नई राह पर पूर्व सांसद और दिग्गज नेता अशोक तंवर, 25 फरवरी को करेंगे बड़ा ऐलान

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सिरसा से पूर्व सांसद अशोक तंवर अपना राजनीतिक दल बनाने की राह पर हैं। जानकारी है कि अशोक तंवर 25 फरवरी को दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित कार्यक्रम में नए मोर्चा का ऐलान करेंगे। 2019 में हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान समर्थकों को टिकट नहीं मिलने से नाराज अशोक तंवर ने पार्टी छोड़ दी थी। अशोक तंवर कांग्रेस पार्टी के हरियाणा प्रदेश के अध्यक्ष रह चुके हैं साथ ही ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सचिव रह चुके हैं। तंवर कांग्रेस युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी से अलग होने के दो साल बाद अब अशोक तंवर नई राजनीतिक पारी खेलने को तैयार हैं। 25 फरवरी को मावलंकर हाल में आयोजित कार्यक्रम में अपनी नई रणनीति का ऐलान करेंगे। इस दौरान वह नई राजनीतिक पार्टी के नाम का ऐलान करेंगे। कार्यक्रम में देशभर में 25 से अधिक शहरों में वेबीनार के जरिये समर्थकों के अधिक से अधिक संख्या में जुड़ने की जानकारी समर्थकों ने दी है। मुख्य कार्यक्रम दिल्ली, चंडीगढ़, पंजाब, उतराखंड व उतरप्रदेश में आयोजित किए जाएंगे। हरियाणा की बात करें तो चंडीगढ़ के अलावा भिवानी, महेंद्रगढ़ सहित अधिकांश बड़े शहरों में अशोक तंवर समर्थक जुड़ेंगे। दिल्ली में मुख्य कार्यक्रम करने के पीछे उनकी राष्ट्रीय राजनीति में नए मोर्चा की मौजूदगी का अहसास करवाने की सोच है। हालांकि अभी उन्होंने अपनी रणनीति का खुलासा नहीं किया है पर आने वाले समय में हरियाणा में तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को भी तलाशा जा सकता है।

बता दें कि 2019 के विधानसभा चुनावों में अशोक तंवर ने उनके समर्थकों को टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर न केवल कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया था, बल्कि कांग्रेस को ही अलविदा कर दिया था। तभी से ही कयास लगाए जा रहे थे कि अशोक तंवर नई पार्टी का गठन करेंगे। अशोक तंवर के समर्थकों का कहना है कि उनका फोकस केवल हरियाणा न होकर राष्ट्रीय राजनीति पर रहेगा।

गौतलब है कि अशोक तंवर का नाम उन नेताओं में शामिल किया जाता है जो दलित समाज से होने के बावजूद तमाम वर्गों में काफी लोकप्रिय हैं। अशोक तंवर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र भी हैं, जहां से उन्होंने इतिहास विषय में एम.ए, एम.फिल और पीएच.डी की डिग्री ली है। अशोक तंवर की नई राजनीतिक पारी के बाद न सिर्फ हरियाणा प्रदेश की सियासत बदलने की उम्मीद जताई जा रही है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी वह मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश जरूर करेंगे।

योगी सरकार के बजट पर बहन मायावती ने घेरा, की यह टिप्पणी

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 बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने सोमवार 22 फरवरी को उत्तर प्रदेश सरकार के बजट पर कठोर निन्दात्मक टिप्पणी की है। उन्होंने हुए कहा कि “यह बजट विशेष रूप से गरीबों, कमजोर वर्गों और किसानों के लिए बेहद निराशाजनक है, यह बजट सिर्फ कोरे वादों से भरा है इसमें समाज के कमजोर वर्गों, किसानों और बेरोजगारों के लिए कोई ठोस योजना नहीं है।” सुश्री मायावती ने ट्वीट करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के बजट की तरह यूपी सरकार का बजट भी कोरे वादों से भरा है और आम जनता को सुंदर सपने दिखाए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश की 23 करोड़ जनता से अपने वादों को पूरा करने के बारे में आदित्यनाथ सरकार असफल रही है। केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी सरकार होने के बावजूद ऐसी असफलता दुर्भाग्यपूर्ण है। अक्सर बीजेपी नेताओं द्वारा कहा जाता है कि केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी सरकार हो तो ऐसी ‘डबल इंजन’ की सरकार में बड़ा विकास होता है। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य के साथ विधानसभा में 2021-22 के लिए 5.5 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। एक साल बाद यहाँ विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसी के मद्देनजर बजट में 27,598 करोड़ रुपये की नई योजनाओं की घोषणा की गयी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के दलितों के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों और युवाओं में बढ़ रही बेरोजगारी के लिए इस बजट से उम्मीदें लगाई जा रहीं थी। लेकिन इस बजट में इन दोनों मुद्दों को लेकर या हाल ही में उभरी किसानों की समस्याओं को लेकर भी कोई योजना घोषित नहीं हुई है। इस प्रकार इस बजट का आम जनता और किसान मजदूर वर्ग की बेहतरी से कोई संबंध नहीं है।

हरियाणा में दलितों-पिछड़ों की एकता के सूत्रधार बनें सर छोटूराम और डॉ. आंबेडकर

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 कृषि कानूनों का विरोध करने वाले किसान अब दलितों के मुद्दे भी उठा रहे हैं। अब योजना यह है कि दलितों के साथ मिलकर काम किया जाए और समाज में फैले जातिगत भेदभाव के खात्मे पर भी जोर दिया जाए। किसान आंदोलनकारियों ने गुरनाम छबड़ा के नेतृत्व में हरियाणा में हिसार के बरवाला कस्बे मेंदलितों के साथ महापंचायत बुलाई। महत्वपूर्ण बात यह है कि हरियाणा की बीस प्रतिशत आबादी दलित है जिसके खिलाफ भयानक जातीय उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं।

इस बैठक में गुरनाम सिंह ने किसानों और दलितों के बीच भाईचारे का आह्वान किया। बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें किसानों से कहा गया कि वे अपने घरों में बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीर लगाएं वहीं दलितों से कहा गया कि वे सर छोटू राम की तस्वीर लगाएं। गुरनाम सिंह ने कहा कि हमारी लड़ाई न केवल सरकार से है बल्कि पूंजीपतियों के खिलाफ भी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सरकार आज तक हमें बांटती रही है, कभी जाति के नाम पर या कभी धर्म के नाम पर। आगे उन्होंने कहा कि किसान और मजदूर सरकार की इस साजिश को समझें। उन्होंने अन्य किसान नेताओं से भी अपील की कि वे हरियाणा और पंजाब में इस तरह की महापंचायत अब न करें बल्कि अब दूसरे राज्यों में ऐसी महा-पंचायतें बुलाएं।

एक खास नजरिए से यह बहुत बड़ी खबर है। भारत के गांवों की शक्ति संरचना में अक्सर ही सवर्ण समाज द्वारा ओबीसी और दलितों, मुसलमानों के बीच झगड़े लगाए जाते रहे हैं। इसी फूट का लाभ धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को होता आया है। ऐसे में ओबीसी जाट समाज द्वारा बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीर अपने घरों में लगवाने का ऐलान करना बहुत बड़ी बात है। यह एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत का संकेत है।

दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को आरक्षण के पक्ष में आएं विशेषज्ञ

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 हाल ही में सरकार की तरफ से एक निर्णय आया है जिसमें कहा गया है कि दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा। इस निर्णय के बाद भारत भर में आरक्षण सहित जाति आधारित आरक्षण पर नई बहस छिड़ गयी है। राजनीतिक पार्टियों एवं मीडिया चैनल्स की चर्चा में यह विषय ठीक से उजागर नहीं किया जा रहा है इसलिए इसके बारे में दलित ईसाई एवं दलित मुस्लिम समाज में काफी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में इस विषय में संविधान और समाजशास्त्र के विशेषज्ञों की राय समझना आवश्यक है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सतीश देशपांडे मानते हैं कि दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को आरक्षण दिया जाना चाहिए। श्री देशपांडे तीन दशक से भी अधिक समय से जाति और वर्ग की असमानताओं का अध्ययन कर रहे हैं और जाति की समस्या सहित तीन पुस्तकों के संपादक के रूप में कार्य कर चुके हैं ।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की 2008 की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों’ को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने के पक्ष में काफी प्रमाण हैं। प्रोफेसर देशपांडे इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक थे। शहरी भारत में लगभग 47% दलित मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे आते हैं, वर्ष 2004- 05 के आंकड़ों के हिसाब से यह प्रतिशत असल में हिंदू दलितों और दलित ईसाइयों की तुलना में काफी अधिक है। ग्रामीण भारत में 40% दलित मुसलमान और 30% दलित ईसाई बीपीएल श्रेणी में हैं।

विभिन्न जाति समूहों के बारे में जरूरी आँकड़े अगर उपलब्ध न हों तो सरकार या प्रशासन द्वारा जरूरी नीति और कल्याणकारी उपायों की रचना करने में मुश्किलें आती हैं। प्रोफेसर देशपांडे का कहना है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों को उप-वर्गीकृत किया जाना चाहिए ताकि इनके भीतर भी तुलनात्मक रूप से अधिक पिछड़े समूह अधिक लाभ उठा सकें।

गौरतलब है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उप-वर्गीकरण पर अपने फैसले की समीक्षा कर रहा है। प्रोफेसर देशपांडे आगाह करते हुए बताते हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण संवैधानिक नजरिए से उचित नहीं है। आर्थिक आधार पर आए इस नए आरक्षण में पहले से जाति के आधार पर आरक्षित समुदायों को शामिल नहीं किया गया है। यह एक गलत बात है इससे उन जातियों के गरीबों के प्रति अन्याय होता है। इस प्रकार यह नया आरक्षण असल में ऊंची जातियों के लिए एक विशेष कोटा बन गया है।

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आदिवासी विकास संगठन के अध्यक्ष मोहन डेलकर के आत्महत्या की खबर

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7 बार सांसद रहें मोहन डेलकर ने मुंबई के एक होलट में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वर्तमान में दादरा एवं नगर हवेली के निर्दलीय सांसद मोहन डेलकर का शव सोमवार को मुंबई के एक होटल से बरामद हुआ है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक आत्महत्या की बात कही जा रही है लेकिन सही जानकारी के लिए पोस्टमार्टम का इंतजार हैं।

डेलकर साल 1985 से ही आदिवासी विकास संगठन के अध्यक्ष भी थे। वे मजूर अधिकारों के लिए भी अपनी नौजवानी के दिनों में लड़ते रहे थे। मोहन डेलकर भी कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों में रहे हैं लेकिन अंतिम चुनाव उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ही जीता था। हालांकि कई लोगों का मानना है कि उन्होंने सुसाइड नहीं किया है। इसके लिए लोकसभा में दिये उनके वक्तव्य को आधार बनाया जा रहा है। 19 नवंबर 2020 को उन्होंने लोकसभा में जो कहा था, उसको आधार बनाकर मोहन डेलकर की आत्महत्या की थ्योरी पर सवाल उठाया जा रहा है। गौरतलब है कि अपने इस संभवतः आखिरी सार्वजनिक भाषण में सांसद ने गंभीर बातों की ओर इशारा किया था।

बना अनोखा रिकार्ड, पहली बार दलितों की भाषा में लिखा गया गीत

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 हाल ही में स्त्री स्वतंत्रता के मुद्दे पर मलयालम भाषा में बनी मशहूर फिल्म ‘द ग्रेट इन्डियन किचन’ चर्चा में है। साथ ही चर्चा में हैं, इस फिल्म के लिए एक लोकप्रिय गीत की रचना करने वाली दलित समाज की गीतकार ‘मृदुला देवी’। मृदुला को आजकल बहुत सराहा जा रहा है। खास बात यह है कि मृदुला ने एक ऐसी भाषा में गीत लिखा है जिसकी अपनी कोई लिपि नहीं है, यानी कि इस भाषा में आप लिख-पढ़ नहीं सकते। यह भाषा सिर्फ दलितों की पराया जाति द्वारा बोली जाती है।

मृदुला लंबे समय से महिला अधिकार के मुद्दे पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था से लड़ रही हैं, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है। दरअसल देश का सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य होने के बावजूद केरल में स्त्रियों के खिलाफ अत्याचार कम नहीं हुआ है। फिल्म ‘द ग्रेट इन्डियन किचन’ में इन्ही मुद्दों को उठाया गया है। यह पहली बार है, जब मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में पराया जाति की भाषा में एक दलित गीतकार द्वारा कोई गीत लिखा गया है। इसे केरल सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में सामाजिक बदलाव की लहर की सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो राज कपूर के दौर में कवि-गीतकार ‘शैलेन्द्र’ ने यादगार गीत रचे हैं। लेकिन शैलेन्द्र के बाद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कोई गीतकार या कलाकार ज्यादा चर्चित नहीं हो पाया। ऐसे में तमिल, कन्नड़ एवं मलयालम फिल्म इंडस्ट्री से दलित कलाकारों की प्रतिभा को अवसर दिए जाने की खबर सुकून देने वाली है। इसकी एक वजह यह भी है कि तमिल, तेलुगु, कन्नड व मलयाली फिल्म इंडस्ट्री में रामासामी पेरियार की विचारधारा को मानने वाले काफी कलाकार, गीतकार और निर्देशक मौजूद हैं। ऐसे में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में मृदुला बेनु का उभरना देश भर की दलित महिलाओं के लिए एक प्रेरणा देने वाली खबर है।

एक ब्राह्मण मित्र की परेशानी: ये ओबीसी और दलित मुसलमानों से मुहब्बत क्यों करते हैं?

एक ब्राह्मण मित्र हैं वे एक बहुत बड़े बिजनेस स्कूल से बड़ी डिग्री लिए हुए हैं। पिछले कई सालों से बार-बार फोन करके दलितों एवं ट्राइबल समाज के लोगों की समस्याओं के बारे में चर्चा करते रहे हैं।

वे अक्सर यह जानना चाहते हैं कि दलितों ओबीसी और ट्राइबल की समस्याएं क्या है। अक्सर वे अपनी चर्चा के दौरान यह भी बताने की कोशिश करते हैं कि वह कितने संवेदनशील हैं और कितनी गहराई से इन ‘बेचारों’ की समस्याओं को जानने समझने की कोशिश करते रहे हैं।

अब वे मेरे अच्छे मित्र रहे हैं और कई सालों से गंभीरता से बातचीत करते रहे हैं, मैं भी उन्हें अपने मन की बात बताता आया हूं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनकी चर्चाओं का स्वरूप बदल गया है, जैसे ही राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा पूरे देश पर हावी हुई है, और जैसे ही NRC के विरोध मे शाहीन बाग और आजकल किसान आंदोलन जैसे उदाहरण पूरे देश में उठ खड़े हुए हैं उनके प्रश्नों का स्वरूप बदल गया है। उन्हे विशेष रूप से इस बात से दिक्कत है कि ओबीसी और दलित लोग मुसलमानों से भाईचारा क्यों दिखाने लगे हैं?

अब उनके प्रश्न शिकायत में बदल गए हैं अब वे मित्र यह पूछना चाहते हैं कि ये दलित ओबीसी और ट्राईबल लोग इन  “मुसलमानों” से इतनी मोहब्बत क्यों कर रहे हैं? इन ओबीसी दलितों आदिवासियों को अपने देश की चिंता क्यों नहीं है? इन लोगों को मुसलमानों की इतनी चिंता क्यों होने लगी है?

यह सवाल सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। पिछले कई सालों में उनसे हो रही चर्चाओं को मैंने फिर से याद किया।

मैंने समझने की कोशिश की कि क्या वास्तव में यह सज्जन ओबीसी दलित और ट्राइबल समाज की भलाई चाहते थे? या फिर यह सिर्फ दूसरे खेमे के राज जानना चाहते थे? मैं यह जान पाया कि वह एक राजनीतिक व्यक्ति हैं जो कि अपनी सुविधा के लिए किन्ही खास और जरूरी प्रश्नों का उत्तर ढूंढना चाहते हैं।

मैंने इस बात की राजनीति को समझ कर दूसरे ढंग से उनसे बात करना शुरू कर दिया।

पिछले महीने दो तीन बार उनका फोन आया मैंने उनके सवालों का जवाब देने की बजाय उनसे खुद से सवाल पूछने शुरू किया मैंने पूछा कि ब्राह्मणों के बीच में इतना जातिवाद क्यों है? एक सरयूपाणी ब्राह्मण एक पाठक या जोशी ब्राह्मण को अछूत क्यों समझता है? पंक्ति पोषक और पंक्ति दूषण ब्राह्मण क्या होते हैं? एक देशस्थ ब्राह्मण और कोकणस्थ ब्राह्मण के बीच में विवाह करने में क्या समस्या है? एक ठाकुर क्षत्रिय की बेटी किसी उपाध्याय ब्राह्मण से शादी क्यों नहीं कर सकती? आजादी के बाद भी अभी हाल ही तक ब्राह्मणों के परिवार में स्त्रियों को शिक्षा एवं रोजगार की आजादी क्यों नहीं थी?

यह सवाल सुनते ही वे भड़क गए। मैंने उनके क्रोध को भांपकर पूछा कि भाई यह सवाल तो आपके समाज पर भी उठते ही हैं, आपके समाज में भी वही समस्याएं हैं जो कि दूसरी जातियों और समाजों में है।

अगर आप वास्तव में इन समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं तो आपको अपने घर से शुरू करना चाहिए, अगर आपको लगता है कि दलितों ओबीसी और ट्राइबल समाज में जातिवाद की समस्या ने उनका बड़ा नुकसान किया है तो आपको यह भी देखना चाहिए कि खुद ब्राह्मण बनिया एवं क्षत्रिय समाज में भी जातिवाद भयानक रूप से प्रचलित है। अगर वास्तव में आप इन समस्याओं के प्रति गंभीर हैं तो आपको वहां से शुरू करना चाहिए जहां आप खुद खड़े हैं।

मेरी यह बातें सुनकर उन्हें बड़ा आश्चर्य और दुख हुआ, उनकी महान बनने की सारी कोशिश बर्बाद हो गई। मेरे सवालों ने उन्हें उन्हीं की नजर में एक बेचारा साबित कर दिया। अभी तक वे दूसरों को बेचारा समझ कर उनका अध्ययन कर रहे थे लेकिन जब मैंने उनका अध्ययन करना शुरू किया तो वह खुद बेचारे बन गए। और इस बात से उन्हें बहुत तकलीफ हुई।

यह बड़ी मजेदार बात है, इस देश को जातिवाद और छुआछूत सिखाने वाले लोग हमेशा दूसरों का अध्ययन करते रहे हैं और खुद अपना अध्ययन कभी नहीं करते। दूसरों का अध्ययन करते हुए वह सिद्ध कर देते हैं कि वह खुद तो पहले से ही महान है बस दूसरों को थोड़ा और सुधारना है, फिर सब ठीक हो जाएगा। यह भारत की ऐतिहासिक समस्या है, भारत की सबसे बड़ी राजनीति का सबसे गंदा चेहरा यही है।

इसीलिए मैं अपने ब्राह्मण एवं सवर्ण मित्रों को बार-बार कहना चाहता हूं कि अगर आपको वास्तव में इस देश की कोई चिंता है और इस देश से जातिवाद छुआछूत और भेदभाव को खत्म करना चाहते हैं तो आपको अपने घर और अपने समाज से ही शुरू करना चाहिए। मैने उन मित्र से कहा कि आपको अगर पूरे समाज में रोशनी फैलानी है तो सबसे पहला दीपक आपको अपने घर में  जलाना चाहिए तब आपको पता चलेगा कि जातिवाद छुआछूत और भेदभाव का असली जहर क्या है? और वह कैसे काम करता है?

तभी आप दूसरों की भी मदद कर पाएंगे अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आप सिर्फ एक गंदी राजनीति खेल रहे हैं।आप का सबसे पहला कर्तव्य है कि आप इस बात को सामने लाएं की तथाकथित ऊंची जातियों में स्त्रियों का शोषण किस तरह होता है? तथाकथित ऊंची जातियों में आपस में जाति और वर्ण के क्या भेदभाव हैं? और किस तरह से इन तथाकथित ऊंची जातियों में धर्म और कर्मकांड के गंदे अंधविश्वास फैले हुए हैं?

मेरी यह बात सुनते हुए वे तथाकथित प्रगतिशील मित्र भड़क गए और फोन काट कर भाग गए और फेसबुक पर भी ब्लॉक कर दिया।

जानिए, किसान आंदोलन को लेकर न्यूयार्क टाइम्स में फुल पेज क्या छपा है?

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भारत का किसान आंदोलन अब पूरी दुनिया के लिए चर्चा का मुद्दा बन गया है। अमेरिकी पॉप स्टार सहित तमाम राजनीतिक हस्तियों एवं सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता एवं संगठनों ने किसानों के प्रति समर्थन की घोषणा की है। इसी सिलसिले में अमेरिका से प्रकाशित होने वाले और दुनिया के बड़े मीडिया ग्रुप में शुमार अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में किसानों के पक्ष में पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित हुआ है। इस विज्ञापन को ‘जस्टिस फॉर माइग्रेन्ट वूमन’ नामक संगठन ने प्रकाशित करवाया है। यह संगठन अमेरिका में अन्य स्थानों से पलायन करके आई महिलाओं के कानूनी अधिकार एवं मानवाधिकार पर जागरूकता निर्माण करने के साथ उनके अधिकारों की रक्षा का काम करता है। इस संगठन द्वारा न्यूयॉर्क टाइम्स में दिए गए इस विज्ञापन में दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से एक अपील भी की गयी है। दलित दस्तक इस अपील को हिन्दी में सबके सामने ला रहा है ताकि अधिकाधिक भारतीय नागरिक इसे पढ़ एवं समझ सकें। करीबन दस लाख किसान शांतिपूर्वक ढंग से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन इसके जवाब में भारत सरकार ने राज्य द्वारा अनुमत  हिंसा, आंसू गैस, पानी की धार और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के जरिए किसानों को जवाब दिया है।  मानवाधिकार का इस प्रकार का हनन अब समाप्त होना चाहिए। भारत के किसान अपने जीवन की गरिमा और आजीविका को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यह किसान उन तीन कानूनों का विरोध कर रहे हैं जो कि हड़बड़ी में बगैर किसी विचारविमर्श के पास कर दिए गए हैं, ये तीनों कानून भारत में कृषि को खुले मार्केट के लिए खोल देंगे। कई लोगों के लिए यह उनके जीवन और मरण का प्रश्न है। ये कानून बड़ेबड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाते हैं और किसानों की सारी सुरक्षा छीन लेते हैं। भारत की लगभग आधी कामकाजी आबादी खेती से और वह भी मुख्य रूप से छोटी जोत वाली खेती सेजुड़ी हुई है। भारत के दसियों लाख परिवार अपनी आजीविका खो जाने की आशंका से डरे हुए हैं। खेती के बढ़ते व्यावसायिकरण से हमारे भोजन और हमारे पर्यावरण के भविष्य पर बुरा असर पड़ सकता है। भारत के किसान पूरे देश से इकट्ठे होकर शांतिपूर्ण ढंग से कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके बावजूद उनके खिलाफ हिंसा, गिरफ्तारियां और सरकार के द्वारा कानूनी कार्रवाई की जा रही है। किसानों के प्रदर्शन स्थलों पर बारबार पानी बिजली और अन्य सुविधाएं बंद की जा रही है। किसानों के प्रतिरोध की आवाज को दबाने के लिए इंटरनेट सुविधा भी सोचीसमझी रणनीति के तहत निलंबित की जा रही है। मीडिया को भी सेंसर किया जा रहा है और धमकाया जा रहा है। आंदोलनकारियों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा रहा है, उनपर हमले किए जा रहे हैं और अनिश्चित काल के लिए जेल में ठूँसा जा रहा है। भारत यह जो कुछ भी कर रहा है वह उन पवित्र लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है जिनके जरिए मानव अधिकार के प्रति नागरिक एवं राजनीतिक भागीदारी की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। हम एक खतरनाक समय में जी रहे हैं, आज पूरी दुनिया के नागरिकों को इकट्ठा करने की आवश्यकता आन पड़ी है ताकि लोकतंत्र के आदर्शों की रक्षा की जा सके। भारतीय किसानों के लिए संदेश: आप लोगों ने मानवता के इतिहास के सबसे बड़े आंदोलन को जन्म दिया है।पंजाब के खेतों से, केरल के गांव से, नई दिल्ली की सड़कों से, आपकी आवाज पूरी दुनिया में गूंज रही है। अब हम भी आपकी आवाज में आवाज मिला रहे हैं। हम अमेरिका और दुनिया भर के सभी मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का आह्वान करते हैं, कि वे हमारे साथ आएं और भारत के किसानों और आंदोलनकारियों के खिलाफ हो रहे दुर्व्यवहार की निंदा करें। आप से गुजारिश है कि आप अपनी आवाज का इस्तेमाल करते हुए भारत को बताएं कि वह लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की मांग करने का अधिकार, पूरी दुनिया के लिए सुरक्षित स्वस्थ और अधिक न्यायपूर्ण भविष्य को साकार करने की दिशा में लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों का सम्मान करें। https://www.siasat.com/ney-york-times-carries-full-page-ad-in-support-of-indian-farmers-2091999/

कौन और किस आधार पर कहता है कि वर्ण व्यवस्था आधारित बंटवार टूटा है? देखिए तथ्य क्या कह रहे हैं?

 आज भी भारतीय समाज में आर्थिक संसाधनों, निर्णायक पदों पर नियंत्रण और सामाजिक हैसियत वर्ण-जाति व्यवस्था पर ही आधारित है और राजनीति और प्रशासन पर भी उच्च जातियों का नियंत्रण है। इसे निम्न तथ्यों के आलोक में देख सकते हैं। आइए तथ्यों की रोशनी में वर्ण-जाति आधारित असमानता के श्रेणीक्रम को देखते हैं।

राजनीति सबसे पहले देश की संसद को लेते हैं। संसद देश का सर्वोच्च निकाय ही नहीं, सबसे ताकतवर संस्था है, क्योंकि उसे ही संविधान में संशोधन करने एवं कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यह जनता के प्रतिनिधियों की सर्वोच्च निकाय है, जिस जनता में भारत की संप्रभुता निहित है। देखते हैं इसमें किसका कितना प्रतिनिधित्व है। वर्तमान लोकसभा (2019) में चुनकर आए कुल 543 सांसदों में 120 ओबीसी, 86 अनुसूचित जाति और 52 अनुसूचित जनजाति के हैं और हिंदू सवर्ण जाति से जीतकर आए सांसदों की संख्या 232 है। आनुपातिक तौर देखें, तो ओबीसी का लोकसभा में अनुपात 22.09 प्रतिशत है, जबकि मंडल कमीशन और अन्य आंकड़ों के अनुसार आबादी में इनका अनुपात 52 प्रतिशत है।

आबादी में करीब 21 प्रतिशत के बीच हिस्सेदारी रखने वाले सवर्णों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व उनकी आबादी करीब दो गुना 42.7 प्रतिशत है। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को उनकी आबादी के अनुपात से थोड़ा अधिक ही लोकसभा में प्रतिनिधित्व प्राप्त है। आखिर 52 प्रतिशत ओबीसी को अपने आबादी के अनुपात से आधे से भी कम और सवर्णों को उनकी आबादी से दो गुना प्रतिनिधित्व क्यों मिला हुआ है। इसका सीधा कारण है, भारतीय समाज में उच्च जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुछ अन्य) का वर्ण-जाति आधारित वर्चस्व। एससी-एसटी को उनकी आबादी के अनुपात में लोकसभा में इसलिए प्रतिनिधित्व मिला हुआ है, क्योंकि उनके लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण है। इस बात की पूरी संभावना है कि यदि एससी-एसटी के लिए आरक्षण नहीं होता,तो उनका लोकसभा में प्रतिनिधित्व ओबीसी से भी बहुत कम होता और ओबीसी के लिए उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं, क्योंकि उन्हें आबादी के अनुपात में लोकसभा में आरक्षण प्राप्त नहीं है।

नौकरशाही अब इसे नौकरशाही के संदर्भ में देखिए। भले ही संसद विधान बनाती हो, लेकिन नौकरशाही नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन के मामले में सबसे निर्णायक संस्था है। उसमें विभिन्न मंत्रालयों के सचिव से सबसे निर्णायक होते हैं। 2019 में पीएमओ साहित केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कुल 89 शीर्ष आईएएस अधिकारियों (सचिवों) में एक भी ओबीसी समुदाय से नहीं था और इनमें केवल एक एससी और 3 एसटी समुदाय के थे। क्योंकि इन पदों पर कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है। अब जरा विस्तार से केंद्रीय नौकरशाही को देखते हैं। 1 जनवरी 2016 को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि ग्रुप-ए के कुल पदों 84 हजार 521 में से 57 हजार 202 सामान्य वर्गों (उच्च जातियों) का कब्जा था यानि कुल नौकरियों के 66.67 प्रतिशत पर 21 प्रतिशत सवर्णों का नियंत्रण था। इसमें सबसे बदत्तर स्थिति 52 प्रतिशत आबादी वाले ओबीसी की थी। इस वर्ग के पास ग्रुप-ए के सिर्फ 13.1 प्रतिशत पद थे यानि आबादी सिर्फ एक तिहाई, जबकि उच्च जातियों के पास आबादी से ढाई गुना पद थे। कमोवेश यही स्थिति ग्रुप-बी पदों के संदर्भ में भी थी। ग्रुप बी के कुल पदों के 61 प्रतिशत दों पर सवर्ण काबिज थे।

उच्च शिक्षा यही स्थिति विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के शिक्षक पदों पर थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की वार्षिक रिपोर्ट (2016-17) के अनुसार 30 केंद्रीय विश्वविद्यालय 82 राज्यों के विश्वविद्यालय (सरकारी) में प्रोफेसरों के कुल 31 हजार 446 पदों में सिर्फ 9 हजार 130 पदों पर ही ओबीसी, एससी-एसटी के शिक्षक है यानि सिर्फ 29.03 प्रतिशत। यहां 52 प्रतिशत ओबीसी की हिस्सेदारी बहुत ही कम है।

कुलपति अब जरा कुछ उन निर्णायक पदों को देखते, जहां किसी समुदाय के लिए कोई आरक्षण नहीं। ऐसा ही एक पद विश्वविद्यलय के कुलपतियों का है। उच्च शिक्षा व्यवस्था में कुलपति सबसे निर्णायक होता है, विशेषकर नियुक्ति एवं पदोन्नति के मामले में। 5 जनवरी 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा दी गई सूचना के अनुसार देश के (उस समय के) 496 कुलपतियों में 6 एससी, 6 एसटी और 36 ओबीसी समुदाय के थे। यानि उच्च जातियों के 90.33 प्रतिशत और ओबीसी 7.23 प्रतिशत, एसी 1.2 प्रतिशत और एसटी 1.2 प्रतिशत। यहां ओबीसी को अपनी आबादी का करीब आठवां हिस्सा प्राप्त है और एससी-एसटी को न्यूनतम से न्यूनतम, क्योंकि उनके लिए भी यहां आरक्षण का प्रावधान नहीं है। इसके पहले हम केंद्र सरकार के 89 सचिवों में एक के भी ओबीसी नहीं होने के तथ्य को देख चुके हैं, क्योंकि वहां भी आरक्षण नहीं है।

संपत्ति-संपदा ओबीसी समुदाय के सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के बहुत सारे अन्य तथ्य उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय संपदा में हिस्सेदारी के मामले में देखें तो पाते हैं कि (2013 के आंकड़े) कुल संपदा में ओबीसी की हिस्सेदारी सिर्फ 31 प्रतिशत है, जबकि उच्च जातियों की हिस्सदारी 45 प्रतिशत है, दलितों की हिस्सेदारी अत्यन्त कम सिर्फ 7 प्रतिशत है, क्योंकि वे वर्ण-जाति के श्रेणीक्रम में सबसे नीचे हैं। कुल भूसंपदा का 41 प्रतिशत उच्च जातियों के पास है, ओबीसी का हिस्सा 35 प्रतिशत है और एससी के पास 7 प्रतिशत है। भवन संपदा का 53 प्रतिश सवर्णों के पास है, ओबीसी के पास 23 प्रतिशत और एसीसी के पास 7 प्रतिशत है। वित्तीय संपदा (शेयर और डिपाजिट) का 48 प्रतिशत उच्च जातियों के पास है, ओबीसी के पास 26 प्रतिशत और एससी के पास 8 प्रतिशत। भारत में प्रति परिवार औसत 15 लाख रूपया है, लेकिन सवर्ण परिवारों के संदर्भ में यह औसत 29 लाख रूपया है, ओबीसी के संदर्भ में 13 लाख और एससी के संदर्भ में 6 लाख रूपया है यानि उच्च जातियों की प्रति परिवार औसत संपदा ओबीसी से दो गुना से अधिक है। (सुखदेव थोराट)

मीडिया एक नजर भारतीय समाज की सोच के नियंत्रित करने वाली मीडिया पर डालते हैं। गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम व न्यूजलॉन्ड्री नामक मीडिया संस्थान ने एक 2018 में सर्वे जारी किया। इसके मुताबिक मीडिया के सभी स्वरूपों फिर चाहे वे अखबार हों या न्यूज चैनल या फिर ऑनलाइन न्यूज पोर्टल सभी में वंचितों की हिस्सेदारी नगण्य है। “हू टेल्स अवर स्टोरीज़ मैटर्स: रिप्रेजेंटेशन ऑफ मार्जिनलाइज़्ड कास्ट ग्रुप्स इन इंडियन न्यूज़रूम्स” नाम की यह रिपोर्ट बताती है कि भारतीय मीडिया के तमाम न्यूज़रुम वंचितों की आवाज़ से वंचित हैं। यानि यहां काम करने वाले अधिकतर लोग सवर्ण हैं जिनके अपने सरोकार हैं। अपने अध्ययन में ऑक्सफैम-न्यूजलॉन्ड्री ने पाया है कि भारतीय मीडिया में अनुसूचित जनजाति के लोग नज़र ही नहीं आते, जबकि अनुसूचित जातियों के लोगों का प्रतिनिधित्व भी बतौर पत्रकार न के बराबर है। अपनी इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए ऑक्सफैम इंडिया और न्यूज़लॉन्ड्री ने अंग्रेज़ी के 6 और हिंदी के 7 अख़बारों का अध्ययन किया। इसके अलावा डिजिटल मीडिया से जुड़े 11 संस्थानों, 12 समाचार पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों से ब्यौरा जुटाया। साथ ही अंग्रेज़ी के 7 और हिंदी के 7 प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों में शामिल होने वाले रिपोर्टर, लेखक और पैनलिस्टों का ब्यौरा जुटाया। इसके बाद जो नतीजे सामने आए वे चौंकाने वाले थे।

न्यायपालिका न्यायपालिका पर सवर्णों के पूर्ण वर्चस्व से हम सब वाकिफ हैं। 90 प्रतिशत जज सर्वण, उनमें से अधिकांश ब्राह्मण और कुछ परिवारों के ( उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय)।

मैंने यहां सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व और वर्ण-जाति आधारित भेद-भाव और हिंसा- बलात्कार का आंकड़ा नहीं देर रहा हूं। वह जगजाहिर है। पिछड़े वर्ग के प्रधानमंत्री और दलित समाज के राष्ट्रपति की भूमिका राम की सेना के हनुमान और जामवंत की है। मेरा सवाल  है कि आखिर कौन और किस आधार पर कहता है कि वर्ण व्यवस्था आधारित बंटवार टूटा है?

उलझ गया है उन्नाव में दलित लड़कियों की मौत का मामला, ऐसे होगा खुलासा

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 उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में दलित समाज से ताल्लुक रखने वाली दो लड़कियों की संदिग्ध हालत में मौत से हड़कंप मच गया है। यह घटना जिले के असोहा थाना के बबुरहा गांव की है। परिवार वालों के मुताबिक तीन लड़कियां एक साथ चारा लाने गई थीं, लेकिन थोड़ी देर बाद लड़की के चाचा के पास फोन आया कि लड़कियां खेतों में बेहोश पड़ी हैं। तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने दो की मौत की पृष्टि की जबकि एक अन्य लड़की की हालत नाजुक बनी हुई है।

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 घटना के बाद न तो परिवार वालों को न ही अन्य लोगों को ही यह समझ में आ रहा है कि मामला क्या है, और लड़कियों के साथ ऐसा क्या हुआ। शुरुआती तौर पर इसे जहर खाने का मामला बताया जा रहा है, लेकिन लड़कियां ऐसा क्यों करेंगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। क्योंकि कोई संदिग्ध बात अब तक सामने नहीं आई है। वहीं एक अन्य युवती का कानपुर के रीजेंसी अस्पताल में इलाज चल रहा है। सबकी नजर उसी पर है क्योंकि होश में आने के बाद वही लड़की पूरी घटना का राज खोल सकती है। पुलिस अधिकारियों ने छह टीमों का गठन कर मामले की जांच शुरू कर दी है, जबकि घरवाले सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। आज पोस्टमार्टम होना है, जिसके बाद कुछ सच्चाई सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है। गौरतलब है कि तीनों लड़कियां आपस में चचेरी बहने हैं। भीम आर्मी प्रमख और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने नाजुक हालत में पड़ी युवती का दिल्ली एम्स में इलाज करने की मांग की है। तो वहीं इस मामले में अन्य दलों ने भी बयानबाजी शूरू कर दी है और योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधा है।

वहीं दूसरी ओर इस मामले में पुलिस की भूमिका को लेकर सभी एक्टिविस्ट और राजनीतिक कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं।दरअसल पुलिस ने पीड़ित परिवार को नजरबंद कर रखा है। पुलिस पीड़ित परिवार को किसी से भी नहीं मिलने दे रही है, यहां तक की मीडिया को भी पीड़ित परिवार से नहीं मिलने दिया जा रहा है, न ही एक अन्य जीवित बची युवती का ही कोई हेल्थ बुलेटिन जारी किया जा रहा है, जिससे लोगों में गुस्सा है। दिल्ली सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने ऐलान किया है कि उन्नाव पीड़िता को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। उन्नाव की बेटी को यूपी सरकार एयर एंबुलेंस से दिल्ली भेजें, दिल्ली सरकार उसके इलाज की पूरी जिम्मेदारी लेती है।

तो वहीं भीम आर्मी प्रमुख चंद्रेशेखर आजाद ने कहा है कि सरकार अगर इस मामले को गंभीरता से नहीं लेती तो वो उन्नाव कूच करेंगे।

दुनिया भर में बढ़ा चंद्रशेखर रावण का कद, टाइम मैग्जीन की लिस्ट में हुए शामिल

 दलित-वंचित समाज के लिए आवाज उठाने और संघर्ष करने वाले चंद्रशेखर आजाद रावण के काम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली है। दुनिया भर में प्रतिष्ठित “टाइम मैगजीन” ने चंद्रशेखर रावण को भविष्य में दुनिया के 100 सबसे ताकतवर लोगों में शुमार किया है। 17 फरवरी को टाइम मैगजीन की वेबसाइट पर “टाइम नेक्स्ट 100” की एक लिस्ट जारी की गई, जिसमें चंद्रशेखर की तस्वीर के साथ उनके बारे में लिखा गया है। टाइम मैग्जीन ने भीम आर्मी प्रमुख और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के बारे में जो लिखा है, हम यहां उसका अनुवाद दे रहे हैं। टाइम ने लिखा है-

 “34 साल के चंद्रशेखर आजाद भारत के भारत के सबसे दबे-कुचले जाति समूह के सदस्य हैं, जिसे दलित कहते हैं। उनके नेतृत्व में भीम आर्मी दलित बच्चों को गरीबी से उबार कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्कूल चलाती है। भीम आर्मी अपने हक की आवाज बुलंद करने के लिए एक और खास रणनीति अपनाती है। वह है जातिवादी दमन के शिकार लोगों को बचाने के लिए दनदानाती हुई मोटरबाइक की रैली लेकर पीड़ित के गाँव में घुस जाना और भेदभाव के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करना।

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सितंबर 2020 में, जब उत्तर प्रदेश में पुलिस ने एक 19 वर्षीय दलित महिला के साथ चार सवर्णों द्वारा सामूहिक बलात्कार की जांच में देरी की, तब आजाद और भीम आर्मी ने न्याय के लिए एक जोरदार अभियान छेड़ दिया। इसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक मांग के कारण आखिरकार आरोपी बलात्कारियों की गिरफ्तारी हुई। (हालांकि वे आरोपों से इनकार करते हैं।)

 आजाद ने हाल ही में कॉर्पोरेट कृषि सुधारों का विरोध कर रहे भारतीय किसानों सहित भारत में चल रहे कई अन्य प्रगतिशील आंदोलनों को भी समर्थन दिया है। उन्हें उम्मीद है कि वे भीम आर्मी की पहुंच और अपनी बढ़ती लोकप्रियता को बैलेट बॉक्स के जरिए राजनीतिक जीत में बदल सकेंगे। इसी सोच के साथ उन्होंने मार्च 2020 में एक राजनीतिक पार्टी की नींव रखी। इस पार्टी की पहली परीक्षा उत्तर प्रदेश में अगले साल 2022 में होने वाली है, जहां हिंदू राष्ट्रवादी तबका राजनीतिक रूप से प्रभावी है। भीम आर्मी के जोशीले रुख के बावजूद, आजाद ने सोशल मीडिया के बेहतरीन उपयोग के जरिए जनता में अपनी पहुँच का करिश्मा दिखाया है। यहां तक कि आजाद की रौबदार मूंछें – कुछ प्रभावशाली जातियों द्वारा एक सामाजिक हैसियत के प्रतीक के रूप में देखी जाती हैं, जो कि प्रतिरोध का ही एक तरीका है।

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 हिंदुस्तान टाइम्स में काम करने वाले एक दलित पत्रकार ध्रुबो ज्योति कहते हैं कि यह धारणा बन गयी है कि दलितों को दबकर जीना चाहिए, लेकिन आजाद और भीम आर्मी ने इस धारणा को खुली चुनौती दी है। इस प्रकार आजाद और भीम आर्मी ने भारत में जातिगत प्रतिरोध की लड़ाई को जाहिर तौर पर मनोवैज्ञानिक रूप से बदल दिया है।” – बिली पेरिग


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दिलीप मंडल की गिरफ्तारी को लेकर सवर्णों ने शुरु की मुहिम, जानिए क्या है मामला

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 देश के वरिष्ठ पत्रकार और बहुजन चिंतक प्रो. दिलीप मंडल के खिलाफ मनुवादियों ने ट्विटर पर मुहिम छेड़ दी है। ट्विटर पर मौजूद तमाम लोगों ने वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की गिरफ्तारी की मांग को लेकर मुहिम शुरु कर दी है। आलम यह है कि 16 फरवरी को भारत में हैशटैग #Arrestdilipmandal Political Trending में ट्रेंड कर रहा था। और 66 हजार से ज्यादा लोगों ने दिलीप मंडल की गिरफ्तारी की मांग कर दी थी। यहां तक की गौरव गोयल ने दिलीप मंडल के खिलाफ साइबर क्राइम में क्रिमिनल कंप्लेंट कर दिया है।

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दरअसल मामला शुरू हुआ 16 फरवरी को। इस साल यह दिन हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक बसंत पंचमी का दिन था। हिन्दू धर्म के मानने वाले बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं और हिन्दू सरस्वती को शिक्षा की देवी मानते हैं। दरअसल दिलीप मंडल ने इसी दिन एक ट्विट किया जो पूरे विवाद की जड़ बना हुआ है। दिलीप मंडल ने ट्विटर पर लिखा-

सरस्वती को मैं शिक्षा की देवी नहीं मानता। उन्होंने न कोई स्कूल खोला, न कोई किताब लिखी। ये दोनों काम माता सावित्रीबाई फुले ने किए। फिर भी मैं सरस्वती के साथ हूँ। ब्रह्मा ने उनका जो यौन उत्पीड़न किया, वह जघन्य है। – संदर्भ Phule J. , Slavery(1991), Govt of Maharashtra Publication

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बस इसके बाद से ही एक धर्म विशेष के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो गईं। उनकी आपत्ति इस बात को लेकर थी कि दिलीप मंडल ने ब्राह्मा और सरस्वती के संबंधों को लेकर जो कहा है, वह उनकी धार्मिक भावनाएं आहत करता है। इसके बाद कई लोगों ने दिलीप मंडल की गिरफ्तारी की मुहिम चलाते हुए हैशटैग #Arrestdilipmandal की मुहिम शुरू कर दी। दिलीप मंडल के विरोधी यहीं नहीं रुकें बल्कि उन्होंने उनके खिलाफ साइबर क्राइम के तहत कंप्लेंट भी दर्ज करा दिया।

तो वहीं दूसरी ओर दिलीप मंडल के समर्थन में भी तमाम लोग सामने आ गए और उन्होंने हैशटैग #SupportProfDilipMandal के जरिए इसका जवाब देना शुरू कर दिया। दिलीप मंडल ने भी प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी का एक पुराना ट्विट शेयर किया और विरोधियों को जवाब देते हुए लिखा-

प्रधानमंत्री जी ने कहा है महात्मा फुले जी के रास्ते पर चलने के लिये। अब फुले जी की किताब में ब्रह्मा के बारे में जो लिखा है, वह तो सबको बताना ही पड़ेगा। ऐसा तो होगा नहीं कि वोट के लिए बहुजनों के महापुरुषों की पूजा कर लें और उनकी किताब न पढ़ें। पैकेज डील है। वोट के साथ किताब।

अपने ऊपर साइबर क्रिमिनल केस करने वाले को करारा जवाब देते हुए दिलीप मंडल ने उसे अज्ञानी मू्र्ख कह दिया। साथ ही उन्होंने लिखा कि- क्या तुम जानते हो कि महात्मा फुले को कोट करना कोई अपराध नहीं है। उनकी प्रतिमा देश के संसद में है जिसका अनावरण 2013 में वाजपेयी ने किया था और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें महानतम समाज सुधारक करते हैं। दिलीप मंडल यहीं नहीं रुकें, उन्होंने उसे चिढ़ाते हुए आगे लिखा कि आपकी नाजुक भावनाओं को आहत करने के लिए, मैं फिर से उनका उद्धरण साझा कर रहा हूं।

विरोधियों को चिढ़ाते हुए दिलीप मंडल ने एक और ट्विट किया और लिखा-

#Arrestdilipmandal ये हैशटैग बंद कीजिए। वरना मैं कबीर, संत रविदास महाराज, ज्योतिबा फुले, बाबा साहब, पेरियार, ललई यादव, जगदेव प्रसाद का लिखा हुआ सब उनकी किताबों से उठाकर पोस्ट कर दूँगा। फिर समेटते रहना। इनमें से ज़्यादातर किताबें सरकारों ने छापी हैं।

 दरअसल बहुजन समाज के बुद्धिजीवि अक्सर ज्योतिबा फुले और बाबासाहब आंबेडकर द्वारा लिखी गई बातों को कोट करते रहते हैं। इसमें तमाम बातें ऐसी भी हैं जो खुद हिन्दु धर्म ग्रंथों में लिखी हुई है। खुद हिन्दू धर्म में लिखी बातें को भी जब बहुजन समाज के लोग साझा करते हैं तो अपने धर्मग्रंथों और उसके लेखकों के खिलाफ आवाज उठाने की बजाय लोग बहुजनों पर ही भड़ास निकालने लगते हैं।

यूपी विधानसभा सत्र कल से शुरू, बहनजी ने अपने विधायकों को दिया यह निर्देश

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 किसानों के आंदोलन के मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती लगातार मुखर हैं। वो लगातार अपने बयानों के जरिए सरकार से किसानों की मांग मान लेने और कृषि बिल रद्द किये जाने की मांग कर रही हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में कल 18 फरवरी से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र को लेकर बहनजी ने अपनी पार्टी के विधायकों के लिए फरमान जारी किया है।

बसपा अध्यक्ष ने अपने एक बयान में बसपा के विधायकों को निर्देश दिया है कि विधायक यूपी विधानसभा के कल से शुरू हो रहे सत्र में किसानों व जनहित के अहम मुद्दों को उठाएं। साथ ही अपराध नियंत्रण व कानून-व्यवस्था के मामले में सरकार की घोर लापरवाही व द्वेषपूर्ण कार्रवाई के प्रति सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए दबाव डाला जाए। अपने बयान में बसपा प्रमुख ने यूपी में विधानसभा व पंचायत चुनाव से पहले नेताओं, वकीलों व व्यापारियों आदि की हत्याओं को लेकर भी चिन्ता जताई है।

सिविल सेवा इंटरव्यू में अब छुपाई जाएगी जाति से जुड़ी पहचान!

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 जाति और आरक्षण की बहस के बीच सरकार की तरफ से एक नया प्रस्ताव आया है। सरकार चाहती है कि प्रशासनिक सेवा के इंटरव्यू में जाति और वर्ण से जुड़े उपनाम, धार्मिक प्रतीकों आदि का कोई उल्लेख नहीं होना चाहिए। यह खबर सामाजिक न्याय मंत्रालय की ओर से आ रही है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की तरफ से आ रही इस रिपोर्ट में निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की भी मांग की गई है। कहा जा रहा है कि ‘समाज के उन्नत वर्गों के बराबर नौकरी की सुरक्षा’ देने के लिए इस तरह की व्यवस्था की योजना बन सकती है। रिपोर्ट के जरिए केंद्र सरकार द्वारा सिफारिश की गई है कि सिविल सेवा और अन्य केंद्रीय या राज्य स्तरीय परीक्षाओं में साक्षात्कार में उम्मीदवारों के जाति उपनाम या विवरण प्रकट नहीं किए जाने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे साक्षात्कार के दौरान बहुजनों के खिलाफ भेदभाव की संभावना बढ़ जाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सिविल सेवाओं और अन्य सेवाओं में खुली प्रतियोगिताओं के माध्यम से चयन की प्रक्रिया में व्यक्तित्व परीक्षण/साक्षात्कार के चरण में भेदभाव की संभावना अधिक होती है। गौरतलब है कि दलित इंडियन चैंबर ऑफ कामर्स (डिक्की) द्वारा बीते सात दशकों में दलित बहुजन समाज के सशक्तिकरण की प्रक्रिया में आ रही समस्याओं पर एक अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट में उक्त अनुशंसाएं की गयी हैं।

अंग्रेजी में खबर पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं

पिछले दरवाजे से ‘खास’ लोगों की भर्ती यानी लैटरल इंट्री के खिलाफ बहुजनों का आंदोलन शुरू

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 संघ लोक सेवा आयोग ने एक बार फिर से बीते 5 फरवरी को ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टर के पदों पर लेटरल एंट्री के लिए आवेदन आमंत्रित किया है। यूपीएससी ने विभिन्न सरकारी विभागों में 3 ज्वॉइंट सेक्रेटरी और 27 डायरेक्टर लेवल के कुल 30 पदों के लिए आवेदन मांगे हैं। इस भर्ती से प्राइवेट सेक्टर के 30 और विशेषज्ञों को सीधे नियुक्त किया जाएगा। आयोग द्वारा निकाली गई इस भर्ती का मामला 9 फरवरी को संसद में उठा। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव ने इस मुद्दे को संसद में उठाया और कहा कि ऐसा करने से सिविल सेवा प्रतिभागियों और आईएएस अधिकारियों में खासी नाराजगी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ऐसी नियुक्तियों में आरक्षण व्यवस्था का भी बिल्कुल ध्यान नहीं रखा गया है।

 इसी के विरोध में अब बहुजन समाज के बुद्धिजीवि और नेताओं ने खुलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 16 फरवरी को इसी के विरोध में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन होना है। तो संविधान बचाओ संघर्ष समिति ने 7 मार्च को भारत बंद का आवाहन किया है। अखिलेश यादव से लेकर उदित राज और आम आदमी पार्टी के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम तक सबने लैटरल एंट्री को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। राजेन्द्र पाल गौतम ने तो आंदोलन का ऐलान कर दिया है। हम आंदोलन के मुद्दे पर बाद में आएंगे, पहले हम आपको बताते हैं कि क्या है लैटरल एंट्री और इसकी आड़ में देश के आम युवाओं के साथ किस तरह एक बड़ा धोखा किया जा रहा है जो सिविल सेवा में चयनित होने के लिए सालों साल जी-तोड़ मेहनत करते हैं।

क्या है लैटरल एंट्री संघ लोक सेवा आयोग जिन ज्वाइंट सेक्रेटरी और डायरेक्टरके पदों पर लेटरल एंट्री के लि आवेदन आमंत्रित किए हैं, आम तौर पर इन पदों पर सिविल सेवा अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है। लेकिन अब लेटरल एंट्री की आड़ में इन पदों पर प्राइवेट सेक्टर के अनुभवी और विशेषज्ञ पेशेवरों को नियुक्त किया जा सकेगा। इन पदों पर नियुक्ति के लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं होगी और उम्मीदवारों का चयन सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर किया जाएगा। बस भर्ती के लिए आवेदक के पास मास्टर डिग्री होनी चाहिए। यूपीएससी ये भर्ती तीन साल के कॉन्ट्रेक्ट पर निकालती है, लेकिन प्रदर्शन के आधार पर इसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है। पहली बार साल 2018 में ‘सीधी भर्ती व्यवस्था के जरिए संयुक्त सचिव रैंक के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इसमें कुल 6,077 लोगों ने आवेदन किए थे। इसके तहत पहली बार निजी क्षेत्रों के नौ विशेषज्ञों को केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के पदों पर तैनाती के लिए चुना गया था।

क्या है आरक्षण को खतरा सीधे निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को चुने जाने के कारण दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग को भारी नुकसान हो रहा है, क्योंकि इस तरह की नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। इस कारण आरक्षित वर्ग के युवाओं को ऐसी नियुक्तियों में आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिल पाएगा। न ही मुसलमान युवाओं को ही कोई मौका मिलेग। लेटरल एंट्री के तहत पहली बार जिन नौ लोगों को संयुक्ति सचिव के पदों पर नियुक्त किया गया, उनके नामों को गौर से देखिए। यह एक बानगी भर है। UPSC द्वारा चुने गए नौ विशेषज्ञों में अंबर दुबे (नागरिक उड्डयन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएँ), दिनेश दयानंद जगदाले (नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा), सुमन प्रसाद सिंह (सड़क परिवहन और राजमार्ग), भूषण कुमार (शिपिंग) और काकोली घोष (कृषि, सहयोग और किसान कल्याण) शामिल हैं। यानी साफ है कि इन सीधी भर्तियों में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के लिए सारे रास्ते पूरी तरह बंद हैं जो उन्हीं की भर्ती होगी, जिन्हें सरकार चाहेगी।

हालांकि अब इसके खिलाफ माहौल बनने लगा है और तमाम आम और खास लोग लैटरल एंट्री के नाम खिलाफ मुखर होकर बोल रहे हैं। इस मुद्दो को सोशल मीडिया पर लंबे वक्त से उठा रहे वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने हाल ही में इस बारे में ट्विट किया है। उन्होंने लिखा है- लैटरल एंट्री तमाम जाति-धर्म के उन स्टूडेंट्स और युवाओं के हितों के ख़िलाफ़ है, जो Competition Exams की तैयारी में रात-रात भर जगते हैं। लैटरल एंट्री नौकरशाही का कोलिजियम सिस्टम है।

तो आईएएस सूर्यप्रताप सिंह (@suryapsingh_IAS) ने लिखा है-

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने अपने ट्विट में लिखा-

तो वहीं वंचित तबके की आवाज को मजबूती से उठाने वाले राजेंद्र पाल गौतम जो कि दिल्ली सरकार में सोशल जस्टिस मिनिस्टर भी हैं, लैटरल इंट्री के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है।

 कुल मिलाकर देखें तो दिलीप मंडल की इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि लैटरल एंट्री की व्यस्था सही मायने में नौकरशाही का कोलेजियम सिस्टम बनाने की कोशिश है। 2-4 लाइन और बोलेंगे।

दलित युवा ने दादी को श्रद्धांजलि के जरिए एक पीढ़ी को किया याद, अंग्रेजी अखबार ने छापा

 पारिवारिक शोक की अवस्था में हम एक हो जाते हैं और अपने सामूहिक स्व से बंध जाते हैं। हमारा मन हमारी उन सबसे खूबसूरत बातों के बारे मे सोचने लगता है जिसे हम परिवार कहते हैं। परिवार एक सबसे मूल्यवान संस्था है जहां आदर और सम्मान का दिखावा नहीं किया जाता। यह एक ऐसी जगह है जहां हम अपने दिल से सहज ही करुणा और स्नेह बांटते हैं।

मेरी दादी, चंद्रभागाबाई ने अपने पूरे परिवार को रिश्तों के एक खूबसूरत धागे से बांध रखा था। इस साल की शुरुआत मे 4 जनवरी को रात 9 बजकर पंद्रह मिनट पर नांदेड के सिविल लाइन अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। इस तरह मेरे लिए यह नया साल एक सदमे के साथ शुरू हुआ। 2020 अब तक का सबसे कठिन साल रहा है, उसे विदा करते हुए मैं 2021 की तरफ कुछ आशावादी नज़रिये के साथ देखना चाहता था। हालांकि यह आशावाद ज्यादा देर नहीं टिक सका। मेरी दादी, चंद्रभागाबाई ने अपने पूरे परिवार को रिश्तों के एक खूबसूरत धागे से बांध रखा था। इस साल की शुरुआत मे 4 जनवरी को रात 9 बजकर पंद्रह मिनट पर नांदेड के सिविल लाइन अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। मेरी दादी अस्थमा की मरीज थीं, बीते पच्चीस साल से वे इस बीमारी से लड़ रही थीं। उन्हे सांस लेने मे दिक्कत आ रही थीं और उनका दम फूल रहा था। जिस दिन उन्होंने हमें अलविदा कहा उस दिन उन्होंने बहुत तकलीफ झेली। वे वेंटीलेटर पर थीं और उनका ब्लड प्रेशर लगातार ऊपर-नीचे हो रहा था।

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उस रात उनकी देखभाल करने की बारी मेरे भाई और चाचा की थी, उन्होंने उस रात मुझे आइसीयू में भर्ती मेरी दादी की फ़ोटो भेजी। फ़ोटो में साफ नजर आ रहा था कि वे सरकारी अस्पताल के पलंग पर एक फटे हुए गद्देपर लेटी हुई थीं, उस पलंग पर चादर भी नहीं थी। यह तस्वीर देखकर मैं अंदर तक टूट गया और एक गहरी उदासी ने मुझे घेर लिया। लाख कोशिश करने के बाद भी मैं अपनी दादी को इस हालत मे नहीं देख पा रहा था। मेरी बीमार दादी ने अस्पताल जाने के पहले मेरी माँ को रोते हुए गले लगाया था और रोते हुए ही मेरी माँ को नसीहत दी थी कि वो अपने बच्चों की यानि कि उनके पोते-पोतियों की ठीक से देखभाल करें। मेरे पिताजी छह साल पहले ही हमें छोड़कर चले गए थे; मेरी दादी अपने सबसे बड़े बेटे को बाबा कहकर बुलाती थीं और अपनी आँखों के सामने उन्हें मरता हुआ देखकर वे सदमे में डूब गयीं थीं। आज हम सब बड़े हो चुके हैं और आत्मनिर्भर हो गए हैं, लेकिन माँ का ममतामयी दिल आज भी पहले की तरह हमें उतना ही प्यार करता है।

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हफ्ते भर पहले मेरी बहन ने मुझे खबर दी थी कि आई (दादी) की तबीयत बहुत खराब है। मैंने तुरंत ही वीडियो कॉल करके बात की। मेरी दादी का चेहरा सूजा हुआ था इसके बावजूद वे कैमरे की तरफ देख पा रहीं थीं और मेरी चचेरी बहन की मदद से बातचीत कर पा रही थीं। कुछ साल पहले ही आई को सुनाई देना बंद हो गया था। उनके कान बहुत कमजोर हो गए थे और हमें सलाह दी गयी थी कि अब सुनने की मशीन वगैरह लगाकर इन कमजोर कानों पर जोर डालना ठीक नहीं है। चंद्रभागाबाई के बच्चे उन्हें आई कहते थे, बाद मे उनके पोते-पोतियाँ भी उन्हे आई कहने लगे। दादी के कान अपने तीन लड़कों के मुंह से निकलने वाले सुरीले “आई” शब्द को सुनने के आदि हो चुके थे। बाद में नौ पोते-पोतियों ने इसमें सुर मिलाकर इसे और सुरीला बना दिया। आई ने एक भरपूर जीवन जीया। उन्होंने अपने बच्चों और पोते-पोतियों को अपनी आँखों के सामने आदमकद होते हुए और फलता-फूलता देखा। उनकी ऊंचाई करीब चार फीट थी। हम जब भी उन्हें गले लगाते थे, तब हमें नीचे झुकना होता था ताकि वे विशाल बाज़ की तरह अपनी बाहें फैलाकर हमें अपनी आग़ोश में ले सकें। इस तरह जब हम उनकी आग़ोश में होते थे, हम बहुत महफ़ूज महसूस करते थे। उनकी झुर्रीदार चमड़ी बहती हुई नदी के पत्थरों की तरह चिकनी हो गई थी।

उनसे गले मिलने पर वे आपको कम से कम एक मिनट तक अपनी आग़ोश में ले लेतीं थीं और फिर आपको ढेर सारे चुंबन झेलने होते थे। वे हमें उसी तरह चूमती थीं जिस तरह कि वे हमें हमारे दुधमुँहेपन में चूमा करती थीं। मैं अक्सर सोचता रहा हूँ कि आज जब उनके सभी पोते-पोतियाँ इतने बड़े हो गए हैं, तब हमें देखकर उन्हे कैसा लगता होगा? मुझे आज एक सम्मानजनक स्थिति में देखकर वे मुझे ‘साहेब’ कहकर बुलाती हैं, इसके पहले वे मुझे बाला कहकर पुकारतीं थीं। वे मुझे ‘तुम्हीं’ या हिन्दी के ‘आप’ जैसे सम्मानजनक सम्बोधनों से भी पुकारती थीं। यह बदलाव उनके जीवन में स्वाभाविक रूप से आया था। ठीक वैसे ही जैसे कि कोई व्यक्ति किसी उच्च शिक्षित या उच्च अधिकारी व्यक्ति के सामने स्वाभाविक रूप से झुकता है, या उसके मातहत काम करता है। चंद्रभागाबाई, यानि कि मेरी आई की कहानी आज की बुजुर्ग दलित पीढ़ी के जीवन को दर्शाती है।

मेरे परिवार को चंद्रभागाबाई के जन्म के साल तक के बारे में भी सही जानकारी नहीं है, ऐसे में तारीख और महीने की तो बात ही क्या की जाए। अगर उनके बच्चों की उम्र से हिसाब लगाया जाए तो सबसे सही अंदाज़ा यह है कि वे सन 1940 में पैदा हुई होंगी। वे एक खेतिहर मजदूर ‘हनुमंते’ के परिवार मे पैदा हुईं थीं। उन्हें बहुत बचपन से ही जात-पात से जुड़े नियम-कायदे सिखा दिए गए थे। अपने बचपन की यादें ताज़ा करते हुए दादी हमें सुनाती थीं “हमें सिखाया गया था कि ऊंची जाति के लोगों के खाने या पीने के पानी के बर्तन नहीं छूने हैं”, “हमें कभी भी सम्मान से पीने का पानी नहीं दिया गया, हमें हमेशा काफी ऊंचाई से पानी पिलाया जाता था”। मेरी दादी ने अपने बचपन में एक मराठा किसान की जमीन पर मजदूरी की। फसल कटाई के दिनों में उनका परिवार दिन भर में 25 पैसा कमाता था। मेरी दादी ने ज़िंदगी भर कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा।

चंद्रभागाबाई अपने दो भाइयों से बड़ी थीं और अपनी बहन से छोटी थीं, और जैसा कि बड़ी बहनों के साथ हमेशा होता आया है, मेरी दादी का बचपन भी अपने दो छोटे भाइयों की देखभाल में गुज़रा। नांदेड की उस्मान शाही मिल मे काम करने वाले अपने कामरेड पति के साथ एक अलग-थलग बसी दलित झुग्गी बस्ती में उन्होंने आधा शहरी और आधा देहाती जीवन जीया। मेरे दादा-दादी बिना दरवाजे के एक कामचलाऊ से कमरे में रहते थे जिसकी दीवारें प्लास्टिक की ताड़पत्री से बनीं थीं और दरवाजा सूखी टहनियों से। चंद्रभागाबाई के तीन लड़के हुए, जिन्हें पालने के लिए उन्होंने तरह तरह के छोटे-मोटे काम किये। उन्होंने खेतों में और जूता फेक्टरी में काम किया और दलित छात्रों के हॉस्टल में खाना बनाने का काम भी किया। एक दमघोंटू कमरे में पूरे हॉस्टल के बच्चों के लिए दिन में तीन बार खाना बनाने का काम उनकी सेहत पर बहुत भारी पड़ा। लेकिन उन्हें इन हालात से जूझना ही था, अपने बच्चों के लिए उन्होंने यह सब झेला। गरीबी उन्हें विरासत मे मिली थी लेकिन इसके बावजूद वे एक साफ-सुथरी सूती-साड़ी पहनतीं थीं और इस मामले में कभी कोई समझौता नहीं किया। वे बहुत खूबसूरत थीं। फिर भी उन्हें अन्य भारतीय लड़कियों की तरह शादी के बाद जहरीली पितृ सत्ता का शिकार बनना पड़ा।

एक समय वह भी था जबकि चंद्रभागाबाई की कहानी या उनके लिए उनके पोते द्वारा लिखी गयी श्रद्धांजलि, और वो भी इंग्लिश में, कभी किसी अंतर्राष्ट्रीय अखबार में नहीं छप सकती थी। लेकिन आज यह संभव है और यह दलित समुदाय के लिए एक चमत्कार जैसा है, और हकीकत में यह एक दुर्लभ घटना है। वे महान जीवट वाले लोगों के उस समुदाय में जन्मीं थीं जिसे सबसे निचला और अछूत माना जाता था। जिंदगी और समय ने इन्हें जो कुछ भी दिया था, उससे भी आगे बढ़कर उन्होंने एक बड़ा सपना देखा था। हम दलितों के लिए हमारे पूर्वज ही हमारे देवता हैं और उन्हीं के जीवन को हम आगे बढ़ाते हैं। मेरी दादी अपनी रूह के जरिए हमें रास्ता दिखाने के लिए, अपने कामों से हमारे मन में विश्वास जगाने के लिए, हमें सहिष्णुता, ईमानदारी और प्रेम सिखाने के लिए हमारे पूर्वजों के देवसमूह में शामिल हो गयीं। मैं यह श्रद्धांजलि उन सभी दादियों-दादाओं के लिए लिख रहा हूँ जिनके महान वात्सल्य और धैर्य ने अपने पोते-पोतियों को इस लायक बनाया कि वे विरासत में मिले नैतिक मूल्यों से आगे बढ़कर कुछ और हासिल करने के लिए संघर्ष कर सकें।

जिन लोगों ने इन दिनों में अपने किसी प्रियजन को खो दिया है, मैं उनके दुख में शामिल हूँ। हमने जो खोया है वह एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन हमें अपने बिछड़ गए परिजनों के साथ बिताए गए खूबसूरत पलों के बारे में सोचना चाहिए। आखिर में सिर्फ यादें ही रह जातीं हैं। इन खूबसूरत पलों की याद्दाश्त ही हमें आगे बढ़ने की ताकत देती है। मुझे लगता है कि ऐसे दुख को साझा करने के लिए समाज में एक सार्वजनिक मंच होना चाहिए। समाज में सामूहिक रूप से शोक मनाने की एक आदत बननी चाहिए। जिंदगी की एक बुनियादी सच्चाई, जिसे आज तक कोई नहीं बदल पाया– हमें उसका सम्मान करना सीखना चाहिए, और वो सच्चाई है– मृत्यु। मृत्यु को एक अंतिम सत्य मानकर और उसे स्वीकार करके हम जीवन की सारभूत शांति को हासिल कर सकते हैं। हमें मृत्यु को गले लगाना सीखना चाहिए यही हमें बुद्ध के बोधि-प्रकाश की ओर ले जाता है। मेरी दादी एक अछूत की तरह जन्मीं थीं लेकिन एक बौद्ध बनकर उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा।

अगर हमारे आंतरिक जीवन में संतोष है, तभी समता की अनुभूति हमारे दुखी मन को शांत कर सकती है। पारिवारिक शोक की अवस्था में हम एक हो जाते हैं और अपने सामूहिक स्व से बंध जाते हैं। हमारा मन हमारी उन सबसे खूबसूरत बातों के बारे मे सोचने लगता है जिसे हम परिवार कहते हैं। परिवार एक सबसे मूल्यवान संस्था है जहां आदर और सम्मान का दिखावा नहीं किया जाता। यह एक ऐसी जगह है जहां हम अपने दिल से सहज ही करुणा और स्नेह बांटते हैं। यह एक ऐसी अनुभूति है जिसे हमें आपस मे बांटना चाहिए ताकि हम एक बेहतर इंसान बन सकें।


सूरज येंगड़े का यह आर्टिकल इंडियन एक्सप्रेस के नियमित कॉलम ‘Dalitality’ में प्रकाशित हुआ है। हिन्दी अनुवाद- संजय श्रमण

यहां देखिए 200 बहुजन साहित्य की लिस्ट, तुरंत कर सकते हैं बुकिंग

 बहुजन समाज के तमाम नायकों के संघर्ष और बलिदान के कारण दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग में नई चेतना जागी है। बीते तकरीबन दो दशकों में इस वंचित समाज में नई राजनैतिक और धार्मिक चेतना जगी है तो इसमें दलित-बहुजन साहित्य और दलित-बहुजन साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है। ‘दलित दस्तक’ की हमेशा से यह कोशिश रही है कि वह तमाम माध्यमों के जरिए दलित/आदिवासी/पिछड़े समाज या यूं कहें कि बहुजन मूलनिवासी समाज तक तमाम ऐसी सूचनाएं पहुंचाने का काम करें जिससे बहुजन मूलनिवासी समाज में राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का संचार हो। इसी कड़ी में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास द्वारा साल 2020 में बहुजन साहित्य को एक जगह मुहैया कराने के लिए बहुजन बुक्स (www.Bahujanbooks.com) नाम की एक वेबसाइट शुरू की गई थी। यहां पर ही आपको तमाम अलग-अलग प्रकाशकों-लेखकों द्वारा प्रकाशित और लिखित पुस्तकें मिल जाएंगी।

दरअसल बहुजन समाज के लिए जरूरी किताबों के बारे में तमाम पाठकों को पता नहीं होता। किताबों के नाम पता होते हैं तो लेखक या प्रकाशक का नाम पता नहीं होता, जिसकी वजह से उन्हें पुस्तकें ढूंढ़ने में असुविधा होती है और वह चाह कर भी बहुजन आंदोलन की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते हैं। देश के छोटे शहरों और गांवों में रहने वाले अम्बेडकरी-फुले विचारधारा को मानने वाले साथियों को तो और भी दिक्कतें आती हैं। इसलिए हम आपको यहां किताबों के नाम दे रहे हैं। आपको जो पुस्तक चाहिए, उसके नाम पर क्लिक कर सीधे किताब की बुकिंग कर सकते हैं। बिल्कुल कम खर्चे में किताब आपके घर तक स्पीड पोस्ट डाक के जरिए 10 दिनों के भीतर पहुंचाई जाएगी। इस लिस्ट में बाबासाहब डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखी हिन्दी और अंग्रेजी की तमाम पुस्तकें भी हैं। साथ ही तमाम चर्चित दलित, पिछड़े समाज के बुद्धिजीवियों द्वारा लिखित किताबों को भी शामिल किया गया है। आपका कोई सुझाव हो या आप कोई ऐसी पुस्तक मंगवाना चाहते हैं जो इस लिस्ट में नहीं है, या आप हमसे किताबों की कोई सूची साझा करना चाहें तो आपका स्वागत है। आप हमें ई-मेल कर सकते हैं-  Email- bahujanbook@gmail.com

  1. 50 बहुजन नायक
  2.  जनता  (डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रकाशित पत्र का संपादकीय)
  3. बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की धम्मदीक्षा का अविस्मरणीय इतिहास
  4. मैं ओबीसी बोल रहा हूँ
  5. पालि साहित्य का इतिहास
  6. मुक्ति कौन पथे
  7. करिश्माई कांशीराम
  8. मुर्दहिया (तुलसी राम की आत्मकथा का पहला खंड)
  9. मणिकर्णिका (तुलसी राम की आत्मकथा का दूसरा खंड)
  10. दलित एजेंडा 2050
  11. शब्बीरपुरः जलते घर- सुलगते सवाल
  12. चमचा युग
  13. धोबी समाज का संक्षिप्त इतिहास
  14. राष्ट्र की जरूरतः राम मंदिर या सामाजिक अन्यायमुक्त भारत निर्माण
  15. प्रेमचंदः दलित संदर्भ की कहानियां
  16. जूठन- पार्ट 1 ( आत्मकथा- ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  17. जूठन (दूसरा खंड) (आत्मकथा- ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  18. तथागत बुद्धः जीवन और देशनाएं
  19. बहुजन समाज पार्टी एवं संरचनात्मक परिवर्तन (लेखकः डॉ. प्रो. विवेक कुमार)
  20. बुद्ध या कार्ल मार्क्स (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  21. रामा एंड कृष्णा (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  22. कुम्हार जाति का संक्षिप्त इतिहास
  23. शहीद भगत सिंह, जीवन और संदेश
  24. रानाडे, गांधी और जिन्ना (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  25. भारत में जातियां (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  26. महानायक मदारी पासी
  27. गुलामगिरी (लेखक- ज्योतिबा फुले)
  28. बहुजन कैलेंडर (बहुजन आंदोलन से जुड़ी तारीखों का इतिहास)
  29. सामाजिक क्रांति की योद्धाः सावित्री बाई फुले (जीवन- चरित्र)
  30. सर्वश्रेष्ठ दलित कहानियां
  31. डॉ. आंबेडकर और वाल्मीकि समाज
  32. मैं एक कारसेवक था
  33. चमार जाति का गौरवशाली इतिहास
  34. एक था डॉक्टर एक था संत (लेखक- अरुंधति राय)
  35. भगवान बुद्ध धम्म-सार व धम्म-चर्या (लेखक-आनंद श्रीकृष्ण)
  36. संत रविदासः एक समाज सुधारक, चिंतक और दार्शनिक
  37. आधी आबादी का दर्द
  38. राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर
  39. दलितों बिजनेस की ओर बढ़ो
  40. अछूत कौन और कैसे
  41. जातिभेद का उच्छेद (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  42. एजुकेशन डायवर्सिटी
  43. जोहड़ी
  44. धर्मग्रंथों का पुर्नपाठ
  45. पासी समाज का दर्पण
  46. डॉ. बाबा साहब अंबेडकर जीवन चरित (लेखकः धनंजय कीर)
  47. हरिजन से दलित
  48. वाल्मीकि जातिः उद्भव, विकास और वर्तमान समस्याएं
  49. भारशिव नाग एवं उनके वंशज
  50. बहिष्कृत भारत में प्रकाशित डॉ. अम्बेडकर के संपादकीय
  51. बहनजी
  52. गोंड
  53. देशभक्त बिरसा
  54. भीमा कोरेगांव की शौर्यगाथा
  55. बहिष्कृत भारत (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  56. नदियां बहती रहेंगी (कविता संग्रह)
  57. सलाम (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  58. दुसाध जातिः उद्भव और विकास
  59. क्रांति और प्रतिक्रांति
  60. अछूत (आत्मकथा, दया पंवार)
  61. सम्राट अशोक
  62. छप्पर (लेखकः जयप्रकाश कर्दम)
  63. सफाई देवता (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  64. घुसपैठिये (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  65. अपने-अपने पिंजरे– खंड 1 (आत्मकथा- मोहनदास नैमिशराय)
  66. अपने-अपने पिंजरे– खंड 2 (आत्मकथा- मोहनदास नैमिशराय)
  67. छूआछूत
  68. दलित कौड़ी से करोड़पति
  69. दलितों को अनपढ़ रखने की साजिश
  70. सावित्रीबाई फुले की कविताएं (लेखकः सावित्रीबाई फुले)
  71. पूना पैक्ट
  72. राज्य और अल्पसंख्यक
  73. मूकनायक
  74. संत कबीरः विचार एवं दर्शन
  75. दलित ब्राह्मण
  76. सपनों के पंख
  77. भगवान बुद्ध और उनका धम्म (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  78. भारत में छोटी जोतें, समस्या और समाधान (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  79. डॉ. अम्बेडकर के पत्र (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  80. रुपये की समस्या (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  81. शूद्रों की खोज (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  82. BUDDHA OR KARL MARX (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  83. CASTES IN INDIA (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  84. What the Buddha Taught (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  85. ANNIHILATION OF CASTE (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  86. STATE AND MINORITIES (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  87. PAKISTAN OR The PARTITION OF INDIA (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  88. BUDDHA AND HIS DHAMMA (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  89. Dr. Babasaheb Ambedkar Life and Mission [Eng] (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  90. Dalit Assertion and Bahujan Samaj Party (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  91. RANADE, GANDHI AND JINNAH (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  92. Mr. Gandhi and Emancitation of the Untouchables (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  93. Riddle of Rama and Krishna (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  94. The Problem of the Rupee (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  95. The Untouchables (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  96. Problem of Rupees (लेखक- बाबासाहब आंबेडकर)
  97. स्वतंत्रता संग्राम में अछूत जातियों का योगदान
  98. डॉ. आम्बेडकर के प्रेरक भाषण
  99. डॉ. अम्बेडकर जीवन दर्शन
  100. गैर दलितों के भी उद्धारक बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर
  101. डॉ. बी. आर. आम्बेडकर द्वारा राज्यसभा में दिए गए भाषण
  102. बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर और महाप्राण जोगेन्द्र नाथ मंडल
  103. बाबासाहेब द्वारा लड़े गए मुकदमें
  104. दक्खिन टोला
  105. बहुजन
  106. स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ और हिन्दी नवजागरण
  107. दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह
  108. केशर कस्तूरी (लेखकः शिवमूर्ति)
  109. त्रिशूल (लेखकः शिवमूर्ति)
  110. दलित चेतना की कहानियाँ
  111. गोलपिठा (लेखकः नामदेव ढसाल)
  112. स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ संचयिता
  113. बाल्मीकि – वाणी
  114. गवरमेंट ब्राह्मण
  115. आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह 
  116. मेरा बचपन मेरे कन्धों पर (आत्मकथा- श्योराज सिंह बेचैन)
  117. वीरांगना झलकारी बाई (लेखकः मोहनदास नैमिशराय)
  118. सफाई कामगार समुदाय
  119. दलित साहित्य अनुभव, संघर्ष एंव यथार्थ (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  120. अब और नहीं… (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  121. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र
  122. बस्स! बहुत हो चुका (लेखकः ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  123. निर्माण-पुरुष डॉ. अम्बेडकर की संविधान यात्रा
  124. बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन
  125. भारत का संविधान
  126. मुद्राराक्षस संकलित कहानियां
  127. दलितों-पिछड़ों की मुक्ति के सवाल
  128. गाडगे बाबा और उनका मिशन
  129. पिछड़ा वर्ग और डॉ. आंबेडकर
  130. आजादी का आंदोलन और भारतीय मुसलमान
  131. जोतिबा फूले
  132. सवर्ण और विभागवार आरक्षण
  133. अबुआ राज की चुनौतियाँ
  134. सर्वव्यापी आरक्षण की जरूरत
  135. हकमार वर्ग
  136. धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए डाईवर्सिटी ही क्यों
  137. सावित्रीबाई फूले के भाषण
  138. नामकरण संस्कार व 15 हजार नाम
  139. बिपस्सना
  140. जहं जहं चरन परे गौतम के
  141. उत्कोच (लेखकः जयप्रकाश कर्दम)
  142. कांशीराम बहुजनो के नायक
  143. दलित नजर में मीडिया
  144. दलित पत्रकारिता और विमर्श
  145. अक्करमाशी
  146. चिंतन के जनसरोकार
  147. भारतीय दलित साहित्य परिप्रेक्ष्य
  148. भोर के अंधेरे में
  149. चमार की चाय (प्रो. श्योराज सिंह बेचैन)
  150. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन
  151. भारत का संविधान (हिन्दी)
  152. भारत का संविधान (हिन्दी-अंग्रेजी)
  153. गोदान
  154. गाडगे बाबा जीवन दर्शन
  155. लोहिया के विचार
  156. मदर इंडिया (कैथरीन मायो)
  157. महिषासुरः मिथक और परंपराएं
  158. संत रविदास (जीवन और दर्शन)
  159. कबीर ग्रंथावली
  160. भारत का संविधान
  161. बहुजनों बिजनेस की ओर बढ़ो
  162. कबीरः साखी और सबद
  163. जाति का विनाश (संदर्भ टिप्पणियों सहित)
  164. बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन
  165. बिहार की चुनावी राजनीति
  166. बहुजन साहित्य की प्रस्तावना
  167. समकालीन भारत में दलित
  168. DALIT PANTHERS
  169. दलित पैंथर (हिन्दी)
  170. जाति के प्रश्न पर कबीर
  171. महिषासुरः एक जननायक
  172. पेरियारः दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण
  173. मैं भंगी हूं
  174. धर्म बनाम अंधविश्वास
  175. दलित और मानवाधिकार
  176. मेरिट, मंडल और आरक्षण
  177. चमार रेजिमेंट और अनुसूचित जातियों की सेना में भागीदारी
  178. धर्म और विश्वदृष्टि
  179. कांग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिए क्या किया
  180. बौद्ध सभ्यता की खोज
  181. खुसरो भंगी
  182. नंदों और सेनों की उत्पत्ति और इतिहास
  183. महार लोक
  184. इतिहास का मुआयना
  185. सम्राट हिरण्यकश्यप
  186. सिन्धु घाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक
  187. भर/ राजभर साम्राज्य
  188. महाबली बाबा चौहरमल
  189. पंचाल राजवंश का प्राचीन इतिहास
  190. कोसलराज पसेनदि (मांग-मातंग जाति के आदि पुरुष)
  191. छत्रपति शाहूजी महाराज संघर्ष और इतिहास
  192. महाराजा बलि और उनका वंश
 

2025 तक 10 करोड़ लोगों को बौद्ध धर्म से जोड़ेंगे- राजेन्द्र पाल गौतम

 1983 में दसवीं पास करने के बाद राजेन्द्र पाल गौतम आंबेडकरी आंदोलन से जुड़ गए। शुरुआत गरीब बच्चों को पढ़ाने से हुई। 1987 में समता सैनिक दल से जुड़ें, जहां राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष, राष्ट्रीय प्रवक्ता और फिर राष्ट्रीय प्रधान महासचिव बनाए गए। दिल्ली में बाबासाहब के परिनिर्वाण स्थल 26 अलीपुर रोड की कोठी को मुक्त कराने और उसे स्मारक घोषित करवानेके संघर्ष में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक जीवन में उन्होंने हजारों आंदोलनों में हिस्सा लिया।अन्ना आंदोलन के बाद वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए और राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 19 मई 2017 को वह केजरीवाल सरकार में मंत्री बनें और तब से वह लगातार राजनीतिक तौर पर सक्रिय हैं। राजेन्द्र पाल गौतम इन दिनों चर्चा में हैं। एक वजह राजनीतिक है, दूसरी सामाजिक। राजनीतिक वजह यह है कि वह उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत चुनाव के पर्यवेक्षक बनाए गए। जबकि सामाजिक वजह यह है कि उन्होंने“मिशन जय भीम” नाम से एक सामाजिक संगठन बनाया है, जिसके तहत उन्होंने साल 2025 के अशोक विजय दशमी तक 10 करोड़ लोगों को बौद्ध धम्म से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास ने राजेन्द्र पाल गौतम से बात की।

 आप अपनी पार्टी (आम आदमी पार्टी) की ओर से उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत चुनाव के पर्यवेक्षक बनाए गए हैं, क्या वहां दलित वोटों को आम आदमी पार्टी की ओर लाने की जिम्मेदारी आपको दी गई है? – पहले हमलोग भी भावनात्मक रूप से बसपा के साथ जुड़े रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी को मजबूत करने में हमने भी अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय लगाया। बहनजी ने उत्तर प्रदेश में जो काम किया, बहुजन समाज के हर व्यक्ति की तरह मैं भी उसकी प्रशंसा करता हूं। उन्होंने जो स्मारक बनाएं वो हमें भावुक कर देते हैं। वह ऐतिहासिक हैं। लेकिन मैं नहीं जानता कि अब बहनजी की क्या मजबूरी है कि वो सामाजिक मुद्दों पर पहले की तरह प्रखर नहीं हैं। मैं उनका सम्मान करता हूं इसलिए मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगा। समाज उनको अब भी प्यार करता है लेकिन सच्चाई यह भी है कि समाज को उनके हक के लिए लड़ने वाला नेता भी चाहिए। हमें अपनी लड़ाई तो लड़नी है। मैं अपनी पार्टी का जिम्मेदार सिपाही हूं और पार्टी को बढ़ाने के लिए देश भर में जाना है। केवल दलित चेहरे की बात नहीं है और बात वोट बैंक की भी नहीं है। जनता किसी का भी वोट बैंक नहीं होती, जो उनके लिए काम करता है, जनता उससे जुड़ती है।

राजेन्द्र पाल गौतम, एक परिचय  विधायक, सीमापुरी विधानसभा / दिल्ली में जन्में, पले-बढ़े / पेशे से वकील  साल 2014 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए, 2015 में विधायक बने और19 मई 2017 कोमंत्री बनें  वर्तमान में 5 मंत्रालयों का प्रभार- महिला एवं बाल विकास, समाज कल्याण, एससी-एसटी ओबीसी वेलफेयर, गुरुद्वारा चुनाव प्रबंधन, सहकारिता विभाग  आम आदमी पार्टी में नेशनल एक्जिक्युटिव काउंसिल के मेंबर

 यूपी का दलित समाज बसपा की बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन क्यों करे? – देश के अंदर अभी दो तरह के मॉडल हैं। एक मॉडल गुजरात का मॉडल है, जिसमें विपक्ष को खत्म किया जाता है, बोलने वालों के खिलाफ रासुका लगाकर जेल में डाला जाता है और सरकारी एजेंसियों के छापे डलवाए जाते हैं और विपक्ष की आवाज को खत्म किया जाता है। इस गुजरात मॉडल में पूंजीवादियों के हवाले देश की जमीने की जा रही है। यह गुजरात मॉडल देश को बर्बाद कर रहा है। वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी का दिल्ली का मॉडल है, जिसमें गरीब लोगों को ध्यान में रखते हुए योजना बनती है। जैसे “जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना” बनी जिसका फायदा सभी वर्ग के 15 हजार छात्रों को मिला। जो भय का वातावरण पूरे देश में है, और जिस तरह जाति और धर्म की राजनीति है, उसको खत्म कर के काम की राजनीति में आना होगा।

 आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर आरोप है कि वो अगस्त 2008 में जेएनयू में यूथ फॉर इक्वैलिटी फोरम के कार्यक्रम में शामिल हुए थे, जो आरक्षण के खिलाफ रही है। – आरक्षण के बिना कुछ भी होना संभव नहीं है। आरक्षण न होता तो न मैं एमएलए बनता और न मंत्री। आज हम यहां हैं तो बाबासाहब का समाज के लिए किया गए बलिदान और आरक्षण की वजह से हैं। रही बात अरविंद केजरीवाल जी की तो रोहित वेमुला की शहादत के बाद जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान भी उनसे यह सवाल पूछा गया था, उस वक्त उन्होंने साफ कहा था कि हम आरक्षण के समर्थक हैं और जो भी ऐसा कहता है दुष्प्रचार करता है। उन्होंने साफ कहा था कि आरक्षण के बिना इस समाज का विकास संभव नहीं है। हां, उन्होंने एक बात यह जरूर जोड़ी थी कि आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए। जो लोग अब तक गांव के बाहर नहीं निकले हैं, जिन्हें अब तक आरक्षण का हक नहीं मिला है, उन्हें भी इसका लाभ मिलना चाहिए।

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 खबर है कि आपने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से बीते दिनों मुलाकात की थी, क्या यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों में आपलोग सपा से गठबंधन करने जा रहे हैं? – हम लोग उत्तर प्रदेश में अपने संगठन का मजबूती से निर्माण कर रहे हैं। इस जिला पंचायत चुनाव को हम अवसर की तरह देख रहे हैं। इस चुनाव के माध्यम से हम बूथ लेवल पर अपने कार्यकर्ताओं को तैयार कर रहे हैं और अपनी पॉलिसी को गांव-गांव तक पहुंचा रहे हैं। हमारा लक्ष्य 2022 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाना है। इस दमनकारी सरकार के खिलाफ अगर हमें किसी से बात भी करनी पड़ी तो संभवतः हमारा केंद्रीय नेतृत्व उस पर जरूर फैसला लेगा।

 आपके पास दिल्ली सरकार में सोशल वेलफेयर से जुड़े तमाम विभाग हैं, आपकी सरकार के वो पांच काम कौन हैं, जिससे हाशिये के समाज का भला हुआ है? – पहला, जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना है। इसमें गरीब से गरीब बच्चों को जो सिविल सर्विस, डॉक्टर, इंजीनियर जैसे क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उन्हें कोचिंग के माध्यम से इसमें मदद की जा रही है।दूसरा,सीवर की सफाई में लगे लोगों के लिए हमने सीवर सफाई के मशीन मुहैया कराएं और इसका मालिक उन्हीं लोगों को बनाया, जो यह काम करते थे। तीसरा, विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले हमारे विद्यार्थियों को आर्थिक मदद करने के लिए एक योजना बनाई गई है। चौथा, बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के बहुआयामी चरित्र पर तीन चैप्टर लिखवा कर छठवीं, सातवीं और आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल किया। पांचवां, विकलांगों, विधवा महिलाओं और आंगनबाड़ी महिलाओं को मिलने वाली राशि को दोगुना किया गया। ये तो पांच मुख्य काम हैं, इसके अलावे भी हम तमाम अन्य योजनाओं के माध्यम से एससी-एसटी समाज और गरीबों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मुहैया कराने की दिशा में काम कर रहे हैं।

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 आप दिल्ली सरकार में मंत्री हैं, सोशल वेलफेयर के तमाम विभाग आपके पास हैं, वहां से आप वंचित समाज की अधिकार पूर्वक मदद भी कर सकते हैं, ऐसे में आपको “मिशन जय भीम” नाम से सामाजिक संगठन बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई? – दरअसल मेरे दिमाग में एक योजना यह थी कि हमारे समाज के जो रिटायर्ड अधिकारी हैं, जो नौकरी में रहते हुए सरकार के लिए योजनाएं बनाते हैं लेकिन रिटायर होने के बाद समाज को उनका फायदा नहीं मिल पाता। पहले से जोसंगठन हैं और वहां जो पदाधिकारी जमे हैं, उसमें से ज्यादातर किसी का सुझाव नहीं लेना चाहते हैं। ऐसे में मैंने सोचा कि क्यों न सरकारी पदाधिकारियों को एक साथ लेते हुए हमारे समाज के महापुरुषों के विचार को आगे बढ़ाया जाए। जो अधिकारी सरकार के लिए योजनाएं बना सकते हैंवो समाज की भलाई के लिए भी योजनाएं बना सकते हैं। इस संगठन से देश भर से लोग जुड़ रहे हैं और कंट्रीब्यूशन भी दे रहे हैं। मैं इस संगठन में एक मेंटर, एक सलाहकार की हैसियत से जुड़ा हूं। हमने दिल्ली के अंदर एक जमीन ले ली है। यहां हम स्थायी कैडर सेंटर स्थापित करेंगे, जहां हम अपने समाज के महापुरुषों के जीवन-संघर्ष के बारे में पढ़ाएंगे। हम एक महीने, दो महीने का कोर्स डिजाइन करेंगे। डाक्यूमेंट्री फिल्म और किताबों के माध्यम से हमारे बहुजन समाज के युवाओं को उनका इतिहास बताएंगे। साथ ही साथ युवाओं को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने का काम करेंगे। जब अन्य समाज के लोग अपने कॉलेज बना सकते हैं, आर्थिक नीतियां बना सकते हैं तो हम क्यों नहीं बना सकते।हमारा एक लक्ष्य यह भी है कि हम 2025 तक दस करोड़ लोगों को बौद्ध धम्म से जोड़ेंगे।

 आपका आदर्श पुरुष कौन हैं? – सबसे पहले बाबासाहब हैं और फिर मान्यवर कांशीराम जी हैं। हमारे जो भी विचार बने हैं, वो उन्हीं को देख-सुनकर समझा है। एक बात मैंने हमारी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल जी से भी सीखा कि अगर किसी लक्ष्य को लेकर चला जाए तो उसे हासिल किया जा सकता है। बाबासाहब और मान्यवर कांशीराम जी का जो आंदोलन था, जो कारवां था, वो आगे बढ़ना चाहिए, रुकना नहीं चाहिए। उसे चाहे जो चलाए। राजनीति में तो कुर्सियां टेंपरेरी (अस्थाई) है, यह आती-जाती रहती हैं। कोई आज मंत्री और सांसद है, कल नहीं रहेगा। लेकिन जो बाबासाहब और मान्यवर कांशीराम जी का मिशन-मूवमेंट है, वो समाज के लिए बहुत जरूरी है। अगर मूवमेंट छोड़ कर केवल कुर्सी के पीछे लग जाएं, केवल मंत्री बनकर खुश हो जाएं और समाज को कुछ न दें तो हमारे होने और एक मरे हुए व्यक्ति में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। अगर अनुसूचित जाति-जनजाति का हर नेता यह सोच ले कि वो समाज के लिए है, न कि किसी पार्टी के लिए है तो फिर समाज का भला होने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि आरक्षित सीटों पर टिकट तो इसी समाज को मिलेगा।

दलित महिला पत्रकार को मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

भारत की दलित महिलाओं द्वारा संचालित एक डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कामयाबी और पहचान मिली है। इस न्यूज नेटवर्क का नाम है ‘खबर लहरिया’, जिसे उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली कविता देवी ने महिलाओं की एक टीम के साथ मिलकर शुरू किया था। खबर लहरिया स्थानीय भाषाओं में निकलने वाला आठ पन्नों का साप्ताहिक अखबार है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार के 600 गाँवों में 80,000 पाठकों के बीच पहुंचता है। साथ ही वीडियो डाक्यूमेंट्री और वेबसाइट पर खबरें भी प्रकाशित होती हैं। इसी खबर लहरिया के हिस्से में एक विशेष सम्मान आया है।

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 इस न्यूज़ नेटवर्क की शुरुआत, संघर्ष और सफलता की कहानी सुनाने वाली एक डॉक्यूमेंटरी “राइटिंग विद फायर” को अमेरिका के सन-डांस फिल्म फेस्टिवल 2021 में आडियंस और स्पेशल ज्यूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। दलित दस्तक ने बीते छह फरवरी को इस नेटवर्क के बारे में एक खबर भी लगाई गई थी। निश्चित तौर पर यह पूरे वंचित समाज और खासकर वंचितों में भी वंचित महिलाओं के लिए एक शानदार खबर है।

एक तरफ जहां भारत में किसानों, मजदूरों और दलितों कि अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा जा रहा है वहीं दलितों की आवाज को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलना एक बड़ी खबर है। बीते हफ्ते अमेरिका के साल्ट लेक सिटी में आयोजित सनडांस फिल्म फेस्टिवल में ‘वर्ल्ड सिनेमा डॉक्युमेंट्री कॉम्पिटिशन’ सेगमेंट में ‘राइटिंग विद फायर’ की स्क्रीनिंग की गई। इस सेगमेंट में दुनिया भर में उभरती प्रतिभाओं द्वारा बनाई गयी 10 नॉन-फिक्शन फीचर फिल्में शामिल की गयी थी। उन सभी को पछाड़ते हुए खबर लहरिया की डाक्यूमेंट्री अवार्ड जीतने में सफल रही।

खबर लहरिया पर आधारित “राइटिंग विद फायर” की कहानी इस न्यूज़ नेटवर्क की शुरुआत और इसके जमीनी संघर्ष पर आधारित है। इस डॉक्यूमेंटरी में मीरा, सुनीता और श्यामकली जैसी दलित महिला किरदारों को प्रमुखता से उभारा गया है। हम अपने दर्शकों को बता दें कि पूरी तरह दलित महिलाओं द्वारा संचालित खबर लहरिया नेटवर्क उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थानीय बुन्देली और अवधि भाषा में अपना काम कर रहा है। इस नेटवर्क द्वारा मुख्य रूप से जाति आधारित हिंसा व भेदभाव सहित महिला अधिकार के मुद्दों को उठाया जाता है।

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 उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के सुरसा ब्लॉक के एक छोटे से गाँव ‘कुंजनपुरवा’ में जन्मी कविता देवी ने इसकी शुरुआत की थी। फिलहाल कविता तकरीबन तीस दलित महिला रिपोर्टर्स की मदद से यह नेटवर्क चला रही हैं। जानकारी के मुताबिक कविता देवी ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की एकमात्र दलित सदस्य भी हैं। कविता का जीवन अपने आप में एक मिसाल है। कविता की शादी मात्र बारह साल की उम्र में कर दी गयी थी। उन्होंने खुद अपनी मेहनत से पढ़ाई की और एक समाजसेवी संस्था के साथ महिला शिक्षा पर काम करती रहीं। कविता ने अपने इलाके में ‘महिला डाकिया’ नाम के बुन्देली न्यूजलेटर के लिए काम करते हुए पत्रकारिता सीखी। बाद में दिल्ली की समाज सेवी संस्था ‘निरंतर’ की मदद से उन्होंने ‘खबर लहरिया’ की शुरुआत की। लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन कविता नहीं रूकीं।

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खबर लहरिया डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क है जो कथित मुख्यधारा की मीडिया द्वारा उपेक्षित खबरों की खबर लेता है। कविता से बार-बार पूछा जाता है कि आपके नेटवर्क में सिर्फ महिलायें क्यों हैं? इसपर कविता का जवाब होता है कि… पत्रकारिता सहित दुनिया के सभी कामों में पुरुषों का दबदबा है, हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। और अब जब खबर लहरिया और उसकी डाक्यूमेंट्री को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है, साफ है कि कविता और उनकी टीम अपनी जिद्द को पूरा करने में कामयाब रही है।

मल्लिकार्जुन खड़गे बने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष

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 कांग्रेस पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राज्यसभा में अपना नेता चुना है। नेता प्रतिपक्ष श्री गुलाम नवी आजाद का कार्यकाल पूरा होने और राज्यसभा से विदाई के बाद कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे को अपना नेता चुना है। खड़गे दक्षिण भारत से ताल्लुक रखते हैं और कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं। खड़गे एक शानदार वक्ता हैं और लोकसभा में भी कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की तुलना में श्री खड़गे का इस पद हेतु चुनाव भविष्य की राजनीति का संकेत माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी एक साल के भीतर बंगाल सहित दक्षिण के अन्य राज्यों में चुनाव हैं। ऐसे में दलित नेता का नेता प्रतिपक्ष बनना कांग्रेस के लिए लाभकारी हो सकता है। यह भी माना जा रहा है कि किसान आंदोलन के बाद बदली हुई परिस्थितियों में अब किसानों मजदूरों और दलितों-बहुजनों के अधिकार का मुद्दा 2024 के लोकसभा चुनाव में ताकत के साथ उठने वाला है। इस प्रकार दलित समाज से आने वाले एक नेता का राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हेतु चुना जाने से बहुत सारे राजनीतिक संकेत मिल रहे हैं।

 गौरतलब है कि कांग्रेस ने सन् 2014 में खड़गे को लोकसभा में अपना नेता चुना था तब देश की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गयी थी। कांग्रेस के ही शशि थरूर व दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने खड़गे कि बजाय राहुल गांधी को इस पद पर लाने की वकालत की थी। लेकिन बाद में सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी ने इस पद हेतु अनिच्छा जाहिर की तब से माना जा रहा था कि कमलनाथ या विरप्पा मोइली इस पद के लिए चुने जाएंगे। लेकिन श्री खड़गे के चुनाव ने उस समय भी सबको चौंका दिया था।