अमेरिकी पत्रिका GQ ने दलित स्कॉलर सूरज येंगड़े को भारत के 25 प्रभावशाली युवाओं में किया शामिल

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अमेरिका की एक प्रतिष्ठित पत्रिका GQ ने भारत के युवा दलित विचारक, लेखक एवं शोधकर्ता डॉक्टर सूरज येंगड़े को 2020 के लिए भारत के 25 सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों में शामिल किया है। यह पत्रिका स्टाइल, मर्दानगी, फैशन और लाइफस्टाइल के मुद्दों पर काम करती है। भारत में GQ  पत्रिका में अभी तक बॉलीवुड स्टार्स, फैशन से जुड़ी हस्तियां, और स्टाइलिश खिलाड़ियों को ही शामिल किया जाता था। लेकिन अब एक दलित चिंतक एवं दार्शनिक को इस लिस्ट में शामिल करना बहुत कुछ बताता है।

यह अपने आप में एक बहुत बड़ी घटना है। अब तक दलित लेखकों और चिंतकों को लेखन, चिंतन या सामाजिक राजनीतिक आंदोलन के लिए पहचान मिलती रही है, लेकिन ऐसे दलित लेखक या चिंतक को अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की समाज की मुख्यधारा की पत्रिकाओं में ‘स्टाइल के प्रतीक’ की तरह शामिल करना बहुत बड़ी बात है। डॉ. सूरज येंगड़े अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रिसर्च का काम कर रहे हैं। वे भारत के दलितों की सामाजिक धार्मिक राजनीतिक एवं आर्थिक समस्याओं पर नए सिद्धांतों का निर्माण करते हुए लगातार लिख रहे हैं।

हाल ही में उनकी एक किताब “कास्ट मैटर्स” भारत की नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चित रहा। इस किताब को हाल ही में द हिंदू द्वारा प्रतिष्ठित “सर्वश्रेष्ठ नॉनफिक्शन बुक्स ऑफ द दशक” सूची में शामिल किया गया था। डॉ. सूरज येंगड़े फिलहाल हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में सीनियर फेलो हैं। वे अफ्रीकी और अफ्रीकी अमेरिकी अध्ययन के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हचिन्स सेंटर में काम करते हैं। उन्होंने चार महाद्वीपों (एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका) में पढ़ाई की है। डॉ सूरज येंगड़े को भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार “साहित्य अकादमी” के लिए नामित किया गया है और वे “डॉ अंबेडकर सामाजिक न्याय पुरस्कार” (कनाडा, 2019) और “रोहित वेमुला मेमोरियल स्कॉलर अवार्ड” (2018) भी हासिल कर चुके हैं।

4000 महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने की चीफ जस्टिस बोबडे के इस्तीफे की मांग, जानिए वजह

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 भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे की न्यायिक सूझ बूझ और टिप्पणियों पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के ठीक पहले भारत की 4000 महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और समूहों ने जस्टिस बोबड़े को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में मांग की गई है कि जस्टिस बोबड़े अदालत में बोले गए अपने शब्द वापस लें, भारत की महिलाओं से माफी मांगें और इस्तीफा दें। दरअसल, जस्टिस बोबड़े ने सुप्रीम कोर्ट में दो विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए कथित रूप से विवादित टिप्पणियाँ की हैं जिन्हें महिलाओं के खिलाफ माना जा रहा है। उन्होंने बलात्कार के केस में सुनवाई करते हुए बलात्कारी से सवाल किया कि क्या आप पीड़िता से विवाह करना चाहेंगे? जस्टिस बोबड़े ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “अगर आप पीड़िता से शादी करना चाहते हैं, तो हम आपकी मदद कर सकते हैं। अगर नहीं तो आपकी नौकरी चली जाएगी और आप जेल जाएंगे। आपने लड़की को बहकाया, उसके साथ बलात्कार किया। हम आपको शादी के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं। हमें बताएं कि क्या आप करेंगे। अन्यथा, आप कहेंगे कि हम आपको उससे शादी करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।” इस टिप्पणी के बाद उन्होंने आरोपी की गिरफ़्तारी पर एक महीने की रोक भी लगा दी है। इस खुले पत्र में भारतीय न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल भी उठाए गए हैं। पत्र में जस्टिस बोबड़े को कहा गया है कि आपके शब्द न्यायपालिका की गरिमा के अनुकूल नहीं हैं। आपके शब्दों से न्यायपालिका के निचले स्तरों सहित पुलिस और प्रशासन को यह संदेश जाता है कि भारत की महिलाओं को न्याय मांगने का अधिकार नहीं है। आपके शब्दों से भारत की महिलायें और लड़कियां अपना मुंह बंद रखने को मजबूर हो जाएंगी और बलात्कारियों के हौसले बढ़ेंगे। इस पत्र ने भारत के नागरिक समाज और मीडिया में भारत के शासन-प्रशासन सहित न्यायपालिका के काम करने के तरीके के बारे में नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवकुमार को मिली जमानत

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 दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवकुमार को आज जमानत मिल गयी है। शिवकुमार एक अन्य दलित मजदूर अधिकार कार्यकर्ता नौदीप कौर के साथ मिलकर काम करते रहे हैं। नौदीप कौर को कुछ दिनों पहले ही जमानत मिली थी। आज शिवकुमार को सोनीपत न्यायालय से सभी तीन मामलों में जमानत मिलना पूरे भारत के बहुजन समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी खबर है। शिवकुमार असल में हरियाणा पंजाब में काम कर रहे मजदूर अधिकार संगठन के अध्यक्ष हैं। इन्हें 16 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। शिवकुमार की गिरफ़्तारी के ठीक एक दिन पहले नौदीप को भी गिरफ्तार किया गया था। बाद में खबरें आती रहीं कि इन दोनों के साथ हिरासत में हिंसा एवं जातिगत अपमान की घटनाएं हुई हैं। इन दोनों की गिरफ़्तारी के बाद पूरे देश के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, किसान आन्दोलनकर्ताओं और नागरिक समाज में इनकी रिहाई की मांग उठ रही थी। गौरतलब है कि इन दोनों की गिरफ़्तारी सोनीपत के कुंडली औद्योगिक क्षेत्र में 12 जनवरी को मजदूरों के खिलाफ कथित अत्याचार के एक मामले में हुई थी। पुलिस ने इनपर हत्या के प्रयास, चोरी और ज़बरन वसूली के आरोप लगाए थे। शिवकुमार के वकील जतीन्द्र कुमार आज सोनीपत न्यायालय में शिवकुमार की तरफ से उपस्थित हुए थे। इन्होंने तीनों मामलों में शिवकुमार की जमानत का आवेदन किया था। नौदीप कौर को इन्हीं मामलों में 26 फरवरी को जमानत मिलने के बाद शिवकुमार की रिहाई के लिए भी मांग तेज हो गयी थी।

मोदी सरकार को झटका, अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने भारत में लोगों की स्वतंत्रता घटने की बात कही

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अमेरिकी संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में लोगों की स्वतंत्रता पहले से कुछ कम हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक ‘स्वतंत्र’ देश से ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ देश में बदल गया है। दरअसल इस रिपोर्ट में ‘पॉलिटिकल फ्रीडम’ और ‘मानवाधिकार’ को लेकर कई देशों में रिसर्च की गई थी। रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि साल 2014 में भारत में सत्तापरिवर्तन के बाद नागरिकों की स्वतंत्रता में गिरावट आई है। इस रिपोर्ट में राजद्रोह के केस का इस्तेमाल, मुस्लिमों पर हमले और लॉकडाउन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र है। ‘डेमोक्रेसी अंडर सीज’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में भारत को 100 में से 67 नंबर दिए गए हैं। जबकि पिछले साल भारत को 100 में से 71 नंबर मिले थे।

फ्रीडम हाउस ने अपनी सलाना रिपोर्ट में कहा है कि, ‘हालांकि भारत में बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार भेदभाव की नीतियां अपनी रही हैं। इस दौरान हिंसा बढ़ी है और मुस्लिम आबादी इसका शिकार हुई है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सरकार में मानवाधिकार संगठनों में दबाव बढ़ा है, लेखकों और पत्रकारों को डराया जा रहा है। कट्टरपंथ से प्रभावित होकर हमले किए जा रहे हैं, जिनमें लिंचिंग भी शामिल हैं और इसका निशाना मुस्लिम बने हैं। रिपोर्ट में आगे लिखा है कि- “2014 के बाद से भारत में मानवाधिकार संगठनों पर दबाव काफी बढ़ गया है। राजद्रोह कानून और मुसलमानों पर हमलों का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि देश में नागरिक स्वतंत्रता के हालत में गिरावट देखी गयी है। गैर सरकारी संगठनों और सरकार के आलोचकों को परेशान किया जा रहा है। रिपोर्ट में मुस्लिम समाज के साथ दलितों और आदिवासी समाज का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मुस्लिम, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर पहुंच गए हैं।”

ऐसा नहीं है कि रिपोर्ट में सिर्फ भारत की सीधी आलोचना है, बल्कि इस आलोचना का आधार भी बताया गया है। रिपोर्ट में भारत के अंक को कम करने के पीछे का कारण सरकार और उसके सहयोगी पार्टियों की ओर से आलोचकों पर शिकंजा कसना बताया गया है।

नागरिक स्वतंत्रता की रेटिंग में सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को 60 में से 33 नंबर दिए गए हैं, पिछले साल भारत को 60 में से 37 नबंर मिले थे। जबकि भारत में राजनीतिक अधिकारों पर दोनों सालों का स्कोर 40 में से 34 है। इस रिपोर्ट में पिछले साल कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए भारत सरकार की ओर से लगाए गए लॉकडाउन की भी चर्चा की गई है और इसको खतरनाक बताया गया है। इसमें लिखा है कि सरकार की ओर से पिछले साल लागू किया गया लॉकडाउन खतरनाक था। इस दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों को पलायन का सामना करना पड़ा। हम अपने दर्शकों को बता दें कि ‘फ्रीडम इन द वर्ल्ड’ राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता पर एक वार्षिक वैश्विक रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में 1 जनवरी 2020 से लेकर 31 दिसंबर 2020 तक 25 बिंदुओं को लेकर 195 देशों और 15 प्रदेशों पर शोध किया गया है।

इस रिपोर्ट के सामने आते ही इस पर तमाम राजनीतिक दलों ने भी प्रतिक्रिया दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस रिपोर्ट को लेकर चिंता जताई है, साथ ही कहा है कि ऐसी स्थिति में केंद्र व सभी राज्यों की सरकारों को भी इसे अति-गंभीरता से लेते हुए विश्व स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को कोई आहत होने से बचाने के लिए सही दिशा में कार्य करना बहुत जरूरी है।

जाति के मुद्दे पर अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर और अमेरिका हिन्दू फॉउण्डेशन आमने-सामने

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 अमेरिका में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मामले में अमेरिका स्थित संगठन अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (एआईसी) भी सामने आ गया है। सेंटर ने मंगलवार 2 फरवरी को कैलिफोर्निया के सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करके एमिकस क्यूरी अर्थात अदालत के कानूनी सहयोगी के रूप में कानूनी प्रक्रिया में शामिल होने का फैसला लिया है। हाल ही में यह केस अमेरिका की संघीय अदालत से कैलिफोर्निया राज्य में शिफ्ट किया गया है जिसपर भेदभाव उन्मूलन के अमेरिकी कानूनों के आधार पर केस चलने वाला है।

कुछ महीनों पहले एक दलित भारतीय इंजीनियर ने अपने ब्राह्मण साथियों पर जातिगत भेदभाव एवं अपमान का केस दायर किया था। इस मामले में कैलिफोर्निया के निष्पक्ष रोजगार और आवास विभाग (डीएफईएच) का आरोप है कि जाति आधारित भेदभाव हिंदुओं की धार्मिक व्यवस्था का अंग है। वहीं अमेरिका में आरएसएस समर्थित हिन्दू संगठन ‘हिन्दू अमेरिका फॉउण्डेशन’ ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया था। हिन्दू अमेरिका फाउंडेशन ने दलील दी है कि कैलिफोर्निया राज्य में दायर यह केस अमेरिका में बसे हिंदुओं की धार्मिक व्यवस्था और धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप है। हिन्दू फॉउण्डेश ने इस हस्तक्षेप को गैरकानूनी बताकर चुनौती देने का फैसला किया है।

कैलिफोर्निया के निष्पक्ष रोजगार और आवास विभाग (डीएफईएच) बनाम सिस्को सिस्टम्स इंक, सुंदर अय्यर और कार्यस्थल में जातिगत भेदभाव के रमण कोम्पेला मामले में 9 मार्च को सुनवाई होनी है। कैलिफोर्निया राज्य का आरोप है कि भारतीय मूल के एक कामगार के साथ जाति के आधार पर हुआ भेदभाव नागरिक अधिकार कानूनों का उल्लंघन है। इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए हार्वर्ड विश्वविद्यालय की मानवशास्त्री प्रोफेसर अजंता सुब्रमण्यन ने कहा है कि इस मामले ने अमेरिकी भारतीयों में बजबजा रही जाति की गंदगी को सबके सामने लाकर रख दिया है। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद अब अमेरिका में बसे कई दलित एवं मानवाधिकार समूह खुलकर सामने आ रहे हैं।

दलितों के पक्ष में अमेरिका में जल्दी बन सकता है कानून

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  9 मार्च 2021 को अमेरिका में एक बहुत ही महत्वपूर्ण केस की सुनवाई होने वाली है। इस केस के फैसले से यह तय होगा कि अमेरिका में जाति आधारित भेदभाव को अमेरिकन कानून के हिसाब से कैसे देखा जाए। यूरोप या अमेरिका में गोरे और काले लोगों के बीच नस्ल के आधार पर होने वाली हिंसा या भेदभाव के बारे में स्पष्ट कानून है। लेकिन दुर्भाग्य से यूरोप और अमेरिका में एक बड़ी संख्या में भारतीयों के होने के बावजूद वहां पर जाति आधारित भेदभाव के बारे में कानून स्पष्ट नहीं है। लेकिन अब इस विषय में एक उम्मीद जाग रही है। कुछ महीनों पहले कैलिफोर्निया में एक भारतीय इंजीनियर ने एक कंपनी (CISCO) के खिलाफ जातिगत आधार पर भेदभाव का आरोप लगाया था। इसके तुरंत बाद अमेरिकन नियामक संस्थाओं ने CISCO नाम की आई टी कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। यह मामला खूब उछला था और अमेेरिका स्थित तमाम अम्बेडकरवादी संगठनों ने इसके खिलाफ और पीड़ित के पक्ष में पुरजोर आवाज उठाई थी।

गौरतलब है कि अमेरिका के एक भारतीय इंजीनियर ने CISCO के सैन जोस स्थित मुख्यालय में काम के दौरान अपने खिलाफ जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। इस बहुजन इंजीनियर ने कहा है कि उसके साथ काम करने वाले ब्राह्मण लोगों ने कार्यस्थल पर जातिगत भेदभाव करते हुए उसका अपमान किया है। यह व्यवहार 1964 के कैलिफोर्निया के कानून के हिसाब से एक अपराध है। इस मामले में कुछ महीनों से कार्रवाई चल रही है।

यहां यह भी गौर करना चाहिए कि पहले यह केस अमेरिका की संघीय अदालत में लगाया गया था, लेकिन अब इसे कैलिफोर्निया की अदालत में दायर किया गया है। इसका कारण यह है कि भेदभाव के मामलों में कैलिफोर्निया राज्य का कानून बहुत सख्त है। अगर इस मामले में अमेरिका में एक सख्त निर्णय आता है तो यह पूरे दुनिया में बसे हुए बहुजन डायस्पोरा के लिए एक बहुत बड़ी खबर होगी। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हो सकता है कि इस मामले में फैसला आने के बाद अमेरिका में जाति आधारित भेदभाव पर कानून बन सकेगा। इसके बाद निश्चित ही इसका परिणाम भारत में रह रहे बहुजनों पर भी पड़ेगा।

लोकसभा और राज्यसभा टीवी का संसद टीवी बनना

लोकसभा और राज्यसभा के अलग-अलग चैनलों को मिलाकर एक संसद टीवी (Sansad Telivision) बनाने का फैसला सैद्धांतिक और धारणात्मक स्तर पर सही है। असलियत ये है कि सन् 2005-06 के दौरान संसद के दोनों सदनों के माननीय सभापति और स्पीकर की आपसी चर्चा में ‘संसद टेलीविजन नेटवर्क’ नाम से भारतीय संसद का अलग टीवी चैनल शुरू करने का विचार सामने आया था। संसद टीवी नेटवर्क का बुनियादी विचार तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का था। इस विचार पर माननीय स्पीकर और माननीय सभापति के बीच शुरुआती सहमति बनी थी। उस वक़्त राज्यसभा के सभापति भैरो सिंह शेखावत थे।
 उन दिनों दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के एक पत्रकार के रूप में मैं राज्यसभा की कार्यवाही और अन्य संसदीय मामलों को ‘कवर’ करता था। यदा-कदा दोनों सदनों के पीठासीन प्रमुखों के अलावा उनके कार्यालय से सम्बद्ध उच्चाधिकारियों से मुलाकात होती रहती थी। जहां तक हमारी जानकारी है, उन दिनों ये सोचा गया था कि दोनो सदनों की कार्यवाही अलग-अलग फ्रिक्वेंसी पर प्रसारित होगी और चर्चा व विमर्श के अन्य कार्यक्रम साझा होंगे। लेकिन कुछ समय बाद राज्यसभा की तरफ से उक्त प्रस्ताव को लेकर कुछ समस्या आने लगी। समस्या बढ़ती गयी, जिसमें राजनीति का पहलू अहम् था। फिर एक दिन संसद टीवी नेटवर्क का वह प्रस्ताव धराशायी हो गया। तब स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा टीवी शुरू करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी और सदन की जीपीसी से चर्चा के बाद चैनल लांच करने का फैसला हुआ। इस तरह सन् 2006 में लोकसभा टीवी शुरू हो गया।
 राज्यसभा का अलग चैनल लांच करने के फैसले का ऐलान 2010 मे हुआ और 2011 में वह ‘लांच’ हो गया। बेहतर रहता अगर लोकसभा के पहले से चल रहे चैनल और राज्यसभा की नयी पहल को मिलाकर संसद टेलीविजन नेटवर्क नाम से दोनो सदनों का साझा चैनल ‘रिलांच’ होता! पर ऐसा संभव नहीं हुआ। संभवतः इसके लिए ठीक से पहल नहीं हो पाई। इसलिए आज संसद टेलीविजन नेटवर्क नाम से अगर एकीकृत टीवी का पुनर्गठन किया गया है तो यह धारणा और विचार के स्तर पर सही कदम है।
दुनिया के अनेक विकसित लोकतांत्रिक देशों की संसद के पास तो अपने स्वतंत्र टीवी नेटवर्क तक नही हैं। ज्यादातर मुल्कों की संसद की कार्यवाही वहां के लोक प्रसारक (पब्लिक ब्राडकास्टर) ही प्रसारित करते हैं। भारत की संसद का अपना टीवी नेटवर्क है तो यह महत्वपूर्ण बात है पर दोनों सदनों के दो अलग-अलग चैनल रहें, इसे धारणा और व्यावहारिकता के स्तर पर जायज नहीं ठहराया जा सकता।
अब आते हैं, दोनों चैनलों पर। लोकसभा टीवी पहले से जारी था और राज्यसभा चैनल उस के चार-पांच साल बाद शुरू हुआ। पर कम समय में ही वह ज्यादा लोकप्रिय होता गया। उसके कार्यक्रमों की गुणवत्ता ने उसे लोकप्रिय बनाया। बाद के दिनों में वहां भी समस्याएं पैदा होने लगी थीं और उसका असर कंटेंट पर दिखता था। लेकिन अपने कंटेंट और रूप-रंग के स्तर पर वह लोकसभा टीवी के मुकाबले हमेशा बेहतर माना जाता रहा। हालांकि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा टीवी के भी कुछ वीकली कार्यक्रम बहुत प्रशंसित रहे, जो अब नहीं प्रसारित होते हैं।
 पुनर्गठित संसद टीवी के सामने नयी चुनौती होगी कि वह संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही के लाइव कवरेज़ के अपने बुनियादी दायित्व के अलावा अन्य कार्यक्रमों का संयोजन कैसे करे और गुणवत्ता का स्तर कैसे हासिल करे। हमारे समाज, राजनीति, वैचारिकी और संसदीय लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रता, सहिष्णुता और विविधता जैसे मूल्यों की रोशनी में अपने कार्यक्रमों को कैसे आकार दे। इन मूल्यों को कैसे अभिव्यक्ति दे! आज के राजनीतिक माहौल में यह बहुत चुनौतीपूर्ण काम होगा। एक संसदीय टीवी नेटवर्क को किसी सरकार या किसी एक राजनीतिक शक्ति का मंच नही होना चाहिए। उसे भारतीय संसद यानी जनता और राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली लोकतांत्रिकता का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, ऐसी लोकतांत्रिकता जिसमें स्वतंत्रता, सहिष्णुता और विचारों की विविधता के तमाम खूबसूरत रंग शामिल हों!

दलित एक्टिविस्ट शिवकुमार को बचा लीजिए

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दिशा रवि को जमानत मिली हम सबने स्वागत किया, लेकिन दलित एक्टिविस्ट शिवकुमार के बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है। मुझे यह कहते हुए बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि इस देश में दलित की जान सबसे सस्ती है और इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। सारे सो कॉल्ड लिबरल-प्रोग्रेसिव पत्रकार हों या फिर एक्टिविस्ट अमूमन सभी झूठे और मक्कार हैं। उन्हें दलित-आदिवासी से बिल्कुल भी मतलब नहीं है।
नवदीप कौर का मामला अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी नहीं उठाती तो शायद ही कोई उनको भी जान पाता! जैसी चुप्पी शिवकुमार के मामले में है ठीक वैसी ही चु्प्पी नवदीप के मामले में भी दिखती और इसका कारण साफ है कि दोनों उस समाज से आते हैं जो वंचित और शोषित हैं, जिन्हें समाज वॉयसलेस कहता है और अगर वो कुछ बोलना चाहते हैं तो उन्हें इसी तरह की सजा दी जाती है।
मेडिकल रिपोर्ट से साफ़ है कि दलित एक्टिविस्ट शिवकुमार को भयानक यातनाएं दी गई हैं, लेकिन आप सभी सो कॉल्ड लिबरल-प्रोग्रेसिव लोग मुबारक़ के काबिल हैं, क्योंकि बड़ी चालाकी से इस मामले पर फिर से आप लोगों ने चुप्पी साध ली है। शायद इन्हें एक और रोहित वेमुला का इंतजार है जिसपर वे घड़ियाली आंसूं बहा सके।
 दलित एक्टिविस्ट शिवकुमार बेहद ही गरीब परिवार से आते हैं। उनके पिता चौकीदार हैं जिनका वेतन सात हजार रुपया प्रति महीना है। शिवकुमार की एक आंख कक्षा 10 से ही खराब है। मां 23 साल से मानसिक तौर पर बीमार हैं। शिवकुमार के पास ना जमीन है और ना ही कोई सामाजिक संपत्ति।
वरिष्ठ पत्रकार Anil Chamadia के फेसबुक वॉल से

दलित कार्यकर्ताओं के समर्थन में उतरी गुरुद्वारा प्रबंधन समिति

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 हाल ही में अलग-अलग आरोपों में हिरासत में ली गई दलित मजदूर मानवाधिकार कार्यकर्ता नवदीप कौर रिहा हुई हैं। पूरे देश के मानवाधिकार एवं दलित अधिकार कार्यकर्ता इस बात की खुशी मना रहे हैं। इसी बीच दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीएमसी) ने रविवार (28 फरवरी) को रकाबगंज गुरुद्वारा परिसर में मजदूर व दलित अधिकार कार्यकर्ता नवदीप कौर को सम्मानित किया। कमेटी ने यह भी घोषणा की कि वे नवदीप कौर के हक में कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे। नवदीप कौर ने रविवार को दिल्ली दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों से मुलाकात की। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा जमानत पर करनाल जेल से बाहर चलने के 72 घंटे बाद कौर को ‘सिरोपा’ देकर से सम्मानित किया गया। इसी मौके पर नवदीप कौर ने अपने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए घोषणा की कि मेरा संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि मेरे साथ अन्याय हुआ है और मैं न्याय के लिए लड़ाई लडूंगी। गौरतलब है कि नवदीप कौर और एक अन्य दलित कार्यकर्ता शिवकुमार के साथ कथित तौर पर पुलिस की हिरासत में यौन हिंसा एवं हिंसा के आरोप लगे हैं। कुछ दिन पहले ही कुमार शिव कुमार के मेडिकल रिकॉर्ड भी सामने आए है जिसमें उनकी शरीर में कई फ्रैक्चर्स की बात सामने आई है। इन निराश करने वाली खबरों के बाद सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा दलितों एवं मजदूरों के पक्ष में खुलकर सामने आना एक बड़ी घटना है। यह खबर एक खास मायने में और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक तरफ जाट समुदाय और दलित पंचायतें एक दूसरे के समर्थन में उतर आई हैं। दूसरी तरफ सिखों की धार्मिक संस्था द्वारा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की कानूनी मदद की घोषणा करना एक बड़े बदलाव की दिशा में पहला कदम नजर आता है। इस प्रकार ना केवल किसान आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ेगा बल्कि दलितों मजदूरों के मानवाधिकार के हक में उठ रही आवाजें भी मजबूत होंगी।

उन्नाव कांड में उठी सीबीआई जांच की मांग, भीम आर्मी सहित राहुल प्रियंका उतरे समर्थन में

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उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में 17 फरवरी को दो दलित नाबालिग लड़कियों की मौत के बाद बाद उनके परिवार ने अब सीबीआई जांच की मांग की है। पुलिस कह रही है कि बालिकाओं के शवों पर चोट या संघर्ष के निशान नहीं हैं इसलिए यौन उत्पीड़न या बलात्कार की कोई संभावना नहीं है। लेकिन पुलिस के इस कथन से बालिकाओं का परिवार सहमत नहीं है और उन्होंने बालिकाओं को दफनाने की पुलिस की सलाह को ठुकरा दिया है। परिवारजन चाहते हैं कि घटना की हर दृष्टिकोण से उचित जांच होने के बाद ही अंतिम क्रिया की जाएगी। गौरतलब है कि उन्नाव में बुधवार 16 फरवरी की देर रात एक खेत में तीन नाबालिग दलित लड़कियां बेहोशी की हालत में मिलीं। इनमें से दो को अस्पताल ले जाते ही मृत घोषित कर दिया गया, जबकि तीसरी बालिका गंभीर हालत में कानपुर के एक अस्पताल में भर्ती है। घटना के तुरंत बाद यूपी पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और सबूत छिपाने का मामला दर्ज कर छह लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। लड़कियों के परिजनों ने कहा कि वे यूपी पुलिस द्वारा की गई जांच से संतुष्ट नहीं हैं। एक बालिका की माँ ने कहा है कि “हमें यकीन है कि लड़कियों की हत्या कर दी गई इस क्षेत्र में यह आम बात है।” सैकड़ों ग्रामीणों ने कहा कि वे पीड़ितों को दफनाने की अनुमति नहीं देंगे और जब पुलिस ने जेसीबी मशीनों के साथ कब्र खोदना शुरू किया तब गाँववालों ने इसका विरोध किया। इस घटना ने प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व के खिलाफ गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब इस घटना ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस के पूर्व प्रमुख राहुल गांधी ने ट्वीट किया है कि उतरप्रदेश सरकार न केवल दलित समाज को कुचल रही है बल्कि महिलाओं के सम्मान और मानवाधिकारों को भी कुचल रही है। भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद ने मांग की कि जिंदा लड़की को बेहतर इलाज के लिए एम्स पहुंचाया जाए।

बीजेपी और कांग्रेस ने दलित, आदिवासी, ओबीसी महापुरुषों की उपेक्षा की है: सुश्री मायावती

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कल 27 फरवरी को देश भर में धूमधाम से संत रैदास की जयंती मनाई गई। भारत के करोड़ों बहुजनों ने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से अपने संत को श्रद्धांजलि दी। इसी दौरान एक मजेदार घटना भी पूरे देश में घटी। सवर्ण हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली और तथाकथित मुख्यधारा की राजनीति करने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस बार संत रैदास को बड़े पैमाने पर याद किया। वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में वाराणसी में संत रैदास की जयंती पर, संत रैदास की जन्मस्थली पर सभी प्रमुख पार्टियों के प्रतिनिधि पहुंचे। इन प्रतिनिधियों ने वहां पर प्रार्थना की और भाषण दिए। अपने भाषणों में उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वे खुद संत रविदास के सबसे बड़े भक्त हैं। इस अवसर पर हजारों लोग संत रैदास के मंदिर में इकट्ठा हुए थे, और अन्य करोड़ों बहुजन इस स्थान पर होने वाले कार्यक्रम पर नजरें गड़ाए हुए थे। ऐसे में मौका था कि तथाकथित मुख्यधारा की सभी पार्टियां भारत के बहुजनों को संदेश दे सकें। इस मौके का फायदा उठाते हुए बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी इत्यादि सभी प्रमुख पार्टियों ने रैदास जयंती पर संत रैदास के मंदिर में अपने-अपने प्रतिनिधि भेजें। इस बात पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए बहुजन समाज पार्टी की मुखिया सुश्री मायावती ने बीजेपी और कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है। सुश्री मायावती ने आरोप लगाया है कि जब चुनाव का समय होता है या फिर जब भी सवर्णों की राजनीति अस्थिर होती है अभी इन लोगों को बहुजन संतों की याद आती है। अन्य समय में संत कबीर या संत रैदास या गौतम बुद्ध या बाबासाहेब अंबेडकर को कोई सम्मान नहीं दिया जाता है। उन्होंने ट्वीट करते हुए संत रविदास को श्रद्धांजलि देते हुए यह बात कही। सुश्री मायावती ने ट्वीट करते हुए कहा कि मैं अपना पूरा जीवन इंसान कोई इंसान बनाने की कोशिश में बिता दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा ने हमेशा समाज के दलित आदिवासी और ओबीसी वर्गों में जन्मे संतो और महापुरुषों की उपेक्षा की है, और इन्हें सम्मान देने की वजह उनका अपमान ही किया है। उन्होंने अपने सरकार के कार्यकाल में संत रैदास के सम्मान में किए गए कार्यों की याद दिलाते हुए कहा कि मैंने संत रैदास के नाम पर भदोही जिले का नाम भी रखा था लेकिन पिछली समाजवादी पार्टी की सरकार ने जातिवादी मानसिकता के कारण वह नाम फिर से बदल दिया। आगे उन्होंने बताया कि प्रदेश में चार बार बनी बसपा सरकार के तहत संत रैदास के सपनों को साकार करने के लिए काफी प्रयास किए गए थे। संत रैदास के सम्मान में किये गए उनके काम किसी से छिपे नहीं रहे। उन्होंने यह भी बताया है कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें उनके लिए मार्ग पर चलते हुए समाज और देश का भला करती है तो यह बेहतर होगा। बहन मायावती ने यह वादा भी किया कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वो फिर से बदल कर का संत रविदास नगर कर दिया जाएगा।
  • टीम दलित दस्तक

“दिल्ली में धूमधाम से मनाई गई महापुरुषों की जयंती”

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नई दिल्ली। सामाजिक संगठन ‘मिशन जय भीम’ और महारानी दुर्गावती सेवा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में बहुजन समाज में जन्मे महापुरुषों की जयंती धूमधाम से मनाई गई. दिल्ली सरकार के कबिनेट मंत्री और मिशन जय भीम के राष्ट्रीय संरक्षक श्री राजेंद्र पाल गौतम के आह्वान पर उनके राजनिवास मार्ग स्थित निवास पर तिलका मांझी, छत्रपति शिवाजी महाराज, संत गाडगे महाराज, संत गुरु रविदास और सर छोटूराम की जयंती संयुक्त रूप से मनाई गई. जयंती समारोह में दिल्ली एनसीआर के अम्बेडकरवादी समुदाय के अलावा देश के विभिन्न राज्यों से आकर दिल्ली में बसे आदिवासी समुदाय के सैंकड़ो लोग भी शामिल हुए. अपने संबोधन में वक्ताओं ने कहा की समय आ गया है कि उंच नीच और गैर बराबरी पर आधारित शोषणकारी जाति व्यवस्था को त्यागकर शिक्षा के आधार पर अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग होना पड़ेगा. आदिवासी नेताओं ने चिंता जताते हुए कहा कि दिल्ली में अनुसूचित जनजाति अधिकारिक रूप से मौजूद नहीं है लेकिन देश के कोने कोने से आये आदिवासी दिल्ली में बसे हुए हैं और इस कारण सरकारी योजनाओ का लाभ इन वर्गों को नहीं मिल पाता.
श्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि देश की असल उन्नति तभी सम्भव है जब देश के सभी वर्गों का बहुमुखी विकास हो और सभी को प्रगति के समान अवसर प्राप्त हों. उन्होंने कहा की मंत्रिपद आते जाते रहते हैं लेकिन हमारी सफलता का पैमाना ये होना चाहिए की मंत्री रहते हुए हम समाज के लिए क्या कर पाए. रविदास जयंती के अवसर पर आयोजित इस संयुक्त जयंती समारोह में सभी महापुरुषों के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई और वक्ताओं ने इनके जीवन संघर्षों से अवगत कराया. कार्यक्रम में मिशन जयभीम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष चंद आर्या, राष्ट्रीय महासचिव बी पी निगम, राष्ट्रीय संघठन मंत्री पुश्पांकर देव भी मौजूद रहे.

देवनागरी लिपि बौद्ध लिपि है: झारखंड में बौद्ध मूर्तियों से मिले संकेत

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भारत की महान बौद्ध विरासत बार-बार सामने आती रहती है। बौद्ध धर्म भारत का पहला वैश्विक धर्म रहा है जिसने भारत में सभ्यता और ज्ञान-विज्ञान का विकास किया था। इस बात के सबूत पत्थरों की मूर्तियों, शिलालेखों और अन्य प्राचीन साहित्यिक रिकार्ड्स में देखने को मिलते हैं। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कई सदियों बाद ब्राह्मण धर्म का भारत में व्यापक प्रसार हुआ। ब्राह्मण धर्म द्वारा भारत के उपनिवेशीकरण के बाद भारत में श्रमण बौद्ध एवं श्रमण जैन धर्म का पतन हुआ। इसके बाद भारत के श्रमण धर्मों की भाषा और साहित्य को ब्राह्मणों द्वारा बदल दिया गया। लेकिन चूंकि श्रमणों की पत्थर की मूर्तियाँ, शिलालेख, मंदिर एवं मठ पूरी तरह से मिटाए नहीं जा सके। इसीलिए में जब भी कोई पुरातात्विक खोज होती है तब तब भारत की महान बौद्ध विरासत की पूंजी धरती और इतिहास का सीना चीरकर निकाल आती है।

हाल ही में झारखंड में हजारीबाग़ जिले के एक पहाड़ी इलाके में एक गाँव में एक बौद्ध मठ का पता चला है। इससे भारत में नागरी और देवनागी लिपि के जन्म और विकास के बारे में एक नई जानकारी सामने आई है। इस खोज से पता चलता है कि नागरी एवं देवनागरी लिपि का संबंध बौद्ध धर्म से है। इस गाँव में एक पुराने टीले के नीचे दबे 900 साल पुराने बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं। इसके दो महीने पहले इसी जगह से लगभग 100 मीटर की दूरी पर एक अन्य बौद्ध मंदिर की खोज हुई थी। इस तरह दो मेहीने के भीतर इस गाँव में यह दूसरी बड़ी खोज है। पूरे भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तक इस तरह की खोजें हो रही हैं।

पिछले साल 2020 में भी खुदाई के दौरान इसी इलाके में चार-पांच शब्दों की एक स्क्रिप्ट मिली थी। इस ऐतिहासिक पांडुलिपि को समझने के लिए इसका सैंपल पैलियोग्राफिक डेटिंग के लिए मैसूर भेजा गया था। वहाँ यह पता चला था कि यह एक नागरी लिपि में लिखी गई पंक्तियाँ है जो कि 10 वीं से 12 वीं सदी की हैं। यह नागरी लिपि असल में आज मौजूद देवनागरी लिपि का की माँ है। इससे पता चलता है कि नागरी और देवनागरी दोनों बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई हैं। हजारीबाग़ में अभी जो भगवती तारा की मूर्ति मिली है उसपर भी नागरी लिपि अंकित है। इससे पुनः स्पष्ट होता है कि आज की देवनागरी लिपि असल में बौद्धों द्वारा विकसित की गई नागरी लिपि से जन्मी है।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक असल में भारत का चप्पा चप्पा बौद्ध विरासत से भरा हुआ है। जहां कहीं भी ऐतिहासिक, व्यापारिक  या धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण कोई नगर या स्थान मिलता है तो उसका संबंध बौद्ध धर्म और परंपरा से निकाल ही आता है। ठीक यही खोजें अयोध्या और मथुरा से भी आ रही हैं। हाल ही में अयोध्या में खुदाई के दौरान बौद्ध अवशेष मिले थे और इसके पहले भी बीते कई दशकों में केवल मथुरा इलाके में पाँच हजार छोटी बड़ी बुद्ध की मूर्तियाँ मिलीं हैं। इस तरह आज नजर आने वाले सभी मंदिर या तीर्थ स्थल असल में बौद्ध स्थल रहे हैं।

इसी कड़ी में पिछले दिनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पटना शाखा इस स्थान पर खुदाई कर रही थी। इस टीम ने जिला मुख्यालय हजारीबाग से करीब 12 किमी दूर सीतागढ़ी पहाड़ियों के जुलजुल पहाड़ के पास बुरहानी गांव खुदाई की। इस खुदाई में बौद्ध देवी तारा और भगवान बुद्ध की दस पत्थर की मूर्तियाँ मिलीं हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों ने कहा है कि, 25 फरवरी को उन्हें एक मूर्ति मिली जो शैव देवी महेश्वरी की तरह नजर आती है। इस मूर्ति में एक कुंडलित मुकुट और चक्र साथ साथ नजर आते हैं।

इसके बारे में अनुमान लगाया जा रहा है कि यह असल में प्राचीन बौद्ध देवी भगवती तारा को बाद में वैदिक ब्राह्मण धर्म द्वारा महेश्वरी बनाकर अपने धर्म में मिला लिए जाने का संकेत है। यह कोई नई बात नहीं है, इसी तरह पूरे भारत में बौद्ध देवी देवताओं को ही नहीं बल्कि भगवान बुद्ध की मूर्तियों को भी थोड़ी तोड़ फोड़ करके रूप रंग बदलकर दूसरे धर्म के देवी देवता बना दिया जाता है। पूरे भारत में ऐसे लाखों मूर्तियाँ हैं जो मूल रूप से भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ हैं लेकिन उन्हे किसी अन्य देवी या देवता की मूर्ति की तरह दिखाया जाता है।

पुरातत्वविदों ने कहा कि यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मठ सारनाथ से 10 किमी दूर वाराणसी के पुराने मार्ग पर स्थित है। इस क्षेत्र में भगवान बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया था जिसे कि धम्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है। पुरातत्वविदों का कहना है कि बौद्ध देवता तारा की मूर्तियों की उपस्थिति इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की एक ताकतवर शाखा  वज्रयान की मौजूदगी का संकेत देती है। इस बात कि संभावना है कि यहाँ पर वज्रयान का प्रसार हुआ हो। यहाँ यह भी नोट करना चाहिए कि झारखंड, ओरिसा, बंगाल, आसाम आदि में वज्रयान एक शक्तिशाली बौद्ध संप्रदाय था जिसमें देवियों की आराधना पर जोर दिया जाता था। इस संप्रदाय में भगवान बुद्ध के स्त्री रूप तारा को सर्वोच्च ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

कई विद्वान कहते हैं कि इसी वज्रयान से ब्राह्मण धर्म के तंत्र एवं तांत्रिक संप्रदायों का जन्म हुआ है। इस प्रकार कई सबूत मिलते हैं जो बताते हैं कि योग का जन्म बौद्ध योगाचार संप्रदाय में एवं तंत्र का जन्म वजरायां संप्रदाय में हुआ है। झारखंड के हजारीबाग़ में मिले बौद्ध मंदिर और बौद्ध मठ के प्रमाण बहुत गहराई से यह सिद्ध कर रहे हैं कि भारत के इतिहास को बौद्ध इतिहास की तरह देखा चाहिए। पुरातत्व विभाग पटना के पुरातत्वविद् नीरज कुमार मिश्र ने बताया कि पिछले साल दिसंबर में उन्हें जुलजुल पहाड़ के पूर्वी हिस्से में एक कृषि भूमि के पास तीन कमरों के साथ एक बौद्ध मंदिर मिला था।

यहाँ पर मिले केंद्रीय मंदिर में तारा की मूर्ति थी और दो अन्य धार्मिक स्थलों में बुद्ध की मूर्ति स्थापित थी। उन्होंने कहा, “पहले, संदर्भ स्पष्ट नहीं था, उनका ध्यान फिर दूसरे टीले पर चला गया और 31 जनवरी को खुदाई शुरू कर दी गई । मिश्रा ने कहा, “हमने जुलजुल पहाड़ तलहटी के पास एक टीले पर ध्यान केंद्रित किया जहां हमें एक बौद्ध मठ और उसके साथ एक मंदिर के अवशेष मिले जहां किनारों पर कमरा बना है और साथ ही एक खुला आंगन भी नजर आता है। इस स्थान पर वरद मुद्रा में बौद्ध देवी तारा की चार मूर्तियां और भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की छह मूर्तियां मिलीं हैं। ये मुद्रा भगवान बुद्ध के ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है जिसमें कि पृथ्वी की ओर दाहिने हाथ की पांच उंगलिया नजर आती हैं।

यह एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है क्योंकि देवी तारा की मूर्तियों का मतलब है कि यह बौद्ध धर्म के वज्रयाना संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वज्रयान तांत्रिक बौद्ध धर्म का एक रूप है, जो भारत में 6 वीं से 11 वीं शताब्दी तक फला-फूला। मिश्रा ने कहा कि पुरातत्व विभाग ने अभी तक इन संरचनाओं की वैज्ञानिक कार्बन डेटिंग नहीं की है, लेकिन यह पहले के निष्कर्षों के आधार पर यह पाल राजवंश के समय के अवशेष नजर आते हैं।

ये सभी बातें भारत में बहुजनों के लिए विशेष रूप से महत्व रखती हैं। बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपनी जीवन भर की खोज के आधार पर सिद्ध किया था कि भारत का इतिहास असल में बौद्ध और ब्राह्मण धर्म के संघर्ष का इतिहास मात्र है। प्राचीन काल में जब भारत सोने की चिड़िया कहलाता था तब असल में वह बौद्ध भारत था। इसी दौरान तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशीला इत्यादि शिक्षा केंद्रों कि शुरुआत हुई थी और भारत इस दौर में विषवगुरु बना था। उस बौद्ध भारत में दुनिया भर से लोग शिक्षा और ज्ञान हासिल करने आते थे। चीन, यूनान, और अरब से भारत आकार बौद्ध धर्म की शिक्षा लेने वाले यात्रियों की कहानियाँ दुनिया भर में मशहूर हैं।

आज हमारे बहुजन भाई बहनों को, विशेष रूप से ओबीसी और अनुसूचित जाति के लोगों को अपनी बौद्ध विरासत को पहचानकर भगवान बुद्ध के शांति और भाईचारे के संदेश को अपनाना चाहिए। इस तरह अगर हम अपनी वास्तविक भारतीय विरासत को अंगीकार करते हैं तो यह भविष्य में एक सुखी, समृद्ध और शांतिपूर्ण भारत के निर्माण की दिशा में एक आश्वासन होगा।

आभार TheIndianEXPRESS

भारत में बनेगा बौद्ध धर्म के सभी पाठ्यक्रमों का डाटाबेस

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भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में बौद्ध धर्म से संबंधित सभी पाठ्यक्रमों का एक डाटाबेस तैयार करने की योजना बन रही है। भारत का शिक्षा मंत्रालय देश में सभी विश्वविद्यालयों से जानकारी जुटाकर ऐसा डाटाबेस तैयार करने जा रहा है। इस डाटाबेस में बौद्ध धर्म के सभी विद्वानों, पाली भाषा के विद्वानों, पूर्व छात्रों और वार्षिक सम्मेलन और सहित विश्वविद्यालय द्वारा बौद्ध धर्म पर आयोजित सेमिनार, कॉन्फ्रेंस, कांक्लेव इत्यादि का पूरा लेखा-जोखा रखा जाएगा। इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग मैं सभी विश्वविद्यालय में उसे कहा है कि वह बौद्ध धर्म से संबंधित अपने सभी कार्यक्रमों एवं पाठ्यक्रमों के बारे में जरूरी जानकारी डेटाबेस के लिए भेजें।

यूजीसी द्वारा सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को एक पत्र लिखा गया है। इस पत्र में यूजीसी के सचिव रजनीश जैन ने अन्य जानकारियों के अलावा पाठ्यक्रम का नाम, छात्रों की संख्या, शोध विद्वानों की संख्या, इत्यादि का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करना जरूरी होगा। यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से यह भी कहा गया है कि वे इस पत्र के जुड़े ऑनलाइन फॉर्म के माध्यम से अपने विश्वविद्यालय में प्रस्तावित ऐसे पाठ्यक्रमों की जानकारी भी दें। इस प्रकार ना केवल अभी तक चलाए जा रहे बौद्ध धर्म से संबंधित पाठ्यक्रमों के बारे में, बल्कि भविष्य में आने वाले ऐसे पाठ्यक्रमों की जानकारी भी शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालयों से मांगी है।

इस योजना के बारे में कहा जा रहा है कि भारत सरकार विभिन्न प्रयासों के माध्यम से बौद्ध संस्कृति से जुड़ी परंपराओं को प्रकाश में लाना चाहती है। हालांकि इस बात की भी संभावना है कि इस प्रकार जानकारी जुटाने की पहल भारत में बढ़ रहे बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव के डर के कारण की जा रही हो। बीजेपी एवं आरएसएस की विचारधारा से हटकर  अगर कहीं किसी विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जा रही हो तो उसकी जानकारी सरकार को देने के लिए संभवत यह योजना बनाई गई है।

आभार NDTV Education

रैदास जयंती की सोशल इंजीनियरिंग और किसान आंदोलन

 जब भी हम किसान के बारे में बात करते हैं तो पंजाब में इसका मतलब जाट सिक्ख होता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि पंजाब में ज्यादातर किसान इसी समुदाय से आते हैं। इस जाट सिख की तस्वीर का संत रैदास से कोई सीधा रिश्ता नजर नहीं आता था। हालांकि जाट सिख भी संत रैदास में श्रद्धा रखते हैं लेकिन फिर भी जाटों और रविदासिया समाज में कुछ दूरियाँ बनी हुई हैं। अभी तक जाट सिख बड़े पैमाने पर संत रैदास की जयंती मनाने के लिए भी आगे नहीं आ रहे थे। सामाजिक भेदभाव और छुआछूत के कारण जाट सिख समुदाय के लोग रविदासिया समाज के सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पा रहे थे।

लेकिन हाल ही में मजबूत हो रहे किसान आंदोलन में स्थिति बदल गई है और अब जाट सिख समुदाय भी संत रैदास के प्रति अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन कर रहा है। यह भारत के आंतरिक सामाजिक ताने-बाने और लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक बहुत बड़ी बात है। अभी 24 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले किसान नेताओं ने घोषणा की कि वे संत रैदास की 645 वी जयंती सिंघु बॉर्डर पर मनाएंगे। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक निर्णय है। इस निर्णय की घोषणा करते हुए उन्होंने सभी किसानों से अपील की कि वह लोग सिंघु बॉर्डर पर जाएं और रैदास जयंती मनाए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई नहीं आ सकता है तो अपने ही गांव और शहर में रैदास जयंती के कार्यक्रम में शिरकत करें।

अब सोचने वाली बात यह है कि किसान नेता रैदास जयंती के दिन ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या किसान आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक नई सोशल इंजीनियरिंग है? क्या यह किसान आंदोलन को मजबूत करने के लिए दो समुदाय में भाईचारा पैदा करने की रणनीति है? और इसका किसान आंदोलन सहित भारत के लोकतंत्र की सेहत पर क्या असर पड़ने वाला है?

आईए इस बात को समझने की कोशिश करते हैं।

पंजाब हरियाणा क्षेत्र में जब भी हम किसानों की बात करते हैं तो मन में तस्वीर उभरती है एक पगड़ी वाले सरदार की जो हाल जोत रहा है, या ट्रैक्टर चला रहा है। एक दलित या रविदासिया समाज के आदमी को किसान की तरह देखना लोगों की आदत में शुमार नहीं है। इस इलाके में जातिवाद भी भयानक तौर पर फैला हुआ है इसके कारण जाट सिख लोग गुरु रैदास जयंती मनाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में नहीं आते थे। रैदास जयंती मनाने के लिए सिर्फ दलित समझे जाने वाले रैदास या समुदाय के लोग एक बड़े पैमाने पर इकट्ठा हुआ करते थे। इसी पंजाब और हरियाणा इलाके में अगर गौर से देखें तो पता चलता है कि दलित समुदाय पर जाट सिख समुदाय द्वारा अत्याचार किए जाते हैं।

इसी तरह पूरे भारत में दलित और ओबीसी समुदाय के आपसे रिश्ते हमेशा नरम गरम होते रहे। किसान आंदोलन के बीच दलित समुदाय और ओबीसी किसान समुदाय के द्वारा आपस में रणनीतिक साझेदारी और रैदास जयंती एक साथ बड़े पैमाने पर मनाने का बहुत बड़ा मतलब भी निकाला जा सकता है। इस विषय में बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटी एंप्लॉय फेडरेशन अर्थात बामसेफ के एक प्रमुख नेता ने जो कहा वह समझना जरूरी है। बामसेफ के श्री जसवंत राय ने कहा कि “यदि किसान लोगों के बीच में गुरु रैदास की जयंती मनाई जाती है तो, यह बहुत ही महत्वपूर्ण कदम होगा। इसके जरिए जाट समुदाय भी गुरु रैदास जयंती में शिरकत कर सकेगा।” आगे उन्होंने यह भी कहा कि या भाईचारा केवल किसानों ताकि नहीं रहना चाहिए बल्कि समाज में गहराई से इसे हर गली हर मोहल्ले तक पहुंचना होगा।

सदियों से दलितों और जाट सिख समुदाय के रिश्तो में कड़वाहट बनी हुई है। आजादी के दौरान और आजादी के बाद जब दलितों में चेतना आई, तब पंजाब हरियाणा के जाट समुदायों ने इसका खुले मन से स्वागत नहीं किया। जाट सिख समुदायों के लोगों ने इसे अपने खिलाफ एक बगावत की तरह देखा। उन्हें लग रहा था कि अगर यह दलित चेतना फैल गई तो परंपरागत जमीदारो को आसानी से जो मजदूर मिलते थे वह सब मिलने बंद हो जाएंगे। इस तरह बड़े जमीदारों को अपनी जमीदारी खत्म होने का डर सताने लगा। इसीलिए संपन्न ओबीसी तब का दलितों में आजाद चेतना के जन्म से डरने लगा। ओबीसी के दिल में बैठा यही डर दलितों और ओबीसी के बीच में रिश्ते नहीं सुधरने दे रहा था।

इस विषय में जालंधर के प्रोफेसर इसी कौल बताते हैं कि दलितों पर ऊंची जाति के जाति के जमीदारों और वह भी सिंह के जमीदारों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के कारण आदि धर्म मंडल आंदोलन 1920 में पैदा हुआ था। एक अलग धर्म की स्थापना इसका लक्ष्य था। अभी हाल ही में यूरोप में वियना में रविदासिया समुदाय के एक बड़े संत की हत्या के बाद स्थिति और बिगड़ गई थी। डेरा सचखंड बलान के प्रमुख संत की पंजाबी समुदाय द्वारा की गई हत्या के बाद रविदासिया समुदाय और जाट सिख समुदाय के बीच में संबंध और खराब हो गए थे। इस डेरा ने 2010 में सद्गुरु रैदास के जन्म स्थल बनारस में रविदासिया धर्म को एक अलग धर्म घोषित कर दिया था। इसके बाद इन लोगों ने गुरु ग्रंथ साहिब के 200 लोगों को अलग करके एक नई अमृतवाणी बनाई थी। इस प्रक्रिया के दौरान दोआबा क्षेत्र में सिखों और रावदासिया समुदाय के बीच में बहुत संघर्ष भी हुआ था।

सन 2021 की जनगणना के लिए भी कई रविदासिया लोग अलग धर्म के कॉलम की मांग कर रहे हैं। इसके लिए कई गीत भी बनाए गए हैं जो कि समाज में इस विषय में मांग उठाते रहते हैं। लेकिन इस सब के बावजूद जैसे ही कुछ समय पहले किसान आंदोलन शुरू हुआ इन समुदायों को आपसी भाईचारे का महत्व पता चला। अब यह समुदाय नजदीक आ रहे हैं और अपनी जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर इकट्ठा संघर्ष करना चाहते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर यह दोनों समुदाय रैदास साहब की जयंती मनाते हैं तो इनके बीच में दुश्मनी कम होगी और प्यार बढ़ जाएगा। इस बारे में प्रोफेसर कौल कहते हैं कि “इन दोनों समुदाय के द्वारा रैदास जयंती मनाया जाना बहुत सारी सामाजिक समस्याओं को और भेदभाव को खत्म कर देगा”।

विशेषज्ञ भी बताते हैं कि नासिर भाई इससे इन समुदायों में कड़वाहट कम होगी, बल्कि इससे किसान आंदोलन को मजबूत करने में और मदद मिलेगी। एक ही उद्देश्य के लिए आवाज उठाने वाले करोड़ों लोग जब एक साथ आते हैं अब कोई भी आंदोलन बहुत मजबूत होकर उभरता। अगर यह दोनों समुदाय अलग-अलग बटे रहे तो आंदोलन स्वाभाविक रूप से कमजोर होगा। इसीलिए रैदास जयंती पर इन दोनों समुदायों का एक साथ आना कोई साधारण घटना नहीं है। के जरिए करोड़ों लोग एक मंच पर एक साथ आ जाएंगे। इसका एक और बहुत महत्वपूर्ण परिणाम निकलेगा। अभी तक किसान आंदोलन को सिखों और जाटों से जोड़कर देखा जा रहा है। रैदास जयंती मनाने से यह साबित हो जाएगा इस आंदोलन में बड़ी संख्या में दलित समुदाय भी शामिल है। इस प्रकार इस आंदोलन को किसी एक या दो समुदाय से जोड़कर देखने और दिखाने वाली षड्यंत्र पूर्ण रणनीति अपने आप कमजोर हो जाएगी।

इस प्रकार संत रैदास जयंती, न सिर्फ इंसानियत के लिए, और बहुजन भारत के भविष्य के लिए एक बहुत खूबसूरत सौगात लेकर आई है बल्कि भारत में करोड़ों गरीब और मजबूर किसानों के लिए एक बहुत बड़ा मौका लेकर भी आई है। संत रैदास की जयंती पर हजारों साल से दुश्मन बने हुए दो समुदाय अगर गले मिल जाते हैं तो यह संत रैदास को भी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। संत रैदास का अपना सपना था कि बेगमपुरा में सभी जन निवास करें जहां पर कोई गम ना हो। संत रैदास जयंती पर इस तरह के सोशल इंजीनियरिंग को सामने होते देखना भारत के लोकतंत्र को मजबूत होते हुए देखने के समान है। संत रैदास और बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों पर चलते हुए सभी समुदायों को आपसी मतभेद भुलाकर अपने साझा उद्देश्यों के लिए इकट्ठा संघर्ष करना चाहिए।

बेगमपुरा बनाम रामराज्य 

डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ में भारत के इतिहास को क्रांतियों और प्रतिक्रांतियों के इतिहास के रूप में चिन्हित किया है। वे बहुजन-श्रमण परंपरा को क्रांतिकारी परंपरा के रूप में रेखांकित करते हैं,  जिसके केंद्र में बौद्ध परंपरा रही है। वे वैदिक परंपरा को प्रतिक्रांतिकारी परंपरा के तौर  चिन्हित करते हैं। वे सनातन, ब्राह्मणवादी और हिंदू परंपरा को बदलते समय के साथ वैदिक परंपरा के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द के रूप में देखते हैं, हालांकि सबका मुख्य तत्व एक है- वर्णाश्रम व्यवस्था का गुणगान और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता का दावा। इसके विपरीत बहुजन-श्रमण पंरपरा है, जो वर्ण-जाति व्यवस्था को खारिज करती रही है और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता के दावे को पूरी तरह नकारती रही है और सभी इंसान को समान दर्जा देने की हिमायती रही है। वैदिक और बहुजन-श्रमण परंपरा के बीच, प्राचीन काल में शुरू हुआ संघर्ष किसी न किसी रूप में आज भी जारी रहा। हिंदी पट्टी में मध्यकाल में यह संघर्ष बहुजन संत कवियों की निर्गुण धारा और द्विज भक्त कवियों की सगुण धारा के रूप में सामने आया। हिंदी भाषा-भाषी समाज में बहुजन निर्गुण संत कवियों की धारा के प्रतिनिधि कवि रैदास और कबीर हैं, तो सगुण भक्त कवियों के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास और सूरदास हैं, विशेष तौर पर रामचरित मानस के  रचयिता तुलसीदास।

सिर्फ जन्म के आधार ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का दावा वैदिक परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति तुलसदीस इन शब्दों में करते हैं-

  पूजहिं विप्र सकल गुणहीना,   सूद्र न पूजहिं ज्ञान प्रवीना

(रामचरित मानस)

इसके विपरीत गुण-कर्म आधारित श्रेष्ठता बहुजन-श्रमण परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति रैदास इन शब्दों में करते हैं-

  रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुनहीन,   पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन।

 (संत रैदास)   

वैदिक परंपरा परजीवी मूल्यों की वाहक रही है और जबकि बहुजन-श्रमण पंरपरा श्रम को एक श्रेष्ठ मूल्य के रूप में स्वीकार करती है। यही कारण है कि द्विज जातियां दलित-बहुजनों के श्रम पर पलती रही हैं, और इस परजीवीपन पर अभिमान करती रही हैं और इसके आधार पर अपनी श्रेष्ठता का दावा करती रही हैं। उनकी नजर में जो व्यक्ति श्रम से जितना ही दूर है, वह उतना ही श्रेष्ठ है और जो सबसे ज्यादा श्रम करता है, उसे सबसे निम्न कोटि का ठहरा दिया गया। इसके विपरीत   दलित-बहुजन परंपरा श्रम संस्कृति की वाहक रही है। रैदास स्वयं भी श्रम करके जीवन-यापन करते थे और श्रम करके जीने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। वे घर-बार छोड़कर वन जाने या संन्यास लेने को ढोंग-पाखण्ड कहते थे-

नेक कमाई जउ करइ गृह तजि बन नहिं जाए।

रैदास अभिमानी परजीवी ब्राह्मण की तुलना में श्रमिक को ज्यादा महत्व देते हैं-

धरम करम जाने नहीं, मन मह जाति अभिमान। ऐ सोउ ब्राह्मण सो भलो रविदास श्रमिकहु जान।।

ब्राह्मणवादी द्विज परंपरा के विपरीत दलित-बहुजन परंपरा के कवि सतगुरु रैदास श्रम की संस्कृति में विश्वास करते हैं। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को श्रम करके ही खाने का अधिकार है—

रविदास श्रम कर खाइए, जौ-लौ-पार बसाय। नेक कमाई जो करई, कबहु न निष्फल जाय।।

बुद्ध की तरह रैदास ने भी ऊंच-नीच अवधारणा और पैमाने को पूरी तरह उलट दिया। वे कहते हैं कि जन्म के आधार पर कोई नीच नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति नीच होता है, जिसके हृदय में संवेदना और करुणा नहीं है-

दया धर्म जिन्ह में नहीं, हद्य पाप को कीच। रविदास जिन्हहि जानि हो महा पातकी नीच।।

 उनका मानना है कि व्यक्ति का आदर और सम्मान उसके कर्म के आधार पर करना चाहिए, जन्म के आधार पर कोई पूज्यनीय नहीं होता है। बुद्ध, कबीर, फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह रैदास भी साफ कहते हैं कि कोई ऊंच या नीच अपने मानवीय कर्मों से होता है, जन्म के आधार पर नहीं। वे लिखते हैं —

रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच। नर कूं नीच कर डारि है, ओछ करम की कीच।।

सतगुरु रैदास का कहना था कि जाति एक ऐसा रोग है, जिसने भारतीयों की मनुष्यता का नाश कर दिया है। जाति इंसान को इंसान नहीं रहने देती। उसे ऊंच-नीच में बांट देती है। एक जाति का आदमी दूसरे जाति के आदमी को अपने ही तरह का इंसान मानने की जगह ऊंच या नीच के रूप में देखता है। बाबासाहब आंबेकर ने भी बाद में इसी बात को दोहराया था। सतगुरु रैदास का कहना है कि जब तक जाति का खात्मा नहीं होता, तब तक लोगों में इंसानियत जन्म नहीं ले सकती।

जात-पात के फेर मह उरझि रहे सब लोग। मानुषता को खात है, रैदास जात का रोग।।

वे यह भी कहते हैं कि जाति एक ऐसी बाधा है, जो आदमी को आदमी से जुड़ने नहीं देती है। वे कहते हैं एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से तब तक नहीं जुड़ सकता, जब तक जाति का खात्मा नहीं हो जाता—

रैदास ना मानुष जुड़ सके, जब लौं जाए न जात।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह रैदास भी हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई भेद नहीं करते। वे दोनों के पाखण्ड को उजागर करते हैं। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मस्जिद से; क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है—

मस्जिद सो कुछ घिन नहीं, मन्दिर सो नहीं प्यार। दोउ अल्ला हरि नहीं, कह रविदास उचार।।

रैदास मंदिर-मस्जिद से अपने को दूर रखते हैं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों से प्रेम करते हैं—

मुसलमान से दोस्ती, हिन्दुवन से कर प्रीत। रविदास ज्योति सभ हरि की, सभ हैं अपने मीत।।

रैदास बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है। जिन तत्त्वों से हिंदू बने हैं, उन्हीं तत्त्वों से मुसलमान। दोनों के जन्म का तरीका भी एक ही है –

हिन्दू तुरुक महि नाहि कछु भेदा दुई आयो इक द्वार। प्राण पिण्ड लौह मास एकहि रविदास विचार।।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह संत रैदास के मन में भी अपनी जाति और पेशे को लेकर कोई हीनताबोध का भाव नहीं है। वे यह कहते हैं —

ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार।

तुलसी के वर्णाश्रम आधारित रामराज्य के विपरीत रैदास बेगमपुरा के रूप में एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं, जिसे बाद में जोतीराव फुले के आदर्श बलि राज, डॉ. आंबेडकर के आदर्श समाज की कल्पना और मार्क्स के समाजवादी समाज की कल्पना दोहराती दिखती है-

बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ। ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।।

अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई। काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।।

आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर। तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।

कह रविदासखलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा। बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।

ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु। अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।

काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही। आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।

तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै। कह रविदासखलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।

इस पद में संत रैदास ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुखविहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम ‘बेगमपुरा’ या बेगमपुर शहर है। रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है; जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छूतछात का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है। कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास अपने शिष्यों से कहते हैं- ‘ऐ मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे–तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।’

रैदास के बेगमपुरा के विपरीत तुसलीदास के रामराज्य की परिकल्पना वर्णाश्रम धर्म यानि वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित है। राम-राज्य का सबसे बड़ा लक्षण बताते हुए तुलसीदास लिखते हैं कि राम-राज्य में सभी लोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए वेदों के दिखाए रास्ते पर चलते हैं-

वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखद नहिं भय शोक न रोग।।

रामराज्य में वर्णाश्रण व्यवस्था को कोई उल्लंघन नहीं कर सकता है।हम सभी जानते हैं कि वर्णाश्रण धर्म के पालन का मतलब है कि शूद्र द्विजों की सेवा करें और महिलाएं पुरुषों की सेवा करें। उत्पादन और सेवा के सारे कार्य गैर-द्विज शूद्र-अतिशूद्र करें। वर्ण-धर्म का पालन ही राम-राज्य है।

तुलसीदास कहते हैं कि राम राज्य के आदर्श राजा राम का जन्म ही ब्राह्मणों और गाय के हितों के लिए हुआ है-

विप्र, धेनु, सुर, संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।”   

इतना ही नहीं ऐसा उल्लिखित है कि रामराज्य के आदर्श राजा राम स्वयं ही घोषणा करते हैं कि उन्हें द्विज (सवर्ण) सबसे प्रिय हैं-

सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥

इतना ही नहीं, तुसलीदास शूद्रों-अतिशूद्रों की समता की मांग को कलयुग एक बड़ा लक्षण बताते हुए कहते हैं कि कलयुग में शूद्र द्विजों (सवर्णों) से कहते हैं कि हम तुमसे कम नहीं है और जो ब्राह्मण ब्रह्म ज्ञानी हैं; उनको शूद्र आंख तरेरते हुए डाटते हैं –

बादहिं सृद्र द्विजन्ह सन, हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो विप्रवर, आँखि देखावहिं डाटि।

तुलसी के आदर्श रामराज्य के राजा राम उन्हीं शूद्रों-अतिशूद्रों ( पिछड़े-दलितों) को गले लगाते हैं, जो  खुद को उनके दास या सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। तुलसी के राम स्वयं कहते हैं कि शूद्र (नीच प्राणी) तभी मुझे प्रिय हो सकता है, जब वह उनका दास बन जाए और उनका भक्त बन जाए। राम साफ शब्दों में कहते हैं कि —

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥

संत रैदास के उलट तुलसी के राम चरित मानस और राम का चरित्र पूरी तरह द्विजों और मर्दों के वर्चस्व की स्थापना करने वाला है। सच तो यह है कि राम के चरित्र का गुणगान करने वाला रामचरित मानस मनु-स्मृति और पुराणों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। राम के चरित्र को न्याय का प्रतीक बताकर और रामचरित मानस को प्रगतिशील साहित्य घोषित कर रामविलास शर्मा, शिवकुमार मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर सिंह जैसे वामपंथी आलोचकों ने भी उत्तर भारत में द्विज पुरुषों के सांस्कृतिक वर्चस्व की परंपरा को और मजबूत बनाया। अनेक अन्य हिंदी लेखकों ने भी अपने सृजनात्मक साहित्य के माध्यम से यही किया। ऐसा करके उन्होंने हिंदी समाज के वर्ण-जातिवादी और पितृसत्तात्मक चरित्र को मजबूत बनाया। इसके बरक्स बहुजन परंपरा के आलोचकों चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’, कंवल भारती और डॉ. धर्मवीर जैसे बहुजन आलोचकों  ने संत रैदास को बहुजन-श्रमण परंपरा के शीर्ष कवि के रूप में स्थापित किया और भारत की क्रांतिकारी बहुजन-श्रमण परंपरा को स्थापित करने की कोशिश किया।

 न्याय, समता, बंधुता और समृद्धि के समान बंटवारे पर आधारित प्रबुद्ध भारत का निर्माण रैदास के बेगमपुरा का निर्माण करके किया जा सकता है, रामराज्य की स्थापना करके नहीं।

पूर्व कांग्रेस नेता अशोक तंवर ने बनाया अपना भारत मोर्चा

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पूर्व कांग्रेस नेता और सिरसा से सांसद डॉ. अशोक तंवर ने नई राजनीतिक पारी शुरू कर दी है। आज उन्होंने दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित कार्यक्रम में नए मोर्चे का ऐलान किया है। अशोक तंवर ने नए मोर्चा का नाम अपना भारत मोर्चा रखा है।  

भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर को मिला अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

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दुनिया भर के बुद्ध प्रेमियों के लिए एक बड़ी खबर आई है। अब भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण स्थल कुशीनगर में एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जाएगा। डाइरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एवीएशन ने इस योजना को अनुमति दे दी है। केन्द्रीय मंत्री हरदीप पूरी ने इस संबंध में ट्वीट करते हुए जानकारी दी है कि कुशीनगर अब उत्तर प्रदेश का तीसरा लाइसेंस प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने जा रहा है। इस प्रकार राज्य में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। गौरतलब है कि कुशीनगर, सारनाथ, लुम्बिनी, बोधगया, वाराणसी आदि स्थल भगवान बुद्ध से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हुए हैं। भगवान बुद्ध के जन्म, बोध प्राप्ति, धम्म चक्र प्रवर्तन एवं परिनिर्वाण से जुड़े स्थल चार महातीर्थ कहलाते हैं। ऐसे ही अन्य चार लघु तीर्थ हैं जिन्हे मिलाकर बौद्धों के अष्ट-महातीर्थ बनते हैं। ये सभी उत्तर भारत में हैं। दुनिया भर के बुद्ध प्रेमी हमेशा से सपना देखते आए हैं कि उन्हे हवाई जहाज से सीधे ही बुद्ध से जुड़े स्थानों पर उतरने का मौका मिले ताकि उनका समय और पैसा अनावश्यक खर्च न हो।

दुनिया भर के बौद्ध धर्म के अनुयायी एवं बुद्ध की शिक्षाओं को प्रेम करने वाले लोग भारत में आते हैं। लाखों की संख्या में आने वाले इन पर्यटकों से स्थानीय व्यापार व्यवसाय और अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। इसके अलावा पूरे विश्व में भारत में जन्मे सच्चे विश्वगुरु भगवान बुद्ध कि शिक्षा का प्रसार भी होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कुशीनगर में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की स्वीकृति भारत के बहुजनों के लिए भी एक खुशखबरी है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को मिला अध्यक्ष, विजय सांपला ने संभाला पद

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तकरीबन नौ महीने तक खाली रहने के बाद आखिरकार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को नया अध्यक्ष मिल गया है। केंद्र सरकार में पूर्व राज्यमंत्री विजय सांपला को आयोग का नया चेयरमैन चुना गया है।  राष्ट्रपति ने 16 फरवरी को विजय सांपला को नियुक्ति का पत्र दिया, जिसके बाद सांपला ने 24 फरवरी 2021 को एससी-एसटी कमीशन के चेयरमैन का पद संभाला है। उन्होंने रमाशंकर कठेरिया की जगह ली है, जिनका कार्यकाल 9 नवंबर 2014 से 24 May 2019 तक था। सांपला ने 22 फरवरी को सबका धन्यवाद करते हुए ट्विटर पर इसकी जानकारी साझा की।

साल 1998 में भाजपा ज्वाइन करने के बाद उन्होंने 2014 में उन्होंने होशियारपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और विजय हुआ। विजय सांपला 2014-2019 तक होशियारपुर से सांसद रहे हैं। 2014-2019 तक मोदी सरकार में सोशल जस्टिस स्टेट मंत्री रहे हैं। लेकिन सांपला के राजनीतिक करियर पर उस समय विराम लग गया था, जब 2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी टिकट काटकर सोम प्रकाश को दे दिया गया था। वह अब केंद्र में मंत्री हैं। लोकसभा चुनावों में टिकट न मिलने के बावजूद उन्होंने न पार्टी छोड़ी और न ही किसी और दल से चुनाव लड़ा। विजय सांपला ने पार्टी और मैदान में अपना संघर्ष जारी रखा। सांपला को इसका फायदा नई जिम्मेदारी के रूप में मिला है।

विजय सांपला की नियुक्ति के साथ ही यह भी माना जा रहा है कि भाजपा ने 2022 में पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए अपना तुरुप का पत्ता भी चल दिया है। तो वहीं राष्ट्रीय राजनीति में विजय सांपला के कद को बढ़ाकर यह साफ कर दिया है कि भाजपा उनको लेकर कुछ बड़ा करने की योजना बना रही है।

विजय सांपला को राष्ट्रीय चेयरमैन की कुर्सी देकर भाजपा की ओर से पंजाब की 34 विधानसभा सीटों पर प्रभाव डालने की पूरी रणनीति तैयार की गई है। पंजाब में 2022 में भाजपा अकेले चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। राज्य में पार्टी पहले ही दलित वोट बैंक को लेकर काफी गंभीर रही है। पंजाब में 117 में से 34 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से अभी तक भाजपा पांच सीटों पर ही चुनाव लड़ती रही है। बाकी सीटों पर शिरोमणि अकाली दल ने अपना कब्जा रखा था। भाजपा इसे अपने खेमे में लाना चाहती है। तो वहीं कृषि कानून पास होने से पंजाब का ग्रामीण वोटर केंद्र सरकार से नाराज चल रहा है। उन्हें भी भाजपा विजय सांपला के जरिए साधना चाहती है, क्योंकि उनमें ज्यादातर दलित समाज से हैं। 6 जुलाई 1961 को पंजाब के जालंधर में जन्में विजय सांपला का जीवन संघर्षों में बीता है। एक वक्त में उन्होंंने सउदी में पलंबर का काम भी किया था। लेकिन आगे बढ़ने की चाह उन्होंने कभी नहीं छोड़ी न हालात से समझौता किया और आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं।

जम्मू के अखनूर में मिला नया बौद्ध स्थल

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 जम्मू से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अखनूर अंबारान में बहुत ही महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल होने की बात सामने आई है। यह बौद्ध स्थल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर 5 ईसवी तक निर्मित हुआ है। इस स्थान पर दो से तीन टूटे हुए बौद्ध स्तूप हैं। कहा जा रहा है कि यह जम्मू क्षेत्र का यह पहला बौद्ध विहार है। इसके बारे में बौद्ध विद्वानों का कहना है कि यह दूसरी शताब्दी ईस्वी तथा कुषाण डायनेस्टी के समय स्थापित हुआ था। इसके बारे में जानकारी मिलने के बाद अंबेडकर फुले कैरियर काउंसलिंग के सदस्यों ने वहां पर जाकर त्रिशरण- पंचशील, बुद्ध वंदना, धम्म वंदना, संघ वंदना की।