दलित छात्र को पीएचडी में प्रवेश न देने का मुद्दा राज्यपाल तक पहुंचा

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 कालीकट विश्वविद्यालय के एक सिंडिकेट सदस्य ने ‘जीवन विज्ञान विभाग’ में पीएचडी कार्यक्रम में दलित छात्र को प्रवेश देने से कथित रूप से इनकार करने के खिलाफ केरल के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान से संपर्क किया है। केरल के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट समर्थित सिंडिकेट सदस्य पी रशीद अहमद ने श्री खान को अपने ई-मेल में दावा कियाकि कालीकट विश्वविद्यालय के दलित छात्र केपी लिजिथ चंद्रन ने 2020 में विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पीएचडी प्रवेश परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया था। नियमानुसार चंद्रयान को एक साल के भीतर किसी भी पीएचडी में प्रवेश करने की पात्रता है इसके बावजूद उन्हें जाति आधारित भेदभाव के चलते पीएचडी पाठ्यक्रम में प्रवेश नहीं दिया गया।

श्री अहमद ने श्री चंद्रन का हवाला देते हुए यह भी आरोप लगाया कि पीएचडी कार्यक्रम के लिए केरल के इस विश्वविद्यालय में चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। प्रवेश परीक्षा के लिए प्रश्न पत्र तैयार करने के बाद जो परीक्षा हुई उसका मूल्यांकन भी इसी विभाग के शिक्षकों ने किया था, जो कि नियमों के खिलाफ था। उन्होंने यह भी दावा किया कि विश्वविद्यालय में आरक्षण नियम अस्पष्ट हैं और इस मामले में जानबूझकर दलित छात्र के खिलाफ षड्यन्त्र किये जाने की आशंका है। इस शिकायत के बाद आवश्यक कार्यवाही करते हुए प्रवेश प्रक्रिया के निदेशक को नियमों के संभावित उल्लंघन पर विभिन्न विभागों से स्टेटस रिपोर्ट एकत्र करनी थी। लेकिन जो जानकारी मिल रही है उससे पता चलता है कि निदेशक द्वारा यह कार्यवाही नहीं की गयी है। इसके अलावा श्री अहमद ने यह भी आरोप लगाया कि चंद्रन कांग्रेस की स्टूडेंट विंग केरल स्टूडेंट्स यूनियन के मलप्पुरम जिला अध्यक्ष रहे हैं एवं एक दलित समुदाय से आते हैं, इसीलिए विश्वविद्यालय प्रशासन उनके खिलाफ षड्यन्त्र कर रहा है।

भाजपा की धर्म की राजनीति को यूपी पंचायत चुनाव में बड़ा झटका

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 भारतीय जनता पार्टी की देश भर में जमकर फजीहत हो रही है। कोरोना के कोहराम से निपटने की व्यवस्था में पूरी तरह फेल हो चुकी भाजपा पर हर किसी का गुस्सा सामने आ रहा है। उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में भी भाजपा को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा है। खासतौर पर धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा को अयोध्या से लेकर मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मथुरा तक में करारी शिकस्त मिली है।

 अयोध्या में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। अयोध्या जनपद में कुल जिला पंचायत सदस्य की 40 सीटें हैं, जिसमें से 24 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज करने का दावा किया है। यहां की 12 सीटों पर निर्दलीयों ने जीत दर्ज की है, जबकि भाजपा को महज 6 सीटें मिली है। हालांकि भाजपा दावा कर रही है कि उसके साथ निर्दलीय हैं। ऐसे में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर सपा और भाजपा के बीच जबरदस्त मुकाबला देखने को मिल सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वर्तमान लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भी भाजपा की हालत पतली है। यहां जिला पंचायत की 40 सीटों में से बीजेपी के खाते में महज 8 सीटें आई है। जबकि सपा 14 सीटें जीतने का दावा कर रही है। काशी में बसपा के हिस्से में 5 सीटें आने की बात सामने आई है, जबकि तीन निर्दलीय प्रत्याशियों को जीत मिली है।

मथुरा में बाजी बसपा के हाथ रही है। यहां की 33 के करीब सीटों में बसपा उम्मीदवारों के 12 सीटों पर जीतने की सूचना है। दूसरे नंबर पर आरएलडी है, जिसके 8 उम्मीदवारों के जीत दर्ज करने की बात सामने आई है, जबकि भाजपा के हिस्से में 9 सीटें आने की खबर है। इन नतीजों को भाजपा के साथ-साथ योगी आदित्यनाथ के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। क्योंकि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। और पंचायत चुनाव को कहीं न कहीं सभी पर्टियां अपने शक्ति परीक्षण के तौर पर देख रही थी। और जिस तरह के नतीजे सामने आए हैं, वह निश्चित तौर पर भाजपा के लिए बड़ी चिंता की बात है।

कोरोना से लड़ने को विपक्ष एकजुट,  केंद्र सरकार के सामने रखी यह मांग

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देश में कोरोना की विकट स्थिति को देखते हुए भारत की सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने मिलजुल कर केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। रविवार 2 मई को देश की 13 प्रमुख विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने संयुक्त रूप से कोरोना महामारी से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विशेष अपील की है। इन लोगों ने मिलजुल कर कहा है कि पूरे भारत में गरीबों एवं सामान्य नागरिकों के स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, देशभर में मुफ्त टीकाकरण की आवश्यकता है। विपक्षी पार्टियों के इन नेताओं ने अपील जारी की है कि केंद्र सरकार को देशभर के अस्पतालों में ना केवल मुफ़्त व निर्बाध ऑक्सीजन सुनिश्चित करना चाहिए बल्कि देश के सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर निशुल्क एवं अनिवार्य टीकाकरण करवाना चाहिए। औपचारिक अपील जारी करते हुए उन्होंने कहा है कि “हमारे देश में महामारी के बेकाबू ढंग से बढ़ते जाने के समय हम केंद्र सरकार से देशभर के सभी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में ऑक्सीजन की आपूर्ति के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।” सोनिया गांधी, एचडी देवेगौड़ा, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी एवं हेमंत सोरेन जैसे महत्वपूर्ण नेताओं सहित डीएमके प्रमुख स्टालिन एवं बहुजन समाज पार्टी की तरफ से मायावती ने भी या मांग रखी है। इनके अलावा फारूक अब्दुल्लाह, अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी और डी के राजा ने संयुक्त बयान जारी करते हुए केंद्र सरकार से कहा है कि मुफ्त और अनिवार्य टीकाकरण के लिए 35000 करोड रुपए का बजट आवंटित किया जाना चाहिए।

बहुजन अभिनेत्री ‘सांची जिवाने’ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार

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 सुप्रसिद्ध बहुजन रंगमंच कलाकार ‘सांची जिवाने’ को 11वें दादासाहेब फाल्के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 2021 में ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ का पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। सांची ने मराठी फिल्म ‘पैदागीर’ में अपने सशक्त अभिनय के लिए यह पुरस्कार जीता है। फिल्म ‘पैदागीर’ को अन्य फिल्म समारोहों में ‘बेस्ट एजुकेशनल मूवी’ का पुरस्कार भी मिला है। फिल्म को भारत भर से आई 310 अन्य फिल्मों के बीच से चुना गया है। 30 अप्रैल को इस पुरस्कार की घोषणा की गई। बहुजन समाज से आने वाली अभिनेत्री सांची जिवानेनागपुर के वीएमवी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर भी रही हैं। उन्होंने मात्र 9 साल की उम्र में सिनेमा और अभिनय की दुनिया में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था। पिछले 25 वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर दो फिल्मों और कई मंच नाटकों में अभिनय किया है, लेकिन, सांची का मानना है कि उनकी तीसरी फिल्म ‘पैदागीर’ जो एक शैक्षिक जागरूकता फिल्म है, अभी तक उनके जीवन कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म है। सांची ने कहा कि इस फिल्म की रिलीज के बाद हमें अपने दर्शकों से जो सराहना मिली, वह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि रही। उन्होंने नागपुर शहर के कलाकारों, अपने माता-पिता, दोस्तों, निर्माता, निर्देशक, सह-कलाकारों और ‘पैदागीर’ की पूरी टीम के साथ इस उपलब्धि का शुक्रिया अदा किया है। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार मेरे जैसे थिएटर आर्टिस्ट के लिए बहुत बड़ी और प्रतिष्ठित उपलब्धि है।

देश को एक बार दक्षिण की ओर देखना होगा

 चुनावी नतीजे आये तो सर्वाधिक ध्यान बंगाल ने खींचा। यह स्वाभाविक भी था। बड़ी लड़ाई थी। उसके महत्व को मैं भी मंज़ूर करता हूं। पर विचार की दृष्टि से देखें तो ये दो तस्वीरें भी कुछ कम महत्वपूर्ण नही हैं। ये तमिलनाडु और केरल के विजयी नेताओं की तस्वीरें हैं। मत भूलिये कि बीते कई सालों से केंद्र के सत्ताधारी ही रिमोट से तमिलनाडु को चला रहे थे, और केरल ने भी कुछ कम चमत्कार नही किया। यह अच्छे काम, जन-कल्याणकारी शासन और व्यापक सामाजिक सोच की जन-स्वीकृति है।
 मुझे समझ में नहीं आता, उत्तर और मध्य भारत के लोग कब तक इस गुमान में रहेंगे कि देश उन्हीं की मर्जी से चलता है और चलता रहेगा! चाहे, वे देश भर में जितना कूड़ा-करकट फैलाते रहें! सोचिये, इस गुमान और बहुसंख्यकवाद के नशे में चूर हिंदी-भाषी क्षेत्र के फैसलों ने देश को आज कहां पहुंचा दिया? उनकी चुनी सरकारों का किसानों की बेहद जेनुइन मांग और प्रतिरोध को लेकर क्या रवैया रहा? क्या इस महामारी में भी इस क्षेत्र के राजनीतिक-गुनाह आपको नज़र नही आ रहे हैं?
ऐसे में क्या लोगों को अब दक्षिण की तरफ़ नहीं झाँकना चाहिए? दक्षिण के पास सोच, समझ, और संस्कृति का बड़ा मानवीय दायरा है, जो हमेशा दिखता रहा है और वह आज इस महामारी में भी दिखाई दे रहा है। दक्षिण की धारा उत्तर और मध्य भारत को जाति-वर्ण और कारपोरेट-हिंदुत्व की जकड़ से मुक्त कराने में ज़्यादा समर्थ है। संकीर्णताओं से मुक्ति के संघर्ष की उसके पास समृद्ध विरासत भी है। जानता हूं, हिंदी-भाषी क्षेत्र का सबसे प्रभावी चिंतन इतनी आसानी से खत्म नहीं होने वाला। मेरी इस छोटी सी टिप्पणी से तो हरगिज़ नहीं, पर अंतिम सांस तक यह सच कहना और लिखना जारी रखना चाहता हूं कि कारपोरेट-हिंदुत्व और मनुवाद के ज़हरीले चंगुल से मुक्ति के लिए नया विचार चाहिए। मुझे विश्वास है, एक दिन लोग जागेंगे! शायद जगाने वालों की कमी है लोगों की नहीं!

उत्तर प्रदेश में पंचायतों में उभरता नया दलित नेतृत्व

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 हाल ही के पंचायत चुनावों में उत्तर प्रदेश में दलितों के पक्ष में कुछ अच्छी खबरें आ रही हैं। गांव की प्रधानी के चुनाव हमेशा ही स्थानीय स्तर पर शक्ति संतुलन की नई एवं ठोस इबारत लिखते आए हैं। राष्ट्रीय स्तर की राजनीति से परे स्थानीय स्तर की अपनी राजनीति होती है। इस राजनीति में भारत के दलितों को स्तर पर प्रतिनिधित्व के अवसर मिलना भविष्य में आने वाले परिवर्तन की सूचना देता है। इस परिवर्तन की सूचना देने वाली दो महत्वपूर्ण खबरें उत्तर प्रदेश से आ रही हैं। समाजवादी पार्टी के काडर एवं पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का गढ़ माने जाने वाले सैफई गांव में 48 साल के लंबे अंतराल के बाद पहली बार हुए चुनाव में एक दलित व्यक्ति ने गांव की प्रधानी का चुनाव जीता है। वाल्मीकि समाज से आने वाले रामफल बाल्मीकि जो मुलायम कुनबे के विश्वासपात्र माने जाते हैं, वे अब क्षेत्र से मुलायम सिंह यादव समर्थित राजनीति का चेहरा बनेंगे।

 वहीं दूसरी तरफ कानपुर के ‘बिकरू’ गांव में मधु नाम की एक दलित महिला ने गांव की प्रधानी का चुनाव जीता है। यह वही गांव है जहां पर पिछले साल गैंगस्टर विकास दुबे ने उत्पात मचाया था। मधु के द्वारा चुनाव जीतने के बाद इस इलाके में लोकतांत्रिक व्यवस्था के बहाल होने की उम्मीद की जा रही है। विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा की दिशा में बेहतर काम की यहा बड़ी आवश्यकता बताई जा रही है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्तर पर सामाजिक ताने-बाने एवं बदलती भी राजनीति का एक संकेत प्राप्त होता है। बहुत सारे नकारात्मक बातों के बीच में उत्तर प्रदेश से आने वाली यह खबरें बहुजन समाज के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाती हैं। हालांकि ये सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें हैं, लेकिन इसके बावजूद बीते कुछ सालों में दलितों के खिलाफ बढ़ते हुए अत्याचार के बीच एक तरफ समाजवादी पार्टी द्वारा समर्थित दलित उम्मीदवार का उभरना और दूसरी तरफ युवा दलित महिला का एक नेता के रूप में उभरना अंधेरे में एक दीपक जलने के समान है।

बंगाल में फिर से दीदी

Written By- राजेश कुमार

 कोरोना की दूसरी खतरनाक लहर में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने बाजी मार ली है और 2011 के बाद से लगातार तीसरी बार प्रदेश में सत्ता पर काबिज होने में सफल हुई है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने 2019 लोकसभा चुनावों में भारी हार का सामना किया था, तब से (मई,2019 से लेकर मई,2021 तक) ममता और उनके चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर ने जबरदस्त मेहनत करते हुए मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि ममता ही बंगाल के मुख्यमंत्री पद के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प है और इसी भरोसे के सहारे वो इस चुनाव में जबरदस्त वापसी करने में सफल हुए।

पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षो तक लेफ्ट ने शासन किया, 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार विधानसभा चुनाव जीता और  सत्ता पर काबिज हुई तो इस जीत की भूमिका कई वर्षों पूर्व में बनना शुरू हुई थी। सर्वप्रथम वर्ष 2008 में पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की, उसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में भी तृणमूल कांग्रेस ने लेफ्ट को भारी पराजय का सामना करवाया और अंततः 2011 विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को सत्ता से बाहर कर दिया। बिल्कुल इसी पैटर्न पर भाजपा चल रही थी। वह 2008 व 2009  की तरह 2018 के पंचायत व 2019 के लोकसभा चुनावों में भारी जीत हासिल करने में कामयाब रही थी और इसी आधार पर कुछ राजनीतिक व चुनावी विश्लेषकों का मानना था कि बंगाल 2011 के इतिहास को दोहराएगा और भाजपा  तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर पाने में सफल हो पाएगी, परन्तु ममता बनर्जी की कड़ी मेहनत ने इसे होने नहीं दिया, भाजपा व अन्य चुनावी राजनीतिक विश्लेषकों को जिन्हें लगता था कि पंचायत और लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा विधानसभा चुनाव भी जीतने में सफल हो पाएगी, वो सब ग़लत साबित हुए हैं।

 ममता बनर्जी की जीत में उनके चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर की सबसे अहम भूमिका रही है, उन्होंने न केवल ममता दीदी को चुनाव जीतने में सहयोग किया है बल्कि चुनाव से  पांच महीने पहले कही बात कि भाजपा दो डिजिट पार नहीं करेगी, को भी सच साबित किया है। यहां प्रशांत के लिए दोहरी चुनौती थी, परन्तु वो इस चुनौती को भेद पाने में कामयाब रहे है। प्रशांत किशोर के अलावा भी कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ऐसे है जिन्होंने ममता के चुनाव जीतने में अहम भूमिका निभाई है, उनका जिक्र इस प्रकार है –

मजबूत नेतृत्व और साफ छवि- ममता हमेशा से जुझारू व मजबूत नेता रही हैं, इस चुनाव में भी उन्होंने व्हील चेयर पर होने के बावजूद सक्रिय भूमिका निभाई और हर जगह संघर्ष करते हुए नजर आई। इसके आलावा उनकी साफ छवि ने भी मतदाताओं को उनकी तरफ आकर्षित किया है, क्योंकि ममता सरकार में भ्रष्टाचार के सारे आरोप उनके मंत्रियों या विधायको के सिर पर रहें है और ऐसे लगभग सभी खराब और नकारत्मक छवि वाले लोगों को या तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर वो खुद पार्टी छोड़ कर चले गए । उनके जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस एक बार फिर साफ सुथरी हो गई और ममता की साफ छवि का आकर्षण मतदाताओं को अपनी तरफ खींच पाने में सफल हुआ। महिला नेतृत्व होने की वजह से महिलाओं के वोट को तृणमूल कांग्रेस अपनी तरफ कर पाने में सफल रही है, क्यूंकि दूसरी विरोधी पार्टी के पास महिला नेतृत्व का अभाव था।

सरकारी योजनाओं की आम जन तक पहुंच- लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद से लेकर पिछले दो वर्षो में ममता सरकार ने लगातार अनेक कार्यक्रम चलाए जिनसे सरकारी योजनाओं की आम जन तक पहुंच को सुनिश्चित किया जा सका, इनमें सबसे प्रमुख था, “ममता के बोलो”-  इसमें एक फोन नंबर दिया गया और कोई भी व्यक्ति अपनी बात सीधा ममता को बता सकता था और हर व्यक्ति की बात को ममता की टीम द्वारा सुना गया और आम जन की हर समस्या को दूर करने का पूर्ण प्रयास किया, इसका मतदाताओं पर बहुत साकारात्मक प्रभाव पड़ा ।

बाहरी व अंदरूनी का प्रभाव- ममता ने इसको मुद्दा बनाया और बंगाली लोगों को ये समझा पाने में कामयाब रही कि मैं आपकी आपनी हूं और भाजपा वाले बाहरी है, इसलिए आप अपनों के लिए मतदान करें ना की बाहरी के लिए। इस सिलसिले में ममता की पार्टी ने कई नारे जैसे बंगाल की बेटी, बंगाल का सम्मान, बंगाली बनाम गैर बंगाली आदि दिया, जिनका ममता बनर्जी को पूरा फायदा मिला है।

सोशल इंजीनियरिंग- तृणमूल कांग्रेस लोकसभा चुनावों में जिन क्षेत्रों में हारी थी, बात चाहे जंगल महल क्षेत्र की करें या कूचबिहार की, वहां पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाता ज्यादा संख्या में हैं। इसलिए विधानसभा चुनावों में ममता ने इन जातियों का खास ख्याल रखा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बंगाल में 68 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है परन्तु तृणमूल कांग्रेस ने 79 सीटों पर अनुसूचित जाति के लोगों को चुनाव लड़वाया, वहीं अनुसूचित जनजाति की 16 सीटें आरक्षित है परन्तु तृणमूल कांग्रेस की तरफ से 17 सीटों पर अनुसूचित जनजाति के लोग चुनाव लड़े।

 दूसरा उत्तरी बंगाल में (कूचबिहार, दार्जलिंग आदि क्षेत्र) एक महत्वपूर्ण अनुसूचित जाति है ‘राजवंशी’, उन्हें ये आश्वाशन दिया गया कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने पर उनके मुख्य देवता के जन्मदिन पर प्रदेश में सरकारी अवकाश घोषित किया जाएगा। उनकी भाषा को सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाएगा, उनकी जाति के नाम से एक नई पुलिस फोर्स बनाई जाएगी। इन आश्वासनों ने भी इस समुदाय को जो की लोकसभा चुनावों में भाजपा के पक्ष में गया था को वापिस तृणमूल कांग्रेस की तरफ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ममता ने अनुसूचित जातियों को फिर से विश्वास दिलवाया की वो ही उनकी सच्ची हितैषी हैं और अपने पक्ष में मतदान करवाने में सफल हो पाई।

तृणमूल कांग्रेस ध्रुवीकरण की राजनीति से दूर रही और पूरे चुनावों के दौरान उसने समग्र मतदाताओं पर ध्यान दिया, ममता ने हिन्दू – मुस्लिम, छोटे लोग – भद्र लोग, शहरी – ग्रामीण आदि कोई अंतर नहीं किया और सभी वर्गों पर पूरा ध्यान दिया जिसका फायदा ममता की पार्टी को मिला, क्यूंकि इस से हर समुदाय का कुछ ना कुछ वोट ममता के पक्ष में आया, वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने मुस्लिम वोट, जो कि प्रदेश में 30 प्रतिशत के आसपास हैं को पार्टी से अलग थलग रखा, और केवल 70 प्रतिशत मतदाताओं के सहारे चुनाव लड़ रही थी वहीं दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस का ध्यान पूरे 100 प्रतिशत मतदाताओं पर था, और इसी का नतीजा है कि तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार प्रदेश में सरकार बनाने में सफल हो पाई है।

भाजपा बनाम भाजपा का फायदा भी ममता को मिला है, क्यूंकि भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर गए लोगों को पार्टी में अहम स्थान दिए और उन्हे चुनाव भी लड़वाए। इससे भाजपा का पुराना मतदाता नाराज़ हुआ क्यूंकि उस क्षेत्र में उनकी लड़ाई उसी व्यक्ति से थी परन्तु अब वो व्यक्ति भाजपा का उम्मीदवार हो गया था, जैसे बहुत से स्थानों पर मतदाताओं ने साफ साफ बोला कि वो तृणमूल कांग्रेस के इसी नेता के खिलाफ थे उनकी लड़ाई इसी के खिलाफ थी परन्तु अब वो भाजपा में आ गया है तो हम कैसे उसे वोट दे, हमारी लड़ाई आज भी उसी के खिलाफ है, इस प्रकार ऐसे लोगों ने भाजपा से नाराज होकर ममता के पक्ष में मतदान किया है।

और भी अन्य कई कारण है जिनकी सहायता से ममता चुनाव जीतने में सफल हो पाईं है इनमें सबसे महत्वपूर्ण है उनका साधारण व्यक्तित्व और उनकी कड़ी मेहनत।


लेखक राजेश कुमार दिल्ली विवि के पूर्व छात्र हैं।

कोरोना को मात देने को लेकर बहन मायावती ने सुझाया शानदार फार्मूला

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आए दिन देश-दुनिया से जुड़े तमाम मामलों पर अपनी राय जाहिर करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने कोरोना से निपटने को लेकर एक आईडिया दिया है। कोरोना को मात देने के लिए बसपा सुप्रीमों ने ऐसा आइडिया दिया है, जिसे अगर सरकारें मान लें और देश सामने आ जाए तो उससे निपटने में जरूर मदद मिल सकती है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और देश की कद्दावर नेता सुश्री मायावती ने कोविड-19 का टीका लगाए जाने की मुहिम में सभी सरकारों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सामने आने की अपील की। साथ ही उन्होंने पूंजीपतियों से अभियान में आर्थिक सहयोग देने की भी अपील की है।

बसपा प्रमुख ने शनिवार को अपने ट्वीट में कहा, “देश में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाए जाने के आज (एक मई) से प्रारंभ हुए कार्यक्रम को सभी सरकारें दलगत राजनीति एवं स्वार्थ से ऊपर उठकर पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ सफल बनाने के लिए खुलकर सामने आऐं। ”उन्होंने कहा कि देश और आम जनता की इन दलों से यही अपेक्षा है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, “ इस कोरोना वैक्सीन कार्यक्रम में देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों को भी बढ़-चढ़कर जरूर भाग लेना चाहिए तथा उसी प्रकार की उदारता के साथ इनको केन्द्र व राज्य सरकारों की मदद करनी चाहिए जिस प्रकार वे चुनावी बॉण्ड आदि के माध्यम से पार्टियों को चंदा देते हैं।” बहन मायावती ने विदेशी मदद की पेशकशों की भी सराहना की।

इस मुद्दे पर अपने एक-के-बाद एक ट्वीट में मायावती ने कहा,“देश में कोरोना प्रकोप की बेकाबू होती जा रही स्थिति के परिणामस्वरूप वर्षों बाद विदेश से अनुदान एवं चिकित्सीय आपूर्ति लेने को लेकर किए गए भारत के नीतिगत परिवर्तन के बाद जो भी देश भारत की मदद को आगे आ रहे हैं, वह सराहनीय है।

दरअसल कोरोना संकट से हर कोई हलकान है। ऐसे में इससे निपटने के लिए एक मजबूत साझेदारी के साथ लड़ाई की जरूरत है। साफ है कि देश की सरकारें, चिकित्सा व्यवस्था में लगे लोग और देश के पूंजीपति अगर एक साथ मिलकर कोरोना के खिलाफ जंग छेड़ दे तभी हालात को काबू में किया जा सकता है।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल एवं बसपा में गठबंधन की चर्चा तेज

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 पंजाब के शिरोमणी अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी के बीच राजनीतिक गठबंधन होने की संभावना जताई जा रही है। शिरोमणी अकाली दल और कांग्रेस के बीच चल रही खटपट के बीच शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने बहुजन समाज पार्टी से संपर्क किया है। दोनों दलों ने फिलहाल गठबंधन को लेकर साकारात्मक रुख दिखाया है, हालांकि आखिरी फैसला बसपा प्रमुख का होगा। बीते कुछ सालों में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पंजाब की राजनीति में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल सकता है। ऐसी स्थिति में बहुदलीय गठबंधन चुनावी विजय के लिए आवश्यक होता जा रहा है। खबर है कि हाल ही में दोनों दलों के उच्च स्तरीय नेताओं के बीच रणनीतिक चर्चा हुई है और इस विषय में अंतिम निर्णय सुश्री मायावती द्वारा लिया जाएगा। गौरतलब है कि सन 1989 में बीएसपी ने जब सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन किया था तब पंजाब में बीएसपी का पहला सांसद चुना गया था। यह बहुजन समाज पार्टी के लिए पहली सफलता थी। इसके बाद सन् 1996 में प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल के साथ गठबंधन द्वारा बीएसपी के तीन सांसद चुने गए थे। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल एवं बहुजन समाज पार्टी दोनों की अपने-अपने इलाकों में अपनी खास ताकत है। शिरोमणि अकाली दल ने पिछले कुछ दशकों में पंजाब के दलितों में भी पैठ बनाई है। शिरोमणि अकाली दल के दोआबा क्षेत्र के चार विधायकों में से तीन विधायक आरक्षित क्षेत्र से आते हैं।

कोरोना से मरने वाले कर्मचारियों के लिए पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने की यह मांग

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उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी बसपा प्रमुख सुश्री मायावती प्रदेश में कर्मचारियों की कोरोना से मौत को लेकर काफी चिंतित हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने राज्य सरकार से शुक्रवार को मांग की कि वह उन सरकारी कर्मियों के आश्रितों को नौकरी एवं आर्थिक मदद मुहैया कराए, जिनकी पंचायत चुनाव में तैनाती के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित होने के कारण मौत हो गई। मायावती ने उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया, ”कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते यदि उत्तर प्रदेश सरकार पंचायत चुनाव टाल देती, अर्थात उन्हें थोड़ा आगे बढ़ा देती, तो यह उचित होता और चुनाव ड्यूटी में लगे कई कर्मचारियों की मौत नहीं होती। इन कमियों की मौत होना अत्यंत दुःखद है।”

मायावती ने मांग की कि राज्य सरकार उन सरकारी कर्मियों के आश्रितों को नौकरी एवं आर्थिक मदद मुहैया कराए, जिनकी पंचायत चुनाव में तैनाती के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित होने के कारण मौत हो गई।

उन्होंने कहा, ”इसके साथ ही, अब कोरोना वायरस प्रकोप के गांव-देहात में भी काफी फैलने की आशंका है। ऐसी स्थिति में बसपा की सलाह है कि उत्तर प्रदेश सरकार शहरों के साथ-साथ देहात में भी कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाए।”

गौरतलब है कि मायावती लगातार पंचायत चुनाव को टालने की मांग करती रही हैं। लेकिन सरकार ने हर किसी की मांग को ताक पर रख कर जिस तरह पंचायत चुनाव कराया, उससे कर्मचारियों में काफी रोष है। पूरे प्रदेश से लगातार कर्मचारियों की मृत्यु की खबरें आ रही है। ऐसे में बड़ा सवाल उनके आश्रितों का है कि आखिर अब उनका भरण-पोषण कैसे हो पाएगा।

कोविड संकट से निपटने को राष्ट्रीय प्लान जरूरी

 केवल चुनावी राजनीति से देश नहीं चलता है। देश सिस्टम से, जिम्मेदारी से व जवाबदेही से चलता है, जो कि बनाना पड़ता है। देश का दुर्भाग्य रहा है कि आजादी के बाद से ही सरकारों का जोर सिस्टम बनाने पर नहीं रहा, जिम्मेदारी लेने पर नहीं रहा और न ही जवाबदेही तय करने पर रहा। बड़ी से बड़ी आपदा आई, सरकारों ने सबक नहीं लिया। सरकारों ने कभी भी देश में पारदर्शी, समावेशी, जिम्मेदार व जवाबदेह सिस्टम बनाने की जहमत नहीं उठाई। देश में हमेशा चुनावी राजनीति हावी रही, जिसके लिए लोलुभावन वादे किए जाते रहे, जाति-धर्म-क्षेत्र के बंटवारे की सियासत होती रही, सत्तासीन दलों का समूचा ध्यान चुनाव जीतने के लिए फैसले पर रहने लगा।
चुनावी राजनीति दिनों-दिन इस कदर नीचे गिरती गई कि मतदाताओं को टीवी, फ्रीज, साड़ी, साइकिल, लैपटॉप, गेहूं-चावल, नकदी आदि फ्रीबिज ऑफर किए जाने लगे।… और सत्ता में आने पर सरकारों का फोकस इसी फ्रीबिज के बंदरबांट पर रहने लगा। इसका खामियाजा आज देश भुगत रहा है। देश में स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था का ढांचा मजबूत ही नहीं हो पाया। सड़क, रेल, बिजली, पानी, रोजगार जैसे मुद्दे गौण होते गए। आज जब देश कोरोना महामारी से गुजर रहा है, तो पता चल रहा है कि हमारी सरकारी स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह चरमराई हुई है। निजी स्वास्थ्य व्यवस्था किसी नैतिकता से संचालित नहीं है। सरकार का पूरा तंत्र संकट के समय कोविड मरीजों को आसानी से ऑक्सीजन तक उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। ऑक्सीजन की कमी से सैंकड़ों लोगों की जान चली गई है।
यह भी देखें- https://www.youtube.com/watch?v=YgYA8zbpph0 
देश में कोविड से नित हो रही मौतों से त्राहिमाम मचा हुआ है, लगातार बढ़ रहे संक्रमण से हर तरफ निराशा है, लोग डरे हुए हैं, बेबस हैं। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्टों को दखल देना पड़ा है। कोविड के नियंत्रण में विफलता व अस्पतालों की बदहाली से आहत सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्र सरकार से नेशनल प्लान मांगा, सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी, तो शीर्ष कोर्ट ने कोविड-19 मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी को ‘राष्ट्रीय संकट’बताते हुए कहा कि वह ऐसी स्थितियों में मूक दर्शक बना नहीं रह सकता। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय मुद्दों में हस्तक्षेप की जरूरत है, क्योंकि कुछ मामले राज्यों के बीच समन्वय से संबंधित हो सकते हैं। हम पूरक भूमिका निभा रहे हैं। कोविड मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान लेना बताता है कि देश की सरकारें ठीक से अपना काम नहीं कर रही हैं।
विदेशी मीडिया में कोविड नियंत्रण में भारत की लापरवाहियां सुर्खियों में हैं। हमारी सरकार को इसकी चिंता होनी चाहिए। कोविड महामारी के समय कुंभ का आयोजन, बड़ी-बड़ी चुनावी रैली, भीड़-भाड़ पर नियंत्रण नहीं, आवाजाही नियंत्रित नहीं आदि के चलते देश एक बार फिर संकट में घिर गया है। मद्रास हाईकोर्ट ने तो कोरोना की दूसरी तहर के लिए चुनाव आयोग को कसूरवार ठहरा दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार व केंद्र की राजग सरकार को निशाने पर लिया है, सरकारों को ऑक्सीजन आपूर्ति दुरुस्त करने को कहा है। हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन निर्माता कंपनियों को आईना दिखाया है कि संकट के समय गिद्ध जैसा बर्ताव ना करें। इससे पहले भी हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन आपूर्ति में बाधा डालने वालों को लटकाने की सख्त टिप्पणी की थी। दरअसल, कोरोना के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति की जरूरत है, केवल बैठकों, निर्देशों व अपीलों से ठोस रिजल्ट नहीं आएगा। प्राथमिकता के स्तर पर देश की स्वास्थ्य सेवा में भी आमूल-चूल परिवर्तन लाना पड़ेगा।

कोरोना पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सख्त कदम

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कोरोना को लेकर फैली अव्यवस्था के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर स्वतः संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोरोना महामारी के प्रबंधन से संबंधित ऑक्सीजन की कमी और अन्य मुद्दों के मामले में सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने वैक्सीन के दाम, टीकों की उपलब्धता, ऑक्सीजन समेत कुछ मुद्दों पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। तीन जजों की बेंच ने शुक्रवार तक सरकार से जवाब मांगा, साथ ही कहा कि वह इस मामले पर शुक्रवार यानी 30 अप्रैल को दोपहर 12 बजे  सुनवाई करेगी।

 कोरोना संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय योजना को लेकर मंगलवार को सुनवाई करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि ‘जब हमें लगेगा कि लोगों की जिंदगियां बचाने के लिए हमें हस्तक्षेप करना चाहिए, तब हम ऐसा करेंगे।’ सुनवाई के दौरान जस्टिस एस रवींद्र चंद ने केंद्र से पूछा, ‘संकट से निपटने के लिए आपकी राष्ट्रीय योजना (Covid-19 National Plan) क्या है? क्या इससे निपटने के लिए टीकाकरण मुख्य विकल्प है?’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘राष्ट्रीय संकट के समय यह अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती। हमारा मकसद है कि हम हाईकोर्ट्स की मदद के साथ अपनी भूमिका अदा करें। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना से बिगड़े हालात पर स्वतः संज्ञान लिया था और केंद्र सरकार से महामारी को लेकर क्या तैयारियां की गई हैं इसका जवाब मांगा था।

दरअसल कोरोना की रोकथाम में तमाम सरकारों के विफल हो जाने के कारण जहां हाईकोर्ट भी सख्त है तो वहीं सुप्रीम कोर्ट भी मामले पर नजर बनाए हुए है।

लालू यादव को सशर्त जमानत, राजद समर्थकों में खुशी की लहर

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 झारखंड उच्च न्यायालय ने शनिवार को चारा घोटाला मामले में सजा काट रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को जमानत दे दी। लालू अब जेल से बाहर आ जाएंगे। झारखंड उच्च न्यायालय ने आधी सजा पूरी करने के आधार पर लालू प्रसाद यादव को सशर्त जमानत दी है। उन्हें एक लाख के निजी मुचलके का बांड भरना होगा। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि लालू यादव बिना अनुमति के वे देश से बाहर नहीं जाएंगे और ना ही अपना पता और मोबाइल नंबर बदलेंगे। फिलहाल, राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष का दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा है।

लालू की जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि जमानत के लिए लालू को एक लाख रुपये का मुचलका देना होगा। साथ ही 10 लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा। इसके अलावा उन्हें अपना पासपोर्ट जमा कराना होगा। बिना अदालत की अनुमति के लालू विदेश नहीं जा सकेंगे। गौरतलब है कि दुमका कोषागार से अवैध निकासी के मामले में लालू प्रसाद ने जमानत के लिए आधी सजा पूरी करने का दावा करते हुए याचिका दायर की थी। इस मामले में सीबीआई की अदालत ने लालू प्रसाद को सात-सात साल की सजा दो अलग अलग धाराओं में सुनाई थी।

दलित उत्पीड़न की घटनाओं में अब आप खुद ऑनलाइन कर सकेंगे शिकायत, ये है वेबसाइट का पता

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भारत के संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जाति आयोग का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य किसी भी कानून के तहत अनुसूचित जाति के लिए प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच और निगरानी करना है। ऐसे में दलित समाज के लोग अनुसुचित जाति एवं जनजाति आयोग की ओर आशा की नजर से देखते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई जातीय आधार पर या किसी भी कारण से उनके साथ अन्याय करता है तो यह आयोग उन्हें न्याय दिलवाएगा। दरअसल इस आयोग का काम भी यही है। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो अनुसूचित जाति आय़ोग की भूमिका से यह वर्ग बहुत खुश नहीं रहा है। तमाम लोग आयोग पर सत्ता के दबाव में न्याय नहीं मिलने का आरोप लगाते रहे हैं तो वहीं आयोग का दावा रहता है कि वह पीड़ितों के पक्ष में खड़ा रहता है। हालांकि इसका कोई ऑनलाइन लेखा-जोखा नहीं होने के कारण गलती किसकी है, यह सामने नहीं आ पा रहा था।

लेकिन अब अनुसूचित जाति आयोग के हाल ही में बने अध्यक्ष विजय सांपला ने अंबेडकर जयंती पर एक बड़ी पहल की है। दलित समाज के लोगों की इस लंबी मांग को मानते हुए एक शिकायत पोर्टल लांच किया गया है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की 130वीं जयंती पर संचार एवं आईटी और कानून एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला, आयोग के सदस्यों और सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रतन लाला कटारिया की उपस्थिति में यह पोर्टल लांच किया।

 खास बात यह है कि इस पोर्टल के जरिए अनुसूचित जाति का कोई भी व्यक्ति देश के किसी भी हिस्से से अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायतों के अंत में ई-फाइलिंग की सुविधा भी है, और किसी शिकायत की वर्तमान स्थिति क्या है, उसे भी देखा जा सकेगा। इस पोर्टल के माध्यम के जरिए आप दस्तावेज़ और ऑडियो / वीडियो फ़ाइलों को भी अपलोड कर सकते हैं। पोर्टल के लांचिंग के दौरान आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का उद्देश्य इस पोर्टल के माध्यम से विशेष रूप से अनुसूचित जाति की आबादी की शिकायतों और उसके निवारण को व्यवस्थित करना है। सांपला ने 24 फरवरी 2021 को अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन का पद संभाला, जिसके बाद वो खासे सक्रिय है।

दलित दस्तक के हिस्से आई एक और उपलब्धि

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बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की जयंती के ठीक पहले दलित दस्तक के हिस्से में एक और उपलब्धि आई है। खबर यह है कि  ‘दलित दस्तक ग्रुप के यू-ट्यूब चैनल पर शोध कार्य हुआ है। हाशिये के समाज की आवाज़ को प्रमुखता से उठाने वाले यू-ट्यूब चैनल ‘दलित दस्तक’ पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में शोध कार्य हुआ है। केंद्र में जनसंचार विभाग की छात्रा पूजा साव ने अपने परियोजना कार्य के तहत ‘’दलित दस्तक (यू-ट्यूब चैनल) में खबरों के प्रस्तुतीकरण का विवेचन’’ विषय पर अपना शोध कार्य प्रस्तुत किया है।

कोलकाता केंद्र के प्रभारी और सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ के निर्देशन में यह परियोजना कार्य सम्पन्न किया गया है। इसके अंतर्गत छात्रा ने अपने अध्यायों में मुख्य रूप से ‘दलित दस्तक’ में प्रसारित होने वाली राजनीतिक खबरों तथा जाति-धर्म व जेंडर से जुड़े मुद्दों पर प्रसारित सामग्रियों का संदर्भों सहित मूल्यांकन किया है। छात्रा पूजा साव ने ‘दलित दस्तक’ के प्रसारण संबंधी तकनीकी पक्षों पर भी अपना सोदाहरण अध्ययन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस परियोजना शोध कार्य में ‘परिशिष्ट’ के अंतर्गत चैनल के प्रधान संपादक अशोक दास का पूजा साव द्वारा लिया गया साक्षात्कार भी शामिल किया गया है तथा चैनल से जुड़ी तस्वीरें दी गई हैं।

निश्चित तौर पर यह दलित दस्तक समूह के लिए और उसके सभी पाठकों और दर्शकों के लिए बड़ी खबर है। हाल ही में सिंगापुर से प्रकाशित सबसे बड़े मीडिया संस्थान The Straits Times ने 12 अप्रैल को दलित दस्तक और इसके संपादक अशोक दास के विचारों को प्रकाशित किया था।

आंबेडकरवाद को संकट-मुक्त करने के लिए एक नए स्वाधीनता संग्राम की जरुरत!

आज भारतरत्न उस डॉ.बी.आर. आंबेडकर की 130 वीं जयंती है, जिनके विषय में बहुत से नास्तिक बुद्धिजीवियों की राय है कि बहुजनों का यदि कोई भगवान हो सकता है तो वह डॉ. आंबेडकर ही हो सकते हैं, जिनकी तुलना लिंकन, बुकर टी . वाशिंग्टन, मोजेज इत्यादि से की जाती है। मानवता की मुक्ति में अविस्मरणीय योगदान देने वाले ढेरों महापुरुषों का व्यक्तित्व और कृतित्व समय के साथ म्लान पड़ते जा रहा है पर, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर वह महामानव हैं, जिनकी स्वीकृति समय के बढ़ती ही जा रही है। यही कारण है इंग्लैंड की महारानी तथा राष्ट्रमंडल देशों की प्रमुख एलिज़ाबेथ द्वितीय ने बीते दिनों 14 अप्रैल,2021 को ‘डॉ.बी.आर.आंबेडकर इक्वेलिटी डे’ के रूप में मनाने का फरमान जारी किया है।

रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय का यह फरमान इस बात का संकेतक है कि डॉ. आंबेडकर की स्वीकृति समय के साथ-साथ विश्वमय फैलती जा रही है। उनकी इस घोषणा से कोरोना के दहशत भरे माहौल में घरों में बैठकर आंबेडकर जयंती मनाने के लिए विवश आंबेडकरवादियों में एक नए उत्साह का संचार हुआ है। बहरहाल समय के साथ-साथ आंबेडकर और उनके वाद की स्वीकृति भले ही नित नयी उंचाई छूती जा रही हो, किन्तु देश-विदेश में फैले कोटि-कोटि आंबेडकरवादियों में बहुत कम लोगों को इस बात का इल्म है कि खुद भारत में आंबेडकरवाद बुरी तरह संकटग्रस्त हो चुका है। ऐसे में आज इतिहास ने आंबेडकरवाद को संकट-मुक्त करने की बड़ी जिम्मेवारी बहुजनवादी दलों, बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों के कन्धों पर डाल दिया है। इसे देखते हुए आंबेडकरवाद को संकट-मुक्त करने में होड़ लगाना सामाजिक न्यायवादी दलों, बहुजन बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का अत्याज्य कर्तव्य बन गया है। ऐसे में इस दिशा में अपना कर्तव्य निर्धारित करने के पहले आंबेडकरवादियों को आंबेडकरवाद और इस पर आये संकट को ठीक से समझ लेना जरुरी है।

वैसे तो आंबेडकरवाद की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति, नस्ल, लिंग इत्यादि जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय की खाई में धकेले गए मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का प्रावधान करने वाला सिद्धांत ही आंबेडकरवाद है और इस वाद का औजार है- आरक्षण। भारत के मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों के द्वारा दया-खैरात के रूप में प्रचारित आरक्षण और कुछ नहीं, शक्ति के स्रोतों से जबरन बहिष्कृत किये गए लोगों को कानून के जोर से उनका प्राप्य दिलाने का अचूक माध्यम मात्र है। बहरहाल दलित, आदिवासी और पिछड़ों से युक्त भारत का बहुजन समाज प्राचीन विश्व के उन गिने-चुने समाजों में से एक है जिन्हें जन्मगत कारणों से शक्ति के समस्त स्रोतों से हजारों वर्षों तक बहिष्कृत रखा गया। ऐसा उन्हें सुपरिकल्पित रूप से धर्म के आवरण में लिपटी उस वर्ण- व्यवस्था के प्रावधानों के तहत किया गया जो विशुद्ध रूप से शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही। इसमें अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य, भूस्वामित्व, राज्य संचालन, सैन्य वृत्ति, उद्योग-व्यापारादि सहित गगन स्पर्शी सामाजिक मर्यादा सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के मध्य वितरित की गयी। स्व-धर्म पालन के नाम पर कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता के फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया, जिसे कई समाज विज्ञानी हिन्दू आरक्षण व्यवस्था कहते हैं।

हिन्दू आरक्षण ने चिरस्थाई तौर पर भारत को दो वर्गों में बांट कर रख दिया: एक विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी सवर्ण वर्ग और दूसरा शक्तिहीन बहुजन समाज! इस हिन्दू आरक्षण में शक्ति के सारे स्रोत सिर्फ और सिर्फ विशेषाधिकारयुक्त तबकों के लिए आरक्षित रहे। इस कारण जहाँ विशेषाधिकारयुक्त वर्ग चिरकाल के लिए सशक्त तो दलित, आदिवासी और पिछड़े अशक्त व गुलाम बनने के लिए अभिशप्त हुए, लेकिन दुनिया के दूसरे अशक्तों और गुलामों की तुलना में भारत के बहुजनों की स्थिति सबसे बदतर इसलिए हुई क्योंकि उन्हें आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों के साथ ही शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों तक से भी बहिष्कृत रहना पड़ा। इतिहास गवाह है मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी समुदाय के लिए शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियां धर्मादेशों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध नहीं की गयीं, जैसा हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था के तहत बहुजनों के लिए किया गया। यही नहीं इसमें उन्हें अच्छा नाम तक भी रखने का अधिकार नहीं रहा। इनमें सबसे बदतर स्थिति दलितों की रही। वे गुलामों के गुलाम रहे। इन्ही गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की चुनौती इतिहास ने डॉ.आंबेडकर के कन्धों पर सौंपी, जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज में निर्वहन किया।

अगर जहर की काट जहर से हो सकती है तो हिन्दू आरक्षण की काट आंबेडकरी आरक्षण से हो सकती थी, जो हुई भी। इसी आंबेडकरी आरक्षण से सही मायने में सामाजिक अन्याय के खात्मे की प्रक्रिया शुरू हुई। हिन्दू आरक्षण के चलते जिन सब पेशों को अपनाना अस्पृश्य-आदिवासियों के लिए दुसाहसपूर्ण सपना था, अब वे खूब दुर्लभ नहीं रहे। इससे धीरे-धीरे वे सांसद-विधायक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे। दलित–आदिवासियों पर आंबेडकरवाद के चमत्कारिक परिणामों ने जन्म के आधार पर शोषण का शिकार बनाये गए अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों के वंचितों के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए। संविधान में डॉ. आंबेडकर ने अस्पृश्य-आदिवासियों के लिए आरक्षण सुलभ कराने के साथ धारा 340 का जो प्रावधान किया, उससे परवर्तीकाल में मंडलवादी आरक्षण की शुरुआत हुई, जिससे पिछड़ी जातियों के लिए भी सामाजिक अन्याय से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। और उसके बाद ही आंबेडकरवाद नित नई ऊंचाइयां छूते चला गया तथा दूसरे वाद म्लान पड़ते गए। लेकिन 7 अगस्त, 1990 को प्रकाशित मंडल की जिस रिपोर्ट के बाद आंबेडकरवाद ने जरुर नित नई ऊंचाइयां छूना शुरू किया, उसी रिपोर्ट से इसके संकटग्रस्त होने का सिलसिला भी शुरू हुआ।

मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही हिन्दू आरक्षण का सुविधाभोगी तबका शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गया। इसके प्रकाशित होने के साल भर के अन्दर ही 24 जुलाई,1991 हिन्दू आरक्षणवादियों द्वारा बहुजनों को नए सिरे से गुलाम बनाने के लिए निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण इत्यादि का उपक्रम चलाने साथ जो तरह-तरह की साजिशें की गयीं, उसके फलस्वरूप ही आज आंबेडकरवाद संकटग्रस्त हो गया है। 24 जुलाई, 1991 के बाद शासकों की सारी आर्थिक नीतियाँ सिर्फ आंबेडकरवाद की धार कम करने अर्थात आरक्षण के खात्मे और धनार्जन के सारे स्रोतों हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग के हाथों में शिफ्ट करने पर केन्द्रित रहीं। इस दिशा में जितना काम नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी ने और मनमोहन सिंह ने 20 सालों में किया, आंबेडकर प्रेम के दिखावे में सबको बौना बना चुके नरेंद्र मोदी ने उतना प्रधानमंत्री के रूप में पिछले कुछ सालों में कर डाला है।

बहरहाल आरक्षण के खात्मे के मकसद से नरसिंह राव ने जिस नवउदारवादी अर्थनीति की शुरुआत किया एवं जिसे आगे बढ़ाने में उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने एक दूसरे से होड़ लगाया, उसके फलस्वरूप आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के परम्परागत सुविधाभोगी जैसा शक्ति के स्रोतों पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल व पोर्टल्स प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है। संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं। शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के बेनजीर वर्चस्व के मध्य जिस तरह विनिवेशीकरण और निजीकरण के लैट्रल इंट्री को जूनून की हद तक प्रोत्साहित करते हुए रेल, हवाई अड्डे, चिकित्सालय, शिक्षालय इत्यादि सहित ब्यूरोक्रेसी के निर्णायक पद सवर्णों को सौपें जा रहे हैं उससे डॉ। आंबेडकर द्वारा रचित संविधान की उद्द्येशिका में उल्लिखित तीन न्याय- आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक – पूरी तरह एक सपना बनते जा रहे है।

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने राष्ट्र को संविधान सौपने के पूर्व 25 नवम्बर, 1949 को संसद के केन्द्रीय कक्ष से चेतावनी देते हुए कहा था,’ संविधान लागू होने के बाद हम एक विपरीत जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति के क्षेत्र में मिलेगी समानता: प्रत्येक व्यक्ति को एक वोट देने का अधिकार मिलेगा और उस वोट का समान मूल्य होगा। किन्तु राजनीति के विपरीत आर्थिक और सामजिक क्षेत्र में मिलेगी भीषण असमानता। हमें इस असमानता को निकटतम भविष्य में ख़त्म कर लेना होगा नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के उस ढाँचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है।’ डॉ. आंबेडकर की उस चेतवानी को ध्यान में रखते हुए आजाद भारत के शासकों ने शुरुआत के प्रायः चार दशकों तक विषमता के खात्मे की दिशा में कुछ काम काम किया । इसी क्रम में ढेरों सरकारी उपक्रम खड़े हुए: बैंको, कोयला खानों इत्यादि का राष्ट्रीयकारण हुआ। किन्तु 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने का बाद जब देश का शासक वर्ग आंबेडकरवाद को संकटग्रस्त करने की दिशा में अग्रसर हुआ, मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या (आर्थिक और सामजिक –गैर-बराबरी) भारत में विस्फोटक बिंदु पर पहुच गयी। आज आर्थिक और सामाजिक विषमता की विस्फोटक स्थिति के मध्य, जिस तरह विनिवेशीकरण, निजीकरण और लैट्रल इंट्री के जरिये शक्ति के समस्त स्रोतों से वंचित बहुजनों के बहिष्कार का एक तरह से अभियान चल रहा है, उसके फलस्वरूप, जिन वंचित जातियों को विश्व प्राचीनतम शोषकों से आजादी दिलाने के लिए डॉ। आंबेडकर ने वह संग्राम चलाया जिसके फलस्वरूप वह मोजेज, लिंकन, बुकर टी। वाशिंग्टन की कतार में पहुँच गए: वह जातियां आज विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच चुकी हैं।ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए। ऐसे ही हालातों में अंग्रेजों के खिलाफ खुद भारतीयों को स्वाधीनता संग्राम छेड़ना पड़ा था।

बहरहाल भारत में आज वर्ग संघर्ष का खुला खेल खेलते हुए शासक दलों ने आंबेडकरवाद को संकटग्रस्त करने के क्रम में जिन स्थितियों और परिस्थितियों का निर्माण किया है , उसमें बहुजनों को अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों की लड़ाई की तरह एक नए स्वाधीनता संग्राम छेड़ने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बचा है। और इस संग्राम का लक्ष्य होना चाहिए आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा, जिसका सपना सिर्फ बाबा साहेब ही नहीं लोहिया, सर छोटू राम, बाबू जगदेव प्रसाद, मान्यवर कांशीराम इत्यादि ने भी देखा था। चूँकि सारी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक विषमता की सृष्टि शक्ति के स्रोतों के लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य अन्यायपूर्ण बंटवारे से होती रही है, इसलिए बहुजनों के स्वाधीनता संग्राम का एजेंडा शक्ति के स्रोतों का भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों – सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों- के स्त्री-पुरुषों के मध्य न्यायपूर्ण बंटवारे पर केन्द्रित होना चाहिए। ऐसे में अगर आंबेडकरवाद के संकटग्रस्त होने से भारत सहित यहाँ की तमाम वंचित जातियों का भविष्य संकटग्रस्त नजर आता है तो आंबेडकरवादियों को आज से ही अपने स्वाधीनता संग्राम को अंजाम तक पहुँचाने की परिकल्पना में निमग्न हो जाना चाहिए।

बाबासाहेब आंबेडकर के इस योगदान पर हमारी नजर क्यों नहीं जाती?

भारत-रत्न बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर जी की आज 130वीं जयंती है। उनके जीवन और कामकाज को देख कर हैरानी होती है। बचपन में ही मैंने एक बार बाबासाहेब की जीवनी पढ़ी तो उनको पढ़ता गया और इस बात को थोड़ा देर से समझ पाया कि जिस व्यक्ति के पास न तो मजबूत संगठन था, न संसाधन थे उसकी काया का विस्तार पूरी दुनिया में कैसे होता चला गया है। बाबा साहेब से जुड़ी तमाम जगहों की यात्राएं मैंने की हैं। बौद्धों के सभी प्रमुख स्थलों पर भी गया हूं। लेकिन मुझे नागपुर में उनकी यादों को जिस तरह सहेजा गया है, उसने बहुत प्रभावित किया।

वे विधिवेत्ता, असाधारण अर्थशास्त्री, पत्रकार और लेखक और समाज सुधारक होने के साथ ऐसे आंदोलनकारी थे जिन्होने हजारों सालों से कमजोरों के हकों पर कुंडली मार कर बैठे लोगों को खुली चुनौती दी। वे जानवरों को तो बेहतर समझते थे लेकिन अपने जैसे मनुष्य को नहीं। बाबा साहेब का साहित्य पढ़ने पर बगावत पैदा होती है। वे कौन लोग थे जिनके सरोवर जानवरों के लिए खुले थे लेकिन मनुष्य के लिए नहीं। वे कौन लोग थे जिन्होंने प्राकृतिक संपदाओं को हड़प लिया और एक बड़ी आबादी को किनारे कर दिया। मेरे हिसाब से इस समाज को जगा कर अपने पांवों पर खड़े होने की जो ताकत बाबा साहेब ने दी वह आजाद भारत की एक ऐसी बड़ी घटना है, जिन पर शायद हमारी निगाह कम जाती है।

बाबा साहेब ने संविधान बनाते समय समता या समानता के पक्ष में संविधान सभा में जो माहौल बनाया वह एक बड़ी बात थी। वे कहते थे कि शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो। वे शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देते थे। वे खुद इतने शिक्षित न होते तो शायद इतना कुछ कर न पाते। उन लोगों का विचार अपनी इसी ताकत से न बदल पाते जो उनका तब तक विरोध करते रहे जब तक उनको बाबा साहेब के विचार की ताकत का अंदाजा नहीं हुआ। लेकिन संविधान सभा के अपने आखिरी वक्तव्य में बाबा साहेब ने जो बातें कहीं थी, जो चेतावनी दी थी वे आज भी प्रासंगिक हैं। “मैं महसूस करता हूँ कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को चलाने का काम सौंपा जाएगा, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा। दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले अच्छे लोग हुए तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा।”

Worldwide Celebrated on the occasion of Mahatma Phule & Dr. Ambedkar Birth Anniversary

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The year 2021 has been a difficult time due to the Covid-19 pandemic. Many countries are on the 3rd or 4th wave of a Covid-19 lockdown and due to this lot of local gatherings of any physical kind are strictly prohibited. The worldwide Bahujan Indian community celebrates an online Cyber celebration to commemorate Equality day & Knowledge dayon the occasion of the 194thRashtrapitaMahatma Jyotirao Phule’s birth anniversary & Bharat Ratna Dr. B R Ambedkar’s 130th birth anniversary.

These online celebrations help the Bahujan community to come together and pay respectsto tribute the beloved leaders like RashtrapitaMahatma Jyotirao Phule and Babasaheb Ambedkar by garlanding statues, light candles in front of their photographs, read their favorites quotes, and even cheer slogans such as “’JAI PHULE, JAI BHIM’, ‘Mahatma Phule Amar Rahe, and Dr. Ambedkar Amar Rahe’” from their respective homes.

The Bahujan community comes together from all over the world like The United States, Canada, United Kingdom, Germany, France, Italy, Switzerland, Spain, Portugal, Greece, Holland, Austria, Belgium, Lebanon, Japan, Singapore, Australia, New Zealand, Saudi Arabia, United Arab Emirates, Brunei, Oman, Qatar, Dubai, Bahrain, Kuwait, Malaysia, and of course India.

These online cyber celebrations are telecasted live on Bahujan media networks like AwaazTV, MaitriTV, KanshiTV, Samyak India TV, BahujanTV, MNT News Network, MN Live, Dalit Dastak, and YouTube channels.They have used multiple online meeting platforms like skype, google hangout, Facebook, YouTube, Zoom, WebEx, Free-conference call, webinar jam, and GoToMeeting.

There was a huge Twitter presence with international followers of #JyotibaPhule, #ज्योतिबा_फुले_जयंती, Dr. Ambedkar emoji, #AmbedkarJayanti, #JaiBhim and #जयभीम,#अंबेडकरजयंती.

Nowadays, these online celebrations are getting overwhelming responses from all levels, all ages, andbackgrounds of participants. There were multiple cultural activities performed by children, women, online Kahoot quizzes, inspirational song competitions, speeches, book launches, blood donation camps, wheelchair donation camps, free food community kitchen, and paintings done to commemorate the celebration.

“A symbol of humanistic thought and sacrifice by these leaders is a source of motivation and inspiration to all Bahujan community.” These cyber celebrations are continuing from the 1st week of May till the end of it at multiple locations across the globe.

The listed organization with their fliers online Jayanti celebration.


Report from Mahesh Wasnik-Detroit, Michigan

जयंती विशेषः शूद्र यानी ओबीसी समाज में स्वीकार्यता के इंतजार में ज्योतिबा फुले

ज्योतिबा फुले के जन्मदिन पर आप एक बात गौर से देख पाएंंगे। गैर बहुजनों के बीच में ही नहीं बल्कि बहुजनों अर्थात ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लोगों के बीच भी ज्योतिबा फुले को उनके वास्तविक रूप में पेश करने में एक खास किस्म की कमजोरी नजर आती है। ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के जितने भी महानायक हुए हैं लगभग उनके सभी के साथ यह समस्या नजर आती है।

भारत में ब्राह्मणवाद का जो षड्यंत्र सदियों से चला आ रहा है यह समस्या उस यंत्र से जुड़ती है। भारत के वे विद्वान और महापुरुष जो तथाकथित ऊंची जातियों में जन्म लेते हैं वे अखिल भारतीय स्तर के महानायक मान लिए जाते हैं। और ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति से आने वाले महानायक उनके अपनी जातीय श्रेणी के अंदर विद्वान या महान माने जाते हैं। इस बात को ज्यादातर ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग ठीक से समझते नहीं हैं। इसीलिए भारत में इतनी शिक्षा, इंटरनेट और टेक्नोलॉजी के आने के बावजूद भारत का ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति का बड़ा समुदाय अपने नेरेटिव और ग्रैंड नेरेटिव का निर्माण नहीं कर पा रहा है।

आप बाबा साहेब आंबेडकर का उदाहरण लिजिए, गैर बहुजन समाज ही नहीं बल्कि बहुजन समाज भी ज्यादातर उन्हें संविधान के निर्माता के रूप में देखता है। डॉक्टर आंबेडकर ने अपनी महान विद्वता का इस्तेमाल करते हुए सिर्फ संविधान की रचना नहीं की थी। संविधान और कानून के अलावा ना केवल उन्होंने अर्थशास्त्र और भारत के इतिहास के बारे में बहुत कुछ लिखा है बल्कि उन्होंने पूरे भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए एक नए बौद्ध धर्म को भी जन्म दिया है। लेकिन दुख की बात है कि खुद बहुजनों में इस बात को ज्यादातर लोग नहीं जानते। आज आप किसी भी शहर में या गांव में किसी बस्ती में जाकर पूछ लीजिए कि बाबासाहेब आंबेडकर ने क्या काम किया था? ज्यादातर लोग यह जवाब देंगे कि उनका सबसे बड़ा काम संविधान की रचना करना था।

अगर आप पूछें कि बाबा साहब अंबेडकर ने कोई नया धर्म बनाया था क्या? तो ज्यादातर लोग इस तथ्य से अंजान मिलेंगे। जो लोग यह जानते हैं कि बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, वे भी यही कहते हैं कि उन्होंने किसी पुराने रंग रूप के बौद्ध धर्म को अपना लिया था। इस तरह बाबा साहेब का जो वास्तविक विराट स्वरूप है वह ना सिर्फ दुनिया के सामने नहीं आ पाता बल्कि अपने ही प्रेम करने वाले लोगों के बीच में भी बहुत छोटा होकर और सिकुड़ कर रह जाता है।

कल्पना कीजिए कि बाबासाहेब आंबेडकर को भारत में धम्मक्रांति का जनक कहकर प्रचारित किया जाए। या धम्म चक्र प्रवर्तन करने वाले महापुरुष या नए बौद्ध गुरु की तरह प्रचारित किया जाए तो क्या होगा?

आप सीधे-सीधे दो तरह के प्रचार की कल्पना कीजिए। मैं एक राज्य में पचास हजार बच्चों के बीच दस सालों तक यह प्रचारित करूं कि बाबासाहेब आंबेडकर भारत में धर्म क्रांति के जनक हैं और उन्होंने भारत के संविधान का भी निर्माण किया है। और कोई दूसरा आदमी दूसरे राज्य में दस सालों तक पचास हजार बच्चों के बीच तक यह प्रचारित करें कि बाबासाहेब केवल एक वकील और संविधान के निर्माता थे। आप आसानी से समझ सकते हैं कि मैं जिस राज्य में मैंने बाबा साहब को धम्मक्रांति का जनक और संविधान निर्माता दोनों बता रहा हूं वहां के बच्चों के मन में अपने भविष्य के निर्माण की कितनी विराट योजना अचानक से प्रवेश कर जाएगी। और जिस राज्य में दस सालों तक केवल उन्हें संविधान का निर्माता बताया जा रहा है उस राज्य के बच्चे धर्म संस्कृति इतिहास और राजनीति के महत्व के बारे में बिल्कुल भी जागृत नहीं हो पाएंगे।

जैसे ही धर्म के निर्माण की बात आती है, धर्म के साथ इतिहास संस्कृति कर्मकांड और सब तरह की सृजनात्मक प्रक्रियाएं अचानक जुड़ जाती है। लेकिन अपने महापुरुष को अगर सिर्फ संविधान और कानून तक सीमित कर दिया जाए, बाबा साहेब को आप सिर्फ एक काले कोट पहने वकील के रूप में ही कल्पना कर पाएंगे। आज भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों में बाबा साहेब की जो कल्पना है वह सिर्फ काला कोट पहने और मोटी सी किताब पकड़े एक बैरिस्टर की कल्पना है। यह छवि और यह कल्पना भी बहुत अच्छी है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। अगर बाबा साहेब को भारत के भविष्य के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए एक नए धर्म के जन्मदाता के रूप में या धम्म चक्र प्रवर्तन करने वाले आधुनिक बौद्ध गुरु की तरह चित्रित किया जाए तो क्या प्रभाव होगा आप सोच सकते हैं।

अब आप ज्योतिबा फुले पर आइए। ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को सिर्फ शिक्षा और समाज सुधार से जोड़कर देखा और दिखाया जाता है। न केवल गैर बहुजनों में बल्कि ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकांश लोगों में भी उन्हें सिर्फ शिक्षक और शिक्षिका बताने की बीमारी पाई जाती है। जिस तरह भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति बाबासाहेब आंबेडकर को उनके विराट रूप में प्रस्तुत नहीं करते, उसी तरह ज्योतिबा फुले को भी बहुत ही सीमित रूप में पेश किया जाता है। ज्योतिबा फुले के साथ शिक्षा और ज्ञान को जोड़ देना अच्छी बात है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। ज्योतिबा फुले ने शिक्षा के अलावा और भी बहुत सारे काम किए हैं जिसका कि लोगों को पता नहीं है। उन्होंने एक नई सत्यशोधक समाज जैसा संगठन बनाया था जिसका धर्म, जिसकी संस्कृति कर्मकांड और प्रतीक बहुत ही अलग थे और नए थे। उन्होंने लगभग एक नए पंथ की ही रचना कर डाली थी।

ज्योतिबा फुले ने ना सिर्फ शिक्षा के लिए काम किया था बल्कि, अनुसूचित जाति जनजाति और ओबीसी की महिलाओं के लिए और बच्चियों के लिए स्कूल खोला था। इतना ही नहीं बल्कि तथाकथित ऊंची जाति की विधवा एवं गर्भवती महिलाओं के लिए मुफ्त में बच्चा पैदा करने और बच्चा पालने के लिए एक आश्रम भी खोला था। उन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए सरकार से लड़ाई की और स्थानीय संस्थाओं से भी लड़ाई की। उस जमाने में ब्रिटिश गवर्नमेंट जब हंटर कमीशन लेकर आई थी तब ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए स्कूल एवं शिक्षा का प्रावधान करने के लिए उन्होंने आवाज उठाई थी। उस समय उन्होंने शराबबंदी को लेकर महिलाओं का एक आंदोलन चलाया था। उन्होंने मजदूरों और किसानों के लिए आंदोलन चलाए थे। अपने लेखन में उन्होंने ना सिर्फ अंधविश्वासों का विरोध किया था बल्कि ब्राह्मणों और बनियों के बीच जिस तरीके का षड्यंत्र बनाया जाता है और जिस तरीके से भारत की ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति को लोगों का शोषण होता है, उस पूरी तकनीक को उन्होंने उजागर किया था।

ज्योतिबा फुले ने जिस तरीके से भारत के पौराणिक शास्त्रों और उनकी कहानियों का विश्लेषण किया था, वह बिल्कुल डांटे की डिवाइन कॉमेडी के महत्व से मिलता-जुलता है। यूरोप मे डांटे की डिवाइन कॉमेडी एक बहुत महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है जिसने की सेमेटिक परंपराओं में ईश्वर स्वर्ग नर्क और इस तरह की अंधविश्वासों का खूब मजाक उड़ाया गया है। आज भी यूरोप में डांटे को एक महान पुनर्जागरण के मसीहा के रूप में देखा जाता है। लेकिन भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग अपने ही सबसे बड़ी मसीहा को सिर्फ एक शिक्षक बनाकर छोड़ देते हैं। यह भारत की तथाकथित ऊंची जाति के लोगों का षड्यंत्र भी हो सकता है। लेकिन भारत के ओबीसी समाज एवं बहुजन समाज के लोगों को तो कम से कम हजार बार सोच कर निर्णय लेना चाहिए। ज्योतिबा फुले खुद माली समाज से आते थे, खेती किसानी फूलों का धंधा और फूल सजाकर बेचना उनका पुश्तैनी काम था। इस तरह माली ओबीसी समाज से आने वाले इतने विराट महापुरुष को स्वयं ओबीसी समाज ने ही भुला दिया है।

जो समाज अपने ही पिता को, अपने ही महान पूर्वज को अपने हाथों से बौना बनाकर पेश करता है वह दूसरों से क्या उम्मीद कर सकता है? कल्पना कीजिए कि आप स्वयं अपने पिता को अनपढ़ और गंवार साबित कर देते हैं, तो आपका पड़ोसी जो आपका शोषण कर रहा है वह आपके पिता को विद्वान साबित क्यों करना चाहेगा? इस बात को ध्यान से समझने की कोशिश कीजिए। अगर आप अपने पिता और अपने पूर्वजों को महान साबित नहीं करना जानते तो आपके बच्चे भी कभी महान नहीं हो पाएंगे। इसलिए सारी संस्कृतियों में उन सभी धर्मों में आप देखेंगे कि वे अपने पूर्वजों को महानतम रूप में पेश करते आए हैं। भारत में एक विचित्र की परंपरा है। भारत के काल्पनिक और या पौराणिक इतिहास में जिन लोगों ने यहां के मूल निवासियों की बड़े पैमाने पर हत्या की है, उन्हे जगत का पिता और पूरी दुनिया का पालनहार बताया जाता है। कम से कम इसी बात से भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को कुछ सीख लेना चाहिए।

ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अपने पूर्वजों को सम्मान देना सीख लेना चाहिए। भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के पूर्वजों ने कभी भी बड़े पैमाने पर हत्याकांड नहीं किए, ना ही बलात्कार किए, ना ही महिलाओं का अपमान किया और ना गांव और शहरों को जलाया। इसके विपरीत इन श्रमशील जातियों से आने वाले महानायकों ने महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था, जागरूकता, आधुनिकता इत्यादि के लिए अनेक अनेक काम किए हैं। ज्योतिबा फुले बाबासाहेब आंबेडकर परियार जैसे लोग भारत को आधुनिक जगत में ले जाने वाले सबसे बड़े नाम हैं। इन जैसे लोगों ने काल्पनिक देवी देवताओं की तरह ना तो बड़े हत्याकांड रचे न ही नगरों और राजधानियां को जलाया बल्कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की तरफ पूरे देश को ले जाने का बड़ा काम किया।

बहुजन और गैर बहुजन की बात निकलते ही अक्सर लोग कहने लगते हैं कि यह तो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की समस्या है। उन्हें यह पता ही नहीं है कि भारत के ओबीसी जो कि यादव किसान काश्तकार कुम्हार विश्वकर्मा कुर्मी कुनबी सुतार इत्यादि जातियों के लोग होते हैं लोग भारतीय धर्मशास्त्रों में शूद्र कहे गए हैं। ज्योतिबा फुले स्वयं माली समाज से आते थे और स्वयं को शूद्र कहते थे, भारत के दलित लोग अतिशूद्र या पंचम माने जाते हैं। शूद्र का मतलब ओबीसी होता है और दलित का मतलब अस्पृश्य होता है, ज्यादातर बहुजन लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है। इसीलिए ज्यादातर ओबीसी अपने आप को किसी ना किसी तरीके से क्षत्रिय या वैश्य सिद्ध करने में लगे रहते हैं। हालांकि जो क्षत्रिय और वैश्य समुदाय हैं वे इन ओबीसी लोगों के साथ न शादी करते हैं न खाना खाते हैं और ना इनके घर में आना-जाना करते हैं।

ऐसे में भारत के ओबीसी लोगों को अपने भीतर छुपा आत्मसम्मान जगाते हुए इस तरह के नाटक बंद कर देना चाहिए। जिस तरह ज्योतिबा फुले ने अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान से समझौता ना करते हुए अपने आपको शूद्र मानकर अपने इतिहास की खोज की थी, उसी तरह भारत के शेष ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अपनी महान परंपरा और शास्त्रों का फिर से अध्ययन करना चाहिए। बाबासाहेब आंबेडकर ने भी यही काम किया था। उत्तर भारत में ललई सिंह यादव ने पेरियार के शिक्षाओं पर चलते हुए यही काम किया था, बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाह ने भी यही काम किया था। झारखंड से आने वाले महान जयपाल सिंह मुंडा ने भी यही काम किया था। उनके पहले महान टंट्या भील और महान बिरसा मुंडा ने भी यही काम किया था।

ज्योतिबा फुले के जन्मदिन पर हमें यह बात गौर करते हुए नोट करनी चाहिए। ज्योतिबा फुले को सिर्फ शिक्षक या समाज सुधारक बताने वाले लोग मासूम या फिर गलत लोग हैं। इन लोगों को मालूम नहीं है कि शिक्षा से भी बड़ा योगदान ज्योतिबा फुले ने इस देश को दिया है। ज्योतिबा फुले सही अर्थों में देखा जाए तो भारत की आधुनिकता के पिता है। ज्योतिबा फुले को “फादर ऑफ इंडियन मॉडर्निटी” कहा जाना चाहिए।

अंबेडकर जयंती पर अपने बयान को लेकर घिरे अखिलेश यादव

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अंबेडकर जयंती को लेकर दिए अपने बयान पर घिर गए हैं। अखिलेश यादव के इस बयान की निंदा हो रही है। खासकर अखिलेश अंबेडकरवादियों के निशाने पर हैं। अखिलेश यादव ने जो ट्विट किया, उसे देखिए।

दरअसल अखिलेश यादव द्वारा अंबेडकर जयंती को दलित दीवाली कहने से अंबेडकरवादी उनसे नाराज हैं। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्विट किया- नैक्डोर के फाउंडर और प्रमुख अशोक भारती ने बिना किसी का नाम लिए ट्विट किया- फिलहाल इस पर बहस जारी है और अखिलेश यादव अंबेडकरी समाज के निशाने पर हैं। देखिए, यह वीडियो-