्धजी हम जैसे कई लोगों के प्रेरणा स्रोत रहे।‘ ‘समाज और भारतीय बौद्ध जगत की कभी न पूर्ति होने वाली क्षति हो गयी,’ ऐसा साहित्यकार सुदेश तनवर का कहना है। ‘वर्तमान समय के आंबेडकरवादियों ने अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक और संरक्षक खो दिया। आज देश भर में बहुजन महापुरुषों की जो किताबें और तस्वीरें नजर आती हैं, वह सिर्फ आपके कठिन परिश्रम से ही मुमकिन हो सका है,’ ऐसा कहना है विदुषी मनीषा गौतम का। महेश कुमार राजन के अनुसार।‘ वे ज्ञान के अथाह सागर,अद्भुत व निडर वक्ता,बहुजन महापुरुषों के इतिहास को सम्यक प्रकाशन के जरिये जन-जन तक ले जाने वाले, प्रेरणा के स्रोत,एक महान पुरुष थे ।उनको बहुजन समाज हमेशा याद रखेगा।‘ ‘शांति स्वरूप बौद्ध सर ने बहुजन साहित्य का विशाल भंडार हमें दिया है। दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बहुजन प्रकाशन खड़ा किया है। जब तक बहुजन समाज रहेगा, बहुजन साहित्य की तलब  भी रहेगी। जब तक बहुजन साहित्य की तलब बनी रहेगी, तब तक शांति स्वरूप बौद्ध जी हमारे बीच जिंदा रहेंगे,’ ऐसा मानना है विशिष्ट बहुजन चिंतक चंद्र भूषण सिंह यादव का। ‘बौद्ध साहित्य की महान हस्ती रहे शांति स्वरूप बौद्ध जी। उन्होंने सम्यक  प्रकाशन के जरिये बहुजन महापुरुषों के विचारों को फैलाने का जो काम किया है, उसे समाज कभी नहीं भूलेगा,’ ऐसा सोचना है महान बौद्ध विद्वान बुद्ध शरण हंस का। ‘दलित साहित्य एवं दलित साहित्यकारों को साहित्य के गगन पर पहुँचने वाली शख्सियत रहे शांति स्वरूप बौद्ध’ ,ऐसा कहना है युवा एक्टिविस्त राजीव रंजन का। सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. विजय कुमार त्रिशरण के अनुसार वह बाबा साहब और मान्यवर कांशीराम के बाद मूलनिवासी – बहुजन सामाजिक- सांस्कृतिक मिशन और मुव्हमेंट को तीव्रतर करने वाले एक मुकम्मल और मजबूत भीम स्तम्भ रहे।‘सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध जी का परिनिर्वाण एक विराट क्षति है,’ ऐसा कहना है लालजी प्रसाद निर्मल का।‘ एक इंसान के रूप में जितनी खूबियाँ एक व्यक्ति में हो सकती हैं, वह उनमे उससे ज्यादा थी,’ ऐसा मानना है दलित दस्तक के संपादक अशोक दास का। ‘सम्यक प्रकाशन के संस्थापक और क्रांतिकारी लेखक शांति स्वरूप बौद्ध आंबेडकरवादी मूवमेंट के क्रूसेडर रहे’, ऐसा कहना है अंतर्राष्ट्रीय लेखक फ्रैंक हुजूर का। उनके आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त करते हुये बसपा सुप्रीमो मायावती जी ने कहा है,’श्री शांति स्वरूप बौद्ध, जो कमजोर तबकों को जागरूक करने मे लगातार सक्रिय रहे, उनकी दिल्ली में अचानक हुई मौत की खबर अत्यंत दुखदायी है। इनके परिवार व परिचितों के प्रति गहरी संवेदना। कुदरत इनके करीबी लोगों को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।‘ ‘यह बात किसी भी आंबेडकरवादी को गर्वित करती रहेगी कि उन्होंने सम्यक प्रकशन के रूप में एक ऐसा संस्थान छोड़ा है जिससे 2000 से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं। हम उम्मीद करते हैं कि उनके परिवार और मित्र भारत में आंबेडकरवादी बौद्ध सांस्कृतिक आंदोलन को मजबूत करने के लिए उनसे प्रेरणा लेंगे और उनके कार्यों को आगे बढ़ाते रहेंगे’, ऐसी चाहत है विशिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता विद्या भूषण रावत की। विद्या भूषण रावत जैसे बौद्ध जी के ढेरों गुणानुरागियों की भांति प्रोफेसर विवेक कुमार का भी कहना है कि बौद्ध जी के किए गए कार्यों और कहे गए शब्दों को आगे बढ़ाएँ, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह सही है कि शांति स्वरूप बौद्ध जी के आकस्मिक निधन से बहुजन भारत की अपूरणीय क्षति हुई है ,पर, यदि हम प्रोफेसर विवेक कुमार के शब्दों में उनके कार्यों और कहे गए शब्दों को आगे बढ़ा सके तो अवश्य ही कुछ भरपाई हो जाएगी । (लेखक एच. एल. दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन क राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सपर्क – 9654816191)   

Shanti Swarup Bauddh: He spent his whole life for the Bahujans

I am so shocked and heart broken to inform you of the passing away of Br. Bauddhacharya Shanti Swarup Bauddhji on Saturday, June 6, 2020 at about 7:00 am in the hospital due to COVID-19.

Baudhji, an Ambedkarite Buddhist was a writer, fiery orator, activist, great Bahujan publisher, and painter of world repute. He left the government position of a gazetted officer; and dedicated his entirety with all means to make cultural, artistic, literary, and social revolution successful among the Bahujans.

He was born on October 2,1948 in a relatively better off Jatav family of political background in Old Delhi. He has been living in Paschim Puri for more than 25 years.

He left behind- his wife, 4 sons, 4 daughter–in-laws, and 8 grandchildren. His father has been working as the President of the Republican Party of India (RPI), Delhi from 1965 to 1967.

Baudhji was made the General Secretary of the RPI, Delhi in 1970.

He founded Samyak Prakashan. In 1975, to identify the identity of the idigenous people / Moolniwasis of India, the process of starting Samyak Prakashan was initiated, but regular publication of books started in 1997. More than 1000 books have been published by 2013, and about 300 writers are associated with the publication. He published illustrated books on the life stories of more than 60 characters.

The Samyak Prakashan publications won bronze medal in 2017, silver medal in 2018, and silver medal in 2019 in World Book Fairs for literature and display. Many texts published by Samyak Prakashan have been awarded by national and international institutions.

This Prakashan has been striving to publish glorious Buddhist culture, and literature related to the native revolutionary heroes. It is dedicated to the wide publicity of the Bahujan mission, and for publishing Buddhism, Dr Babasaheb Ambedkar, Ashoka, Phule, Sahuji Maharaj, and other social reformers, revolutionaries of the country, and their mission.

In fact, the literature published by this Publication has played the role of an alternative media for the depressed, oppressed, underprivileged and women society of the country. This publication played a respectable role in establishing the Bahujan-Moolniwasi identity through language and words.

He has been working as the National Vice- President of the Buddhist Society of India (BSI) of which Ms Meera Tai Ambedkar, the daughter-in-law of Dr Babasaheb Ambedkar has been the President.

He was the Patron of the ‘Youth for Buddhist India’, of which Mr Hari Bhartiji is the President. He has been organizing the Samyak Sammelan in Talkatora Stadium, Delhi every year to honour those who work in the society.

Also, he has been very actively participating without any position in Samta Buddha Vihar, Paschim Puri, New Delhi.

He had deeply studied Buddhism, and was considered as one of the pillars of Buddhism. He had been working as a member of the Board of Editors of representative journal of the Buddhist movement ‘Dhamma Darpan’; also was a member of the Board of Editors of ‘Dalit Dastak’, a famous Youtube news channel. He was the winner of several national and international awards.

 He was my friend and neighbour in Delhi. Last, I had a conversation with him on April 30, 2020.  He spent his whole life for the Bahujans, and lived the life as a true Ambedkarite Buddhist.

‘Life is uncertain; death is certain’

The sudden demise of Bauddhji is not only the loss of his family, but it is an unfulfilled loss to the Bahujan movement in near future.

My deepest sympathies are to the family.

With regards, Your’s in the mission, (PROF. ARUN GAUTAM) C: 647-853-2329 A: 201- 35 Jansusie Road, Toronto ON M9W 4V4, Canada E: gautam.arunkumar45@gmail.com


 President, -Dr Ambedkar International Mission (AIM), Toronto (Registered), Canada Convenor,     -Confederation of Bahujan (Ambedkarite, Buddhist, Ravidassi, Valmiki, Backward, & Minorities) Organizations (CBO) of Greater Toronto Area (GTA), Canada

Statement in support for the Bhima Koregaon 12 Activists

We the undersigned twenty-five organizations strongly condemn the shameful imprisonment of India’s finest public intellectuals and social justice defenders, Dr. Anand Teltumbde and Mr. Gautam Navalakha who’ve been in custody since April 14, 2020. Dr. Teltumbde & Mr. Nalvlakha join nine others – journalists, lawyers, writers, academics & organizers- Surendra Gadling, Arun Fereira, Vernon Gonsalves, Mahesh Raut, Sudha Bharadwaj, Dr. Shoma Sen, Sudhir Dhawale, Rona Wilson and Varavara Rao- who have been imprisoned in the same fabricated Bhima-Koregaon case. The case is an attempt by the ruling regime to silence some of its strongest critics that revealed the continued exploitation, humiliation, and oppression of a majority of India’s population, especially Dalits, Adivasis, workers and women. Indeed, we see the Bhima-Koregaon case as a reaction to the anti-casteist united front of Dalits and other caste groups that was emerging through the Elgar-Parishad. We also strongly condemn the recent shameful arrests of students from some of India’s universities such as Safoora Zargar, Devangana Kalita and Natasha Narwal who have staked their lives and careers for preserving the Constitutional right to dissent, which is at the heart of democracy and citizenship. On May 30, 2020, we came together to hear testimonies from the United States of America, Canada, United Kingdom, Japan and India. The speakers were inspired to act of their own accord as people who care deeply about India and who are moved by the alarming breakdown of basic guarantees of the Indian Constitution and the impunity of actions undertaken by the Indian state. Each one of them, in their own language of comfort, spoke the language of defiance, of anguish, of protest and of solidarity. Each one of them demanded the immediate and unconditional release of Dr. Anand Teltumbde – a figure who remains an inspiration to us as a scholar, a writer, a thinker, a prophet of our times, and a human being who relentlessly strove to make us think and feel the true spirit of the Indian Constitution and those of democratic social revolutionaries such as Babasaheb Ambedkar , Periyar and Marx. Many speakers reminded people that the work and lives of social justice defenders being imprisoned in the Bhima-Koregaon case is a testimony against the immorality of the violence perpetrated in India today by the ruling regime – the violence of development policies, violence of casteism against Dalits, the violence of patriarchy against women, the violence of capitalism against workers, and the violence of an ultranationalism against those seeking to live a life of freedom and choice. Our effort has only begun. We are very diverse in our biographies but united in our focus. We stand clearly in solidarity with all victims of the unjust and draconian Unlawful Activities Prevention Act (UAPA) – a law that must go for a democratic India to emerge. India is going through a very dark phase of its history, a phase that ominously threatens to extinguish any glimmer of hope for a majority of its citizens, undercut all promises of the Constitution, and consign all social justice and human rights defenders to oblivion in Indian jails. The rule of fear by the use and abuse of particular laws and institutions of governance is an attempt to silence all voices that have dared to imagine an India that is based on Babasaheb Ambedkar’s vision of liberty, equality and fraternity. We demand:
  1. Immediate release and dropping of all charges against all the Bhima-Koregaon-12
  2. Charges to be brought on Milind Ekbote and Sambhaji Bhide as per the FIRs filed against their actions.
  3. A repeal of the UAPA which infringes on the fundamental Democratic freedoms of Indian citizens, including their right to dissent and their right to a fair trial.  
Organization Endorsement:
  1. Ambedkar King Study Circle (AKSC)
  2. Ambedkar International Center (AIC)
  3. Coalition of Seattle Indian-Americans
  4. India Civil Watch (ICW)
  5. Periyar Ambedkar Study Circle (PASC)
  6. Ambedkar Buddhist Association of Texas (ABAT)
  7. Begumpura Cultural Society of New York
  8. Shri Guru Ravidass Sabha of New York
  9. Organizations for Minority of India (OFMI)
  10. Ambedkar Mission, Toronto (AM)
  11. Ambedkarite International Coordination Society (AICS)
  12. Political Action Platform for Tamils
  13. Ambedkar International Social reform organization (AISRO)
  14. Ambedkar International Mission Society (AIMS)-Canada
  15. Bahujan Federation America
  16. International Commission for Dalit Rights ICDR
  17. Equality Labs
  18. Jaibhim Atlanta
  19. Bhim International USA
  20. Shri Guru Ravidas Sabha-Bay Area California America
  21. Samaj Weekly/The Asian Independent – United Kingdom
  22. Ambedkar Times
  23. Ambedkar International Mission(AIM) – Japan
  24. FABO-United Kingdom
  25. Anti-Caste Discrimination Alliance-United Kingdom

ओडिशा में नरबलि और अंधविश्वास का धंधा

विश्व महामारी कोरोना संक्रमण को ठीक करने के लिए पूरी दुनिया के वैज्ञानिक दवा की खोज में लगे हुए हैं। लेकिन भारत में दैवीय चमत्कार की उम्मीद भी की जाने लगी है। कोई कह रहा है कि कोरोना गो-मूत्र से ठीक हो जाएगा तो कोई कोरोना भगाने के लिए यज्ञ कर रहा है। लेकिन हद तब हो गई, जब कोरोना भगाने के लिए नरबली दे दी गई। जी हां, ठीक सुना आपने, नरबलि, यानी कि कोरोना भगाने के लिए एक पुजारी ने एक इंसान की गला काट कर बलि दे दी। यह घटना घटी है ओडिशा के प्रमुख शहर कटक में। कटक के बाहुड़ा गांव में एक मंदिर है। मंदिर का नाम है ब्राह्मणी देवी मंदिर। यहीं पर यह हैरान कर देने वाली घटना घटी है। बलि देने के आरोप में 70 साल के पुजारी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस को दिये अपने बयान में पुजारी ने कहा है कि चार दिन पहले हमें मां मंगला देवी का सपना आया था कि नरबलि देने से यह इलाका कोरोना महामारी से मुक्त हो जाएगा। इसके बाद बुधवार 27 मई की रात को जब गांव के ही 55 वर्षीय सरोज प्रधान मंदिर में पहुंचे तब पुजारी ने धोखे से धारदार कटारी से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। हालांकि घटना के बाद पुलिस ने पुजारी को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन ऐसी घटनाएं एक दिन में नहीं घटती। अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से 31 मई को कोरोना सहित अन्य विषाणुओं, हानिकारक जीवाणुओं और रोगाणुओं के नाश तथा पर्यावरण के परिशोधन के लिए एक साथ गायत्री मंत्र, सूर्य गायत्री मंत्र एवं महामृत्युंजय मंत्र से हवन यज्ञ किया जाएगा। इसे विश्व के 100 से भी ज्यादा देशों के करोड़ों लोग अपने-अपने घरों में करेंगे। कहा जा रहा है कि हर शहर से 551 लोगों की भागेदारी रहेगी। सवाल है कि क्या मलेरिया, टीबी, एड्स, कोरोना, कैंसर आदि के विषाणु इस यज्ञ से खत्म हो जाएंगे। मार्च के दूसरे हफ्ते में तो अखिल भारत हिन्दू महासभा द्वारा जंतर मंतर पर गो-मूत्र पार्टी की गई। और इस महासभा के स्वघोषित संत ने तो यहां तक मांग कर दी कि जो भी भारत में कदम रखे, उसको गो-मूत्र पिलाया जाए, गोबर से स्नान कराया जाए, फिर आने दिया जाए। चिंता की बात यह है कि इस तरह के आयोजनों को भारतीय मीडिया भी बढ़-चढ़ कर प्रचारित करता है। मीडिया द्वारा इसकी आलोचना नहीं की जाती, बल्कि इस तरह के अंधविश्वासों पर घंटे भर के कार्यक्रम बनाए जाते हैं और चर्चाएं आयोजित की जाती है। जिससे इस तरह के काम करने वालों को बल मिलता है। दरअसल भारत में अंधविश्वास फैलने से कुछ लोगों का फायदा होता है। देश में अंधविश्वास धंधा बन चुका है। इसके खिलाफ काम करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या इस बात का पुख्ता सबूत है कि अगर दाभोलकर सफल हो जाते तो कईयों का धंधा बंद हो जाता। वरना एक नेक काम करने वाले इंसान की हत्या समझ से परे है। दाभोलकर एक लेखक  और तर्कवादी व्यक्ति थे। वह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक थे। 20 अगस्त 2013 को उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन दिक्कत यह है कि भारत में इस तरह की हत्याओं पर कोई जन आक्रोश नहीं होता।

शहर छोड़ने वाले मजदूरों को पीसने के लिए तैयार है गांव की जातिवादी चक्की

  – अभय कुमार बिहार के गाँवों से बहुत सारे मज़दूर दो पैसा कमाने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों में पलायन करते हैं। कोरोना संकट के बाद अब वे मजबूरन घर लौट रहे हैं। मगर क्या गाँव उनको राह़त दे पायेगा? इतना तो ज़रूर है कि घर लौटकर प्रवासी मज़दूर और उनके घर वाले अपार ख़ुशी का अनुभव कर करेंगे। मगर यह तब संभव है जबकि वह सही सलामात घर पहुंच जाएं। हजारों मील का सफ़र पैदल तय करना जान को जोखिम में डालना है। ट्रेनों की जो स्थिति है, अगर उन्हें ट्रेन मिल भी गयी तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सही टाइम पर अपनी मंज़िल तक पहुंच जाएगी। ट्रेनें लेट हो रही हैं, रास्ता भटक जा रही हैं, लोग गाड़ियों में भूखे मर जा रहे हैं। जो मज़दूर जीवित घर पहुंच भी जाये तो कब तक वह और उसका परिवार गाँव में भूख से लड़ पायेगा यह भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। इस समय मुझे मीठी (नाम काल्पनिक) की याद आ रही है, जो मेरे ही गाँव के एक प्रवासी मज़दूर की फूल सी नन्ही बेटी है। उम्मीद करता हूं कि उसके पापा सकुशल घर पहुंच गये होंगे। पापा को घर पर देखकर वह गौरैया की तरह फुदक रही होगी। उसकी मुस्कान पापा के सारे कड़वे अनुभव में शक्कर घोल रही होगी। जब कभी मीठी के दोस्त ‘कुरकुरे’ और ‘मोटू-पतलू’ उसे खाने को नहीं देते हैं तो वह फ़ौरन उन्हें धमकी देती है, “मेरे पापा जब कमा के आयेंगे तो बहुत सारा कुरकुरे, मोटू पतलू, फ्रूटी लायेंगे…मैं भी तुम लोगों को नहीं दूंगी।” मीठी की माँ भी ख़ुश ज़रूर होंगी। अपने जीवनसाथी के बिना लम्बा समय काटने का एहसास शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता है। मीठी के पापा मेरे हम-उम्र हैं। सालों पहले मैं आला तालीम ह़ासिल करने के लिए शहर आ गया। वह किसी स्टील फैक्ट्री में काम करने के लिए परदेश निकल पड़े। मीठी के पापा को देखने के लिए आस-पड़ोस के लोगों का जमावड़ा भी लगा होगा। जब भी कोई बाहर से कमा कर घर लौटता है तो मिठाई बांटना लाज़मी होता है। अभी भी मेरे गाँव के अधिकतर लोग मिठाई अकसर सपनों में ही खाते हैं। ख्वाबों से बाहर उनको मिठाई किसी परदेशी के घर लौटने पर ही मिलती है। यह कहना मुश्किल है कि इस बार मीठी के पापा घर मिठाई ले कर गये होंगे। मगर गाँव के अपने कड़वे अनुभव भी हैं। मुमकिन है कि गाँव वाले मीठी के पापा को सरहद पर ही रोक दिए हों। उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस भी बुलाई गयी हो। डर इस बात का भी है कि उनको किसी गाँव के स्कूल में ‘क्वारंटाइन’ भी कर दिया गया हो। अगर वे बदकिस्मत निकले तो उन्हें मक्खी, मच्छर, छिपकली, चूहा, सांप, बिच्छू के साथ भी समय काटना पड़ेगा। खाने में उन्हें बेरंग खिचड़ी भी परोसा गया हो। नरक से भी ज्यादा गंदे शौचालय में जाने के लिए उन्हें विवश किया गया हो। अगर मान भी लें कि मीठी के पापा को इन सब अज़ीयतों से न गुज़रना पड़ा हो, फिर भी गाँव की बेशुमार मुसीबतों से वह कैसे बच सकते हैं? किताब में गाँव को पढ़ने और जानने वालों के लिए गाँव एक ‘स्वर्ग’ है। यह ‘इंद्रलोक’ के सामान है। यह “सद्भाव” और “सहयोग” का संगम है। यह भारत की “आत्मा” है। यह “पश्चिमी सभ्यता” और “मैटेरियलिज़म” का सही विकल्प है। फिर गाँव को “शांति” और “सुख” का पर्यायवाची कहा गया। यह ग़लतफ़ह़मी दरअसल उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने फ़ैलाया। लंदन में पढ़े और फिर धोती-धारण करने वाले एक ‘फक़ीर’ ने इसे क़ौमी तह़रीक में सच बताकर प्रचारित किया। इसका इस्तेमाल देशी बनाम विदेशी और राष्ट्रीयता बनाम साम्राज्यवाद की राजनीति के तहत किया गया। मगर मीठी के पापा को और अन्य मजदूरों के लिए गांव शहर की ही तरह शोषण और अत्याचार का अड्डा है। जहाँ गाँव और शहर की समस्याओं के ‘फॉर्म’ में कुछ अंतर है, वहीं गहराई में जाने पर उनके बीच बहुत सारी समानतायें भी दिखती हैं। यह बात सुकूनदायक है कि गाँव की हवा शहर की तरह ज़हरीली नहीं है। पानी भी गाँव में चांपाकल और कुएं से मिल जाता है। मगर यह भी सत्य है कि ज़्यादातर कुएं ‘ठाकुर’ के हैं। चांपाकल और नलके भी सवर्णों की बस्तियों में अधिक संख्या में हैं। अब गाँव में भी पानी पैसे से बिकना शुरू हो गया है। एक और राहत है कि गाँव में लोग फुटपाथ, फ्लाईओवर, नाला और गटर पर सोने के लिए मजबूर नहीं हैं। मगर गाँव में भी ‘डिसेंट’ मकान ज़्यादातर द्विज को ही मयस्सर है। कुछ के पास सोने के लिए “दीवान” पलंग है, जिस पर मखमली बिस्तर सजा हुआ रहता है। दूसरी तरह बहुत तो बांस के मचान पर फटी चादर डाल कर लेट जाते हैं। मीठी के पापा भी इन मुसीबतों से अनजान नहीं हैं। रुपये के बगैर चावल और आटा न शहर में मिल सकता है, और न ही गाँव में। अब भी गाँव की ज़्यादातर ज़मीनों पर क़ब्ज़ा उन ‘खुशनसीबों’ का है जो कुछ खास जातियों में पैदा होते हैं। एक तरफ “मालिकों” के पास कई-कई एकड़ में फुलवारी और बाग-बगीचा लगाया गया है। वहीं बाकी जनता के पास ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन के पास मिट्टी, तालाब, अनाज, खेत, खलिहान, कुआं, घर कुछ भी नहीं है। वे मज़दूरी करते हैं तो पेट भर पाते हैं। जो लोग ‘गाँव’ का बखान करते नहीं थकते, वे इन हकीकतों को दबा जाते हैं। वे यह भी नहीं बताते कि दलित बस्ती में रहने वाला मज़दूर प्यास बुझाने के लिए कैसे पानी के लिए तरसता है। वहीं जब हलकी बारिश हो जाये, तो उसका घर तालाब सा बन जाता है। बिस्तर के नीचे थाली और बर्तन कागज की कश्ती की तरह तैरने लगते हैं। गाँव को सुकून और सहयोग की जगह कहने वाले यह भी नहीं कहते कि खेत में पसीना किसी और का बहता है और अनाज पर नाग की तरह कुंडली मार कोई और बैठ जाता है। यही नहीं मज़दूरों को बेगारी भी तो करनी होती है। दिन भर खून-पसीना बहाने पर हाथ में सिर्फ 200 से 300 रूपये आते हैं। खेत में काम करने वाले मज़दूरों को और भी कम पैसा मिलता है। 100 रुपये मज़दूरी पाने के लिए 20 मुट्ठा धान के पौधे पहले उखाड़ने होते हैं और फिर उसे कीचड़ में रोपना होता है। धान रोपते-रोपते पैर की अंगुलियाँ सड़ जाती हैं। फिर इलाज के नाम पर जलती तेल की बूंदें घाव पर टपकाई जाती हैं जो बड़ा कष्टदायक होता है। गाँव में मज़दूरी भले ही कम मिले, मगर चीज़ों के दाम थोड़े कम हैं। चावल, आटा, दाल की क़ीमतें शहरों के बराबर ही हैं। दूध भी 40 रुपये लीटर मिलता है। पॉकेट की चायपत्ती भी शहरों के रेट में ही बिकती है। साग-सब्ज़ी की क़ीमत में भी कोई ज़्यादा अंतर नहीं है। मेरे गाँव में तो अब छोटे शहरों से सब्जी उल्टा ख़रीद कर रेहड़ी वाले बेचते हैं। इससे क़ीमतें और भी बढ़ जाती हैं। मोबाइल रीचार्ज भी गाँव में उतना ही महंगा है जितना शहर में है। यह सब देख कर मुझे डर है कि मीठी के पापा क्या उसे ‘कुरकुरे’, ‘मोटू-पतलू’ और ‘फ्रूटी’ नहीं दे पायेंगे। जेब में पैसे न भी हों तब भी खर्च नहीं रुकता है। इस तरह गाँव के ज़रूरतमंदों को क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। गाँव में क़र्ज़ में डूबना वैसा ही है जैसा चूहा रोटी की तलाश में चूहेदानी में फंस जाता है। मूलधन के अलावा हर माह 5 से 10 रुपए सैकड़ा सूद देना सब के लिए थोड़े आसान है। हर महीने सूद मूलधन में जुड़ता चला जाता है, जिसे हिसाब में ‘चक्रवृद्धि ब्याज’ कहते हैं। एक पल के लिए कोई भूख घास खाकर भी मिटा  सकता है, मगर जब कोई अपना बीमार पड़ जाये तो मोह़ताजों को धनाड्य सेठ के पैरों में मजबूरन नाक रगड़ना पड़ता है। ऊपर से गाँव में छुआछूत और भेदभाव का चलन आज भी बरकरार है। मजाल है कि कोई अवर्ण सवर्णों के घर जा कर उनके ग्लास में पानी पी ले। जाति और वर्ग पर आधारित असमानता सूरज चाँद की तरह ही आज भी प्रत्यक्ष है। इस गुलामी से मुक्ति पाने के लिए ही तो मीठी के पापा वर्षों पहले शहर भागे थे। मगर देश के पत्थर-दिल शहर ने भी मजदूरों को सिर्फ लूटा। कोरोना के दौर में  जान बचाकर मीठी के पापा और उनके जैसे करोड़ों मज़दूर आज गाँव पहुंचे हैं। एक बार फिर गाँव की अमीरी-ग़रीबी और ऊंच-नीच की चक्की उन्हें पिसने के लिए तैयार रहना है। (Source: Janchowk.com)
(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। इनकी दिलचस्पी माइनॉरिटी और सोशल जस्टिस से जुड़े सवालों में है। आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं।)

अजीत जोगी: डीएम जो सीएम भी बना

भारतीय प्रशासनिक सेवा की अपनी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अजीत प्रमोद कुमार जोगी यानी अजीत जोगी (जन्मः 29 अप्रैल 1946 – निर्वाणः 29 मई 2020) जिलाधिकारी से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले संभवत: अकेले शख्स थे। छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के एक गांव में शिक्षक माता-पिता के घर पैदा हुए जोगी को अपनी इस उपलब्धि पर काफी गर्व था और जब तब मौका मिलने पर अपने मित्रों के बीच वह इसका जिक्र जरूर करते थे। करीब दो दशक पहले अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल करने वाले जोगी का शुक्रवार को निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे। कुछ दिन पहले ही उन्हें हृदयाघात के बाद रायपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया था। राजनीति में आने से पहले और बाद में भी लगातार किसी न किसी से वजह से हमेशा विवादों में रहे जोगी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बहुत प्रभावित थे और पत्रकारों और अपने नजदीकी मित्रों के बीच अक्सर एक किस्सा दोहराते थे। उनकी इस पसंदीदा कहानी के मुताबिक अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रोबेशनर अधिकारी के तौर पर जब उनका बैच तत्कालीन प्रधानमंत्री से मिला तो एक सवाल के जवाब में इंदिरा गांधी ने कहा, ‘‘भारत में वास्तविक सत्ता तो तीन ही लोगों के हाथ में है– डीएम, सीएम और पीएम।’’ युवा जोगी ने तब से यह बात गांठ बांध रखी थी। जब वह मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए तो एक बार आपसी बातचीत में उन्होंने टिप्पणी की कि हमारे यहां (भारत में) ‘‘सीएम और पीएम तो कुछ लोग (एच डी देवेगौड़ा, पी वी नरसिंहराव, वी पी सिंह और उनके पहले मोरारजी देसाई) बन चुके हैं, पर डीएम और सीएम बनने का सौभाग्य केवल मुझे ही मिला है।’’ हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार रखने वाले और अपने छात्र जीवन से ही मेधावी वक्ता रहे जोगी की राजनीतिक पढ़ाई मध्य प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले अर्जुन सिंह की पाठशाला में हुई थी। नौकरशाह के तौर पर सीधी जिले में पदस्थापना के दौरान वह अर्जुन सिंह के संपर्क में आए थे। सीधी अर्जुन सिंह का क्षेत्र था और युवा अधिकारी के तौर पर जोगी उन्हें प्रभावित करने में पूरी तरह सफल रहे थे। बाद में रायपुर में कलेक्टर रहते हुए वह तब इंडियन एअरलाइंस में पायलट राजीव गांधी के संपर्क में आए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब जोगी इंदौर में जिलाधिकारी के तौर पर पदस्थ थे और सबसे लंबे समय तक डीएम बने रहने का रिकॉर्ड उनके नाम हो चुका था। जून 1986 में उन्हें पदोन्नति के आदेश जारी हो चुके थे और जोगी इंदौर जिले में उनकी विदाई के लिए हो रहे आयोजनों में व्यस्त थे जब प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें फोन कर नौकरी से इस्तीफा देने और राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने को कहा गया। अपने एक संस्मरण में जोगी ने लिखा है कि वह बहुत धर्मसंकट में थे और अंत में पत्नी रेणु जोगी व मित्र दिग्विजय सिंह की सलाह मानते हुए उन्होंने नामांकन दाखिल करने का फैसला किया। जोगी ने लिखा है कि दिग्विजय सिंह ने उन्हें समझाते हुए न केवल राज्यसभा का प्रस्ताव स्वीकार करने की सलाह दी थी बल्कि यह भविष्यवाणी भी की थी कि राजनीति में उनका भविष्य बहुत उज्ज्वल है। जोगी के अनुसार, दिग्विजय ने कहा था, ‘‘भविष्य में कभी प्रदेश में किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने की बात आई तो उसका गौरव भी मुझे ही हासिल होगा।’’ यह संयोग ही था कि जब छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अजीत जोगी के नाम पर मुहर लगाई तो राज्य के नेताओं और विधायकों के बीच सहमति बनाने की जिम्मेदारी उन्होंने उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को ही सौंपी। कांग्रेस में आगे बढ़ने में जोगी को उनकी आदिवासी पृष्ठभूमि और नेतृत्व (गांधी परिवार) से नजदीकी का भरपूर फायदा मिला। लंबे समय तक वह गांधी परिवार के विश्वस्त नेताओं में रहे। एक समय कांग्रेस के भविष्य के नेताओं में उनकी गिनती होने लगी थी। मुख्यमंत्री बनने के पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर उनका कार्यकाल आज भी याद किया जाता है। पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस के प्रवक्ताओं के तौर पर जो प्रमुख नेता पत्रकारों के बीच लोकप्रिय रहे उनमें महाराष्ट्र से पार्टी के प्रमुख नेता वी एन गाडगिल और उनके बाद जोगी ही थे। नौकरशाह के तौर पर मिले प्रशिक्षण ने जोगी की वरिष्ठ नेताओं के बीच पहुंच आसान बनाने में काफी सहायता की और इसका पूरा फायदा उन्होंने जानकारियां हासिल करने और उन्हें सुविधानुसार मीडिया तक पहुंचाने में उठाया। प्रवक्ता के तौर पर उनकी जो राष्ट्रीय छवि बनी उसने उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाने में काफी मदद की। जोगी जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने तब उनके सामने तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके श्यामा चरण शुक्ल, उनके भाई विद्या चरण शुक्ल और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जैसे दिग्गज थे। लेकिन इन सबका दावा खारिज कर सोनिया गांधी ने जोगी को प्राथमिकता दी। जोगी का सबसे बड़ा तर्क होता था कि ‘‘ये लोग कैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बन सकते हैं, इनमें से कोई भी स्थानीय छत्तीसगढ़ी भाषा में बात नहीं कर सकता।’’ यह सही भी था। शुक्ल बंधु मूलत: उत्तर प्रदेश से थे और वोरा राजस्थान से। लेकिन, जोगी को प्राथमिकता मिलने का कारण छत्तीसगढ़ी बोलने और समझने की उनकी योग्यता नहीं बल्कि उनका गांधी परिवार के प्रति निष्ठावान होना था। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी की ओर से की गई यह पहली महत्वपूर्ण नियुक्ति थी। छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए पहले चुनाव 2003 में हुए और जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस यह चुनाव हार गई। मगर, जोगी को तब तक यह गुमान हो चला था कि उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता। इस दौरान हुए एक स्टिंग ऑपरेशन से पता चला कि वह और उनके बेटे अमित जोगी भाजपा की सरकार गिराने के लिए कथित तौर पर विधायकों को पैसे की पेशकश कर रहे थे। इस कांड के छींटे सोनिया गांधी पर भी पड़े और यहीं से जोगी व गांधी परिवार के बीच दूरियां बननी शुरू हुईं। बावजूद इसके किसी विकल्प के अभाव में कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें अगले चुनाव में भी मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया। लेकिन तब तक यह साफ हो चुका था कि न तो कांग्रेस नेतृत्व जोगी को और सहने के पक्ष में है और न ही जोगी की नेतृत्व में कोई आस्था बची है। कांग्रेस में ठीक से बने रहने के लिए उनके पास एकमात्र सबसे बड़ी पूंजी के तौर पर सोनिया गांधी का विश्वास था और इसे गंवाने के बाद उनका जो हश्र होना था वही हुआ। जोगी खुद को छत्तीसगढ़ के ली-क्वान यू (आधुनिक सिंगापुर के निर्माता) के तौर पर देखते थे। जोगी का मानना था कि राजनीति के क्षेत्र में दांव पेंच, कूटनीति और छलकपट के बिना सफलता प्राप्त करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होता है। लेकिन, उनका मानना था कि, ली क्वान यू ने साबित किया कि इन सबके बिना भी आप सफल हो सकते हैं अगर आप कर्तव्यनिष्ठ और निष्ठावान हों तो। मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने प्रशासनिक अनुभव के आधार पर जोगी ने नए राज्य की आधारशिला को मजबूत करने के लिए कई दूरदर्शी फैसले लिए, लेकिन इस बीच में वह ली-क्वान यू के उन दो गुणों को भूल गए जो उनके ही शब्दों में सिंगापुर के महान नेता को बाकी राजनीतिज्ञों से अलग बनाते थे- कर्तव्यनिष्ठ और निष्ठावान होना। (एजेंसी ‘भाषा’ में प्रकाशित यह आलेख, साभार प्रकाशित)

बहुजन समाज को बेकार करती सरकारी योजनाएं !

सच्ची घटना है। एक गांव में मुझे बचपन का परिचित मिल गया। परदेस में वह ठीक ठाक कमा लेता था लेकिन गांव में मुफ्त की सरकारी सुविधाओं का सुनकर गांव आ गया। बीपीएल में नाम लिखवा दिया। फिर क्या था, उसके तो सपने साकार होने लगे। घर की छत सरकार ने बनवा दी। दो रूपये किलो आटा चावल से वह धन्य होने लगा। राशन की सस्ती चीनी उसे गुड़ से भी मीठी लगने लगी। राशनकार्ड मानो अलादीन का चिराग हो गया। सब कुछ फोकट में या सस्ता। ऊपर से बुढे माता पिता की पेंशन। अब कमाने की कसरत क्यूं करे। गांव के खूंटे में वह राजी राजी बंध गया। कभी कभार छुट्टा काम कर लेता था वरना सारे दिन गांव की चौपाल पर गप्पें। उसके जैसे ही चार पांच मिलकर रोज इंटरनेशनल कॉन्फ्रेस करने लगे। शाम होते ही देशी ठर्रे की महफिल जम जाती। परिवार में क्लेश बढ गये। बच्चों की पढाई लिखाई का कोई अता पता नहीं। मैंने उसे कहा, भाई! सारे दिन चौपाल पर बैठकर गप्पे मारते हो। यहां फ्रूट्स की एक लॉरी क्यों नहीं खड़ी कर देते? अच्छी कमाई होगी। वह एक धुरंधर अर्थशास्त्री की तरह मुझे ढंग से समझाते हुए बोला,डॉक्टर साहब।।! यदि मैं फ्रूट्स की लॉरी लगाऊंगा तो मेरी इनकम बढ जाएगी। गांव में पता चल जाएगा और ये मनुवादी मेरा नाम बीपीएल से काट देंगे।  मुझे वापस शहर जाना पड़ेगा। आज हर गांव में मुफ्त की सरकारी सुविधाओं के अंधे मोह में फंसकर कई हुनरमंद बहुजन जीवन बर्बाद कर रहे हैं। बीपीएल, राशनकार्ड, सब्सिडी, सस्ती चीनी, चावल के लोभ में खुद के बाद बच्चों का भी भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। राशनकार्ड बनवाने व बीपीएल में नाम जुड़वाने के लिए ही जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। हमारे आसपास पशुपालन, खेती, किराणा, गारमेंट्स, शूज ,स्टेशनरी, कॉस्मेटिक्स, फल सब्जी आदि कई तरह के बिजनेस खूब बिखरे पड़े है जरूरत साहस व समझ की हैं। गरीब रहकर जीवन गुजारना कोई आदर्श नहीं है। बदहाली व गरीबी से निजात पाना जरूरी हैं। अब बहाना नहीं चलेगा, हर ओर ऑनलाइन बिजनेस हो रहा हैं। बुद्धिमानी व हुनरमंद लोग सिर्फ काजू बादाम या गोल्ड ज्वैलरी के ही बिजनेस नहीं करते है बल्कि गोबर के उपलें भी ऑनलाइन बेचकर लाखों कमा लेते हैं और हम छोटी सी सरकारी नौकरी के लिए माता पिता को धोखे में रख कई साल कोचिंग करते रहते हैं। आप सभी में भी अपार प्रतिभा है।सरकारी नौकरी के अलावा भी कई अच्छे विकल्प है। अपनी क्षमता को पहचानो। जागो !समय किसी का इंतजार नहीं करता। हुनर आजमाओ, मेहनत करो। धनवान बनो। नशा छोड़ो और जीवन मोड़ो। सबका मंगल हो।।।।। सभी प्राणी सुखी हो
इस आलेख के लेखक डॉ. एम एल परिहार, जयपुर हैं। डॉ. परिहार बहुजन आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। बुद्धम पब्लिकेशन के नाम से प्रकाशन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनसे संपर्क- 9414242059 पर किया जा सकता है।  

संक्रामक बीमारियों से लैस भारत में कोरोना के खतरे की हकीकत

क्या सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों को भी कोरोना वायरस से उतना ही खतरा है, जितना कि अन्य बीमारियों और भुखमरी से, जिसकी अब आहट सुनाई देने लगी है। या, इन वर्गों में इस खतरे को महसूस करने के स्तर में गुणात्मक भिन्नता है? बहुत ज़िम्मेदारी के साथ भी इतनी बात तो कही ही जा सकती है कि भारत समेत दूसरे गरीब व विकासशील देशों के मेहनतकश और विभिन्न तबके को कोरोना वायरस से बहुत कम ख़तरा महसूस होगा। टी. बी., डायरिया, न्यूमोनिया जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त इस क़ौम को वह बीमारी कितनी खतरनाक लग सकती है, 80 फीसदी मामलों में शरीर में जिसके कोई लक्षण ही नहीं दिखते, जिसके 95 प्रतिशत मरीज स्वत: ठीक हो जाते हैं! जिसमें  संक्रमित व्यक्ति के मृत्यु का जोखिम (infection fatality rate ) 0·39–1·33 प्रतिशत के बीच है। हालांकि विश्व स्वास्थ संगठन ने इसकी मृत्यु दर 3.4 होने का अनुमान जताया है, लेकिन जैसे-जैसे संक्रमण की संख्या बढ रही है, उसके अनुपात में मृत्यु की दर नहीं बढ रही, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कोविड की औसत मृत्यु दर और कम होगी। कोविड से मौत का शिकार होने वालों में अधिकांश बहुत बुज़ुर्ग लोग हैं, उनमें भी अधिकांश वे जो हृदय-रोग, कैंसर, किडनी, हाइपरटेंशन आदि ‘अभिजात’ बीमारियों के बुरी तरह पीड़ित लोग थे। भारत, पाकिस्तान,  बांग्लादेश, इंडोनेशिया, नाइजीरिया व दक्षिण अफ्रीका व अन्य देशों के ग़रीबों के लिए सबसे घातक टी.बी. का संक्रमण है। यह कोरोना की तुलना में बहुत घातक है। विश्व में हर साल लगभग 1 करोड लोगों को टी.बी. के लक्षण उभरते हैं,  जिसे हम सामान्य भाषा में “टी.बी. हो जाना” कहते हैं। इन एक करोड़ लोगों में से लगभग 15 लाख लोगों की हर साल मौत होती है। जिन अन्य संक्रामक बीमारियों से दुनिया के गरीब लोग सबसे अधिक मरते हैं, उनका आधिकारिक आंकड़ा इस प्रकार है- डायरिया से हर साल लगभग 10 लाख, न्यूमोनिया से 8 लाख, मलेरिया से 4 लाख, हेपेटाइटिस-सी से 3.99 लाख और हैजा से लगभग 1.43 लाख लोग मरते हैं। इनके अतिरिक्त और भी कई जानलेवा संक्रामक बीमारियाँ हैं, जिनमें से अनेक अभी भी ला-इलाज़ हैं। इसे समझने के लिए लेख के साथ प्रकाशित चार्ट में कुछ प्रमुख बीमारियों से संबंधित आंकड़े देखें। चार्ट में दर्शाये गई ‘मृत्यु दर’ का अर्थ है कुल संक्रमित रोगियों (रिपोर्टेड और अनरिर्पोटेड सम्मिलत) में से मरने वालों का प्रतिशत। अभी तक के शोधों के अनुसार कोविड की मृत्यु दर 0·39 से 1·33 प्रतिशत के बीच है, जबकि टीबी में अगर पूर्ण इलाज न मिले तो इसकी मृत्यु की दर 60 प्रतिशत है। चार्ट में उल्लिखित ‘संक्रमण फैलने की दर’ का अर्थ है कि किसी बीमारी से संक्रमित एक व्यक्ति/जीव कितने अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करता है। कोरोना वायरस से संक्रमित एक व्यक्ति औसतन 1.7 से लेकर 2.4 व्यक्तियों तक को संक्रमित कर देता है। जबकि टीवी का एक मरीज 10 अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करता है। चार्ट में इन रोगों से हर साल मरने वालों की औसत संख्या भी दी गई है। अधिकांश पैमानों में कोविड की घातकता गरीब और निम्न मध्यमवर्ग को होने वाली अन्य बीमारियों से कम हैं। कुछ संक्रामक बीमारियों का वैश्विक आंकड़ा
बीमारी मृत्यु दर (case fatality rate) संक्रमण फैलने की दर basic reproductive ratio हर वर्ष मरने वालों का औसत (लगभग) yearly fatalities rate, Rounded संक्रमण का वाहक primary mode of transmission रोग-जनक pathogen type
कोविड : 19 0·39–1·33%(अद्यतन अध्ययनों के अनुसार) 1.7- 2.4 (अद्यतन अध्ययनों के अनुसार) चार महीने में दो लाख (लॉक डाउन के बावजूद) थूक की बूंदों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क में आने/ हवा में उडने वाले अतिसूक्ष्म कणों के संक्रमण के अभी तक प्रमाण नहीं वायरस
टीबी (इलाज नहीं होने पर) 60% 10 15 लाख प्रति वर्ष हवा में उडने वाले सूक्ष्म बूंदों से, जो बहुत समय तक बरकार रहती हैं बैक्टीरिया
मौसमी इन्फ्लूएंजा (फ्लू) 0.10% 2.5 2.90 लाख से 6.5 लाख  प्रति वर्ष हवा में उडने वाले सूक्ष्म बूंदों से, जो बहुत समय तक बरकार रहती हैं वायरस
न्यूमोनिया 8 लाख प्रति वर्ष
मलेरिया 0.50% 80 4 लाख प्रति वर्ष मच्छर काटने से परजीवी
हेपेटाइटिस-सी 3.99 लाख प्रति वर्ष
हैजा (इलाज नहीं होने पर) 50% 2.13 1.43 लाख प्रति वर्ष मल-कण से बैक्टीरिया
रैबीज 100% 1.6 55 हजार प्रति वर्ष कुत्ते के काटने से वायरस
टायफ़ायड 20% 2.8 1.61 लख प्रति वर्ष मल-कण से बैक्टीरिया
अब भारत के आंकडों पर नजर डालें। अकेले भारत में हर साल 25 लाख से अधिक लोगों को टी.बी. होती है, जिनमें से हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। टी.बी. से मौतों के मामले में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। भारत में न्यूमोनिया से हर साल 1.27 लाख लोग मरते हैं, जिनमें सबसे अधिक बच्चे होते हैं। न्यूमोनियो से मरने वालों में विश्व में भारत का नंबर दूसरा है। पहले नंबर पर नाइजीरिया है। भारत में हर साल मलेरिया से लगभग 2 लाख लोग मरते हैं, जिनमें ज्यादातर आदिवासी होते हैं। इस रोग के मरने वालों में ज्यादातर युवा होते हैं। भारत में हर साल एक लाख से अधिक बच्चे डायरिया से मर जाते हैं। इसी तरह हैजा से भी यहां हर साल हजारों लोग मरते हैं। इतना ही नहीं, अनेक गरीब और विकासशील देशों की तरह भारत सरकार का रिकार्ड भी इन बीमारियों की रिर्पोटिंग करने के मामलें में बहुत खराब रहा है। अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें भारत द्वारा विश्व स्वास्थ संगठन को भेजे गए बीमारियों के आंकडे वास्तविक संख्या से कई सौ गुणा कम थे। वर्ष 2015 में भारत ने विश्व बैंक को बताया कि उस साल यहां सिर्फ 561 लोग मलेरिया से मारे गए, जबकि वास्तविकता थी कि यहां हर साल यहां लगभग 2 लाख युवा व अधेड आदिवासी मलेरिया से मर रहे थे। भारत सरकार के इस गैरजिम्मेवाराना और शर्मनाक व्यवहार को अल-जरीरा के अपनी रिपोर्ट में उजागर किया था। इसी प्रकार हैजा के मामलों को बहुत कम करके रिपोर्ट करने पर आपत्ति जताते हुए एक शोध-पत्र विश्व स्वास्थ संगठन के बुलेटिन में प्रकाशित हुआ था, जिसमें शोधकर्ताओं ने पाया था कि भारत द्वारा हैजे के मामले की गई रिर्पोटिंग न सिर्फ अधूरी है, बल्कि घटनाओं का आँकड़ा रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीके भी गलत हैं। दरअसल, सारा खेल आँकड़ों का ही है। कोरोना वायरस को लेकर जो वैश्विक हड़बड़ी और अफरातफरी फैली है, उसका कारण विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा रीयल-टाइम में कोरोना से संबंधित आंकडों को संकलित करना व उसे जारी करना है। अन्यथा, कोरोना से होने वाली ‘संभावित’ मौतों का आंकडा भी इन संक्रामक बीमारियों से हर रोज हो रही ‘वास्तविक’ मौतों की बराबरी नहीं कर सकता। यह एक दीगर अनुसंधान का विषय है कि कॉरोना को लेकर आखिर पूरी दुनिया में ऐसी अफरा तफरी कैसे बनी, कैसे और क्यों यह ख़बरें इतनी तेजी से प्रसारित हुईं। इसके तार एक ओर दुनिया के स्वास्थ बाजार के किंगपिन बिल गेट्स द्वारा संपोषित आंकड़ों के संधान और वैक्सीन निर्माण में लगी दर्जनों विशालकाय संस्थाओं से जुड़े हैं। दूसरी ओर मध्यम वर्ग के असुरक्षित और जिंदा रहने को अंतिम मूल्य मानने वाले मनोविज्ञान और पिछले वर्षों में विश्वव्यापी हुई इंटरनेट जनित जनसूचना-क्रांति ने इसे गति प्रदान की है। अन्यथा, अनेक संपन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी इसे बड़ी बीमारी मानने से इंकार कर चुके हैं। उनकी स्वास्थ्य विभागों द्वारा जारी मृत्यु के आंकड़े भी बताते हैं कि इन महीनों की औसत मृत्यु दर में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। लेकिन उनके देश की जनता की मांग थी कि लॉक डाउन किया जाए। उन्हें उनके घरों में बंद कर दिया जाए, ताकि वे और उनके बच्चे सुरक्षित रहें। भारत में ताली और थाली तो समृद्ध देशों की नकल में माहिर प्रधानमंत्री ने बाद में बजवाई। यूरोप में तो यह फरवरी से ही बज रही है। लोग अपनी खिड़कियों- बालकनियों में आकर बाइबल पढ़ रहे हैं, प्रार्थनाएं कर रहे हैं और राष्ट्रगान गा रहे हैं। आखिर, ऐसा क्यों है कि लोग खुद अपनी आजादी त्याग रहे हैं? आर्थिक समृद्धि, तकनीक के विकास और नवउदारवादी मूल्यों ने अमेरिका व यूरोप के अधिकांश देशों में व्यक्तिवाद को चरम अवस्था में पहुंचा दिया है। अति-सुरक्षित जीवन ने उन्हें वास्तव में भीतरी असुरक्षा से भर दिया है। वे जानते हैं कि उनका न कोई सगा है, न कोई समाज। और यह सिर्फ अमेरिका और यूरोप में ही नहीं हुआ है। भारत समेत विभिन्न विकासशील देशों में भी उन्हीं परिस्थितियों ने जिस नए मध्यम वर्ग को बनाया है, उसकी भी यही हालत है। कोरोना की भयवहता पर उंगली उठाकर लोगों की कटू आलोचना झेलने वाले इटली के दार्शनिक प्रोफेसर जियोर्जियो अगाम्बेन के शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा समाज बन गया है, जिसका एक मात्र मूल्य जिंदा रहना रह गया है। प्रोफेसर अगाम्बेनम कहते हैं, आज हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जो तथाकथित ‘सुरक्षा के कारणों’ से अपनी आजादी को कुर्बान कर रहा है और खुद को संभवत: हमेशा के लिए भय और असुरक्षा की स्थिति में रहने की सजा देने जा रहा है। दुनिया में हर दिन 4100 से अधिक लोगों के टीबी से तड़प-तड़प कर मरने खबर होती है, जो हम तक नहीं पहुंचती। दुनिया में 180 करोड़ लोग, यानी दुनिया की एक चौथाई आबादी,  टी.बी.के बैक्टेरिया ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ की साइलेंट कैरियर हैं। विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट बताती है दुनिया में हर सेकेंड एक नए व्यक्ति को टीबी का संक्रमण हो रहा है। टीबी से मरने वाला हर आदमी मरने से पहले 10 लोगों को यह बीमारी दे चुका होता है। टीबी भी कोरोना की ही तरह, संक्रमित व्यक्ति की खांसी, छींक यहां तक हवा में उडती थूक की बूंदों से फैलता है। इसी तरह दुनिया में डायरिया से हर रोज 2700 लोग, न्यूमोनिया से 2100 लोग, मलेरिया से 1 हजार , हेपेटाइटिस-सी 1 हजार और हैजा से लगभग 450 लोग मरते हैं। और, जिसे हम सामान्य फ्लू मान कर अक्सर फूंक में उड़ा देने वाला समझते हैं, उस मौसमी इन्फ्लूएंजा (फ्लू) से दुनिया में हर रोज 850 से 1800 लोग मर जाते हैं। मौसमी फ्लू दुनिया में कहीं न कहीं हमेशा बना रहता है, जिस साल यह जोर मारता आता है, उस साल इससे मरने वालों की संख्या बढ जाती है। अन्य वायरस जनित बीमारियों की ही तरह आज तक फ्लू की प्रमाणिक दवा नहीं बन सकी है। इसके लिए जो वैकसीन बना है, वह भी सिर्फ एक मौसम में काम करता है, क्योंकि अगले मौसम में यह वायरस रूप बदल कर आता है, जिससे उस वैकसीन का प्रभाव जाता रहता है। जिस अमेरिका में पिछले चार महीने में लगभग एक लाख लोगों की कोविड से मृत्यु होने की दुखद खबरें हमें मिल रही हैं, उसी अमेरिका में हर वर्ष सर्दियों के चार महीनों में इंफ्लुएंजा से हजारों लोगों की मौत होती रही है। कहा जाता है कि 2017-18 की सदियों में वहां 80 हजार लोगों की मौत फ्लू के वायरस से हो गई थी लेकिन उस समय हमें इसकी रीयल-टाइम पर खबर नहीं दी गई थी। इतना ही नहीं, अभी जो कोविड से मौतों के आंकडे सामने आ रहे रहे हैं, उसमें ‘इंफ्लूएंजा जैसी बीमारियों’, हृदय आघात आदि को भी जोड दिया जा रहा है। कुछ और आंकडे देखें; संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियों से कुल मिलाकर आज दुनिया में हर साल लगभग 5.9 करोड लोगों की मौत होती है। यानी प्रति दिन लगभग 1 लाख 62 हजार लोग इन बीमारियों से मर जाते हैं। जबकि इनमें अधिकांशतः ऐसी बीमारियाँ हैं, जिनका इलाज संभव है। दुनिया में हर साल 1.79 करोड़ लोग हृदय संबंधी बीमारियों से, फेफड़ों के कैंसर से 17 लाख, और मधुमेह (Diabetes) से 16 लाख लोग मर जाते हैं। सबसे तेजी से मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है। दुनिया में 2000 से 2016 के बीच मनोभ्रंश (Dementia) के रोगियों की संख्या दोगुनी बढ़कर 50 लाख हो गई जो हर साल बढ़ रही है। 2014 में यह मौतें के मामले में दुनिया की 14 वीं सबसे बड़ी बीमारी थी, लेकिन आज यह पांचवीं सबसे बड़ी बीमारी है। ये वे बीमारियां हैं, जिन्हें मैंने ऊपर “अभिजात” कहा है। ये संक्रामक नहीं हैं, बल्कि गलत जीवन-शैली के कारण होती हैं। ज्यादातर शारीरिक श्रम न करने वाले खाए-पीए-अघाए लोग तथा कुछ मामलों में बुज़ुर्ग लोग इनका शिकार होते हैं। इनमें से कुछ संक्रामक बीमारियाँ दशकों से और कुछ तो सदियों-सहस्त्राब्दियों से चली आ रही हैं, लेकिन इन्हें रोकने के लिए कभी इस प्रकार के लॉकडाउन का सहारा नहीं लिया गया। लॉकडाउन का अर्थ है आने वाले वर्षों में समाज में भुखमरी से करोड़ों ग़रीब लोगों की मौत और कुटिल राजनेताओं द्वारा नागरिक स्वतंत्रता का हरण। मनुष्यता इन बीमारियों के साथ रहना, इनसे लड़ना जानती है। वह इन लड़ाइयों के लिए नए-नए औजार भी विकसित करती रही है, और दुनिया का कारवां चलता रहा है। जरूरत अगर किसी चीज की है तो वह है स्वास्थ्य सेवाओं के समाजवादीकरण की, जो जनता को उसकी लड़ाई में मदद करे, न कि उसे क़ैद कर  सरकारों और कंपनियों के रहमो-करम पर छोड़ दे।
प्रमोद रंजन लंबे समय तक ‘फारवर्ड प्रेस’ हिन्दी के संपादक रहे हैं।  ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ और ‘शिमला-डायरी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। वह इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में प्राध्यापक हैं। उनसे संपर्क-+919811884495, janvikalp@gmail.com पर कर सकते हैं।

लेनिन से सीखने की जरूरत है खारिज करने की नहीं

इंडियन एक्सप्रेस में इधर किसी लेख के जवाब में लेखक, अध्यापक और सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्वानंद की टिप्पणी पर नजर पड़ी।  पहले तो मुझे लगा कि शायद लेखक कह रहे हैं कि लेनिन के क्रांति के मॉडल को भारत में दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन जब पूरा लेख पढ़ा तो मुझे आश्चर्य और बेहद निराशा हुई। लेखक महोदय ने न केवल लेनिन और रूस की अक्टूबर क्रांति को खारिज किया है बल्कि यहां तक कह दिया है कि लेनिन ने जो व्यवहार रूस में अपनी जनता के साथ किया था, वैसा ही व्यवहार पिछले 6 वर्षों से भारत में देश की जनता के साथ किया जा रहा है। यानी मोदी सरकार से भी बदतर सोवियत सरकार रही है। हममें से कुछ उदारवादियों की यह समस्या है कि वह राज्य और सरकार के वर्ग चरित्र से पूरी तौर पर आंख बंद कर लेते हैं। भला कोई आदमी सोवियत यूनियन के राज्य का और यहां (भारत) के सामंती पूंजीवादी राज्य की तुलना कैसे कर सकता है। कहां सोवियत सरकार मजदूर, किसान, शोषित-उत्पीड़ित जनता के राज्य का प्रतिनिधित्व करती है और कहां यहां की सरकार जो कि घोर सामंती, कारपोरेट, पूंजीपतियों की ब्राह्मणवादी सरकार है। हमने भारतवर्ष में अधिकांश उदारवादी राजनेताओं का यहां तक कि गांधीजी, लोहिया व जयप्रकाश की रचनाओं का भी अध्ययन किया है। कहीं भी हमने अक्टूबर क्रांति को और लेनिन को इस तरह से खारिज करते हुए नहीं देखा है। कोई ऐसा कर भी कैसे सकता है। मानव इतिहास में जो भूमिका अक्टूबर क्रांति की है, उसने दुनिया की सभ्यता को मानवता को एक नया युग दिया, एक नई सभ्यता और संस्कृति दी। लेखकों को और बुद्धिजीवियों को दर्शन और अवधारणा के क्षेत्र में तर्क और खंडन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन राजनीति वास्तविकताओं और संभावनाओं के ही दायरे में काम करती है। 1789 की स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की फ्रांस की महान क्रांति की जमीन पर तानाशाह सम्राट नेपोलियन ने कब्ज़ा कर क्रांति के मूल्यों को खत्म कर दिया था। यूरोप में 1848 की क्रांति विफल हो गई थी,  पेरिस कम्यून की क्रांति को रौंद दिया गया था। समाजवादी क्रांतिकारियों और में सेविकों के लोकतंत्र का रूसी प्रयोग न केवल बेहद निम्न कोटि का था बल्कि विफल होने के लिए अभिशप्त था।  इसी पृष्ठभूमि में लेनिन ने यूरोप की विफल क्रांतियों से सीख लेते हुए परिवर्तन की राजनीति का जो यथार्थ बनाया, जो अक्टूबर क्रांति की, उसने दुनिया के इतिहास के चित्र को ही बदल दिया। यह अक्टूबर क्रांति ही थी जिसने हमारे जैसे ढेर सारे गुलाम मुल्क के लोगों में आजादी की लड़ाई को नई रोशनी दी, हमारे संघर्ष को स्वतंत्रता तक पहुंचाया। यह लेनिन की राजनीति की विरासत ही थी, जिसने हिटलर और मुसोलिनी के नाज़ीवाद और फासीवाद को शिकस्त देकर उदारता और मानवता की रक्षा की। अगर उस समय फासीवाद को परास्त करने की यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी सोवियत यूनियन ने न ली होती तो आज हम उदारवादियों की क्या स्थिति होती, यह कहना मेरे लिए मुश्किल है। माना कि लेनिन से भी गलतियां हुई होगी, लेकिन उन परिस्थितियों पर भी गौर करने की जरूरत है जहां वह चारों तरफ मानवता विरोधी ताकतों से घिरे हुए थे। यह जरुर है कि लेनिन ने 1918 से 1921 तक वार कम्यूनिज्म का दौर चलाया, जिसमें कुछ ज्यादतियां भी हुई,  लेकिन उन्हीं लेनिन ने सोवियत यूनियन के लिए एक नई अर्थव्यवस्था का भी प्रयोग किया। मार्क्स की वह महान अवधारणा जिसमें कोई राज्य नहीं होगा, जिसमें मनुष्य खुद ही अपनी नियति का कर्ता होगा, जीवन संपूर्णता में जियेगा, उसका पहला सफल राजनीतिक प्रयोग लेनिन ने ही किया। लेनिन का यह प्रयोग मानवता में यह विश्वास पैदा करता है कि एक राज्यविहीन समाज का भी निर्माण आने वाली पीढ़ियां जरूर करेंगी, जिसमें मनुष्य की मर्यादा और सत्ता सर्वोपरि होगी। लेनिन जानते थे कि बगैर वर्ग के विनाश के मनुष्यता की,  मानवता की रक्षा नहीं की जा सकती। जिस विविधता, बहुलता के नागरिक समाज को आज हम दुनिया में देखते हैं, उसकी भी नीव लेनिन ने ही रखी थी। यही नहीं नर-नारी समानता का उद्घोष लेनिन से ही हुआ था। इसलिए दुनिया भर के नारी आंदोलन आज भी लेनिन को अपना पथ प्रदर्शक मानते हैं। भारतवर्ष में डॉक्टर आंबेडकर ने भी यह महसूस किया कि यहां जातियां ही हैं जो वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और बिना जाति विनाश के नागरिक समाज का निर्माण नहीं हो सकता।  स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के विचार को फलीभूत नहीं किया जा सकता। वर्ग विहीन समाज में ही जाति विनाश और जाति विहीन समाज से ही वर्ग विहीन समाज का निर्माण होता है। वर्ग और जाति के विरुद्ध संघर्ष एक संपूर्ण  इकाई है उसे एक दूसरे के विरुद्ध नहीं खड़ा किया जा सकता है। बुद्ध ने भी ब्राह्मणवाद से, जातिवाद से मुक्ति के लिए ही इस लोक  और व्यक्ति के ज्ञान पर जोर दिया और कहा कि अप्प दीपो भव:।  यह महान दर्शन भी भारत में ब्राह्मणवाद से पराजित हुआ, लेकिन मानव जाति की सेवा में इसकी भूमिका समाप्त नहीं हुई है। इसलिए इस दौर में जहां फासीवाद अपने वीभत्स रूप में भारतीय राज्य, समाज और जीवन को निगलने में लगा हुआ है, लेनिन से सीखने की जरूरत है, खारिज करने की नहीं। नवउदारवाद निकृष्ट और निर्मम उत्पादन प्रणाली है, जो हमारे देश में फासीवाद का कारण बनी हुई है। उससे निपटने में उदार विचार और पूंजीवादी व्यवस्था सक्षम नहीं दिख रहे हैं। इसलिए नई समतामूलक आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के लिए मार्क्स और लेनिन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जैसे हम डाक्टर आंबेडकर, गांधी, लोहिया, जय प्रकाश  के प्रयोग से सीख सकते हैं। स्वयं गांधी जी ने भी बहुत सारी गलतियां की थीं, लेकिन आज हम उन्हें फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में खारिज तो नहीं कर सकते हैं।
  • लेखक एस आर दारापुरी, आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।