प्रतिक्रियावादी बनने की बजाए समाज निर्माण में उर्जा लगाएं

मनुवादी मानसिकता से सभी लोग परिचित हैं। मनुवादी आए दिन दलितों-पिछड़ों को प्रताड़ित करते हैं। ऐसे में हमारे लोग प्रताड़ित किए जाते हैं। ऐसे में समाज सिर्फ मनुवादी व्यवस्था द्वारा किए गए कार्य के प्रति प्रतिक्रिया देने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। लेकिन हमें यह बात समझनी होगी कि समाज प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं है। समाज का निर्माण समाज के अनुपात में नहीं किया गया है। उसके कुछ मूलभूत कारण हैं, जिन्हें जानना जरूरी है। आज हमारे पास बहुत सारे संगठन हैं और सारे संगठनों का उद्देश्य सामान्यतः व्यवस्था परिवर्तन है. व्यवस्था परिवर्तन कैसे होता है, व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा, इसके लिए कौन सी गतिविधियों को चलाना पड़ेगा, कैसे रणनीति बनानी पड़ेगी, इसको विस्तार से समझने की जरुरत है.

मुझे लगता है आज तक सिर्फ मान्यवर कांशीराम को छोड़कर कोई भी रणनीति बनाने में सक्षम नहीं हो पाया है, क्योंकि रणनीति जब तक सही नहीं होगी उसका क्रियान्वयन एवं उसके परिणाम उसके अनुरूप नहीं होंगे। इसीलिए हमको सबसे पहले हमारे समाज में जो भी संगठन चल रहे हैं और चूंकि क्योंकि समाज उन्हें खाद पानी दे रहा है इसलिए उन्हें उनके दायित्व के बारे में समझाना होगा, उनकी रणनीति के बारे में उनसे खुलकर बहस करनी होगी। इस पर मंथन करना होगा कि समाज के लिए ऐसी कौन सी रणनीति बनानी चाहिए जिससे इस देश में समता, स्वतंत्रता, बंधुता स्थापित हो सके।

यह एक गंभीर विषय है। समता क्या होती है, उसके क्या मायने हैं, स्वतंत्रता क्या होती है, उसको कैसे समझना चाहिए, और बंधुत्व क्या होती है, ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जिन्हें समाज को समझने की जरूरत है। हमारा समाज असंगठित समाज है जिसका मुकाबला संगठित समाज से है। असंगठित और संगठित समाज के बीच में यह महत्वपूर्ण अंतर है कि असंगठित समाज में लोग अपने अधिकारों को नहीं जानते, जबकि संगठित समाज अपने अधिकारों को लेने के लिए संगठित है। ज्यादातर लोग प्रायः संगठित और असंगठित के बीच का अंतर नहीं समझ पाते, इसीलिए हमें रणनीति बनानी होगी

मनुवादी व्यवस्था जिन आधारों पर टिकी है, उन आधारों को समाज में से हटाना पड़ेगा, तभी इसे ध्वस्त करना संभव है। इसके लिए एक वृहद कार्यक्रम की जरूरत है। आज समाज में बहुत सारे संगठन एवं चमचे टाइप के नेता पैदा हो रहे हैं, जिनका उद्देश्य सिर्फ अपना भरण-पोषण और ख्याति प्राप्त करना है। ऐसे में अगर समाज को इस दलदल से निकालना है तो प्रबुद्ध लोगों को संकल्प के साथ एक साथ आना होगा, रणनीति बनानी होंगी। अभी समाज जब कोई प्रतिक्रिया देता है, कई संगठन अलग-अलग रूप से उसका विरोध करते हैं, जिससे हमारी खिल्ली उड़ कर रह जाती है। समाज को सही दिशा देने का कार्य समाज के उन प्रबुद्ध लोगों का है जो समाज के हित में चिंतन मनन करते हैं और जो समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।

मान्यवर कांशीराम जी के बाद Transactional Leadership भी सही से कार्यरत नहीं है। इसीलिए आज फिर से Transformational Leadership की जरुरत है, जिसे विकिसत करना होगा। हमें बहुत चिंतन मनन से कार्य करने की आवश्यकता है। अलग-अलग रूप से प्रबल प्रबुद्ध लोग कार्य करते हैं तो यह साफ़ झलकता है कि वह इगो स्टेटस में फंसे हुए हैं, जबकि ट्रांसफॉरमेशनल लीडरशिप के लिए Self Reliant Status (स्वयं पर विश्वास) की आवश्यकता है।

Self reliant अवस्था के लिए self enhancement (आत्म वृद्धि), Self verification (स्वयं सत्यापन), Self evaluation (स्वयं का मूल्यांकन) की जरूरत है, जिसके परिणाम स्वरुप Self esteem (आत्म सम्मान), Self efficiency (खुद की क्षमता), Emotional stability (भावनात्मक स्थिरता), lead by example (मिसाल पेश करना), perseverance (दृढ़ता), due diligent (सही मूल्यांकन) जैसे गुण स्थापित होते हैं।

जब इस तरह से प्रबुद्ध लोग तैयार होंगे तभी मिलकर संघ का निर्माण कर सकेंगे। मानव जीवन में व्यक्तिगत रूप से किसी में कोई बड़ी शक्ति नहीं होती, शक्ति को सिर्फ समूह द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। संघ निर्माण की प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है।

आज मनुवादी व्यवस्था तेजी से कार्य कर रहे हैं और बहुजन सिर्फ तमाशाबीन बन कर देख रहे हैं। हमारा विरोध भी बहुत निम्न दर्जे का होता है, इसे आसानी से भूलाया जा सकता है। लाखों की संख्या में जो मजदूर लोग सड़कों पर अपने घर जा रहे हैं वे कोई और नहीं बल्कि उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा एससी एसटी ओबीसी समाज के ही हैं। 99 फीसदी जो लोग आज व्यवस्था से प्रताड़ित है, वह इन्ही वर्गों से आते हैं। मनुवादी रामराज्य की बात करते हैं और हमें यह याद रखना चाहिए कि शूद्रों के मौलिक अधिकार राम राज्य में वर्जित थे। इतिहास में वर्णित है कि शूद्र ऋषि शंबूक के तपस्या करने के कारण राम द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी।

बड़ी विडंबना है कि वह द्रोणाचार्य अवॉर्ड देते हैं, जबकि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा इसलिए ले लिया था कि वह एक निम्न जाति था इसलिए वह धनुर्धर नहीं बन सकता था। सत्ताधारी इतनी विषमता वाली चीजों को समाज में स्थापित कर रहे हैं और हम उनके इस निर्णय को रोकने में सक्षम नहीं है। अगर उन्हें रोकना है तो हमें एक रणनीति पर कार्य करना होगा क्योंकि हम संवैधानिक व्यवस्थाओं पर चलने वाले लोग हैं, इसीलिए हमारी रणनीति भी संवैधानिक व्यवस्थाओं के दायरे में रहकर ही मनुवादी व्यवस्था को परास्त करना होगा।

आज जिस कार्य की जरूरत है, जिस रणनीति की जरूरत है, उसे क्रियान्वित करना होगा। मसलन, हमें आज egalitarian (समानाधिकारवादी) संकल्पना को समझना होगा। पैतृक कर की व्यवस्था के लिए बहुजन समाज को आवाज बुलंद करना ही होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे एससी एसटी ओबीसी समाज को एक साथ लाया जा सकता है। सवर्ण समाज को पैतृक कर से सबसे ज्यादा मार पड़ेगी।

समाज की व्यवस्था सामाजिक ढांचे एवं योजनाओं द्वारा ही निर्धारित होती हैं। इस  मनुवादी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए बहुजनों को design thinking पर कार्य करने की आवश्यकता है। आज की डिज़ाइन व्यवस्था सवर्ण के हित में है। इसे बदलने से ही  सर्वजन का हित साधा जा सकता है। मनुवादी लगातार कार्यरत हैं और हम सोच रहे हैं कि हमें क्या करना होगा और उसी विरोधाभास में उलझ जाते हैं। देशव्यापी कार्यक्रम जिसे पुरे देश में साझा किया जा सके ऐसे कार्यक्रम से ही बहुजन एकता बनना संभव है।

लोग धन संचय में लगे हैं। भ्रष्टाचार की जड़े देश में इसीलिए मजबूत है क्योंकि लोग एक पीढ़ी के लिए नहीं सोचते बल्कि सात पीढ़ियों को सुरीक्षित करना चाहते हैं। अगर इन व्यवस्थाओं को नहीं बदला गया तो अंबानी, अडानी का बेटा हमेशा आगे रहेगा। अमेरिका में 50%, जापान में 70%, यूरोप में 40-50% पैतृक सम्पति कर की व्यवस्था है। भारत में यह नहीं लगाया जाता जिससे लोग खुलेआम धन संचय में लगे हैं। मेरे अनुसार इन गतिविधियों को देश में चलाने की जरूरत है।

  • लेखक अनिल कुमार, देहरादून में रहते हैं। अम्बडेकरी आंदोलन से जुड़े हैं।

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