इरफान खान ने बहुजन किरदारों को भी आवाज दी थी

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54 साल की छोटी सी उम्र में कैंसर जैसी घातक बीमारी ने हमारे दौर के सेल्फ मेड एक जानदार और शानदार अभिनेता की जान ले ली। जेएनयू कैम्पस में ‘हासिल’ फिल्म देखते हुए इरफ़ान खान की एक्टिंग और दमदार संवाद अदायगी से पहली बार रूबरू हुआ। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक पिछड़े वर्ग के स्टूडेंट लीडर के रोल में वे आशुतोष राणा से मुक़ाबिल थे। बिल्लू फिल्म के गानों को हम लोगों ने खूब एन्जॉय किया जिसमें वे एक नाइ के रोल में थे।

जब हम प्रवासी भारतीयों पर अपनी एम् फिल लिख रहे थे उनकी ‘नेमसेक’ फिल्म को कई बार देखा और समझा। ‘पान सिंह तोमर’ में उनके दमदार अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। ‘द वारियर’ जैसी ब्रिटिश फिल्म में वे लीड रोल में थे । ऐसा अवसर कम भारतीय अभिनेताओं को मिला है कि वे हॉलीवुड या ब्रिटिश फिल्म में लीड नायक बने हों। ओम पुरी, सईद जाफरी और कबीर बेदी ने भी इंटरनेशल प्रोजेक्ट्स में काम किया लेकिन लाइफ ऑफ़ पाई और द वारियर से जो यश इरफ़ान ने कमाया वो सबको कहां नसीब होता है।

मीरा नैयर की ‘सलाम बॉम्बे’ से 1988 में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफ़ान ने चाणक्य, चंद्रकांता, श्रीकांत , भारत एक खोज, सारा जहाँ हमारा, बनेगी अपनी बात, अनुगूंज और स्पर्श जैसे नामचीन सीरियल्स में भी काम किया। लाल घास पर नीले घोड़े जैसी टेलीफिल्म में भी उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया। 2017 में हिंदी मीडियम फिल्म में एक मध्यवर्गीय परिवार की कश्मकश को जिस तरह से उन्होंने पर्दे पर उतारा वह अद्भुत है। ‘अंग्रेजी मीडियम’ 2020 में रिलीज उनकी अंतिम फिल्म साबित हुई। 2011 में उन्हें पदममश्री से सम्मानित किया गया।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पास आउट इरफ़ान के अंग अंग से अभिनय छलकता था लेकिन असल में उनकी आँखे ही उनकी दिल की जुबान थी और हमेशा रहेंगी। 30 साल तक फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले एक अलहदा एक्टर इरफ़ान के लिए यही कहूंगा ‘इरफान मरते नहीं, इरफ़ान मरा नहीं करते’। अलविदा इरफ़ान आप हमेशा हमारे दिल में बने रहेंगे।

  • लेखक राकेश पटेल फिल्मों के जानकार हैं। जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर रहे हैं।

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