दलितों में ईर्ष्या और बिखराव

आम्बेडकरवाद को आप दलित मुक्ति के दर्शन के रूप में देखते हैं तथा दलित जातियों को आम्बेडकरवाद का हिमायती मानते हैं, तो आप को यह देखना भी जरूरी है कि क्या दलित जतियाँ आम्बेडकरवादी चिंतकों और क्रांतिकारियों का अनुसरण करती हैं। आज हर गाँव स्वार्थ में विभक्त है। सभी गाँवों में कई खेमे हैं। सवर्ण जातियाँ अपने वर्चस्व के मसले पर अनेक विभिन्नताओं के उपरांत भी एकमत हैं लेकिन दलित जातियाँ वर्चस्व कौन कहे, अपने मुक्ति के सवाल पर भी एकमत नहीं हैं और न एक ही हैं। सब के छोटे-छोटे स्वार्थ हैं। सभी के नाली, घूर व रास्ते के झगड़े हैं। इन झगड़ों के चलते दलितों में बहुत कटु मनमुटाव है। यहाँ तक कि दलित जातियों के लोग एक-दूसरे से किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं। दलित जातियों के मध्य आपस में बहुत बड़ी ईर्ष्या कार्य करती रहती है। कोई भी दलित अपनी जातियों में किसी से छोटा नहीं बनना चाहता है। दलित जातियाँ किसी के सामने विनम्र रहकर अगले की बात स्वीकार कर लेना तौहीन समझते हैं।

दलित एक दूसरे को देखकर तने रहते हैं। दलितों में एक अजीब सी अकड़ रहती है। दलित हमेशा ताना मारते रहते हैं। दलित अपने पड़ोसी को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। जब दलित सामान्य रहन-सहन में एक नहीं हैं, तो आम्बेडकर साहब के उद्देश्य और बातों-विचारों पर एक कैसे रहेंगे। ‘जय भीम’ कह लेना एक बात है लेकिन ‘जय भीम’ के अर्थ को ग्रहण करना दूसरी बात है। सामान्य दलित इस परिवर्तन में वैसा विश्वास नहीं रखता है जैसा एक सुविचारित आम्बेडकरवादी करता है। सामान्य दलित अपने गाँव के आम्बेडकरवादी चिंतक, विचारक और क्रांतिकारी के ऊपर बिल्कुल विश्वास नहीं करता है और न ही उसका साथ देता है। एक तरह से गाँव का सामान्य दलित अपने पढ़े-लिखे नौकरी वाले वर्ग से चिढ़ता है। सामान्य दलित क्रांतिकारी दलित की टाँग खींचता है। कई बार कई जगहों पर यह भी देखा जाता है कि गाँव-समाज का दलित अपने पढ़े-लिखे व नौकरी वाले दलित को कौड़ी भर भी इज्जत नहीं करता है और किसी भी तरह उसकी बात भी सुनना पसंद नहीं करता है बल्कि उसे देखकर जलता है।

ऐसी स्थिति में आम्बेडकरवादी दलित क्या कर सकता है? किसके बल पर क्रांतिकारी आम्बेडकरवादी दलित वर्चस्ववादियों और जातिवादी गुंडों से पंगा लेगा, कैसे ब्राह्मणवाद खत्म करेगा, कैसे कोई हत्या-बलात्कार के विरुद्ध दलितों को न्याय दिलाने के लिए नेतृत्व का साहस करेगा? किसी भी गाँव में आम्बेडकरवाद के नाम पर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध चार दलित भी वैचारिक रूप से एकमत नहीं हैं, तो ईमानदारी, चरित्र और नैतिक रूप से वर्चस्ववादी सवर्णों के दर्शन ब्राह्मणवाद के उन्मूलन व जातिवादी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए कितने दलित एकमत होंगे? दलितों को अपने एकता की हैसियत और जनता की ईर्ष्यालु अभिमत को समझना होगा।

दूसरी तरफ, बुद्धिजीवियों के अहमी अलगाववाद से हम सभी परिचित हैं। क्या बुद्धिजीवी दलित एक झंडे के नीचे अपने टकराव को छोड़कर आम्बेडकरवाद की एक सरल वैचारिकता के लिए एकमत हो सकते हैं? दलित साहित्य, आम्बेडकर साहित्य, आजीवक साहित्य, बहुजन साहित्य, मूलनिवासी साहित्य व अवर्णवादी साहित्य में दलितों का साहित्य बँटा हुआ है। दलितों के साहित्य के विभिन्न स्तरों पर बँटने का अर्थ हमारे अंदर एक भारी विखराव का होना है।

दलित राजनीतिक पार्टियाँ सिर्फ वोट लेने के लिए दलित जातियों को एकत्र करती हैं लेकिन इन पार्टियों का वास्तविक चरित्र तो गाँव से बनता है और गाँव जबरदस्त अलगाव और ईर्ष्या में जीवित है। दलित राजनीतिक पार्टियां संसदीय लोकतंत्र और संविधान का मोह छोड़कर भला जातिप्रथा व ब्राह्मणवाद उन्मूलन के लिए अपना जनाधार क्यों खराब करने लगीं। फिर, राजनीतिक स्तर पर भी अनेक पार्टियाँ इन्हीं दलितों को गुमराह करके अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में पड़े रहते हैं। क्या कीजिएगा।

आखिर दलित जतियाँ सवर्ण जातियों के वर्चस्व, छुआछूत, ऊँचनीच की भावना की परिधि से कैसे मुक्त होंगे? आज भी गाँव की स्थिति यह है कि कोई भी दलित किसी भी सवर्ण को उसके अभद्र व्यवहार के उपरांत भी आँख नहीं दिखा सकता है जबकि सवर्ण जब चाहे किसी भी पढ़े-लिखे व नौकरी वाले दलित को अनायास भी आँखे दिखाना कौन कहे, पीट भी सकता है। तत्काल किसी भी प्रतिक्रिया की कोई संभावना नहीं है और जिन स्थानों पर विद्रोही प्रतिक्रियाएँ होती हैं, वहाँ हत्याएँ अपना जघन्य रूप ग्रहण कर लेती हैं।

सोचिए कि द्वन्द्व कहाँ है? सोचिए कि वैमनस्य कैसे खत्म हो सकता है? सोचिए कि सामान्य दलित आम्बेडकरवादी शिक्षित दलितों पर विश्वास कैसे करें और क्यों करें? इन अनेक सच्चाइयों को समझते हुए और गाँव वालों के नफ़रत को बर्दाश्त करते हुए जो साथी लगातार दलितों में वैचारिक विकास, उनके विकास और आम्बेडकरवादी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन पर विश्वास करते हुए उनके बीच कार्य कर रहे हैं, वे यकीकन बहुत महान हैं। मैं उनकी साहस, कर्तव्य और महानता के लिए नतमस्तक हूँ।

लेखक- आर. डी. आनंद

जेएनयू के अम्बेडकरवादी प्रोफेसर ने कर दिया कमाल, दुनिया भर में हो रही है चर्चा

0

 देश के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में शामिल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जिसे आप जेएनयू के नाम से जानते हैं, वहां के प्रोफेसर विवेक कुमार के नेतृत्व में एक ऐसा काम हुआ है, जिसकी चर्चा दुनिया भर के शिक्षा जगत में हो रही है। बीते दिनों प्रो. विवेक कुमार ने न सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि हासिल की है, बल्कि कहीं न कहीं उनकी वजह से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम भी दुनिया भर के अकादमिक जगत में चर्चा में है।

 जहां तक उनके व्यक्तिगत उपलब्धि की बात है तो वह सेज जर्नल्स के ‘साउथ ACN सर्वे जर्नल’ के ‘इंटरनेशनल एडवाइजरी बोर्ड’ के सदस्य का हिस्सा बने हैं। अकादमिक जगत में यह उपलब्धि काफी महत्वपूर्ण है। तो वहीं रिसर्च गेट अकादमिक वेबसाइट पर फरवरी महीने के दूसरे हफ्ते में प्रो. विवेक के लेख को समाजशास्त्र विभाग के अन्य प्रोफेसर्स से ज्यादा पढ़ा गया। भारत के साथ प्रोफेसर विवेक के लेख को यूएसए, यूके, जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, ताइवान, सिंगापुर, फिलीपींस, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनीशिया  आदि देशो में भी पढ़ा गया। प्रोफेसर विवेक कुमार वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंस सेंटर में समाजशास्त्र विभाग के हेड हैं।

उनके नेतृत्व में जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग ने अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि हासिल की है। जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग को विश्व के तमाम विश्वविद्यालयों में मौजूद समाजशास्त्र विभाग में 107वां स्थान मिला है। इसको लेकर दुनिया के अकादमिक जगत में न सिर्फ जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग की चर्चा तेज हुई है, बल्कि विभागाध्यक्ष होने के कारण प्रो. विवेक कुमार को भी सराहा जा रहा है।

7 मार्च को फेसबुक पर दी गई एक सूचना में प्रोफेसर विवेक ने यह बात साझा की। उन्होंने लिखा- सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम/ स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (जेएनयू) के दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र विभाग के बीच विश्व में 107वां स्थान बनाया है। यह अमेरिका की क्यूएस रैंकिंग के अनुसार है। यह दिलचस्प है कि SOAS, द यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड, ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन, यूनिवर्सिट डे मोंटेरेल, वाशिंगटन विश्वविद्यालय आदि जेएनयू पीछे हैं।

महारानी एलिजाबेथ II का अंबेडकर जयंती पर बड़ा ऐलान

0

 विश्व के तमाम देशों में बाबासाहब डॉ. आंबेडकर की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। न सिर्फ वहां बसे अंबेडकरवादी-मूलनिवासी समाज के लोग बल्कि वहां की सरकार भी अब बाबासाहेब के ज्ञान के आगे नतमस्तक हो रही है और उन्हें सम्मान दे रही है। भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी बाबा साहब की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है, और उन देशों में भी अंबेडकर जयंती मनाई जाने लगी है। बड़ी खबर कनाडा से है। बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा जीवन भर मानवता के लिए किए गए संघर्ष को कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया राज्य ने यूनाइटेड किंगडम की रानी एवं कॉमनवेल्थ की प्रमुख एलिज़बेथ द्वितीय की सहमति से, 14 अप्रैल, 2021 को ‘डॉ बी आर आंबेडकर समता दिवस’ (Dr. B. R. Ambedkar Equality Day) घोषित किया है। यानी कनाडा में बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मदिन को ‘समता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा।

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रोविंस ने एक पत्रक जारी करते हुए बाबासाहब के जन्मदिन 14 अप्रैल को ‘डॉक्टर अंबेडकर समता दिवस दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इससे पहले कनाडा के सिर्फ बरनबी नगरपालिका ने बाबासाहब की जयंती को डॉ. बी.आर. आंबेडकर द डे ऑफ इक्टविलिटी के रूप में मनाया था। लेकिन इस बार कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया राज्य ने यूनाइटेड किंगडम की रानी एवं कनाडा एवं कॉमनवेल्थ की प्रमुख एलिज़बेथ द्वितीय की मुहर लगी है। यानी पूरे कनाडा में बाबा साहब की जयंती को समता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। निश्चित तौर पर यह कनाडा में बसे अंबेडकरवादियों के साथ दुनियाभर के अंबेडकरवादियों के लिए एक बड़ी खबर है। इससे जाहिर होता है कि भारत से बाहर बसे अंबेडकरवादियों सहित अन्य देशों के सभ्य समाज में बाबासाहेब आंबेडकर की शिक्षाओं को लेकर जानकारी बढ़ रही है।

उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में कॉमनवेल्थ में शामिल अन्य देशों में भी बाबासाहेब की जयंती 14 अप्रैल को मनाने की घोषणा हो सकती है।

डॉ आंबेडकर और आजाद भारत में लोकतंत्र की कल्पना

 बाबासाहेब आंबेडकर भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक चिंतकों में से एक माने जाते हैं। भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पी होने के नाते भारतीय संविधान एवं शासन व्यवस्था में लोकतंत्र से जुड़े जितनी भी बातें हम देखते हैं उनकी मूल कल्पना बाबासाहेब आंबेडकर के मस्तिष्क से निकली है। अमेरिका में अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने विश्व के एक महान दार्शनिक एवं अपने शिक्षक जॉन डूवी के साथ गुजारे अपना समय के दौरान लोकतंत्र की अपनी समझ को शिखर पर पहुंचाया था। जॉन डूवी स्वयं राजनीतिक चिंतन और दर्शनशास्त्र की दुनिया में एक जाना माना नाम थे, बाबासाहेब आंबेडकर को और उनके विचारों सहित भारत के दलितों की मुक्ति की उनकी योजना को बहुत सम्मान देते थे।

जान डूवी के समय पूरी दुनिया में विश्व युद्ध के कारण उथल-पुथल मची हुई थी, और साम्यवाद, समाजवाद, लोकतंत्र, पूंजीवाद, तानाशाही, धर्मनिरपेक्षता और अराजकता इत्यादि से जुड़े हुए बहुत सारे राजनीतिक विचार विश्व धर्म राजनीतिक चिंतन में उछल रहे थे। ऐसे समय में डॉक्टर आंबेडकर ने भारत के करोड़ों दलितों की मुक्ति के लिए लोकतंत्र को एक सर्वाधिक कारगर उपाय के रूप में देखा। यूरोप और अमेरिका में विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि के बीच लोकतंत्र के पक्ष में वातावरण बनता जा रहा था। इस समय स्वयं ब्रिटेन में एक विशेष किस्म की लोकतांत्रिक चेतना स्थापित हो चुकी थी और लोकतंत्र का एक राजनीतिक स्वरूप अमल में आ चुका था। ब्रिटेन में संसदीय प्रणाली एवं लोकतंत्र की अन्य आधारभूत प्रक्रियाओं को काफी सफलता मिल चुकी थी।

इन सबके बीच डॉक्टर आंबेडकर अमेरिका और ब्रिटेन में अपनी पढ़ाई के दौरान गुलाम भारत रहने वाले अपने करोड़ों दलितों के लिए सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति की योजना बना रहे थे। डॉक्टर आंबेडकर का मानना था कि गुलाम भारत की राजनीतिक मुक्ति के लिए जो आंदोलन चल रहा है वह अपने आप में जरूरी है, लेकिन इसी के साथ यह भी जरूरी है कि लोग जातिवाद से मुक्ति आंदोलन चलाएं। वे सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से बड़ा मानते थे (Ambedkar 1994)। वे लोकतंत्र की अपनी विशिष्ट कल्पना के अनुसार सामाजिक मुक्ति के उपकरण के रूप में देखते थे। वे बार-बार कहा करते थे कि अगर भारत को राजनीतिक मुक्ति मिल जाती है सभी लोगों को एक वोट डालने का अधिकार मिल जाता है तुमसे कुछ खास बदलने वाला नहीं है। इसलिए वे उपनिवेशवाद ब्रिटिश गुलामी को खत्म करने की योजना में जातिवाद को खत्म करने की योजना को अनिवार्य रूप से शामिल करते थे (Dwivedi and Sinha 2005)

उनके साथ जो अन्य राजनीतिक विचारक एवं नेता काम कर रहे थे वे स्वतंत्र भारत की जो कल्पना कर रहे थे उसमें राजनीतिक आजादी, और उपनिवेशवाद का खात्मा प्रमुख लक्ष्य थे। लेकिन इन विचारकों के लिए भारत के करोड़ों दलितों और महिलाओं की सामाजिक मुक्ति की योजना भारत की आजादी की योजना में शामिल नहीं थी (Khilnani 2016)। इसीलिए डॉक्टर आंबेडकर को अपनी पूरी ताकत जाति से मुक्ति के आंदोलन में लगानी पड़ी। अगर ठीक से देखा जाए तो यह अंतर गुलाम भारत में आजाद एवं लोकतांत्रिक भारत की योजना में अंतर के गर्भ से आता है। ठीक इसी समय रामास्वामी पेरियार भी जान चुके थे कि भारत आज नहीं तो कल आजाद होने वाला है। इसीलिए उन्होंने भी डॉ आंबेडकर की तरह भारत की सामाजिक मुक्ति की योजना में अधिक ऊर्जा और समय लगाया।

जाति के विनाश की योजना पर काम करते हुए गुलाम भारत में डॉक्टर आंबेडकर कुछ नए ढंग के सामाजिक आंदोलन की शैलियों का प्रयोग कर रहे थे। महाड़ चवदार आंदोलन और काला राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने तत्कालीन बॉम्बे प्रोविंस लोगों को आंदोलन के माध्यम से लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया था। इन आंदोलनों पर बहुत शोध हो चुका है, अधिकांश शोधकर्ता यह मानते हैं कि मंदिर प्रवेश का आंदोलन वास्तव में मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार हासिल करने के लिए नहीं था (Omvedt 1993), बल्कि यह आंदोलन वास्तव में एक तरकीब थी जिसके जरिए भारत के अछूत एवं सवर्ण हिंदू समाज सहित तत्कालीन भारत के ब्रिटिश आकाओं को भारत की जाति व्यवस्था के बारे में पता चले। ठीक से देखा जाए तो महाड चावदार आंदोलन एवं कालाराम आंदोलन भारत के सबसे गरीब लोगों से लेकर ब्रिटेन की महारानी तक को भारत के सामाजिक लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर दिखाने का एक कारगर उपाय था।

गुलाम भारत में आजादी के पश्चात स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र की जो कल्पना उभर रही थी उसमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक समानता, नागरिक अधिकार, मानव अधिकार और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य लगातार चर्चा में बने हुए थे। इतने भारी भरकम शब्दों की लगातार चर्चा होती रहती। लेकिन डॉक्टर अंबेडकर और रामास्वामी पेरियार दोनों अपने-अपने लोगों के बीच यह महसूस करते थे कि भारत के ब्राह्मण नेता यूरोप से आयातित किए गए इन शब्दों की चर्चा करते हुए भारत के दलित और महिलाओं के बारे में बिल्कुल बात नहीं करते हैं (Anaimuthu 1980)।

रामास्वामी पेरियार दक्षिण भारत में द्रविड लोगों की सामाजिक और धार्मिक मुक्ति की बात करते हुए जाति उन्मूलन के बारे में बड़ा आंदोलन चला रहे थे। एक ही आंदोलन महाराष्ट्र में और उत्तर भारत में बाबासाहेब आंबेडकर चला रहे थे। इन दोनों के आंदोलन एक ही दिशा में जाते हुए नजर आते हैं, और ठीक से देखा जाए तो आजाद भारत में एक जिंदा लोकतंत्र की स्थापना के लिए ये आंदोलन चलाए गए थे। इन दोनों महापुरुषों के बीच में एक स्वर्णिम सूत्र काम कर रहा था दोनों मानते थे कि अगर भारत में सामाजिक लोकतंत्र नहीं आता है तो राजनीतिक लोकतंत्र किसी काम का नहीं होगा।

एक और जरूरी बात यहां यह भी है कि डॉक्टर आंबेडकर लोकतंत्र में भारत अछूतों के अलावा भारत के महिलाओं को भी समान अधिकार देना चाहते थे। उनका कहना था कि एक लोकतंत्र में एक इंसान का एक वोट होगा और वह आपस में बराबर होंगे। इतना ही नहीं बल्कि स्त्री और पुरुष का वोट भी बराबर होना चाहिए। आगे बढ़कर वे कहते थे कि सिर्फ वोट की बराबर नहीं होना चाहिए बल्कि वोट डालने वाले भी आपस में बराबर होने चाहिए। यही विचार दक्षिण में रामास्वामी पेरियार भी निर्मित कर रहे थे। उन्होंने सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट और सेल्फ रिस्पेक्ट मैरिज का नया विचार देकर दक्षिण भारत में सामाजिक लोकतंत्र की एक नई आवाज उठाई थी (Saraswathi 1994)।

इन दोनों के ठीक पहले महामना ज्योति राव फुले और सावित्रीबाई फुले इसी दिशा में अपना जीवन समर्पित कर चुके थे। फुले दंपत्ति ने जिस प्रकार बालिका शिक्षा और महिला शिक्षा के लिए काम किया वह गुलाम भारत में ही नहीं बल्कि भारत के हजारों साल के इतिहास में एक नई घटना थी। फूले दंपत्ति के आंदोलन को भी ठीक से समझा जाए तो यह लोकतंत्र की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होता है। लोकतांत्रिक चेतना एक शिक्षित समाज में ही संभव है। इसीलिए भारत को और भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों एवं महिलाओं को शिक्षित बनाने का बीड़ा उठाने वाले ज्योति राव फुले एवं सावित्रीबाई फुले ने पहली बार गुलाम भारत में शिक्षा के जगत में लोकतंत्र की बात उठाई थी। (Keer 1997)। उनका कहना था कि अगर भारत के करोड़ों दलित, पिछड़े और स्त्रियां अशिक्षित रहते हैं तो भारत एक विकसित समाज और एक लोकतंत्र नहीं बन सकता।

यह भी पढ़ें- दलितों के गौरवशाली इतिहास पर बनी इस फिल्म को देखकर दर्शक बनेंगे करोड़पति

इस अंबेडकर माह में हमें इन बातों पर गौर करना चाहिए। पूरे बहुजन समाज की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मुक्ति के लिए इस बहुजन विचारधारा की हम कल्पना करते हैं, वास्तव में फूले अंबेडकर पेरियार विचारधारा है। हालांकि इन तीनों में आपस में बहुत मतभेद हैं, लेकिन यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है। तीन महान विचारक सामाजिक राजनीतिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर एक ही जैसा सोचेंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उनके विचारों में भिन्नता होने के बावजूद उनके लक्ष्य एक समान है। हमें अंबेडकर माह में ना केवल बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को बल्कि रामास्वामी पेरियार हो ज्योति राव फुले के विचारों पर भी ध्यान देना चाहिए। बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के जरिए रामास्वामी पेरियार और ज्योति राव फुले को समझना बहुत आसान है। इसलिए अंबेडकर माह में इस विशेष लेखों की श्रंखला के माध्यम से हम फुले-अंबेडकर-पेरियार विचारधारा से जुड़े मुद्दों को स्पष्ट करते रहेंगे।


संदर्भ ग्रंथ

 Ambedkar, B. R. 1994. Dr Babasaheb Ambedkar Writings & Speeches. Vol. 2. 17 vols. New Delhi: Ministry of Social Justice & Empowerment, Government of India.

Anaimuthu, V. 1980. Contribution of Periyar E.V.R. to the Progress of Atheism. Chennai: Periyar Nūl Veliyittakam.

Dwivedi, H.S., and Ratan Sinha. 2005. ‘Dr. Ambedkar : The Pioneer of Social Democracy’. The Indian Journal of Political Science 66 (3): 661–66.

Keer, Dhananjay. 1997. Mahatma Jotirao Phooley: Father of the Indian Social Revolution. Mumbai: Popular Prakashan.

Khilnani, Sunil. 2016. Incarnations: History of India in 50 Lives. New Delhi: Penguin India.

Omvedt, G. 1993. Reinventing Revolution: New Social Movements and the Socialist Tradition in India. New York: M. E. Sharpe Incorporated.

Saraswathi, Srinivasan. 1994. Towards Self-Respect: Periyar EVR on a New World. Chennai: Institute of South Indian Studies.

दलितों के गौरवशाली इतिहास पर बनी इस फिल्म को देखकर दर्शक बनेंगे करोड़पति

0

आगामी सितंबर महीने में भीमा कोरेगांव पर एक फिल्म रिलिज होने जा रही है। भीमा कोरेगांव पर बनी यह अब तक की सबसे बड़ी फिल्म है, जो हिन्दी में बन रही है। फिल्म में मुख्य भूमिका में अर्जुन रामपाल हैं, तो उनके साथ कई दिग्गज कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं। फिल्म के निर्माता-निर्देशक पूर्व आईएएस अधिकारी रमेश थेटे हैं। यह फिल्म रमेश थेटे फिल्मस के बैनर के तहत बनी है। फिल्म सितंबर महीने में रिलिज हो रही है। फिल्म को लेकर फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर रमेश थेटे ने एक शानदार योजना बनाई है। जिससे फिल्म न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा बहुजन समाज के लोगों तक पहुंचेगी, बल्कि फिल्म देखकर दर्शक करोड़पति भी बन सकते हैं। नीचे दिये यह वीडियो देखिए, जिसमें रमेश थेटे बता रहे हैं कि यह फिल्म आपको कैसे करोड़पति बना सकती है-

फिल्म में स्पेशल टिकट बुक करने के लिए आप नीचे दिए डिटेल को देखिए। बुकिंग करते समय दिये गए नंबर पर व्हाट्सएप करते हुए या फिर मेल करते हुए “दलित दस्तक” का उल्लेख जरूर करें।

वोटिंग के बाद भाजपा नेता की गाड़ी में मिला EVM, हंगामा

0
भारतीय जनता पार्टी पर अक्सर ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर आरोप लगता रहा है। असम चुनाव के दौरान एक भाजपा उम्मीदवार की निजी गाड़ी से ईवीएम बरामद होने के बाद इस मामले ने और तूल पकड़ लिया है। सोमवार को असम में दूसरे चरण के चुनाव के बाद ही भाजपा के मौजूदा विधायक और उम्मीदवार कृष्णेंदु पाल की गाड़ी से ईवीएम बरामद हुआ। बेलेरो गाड़ी भाजपा नेता के पत्नी के नाम पर पंजीकृत है।

ईवीएम बरामद होने के मामले को लेकर राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने चार मतदान अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। चुनाव आयोग ने ईवीएम विवाद को देखते हुए राताबाड़ी सीट के एक मतदान केंद्र में नए सिरे से मतदान कराने का आदेश दिया है।

दरअसल एक अप्रैल को 39 सीटों के लिए वोटिंग समाप्त होने के महज़ कुछ घंटे बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया, जिसमें एक प्राइवेट कार में ईवीएम ले जाते हुए दिखाया जा रहा है। असम के वरिष्ठ पत्रकार अतानु भुयां ने यह वीडियो ट्विट किया। यह घटना बराक घाटी के करीमगंज के कानीसेल क्षेत्र की है, जहाँ स्थानीय लोगों ने गुरुवार की रात एक सफ़ेद बोलेरो कार को देखा, जिसमें कथित तौर पर ईवीएम मशीन थी।

ईवीएम सामने आने के बाद भाजपा पर चौतरफा हमला शुरू हो गया है। साथ ही भाजपा पर ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर जो आरोप लगता रहा है, उसे भी बल मिला है। वहीं दूसरी ओर आलोचना के बीच गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि चुनाव आयोग इस बारे में कार्रवाई करे, उसे किसने रोका है।

2 अप्रैल आंदोलन की तीसरी वर्षगांठ पर समाज ने किया शहीदों को याद

0

 सरकार और अदालत द्वारा एससी-एसटी एक्ट रद्द किये जाने के बाद 2 अप्रैल 2018 को दलित समाज ने बड़ा आंदोलन किया था। देश भर में दलित समाज के युवा अपने इस संवैधानिक अधिकार को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए थे। क्या गांव, क्या शहर हर ओर सड़कों पर सिर्फ नीले झंडे और बाबासाहब की तस्वीरें दिख रही थी। आखिरकार इस जोरदार विरोध प्रदर्शन से डर कर भाजप की केंद्र सरकार ने संसद में विशेष अधिनियम लाकर इस कानून को फिर से बहाल कर दिया। हालांकि इस आंदोलन में दर्जन भर से ज्यादा युवा शहीद हो गए थे, जबकि लाखों युवाओं पर मुकदमा हो गया था, जो अब तक चल रहा है।

2 अप्रैल की तीसरी वर्षगांठ पर बहुजन समाज ने इन शहीदों को याद किया और आंदोलन के जरिए जीत का जश्न मनाया। समाज के बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्ट आदि ने इस मौके पर ट्विट कर जहां शहीदों को श्रद्धांजली दी तो वहीं कहा कि आंदोलन किसी भी समाज के जिंदा रहने का प्रमाण है।

बाबा साहब आंबेडकर का जन्मदिन राष्ट्रीय अवकाश घोषित

1

 भारत के करोड़ों अंबेडकर प्रेमियों के लिए एक खुशखबरी आई है। लंबे समय से प्रतीक्षा हो रही थी कि डॉ. आंबेडकर का जन्मदिन 14 अप्रैल राष्ट्रीय अवकाश घोषित हो। यह प्रतीक्षा अब पूरी हुई और इस वर्ष जब दुनिया भर में मौजूद आंबेडकरी समाज के लोग बाबासाहब आंबेडकर की 130वीं जयंती मना रहे हैं, केंद्र सरकार ने 14 अप्रैल को राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की है। इस संबंध में आधिकारिक रूप से सरकार की तरफ से नोटिफिकेशन भी आ गया है।

कार्मिक लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय की ओर से जारी किए गए इस नोटिफिकेशन में इस विषय में स्पष्ट जानकारी दी गई है। इस नोटिफिकेशन में कहा गया है कि 14 अप्रैल को केंद्र सरकार के सभी विभागों, कार्यालयों एवं औद्योगिक संस्थानों में राष्ट्रीय अवकाश रहेगा। मंत्रालय द्वारा इस प्रकार का अवकाश घोषित करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट’ का आधार लिया गया है।

गौरतलब है कि इसी तरह बाबा साहब आंबेडकर को भारत रत्न देने में बहुत देर हुई, उसी तरह उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने में भी बहुत देर हुई है। भारत में हमेशा से दलित बहुजन समाज के नायक नायिकाओं के साथ यही अन्याय होता आया है। सवर्ण हिंदू समाज के जिन तथाकथित महापुरुषों का समाज निर्माण में एवं वंचितो और महिलाओं के जीवन की खुशहाली में कोई योगदान नहीं है उनके जन्म और मृत्यु दिवस पर भी छुट्टियां दी जाती हैं। इसके विपरीत बाबासाहब आंबेडकर और ज्योति राव फूले सहित रामास्वामी पेरियार जैसे बहुजन क्रांतिकारियों के जन्म दिवस या मृत्यु दिवस को सरकार द्वारा अनदेखा किया जाता रहा है। हालांकि अब बहुजन समाज के बीच बढ़ रही जागरुकता के कारण दबाव में तमाम राजनीतिक दल और उनके नेता बहुजन नायकों को याद करने लगे हैं। 14 अप्रैल के दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना भी उसी दबाव की जीत है।

लव जिहाद के खिलाफ कानून लाने की तैयारी में भाजपा सरकार

0

 मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बाद अब गुजरात सरकार ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून लाने जा रही है। बीते 30 मार्च को इस संबंध में गुजरात विधानसभा में बिल रखा गया था, इसमें ‘जबरदस्ती’ या ‘बहला-फुसलाकर’ अन्य धर्म में विवाह की घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था की जा रही है। इस कानून में ऐसी किसी शादी के लिए दोषी पाए जाने पर अधिकतम 5 साल की कैद का प्रावधान किये जाने की बात हो रही है।

इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर पीड़ित पक्ष नाबालिग है या फिर अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय से आता है तो दोषी व्यक्ति को 7 साल की सजा दी जा सकती है। इस संबंध में गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ‘लव जिहाद’ एवं महिलाओं के अपहरण की घटनाओं को लेकर चिंतित है, इसीलिए इस तरह के उपाय किए जा रहे हैं। गौरतलब है कि भारत में जितने भी बीजेपी शासित राज्य हैं, वहां पर हिंदुत्ववादी शक्तियों का बोलबाला है। देखने में आया है कि दक्षिणपंथी ताकतें किसी ना किसी तरह लगातार मुस्लिम समुदाय को निशाने पर रखती आई हैं। अब गुजरात द्वारा अपने ‘गुजरात मॉडल’ में लव जिहाद का कानून शामिल करना भारत में लोकतंत्र एवं सांप्रदायिक सद्भाव के लिए एक और खतरनाक कदम होने वाला है। देश के मानवाधिकार संगठन एवं दलित अधिकार कार्यकर्ता एवं अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए लड़ने वाले संगठन इस बात से विशेष रूप से चिंतित हैं।

बाबा साहब डॉ. आंबेडकर और संविधान निर्माण

 संविधान को मुकम्मल स्वरुप देने में बाबासाहब का कितना योगदान है, क्यों बाबासाहब को संविधान निर्माता कहा जाता है, इसका जवाब संविधान सभा में दिये गये उनके भाषण से स्पष्ट होता है। विभिन्न मुद्दों व सभी बिन्दुओं पर उनके चिंतन और लेखन से यह साबित होता है। बाबासाहब द्वारा संविधान सभा के तमाम भाषणों से संविधान के प्रति बाबासाहब की लगन, गहन अध्ययन, जानकारी, जागरुकता एवं देश, देशवासियों के प्रति ईमानदारी व निष्ठा के साथ समतामूलक भारत राष्ट्र निर्माण के लिए उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।

वैसे तो संविधान सभा में विमर्श का हर दिन महत्वपूर्ण है परन्तु फिर इन सभी महत्वपूर्ण दिनों में से कुछ विशेष का जिक्र करते हुए सुविख्यात प्रोफेसर विवेक कुमार ने संविधान सभा में बाबासाहब द्वारा दिये गए भाषणों की खुद गणना की है। प्रो विवेक कुमार द्वारा की गयी इस गणना व पड़ताल, जो कि निम्नांकित तीन बिन्दुओं में वर्णित हैं, के मुताबिक स्पष्ट हैं कि –

1. बंगाल की जनरल सीट से जीत कर आये बाबासाहब ने संविधान सभा में दिसम्बर 17, 1946 को 3310 शब्दों का अपना प्रथम भाषण दिया जो कि संविधान के ख़ाके के प्रति बाबा साहब की गहरी जानकारी व गंभीरता और भारत राष्ट्र निर्माण के लिए उनकी उत्सुकता व समस्याओं के प्रति उनकी चिंता को बताता है। आज से 74 साल पहले अपने इसी भाषण में, 17 दिसम्बर 1946 को बाबासहब ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सदस्यों को समझाया था कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा के आगे किसी पार्टी या लीडर की प्रतिष्ठा का कोई मूल्य नहीं होता।

2. संविधान सभा में नवंबर 04, 1948 को संविधान का मसौदा पेश करने के दौरान राष्ट्र निर्माता बाबा साहब का भाषण 8334 शब्दों का रहा जो कि देश की जनता, उनके लिए उनकी हुकूमत को कैसे स्थापित करना चाहिए, को स्पष्ट करता है।

3. नवंबर 25, 1949 को 3900 शब्दों में परम पूज्य बाबा साहब ने संविधान सभा में संविधान की फाइनल कॉपी संविधान सभा के अध्यक्ष को सौपने के दौरान संविधान सभा व देश की जनता को भारत के अतीत से सीखने की सलाह देते हुए वर्तमान स्थिति के साथ-साथ भविष्य की चुनौतियां क्या है, उनसे कैसे निपटना है, सरकारों को चलाने वाले लोग कैसे होने चाहिए, आदि को स्पष्ट किया।

4. संविधान सभा के माननीय सदस्यों द्वारा 7635 संशोधन लाया गया जिनका अध्ययन करते हुए बाबा साहब ने 5162 संसोधन को रिजेक्ट किया तथा 2473 संसोधन को संविधान सभा के पटल पर चर्चा करते हुए समायोजित किया, जो कि संविधान निर्माण के प्रति बाबा साहब की निष्ठा, लगन व प्रतिबद्धता जो स्थापित करता हैं।

5. संविधान को अंतिम रूप देने में डॉ. आंबेडकर की भूमिका को रेखांकित करते हुए भारतीय संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के एक सदस्य टी. टी. कृष्णमाचारी ने 25 नवम्बर 1948 में संविधान सभा में कहा था, ‘सम्भवत: सदन इस बात से अवगत है कि आपने (ड्राफ्टिंग कमेटी) में जिन सात सदस्यों को नामित किया है, उनमें एक ने सदन से इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह अन्य सदस्य आ चुके हैं। एक सदस्य की इसी बीच मृत्यु हो चुकी है और उनकी जगह कोई नए सदस्य नहीं आए हैं। एक सदस्य अमेरिका में थे और उनका स्थान भरा नहीं गया। एक अन्य व्यक्ति सरकारी मामलों में उलझे हुए थे और वह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहे थे। एक-दो व्यक्ति दिल्ली से बहुत दूर थे और सम्भवत: स्वास्थ्य की वजहों से कमेटी की कार्यवाहियों में हिस्सा नहीं ले पाए। सो कुल मिलाकर हुआ यह कि इस संविधान को लिखने का भार डॉ. आंबेडकर के ऊपर ही आ पड़ा है। मुझे इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि हम सब को उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को इतने सराहनीय ढंग से अंजाम दिया है। [1]

25 नवम्बर 1949 को अपने भाषण में श्री महावीर त्यागी कहते हैं कि “मेरे सामने एक मूर्त तस्वीर है। डॉ. आंबेडकर, जिसके मुख्य कलाकार हैं, ने अपना ब्रश नीचे रख दिया और उस तस्वीर का अनावरण कर दिया ताकि लोग उसे देख सके और उस पर अपनी राय दे सकें।[2]”

साथ ही बाबा साहब के प्रति श्री जगत नारायण लाल, श्री सुरेश चंद्र मजूमदार, श्री राज बहादुर आदि सभी के आभार व्यक्त करने के बाद अन्त में संविधान सभा के अध्यक्ष श्री राजेंद्र प्रसाद ने भी बाबा साहब के त्याग और समर्पण की सराहना करते हुए हैं कि “सभापीठ के आसान पर बैठकर और प्रतिदिन की कार्यवाही का संचालन करते हुए मैंने यह महसूस किया हैं, जो कि किसी दुसरे ने महसूस नहीं किया होगा कि प्रारूप समिति के सदस्यों, विशेषकर इसके अध्यक्ष डॉ आंबेडकर ने अपने ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद जिस उत्साह और समर्पण से कार्य किया हैं, वह दुर्लभ हैं। (सदस्यों ने ख़ुशी प्रकट की) हमने जब उन्हें प्रारूप समिति के लिए चुना और उसका अध्यक्ष बनाने का निर्णय किया, उससे और अधिक सही निर्णय और कोई नहीं हो सकता था। उन्होंने ना सिर्फ अपने चयन को सही ठहराया, बल्कि जिस कार्य को पूरा किया हैं, उसे सरल भी बना दिया हैं।[3]” संविधान सभा के सभी सदस्यों समेत संविधान सभा के अध्यक्ष द्वारा बाबा साहब के प्रति व्यक्त किया गया आभार जहाँ संविधान निंर्माण में बाबा साहब के अथक परिश्रम, उनके त्याग और समर्पण को व्यक्त करता वहीं बाबा साहब को संविधान कर शिल्पकार भी प्रमाणित करता हैं।

6. देश व देशवासियों को आगाह करते हुए अपने इसी भाषण में बाबा साहब ने 26 नवम्बर,1949 को संविधान सभा में कहा था ‘किसी भी देश का संविधान चाहे कितना ही अच्छा क्यों ना हो अगर उसके चलाने वाले खराब होंगे तो अच्छा से अच्छा संविधान भी खराब हो जाएगा’ और ‘किसी भी देश का संविधान चाहे कितना ही खराब क्यों ना हो अगर उसके चलाने वाले अच्छे होंगे तो खराब से खराब संविधान भी अच्छा हो जाएगा”।[4] बाबा साहब का देश के नाम ये सन्देश बाबा साहेब की देश, इसकी व्यवस्था व संविधान के प्रति गंभीरता व आने वाली चुनौतियों के प्रति चिंता को बयां करता हैं।

7. भारत के बाहर के विशेषज्ञों की तरफ रूख़ करे तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आत्मकथा लेखक माइकेल ब्रेचर ने भी बोधिसत्व बाबा साहब डॉ. आंबेडकर को ही भारतीय संविधान का वास्तुकार/शिल्पकार माना और उनकी भूमिका को संविधान के निर्माण में फील्ड मार्शल के रूप में रेखांकित किया।[5]

उपरोक्त उदाहरण बताते हैं कि संविधान निर्माण में बाबा साहब ने कितनी मेहनत की है, जो साबित करते हैं कि बोधिसत्व राष्ट्र निर्माता बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ही संविधान निर्माता (Father on Constitution) हैं।


संदर्भ

[1] संविधान सभा की बहस, खंड- 7, पृष्ठ- 231 [2] डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर, राइटिंग्स एन्ड स्पीच, वॉयलूम – 13, पृष्ठ संख्या – 1205 [3] बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर, सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड – 30, पृष्ठ संख्या – 221 [4] बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर, सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड – 30, पृष्ठ संख्या – 211 [5] नेहरू : ए पॉलिटिकल बायोग्राफी द्वारा माइकल ब्रेचर, 1959

प्रस्तुति

रजनीकान्त इन्द्रा, इतिहास छात्र, इग्नू-नई दिल्ली

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में आरक्षण को झटका देने की तैयारी

2

भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों, आदिवासियों के लिए बुरी खबर है। नोटबंदी जीएसटी और कोरोना की मार के बाद करोड़ों गरीब युवाओं की रोजगार पाने की योजना को एक बड़ा धक्का लगा है। तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं सरकारी रोजगार के अवसरों के कारण सरकारी नौकरी मिलने की संभावनाएं कम होती जा रही है। इसके अलावा सरकारी नियंत्रण की महत्वपूर्ण कंपनियों का भी निजीकरण हो रहा है। ऐसे में लंबे समय से मांग उठाई जाती रही है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण दिया जाना उचित होगा। लेकिन 31 मार्च को आई लाइव मिंट की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि विनिवेश की प्रक्रिया के द्वारा जिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण हुआ है उन में जाति आधारित आरक्षण लागू नहीं होगा।

गौरतलब है कि विनिवेशकरण की प्रक्रिया के जरिए घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निजी हाथों में दे रही है। ऐसे में ओबीसी आदिवासी एवं दलितों ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठाया रहे हैं। लेकिन किसी भी सरकार ने निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर कभी कोई गंभीर पहल नहीं की। यह स्थिति विशेष रूप से कोरोना और लॉकडाउन के बाद बढ़ रही बेरोजगारी के दौर में विशेष रूप से चिंताजनक है। सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करते हुए धीरे-धीरे यह कह रही है कि युवाओं को सरकार से रोजगार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इस हालत में स्वाभाविक रूप से युवाओं को प्राइवेट सेक्टर से ही उम्मीद होगी। ऐसे में प्राइवेट सेक्टर द्वारा आरक्षण लागू न करने के कारण बेरोजगारी की समस्या बहुत अधिक बढ़ने वाली है।

शिक्षित राज्य केरल में प्रतिनिधित्व के इंतजार में महिलाएं

0

 भारत में दलितों एवं महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व कितना कम है इसके संबंध में एक खबर केरल से है। भारत के सर्वाधिक सुशिक्षित राज्य केरल में भी बीते 20 सालों में सिर्फ 6 महिलाएं विधायक बन पाई हैं। इसका अर्थ साफ है कि भारत में शिक्षा के प्रतिशत के बढ़ जाने से भी समाज और परिवार में पितृसत्ता की भूमिका कम नहीं हो जाती।

केरल में पहली महिला विधायक सन 1957 में ईदुक्की के देवीकुलम विधानसभा क्षेत्र से चुनी गई थी। इसके बाद वे विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर भी बनी थी। सन 1957 में ही केरल की पहली विधानसभा में 6 महिलाएं चुनी गई थी। उस समय का आंकड़ा कुल विधायकों का 5.3% था। तब से आज तक की इतने सालों की यात्रा की तुलना की जाए तो आज की केरल की विधानसभा में 9 महिला विधायक हैं। यह संख्या आज केरल विधानसभा में कुल विधायकों की 6.4% है। इस तरह ठीक से देखा जाए तो बीते 60 सालों में केरल की राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में 1.1 % की ही बढ़ोतरी हुई है।

केरल जैसे राज्य की राजनीति और विधानसभा में महिलाओं की यह स्थिति बहुत चिंतित करने वाली है। इसका अर्थ है कि वामपंथी विचारधारा भी पितृसत्ता को कमजोर करने में सफल रही है। इतना ही नहीं सर्वाधिक शिक्षित राज्य होने के दावे से भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आ रहा है। यह बात भारत के ओबीसी और दलितों और आदिवासियों के लिए विशेष रूप से चिंतनीय हैं। क्योंकि सर्वाधिक वंचित एवं शोषित समुदाय कि महिलाओं की आवाज उठाने के लिए महिला प्रतिनिधित्व पहली शर्त है। केरल जैसे राज्य में यह प्रतिनिधित्व अगर कमजोर बना हुआ है तो भारत के ओबीसी और दलितों के लिए यह खतरनाक बात है।

दलित साहित्यकार शरण कुमार लिंबाले को मिला 15 लाख राशि वाला प्रतिष्ठित सम्मान

1

दलित साहित्य की दुनिया के लिए एक बड़ी खुशखबरी आई है। दलित साहित्य के वर्तमान आधार स्तंभों में से एक मराठी साहित्यकार डॉक्टर शरण कुमार लिंबाले को वर्ष 2020 के लिए प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान दिया गया है। डॉक्टर लिंबाले वाले को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘सनातन’ के लिए दिया गया है। इस सम्मान के साथ 15 लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी उन्हें दी जाएगी। गौरतलब है कि ‘सनातन’ उपन्यास भारत में सदियों से दमित और वंचित दलित एवं पिछड़ों के बारे में है। हजारों सालों से सामाजिक भेदभाव एवं आर्थिक शोषण का सामना कर रहे करोड़ों दलितों के बारे में आवाज उठाने वाला यह उपन्यास मूल रूप से मराठी में रचा गया है। पिछले साल ही डॉक्टर पदमजा घोरपड़े ने इसका हिंदी में अनुवाद किया और यह उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। हिंदी में आने के बाद इस उपन्यास को व्यापक पहचान मिली और यह अचानक ही विद्वत समुदाय एवं साहित्य समुदाय में चर्चा का विषय बन गया था। एक दलित साहित्यकार को सरस्वती सम्मान प्राप्त होना एक बड़ी बात है। इस बात के बहुत सारे निहितार्थ हैं। इसका एक विशेष अर्थ यह है कि दलित साहित्य एवं दलित साहित्यकारों के विचार प्रक्रिया अब तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य को चुनौती दे रही है। इसका एक अर्थ यह भी है कि भविष्य में भारत के आमजन एवं महिलाओं से जुड़े मुद्दों को तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य को भी सम्मान देना होगा। इन बड़े संकेतों को छुपाए हुए यह खबर पूरे भारत में दलितों के लिए एक बड़ी खुशखबरी के रूप में देखी जा रही है। शरण कुमार लिंबाले अपनी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ से काफी चर्चा में आ गए थे।

क्या होली का त्योहार ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को मनाना चाहिए?

 होली हिंदुओं का त्यौहार नहीं है, यह भारतीयों का त्यौहार है और ठीक से कहा जाए तो यह भारतीय किसानों,  मजदूरों, आदिवासियों, ओबीसी दलितों इत्यादि का त्योहार है। या फिर यह कह सकते हैं कि होली भारत के आम आदमी का त्योहार है। एक विशेष नजरिया से देखे तो वास्तव में सभी त्योहार किसानों के त्योहार है। गेहूं की कटाई के बाद प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए उत्सव बनाए गए हैं। धीरे-धीरे बाद में जैसे-जैसे धर्म और संस्कृतियों का विकास हुआ उन्होंने अपने धार्मिक प्रतीक इससे जोड़ दिए। सभी देशों में सभी समाजों में यह काम हुआ है।

इसके बाद अलग-अलग समाजों में सूचना और जानकारी का आदान-प्रदान हुआ लोग एक दूसरे से मिलने के लिए। उसके बाद धीरे-धीरे एक संस्कृति पर दूसरी संस्कृति हावी हुई, एक समाज पर दूसरे समाज ने आक्रमण करके उसे अपना गुलाम बनाया। इस तरह उन्होंने पुराने समाज के त्योहारों में अपने नए देवी-देवताओं और प्रतीकों को जोड़कर पुराने प्रतीकों को हटा दिया। यह पूरी दुनिया में हुआ है, ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में आर्य ब्राह्मणों ने भारत के मूल निवासियों के खिलाफ ऐसा किया है। पूरी दुनिया में जितने भी बड़े धर्म हुए हैं उन्होंने नए इलाकों में जाकर स्थानीय मूल निवासियों को तलवार और षड्यंत्र के जरिए जीता और फिर उन्हें मानसिक सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाकर उनकी पुरानी परंपराओं में अपनी परंपराओं  की मिलावट कर दी।

ठीक यही भारत में होली, दिवाली, गुरु पूर्णिमा, वैशाखी, पोंगल, मकर सक्रांति इत्यादि त्योहारों के साथ हुआ। फिर इसके बाद भारत के मूलनिवासी महापुरुषों के जीवन से जुड़े उत्सवों और त्यौहारों को भी आर्य ब्राह्मणों ने अपने धर्म के हिसाब से बदल दिया। उदाहरण के लिए शिव वास्तव में भारत के इंडीजीनस या ट्राइबल समुदाय के देवता रहे हैं, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित महाराष्ट्र, उड़ीसा, तेलंगाना, कर्नाटक इत्यादि राज्यों में संभू सेक कहा जाता है। उन से जुड़ा हुआ ‘शंभू नरका’ नाम का एक त्योहार होता है जिसे हिंदुओं ने बाद में शिवरात्रि बना दिया। ऐसे और बहुत सारे उदाहरण हैं जिनमें विस्तार से बात की जा सकती है।

इस तरह ठीक से देखा जाए तो भारत में मनाए जाने वाले सारे त्योहार मूल रूप से भारतीय किसानों, और महिलाओं के हैं। दिक्कत यह है कि इन प्राचीन त्योहारों को आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर और अपने धर्म की मिलावट करके किसानों मजदूरों और महिलाओं के खिलाफ खड़ा कर दिया है। इसलिए जब यह पूछा जाता है कि क्या हमें दिवाली इत्यादि त्योहार मनाने चाहिए या चाहिए नहीं मनाने चाहिए, तो इसका उत्तर थोड़ा कठिन है। यहां कठिनाई यह है कि आर्यों के ईश्वर और धर्म की मिलावट के पहले प्राचीन भारतीय लोग जिस तरीके से यह त्योहार मनाते थे, हमें वह तरीका पहले खोजना होगा। फिर हमें यह भी जानना होगा कि क्या-क्या मिलावट की गई है और मिलावट को कैसे दूर किया जाए। इस तरह अगर हम भारत के प्राचीन लोगों द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों को समझ ले, और उसमें से ब्राह्मण धर्म के ईश्वर देवी देवता और वर्णाश्रम धर्म वादी पाखंड को निकाल दें तो फिर यह त्यौहार बहुत सुरक्षित बन जाएंगे और फिर सभी दलित पिछड़े और महिलाएं इन त्योहारों को मना सकती हैं।

विशेष रूप से आज का जो विषय है ‘होली का त्यौहार’, अगर इस त्यौहार को ठीक से देखें तो या मूल रूप से इंडीजीनस या ट्राइबल लोगों का या फिर, भारत के ओबीसी दलितों और किसानों त्योहार है। पुराने समय में फसल काटने के बाद फसल को जब पहली बार गांव में लाया जाता था तब पूरे गांव को, घरों को और गली मोहल्लों को साफ किया जाता था। यह प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करने के लिए किया जाता था। घरों से और गली मोहल्ले से जो कचरा निकलता था उसे एक स्थान पर इकट्ठा करके जला दिया जाता था। इस तरह से जलाने के दौरान अग्नि की वंदना की जाती थी, यहां अग्नि परिपक्वता और ज्ञान एवं शक्ति का प्रतीक बन जाती थी। प्राचीन समय में ईश्वर इत्यादि का आविष्कार नहीं हुआ था तब प्रकृति की शक्तियों को ही पूजा जाता था। आज भी भारत के ट्राइबल समाज में ईश्वर या सृष्टि जैसी कोई कल्पना नहीं है, भारत का ट्राईबल और दलित समाज आज भी बौद्ध और जैन परंपरा के अनुसार ईश्वर और सृष्टि को नहीं मानता है।

प्राचीन ट्राइबल या इंडीजीनस किसान घरों की सफाई के बाद गांव का कचरा एक नियत स्थान पर जलाते थे और अग्नि की वंदना करते थे। ऐसी वंदना करते समय नई-नई फसल से आई उपज का थोड़ा सा हिस्सा अग्नि को भेंट देते हुए उस अग्नि में जलाते थे। उदाहरण के लिए नए आए गेहूं की कुछ बालियां गोबर की गोलाकार की रिंग जैसी रचनाओं में बांधकर इस आग में जलाकर या भूनकर खाई जाती थी। फिर इसी आग को लेकर सभी लोग अपने अपने घरों में चूल्हा जलाते थे। इस प्रकार यह बहुत प्राचीन किसानों का त्यौहार है। बाद में आर्य ब्राह्मणों ने जब भारत पर आक्रमण किया और धीरे-धीरे अपने षड्यंत्र से भारत के भोले भाले लोगों को कमजोर करके जीत लिया। तब उनके सरल से प्रकृति पूजक त्योहारों में अपने देवी-देवताओं इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र और अपने काल्पनिक अवतारों को इत्यादि को इनसे जोड़ दिया।

भारत के मूलनिवासी समुदाय में स्त्री और पुरुष मे ज्यादा भेद नहीं किया जाता है, बल्कि प्राचीन भारतीय परंपरा तो मातृसत्तात्मक परंपरा थी। लेकिन आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर को भारत में जब थोपना शुरू किया तब उन्होंने महिलाओं को कमजोर साबित करते हुए पित्र सत्तावादी ढांचा खड़ा किया। इसीलिए उन्होंने भारत की प्राचीन मात्र देवियों और ग्राम देवियों को अपने पुरुष देवताओं की पत्नी बनाकर उनका गुलाम बनाया। और धीरे-धीरे प्राचीन भारत के त्योहारों में स्त्रियों की उर्वरा शक्ति को प्रकृति की उर्वरा शक्ति के साथ जोड़कर जो त्योहार मनाए जाते थे उन त्योहारों में अपने पुरुष एवं वैदिक देवताओं को शामिल कर दिया। इस प्रकार स्त्री और प्रकृति की वंदना करने वाले त्योहार बाद में पुरुष और ईश्वर की वंदना करने वाले त्योहार बन गए।

अब इन सभी त्योहारों में स्त्री को ना केवल कम सम्मान दिया जाता है बल्कि उन्हें पुरुषों से कमजोर, और पुरुषों पर निर्भर रहने वाले पारिवारिक सदस्य की तरह दिखाया जाता है। इस नजरिए से होली का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है, प्राचीन भारतीय समाज में जब आर्यों और ब्राह्मणों का ईश्वर नहीं आया था, तब भारतीय लोग स्त्री और प्रकृति की उर्वरा शक्ति की वंदना करते थे। ब्राह्मणों के ईश्वर ने इसे धीरे-धीरे बदल दिया और स्त्री को न केवल कमजोर साबित किया बल्कि उसकी उर्वरा शक्ति और उसकी बच्चे पैदा करने की क्षमता को अपमानित करते हुए उसे अछूत और पापयोनी सिद्ध कर दिया। होली के त्योहार में एक स्त्री को मायावी या राक्षसी कहकर जिस प्रकार जलाया जाता है वह अपने आप में एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की सूचना देने वाला कर्मकांड है।

अगर हम आज त्योहार को मनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने प्राचीन इतिहास में, अपने आसपास रहने वाले इंडीजीनस या आदिवासी एवं दलित लोगों की परंपरा में झांकना चाहिए। इसके जरिए पता चलेगा कि प्राचीन समय में किसी एक इलाके में यह त्योहार कैसे मनाया जाता था। यह तरीका जान लेना बहुत मुश्किल नहीं है, अगर हमें यह तरीका पता चल जाए तो इसके बाद हम इसमें से ब्राह्मणों की ईश्वर और वर्णाश्रम धर्म से जुड़े प्रतीकों को इसमें से निकाल सकते हैं। और फिर धीरे-धीरे हम भारत के मूल निवासियों के त्योहारों को फिर से जिंदा कर सकते हैं। अब यह काम कोई एक व्यक्ति या एक परिवार या एक गाँव नहीं कर सकता, इसके लिए भारत के मूलनिवासी बहुजनो के संगठनों को आगे आना चाहिए और संस्थागत रूप से रिसर्च करके भारत के प्राचीन त्योहारों का वास्तविक स्वरूप सामने लाया जाना चाहिए। अगर हम ऐसी शुरुआत कर सकें तो धीरे-धीरे हम अगले 10-15 साल में भारत के सभी त्योहारों को फिर से प्राचीन मूल निवासियों के त्योहारों की तरह खड़ा कर सकते हैं।

भारत के सभी त्योहार वास्तव में भारत के मूलनिवासी इंडीजीनस लोगों के या श्रमण लोगों के त्योहार हैं। इंडीजीनस लोगों को आदिवासी भी कहा जाता है, प्राचीन श्रमण लोगों ने बौद्ध धर्म जैन धर्म और आजीवक धर्म का निर्माण किया था। उन धर्मों में ईश्वर और ईश्वरीय सृष्टि का कोई महत्व नहीं है। जैन धर्म और बौद्ध धर्म तो निरीश्वरवादी धर्म है इसमें ईश्वर को नहीं माना जाता। इन धर्मों ने भारत के सबसे पुराने त्योहारों का निर्माण किया है जो कि महिलाओं और प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करते हुए उत्सव मनाने के त्योहार हैं। इन आदिवासी एवं श्रवण त्योहारों को ठीक से देखें तो यह एक दूसरे से मिलकर सहयोग करके फसल बोना, फसल काटना, मकान बनाना, रास्ता बनाना, कुआं खोदना, सिंचाई करना, शिकार करना, मिट्टी चमड़े लोहे या लकड़ी के सामान बनाना इत्यादि से जुड़ा हुआ है।

इसलिए यह त्योहार लोगों को आपस में इकट्ठा करके उनमें एक सामाजिकता की भावना पैदा करने के लिए बनाए गए थे। लेकिन दुर्भाग्य से आर्य ब्राह्मणों के भारत में आने के बाद उन्होंने भारतीयों को कमजोर करने के लिए और उन में फूट डालकर राज करने के लिए उनके इन्हें त्योहारों में अपने भेदभाव सिखाने वाले ईश्वर धर्म और देवी देवता की मिलावट कर दी। इसके बाद भारत का समाज पूरी तरीके से टूटकर कमजोर हो गया। और उसमें जाति और वर्ण व्यवस्था शामिल हो गई।

अगर हम इस बात को ठीक से समझ लें हमें पता चलता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था और दुनिया भर के अंधविश्वास असल में उत्सवों त्योहारों और किस्से कहानियों के माध्यम से ही फैलाए गए हैं। इसीलिए भारत में जिस तरीके से वर्तमान में त्योहार मनाए जाते हैं त्योहारों को पूरी तरह से बदलना बहुत जरूरी है। आप देखते होंगे और हम सभी जानते हैं कि छुआछूत, भेदभाव ऊंच-नीच, और महिलाओं का अपमान करना, यह कमजोर स्त्री का अपमान करना यह सभी स्कूल कॉलेज या विद्यालय में नहीं सिखाया जाता। यह सारी गंदी बातें लोग धार्मिक कहानियों, पुराण की कहानियों, मिथकीय कहानियों  के माध्यम से सीखते हैं। और भारत में जितने भी उत्सव एवं त्योहार हैं अभी उत्सव और त्योहार गंदी, महिला विरोधी और असभ्य कहानियों और मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।

अगर इन त्योहारों को बंद कर दिया जाए तो ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था पर आधारित अंधविश्वासों को दूसरी पीढ़ी में जाने से रोका जा सकता है। लेकिन त्योहारों को बंद करना असंभव है, इसीलिए जब भारत की ओबीसी या दलित या आदिवासी आजकल प्रचलित त्योहार मनाना बंद करने की बात कहते हैं तो वे एक अर्थ में गलत हैं। वास्तव में सच्चाई यह है कि कोई भी समाज या कोई भी संस्कृति उत्सव एवं त्योहारों के बिना जिंदा नहीं रह सकती। आप अगर अपने बच्चों एवं स्त्रियों को कोई खास त्यौहार मनाने से रोकेंगे तो वे आपसे तुरंत पूछेंगे कि इस त्योहार कि जगह हम कौन सा त्योहार मनाएं? आप बच्चों, बड़े, बूढ़ों, औरतों और पुरुषों को उत्सव मनाने से  नहीं रोक सकते। आप कोई भी त्योहार बंद नहीं कर सकते।

इससे बेहतर विकल्प यह है कि आप अपने प्राचीन त्योहारों में ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था की जो मिलावट हो गई है उसे पहचान कर काट कर बाहर फेंक दें। उसमें प्राचीन श्रमण और आदिवासी संस्कृति के मूल्यों को फिर से शामिल कर दें। अगर हम यह कर सके तो अगले 10-15 साल में हम भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों, किसानों मजदूरों और महिलाओं को पापियोंनी बनाने वाली परंपरा को जड़ से उखाड़ सकते हैं, और भारत के करोड़ों लोगों को सम्मानजनक जीवन दे सकते हैं। लेकिन यह काम एक व्यक्ति एक परिवार गांव नहीं कर सकता। इसके लिए पूरे भारत के ओबीसी दलितों आदिवासियों  महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को सामने आना चाहिए।

हमें ऐसे संगठनों का निर्माण करना चाहिए जो भारत में त्योहार मनाने के ढंग, एक दूसरे से बात करने के ढंग, एक दूसरे को संबोधित करने की शैली, शादी ब्याह के तौर तरीके, जन्मदिन मनाने के तौर तरीके, होली दिवाली मनाने के तौर-तरीके बदलने की शुरुआत कर सके। इस तरह एक पक्का सांस्कृतिक बदलाव बहुत आसानी से किया जा सकता है। और आज हमारे पास इंटरनेट सोशल मीडिया इत्यादि सुविधा मौजूद है उससे यह काम अगले 10 या 15 सालों में बहुत आसानी से किया जा सकता है।

इस तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हमेशा से ही एक कठिन काम रहा है। अगर यह आसान काम होता तो यह हो ही चुका होता। बाबासाहब आंबेडकर महामना ज्योतिबाराव फूले व रामास्वामी पेरियार ने हमें कठिन काम करना ही सिखाया है। आसान काम करने से बड़े परिणाम नहीं हासिल होते, और अगर हम भारत के करोड़ों ओबीसी दलित आदिवासी और महिलाओं का जीवन सुधारना चाहते हैं तो हमें कठिन काम ही करने होंगे। दुनिया में समाज में जब भी बड़े बदलाव किए गए हैं वह धीरे-धीरे और कठिन कामों को करते हुए ही हुए हैं। उदाहरण के लिए आर्य ब्राह्मण जब भारत में पहली बार आए थे तब उन्होंने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई से भारत के मूल निवासी लोगों को अपने ईश्वर और वेद वेदान्त के षड्यंत्र में फसाया है।

आज भी आप भारत में ग्रामीण और ट्राइबल इलाकों में जाकर देखेंगे तो वहां शहरों में मनाए जाने वाले त्योहार आपको कम नजर आएंगे। आप ट्राइबल इलाकों में जाकर देखें तो वहां पर तरह-तरह के देवी-देवताओं की तस्वीरें पिछले 20 सालों में पहुंची हैं। उसके पहले वहां पर वे अपने स्थानीय ग्राम देवियों ग्राम देवताओं सहित जंगल पहाड़ पर्वत इत्यादि की पूजा करते थे। बाद में जब टेलीविजन और फिल्म आई सब टीवी सीरियल और फिल्मों के माध्यम से तरह-तरह के देवी देवताओं की कहानियां उनके घरों में पहुंची। इन कहानियों ने वहां पर जाति व्यवस्था को मजबूत किया और स्त्रियों का विरोध करने की परंपरा डाल दी। यह काम आर्य ब्राह्मणों ने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई के साथ ही किया है। और यह काम अभी भी जारी है। आप देख सकते हैं वे लोग कितनी योजना बनाकर पैसा खर्च करके हजारों लाखों लोगों को काम पर लगा कर इस काम को अंजाम देते हैं।

भारत में करोड़ों ओबीसी दलितों आदिवासियों और महिलाओं की जिंदगी बदलने के लिए हमें नई परंपराओं का निर्माण करना पड़ेगा। झंडे डंडे और राजनीतिक नारे उछालने से कुछ नहीं होने वाला, जब तक समाज के जीने का तौर तरीका उत्सव मनाने का त्योहार मनाने का तौर तरीका नहीं बदलेगा तब तक हम बाबासाहब आंबेडकर और ज्योतिबाराव फुले और बीपी मंडल साहब के सपनों का भारत नहीं बना पाएंगे।

तथ्यों को लेकर झूठ और ग़लत बोलने के रिकार्डधारी हैं पीएम मोदी- रवीश कुमार

प्रधानमंत्री इतिहास को लेकर झूठ बोलते रहे हैं। ग़लत भी बोलते रहे हैं। आधा सच और आधा झूठ बोल कर उलझाते भी रहे हैं। अगर झूठ और ग़लत बोलने में उनकी सरकार को भी शामिल कर लें तो ऐसी कई रिपोर्ट आपको मिल जाएँगी जिसमें उनकी ग़लतबयानियों का पर्दाफ़ाश किया गया है। इस रिकार्ड की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए सत्याग्रह और जेल जाने की बात को सोशल मीडिया पर मज़ाक़ उड़ जाना स्वाभाविक था। प्रधानमंत्री ने कर्नाटक के बीदर में बोल दिया कि जब भगत सिंह जेल में थे तब उनसे मिलने कांग्रेस का कोई नेता नहीं गया। तुरंत ही तथ्यों से इसे ग़लत साबित किया गया और आज तक प्रधानमंत्री ने उस पर कोई सफ़ाई नहीं दी।

गुजरात चुनाव के दौरान मोदी ने कह दिया कि मणि़शंकर अय्यर के घर एक बैठक हुई थी जिसमें मनमोहन सिंह, हामिद अंसारी मौजूद थे। इस बैठक में पाकिस्तान के उच्चायुक्त और पूर्व विदेश मंत्री आए थे। मोदी ने बेहद चालाकी से इसे गुजरात चुनाव से जोड़ा और कहा कि पाकिस्तान कांग्रेस की मदद कर रहा है और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। इस बैठक में पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर भी थे, मोदी ने इसकी भी परवाह नहीं की कि भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख दीपक कपूर पाकिस्तान के साथ मिल कर किसी साज़िश में शामिल नहीं हो सकते। दीपक कपूर ने कहा था कि उस मुलाक़ात में गुजरात चुनाव पर कोई बात नहीं हुई। ख़ैर इस झूठ पर प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में माफ़ी माँगी थी।

तक्षशिला बिहार में है। यह ग़लतबयानी थी। वाजपेयी मेट्रो में सवारी करने वाले पहले भारतीय थे। यह भी ग़लत तथ्य साबित हुआ। कर्नाटक की रैली में मोदी बोल गए कि उन्होंने खातों में सीधे पैसे भेजने की सेवा शुरू की जबकि इसकी शुरुआत 2013 में हो चुकी थी। यूपी के चुनाव प्रचार में मोदी ने कह दिया कि रमज़ान में बिजली तो आती थी दीवाली में भी आनी चाहिए थी। बाद में तथ्यों से पता चला कि यह ग़लत है। कानपुर में रेल दुर्घटना हुई थी तो आई एस आई से जोड़ दिया जिसे यूपी के पुलिस प्रमुख ने ख़ारिज किया था। इसकी रिपोर्ट आ गई है आप खुद सर्च करें।

ऐसे अनेक उदाहरण आपको ऑल्ट न्यूज़ से लेकर तमाम मीडिया रिपोर्ट में मिलेंगे। यहाँ तक कि पंद्रह अगस्त के भाषणों में भी तथ्यों की विसंगतियाँ उजागर की जाती रही हैं। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिकार्ड है। ऐसे में बांग्लादेश की आज़ादी के समर्थन में सत्याग्रह करने और जेल जाने की बात का मज़ाक़ उड़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं है और न ही पत्रकारिता की नाकामी है। पहले भी इसी पत्रकारिता ने उनके झूठ और ग़लतबयानी को पकड़ा है जिस पर कोई जवाब नहीं आया और उन कामों को भी मोदी विरोध के खाँचे में फ़िट कर किनारे कर दिया गया। इस चालाकी को भी समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री के राजनीति नेतृत्व के नीचे इतिहास का क्या हाल किया गया है और नेहरू के इतिहास को किस तरह कलंकित किया गया है बताने की ज़रूरत नहीं। मोदी के राज में पत्रकारिता का क्या हाल हुआ है? उनके लिए पत्रकारिता के नाम पर छूट माँगने से पहले इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

यह बात सही है कि बांग्लादेश के निर्माण को लेकर उस वक्त देश में एक माहौल था। उस समय की रणनीति और राजनीति को समग्र रूप से देना यहां संभव नहीं है और न सभी जानकारी है। जनसंघ ने बांग्लादेश को मान्यता देने के आंदोलन का समर्थन किया था। संघ ने भी। शेषाद्रीचारी ने ‘दि वायर’ में लिखा है और वायर ने छापा है। शेषाद्री चारी ने लिखा है कि बांग्लादेश का बनना संघ के अखंड भारत की सोच की जीत थी। इस लेख में भी सत्याग्रह का ज़िक्र नहीं है। हो सकता है लेखक से छूट गया हो या उन्होंने इसे महत्वपूर्ण न समझा हो। मगर चारी ने लिखा है कि उस समय संघ और जनसंघ ने कई बड़े प्रदर्शन और मार्च किए थे। मुमकिन है सत्याग्रह के बारे में अलग से ज़िक्र करने की ज़रूरत न हुई हो। अगर उन्हें मौजूदा प्रधानमंत्री के जेल जाने की बात का इल्म होता तो वे वाजपेयी की भूमिका के साथ मोदी के जेल जाने के संयोग का ज़रूर ज़िक्र करते। उस समय सोशलिस्ट पार्टी के नेता भी अमरीका का विरोध कर रहे थे। दोनों के प्रदर्शन एक दूसरे से घुले मिले हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री के इस बयान के संदर्भ में तीन किताबों का ज़िक्र आया है। एक किताब आपातकाल पर है। उनकी ही लिखी हुई। जिसे बीजेपी समर्थक कोट करने लगे। इसे पढ़ने वालों ने तुरंत ही खंडन कर दिया कि इसमें एक लाइन सत्याग्रह पर नहीं है। फिर गुजरात की वरिष्ठ पत्रकार दीपल त्रिवेदी ने ट्विट किया कि andy marino मोदी के आधिकारिक जीवनीकार हैं। उनकी जीवनी में एक लाइन सत्याग्रह और जेल पर नहीं है। दीपल ने पहली दो किताबों के बारे में कहा है। मैंने दोनों किताब नहीं पढ़ी है। तीसरी किताब नीलांजन मुखोपाध्याय की है। यह किताब andy marino की जीवनी से पहले आई थी। यह भी जीवनी ही है। इस किताब में मोदी ने सत्याग्रह और जेल जाने की बात की है। उन्हीं का दावा है।इस प्रसंग के पैराग्राफ़ में मोदी कहते हैं कि अमरीकी दूतावास के सामने विरोध करने कई दलों के नेता गए थे। जॉर्ज फ़र्नांडिस भी थे। इसकी सत्यता के प्रमाण अभी तक किसी ने पेश नहीं किए हैं, प्रदर्शन हुआ होगा। दूतावास के सामने प्रदर्शन करने पर गिरफ़्तारी हो सकती है। भले ही आप भारत सरकार के समर्थन में ही करें। अब मोदी जेल गए या नहीं गए इसे लेकर मज़ाक़ उड़ रहा है तो कोई तिहाड़ जेल में आर टी आई लगा रहा है। यह भी अजीब है कि मोदी आधिकारिक जीवनी में सत्याग्रह की बात नहीं करते हैं। जेल की बात नहीं करते हैं। लेकिन दूसरी किताब में करते हैं। एक चौथी किताब लैंस प्राइस की है। इसे मैंने नहीं पढ़ी है। इसलिए कह नहीं सकता कि उसमें क्या है। न ही इस किताब को पढ़ने वाले किसी पत्रकार की बात मेरी नज़र से गुजरी है। आपकी नज़र से गुज़री हो तो बता दीजिए।

2015 का एक वीडियो बयान सोशल मीडिया पर चल रहा है जिसमें मोदी इस सत्याग्रह की बात कर रहे हैं। पत्रकार शेष नारायण सिंह ने लिखा है कि वाजपेयी के आह्वान पर जनसंघ ने बांग्लादेश के लिए सत्याग्रह किया था। जहां उनका आधार मज़बूत था वहाँ पर धरना प्रदर्शन हुआ था। उनके जानने वाले लोग भी यूपी से दिल्ली गए थे। प्रदर्शन में हिस्सा लेने। एसोसिएट प्रेस का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें पीले रंग का झंडा लिए लोग दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं। शायद यह जनसंघ का झंडा था। पुलिस से धक्का मुक्की हो रही है। ज़ाहिर है इतने अंतर्विरोधों के बीच मज़ाक़ उड़ना और सवाल उठना लाज़िमी है। प्रधानमंत्री का कौन सा बयान झूठ है और कौन सा सच इसे लेकर सतर्क रहने की ज़रूरत है। मज़ाक़ उड़ाने से पहले भी और बाद में भी। क्योंकि झूठ बोल कर निकल जाने और कुछ ऐसा बोल देने जिसे लोग झूठ समझ लें दोनों ही खेल में नरेंद्र मोदी माहिर हैं।

रवीश कुमार की फेसबुक पोस्ट से साभार। सिर्फ हेडिंग में परिवर्तन किया गया है

कैलिफोर्निया की अदालत से दलितों के पक्ष में आ सकता है फैसला !

0

 जातिगत भेदभाव के खिलाफ अमेरिका में अम्बेडकरवादियों की लड़ाई जारी है। अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित संगठन ‘अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर’ (एआईसी) ने 23 मार्च को कैलिफोर्निया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा फिर से खटखटाया है। संगठन की मांग है कि उसे अमेरिका में होने वाले जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर एमिकस क्यूरी (अदालत का न्यायिक मित्र) के रूप में शामिल किया जाए।

गौरतलब है कि सिस्को सिस्टम्स नामक कंपनी में एक दलित इंजीनियर के खिलाफ सवर्ण इंजीनियरों एवं अधिकारियों द्वारा कथित जातिगत भेदभाव का मामला हुआ था जो अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। यह अमेरिका में अपनी किस्म का एक महत्वपूर्ण मामला है। अगर इस मामले में दलितों के पक्ष में फैसला आता है तो अमेरिका में जातिगत भेदभाव को भी नस्लवादी भेदभाव की तरह मानवाधिकार हनन के मामलों से जोड़ा जा सकेगा। अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (एआईसी) अमेरिका में बसे भारतीय दलितों एवं पिछड़ों के लिए आवाज उठाने वाला एक संगठन है।

अमेरिका में सवर्ण समाज के ही नहीं बल्कि दलित समाज के भारतीय भी बड़ी संख्या में बसे हैं और उनके खिलाफ भारतीय सवर्णों द्वारा भेदभाव के कई मामले सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में चूंकि जातिगत भेदभाव को नस्लवाद (रेसिज़्म) की तरह मानवाधिकार हनन के एक कारण के रूप में अभी तक नहीं देखा गया है। हालांकि भारतीय दलित बुद्धिजीवी एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता मांग करते रहे हैं कि जातिगत भेदभाव को भी नस्लवाद की तरह देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में अगर कैलिफोर्निया की अदालत से दलितों के पक्ष में फैसला आता है तो अमेरिका में एवं उसके बाद यूरोप में जाति को भी नस्ल की तरह देखने के लिए वातावरण बनाने की संभावना बढ़ जाएगी।

50% फीसदी से ज्यादा आरक्षण पर राज्य सरकारों ने लिया है यह फैसला

0

26 मार्च को मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक बड़ा फैसला आया है। इसी महीने में कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच ने राज्यों से पूछा था कि क्या 50% आरक्षण की सीमा बढ़ाई जा सकती है? यह प्रश्न राज्यों की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओ में एवं विभागों में रोजगार के अवसरों में जाति आधारित आरक्षण के विषय में पूछा गया था। कई राज्यों ने इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि वह राज्यों में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाना चाहते हैं। इन राज्यों के साथ केंद्र सरकार ने भी कहा कि मराठा रिजर्वेशन का प्रतिशत बढ़ाया जाना संविधान के अनुकूल ही है।

गौरतलब है कि 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में जाति आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर दी थी। अब राज्यों और केंद्र के सामने सवाल यह है कि क्या उस आदेश को संशोधित करने की आवश्यकता है? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले मामले पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा था कि या आरक्षण कितने सालों तक जारी रखा जा सकता है, और क्या इस तरह आरक्षण जारी रखने से संविधान में वर्णित समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता?

इस मामले में ताज़ा स्थिति यह है कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारे आरक्षण की सीमा 50% से अधिक बढ़ाने के पक्ष में आ गयी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए इन प्रश्नों के कारण यह मामला बहुत महत्वपूर्ण बन गया है। अब सीधे सीधे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की संवैधानिकता से जुड़े सैद्धांतिक प्रश्न को सुलझाने पर बहुत कुछ निर्भर हो गया है। अब इस मामले में भविष्य में जो भी फैसला आएगा वह निर्णायक रूप से भारत के दलितों पिछड़ों के भविष्य को तय करेगा।

बिहार में महासंग्राम शुरू, तेजस्वी ने की नीतीश कुमार को घेरने की तैयारी

0

23 मार्च को बिहार विधानसभा में हुई गुंडागर्दी के खिलाफ राष्ट्रीय जनता दल ने मोर्चा खोल दिया है। नीतीश कुमार पर  गुंडई का आरोप लगाते हुए राजद ने कल 26 मार्च को बिहार बंद का ऐलान किया है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्विट करते हुए कहा-

सड़कछाप गुंडई पर उतर आए अहंकारी नीतीश कुमार द्वारा विधानसभा के चीरहरण, माननीय विधायकों के साथ मारपीट, बेरोजगारी, महँगाई और सरकारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध कल, 26 मार्च, को महागठबंधन के द्वारा बिहार में बिहार बन्द का आह्वान किया है!

सभी बिहारवासी बन्द में हिस्सा लें!

23 मार्च की घटना के बाद से ही नीतीश कुमार की किरकिरी हो रही है। हर ओर नीतीश कुमार की आलोचना हो रही है। राजद और इसके नेता तेजस्वी यादव खासकर नीतीश कुमार पर हमलावर हैं। तेजस्वी ने एक वीडियो जारी कर भी नीतीश पर निशाना साधा है।

Telangana lost its Anti-Caste Doctor: Dr. Kolluri Chiranjeevi (1947-2021)

“I wanted to see Telangana as a separate state before I die”- a seasoned activist Dr. Kolluri Chiranjeevi, seven years ago over a phone call on 8 March when the central government officially announced the formation of the state on 2, June, 2014. I was on my way back to Delhi after a year long field work in Osmania University.  What a coincidence that on March 8th of this year he left us, leaving a legacy of his anti-caste activism for social justice.

As a budding sociologist, I spent 2013 conducting field work in Hyderabad as I researched the Telangana movement. In that time, I had the honor and privilege of meeting the famed activist and first generation student leader of the separate Telangana movement, Dr. Chiranjeevi Kolluri. While I traveled around the city, whenever I passed by lakdi Ka Pul, I would stop by Dr. Chiranjeevi’s flat to feel the warmth of his charming personality. As we started speaking, his wife, who is also a doctor and has provided free medical service to the poorest neighborhood, will make chai. After chai, chutney, and biryani, “Dr. Saab” travels back in history and brings out those facts that were not available in newspapers or archives. After listening to his revolutionary story, as a young researcher, I have always been interested in this question: “What motivates someone to become an activist?”

Born into a socialist family in 1947 in Warangal to a father who was a cloth mill worker and was a Lohia’ite.  ‘There was Hind Mazdoor Sabha that time, and my father was a committee member of this. We had a political atmosphere in our house. That is how I became an activist,’ proudly recalls Dr. Chiranjeevi.

Chiranjeevi was a brilliant student of medical science (MBBS) at Osmania University who eventually turned to radical activism, rising to the top leadership in the 1969 Osmania student movement for separate Telangana. Along with his group, he formed the Telangana Student Action Committee and fought for their separate Telangana. In August 1969, students printed the pamphlet and declared a Separate state on their own and also gave a press statement about a program to celebrate Telangana.. A senior leader Kaloji Rao was invited to honour the function, but right before the function police arrested Kaloji Rao and Chiranjeevi.

To get their Telangana, Chiranjeevi’s group decided to follow the constitutional way. After the formation of Telangana Praja Samiti; students contested general elections and won with a majority in the Telangana region. After all this struggle of winning elections, Chiranjeevi and his friends realised that the government would never give Telangana its freedom. In a state of hopelessness, Chiranjeevi and his friends turned into radical Marxists and joined the People’s War Group. After serving there for a decade, he realised this was a diversion of his goal for a separate Telangana. In the 1980s, when Manyawar Kanshi Ram formed the Bahujan Samaj Party, Dr. Chiranjeevi was inspired by the slogan, Ballot is more powerful than bullet. He began working for the BSP as the president of Andhra Pradesh region and cherished some wonderful moments in the company of Kanshi Ram and travelled the Northern India. That journey made him a life-time anti-caste activist and writer and he served as an editor to Bahujan Patrika.

Dr Chiranjeevi – A man who lost hundreds of his friends in the first Telangana agitation for separate statehood in 1969. He recalls the 10 month long agitations saying, “We had no clue how to fight it. We had a dream, we had passion to see our own statehood; but we didn’t have a strategy. Being on the protest sites and running on the roads of Hyderabad, we learned new strategies to survive the police brutality. We used to carry two handkerchiefs and two onions in our pocket. The minute they used to throw the tear gas shell, we used to eat onion and its smell used to stop the effect of gas. When police throw tear gas shells, it takes 15-20 seconds to burst. Once the gas started coming out, then it was not easy to pick it or touch it because it was very hot. Within these 20 seconds, we used to pick up the shells and throw them back at the police. Such instant strategies were part of our everyday life for 10 months and the battle was so brutal that the police never followed any rules and killed our more than 1000 students. The official data reveals only 372 students died.”

When I asked him what he thought of the ongoing Osmania student activism at the time, Dr. Chiranjeevi displayed resentment about the state of affairs in that most activism was social media based. His way of countering that was forming the 1969 Founders’ Forum for Separate Telangana to support and guide activists in strategies of protest and negotiation until the separate statehood was given to Telangana in 2014. Even after Telangana formation, he continued advocating the welfare of the socially marginalized sections.

Telangana will always miss its doctor, and his activism will always remain alive among revolutionaries, like the meaning of his name.

केरल में लागू होगा ‘रोहित वेमुला एक्ट’?

0

भारत के करोड़ों ओबीसी, दलित एवं आदिवासी छात्रों के लिए एक बड़ी संभावना बन रही है। लंबे समय से शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी, दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव को काम करने का रास्ता खोजा जा रहा है। आरक्षित वर्ग से आने वाले बच्चों को ‘कोटा वाला’ कहा जाता है। इस तरह करोड़ों भारतीय बच्चों को जातिवादी और वर्णवादी असमाजिक तत्वों द्वारा सताया जाता है। लेकिन यह स्थिति बदल सकती है और इसकी शुरुआत केरल राज्य से हो सकती है। केरल कांग्रेस ने घोषणा की है कि अगर केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ सत्ता में आता है तो केरल में भारत का पहला ‘रोहित वेमुला एक्ट’ लागू होगा। इस एक्ट के जरिए दलित और आदिवासी छात्रों को भेदभाव से लड़ने में मदद मिलेगी। शनिवार 20 फरवरी को जारी यूडीएफ के 2021 केरल चुनाव घोषणापत्र में यह बात कही गई। इससे समझा जा सकता है कि इसका लाभ शूद्र समझे जाने वाले ओबीसी को भी मिलेगा।

कांग्रेस के इस घोषणापत्र में कहा गया है, “हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव, रैगिंग और पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए ‘रोहत वेमुला अधिनियम’ लागू करेंगे। सन 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव के कारण दलित समाज के छात्र रोहित वेमुला को आत्महत्या करनी पड़ी थी, इस घटना के बाद देश भर के छात्रों और शिक्षाविदों के बीच आंदोलन छिड़ गया था, जिसमें केंद्र सरकार से इस अधिनियम को लागू करने की मांग की गई थी।”