हरियाणा में दलित बस्ती में आगजनी, दलितों ने दी आंदोलन की धमकी

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 हरियाणा के करनाल जिले के पूसगढ़ गाँव से दलित उत्पीड़न की एक भयानक खबर आ रही है। सवर्ण हिन्दू अतिवादियों के एक समूह द्वारा दलित बस्ती पर आक्रमण और आगजनी का मामला सामने आया है। इस हमले में दलितों के दर्जन भर घरों सहित दलितों की कई मोटरसाइकिलों में आग लगा दी गयी है। इस मामले में पुलिस ने कार्यवाही करते हुए लगभग 200 हिन्दू अतिवादियों को गिरफ्तार किया है।

स्थानीय दलितों ने मीडिया को बताया कि 11 फरवरी की रात वाल्मीकि समाज की इस बस्ती में जातिवादी गुंडों ने हमला किया है। असल में यह मामला नशीली दवाओं के कारोबार से जुड़ा हुआ है। बस्ती के वाल्मीकि समाज के लोगों के मुताबिक ऊंची जाति के हिन्दू यहाँ के वाल्मीकि बच्चों पर दबाव डालकर उनसे शराब और ड्रग्स का कारोबार करवाना चाहते हैं। दलित बच्चों ने इस काम में शामिल होने से इनकार कर दिया। इस बात पर 11 फरवरी को जातिवादी गुंडों और दलितों में हाथापाई हुई थी। सवर्ण हिंदुओं ने दलितों को बुरी तरह पीटा और जब दलित पक्ष स्थानीय अस्पताल में इलाज करवा रहा था तभी रात में उनकी बस्ती में आक्रमण करके आग लगा दी गयी। इसी के साथ वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर डर के कारण बस्ती छोड़कर जाने का दबाव बन रहा है। इस दबाव की प्रतिक्रिया में कुछ दलित युवकों ने आत्मदाह करने की धमकी दी है। हालांकि डेप्यूटी पुलिस कमिश्नर एवं एसपी के द्वारा आश्वासन दिए जाने पर दलितों ने बस्ती छोड़ने का विचार त्याग दिया है और खबर लिखे जाने तक शांति बनी हुई थी।

इस घटना से पूरे राज्य और देश भर में दलित समुदाय में आक्रोश की लहर फैल गयी है। स्थानीय दलित कार्यकर्ताओं और नेताओं ने पुलिस प्रशासन से कहा है कि मामले में जल्द से जल्द न्याय किया जाए अन्यथा वे एक बड़ा दलित आंदोलन शुरू करेंगे।

सुरक्षित सीटों को लेकर बड़ी खबर, अब ये नहीं लड़ पाएंगे रिजर्व सीटों से चुनाव

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 भारत में धर्मांतरण की स्वतंत्रता और आरक्षित चुनावी सीटों के मुद्दे पर केन्द्रीय कानून मंत्री ने ग्यारह फरवरी को राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण बात कही है। श्री रविशंकर प्रसाद के अनुसार जो दलित इस्लाम या ईसाई धर्म में प्रवेश करेंगे वे अब एससी के लिए सुरक्षित सीटों से लोकसभा या विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। हालांकि यहां बौद्ध धर्म में जाने वालों के लिए राहत की खबर है। कानून मंत्री ने कहा कि जो दलित हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म अपनाएंगे उन्हें इस तरह के कोटा का लाभ मिलेगा।

इस मुद्दे को स्पष्ट करते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि संविधान के पैरा तीन में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए नियम बहुत साफ हैं। इन नियमों के अनुसार जो व्यक्ति हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म से आता है उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। हालांकि केन्द्रीय कानून मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आशय से ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम’ में कोई संशोधन लाने का सरकार का कोई विचार नहीं है।

कानून मंत्री के इस बयान से साफ है कि ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम’ में कोई संशोधन किए बिना ही संविधान के पैरा तीन की एक खास तरह से व्याख्या के जरिए एक बड़ा बदलाव हो सकता है। राज्य सभा में कानून मंत्री का यह स्पष्टीकरण धर्मांतरित दलितों को नए धर्म के चुनाव के नजरिए से दो खेमों में बांटता है। एक खेमे में वे दलित हैं जो हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म अपनाना चाहते हैं। वहीं दूसरे खेमे में वे दलित हैं जो इस्लाम और इसाइयत अपनाना चाहते हैं। इस्लाम और इसाइयत अपनाने वाले दलितों को चुनाव लड़ने से रोकने वाली इस व्याख्या से निश्चित ही दलित समुदाय में फूट पड़ेगी जिसके बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं।

जाति आधारित जनगणना के आँकड़ों को फिर से दबाने की साजिश

भारत के ओबीसी एवं एससी, एसटी के लिए एक बड़ी खबर राज्य-सभा से आई है। दस फरवरी को राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सन 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना के कच्चे आँकड़े सामाजिक न्याय मंत्रालय को सौंपे हैं। ऐसा इन आंकड़ों के बेहतर वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण के लिए किया गया है ताकि इन आंकड़ों को ठीक से समझा जा सके। इस दौरान दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से जाति की जनगणना के आंकड़ों जारी नहीं करने की बात भी कही गयी है।

गौरतलब है कि सामाजिक, आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना का यह काम तत्कालीन ‘ग्रामीण विकास मंत्रालय’ एवं ‘आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय’ द्वारा किया गया था। यह गणना ग्रामीण एवं शहरी दोनों इलाकों में की गयी थी। इस बड़ी कार्यवाही का उद्देश्य था कि भारत के करोड़ों ओबीसी, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों की सामाजिक आर्थिक एवं जाति आधारित समस्याओं को उनके जनसंख्यात्मक आंकड़ों के आईने में समझा जाए। नित्यानंद राय ने राज्यसभा में बताया कि जनगणना के इन आंकड़ों में से ‘जाति’ के आंकड़ों को छोड़कर अन्य आंकड़ों को अंतिम रूप में लाकर उक्त दो मंत्रालयों द्वारा जारी कर दिया गया है। राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान राय ने लिखित रूप में यह जानकारी दी।

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भारत के करोड़ों बहुजनों के लिए यह एक बड़ी खबर है। भारत के इतिहास में पहली बार अंग्रेजों द्वारा सन 1871-72 में जाति आधारित जनगणना की गयी थी। इस जनगणना में चौंकाने वाले आँकड़े सामने आए थे। यह रिपोर्ट उस समय लंदन में ब्रिटिश सरकार के दोनों सदनों में पेश की गयी थी। उस समय ब्रिटिश सरकार ने भारत के अधिकांश प्रांतों के लिए ब्राह्मणों, क्षत्रियों, राजपूतों और कई अन्य जातियों की जनसंख्या की गिनती की थी।

तत्कालीन बंबई प्रांत में जनगणना राज्यों में 658,479 ब्राह्मण, 144,293 क्षत्रिय और राजपूत, 936,000 वैश्य और 10,856,000 शूद्र थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी मेमोरेंडम को इस टेबल के अनुसार समझा जाए तो समझ  में आता है कि तत्कालीन समाज में शूद्र 86 प्रतिशत, ब्राह्मण पाँच प्रतिशत, क्षत्रिय एक प्रतिशत और वैश्य सात प्रतिशत थे।

वर्ण कुल जनसंख्या कुल प्रतिशत
ब्राह्मण 6,58,479 5%
क्षत्रिय 1,44,293 1%
वैश्य 9,36,000 7%
शूद्र 1,08,56,000 86%
कुल जनसंख्या 1,25,94,772  

यहाँ यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उस समय के भारत में ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति जैसे शब्द नहीं थे। उस समय हिन्दू वर्ण व्यवस्था के हिसाब से चार वर्णों में रखकर जनगणना की गयी थी। इसलिए इस जनगणना में जिन्हे शूद्र कहा गया है उन्हे हम आज के संदर्भ में ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग मान सकते हैं।

हालांकि आजादी के बाद कई समाजशास्त्री एक अर्थशास्त्री मानते हैं कि अब ब्राह्मणों और क्षत्रियों की संख्या पहले की तुलना में कहीं ज्यादा घटी है। भारत के गरीब समाज में ओबीसी, एससी और एसटी में स्वाभाविक रूप से जनसंख्या वृद्धि की दर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों से अधिक रही है। इसीलिए यह माना जाता है कि अब ब्राह्मणों की कुल जनसंख्या पूरे भारत की आबादी में तीन प्रतिशत से अधिक नहीं है। लेकिन भारत का दुर्भाग्य है कि इन तीन प्रतिशत ब्राह्मणों सहित शेष लगभग बारह प्रतिशत सवर्णों का शासन प्रशासन सहित उद्योग धंधों, व्यापार, निजी नौकरियों, मीडिया, आदि में के पास देश के सत्तर से नब्बे प्रतिशत तक अवसरों पर कब्जा बना हुआ है।

मान्यवर कांशीराम एवं बामसेफ़ के संस्थापकों में से एक श्री डी के खापरडे सहित कई दलित विचारक मानते आए हैं कि भारत मे बहुजनों अर्थात ओबीसी, एससी, एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों की कुल जनसंख्या 85 प्रतिशत से भी अधिक है। वहीं सवर्ण हिंदुओं की कुल जनसंख्या 15 प्रतिशत से भी कम है। इसीलिए बहुजन राजनीतिक कार्यकर्ता एवं विचारक हमेशा से 85 प्रतिशत बनाम 15 प्रतिशत के आँकड़े की चर्चा करते रहते हैं। ये कार्यकर्ता और विचारक मानते हैं कि भारत में बहुसंख्यकसमाज को उनकी संख्या के अनुपात में अधिकार न मिल सकें इसी उद्देश्य से जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों दबाया जाता है। सन 2011 की ‘सामाजिक आर्थिक एवं जातिगत जनगणना’ के आंकड़ों में से ‘जाति जनगणना’ के आंकड़ों को छुपा लेना इसी पुरानी तरकीब का नया उदाहरण है।

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आज बहुजन समाज को जरूरत है कि दुनिया के सभी मंचों से भारत के 85 प्रतिशत शोषित दमित बहुजनों के हक की आवाज उठाई जाए। अंग्रेजों के द्वारा की गयी जनगणना के बाद से बहुत लंबे समय तक इस तरह की जाति और वर्ण की जनगणना के आँकड़े नहीं आए हैं। इसी कारण भारत में न तो सामाजिक आर्थिक विकास की योजनाओं का बहुजनों के पक्ष में निर्माण हो पाता है और न ही बहुजन समाज की चुनावी राजनीति मजबूत हो पाती है। अगर बहुजन समाज से जुड़े जनसंख्या के आँकड़े सामने आते हैं तो निश्चित ही यह न केवल भारत के 85 प्रतिशत बहुजनों के हित में होगा बल्कि यह भारत देश के और भारत के लोकतंत्र के हित में भी होगा।

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सीधी सी बात है कि अगर किसी देश की 85 से 90 प्रतिशत जनसंख्या सशक्त और मजबूत होती है तो उस देश का सशक्तिकरण अपने आप हो जाता है। इसीलिए बहुजन कार्यकर्ता और विचारक बार-बार कहते हैं कि 85 से 90 प्रतिशत बहुजन जनता का कल्याण और सशक्तिकरण ही असली देशभक्ति और राष्ट्रवाद है। इसलिए हमें सच्चा देशभक्त और राष्ट्रवादी बनकर जाति और वर्ण आधारित जनगणना को समाने लाकर उसी के आधार पर सामाजिक विकास और राजनीतिक रणनीति बनाने के लिए काम करना चाहिए।

तेलंगाना मुख्यमंत्री द्वारा दलितों के लिए एक हजार करोड़ रुपये की घोषणा

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 तेलंगाना के मुख्यमंत्री श्री के चंद्रशेखर राव ने दलितों के हित में एक बड़ी घोषणा की है। दस फरवरी को मुख्यमंत्री राव ने ‘मुख्यमंत्री दलित सशक्तीकरण एवं उत्थान’ योजना घोषित करते हुए दलितों के लिए एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने का ऐलान किया है। तेलंगाना जैसे छोटे राज्य के लिए ‘दलित सशक्तिकरण एवं विकास’ की इस योजना को दक्षिण भारत की सामाजिक-आर्थिक एवं चुनावी राजनीति में एक मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। हाल ही में तेलंगाना में हुए नगर निगम चुनावों में विभिन्न पार्टियों ने जैसी आक्रामकता दिखाई थी उसके मद्देनजर श्री राव के इस फैसले को चुनावी नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तेलंगाना के नालगोण्डा जिले के हालिया गाँव में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करने के दौरान उन्होंने राज्य के बजट में वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए इस बड़ी राशि की घोषणा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि “यह एक विडंबना है कि दलित समुदाय आजादी के सात दशक से अधिक समय बाद भी सभी क्षेत्रों में पिछड़ते जा रहे हैं। कोई भी देश या समाज तभी तरक्की करता है जब सभी वर्ग तरक्की करते हैं। विकास समावेशी होना चाहिए। तेलंगाना में दलितों को सशक्त बनाने के लिए मैंने आगामी बजट में नई योजना शुरू करने का फैसला किया है। इस योजना का नाम मुख्यमंत्री के नाम पर रखा जाएगा। मैं व्यक्तिगत रूप से इसके क्रियान्वयन की निगरानी करूंगा और यह सुनिश्चित करूंगा कि इस योजना का लाभ राज्य भर में दलित समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचे। हम इस योजना के लिए 1,000 करोड़ रुपये मंजूर करेंगे।” (फाइल फोटो, फोटो क्रेडिट- गूगल)

कोरेगांव मामले में वाशिंगटन पोस्ट का बड़ा खुलासा, आरोपित बुद्धिजीवियों के लैपटॉप में हुई थी टेम्परिंग

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 कोरेगांव मामले को लेकर वाशिंगटन पोस्ट ने एक बड़ा खुलासा किया है। वाशिंगटन पोस्ट की खबर के मुताबिक रोना विल्सन और भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी 15 अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के खिलाफ मिले सबूत उनके लैपटॉप पर मैलवेयर सॉफ्टवेयर के जरिए प्लांट किये गए थे। यहां हम अपने दर्शकों को बता दें कि Malware एक ऐसा सॉफ़्टवेयर है जिसे विशेष रूप से किसी भी कंप्यूटर से डाटा चुराने या उसे नुकसान पहुंचाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। तो इसी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर पहले कथित आरोपियों के कंप्यूटर में तमाम आपत्तिजनक बातें डाली गई, और फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया। यह तथ्य वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक खबर के जरिए सामने आई है। इस रिपोर्ट को लिखा है निहा मसीह और जोआना स्लैटर ने, जो आज 10 फरवरी को वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित हुई है।

 आर्सेनल कंसल्टिंग जो कि एक अमेरिकी डिजिटल फोरेंसिक फर्म है कि फोरेंसिक रिपोर्ट ने इसका खुलासा किया है कि किसी अज्ञात हैकर ने रोमा विल्सन की गिरफ्तारी से पहले विल्सन के लैपटॉप में मैलवेयर सॉफ्टवेयर के जरिए आपत्तिनजक पत्र डाले थे। पुणे पुलिस ने इन्हीं पत्रों को विल्सन के खिलाफ अपने शुरुआती साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया था। विल्सन के लैपटॉप से प्राप्त पत्रों में से एक माओवादी आतंकवादी को संबोधित किया गया था जिसमें उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने का अनुरोध किया गया था। इस पत्र में, विल्सन ने कथित तौर पर बंदूकें और अन्य गोला बारूद की आपूर्ति पर भी चर्चा की थी। लेकिन आर्सेनल कंसल्टिंग रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि ये पत्र विल्सन के कंप्यूटर में प्लांट किये गए थे और हैकर ने एक मैलवेयर की मदद से विल्सन के डिवाइस पर भी नियंत्रण और जासूसी की थी। हालांकि ये हैकर कौन था, आर्सेनल कंसल्टिंग अब तक इसकी पहचान नहीं कर पाई है। आर्सेनल ने दावा किया कि “यह सबसे गंभीर मामलों में से एक है जिसमें सबूतों से छेड़छाड़ शामिल है।”

जून 2016 में रोना विल्सन को एक व्यक्ति से कुछ ईमेल मिले, जिससे उनका परिचय एक साथी कार्यकर्ता के रूप में हुआ था। उस व्यक्ति ने कथित तौर पर उसे नागरिक स्वतंत्रता समूह के एक बयान को डाउनलोड करने के लिए एक लिंक पर क्लिक करने का आग्रह किया था। लेकिन क्लिक करने के बाद लिंक ने नेटवायर को तैनात किया, जिसने हैकर को विल्सन के डिवाइस का एक्सेस दिया। रिपोर्ट के मुताबिक हैकर ने मालवेयर का इस्तेमाल एक छिपे हुए फोल्डर को बनाने में किया था, जहां 10 गुप्त पत्र जमा किए गए थे। फोरेंसिक फर्म आर्सेनल के अनुसार अक्षरों को माइक्रोसॉफ्ट वर्ड के एक काफी एडवांस वर्जन का उपयोग करके तैयार किया गया था जो कि विल्सन के लैपटॉप पर भी मौजूद नहीं था।

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आर्सेनल की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विल्सन हैकर्स के इकलौते शिकार नहीं थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2020 में खुलासा किया था कि भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी कार्यकर्ताओं की मदद करने की कोशिश करने वाले नौ लोगों को भी ऐसे ही लिंक वाले ईमेल के जरिये निशाना बनाया गया था जो नेटवायर तैनात करते थे।

दिलचस्प बात यह है कि एमनेस्टी और आर्सेनल दोनों की रिपोर्टों में, एक ही डोमेन नाम और आईपी पते सामने आए हैं। इन पत्रों के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उन पर “राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने” और माओवादियों से सांठ-गांठ और उनकी विचारधारा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा, भीमाकोरेगांव विजय दिवस के 200वें वर्षगाठ के दौरान हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद समाज में जातिगत टकराव और घृणा पैदा करने के भी आरोप लगाए गए थे।

यह घटना उस समय हुई जब लोग कोरेगाँव की लड़ाई की 200 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए कोरेगाँव क्षेत्र में एकत्रित हुए थे। दलित समाज इसे “दमनकारी” उच्च जाति के शासकों पर जीत के दिन के रूप में मनाते हैं। पुलिस ने आरोप लगाया कि गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज और वरवारा राव सहित कार्यकर्ताओं ने 31 दिसंबर, 2017 को एल्गर परिषद की बैठक को पैसे से मदद की, जिसमें भड़काऊ भाषण दिए गए, जिसके कारण हिंसा हुई। इसके बाद जनवरी 2020 में मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया था।

यहां Click कर बहुजन साहित्य आर्डर करें पुलिस ने सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धावले, महेश राउत, रोमा विल्सन और सोमा सेन को भी आरोपी बनाया था। बाद में इसी मामले में गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े का नाम भी आया था और उन्हें भी जेल जाना पड़ा था। लेकिन जिस तरह से फारेंसिक रिपोर्ट में साफ हो गया है कि तमाम आपत्तिजनक बातें प्लांटेड थी। अब सवाल उठता है कि आखिर जिन लोगों को आरोपी बनाया गया, उसके खिलाफ साजिश रचने वाले कौन थे, और क्या अब सरकार और पुलिस साजिशकर्ताओं को बेनकाब करेगी।

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उच्च शिक्षा में हो रही है बहुजनों के साथ साजिश, सामने आया चौंकाने वाला आंकड़ा

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 राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान 4 फरवरी को एक ऐसा तथ्य सामने आया है, जिससे भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों और आदिवासियों की शिक्षा के बारे में एक बड़ा खुलासा हुआ है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने 4 फरवरी को राज्यसभा में उच्च शिक्षा को लेकर ऐसा तथ्य सामने रखा जो न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि बहुजन समाज को सचेत भी करता है। केंद्रीय मंत्री द्वारा रखे आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च स्तर के विज्ञान शिक्षण संस्थानों के पीएचडी कार्यक्रमों में भारत के बहुजन छात्रों की उपस्थिति बहुत कमजोर हुई है। आँकड़े के मुताबिक इन संस्थाओं में पीएचडी स्तर के कार्यक्रमों में जिस अनुपात में ओबीसी, एससी और एसटी के छात्रों की संख्या होनी चाहिए उतने छात्र वहाँ प्रवेश नहीं ले पा रहे हैं।

 भारत के सर्वोच्च विज्ञान शिक्षण संस्थान, बेंगलुरु के ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ (आईआईएससी) का उदाहरण देखिए। इस संस्थान में वर्ष 2016 से 2020 के बीच पीएचडी कार्यक्रमों में दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों में से केवल 21 प्रतिशत उम्मीदवार एसटी वर्ग से, 9 प्रतिशत एससी से और 8% ओबीसी वर्ग से थे। इसका अर्थ हुआ कि इस संस्थान में पिछड़ों की स्थिति दलितों से भी खराब है। इस संस्थान में इंटीग्रेटेड पीएचडी कार्यक्रमों में कुल प्रवेश प्राप्त छात्रों में 9 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 12 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 5 प्रतिशत ओबीसी वर्ग से थे।

दूसरी तरफ देश के 17 आईआईआईटी (भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों) में कुल पीएचडी उम्मीदवारों में से बमुश्किल 1.7%एसटी, 9% अनुसूचित जाति और 27.4%ओबीसी श्रेणियों से थे। इसी तरह भारत के 31 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी (NIT) और सात भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (IIRS) में वर्ष 2017 से 2020 के बीच आरक्षित श्रेणी के पीएचडी उम्मीदवारों की संख्या भी बहुत कम है। सन् 2015 से 2019 के बीच आईआईटी-मुंबई में पीएचडी के सभी उम्मीदवारों में से केवल 1.6% एसटी, 7.5% एससी और 19.2% ओबीसी श्रेणी से थे।

चार फरवरी को केंद्रीय शिक्षा मंत्री पोखरियाल ने जो आँकड़े बताए उनमें इन संस्थानों में पीएचडी कार्यक्रमों से ड्रॉपआउट छात्रों के आंकड़े भी शामिल थे। इन सभी संस्थानों में से सात IISER का रिकार्ड विशेष रूप से खराब पाया गया। इसका कारण यह है कि इन संस्थाओं में से अनुसूचित जनजाति श्रेणी के 13.3% छात्रों को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

यह तब है, जबकि कानूनी रूप से भारत में पिछड़े वर्ग के लिए 27%, अनुसूचित जाति वर्ग के लिए 15% और जनजाति वर्ग के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान है। राज्यसभा में शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जो आंकड़ा दिया गया उससे साफ पता चलता है कि इन संस्थानों में छात्रों की जितनी संख्या होनी चाहिए, असल में छात्रों की संख्या उससे बहुत कम है। इसका यह भी अर्थ है कि बहुजनों के हक में बने आरक्षण के कानून को कानूनी रूप से कागजों में खत्म किए बिना ही जमीन पर इसे पूरी तरह खत्म कर देने की साजिश रची जा रही है।

नवंबर 2020 में हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में इस मुद्दे पर आंकड़ों सहित खबर प्रकाशित की गई थी। अखबार की उस रिपोर्ट के अनुसार एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों द्वारा पर्याप्त संख्या में आवेदन किए जाने के बावजूद आईआईटी-मुंबई में पीएचडी कार्यक्रमों में आरक्षित वर्ग के छात्रों की संख्या बहुत कम बनी हुई है। यानी साफ है कि इन छात्रों का चयन के दौरान और चयन के बाद पढ़ाई के दौरान इनकी संख्या अचानक से घट रही है।

राज्यसभा में इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद भारतीय छात्र महासंघ (एसएफआई) की केंद्रीय कार्यकारी समिति ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया है। बयान में साफ तौर पर कहा गया है कि देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में आरक्षण के विधान द्वारा बनाए गए मानदंडों के लगातार उल्लंघन के कारण इन संस्थानों में वंचित बहुजनों का प्रतिनिधित्व लगातार काम होता गया है। इसका साफ मतलब यह है कि इन संस्थानों में शिक्षण-प्रशिक्षण का समावेशी माहौल नहीं बन पा रहा है। इसी के चलते छात्रों को बड़ी संख्या में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ रही है।

निश्चित तौर पर वंचित समाज के बच्चों द्वारा बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की एक बड़ी वजह यह भी है और जिस तरह हाशिये के समाज को एक बड़ी साजिश के तरह हर क्षेत्र में आगे बढ़ने को रोका जा रहा है, उसके खिलाफ देश के बहुजनों को आवाज उठाने की जरूरत है।

  • रिपोर्ट- संजय श्रमण

दलित क्रिश्चियंस के साथ भेदभाव, उठी ‘दलित बिशप’ की मांग

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 तमिलनाडु के कुंभकोणम में दलित क्रिश्चियन्स के खिलाफ चर्च के भीतर लंबे समय से चल रहे भेदभाव का मामला सामने आया है। कुंभकोणम के दलित क्रिश्चियन्स ने अपने डायोसीस क्षेत्र में एक दलित बिशप बनाए जाने की मांग की है। इलाके के आठ दलित क्रिश्चियन समूहों ने छह फरवरी को एक पैदल मार्च निकाला और बिशप सहित डायोसियस के अन्य अधिकारियों को अपनी मांग एवं ज्ञापन सौंपा। गौरतलब है कि कुंभकोणम के वर्तमान बिशप ‘एन्टोनीसामी’ शीघ्र ही रिटायर होने जा रहे हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए स्थानीय दलित क्रिश्चियन्स चाहते हैं कि अगला बिशप किसी दलित क्रिश्चियन को बनाया जाए। ये लोग ऐसा इसलिए चाहते हैं कि उन्होंने स्थानीय चर्च में एवं चर्च से जुड़ी गतिविधियों में दलित क्रिश्चियन्स के खिलाफ भेदभाव अनुभव किया है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता एवं दलित क्रिश्चियन कुदंथाई अरासन ने बताया कि हम लोगों के साथ सामान्य समाज में ही नहीं बल्कि क्रिश्चियन समाज में भी कई दशकों से भेदभाव हो रहा है। और इस तरह का भेदभाव केवल तमिलनाडु में ही नहीं होता है बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी हो रहा है। अरासन ने यह भी बताया कि कुंभकोणम डायोसीस 1 सितम्बर 1899 को स्थापित किया गया था, तब से लेकर आज तक बीते 121 सालों में आज तक किसी दलित क्रिश्चियन को बिशप नहीं बनाया गया। कुंभकोणम ही नहीं बल्कि पूरे तमिलनाडु में किसी भी डायोसीसएक भी दलित बिशप नहीं है। इस बात से स्थानीय दलित लोगों में आक्रोश है। यहाँ यह समझना जरुरी है कि भारत में दलितों के खिलाफ भेदभाव एवं अत्याचार भारत में सभी धर्मों में होता है। बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने जोर देते हुए कहा था कि ब्राह्मण धर्म की जाति व्यवस्था एक बीमारी है। यह बीमारी भारत में आये अन्य धर्मों में भी फ़ैल गयी है। भारत में ईसाईयों और मुसलमानों में भी अपने धार्मिक समुदायों के दलितों के खिलाफ भेदभाव किया जाता है। यह भारत के सामाजिक स्थायित्व और लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक बात है।

Photo Credit- ucanews.com

निजीकरण के विरोध में बैंककर्मी, चार दिन के लिए करेंगे हड़ताल

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 केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट में दो और सरकारी बैंकों के निजीकरण के ऐलान के बाद बैंक कर्मचारी आंदोलन के मूड में हैं। सरकार द्वारा घोषित निजीकरण के विरोध में बैंक कर्मचारी सामने आ गए हैं। निजीकरण के विरोध में सरकारी बैंकों के कर्मचारियों ने दो दिनों की हड़ताल करने का ऐलान कर दिया है। इसकी वजह से मार्च में बैंक लगातार चार दिन तक बंद रह सकते।

सरकारी बैंकों (PSBs) के कर्मचारियो के संगठनों ने 15 और 16 मार्च को दो दिनों की हड़ताल का ऐलान किया है।  इसके पहले 13 मार्च को महीने का दूसरा शनिवार और 14 मार्च को रविवार होने की वजह से बैंक वैसे ही बंद रहेंगे। इस हड़ताल का ऐलान नौ बैंक यूनियन के केंद्रीय संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स ने किया है। निजीकरण को लेकर सरकारी बैंकों के कर्मचारियों में डर बन गया है। इसकी वजह यह है कि इस निजीकरण का शिकार बड़े से लेकर छोटा तक कोई भी बैंक हो सकता है। गौरतलब है कि इसस पहले सरकार आईडीबीआई बैंक का साल 2019 में निजीकरण कर चुकी है और पिछले चार साल में 14 सरकारी बैंकों का विलय भी किया गया है।

सिरपुर बौद्ध महोत्सव का कार्यक्रम घोषित, छत्तीसगढ़ की धरती बनेगी बुद्धमय

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 छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय बौद्ध स्थल सिरपुर में अंतरराष्ट्रीय सिरपुर बौद्ध महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी का आयोजन आगामी 12-14 मार्च को होने जा रहा है। यह आयोजन ‘पुरखा के सुरता’ (पूर्वजों को याद करना) के तहत आयोजित किया जा रहा है। महोत्सव का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना है। यह महोत्सव छत्तीसगढ़ की प्राचीन बौद्ध में संस्कृति एवं उसकी भव्यता को स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। सिरपुर महोत्सव में धम्म, कला-स्थापित, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, समाज एवं इतिहास पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे।

प्रदेश की राजधानी बिलासपुर में शांतिनगर स्थित केंद्रीय कार्यालय में अंतरराष्ट्रीय सिरपुर बौद्ध महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी के आयोजक समिति के पदाधिकारियों की बैठक हुई। सिरपुर महोत्सव छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बौद्ध विरासत को सहेजने के लिए सांस्कृतिक व बौद्धिक चेतना जगाने बौद्ध भिक्षुयों के सानिध्य में आयोजन किया जा रहा है। आयोजन समिति के प्रवक्ता डॉ नरेश कुमार साहू ने बताया कि सिरपुर महोत्सव छत्तीसगढ़ सहित भारत देश के लिए बौद्धिक विचार, विरासत एवं संस्कृति अनुठा संगम होगा। महोत्सव को भव्यता प्रदान करते हुए सफल बनाने के लिए सिरपुर के आसपास के गांव, कस्बो से लेकर प्रदेश-देश व विदेशों तक बौद्ध विरासत की ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने के लिए प्रचार-प्रसार किया जाना है।

तीन दिवसीय महोत्सव में छत्तीसगढ़ी कलाकारों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति होगी। समारोह में देश व दुनिया के प्रख्यात विद्ववानों, भाषाविद, पुरातत्वविद, इतिहासकार, पत्रकारों, शोधकर्ताओं, लेखकों, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों, साहित्यकारों व बुद्धजीवियों का प्रबोधन सत्र भी आयोजित किए जाएंगे। बौद्ध विरासत पर आधारित नाटक का मंचन, लघु फिल्मों का प्रदर्शन, महापुरुषों की जीवनी पर पोस्टर प्रदर्शनी और पुस्तको का स्टॉल भी लगाया जाएगा। महोत्सव में कला, संस्कृति, शिक्षा, साहित्यिक और सामाजिक सहित अन्य क्षेत्रों में आजीवन प्रेरणादायक योगदान देने वाले शख्शियतों को पुरस्कृत करते हुए अवार्ड दिया जाएगा। बौद्ध विरासत और संस्कृति पर आधारित प्रतियोगिता निबंध, गीत, कविता, रंगोली, रेत आर्ट, चित्रकला, पेंटिंग व प्रश्नोत्तरी स्पर्धा आयोजित कर विजेताओं को महोत्सव के समापन अवसर पर पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।

बैठक में आयोजन समिति छत्तीसगढ़ हेरिटेज एन्ड कल्चरल फाउंडेशन, सिरपुर महोत्सव एवं सोशल वेलफेयर फाउंडेशन के पदाधिकारियों में रघुनंदन साहू, रामकृष्ण जांगड़े, शगुन लाल वर्मा, डॉ आरके सुखदेवे, डॉ नरेश कुमार साहू, डॉ जितेंद्र सोनकर, शिव टंडन, अनिल कोरी, अंजू मेश्राम, कल्याण साहू, डॉ रामचंद्र साहू, कृष्णा पैकरा, हेमंत जोशी, अग्निश देव, रवि साहू, स्नेहलता हुमने, बीनिका दुर्गम, भावेश पटेल, निखिल हगवने व अन्य सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे।

इस देश में सड़कों पर उतरे बौद्ध भिक्खु, ये है वजह

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 म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। तख्तापलट के बाद से ही इसके खिलाफ वहां लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आलम यह है कि विरोध प्रदर्शन में अब नर्स और बौद्ध भिक्खु भी उतर गए हैं। बौद्ध भिक्खुओं के सड़क पर उतरने से सैन्य सरकार घबरा गई है और उसने आंदोलन को कुचलने की धमकी दी है। यहां तक की प्रदर्शनकारियों को गोली तक मारने के आदेश दे दिए गए हैं।

इसके बावजूद राजधानी नेपीता और यंगून समेत देश के कई हिस्सों में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए और सत्ता निर्वाचित नेताओं के हाथों में सौंपने की मांग कर रहे हैं। म्यांमार के दूसरे सबसे बड़े शहर मांडले के सात कस्‍बों में सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक कर्फ्यू लगाया गया है।

गौरतलब है कि म्यांमार की सेना ने विगत एक फरवरी को नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) पार्टी की सरकार को अपदस्थ कर दिया था और खुद सत्ता पर काबिज हो गई थी। इसके बाद विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन म्यिंट सहित कई शीर्ष नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। इसके बाद से ही विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है। हजारों प्रदर्शनकारी जमा होकर तख्तापलट के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस से कहा कि वे सेना नहीं बल्कि जनता के लिए काम करें।

बहुजन समाज की बेटी मनीषा की मदद को आगे आए बसपा महासचिव रामअचल राजभर, दी बड़ी आर्थिक मदद

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 बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पूर्व कैबिनेट मंत्री तथा अकबरपुर से बसपा विधायक रामअचल राजभर ने राजभर समाज की पीड़ित मनीषा को इंसाफ दिलाने के लिए खड़े हुए हैं। विगत 2 फरवरी को रामअचल राजभर पीड़िता मनीषा राजभर को देखने बीएचयू ट्रामा सेंटर पहुंचे। उन्होंने मनीषा को न्याय दिलाने के लिए उसके माता-पिता को आश्वस्त किया, साथ ही आर्थिक सहयोग के रूप में एक लाख रुपये का सहयोग भी दिया।

पूर्व कैबिनेट मंत्री ने उच्च अधिकारियों से इस बारे में बात की और पीड़िता को न्याय दिलाने की अपील की। अपने समर्थकों में मंत्रीजी के रूप में लोकप्रिय रामअचल राजभर के सथ बीएचयू ट्रामा सेंटर में गाजीपुर से पूर्व राज्य मंत्री रमाशंकर राजभर, संजय राजभर, हर्ष राजभर (पूर्व महानगर अध्यक्ष  वाराणसी मंडल सेक्टर प्रभारी) तथा प्रदीप गौतम जिला अध्यक्ष चंदौली आदि समर्थक मौजूद थे।

रामअचल राजभर के वाराणसी पहुंचने से जहां उनके समर्थकों में भारी उत्साह था, तो वहीं राजभर समाज सहित तमाम वंचित समाज के लोगों ने उनके इस कदम की सराहना की। पूर्व मंत्री के इस दौरे से स्थानीय प्रशासन ने मजबूर होकर  अभियुक्त के खिलाफ पास्को एक्ट की धारा भी जोड़ दिया ।

गौरतलब है कि मनीषा राजभर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की बेटी है, जिनके साथ कुछ सामंती लोगों ने मारपीट की और गलत नियत के कारण रंजीश के कारण उस पर धारदार हथियार से हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया था, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई थी। जिससे मिलने बसपा के राष्ट्रीय महासचिव रामअचल राजभर पहुंचे थे। पीड़िता के परिवार ने इस आर्थिक मदद के लिए रामअचल राजभर का आभार जताया।बताते चलें की रामअचल राजभर बहुजन समाज के उन चंद नेताओं में हैं, जो वंचित समाज की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसी वजह से उनकी छवि एक लोकप्रिय नेता की है। यही वजह रही कि यूपी के विगत विधानसभा चुनाव में बसपा के खराब प्रदर्शन के बावजूद रामअचल राजभर भारी अंतर से जितने में कामयाब रहें। उन्होंने न सिर्फ खुद की जीत दर्ज की, बल्कि अंबेडकर नगर में बसपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा। उनकी छवि एक जनप्रिय नेता की है। जो हर दुख में वंचित समाज के साथ ही अपने क्षेत्र के सर्वसमाज के लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

दलित कार्यकर्ता नौदीप कौर की हिरासत की दुनिया भर में निंदा

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 अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी मीनाक्षी एशले हैरिस ने अपने ट्वीट्स के माध्यम से भारत की दलित मजदूर कार्यकर्ता पर हिरासत में हुए अत्याचारों का मुद्दा उठाया है। मीनाक्षी हैरिस खुद एक वकील और लेखिका हैं जिनकी सोशल मीडिया पर बड़ी पहचान है। भारतीय किसान आंदोलन के पक्ष में ट्वीट करने के बाद बीजेपी की विचारधारा के लोगों ने उनकी तस्वीरे जलाकर प्रदर्शन किया था। इसके जवाब में मीनाक्षी ने लिखा कि सोचिए अगर मैं भारत में होती तो ये लोग मेरे साथ क्या करते? गौरतलब है कि नौदीप कौर एक दलित युवती है जो मजदूरों के अधिकारों के लिए “मजदूर अधिकार संगठन” के माध्यम से काम कर रही हैं। पंजाब के मुख्तसर की नौदीप ने पिछले महीने सिंघू बॉर्डर पर उन्होंने किसान आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन किया था जिस कारण उन्हे पुलिस ने 12 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया था। नौदीप की बड़ी बहन राजवीर कौर ने अपनी छोटी बहन की हिरासत के दौरान पुलिस द्वारा उस पर हिंसा और यौन शोषण का आरोप लगाया है।

दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार नागरिक द्वारा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र सुदे मुद्दे उठाना एक सुखद अनुभव है। माना जा रहा है कि अमेरिका की नई डेमोक्रेट सरकार भारत में कमजोर होते लोकतंत्र को लेकर खासी चिंतित है। मीनाक्षी हैरिस द्वारा इस प्रकार से किसान आंदोलन एवं दलित महिला कार्यकर्ता के पक्ष में ट्वीट करने पर भारत के दरबारी मीडिया और बीजेपी समर्थक नेताओं की तरफ से भद्दे कमेंट्स की बाढ़ या गयी है। इस प्रकार ये मुद्दे अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के चर्चा के केंद्र में आने लगे हैं। अपनी आक्रामक दुष्प्रचार की रणनीति पर चलते हुए बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं ने अमेरिकी सिलेब्रिटीज के ट्वीट्स पर अनावश्यक प्रतिक्रिया देकर इन मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय बना दिया है।

हरामी व्यवस्थाः मध्यप्रदेश के मंदसौर में दलित की बारात रोकी

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 मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के एक गाँव से दलित उत्पीड़न की खबर है। जिले में दलितों की बरात रोकने के मामले लगातार आ रहे हैं और शासन-प्रशासन इन मामलों पर लगाम लगाने में बेअसर साबित हो रहा है। सवर्ण समाज के जातिवादी गुंडों द्वारा दलितों की बरात रोकने सहित दलितों के परिवारों के अपमान करने और उन्हें डराने धमकाने की खबरें भी लगातार आ रही हैं। गौरतलब है कि हालिया मामले के पहले भी दो ऐसे ही मामलों में पुलिस की मदद से दलितों की बारात निकाली गयी थी।

इन दो मामलों के बाद ठीक ऐसा ही एक मामला मंदसौर के शामगढ़ थाना क्षेत्र के गुराडिया माता स्थान पर देखा गया है।शनिवार छह फरवरी की रात इस स्थान पर एक दलित समाज के युवक दीपक की बरात निकल रही थी। इसी दौरान रात साढ़े आठ बजे इस बारात को जातिवादी गुंडों ने बारात रोककर दलित परिवार के साथ मारपीट और अभद्रता की। दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया गया। पीड़ित दलित परिवार ने इन जातिवादियों के खिलाफ शामगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। हालांकि साकारात्मक बात यह रही कि शिकायत के आधार पर शामगढ़ पुलिस ने आठ नामजद आरोपियों के खिलाफ रविवार सात फरवरी को एफआईआर दर्ज की है। लेकिन पुलिस के सामने पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने की भी चुनौती है।

बीते कुछ दशकों में न केवल दलितों के खिलाफ जातीय उत्पीडन के मामले बढ़े हैं, बल्कि हालिया अनुभव बता रहा है कि शासन प्रशासन में दलितों बहुजनों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है। उत्पीड़न के मामले में फौरी राहत और न्याय नहीं मिल पाने या इसमें दिक्कत आने के कारण स्थानीय पुलिस, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग या फिर न्यायालय ही क्यों न हो, दलित-बहुजनों का इन संस्थाओं में विश्वास घटा जा रहा है। यह भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक बात है।

गौरतलब है कि यह विधानसभा क्षेत्र कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह डंग का है जो स्वयं सिख अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसके बावजूद उनके अपने इलाके में हाल ही में यहाँ इस तरह का यह दूसरा मामला आया है।

लालू यादव की तबीयत बिगड़ी, पूरा परिवार दिल्ली में मौजूद

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 रांची रिम्स से दिल्ली एम्स आने के बावजूद राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव की तबीयत में बहुत सुधार नहीं दिख रहा है। लालू प्रसाद पहले से हार्ट और किडनी की बीमारी से ग्रस्त हैं। निमोनिया होने के बाद उनकी स्थिति ज्यादा बिगड़ गई थी। उन्हें रांची से दिल्ली AIIMS रेफर किया गया था। जानकारी के अनुसार लालू प्रसाद की अभी स्थिति यह है कि निमोनिया की दवा तो चल रही है लेकिन जिस तेजी से सुधार की उम्मीद डॉक्टरों को है उस तेजी से सुधार नहीं हो पा रहा है। दवाओं का असर कम हो रहा है। इससे पूरे परिवार कि चिंता बढ़ी हुई है। फिलहाल तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव, राबड़ी देवी और मीसा भारती दिल्ली में ही मौजूद हैं।

 बिहार विधानसभा में रविवार को आयोजित शताब्दी समारोह में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को भी शामिल होना था। उम्मीद थी कि वे 7 फरवरी को दिल्ली से पटना लौट आएंगे। लेकिन लौटने का कार्यक्रम दो दिनों के लिए बढ़ा दिया गया। दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की तबीयत अभी ऐसी नहीं है कि उन्हें छोड़कर आया जा सके। बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने लालू प्रसाद यादव को रिहा करने के लिए आजादी पत्र लिखने का अभियान पटना में शुरू किया था। आगे लिखे गए पत्रों को राष्ट्रपति को भेजने के लिए वे आने वाले थे लेकिन पिता की खराब तबीयत की वजह से वे भी पटना नहीं आ पा रहे हैं।

राकेश टिकैत की किसान महापंचायत में पांच प्रस्तावित पारित, सरकार की मुश्किलें बढ़ी

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 कृषि बिल के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार जोर पकड़ता जा रहा है। जगह-जगह किसान महापंचायत कर किसानों को एकजुट किया जा रहा है। 7 फरवरी रविवार को हरियाणा के दादरी स्थित कितलाना टोल प्लाजा पर किसान महापंचायत का आयोजन किया गया। इस महापंचायत में पंद्रह हजार से अधिक किसान मौजूद रहे। महापंचायत को संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत, दर्शनपाल सिंह और बलबीर सिंह राजेवाल ने संबोधित किया। महापंचायत में हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर-प्रदेश की 50 से अधिक खापों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। करीब ढाई घंटे चली महापंचायत में मंच से पांच प्रस्ताव पारित किए गए। इस दौरान किसान नेता राकेश टिकैत ने मंच से एलान किया कि किसानों की मांगें पूरी होने तक आंदोलन किसी भी सूरत में खत्म नहीं होगा। सरकार ये बात भली-भांति समझ ले। किसान महापंचायत की अध्यक्षता दादरी से निर्दलीय विधायक एवं सांगवान खाप-40 के प्रधान सोमबीर सांगवान ने की।

ये पांच प्रस्ताव हुए पास

  • कृषि कानून वापिस लिए जाएं और एमएसपी की गारंटी तय हो
  • किसानों पर जो झूठे मुकदमें दर्ज किए गए हैं वो रद्द होने चाहिए
  • दिल्ली परेड में गिरफ्तार युवाओं और किसानों की तुरंत रिहाई हो
  • दिल्ली हिंसा में किसानों के जो वाहन जब्त किए गए हैं उन्हें छोड़ा जाए
  • एनएच-152 डी के लिए अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा किसानों को मिले

कोविड टीकाकरण अभियान में जातिवाद की दुर्गंध

 कोविड-टीकाकरण के इस दौर में भी भारत की जाति-व्यवस्था ने एक बार फिर अपना घृणित चेहरा दिखाया है। कोविड-काल के शुरू में ही हम भारत का सांप्रदायिक चेहरा देख चुके हैं, जब एक तबक़े ने वायरस के प्रसार के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया था। भारत में कोविड का पहला टीका अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दिया गया। इसके लिए एम्स ने अपने सफ़ाई कर्मचारी मनीष कुमार को चुना। मनीष की जाति का कहीं उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन इस बात की लगभग शत-प्रतिशत दावे के साथ कही जा सकती है कि मनीष दलित या पिछड़े समुदाय से आते हैं क्योंकि भारत में सफ़ाई कर्मचारियों का लगभग शत-प्रतिशत उन दलित और पिछड़ी जातियों से आता है जिन्हें जाति-व्यवस्था के अनुसार गंदगी-संबंधी कामों को करने के लिए उपयुक्त माना गया है। अनेक अध्ययनों में यह बात सामने आती रही है कि भारत में निम्न माने जाने वाले कामों में लगे अधिकांश लोग दलित अथवा पिछड़ी जाति से आते हैं।

मनीष को टीका लगाने के बाद ही अन्य ‘बड़े लोगों’, मसलन एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया और नीति आयोग के सदस्य वी.के. पॉल ने टीका लगवाया। जिस समय मनीष को टीका लग रहा था, उस समय भारत के स्वास्थ्य मंत्री वहीं मौजूद थे और तालियाँ बजा रहे थे। टीकाकरण के बाद ख़ुद मनीष भी टीवी पर कहते पाए गये कि ‘सब लोग तो डर ही रहे थे, इसलिए मैंने सर (अपने उच्चाधिकारी) को कहा कि सबसे पहले मुझे लगवाओ। अगर मुझे कुछ होगा तो सबको दिखेगा। अगर मुझे कुछ नहीं होगा तो अपने आप पीछे से सब बंदे टीका लगवाने आ जाएँगे”।

दर-अस्ल, सिर्फ़ भारत में ही नहीं, दिसंबर, 2020 में दुनिया के 15 देशों में हुए सर्वेक्षण में पाया गया था कि अधिकांश लोग कोविड का टीका लेने से हिचक रहे हैं। सिर्फ़ अमेरिका और इंग्लैंड में कोविड की वैक्सीन के प्रति विश्वास कुछ बढ़ा था, वह भी सिर्फ़ पहले की तुलना में, अन्यथा इन दोनों देशों में भी वैक्सीन पर बहुत कम लोगों ने विश्वास प्रकट किया। शेष 13 देशों में वैक्सीन पर भरोसा कम हुआ था। चर्चित मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ ने भी पिछले दिनों 2015 से 2019 के बीच वैक्सीन पर लोगों के भरोसे के संबंध में एक वैश्विक अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें बताया गया था कि वैक्सीन पर से दुनिया भर में लोगों का विश्वास कम हो रहा है।

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एक सर्वेक्षण के अनुसार नवंबर, 2020 तक भारत में 80 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो टीका लेना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या घटती गयी। दिसंबर में पाया गया कि भारत में महज़ 31 प्रतिशत लोग ही टीका लेना चाहते हैं। ग़ौरतलब है कि पिछले पखवाड़े में अनेक देशों में टीकाकरण अभियान शुरू हो चुका है, लेकिन अधिकांश जगहों पर इसे लेकर उत्साह नहीं है। इसके कारणों पर हम फिर चर्चा करेंगे।

लेकिन आपको याद होगा कि पहले सरकारें और फार्मा कंपनियाँ मीडिया में ऐसी भूमिका बाँध रही थीं मानो टीका लेने के लिए लोग उतावले हैं और मानो टीकाकरण केन्द्रों पर इतनी भीड़ उमड़ेगी कि उसे सँभालना मुश्किल हो जाएगा। कई जगहों पर तो टीका को लूट के भय से सुरक्षा बलों की देख-रेख में एक जगह से दूसरी जगह लेने जाए जाने की तस्वीरें प्रकाशित करवाई जा रही थीं, ताकि जनता में इनके प्रति उतावलापन जगाया जा सके। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो यहाँ तक कहा कि टीका पर पहला हक़ स्वास्थ कर्मियों, फ्रंटलाइन वर्कर्स और स्वच्छता कर्मियों का है। पहले चरण में सिर्फ़ इन्हें ही टीका दिया जाएगा। कोई सांसद-विधायक पंक्ति तोड़कर टीका लेने वालों की लाइन में नहीं लगेगा। भारतीय मीडिया में इसे ‘कोविड योद्धाओं’ के प्रति व्यापक उदारता के रूप में प्रदर्शित किया गया।

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लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही थी। असली बात यह थी कि लोग टीके के प्रति बहुत सशंकित हैं। 16 जनवरी, 2021 को भारत में वैक्सीनेशन अभियान शुरू हुआ तो उसे कई राज्यों में असफलता का मुँह देखना पड़ा। पहले चरण के टीकाकरण अभियान के तहत स्वास्थ्य कर्मियों, सफ़ाई कर्मचारियों और समाज में घुल-मिलकर काम करने वाले लोगों (फ्रंट लाइन वर्कर्स) को मुफ़्त टीका दिया जाना है। इनका ख़र्च सरकार वहन करेगी। जिन लोगों को टीका दिया जाना है, उनकी सूची तैयार की गयी है तथा सरकारी अमले को उन्हें टीकाकरण केन्द्रों तक आने के लिए प्रेरित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है। उनकी ट्रैकिंग के लिए तकनीक का भी व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद जिन लोगों के नाम सूची में हैं, उनमें से ज़्यादातर टीका लगवाने नहीं आ रहे।

अभी हमारे पास टीकाकरण अभियान के पहले दो दिन के कुछ आंकड़े उपलब्ध हैं। आन्ध्र प्रदेश में शुरू के दो दिनों में 58, 803 लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य था, जिनमें से सिर्फ़ 32,149 लोग ही टीका लेने पहुँचे। कर्नाटक में 21,658 में से महज़ 13, 408 लोग ही टीका केन्द्रों पर आये। असम में पहले दिन के टीकाकरण की सूची में 6,500 लोगों के नाम थे, जिनमें से सिर्फ़ 3, 528 लोग ही टीका केन्द्रों पर पहुँचे। तमिलनाडु और उड़ीसा में वैक्सीन का प्रतिशत ज़रूर कुछ ऊँचा रहा। लेकिन कहीं भी निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।

दिल्ली और महाराष्ट्र को कोविड का हॉट स्पॉट कहा जा रहा था, लेकिन महाराष्ट्र में भी 28,251 स्वास्थ कर्मियों की सूची में से महज़ 14,883 ही लोग टीकाकरण केन्द्रों पर आये। इसी प्रकार, दिल्ली में लगभग 50 प्रतिशत लोग टीका लगावाने पहुँचे ही नहीं। दिल्ली सरकार ने कहा है कि वह “लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु उपाय करेगी”। दिल्ली में तो राम मनोहर लोहिया अस्पताल के कुछ डाक्टरों ने दिए जा रहे वैक्सीन को लेकर सवाल तक उठाया।

मीडिया में भी यह सुगबुगाहट है कि टीका लेने के लिए डॉक्टर व अन्य स्वास्थ्य कर्मी नहीं आ रहे बल्कि ग़रीब स्वच्छता कर्मियों को आगे किया जा रहा है। हालांकि चूंकि मीडिया ने सरकार की ओर से आंखें बंद कर ली है, इसलिए इस पर चर्चा नहीं हो रही। सभी जानते हैं कि टीका पहले लेने का ख़तरा उठाने के लिए निम्न कही जाने वाली जातियों से आने वाले जिन स्वच्छता कर्मियों को आगे किया जा रहा है, वे सदियों से सामाजिक और आर्थिक दमन का शिकार रहे हैं। दलित-पिछड़े समुदाय से आने वाले इन लोगों को इस प्रकार खतरा लेने के लिए धकेले जाने का परिणाम क्या होता है, यह भी इस बीच देखने को मिला।

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जिन लोगों को शुरू के दो दिन में टीका लगा, उनमें से ‘कम से कम’ 447 लोगों पर वैक्सीन के दुष्प्रभावों की बात भी सरकार ने स्वीकार की। ये दुष्प्रभाव हाथ नहीं उठने से लेकर बेहोश हो जाने तक के रहे। कुछ लोगों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। इनमें से अधिकांश बहुत छोटे पदों पर काम करने वाले कर्मचारी, आशा वर्कर्स, वार्ड ब्वाय, सफाई कर्मचारी, आदि हैं।

एम्स में मनीष नाम को जो सफाई कर्मी भारत में कोविड का पहला टीका लेने वाले आदमी बने, उनका स्वास्थ्य तो ठीक रहा, लेकिन मनीष के साथ एम्स ने अपने कई अन्य निम्न स्तरीय कर्मचारियों को भी शुरू में ही टीका लेने के लिए तैयार किया था। इनमें से एक 22 वर्षीय सुरक्षा गार्ड को टीका लगते ही उसके पूरे शरीर में दाने निकलने लगे और वह खुजली से पागल होने लगा। उसे हृदय की गति असामान्य रूप से बहुत तेज़ महसूस होने लगी, साँस रुकने लगी तथा सिर दर्द से फटने लगा। उसे तुरंत आईसीयू में भर्ती किया गया जिससे उसकी जान बच सकी।

 इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वैक्सीन के बाद तीन लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि भारत सरकार ने उसे टीका से हुई मौत मानने से इनकार कर दिया, जबकि मृतकों के परिजनों ने कहा कि मृतक की तबीयत टीका लेने के तुरंत बाद बिगड़ी थी और वे पहले से स्वस्थ थे। सभी मृतक समाज के निम्न तबक़े से ही आते हैं जो बहुत कम पगार वाली नौकरियों में थे। इनमें से एक थे उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के ज़िला अस्पताल में ‘वार्ड ब्वॉय’ के रूप में काम करने वाले 46 वर्षीय महिपाल सिंह, दूसरे कर्नाटक के बेल्लारी ज़िले के स्वास्थ विभाग में निम्न-पद पर कार्यरत कर्मचारी नागराजू और तेलांगना निर्मल जिले के 42 वर्षीय एंबुलेंस ड्राइवर बिठ्ठल।

महिपाल सिंह को पहले से निमोनिया था। उनके बेटे ने मीडिया को बताया कि “वैक्सीन देने से पहले उनकी जाँच तक नहीं की गयी। वैक्सीन पड़ने के बाद वे हाँफने लगे। इसके बावजूद उनसे नाइट ड्यूटी भी करवाई गयी। नाइट ड्यूटी के दौरान ही उनकी तबीयत और बिगड़ने लगी। उनके हृदय की धड़कन बहुत तेज़ होने लगी तथा साँस रुकने लगी। उसके बाद वे घर लौट आये। घर पहुँचने पर उनकी तबीयत और ज़्यादा बिगड़ गयी। हम लोगों ने सरकारी एम्बुलेंस के लिए फ़ोन किया, लेकिन एम्बुलेंस आने में भी काफ़ी देर लग गयी। जब तक उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया, उनकी मौत हो चुकी थी”।

नागराजू की और विठ्ठल की भी यही कहानी रही। उनके परिजनों ने बताया कि कोरोना की वैक्सीन दिए जाने से पहले वे बिल्कुल स्वस्थ थे। वैक्सीन दिए जाने के कुछ घंटों बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। अगले दिन उनको सीने में दर्द और साँस लेने में परेशानी शुरू हो गयी। जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी। यानी अगर टीके से परेशानी नहीं भी है तो भी क्या वैक्सीनेशन से पहले बेहतर तरीके से उनकी जांच नहीं की जानी चाहिए, या फिर उन्हें पहले से कोई दिक्कत है या नहीं, उस पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए था?

सच्चाई यह है कि भारत का उच्च वर्ग, जो सामान्य तौर पर सामाजिक रूप से उच्च और शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे है, वह ‘इंतज़ार करो और देखो’ की नीति पर चल रहा है। उसके लिए वैक्सीन की राजनीति एक ऐसा समुद्र मंथन है जिसके बारे में वह अभी कुछ तय नहीं कर पा रहा है। इस मंथन से निकले कलश में अगर अमृत साबित होगा, तभी वह उसे ग्रहण करेगा, लेकिन उससे पहले शूद्रों-अतिशूद्रों (मूल हिन्दू मिथक के अनुसार असुरों-राक्षसों) को उसे चखकर देखना होगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

संस्मरण माता प्रसाद: जनता के राज्यपाल का जाना

 वरिष्ठ साहित्यकार और अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद जी का दिनांक 19 जनवरी, 2021 को रात में 12 बजे लखनऊ में निधन हो गया। 20 जनवरी की सुबह लखनऊ से माता प्रसाद जी के पुत्र एस.पी. भास्कर जी ने फोन पर यह दुःखद सूचना दी। ख़बर अप्रत्याशित नहीं थी इसलिए आश्चर्य नहीं हुआ। लगभग पन्द्रह दिन से वह कोमा में थे। कुछ दिन पहले ही भास्कर जी से फ़ोन पर बात हुई थी तो उन्होंने बताया था कि उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा है और शरीर के अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया है। कई वर्ष पहले से उनकी श्रवण शक्ति काफ़ी कम हो गयी थी और आवाज़ भी बैठने लगी थी। पिछले साल इलाहाबाद में एक कार्यक्रम में हम मिले थे तो बहुत मुश्किल से वह कुछ शब्द ही माइक के सामने बोल पाए थे। कुछ माह से उनकी आवाज़ लगभग बंद हो गयी थी। लेकिन उनका मस्तिष्क चेतन और सक्रिय था। हाथ भी काम करते थे। और वह लिख-पढ़ रहे थे।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें  एक स्कूल अध्यापक से राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले माता प्रसाद जी का राजनीतिक जीवन बहुत उज्जवल रहा। अपनी कार्यकुशलता के बल पर 1955 में ज़िला कांग्रेस कमेटी के सचिव बने। शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधान सभा सदस्य तथा 1980 से 1992 तक दो बार विधान परिषद के सदस्य रहे। 1988 से 1989 तक वह मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार में राजस्व मंत्री रहे। तत्पश्चात 1993 से 1999 तक वह अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल और पूर्वोत्तर परिषद के अध्यक्ष रहे। इसी दौरान जब्बार पटेल के निर्देशन में डॉ. अंबेडकर के जीवन पर बनी चर्चित फिल्म की स्क्रिप्ट निर्माण समिति के चेयरमैन माता प्रसाद थे। सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व भी उन्होंने किया था। अपनी उपलब्धियों से जौनपुर की ज़मीन को गौरव प्रदान करने वाले माता प्रसाद जी को वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, जौनपुर द्वारा मानद डी.लिट. की उपाधि से अलंकृत किया गया।

माता प्रसाद जी की गौरवपूर्ण जीवन यात्रा को देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने झोंपड़ी से राजमहल तक की यात्रा अत्यंत सादगी, सहजता और सम्मान के साथ सफलतापूर्वक पूरी की। मामूली से मामूली व्यक्ति से भी वह खुलकर मिलते थे और उनकी बात सुनते थे। जिस तरह उन्होंने राजभवन के दरवाज़े आम आदमी के लिए खोल दिए थे, वह जनता के राज्यपाल बन गए थे। माता प्रसाद जी से पहले अनेक राज्यपाल हुए और भविष्य में भी अनेक राज्यपाल होंगे। लेकिन हर कोई उनकी तरह जनता का राज्यपाल नहीं हो सकता। माता प्रसाद जी भले कांग्रेस में रहें, बाबासाहब अम्बेडकर जिस तरह की भ्रष्टाचार मुक्त, मूल्य-आधारित राजनीति के पक्षधर थे और जैसी राजनीति और राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा हमारा संविधान करता है, माता प्रसाद जी उस पर पूरी तरह खरे उतरने वाले राजनेता थे। स्वच्छ, नैतिक और मूल्य-आधारित राजनीति का वह सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण थे। 1999 में राज्यपाल के पद पर उनका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही तत्कालीन गृहमंत्री द्वारा उनसे पद छोड़ने को कहा गया तो माता प्रसाद जी ने विनम्रतापूर्वक त्याग-पत्र देने से इंकार कर दिया था। माता प्रसाद जी ने मुझे फ़ोन पर बताया था कि गृह मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी ने गृह मंत्री के निर्देश पर उनसे फ़ोन पर स्वास्थ्य आधार पर त्याग पत्र देने को कहा था। माता प्रसाद जी का अपना विवेक होगा और उनके अपने सलाहकार भी रहे होंगे, लेकिन उन्होंने इस बात का ज़िक्र करते हुए मुझसे परामर्श माँगा तो मैंने भी उनको यह सुझाव दिया था कि स्वास्थ्य आधार पर त्याग-पत्र नहीं देना चाहिए, यह राजनीतिक आत्महत्या होगी। बेहतर है कि गृह मंत्रालय को संदेश दे दिया जाए कि नए राज्यपाल की नियुक्ति कर दें, उनके आते ही मैं तत्काल राजभवन छोड़ दूँगा। माता प्रसाद जी ने यही स्टेण्ड अपनाया और दृढतापूर्वक इस स्टेण्ड के साथ रहे। नतीजा यह हुआ कि गृह मंत्रालय बैकफ़ुट पर आ गया और माता प्रसाद जी ने सम्माजनक रूप से अपना कार्यकाल पूरा किया।

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माता प्रसाद जी से परिचय तो 1990 के आसपास ही हो गया था। भारतीय दलित साहित्य अकादमी के एक आयोजन में दिल्ली में उनसे पहली मुलाकात हुई थी। उनको लोगों से अत्यंत सहजता से मिलते और बात करते हुए देखकर बहुत अच्छा लगा था। उम्र, अनुभव और पद, हर तरह से वह मुझसे बहुत बड़े थे, इसलिए उनके निकट जाने में मुझे संकोच हुआ था। लेकिन उनकी सहजता और मिलनसार प्रवृत्ति मुझे उनके समीप ले गयी। उनसे घनिष्ठता हुई 1995 के आसपास। और इतनी अधिक हुई कि उसके पश्चात उनकी जब भी कोई पुस्तक प्रकाशन के लिए तैयार होती, उसकी पांडुलिपि वह मुझे अवश्य दिखाते थे। यदि वह दिल्ली आ रहे होते तो ख़ुद ले आते थे और दिल्ली नहीं आ रहे होते थे तो पांडुलिपि डाक से भिजवा देते थे। उनकी कई पुस्तकें मैंने अतिश प्रकाशन से प्रकाशित करवायीं तथा बाद में सम्यक प्रकाशन के स्वामी शांतिस्वरूप बौद्ध जी से उनका परिचय कराया। सम्यक प्रकाशन से सम्पर्क होने के पश्चात उनकी लगभग समस्त पुस्तकें सम्यक प्रकाशन से ही प्रकाशित हुईं। वह जब भी दिल्ली आते थे, अपने आने की सूचना फ़ोन या पत्र से देते थे, और हम अवश्य मिलते थे। कोमा में जाने से सप्ताह भर पहले ही उन्होंने अपनी एक पुस्तक की पांडुलिपि मेरे पास प्रकाशित कराने हेतु भिजवायी थी, जिसे देखकर मैं शीघ्र ही प्रकाशक को भेजूँगा।

उनकी सहजता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सन, 2000 में चंडीगढ़ में दलित साहित्यकार सम्मेलन में भाग लेने के लिए माता प्रसाद जी ने आयोजकों द्वारा प्रदान की गयी सुविधा न लेकर मेरे साथ मेरी कार से चंडीगढ़ जाने को प्राथमिकता दी। अपरिचितों के लिए भी परिचित से, परायों के भी अपने, और हर उम्र के लोगों के साथ चलने और ढल जाने वाले माता प्रसाद जी अपने आप में सज्जनता, सहजता और विनम्रता की एक मिसाल थे। एक युग थे। बिहारीलाल हरित उनके हम उम्र और जीवित दलित रचनाकारों में सबसे वरिष्ठ थे, माता प्रसाद जी उनका सम्मान करते थे। हरित जी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘भीमायण’, ’जगजीवन ज्योति’ और ‘वीरांगना झलकारीबाई’ से, विशेष रूप से उनकी कवित्त शैली से वह बहुत प्रभावित थे। माता प्रसाद जी के लेखन को लेकर कई लोगों को शिकायत रहीं। लेखन के अलावा राजनीति को लेकर भी बहुत से लोगों ने उनकी आलोचना की। कारण यह था बसपा सुप्रीमो मायावती जी के ख़िलाफ़ घोसी (उत्तर प्रदेश) चुनाव क्षेत्र से लोक सभा का उनका चुनाव लड़ना। कुछ लोगों को इस बात को लेकर शिकायत रही कि वह मायावती के ख़िलाफ़ चुनाव क्यों लड़े। भूलना नहीं चाहिए कि माताप्रसाद जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे और स्वेच्छा से चुनाव क्षेत्र का चयन करने की हैसियत उनकी नहीं थी। हर राजनीतिक व्यक्ति लोकसभा का सदस्य बनना चाहता है, और जहाँ, जिस चुनाव क्षेत्र से पार्टी द्वारा टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा जाता है, वह वहीं से चुनाव लड़ता है। माता प्रसाद भी इसका अपवाद नहीं थे। उनको पार्टी ने ‘घोसी’ चुनाव क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया तो उनके लिए वहाँ से चुनाव लड़ने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। लेकिन उनके लिए मायावती के विरुद्ध चुनाव लड़ने का तात्पर्य मायावती का विरोधी होना नहीं था। अन्य मुद्दों के साथ-साथ इस मुद्दे पर भी मेरी उनसे व्यापक चर्चा हुई थी। उनका यही कहना था-‘हम नहीं चाहते थे बहन जी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना, लेकिन पार्टी ने कहा तो लड़ना पड़ा।’ उनके ये शब्द उनकी राजनीतिक विवशता को दर्शाते हैं। निजी स्तर पर वह मायावती को पसंद करते थे और उनका सम्मान करते थे।

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कांग्रेस की राजनीति में होने के कारण माता प्रसाद जी पर गांधीवाद का प्रभाव था, जो बहुत स्वाभाविक था। किंतु गांधीवाद को उन्होंने सामाजिक सद्भाव के लिए उपयोगी पाया और उस रूप में ही अपनाया। न तो उन्होंने गांधी द्वारा वर्ण-व्यवस्था की पक्षधरता को स्वीकार किया और न रामराज्य के समर्थक रहे। बाद में, विशेष रूप से जब से वह दलित साहित्य से जुड़े, उन पर गांधीवाद का प्रभाव कम हो गया था और वह आम्बेडकरवाद की ओर झुक गए थे।

उनकी चेतना में आए परिवर्तन का ही परिणाम था कि जहाँ उन्होंने ‘दिग्विजयी रावण’, ‘एकलव्य’ और ‘भीमशतक’ जैसी काव्यकृति, ‘उदादेवी’, ‘धर्म का काँटा’, ‘तड़प मुक्ति की’, ‘अछूत का बेटा’, ‘धर्म के नाम पर धोखा’, ’वीरांगना झलकारीबाई’, ‘धर्म परिवर्तन’, ‘अंतहीन बेड़ियां’ और ‘खुसरो भंगी’ जैसे नाटक लिखे, जो उनके इतिहास-बोध को प्रतिबिम्बित करते हैं। कवि और नाटककार होने के अलावा माता प्रसाद जी अच्छे गद्यकार भी थे। उन्होंने गद्य में भी कई पुस्तकें लिखीं। ‘जातियों का जंजाल’, ‘उत्तर प्रदेश की दलित जातियों का दस्तावेज़’, ’लोक-काव्य में वेदना और विद्रोह के स्वर’, ‘मनोरम भूमि अरुणाचल’ और पूर्वोत्तर भारत की लोक संस्कृति पर लिखित उनकी प्रमुख गद्य पुस्तकें हैं। ‘झोंपड़ी से राजमहल’ माता प्रसाद जी की सर्वाधिक चर्चित कृति उनकी आत्मकथा है।

राजनीतिक रूप से दलित प्रश्नों के प्रति कांग्रेस की उदासीनता अथवा निष्क्रियता के कारण वह कांग्रेस की दलित संबंधी नीतियों से अप्रसन्न रहते थे, लेकिन कांग्रेस से उनका मोह भंग नहीं हुआ था। इस बिंदु पर आकर वह बहुजन विचारधारा की राजनीति के समर्थक हो गए थे। राजनीति में शिखर तक पहुँचने के उपरांत माता प्रसाद जी की विशेष पहचान और प्रतिष्ठा साहित्यकार के रूप में थी। भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ अम्बेडकर राष्ट्रीय सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनाऊ द्वारा साहित्य भूषण सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मानों से सम्मानित माता प्रसाद जी ने लगभग पचास पुस्तकों का लेखन किया। वह स्वामी अछूतानंद, चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु और बिहारीलाल हरित की परम्परा के महत्वपूर्ण कवि और नाटककार थे। उन्होंने अछूतानंद, जिज्ञासु और हरित जी की परम्परा को आगे बढ़ाया।

विवादों और प्रतिवादों से मीलों दूर रहने वाले माता प्रसाद जी सदैव संवाद के पक्षधर रहे। न किसी लेखक संघ के साथ जुड़े और न किसी के प्रति दूरी बनायी। जब, जहाँ भी उनको आमंत्रित किया गया, जहाँ तक भी सम्भव हो सका, वह सभी आयोजनों में गए और अपनी तरह से ही अपनी बात रखी, इसीलिए वह सबके ‘अपने’ थे। (फोटो क्रेडिट- सम्यक प्रकाशन)

जानिए क्यों दलित महिलाओं की प्रेरणा स्रोत बनीं कविता देवी

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 दलित महिलाओं के खिलाफ आए दिन अत्याचार की खबर आती रहती हैं। इन सबके बीच उत्तर प्रदेश की दलित किसान परिवार में जन्मी कविता देवी ने ‘खबर लहरिया’ नाम से अपना खुद का ‘डिजिटल रुरल न्यूज़ नेटवर्क’ बनाया है। कविता देवी तीस दलित महिला रिपोर्टर्स की मदद से यह नेटवर्क चला रही हैं जिसके माध्यम से दलित-बहुजन समाज से जुड़े मुद्दे उजागर किए जा रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि कविता देवी ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की एकमात्र दलित सदस्य भी हैं। उत्तर प्रदेश के एक हरदोई जिले के सुरसा ब्लॉक के एक छोटे से गाँव ‘कुंजनपुरवा’ में जन्मी कविता की शादी मात्र बारह साल की उम्र में कर दी गयी थी। उन्होंने खुद अपनी मेहनत से पढ़ाई की और एक समाजसेवी संस्था के साथ महिला शिक्षा पर काम करती रहीं। कविता बतातीं हैं “जब मैं यह काम शुरू किया तो हर कोई मेरे खिलाफ था, मैंने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए हर कदम पर संघर्ष किया।”

 कविता ने अपने इलाके में ‘महिला डाकिया’ नाम के बुन्देली न्यूजलेटर के लिए काम करते हुए पत्रकारिता सीखी। इसी दौरान कविता ने समाज के प्रति अपनी भूमिका की ताकत को किया। बाद में दिल्ली की समाज सेवी संस्था ‘निरंतर’ की मदद से उन्होंने ‘खबर लहरिया’ की शुरुआत की। यह पूरी तरह महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क है जो तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया द्वारा उपेक्षित खबरों की खबर लेता है। उनसे बार-बार पूछा जाता है कि आपके नेटवर्क में सिर्फ महिलायें क्यों हैं? इसपर कविता कहती हैं कि पत्रकारिता सहित दुनिया के सभी कामों में पुरुषों का दबदबा है, हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। कविता द्वारा शुरू किया गया यह ‘महिला न्यूज़ नेटवर्क’ भारत की दलित बहुजन महिलाओं के लिए एक मिसाल है। अतीत में माता सावित्रीबाई फूले ने बालिका शिक्षा और दलित-बहुजन समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी। माता सावित्री के पद-चिन्हों पर चलने वाली इस तरह की महिला नेत्रियों के कामों से बहुजन समाज में एक नई उम्मीद की रौशनी फैल रही है।

(फोटो क्रेडिट- www.thebetterindia.com)

किसान आंदोलन में शामिल हुई दलित महिला कार्यकर्ता का पुलिस पर बड़ा आरोप

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 नौदीप कौर नाम की एक दलित महिला मजदूर अधिकार कार्यकर्ता पर पुलिस हिरासत में कथित तौर पर हिंसा एवं यौन शोषण का मामला सामने आया है। ‘नौदीप कौर’ मजदूर अधिकार संगठन (MAS) की कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिंघू बॉर्डर पर किसान आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन के दौरान 12 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ़्तारी के बाद उनके परिवार द्वारा पुलिस पर उनके साथ हिंसा एवं यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। इस मामले पर तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया में कोई खबर नहीं आ रही है।

गौरतलब है कि पीड़िता पर आईपीसी सेक्शन 307 (हत्या की कोशिश) जैसा गंभीर आरोप लगाया गया है। उनके ऊपर तीन एफ आई आर दर्ज की गयी हैं। साथ ही दंगा भड़काने, घातक हथियार रखने, गैर कानूनी जमावड़ा करने, आपराधिक साजिश, शासकीय कर्मचारी के खिलाफ हिंसा इत्यादि जैसे आरोप लगाए गए हैं। पीड़िता के वकील ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर जानकारी दी है कि पीड़िता के निजी अंगों पर घाव एवं चोट के निशान हैं जो उनके खिलाफ यौन हिंसा के आरोप की पुष्टि करते हैं। नौदीप की बड़ी बहन राजीव कौर जो कि खुद एक छात्र-कार्यकर्ता हैं, और दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं, ने बताया है कि उनकी बहन की पुलिस हिरासत में बेरहमी से पिटाई की गयी है और पुरुष सिपाहियों द्वारा उनके कपड़े फाड़े गए हैं। यहाँ ध्यान देना होगा कि किसानों, मजदूरों के हक में आवाज बुलंद करने वाले कार्यकर्ता केंद्र सरकार के निशाने पर हैं। इसमें भी अगर वह कार्यकर्ता, पत्रकार या नेता दलित बहुजन समाज से आता/आती है तो उसके खिलाफ कहीं गंभीर षड्यन्त्रपूर्ण कार्यवाही की जाती है। नौदीप कौर का मामला भारत के मनुवादी शासन-प्रशासन सहित गोदी मीडिया की कार्यशैली को एक साथ उजागर करता है।

हिन्दू और हिन्दुत्व को बौद्धिक चुनौती देने वाले इतिहासकार प्रो. डी.एन. झा नहीं रहें

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 हिंदू धर्म और हिंदुत्व की राजनीति को खुली बौद्धिक चुनौती देने वाले प्रोफेसर डी. एन. झा (द्विजेंद्र नारायण झा) नहीं रहे। चार फरवरी को उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास का विशेषज्ञ माना जाता है। प्रोफेसर डीएन झा दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग में चेयरमैन रहें। उन्होंने हमेशा भारतीय इतिहास की खामियों को रेखांकित किया। जिन्होंने ‘मिथ ऑफ़ द होली काउ’ जैसी किताब लिखी जिसमें वे साबित करते हैं कि प्राचीन भारत में ब्राह्मण गोमांस खाते थे। इसके अलावा उन्होंने प्राचीन काल के स्वर्ण युग की अवधारणा को चुनौती दिया।

 उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि “ऐतिहासिक साक्ष्य ये कहते हैं कि भारतीय इतिहास में कोई स्वर्ण युग नहीं था। प्राचीन काल को हम सामाजिक सद्भाव और संपन्नता का दौर नहीं मान सकते। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी”। “गैर-ब्राह्मणों पर सामाजिक, क़ानूनी और आर्थिक रूप से पंगु बनाने वाली कई पाबंदियां लगाई जाती थीं। ख़ास तौर से शूद्र या अछूत इसके शिकार थे।” उन्होंने यह भी लिखा है कि “मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के आतंक और ज़ुल्म की बात और मुस्लिम शासकों को दानव के तौर पर पेश करने का दौर भी उन्नीसवीं सदी के आख़िर से ही शुरू हुआ था। क्योंकि उस दौर के कुछ सामाजिक सुधारकों और दूसरे अहम लोगों ने मुसलमानों की छवि को बिगाड़कर पेश करने को अपनी ख़ूबी बना लिया। जैसे कि दयानंद सरस्वती (1824-1883),  जिन्होंने अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में दो अध्याय इस्लाम और ईसाई धर्म की बुराई को समर्पित कर दिए। इसी तरह विवेकानंद (1863-1902) ने कहा कि, ‘प्रशांत महासागर से लेकर अटलांटिक तक पूरी दुनिया में पांच सौ साल तक रक्त प्रवाह होता रहा। यही है इस्लाम धर्म।”

 रामजन्म भूमि पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर उन्होंने लिखा, “ये फ़ैसला बहुसंख्यकवाद की तरफ़ झुका हुआ है। ये हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है।” उन्होंने लिखा कि “मौजूदा वक़्त में दलितों, ख़ास तौर से बौद्ध धर्म के अनुयायी दलितों के साथ जो दुश्मनी निभायी जा रही है, उसकी जड़ें हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था में हैं।” बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच के टकराव और  बौद्ध स्थलों पर हिंदुओं के कब्जे के बारे में उन्होंने लिखा कि “ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच की स्थायी दुश्मनी की झलक हमें दोनों ही धर्मों के ग्रंथों में मिलती है। इसके अलावा कई पुरातात्विक सबूत भी इस दुश्मनी की तरफ़ इशारा करते हैं, जो हमें ये बताते हैं कि किस तरह बौद्ध धर्म की इमारतों को ढहाया गया और उन पर क़ब्ज़ा कर लिया गया।”

उन्होंने लिखा कि “हक़ीक़त ये है कि भारत से बौद्ध धर्म के ग़ायब होने की बड़ी वजह ब्राह्मणवादियों का इसे अपना दुश्मन मानना और इसके प्रति उनका आक्रामक रवैया रहा। साफ़ है कि ब्राह्मण धर्म कभी बौद्ध धर्म की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर सका। इसलिए ये कहना ग़लत होगा कि हिंदू धर्म बहुत सहिष्णु है।” हिंदू  धर्म और हिंदुत्व की राजनीति को बौद्धिक चुनौती देने वाला एक योद्धा नहीं रहा, लेकिन उनकी अनके किताबें हमारे बीच हैं, जो हिंदुत्व की  राजनीति और वर्ण-जातिवादी हिंदू धर्म से संघर्ष के लिए हमारे हथियार हैं।

  • रिपोर्ट- डॉ. सिद्धार्थ के फेसबुक वॉल से