दुनिया भर में बढ़ा चंद्रशेखर रावण का कद, टाइम मैग्जीन की लिस्ट में हुए शामिल

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 दलित-वंचित समाज के लिए आवाज उठाने और संघर्ष करने वाले चंद्रशेखर आजाद रावण के काम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली है। दुनिया भर में प्रतिष्ठित “टाइम मैगजीन” ने चंद्रशेखर रावण को भविष्य में दुनिया के 100 सबसे ताकतवर लोगों में शुमार किया है। 17 फरवरी को टाइम मैगजीन की वेबसाइट पर “टाइम नेक्स्ट 100” की एक लिस्ट जारी की गई, जिसमें चंद्रशेखर की तस्वीर के साथ उनके बारे में लिखा गया है। टाइम मैग्जीन ने भीम आर्मी प्रमुख और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के बारे में जो लिखा है, हम यहां उसका अनुवाद दे रहे हैं। टाइम ने लिखा है-

 “34 साल के चंद्रशेखर आजाद भारत के भारत के सबसे दबे-कुचले जाति समूह के सदस्य हैं, जिसे दलित कहते हैं। उनके नेतृत्व में भीम आर्मी दलित बच्चों को गरीबी से उबार कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्कूल चलाती है। भीम आर्मी अपने हक की आवाज बुलंद करने के लिए एक और खास रणनीति अपनाती है। वह है जातिवादी दमन के शिकार लोगों को बचाने के लिए दनदानाती हुई मोटरबाइक की रैली लेकर पीड़ित के गाँव में घुस जाना और भेदभाव के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करना।

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सितंबर 2020 में, जब उत्तर प्रदेश में पुलिस ने एक 19 वर्षीय दलित महिला के साथ चार सवर्णों द्वारा सामूहिक बलात्कार की जांच में देरी की, तब आजाद और भीम आर्मी ने न्याय के लिए एक जोरदार अभियान छेड़ दिया। इसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक मांग के कारण आखिरकार आरोपी बलात्कारियों की गिरफ्तारी हुई। (हालांकि वे आरोपों से इनकार करते हैं।)

 आजाद ने हाल ही में कॉर्पोरेट कृषि सुधारों का विरोध कर रहे भारतीय किसानों सहित भारत में चल रहे कई अन्य प्रगतिशील आंदोलनों को भी समर्थन दिया है। उन्हें उम्मीद है कि वे भीम आर्मी की पहुंच और अपनी बढ़ती लोकप्रियता को बैलेट बॉक्स के जरिए राजनीतिक जीत में बदल सकेंगे। इसी सोच के साथ उन्होंने मार्च 2020 में एक राजनीतिक पार्टी की नींव रखी। इस पार्टी की पहली परीक्षा उत्तर प्रदेश में अगले साल 2022 में होने वाली है, जहां हिंदू राष्ट्रवादी तबका राजनीतिक रूप से प्रभावी है। भीम आर्मी के जोशीले रुख के बावजूद, आजाद ने सोशल मीडिया के बेहतरीन उपयोग के जरिए जनता में अपनी पहुँच का करिश्मा दिखाया है। यहां तक कि आजाद की रौबदार मूंछें – कुछ प्रभावशाली जातियों द्वारा एक सामाजिक हैसियत के प्रतीक के रूप में देखी जाती हैं, जो कि प्रतिरोध का ही एक तरीका है।

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 हिंदुस्तान टाइम्स में काम करने वाले एक दलित पत्रकार ध्रुबो ज्योति कहते हैं कि यह धारणा बन गयी है कि दलितों को दबकर जीना चाहिए, लेकिन आजाद और भीम आर्मी ने इस धारणा को खुली चुनौती दी है। इस प्रकार आजाद और भीम आर्मी ने भारत में जातिगत प्रतिरोध की लड़ाई को जाहिर तौर पर मनोवैज्ञानिक रूप से बदल दिया है।” – बिली पेरिग


फोटो क्रेडिट- टाइम मैग्जीन

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