क्या होली का त्योहार ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को मनाना चाहिए?

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1993

 होली हिंदुओं का त्यौहार नहीं है, यह भारतीयों का त्यौहार है और ठीक से कहा जाए तो यह भारतीय किसानों,  मजदूरों, आदिवासियों, ओबीसी दलितों इत्यादि का त्योहार है। या फिर यह कह सकते हैं कि होली भारत के आम आदमी का त्योहार है। एक विशेष नजरिया से देखे तो वास्तव में सभी त्योहार किसानों के त्योहार है। गेहूं की कटाई के बाद प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए उत्सव बनाए गए हैं। धीरे-धीरे बाद में जैसे-जैसे धर्म और संस्कृतियों का विकास हुआ उन्होंने अपने धार्मिक प्रतीक इससे जोड़ दिए। सभी देशों में सभी समाजों में यह काम हुआ है।

इसके बाद अलग-अलग समाजों में सूचना और जानकारी का आदान-प्रदान हुआ लोग एक दूसरे से मिलने के लिए। उसके बाद धीरे-धीरे एक संस्कृति पर दूसरी संस्कृति हावी हुई, एक समाज पर दूसरे समाज ने आक्रमण करके उसे अपना गुलाम बनाया। इस तरह उन्होंने पुराने समाज के त्योहारों में अपने नए देवी-देवताओं और प्रतीकों को जोड़कर पुराने प्रतीकों को हटा दिया। यह पूरी दुनिया में हुआ है, ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में आर्य ब्राह्मणों ने भारत के मूल निवासियों के खिलाफ ऐसा किया है। पूरी दुनिया में जितने भी बड़े धर्म हुए हैं उन्होंने नए इलाकों में जाकर स्थानीय मूल निवासियों को तलवार और षड्यंत्र के जरिए जीता और फिर उन्हें मानसिक सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाकर उनकी पुरानी परंपराओं में अपनी परंपराओं  की मिलावट कर दी।

ठीक यही भारत में होली, दिवाली, गुरु पूर्णिमा, वैशाखी, पोंगल, मकर सक्रांति इत्यादि त्योहारों के साथ हुआ। फिर इसके बाद भारत के मूलनिवासी महापुरुषों के जीवन से जुड़े उत्सवों और त्यौहारों को भी आर्य ब्राह्मणों ने अपने धर्म के हिसाब से बदल दिया। उदाहरण के लिए शिव वास्तव में भारत के इंडीजीनस या ट्राइबल समुदाय के देवता रहे हैं, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित महाराष्ट्र, उड़ीसा, तेलंगाना, कर्नाटक इत्यादि राज्यों में संभू सेक कहा जाता है। उन से जुड़ा हुआ ‘शंभू नरका’ नाम का एक त्योहार होता है जिसे हिंदुओं ने बाद में शिवरात्रि बना दिया। ऐसे और बहुत सारे उदाहरण हैं जिनमें विस्तार से बात की जा सकती है।

इस तरह ठीक से देखा जाए तो भारत में मनाए जाने वाले सारे त्योहार मूल रूप से भारतीय किसानों, और महिलाओं के हैं। दिक्कत यह है कि इन प्राचीन त्योहारों को आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर और अपने धर्म की मिलावट करके किसानों मजदूरों और महिलाओं के खिलाफ खड़ा कर दिया है। इसलिए जब यह पूछा जाता है कि क्या हमें दिवाली इत्यादि त्योहार मनाने चाहिए या चाहिए नहीं मनाने चाहिए, तो इसका उत्तर थोड़ा कठिन है। यहां कठिनाई यह है कि आर्यों के ईश्वर और धर्म की मिलावट के पहले प्राचीन भारतीय लोग जिस तरीके से यह त्योहार मनाते थे, हमें वह तरीका पहले खोजना होगा। फिर हमें यह भी जानना होगा कि क्या-क्या मिलावट की गई है और मिलावट को कैसे दूर किया जाए। इस तरह अगर हम भारत के प्राचीन लोगों द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों को समझ ले, और उसमें से ब्राह्मण धर्म के ईश्वर देवी देवता और वर्णाश्रम धर्म वादी पाखंड को निकाल दें तो फिर यह त्यौहार बहुत सुरक्षित बन जाएंगे और फिर सभी दलित पिछड़े और महिलाएं इन त्योहारों को मना सकती हैं।

विशेष रूप से आज का जो विषय है ‘होली का त्यौहार’, अगर इस त्यौहार को ठीक से देखें तो या मूल रूप से इंडीजीनस या ट्राइबल लोगों का या फिर, भारत के ओबीसी दलितों और किसानों त्योहार है। पुराने समय में फसल काटने के बाद फसल को जब पहली बार गांव में लाया जाता था तब पूरे गांव को, घरों को और गली मोहल्लों को साफ किया जाता था। यह प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करने के लिए किया जाता था। घरों से और गली मोहल्ले से जो कचरा निकलता था उसे एक स्थान पर इकट्ठा करके जला दिया जाता था। इस तरह से जलाने के दौरान अग्नि की वंदना की जाती थी, यहां अग्नि परिपक्वता और ज्ञान एवं शक्ति का प्रतीक बन जाती थी। प्राचीन समय में ईश्वर इत्यादि का आविष्कार नहीं हुआ था तब प्रकृति की शक्तियों को ही पूजा जाता था। आज भी भारत के ट्राइबल समाज में ईश्वर या सृष्टि जैसी कोई कल्पना नहीं है, भारत का ट्राईबल और दलित समाज आज भी बौद्ध और जैन परंपरा के अनुसार ईश्वर और सृष्टि को नहीं मानता है।

प्राचीन ट्राइबल या इंडीजीनस किसान घरों की सफाई के बाद गांव का कचरा एक नियत स्थान पर जलाते थे और अग्नि की वंदना करते थे। ऐसी वंदना करते समय नई-नई फसल से आई उपज का थोड़ा सा हिस्सा अग्नि को भेंट देते हुए उस अग्नि में जलाते थे। उदाहरण के लिए नए आए गेहूं की कुछ बालियां गोबर की गोलाकार की रिंग जैसी रचनाओं में बांधकर इस आग में जलाकर या भूनकर खाई जाती थी। फिर इसी आग को लेकर सभी लोग अपने अपने घरों में चूल्हा जलाते थे। इस प्रकार यह बहुत प्राचीन किसानों का त्यौहार है। बाद में आर्य ब्राह्मणों ने जब भारत पर आक्रमण किया और धीरे-धीरे अपने षड्यंत्र से भारत के भोले भाले लोगों को कमजोर करके जीत लिया। तब उनके सरल से प्रकृति पूजक त्योहारों में अपने देवी-देवताओं इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र और अपने काल्पनिक अवतारों को इत्यादि को इनसे जोड़ दिया।

भारत के मूलनिवासी समुदाय में स्त्री और पुरुष मे ज्यादा भेद नहीं किया जाता है, बल्कि प्राचीन भारतीय परंपरा तो मातृसत्तात्मक परंपरा थी। लेकिन आर्य ब्राह्मणों ने अपने ईश्वर को भारत में जब थोपना शुरू किया तब उन्होंने महिलाओं को कमजोर साबित करते हुए पित्र सत्तावादी ढांचा खड़ा किया। इसीलिए उन्होंने भारत की प्राचीन मात्र देवियों और ग्राम देवियों को अपने पुरुष देवताओं की पत्नी बनाकर उनका गुलाम बनाया। और धीरे-धीरे प्राचीन भारत के त्योहारों में स्त्रियों की उर्वरा शक्ति को प्रकृति की उर्वरा शक्ति के साथ जोड़कर जो त्योहार मनाए जाते थे उन त्योहारों में अपने पुरुष एवं वैदिक देवताओं को शामिल कर दिया। इस प्रकार स्त्री और प्रकृति की वंदना करने वाले त्योहार बाद में पुरुष और ईश्वर की वंदना करने वाले त्योहार बन गए।

अब इन सभी त्योहारों में स्त्री को ना केवल कम सम्मान दिया जाता है बल्कि उन्हें पुरुषों से कमजोर, और पुरुषों पर निर्भर रहने वाले पारिवारिक सदस्य की तरह दिखाया जाता है। इस नजरिए से होली का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है, प्राचीन भारतीय समाज में जब आर्यों और ब्राह्मणों का ईश्वर नहीं आया था, तब भारतीय लोग स्त्री और प्रकृति की उर्वरा शक्ति की वंदना करते थे। ब्राह्मणों के ईश्वर ने इसे धीरे-धीरे बदल दिया और स्त्री को न केवल कमजोर साबित किया बल्कि उसकी उर्वरा शक्ति और उसकी बच्चे पैदा करने की क्षमता को अपमानित करते हुए उसे अछूत और पापयोनी सिद्ध कर दिया। होली के त्योहार में एक स्त्री को मायावी या राक्षसी कहकर जिस प्रकार जलाया जाता है वह अपने आप में एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की सूचना देने वाला कर्मकांड है।

अगर हम आज त्योहार को मनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने प्राचीन इतिहास में, अपने आसपास रहने वाले इंडीजीनस या आदिवासी एवं दलित लोगों की परंपरा में झांकना चाहिए। इसके जरिए पता चलेगा कि प्राचीन समय में किसी एक इलाके में यह त्योहार कैसे मनाया जाता था। यह तरीका जान लेना बहुत मुश्किल नहीं है, अगर हमें यह तरीका पता चल जाए तो इसके बाद हम इसमें से ब्राह्मणों की ईश्वर और वर्णाश्रम धर्म से जुड़े प्रतीकों को इसमें से निकाल सकते हैं। और फिर धीरे-धीरे हम भारत के मूल निवासियों के त्योहारों को फिर से जिंदा कर सकते हैं। अब यह काम कोई एक व्यक्ति या एक परिवार या एक गाँव नहीं कर सकता, इसके लिए भारत के मूलनिवासी बहुजनो के संगठनों को आगे आना चाहिए और संस्थागत रूप से रिसर्च करके भारत के प्राचीन त्योहारों का वास्तविक स्वरूप सामने लाया जाना चाहिए। अगर हम ऐसी शुरुआत कर सकें तो धीरे-धीरे हम अगले 10-15 साल में भारत के सभी त्योहारों को फिर से प्राचीन मूल निवासियों के त्योहारों की तरह खड़ा कर सकते हैं।

भारत के सभी त्योहार वास्तव में भारत के मूलनिवासी इंडीजीनस लोगों के या श्रमण लोगों के त्योहार हैं। इंडीजीनस लोगों को आदिवासी भी कहा जाता है, प्राचीन श्रमण लोगों ने बौद्ध धर्म जैन धर्म और आजीवक धर्म का निर्माण किया था। उन धर्मों में ईश्वर और ईश्वरीय सृष्टि का कोई महत्व नहीं है। जैन धर्म और बौद्ध धर्म तो निरीश्वरवादी धर्म है इसमें ईश्वर को नहीं माना जाता। इन धर्मों ने भारत के सबसे पुराने त्योहारों का निर्माण किया है जो कि महिलाओं और प्रकृति की उर्वरा शक्ति का सम्मान करते हुए उत्सव मनाने के त्योहार हैं। इन आदिवासी एवं श्रवण त्योहारों को ठीक से देखें तो यह एक दूसरे से मिलकर सहयोग करके फसल बोना, फसल काटना, मकान बनाना, रास्ता बनाना, कुआं खोदना, सिंचाई करना, शिकार करना, मिट्टी चमड़े लोहे या लकड़ी के सामान बनाना इत्यादि से जुड़ा हुआ है।

इसलिए यह त्योहार लोगों को आपस में इकट्ठा करके उनमें एक सामाजिकता की भावना पैदा करने के लिए बनाए गए थे। लेकिन दुर्भाग्य से आर्य ब्राह्मणों के भारत में आने के बाद उन्होंने भारतीयों को कमजोर करने के लिए और उन में फूट डालकर राज करने के लिए उनके इन्हें त्योहारों में अपने भेदभाव सिखाने वाले ईश्वर धर्म और देवी देवता की मिलावट कर दी। इसके बाद भारत का समाज पूरी तरीके से टूटकर कमजोर हो गया। और उसमें जाति और वर्ण व्यवस्था शामिल हो गई।

अगर हम इस बात को ठीक से समझ लें हमें पता चलता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था और दुनिया भर के अंधविश्वास असल में उत्सवों त्योहारों और किस्से कहानियों के माध्यम से ही फैलाए गए हैं। इसीलिए भारत में जिस तरीके से वर्तमान में त्योहार मनाए जाते हैं त्योहारों को पूरी तरह से बदलना बहुत जरूरी है। आप देखते होंगे और हम सभी जानते हैं कि छुआछूत, भेदभाव ऊंच-नीच, और महिलाओं का अपमान करना, यह कमजोर स्त्री का अपमान करना यह सभी स्कूल कॉलेज या विद्यालय में नहीं सिखाया जाता। यह सारी गंदी बातें लोग धार्मिक कहानियों, पुराण की कहानियों, मिथकीय कहानियों  के माध्यम से सीखते हैं। और भारत में जितने भी उत्सव एवं त्योहार हैं अभी उत्सव और त्योहार गंदी, महिला विरोधी और असभ्य कहानियों और मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।

अगर इन त्योहारों को बंद कर दिया जाए तो ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था पर आधारित अंधविश्वासों को दूसरी पीढ़ी में जाने से रोका जा सकता है। लेकिन त्योहारों को बंद करना असंभव है, इसीलिए जब भारत की ओबीसी या दलित या आदिवासी आजकल प्रचलित त्योहार मनाना बंद करने की बात कहते हैं तो वे एक अर्थ में गलत हैं। वास्तव में सच्चाई यह है कि कोई भी समाज या कोई भी संस्कृति उत्सव एवं त्योहारों के बिना जिंदा नहीं रह सकती। आप अगर अपने बच्चों एवं स्त्रियों को कोई खास त्यौहार मनाने से रोकेंगे तो वे आपसे तुरंत पूछेंगे कि इस त्योहार कि जगह हम कौन सा त्योहार मनाएं? आप बच्चों, बड़े, बूढ़ों, औरतों और पुरुषों को उत्सव मनाने से  नहीं रोक सकते। आप कोई भी त्योहार बंद नहीं कर सकते।

इससे बेहतर विकल्प यह है कि आप अपने प्राचीन त्योहारों में ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और वर्ण व्यवस्था की जो मिलावट हो गई है उसे पहचान कर काट कर बाहर फेंक दें। उसमें प्राचीन श्रमण और आदिवासी संस्कृति के मूल्यों को फिर से शामिल कर दें। अगर हम यह कर सके तो अगले 10-15 साल में हम भारत के करोड़ों ओबीसी, दलितों, किसानों मजदूरों और महिलाओं को पापियोंनी बनाने वाली परंपरा को जड़ से उखाड़ सकते हैं, और भारत के करोड़ों लोगों को सम्मानजनक जीवन दे सकते हैं। लेकिन यह काम एक व्यक्ति एक परिवार गांव नहीं कर सकता। इसके लिए पूरे भारत के ओबीसी दलितों आदिवासियों  महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को सामने आना चाहिए।

हमें ऐसे संगठनों का निर्माण करना चाहिए जो भारत में त्योहार मनाने के ढंग, एक दूसरे से बात करने के ढंग, एक दूसरे को संबोधित करने की शैली, शादी ब्याह के तौर तरीके, जन्मदिन मनाने के तौर तरीके, होली दिवाली मनाने के तौर-तरीके बदलने की शुरुआत कर सके। इस तरह एक पक्का सांस्कृतिक बदलाव बहुत आसानी से किया जा सकता है। और आज हमारे पास इंटरनेट सोशल मीडिया इत्यादि सुविधा मौजूद है उससे यह काम अगले 10 या 15 सालों में बहुत आसानी से किया जा सकता है।

इस तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हमेशा से ही एक कठिन काम रहा है। अगर यह आसान काम होता तो यह हो ही चुका होता। बाबासाहब आंबेडकर महामना ज्योतिबाराव फूले व रामास्वामी पेरियार ने हमें कठिन काम करना ही सिखाया है। आसान काम करने से बड़े परिणाम नहीं हासिल होते, और अगर हम भारत के करोड़ों ओबीसी दलित आदिवासी और महिलाओं का जीवन सुधारना चाहते हैं तो हमें कठिन काम ही करने होंगे। दुनिया में समाज में जब भी बड़े बदलाव किए गए हैं वह धीरे-धीरे और कठिन कामों को करते हुए ही हुए हैं। उदाहरण के लिए आर्य ब्राह्मण जब भारत में पहली बार आए थे तब उन्होंने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई से भारत के मूल निवासी लोगों को अपने ईश्वर और वेद वेदान्त के षड्यंत्र में फसाया है।

आज भी आप भारत में ग्रामीण और ट्राइबल इलाकों में जाकर देखेंगे तो वहां शहरों में मनाए जाने वाले त्योहार आपको कम नजर आएंगे। आप ट्राइबल इलाकों में जाकर देखें तो वहां पर तरह-तरह के देवी-देवताओं की तस्वीरें पिछले 20 सालों में पहुंची हैं। उसके पहले वहां पर वे अपने स्थानीय ग्राम देवियों ग्राम देवताओं सहित जंगल पहाड़ पर्वत इत्यादि की पूजा करते थे। बाद में जब टेलीविजन और फिल्म आई सब टीवी सीरियल और फिल्मों के माध्यम से तरह-तरह के देवी देवताओं की कहानियां उनके घरों में पहुंची। इन कहानियों ने वहां पर जाति व्यवस्था को मजबूत किया और स्त्रियों का विरोध करने की परंपरा डाल दी। यह काम आर्य ब्राह्मणों ने भी बहुत धीरे-धीरे और कठिनाई के साथ ही किया है। और यह काम अभी भी जारी है। आप देख सकते हैं वे लोग कितनी योजना बनाकर पैसा खर्च करके हजारों लाखों लोगों को काम पर लगा कर इस काम को अंजाम देते हैं।

भारत में करोड़ों ओबीसी दलितों आदिवासियों और महिलाओं की जिंदगी बदलने के लिए हमें नई परंपराओं का निर्माण करना पड़ेगा। झंडे डंडे और राजनीतिक नारे उछालने से कुछ नहीं होने वाला, जब तक समाज के जीने का तौर तरीका उत्सव मनाने का त्योहार मनाने का तौर तरीका नहीं बदलेगा तब तक हम बाबासाहब आंबेडकर और ज्योतिबाराव फुले और बीपी मंडल साहब के सपनों का भारत नहीं बना पाएंगे।

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