25 जुलाई को फूलन देवी की पुण्यतिथि के ठीक पहले उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर जंग छिड़ गई है। इस जंग में एक ओर हैं बिहार के वीआईपी पार्टी के मुकेश सहनी तो दूसरी ओर हैं यूपी की निषाद पार्टी के संजय निषाद। दरअसल विकासशील इंसान पार्टी यानी वीआईपी के नेता मुकेश सहनी, उत्तर प्रदेश के 18 शहरों में फूलन देवी की पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा लगाकर अपनी पार्टी को यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में लॉंच करना चाहते थए। लेकिन सहनी की इस कोशिश को योगी आदित्यनाथ सरकार ने तगड़ा झटका दे दिया है।
25 जुलाई को फूलनदेवी की पुण्यतिथि को देखते हुए मुकेश सहनी ने पटना से ये प्रतिमाएं भेजी थी, जो यूपी के जिलों में लगना था। इन प्रतिमाओं को वाराणसी और मिर्जापुर में जब्त कर लिया गया है। वाराणसी के पुलिस कमिश्नर ने मुकेश सहनी को पत्र लिखकर कहा है कि उनकी पार्टी को ऐसे कार्यक्रम की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2008 से ही धार्मिक या राजनीतिक व्यक्ति की प्रतिमा सरकारी या निजी जमीन पर भी लगाने के लिए उच्चस्तरीय इजाजत चाहिए। इसे कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन भी बताया जा रहा है।
जबकि वीआईपी पार्टी का कहना है कि वाराणसी एसडीएम ने कोविड 19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए इस कार्यक्रम की इजाजत दे दी थी। राज्य के मुख्य सचिव को भी इन कार्यक्रमों की विस्तृत सूचना भेजी गई थी।
ऊपर से जो भी कहा जा रहा हो, यहां असल पेंच संजय निषाद का है। वीआईपी के मुखिया मुकेश सहनी यूपी में भी अपनी पार्टी का विस्तार उन क्षेत्रों में करना चाहते थे, जहां निषाद समाज का वोट बैंक है। इसके लिए उन्होंने फूलन देवी की जयंती का दिन चुना। मुकेश सहनी को लगा था कि बिहार सरकार में भाजपा के साथ शामिल होने के कारण भाजपा की ओर से उन्हें मदद मिलेगी, लेकिन यूपी में भाजपा के साथ खड़े निषाद पार्टी के संजय निषाद को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने मुख्यमंत्री मोदी के साथ मिलकर खेल कर दिया। दरअसल यूपी की राजनीति में निषाद पार्टी के डॉक्टर संजय निषाद की बीजेपी से नाराजगी और खुले तौर पर डिप्टी सीएम पद की मांग के बाद मुकेश सहनी के यूपी चुनाव लड़ने के ऐलान से लगा था कि भाजपा ने संजय निषाद का विकल्प तैयार रखा है। संजय निषाद को जैसे ही मुकेश सहनी के यूपी में आने की भनक लगी, वो चुपचाप भाजपा के पीछे जा खड़े हुए। बदले में भाजपा ने मुकेश सहनी के यूपी में आने को लेकर रोड़ा अटका दिया है।
हालांकि मुकेश सहनी अब भी प्रतिमा स्थापित करने पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि प्रतिमा स्थापित करने से हमें कोई डिगा नहीं सकता। हम राज्य के नियमों का पालन करते हुए ऐसा करेंगे। यूपी चुनाव में निषाद वोट को देखते हुए मुकेश सहनी ने कहा था कि वीआईपी यूपी के 18 मंडलों में फूलन देवी की 18 फीट ऊंची प्रतिमा लगाएगी। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मल्लाह यानी निषाद और अन्य उपजातियों के 14 परसेंट वोट हैं। यूपी में संजय निषाद इनके एक नेता हैं जो निषाद पार्टी के अध्यक्ष हैं और इस समय बीजेपी के साथ हैं।
दक्षिण भारत के सुपरस्टार सूर्या शिवकुमार ने अपने 46वें जन्मदिन पर सुपरस्टार सूर्या ने एक बड़ा धमाका किया है। उन्होंने अपने फैंस को स्पेशल गिफ्ट देते हुए अपनी अगली फिल्म का लुक साझा किया है। फिल्म का नाम है, जय भीम। सूर्या इस फिल्म में एक वकील के किरदार में नजर आने वाले हैं, जो आदिवासी समाज के हक के लिए लड़ते नजर आएंगे। सूर्या ने फिल्म जय भीम का फर्स्ट लुक पोस्टर सोशल मीडिया पर शेयर किया है। उन्होंने पोस्टर शेयर करते हुए लिखा- जय भीम का फर्स्ट लुक शेयर करके बहुत एक्साइटिड हूं। पोस्टर में सूर्या इंटेंस लुक में नजर आ रहे हैं। उन्होंने ब्लैक कोट पहना हुआ है। जय भीम में सूर्या के साथ प्रकाश राज और राजिशा विजयन अहम भूमिका निभाते नजर आने वाले हैं। सूर्या इस फिल्म में एक्टिंग करने के साथ इसे प्रोड्यूस भी करने वाले हैं। यह फिल्म उनके प्रोडक्शन हाउस 2d एंटरटेनमेंट के तले बन रही है।
यह उनकी 39वी फिल्म है, जिसे टीएस गनानवेल ने डायरेक्ट किया है और लिखा है। जय भीम की शूटिंग चेन्नई में कोरोना की दूसरी लहर से पहले शुरू हो गई थी। मगर महामारी के चलते इसे रोक दिया गया था। ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े होने वाले और NEET में आरक्षण के मामले में खुलकर ओबीसी समाज का पक्ष लेने वाले तमिल फिल्म स्टार सूर्या शिवकुमार पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं। चर्चा की वजह उनका लगातार ब्राह्मणवाद के खिलाफ होने और वंचित-शोषित तबके के साथ खड़ा होना रहा है। इसको लेकर वह भाजपा के निशाने पर भी रहे थे।
सूर्या ने इंडस्ट्री में अपनी पहचान अपने टैलेंट के दम पर बनाई है। सूर्या कई सालों से इंडस्ट्री में हैं और उनकी हर फिल्म हिट साबित होती है। सूर्या टॉलीवुड के स्टार होने के साथ प्रोड्यूसर भी हैं और टीवी प्रिसेंटर भी हैं। उन्होंने साल 1997 में फिल्म नेरुक्कु नेर से अपने करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद से वह कई फिल्मों में नजर आ चुके हैं। सूर्या की फिल्मों की नकल कर आमिर खान से लेकर अजय देवगन तक हिट फिल्में दे चुके हैं। आमिर खान की गजनी और अजय देवगण की सिंघम इनकी ही फिल्मों की हू-ब-हू रिमेक है।
सरकार से दो-दो हाथ करने को किसानों जंतर मंतर कूच कर रहे हैं। दिल्ली की सीमाओं पर कई महीनों से डटे आंदोलनकारी किसान अपने प्रदर्शन को और धार देने वाले हैं। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्व में किसानों का एक जत्था जंतर मंतर की ओर कूच कर चुका है। दिल्ली पुलिस ने यहां पर उन्हें प्रदर्शन की इजाजत दी है। जंतर मंतर पर ‘किसान संसद’ लगेगी जिसमें भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत भी शामिल होंगे। सिंघु बॉर्डर से 200 किसानों का जत्था बसों के जरिए जंतर मंतर पर किसान संसद लगाएगा। सुबह 11 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक प्रदर्शन चलेगा।
दूसरी ओर संसद के भीतर किसानों के साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी है। कांग्रेस सांसदों ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ संसद परिसर में प्रदर्शन किया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी ने इस प्रदर्शन का नेतृत्व किया। इस बीच राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने हम किसानों के मुद्दों को सदन में उठा रहे हैं। किसान हमारी रीढ़ की हड्डी है। किसानों के बिना हम जी नहीं सकते। उस आवाज को उठाना जरूरी है और हम उठाएंगे।
एक चौंकाने वाला और बेशर्मी भरा बयान केंद्र सरकार की ओर से आया है, जिसमें कहा गया है कि कोविड के कोहराम के दौरान देश में किसी की भी मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई।
थोड़ा पीछे चलिए, मार्च के आखिरी हफ्ते से जून के आखिरी हफ्ते तक के उस तीन महीने के दौर को याद करिए….., जब गंगा में लाशे तैर रही थीं……., जब श्मशान भी रो रहा था। जब लोग अस्पतालों के बाहर अपने नाते-रिश्तेदारों की जान बचाने की गुहार लगा रहे थे। उस तस्वीर को याद करिए जब ऑटो में बैठी एक महिला अपने पति की जान बचाने के लिए उसके मुंह में मुंह लगाकर उसे ऑक्सीजन देने की नाकाम कोशिश करती दिखी थी। जब लोग ऑक्सीजन सिलेंडर की चाहत में एक जिले से दूसरे जिले, यहां तक की एक राज्य से दूसरे राज्य का चक्कर काट रहे थे। और ऑक्सीजन नहीं मिल सकने के कारण उनके परिजन दम तोड़ रहे थे। लेकिन मोदी जी की यह सरकार देश की संसद में दिन दहाड़े यह झूठा बयान दे रही है कि देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा।
हालांकि यह सरकार तो आए दिन झूठ बोलने के कारण एक्सपोज भी हो चुकी है। लेकिन इस बार का झूठ सिर्फ झूठ नहीं, बल्कि अपराध है। क्योंकि यह झूठ देश की संसद में बोला गया। केंद्र सरकार की तरफ से मंगलवार को कहा गया है कि कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई है। फिलहाल संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है और इस दौरान सदन में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार से पूछा था कि क्या यह सच है कि Covid-19 की दूसरी लहर में कई सारे कोरोना मरीज सड़क पर और अस्पताल में इसलिए मर गए क्योंकि ऑक्सीजन की किल्लत थी? इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री भारती प्रवीण पवार द्वारा दिये गए लिखित उत्तर में बताया कि ‘स्वास्थ्य राज्य का विषय है और किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि किसी की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई है।’
आप देश की जनता हैं, आप खुद से पूछिए कि क्या आपका कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई सगा ऑक्सीजन की आस में आखिरी सांस लेने को मजबूर नहीं हुआ? और भीतर से जो जवाब आए उसे मानिए, क्योंकि हमारे देश की सरकार को झूठ बोलने की आदत सी हो गई है। यह झूठ तब बोला जा रहा है जब इसी सरकार का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की डिमांड काफी बढ़ गई थी। महामारी की पहली लहर के दौरान ऑक्सीजन की मांग 3095 मीट्रिक टन थी जो दूसरी लहर के दौरान बढ़ कर करीब 9000 मीट्रिक टन हो गई। ……… और आश्चर्य तो यह है कि केंद्र से अपने सुर में सुर मिलाते हुए तामिलनाडु, बिहार और मध्यप्रदेश राज्य ने भी दावा किया है कि उनके प्रदेश में ऑक्सीजन की किल्लत से कोई मौत नहीं हुई।
जब भारत की संसद में कोरोना को लेकर झूठे आंकड़े दिए जा रहे थे, उसी मंगलवार के दिन वाशिंगटन के अध्ययन संस्थान सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट की ओर से जारी रिपोर्ट में कोरोना से 34 से 49 लाख लोगों के मरने का दावा किया गया। इस रिपोर्ट को अभिषेक आनंद, जस्टिस सैंडफर और चार सालों तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यन भी शामिल हैं। अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबित इस दावे के पीछे सरकारी आंकड़ों, अंतरराष्ट्रीय अनुमानों, सेरोलॉजिकल रिपोर्टों और घरों में हुए सर्वे को आधार बनाया गया है। अमेरिकी अध्ययन में कहा गया है कि भारत में जनवरी 2020 से जून 2021 के बीच कोविड-19 से लगभग 50 लाख (4.9 मिलियन) लोगों की मृत्यु हुई है। अमेरिकी अध्ययन में इन मौतों को विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से देश की सबसे बड़ी मानव त्रासदी बताई गई है।
यह आंकड़ा भारत सरकार के आंकड़ों से 10 गुना से भी ज्यादा है। क्योंकि वर्ल्डोमीटर के मुताबिक, भारत में कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या तीन करोड़ 12 लाख से ज्यादा है जबकि संक्रमण से अब तक चार लाख 18 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, ऐसा बताया जा रहा है।
इस बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार जहां ऑक्सीजन की कमी से मौतों को नकार रही है, वहीं वह टीकाकरण की कमी को भी नकार रही है। जबकि आज भी देश में सिर्फ सात फीसदी से कम आबादी का ही पूरी तरह टीकाकरण हो पाया है। लोग अस्पतालों का चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें कोविड वैक्सीन नसीब नहीं हो रहा है। भारत के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगस्त में तीसरी लहर सामने आ सकती है। उससे ठीक पहले सरकार का इतना बड़ा झूठ देश की आम जनता के गले से कैसे उतर पाएगा। क्या झूठ बोलने वाली इस सरकार पर ही मुकदमा नहीं चलना चाहिए।
बिहार सरकार मंत्रिमंडल सचिवालय के राजभाषा विभाग ने विभिन्न श्रेणी के पुरस्कारों के लिए नामों का चयन कर लिया है। इस बार पुरस्कारों के लिए 15 श्रेणी के लिए नामों का चयन किया गया है। सभी श्रेणी के लिए पुरस्कार की राशि 50 हजार से तीन लाख रुपये तक है। इसके तहत दलित साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे को बी.पी. मंडल अवार्ड मिला है। जबकि डॉ. अशोक कुमार को बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर पुरस्कार देने की घोषणा हुई है।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे को बिहार राजभाषा विभाग की ओर से बी.पी. मंडल पुरस्कार के तहत दो लाख रुपये का पुरस्कार मिलेगा। सुशीला टाकभौरे का जन्म दिनांक 4 मार्च 1954 को मध्यप्रदेश के जिला होशंगाबाद में बनापुरा गाँव में हुआ था। सुशीला जी हिंदी दलित साहित्य की अग्रणी महिला साहित्यकारों में से एक है। उनके जीवन के अनुभव, एक दलित और स्त्री होने के नाते उनके जीवन का संघर्ष उनकी रचनाओं में भली-भांति परिलक्षित होती हैं। एक कहानीकार तथा एक कवियत्री के रूप में उन्होंने अपनी अलग छाप स्थापित की है। वे ‘वाल्मीकि’ समाज से आती हैं।
सुशीला जी का रचना संसार उद्द्येश्यपरक है। उनकी रचनाओं के केंद्र में नारी अथवा दलित अवश्य रहते हैं। उनकी रचनाएँ समाज में समानता एवं उच्च आदर्शों की वकालत करती हैं। उनके उपन्यास ‘नीला आकाश’, ‘वह लड़की‘ और ‘तुम्हें बदलन ही होगा’ अम्बेडकरवादी विचार धारा से ओत-प्रोत हैं जिसमें दलित उद्धार, सामाजिक समरसता तथा जातिगत व्यवस्था के उन्मूलन की वकालत की गयी है। सुशीला जी की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुयी। इसके माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष और कटु अनुभवों को साझा किया है। उनकी कई रचनाओं को विभिन्न विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
डॉ. सुशीला टाकभौरे के बारे में और उनकी लिखी गई किताबों के बारे में जानने के लिए इस लिंक को देखिए
अपने आप को सबसे तेज और क्रांतिकारी बताने वाले चैनल ‘आज तक’ पर उसके एक पत्रकार ने आरोप लगाया है कि चैनल ने उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ट्वीट करने के कारण नौकरी से निकाल दिया है। पत्रकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर दो ट्वीट लिखा था, जिसके बाद उन्हें जाने को कह दिया गया। पत्रकार ने यह ट्विट 17 जुलाई को लिखा था और 19 जुलाई को आज तक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। पत्रकार का नाम श्याम मीरा सिंह है। लोकतंत्र के जिस चौथे खंभे पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी थी, उसने महज सवाल पूछने भर से अपने पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया है। इससे समझा जा सकता है कि भारत का मीडिया आज कितना कमजोर हो चुका है। इस पूरे घटनाक्रम को पत्रकार ने सोशल मीडिया पर साझा किया है। अपने फेसबुक पोस्ट में उन्होंने जो लिखा है, उसे यहां हम नीचे दे रहे हैं-
“आज से आजतक के साथ पत्रकारिता का मेरा सफर खत्म हुआ। प्रधानमंत्री मोदी पर लिखे मेरे दो ट्वीट की वजह से मुझे आजतक से निकाल दिया गया है। मुझे इस बात का दुःख नहीं है, इसलिए आप भी दुःख न करें। जिन दो ट्वीट का हवाला देते हुए मुझे निकाला गया है, वे ये दो ट्वीट हैं-
1.Who says Respect the Prime Minister. They should first ask Modi to respect the post of Prime Minister post. (हिंदी अनुवाद- जो कहते हैं कि प्रधानमंत्री का सम्मान करो, उन्हें सबसे पहले मोदी से कहना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री पद का सम्मान करें)
2.यहाँ ट्विटर पर कुछ लिखता हूँ तो कुछ लोग मेरी कंपनी को टैग करने लगते हैं. कहते हैं इसे हटाओ, इसे हटाते क्यों नहीं… मैं अगला ट्वीट और अधिक दम लगाकर लिखता हूँ. पर इसे लिखने से पीछे नहीं हटूँगा कि ”Modi is a shameless Prime Minister.”
ये दो बातें हैं जिनपर मुझे निकाला गया या निकलवाया गया। सात महीने पहले जब मैंने आजतक JOIN किया, तब भी मुझे इस बात का भान था कि मुझे क्या लिखना है, किन लोगों के लिए बोलना है। तब ही से सत्ताधारी दल के समर्थकों द्वारा कंपनी को टैग कर-कर के लिखा जाने लगा था कि ‘इस आदमी (मुझे) को आजतक से निकाला जाए, क्योंकि ये मोदी विरोध में लिखता है। बीते कुछ दिनों से भी कंपनी पर सोशल मीडिया के माध्यम से एक वर्ग के द्वारा ये दवाब बनाया जा रहा था। अंततः इन दो ट्वीट के बाद मुझे ‘आजतक’ से निकाल दिया गया है। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। जो मैंने लिखा मैं उसके लिए स्टैंड करता हूं। ये वो बातें हैं जो एक पत्रकार के रूप में ही नहीं, एक नागरिक के रूप में मुझसे अपेक्षित थी कि मैं एक ऐसे शेमलेस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं जो एक खिलाड़ी के अंगूठे की चोट पर ट्वीट कर सकता है मगर विदेश में शहीद हुए एक ईमानदार पत्रकार पर एक शब्द भी नहीं बोलते।
मुझसे एक नागरिक के रूप में ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को ‘शेमलेस’ कहूं जिसकी लफ्फाजी और भाषणबाजी ने मेरे देश के लाखों नागरिकों को कोरोना में मरने के अकेला छोड़ दिया। मुझसे ये अपेक्षित था कि ऐसे प्रधानमंत्री और उसकी सरकार को बेशर्म कहूं जिसकी वजह से इस देश का एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हर रोज भय में जीता है, जिसे हर रोज डर लगता है कि शाम को सब्जी लेने जाऊंगा तो घर लौट भी पाऊंगा या नहीं या दाढ़ी और मुसलमान होने के कारण मारा जाऊँगा। मुझसे ये अपेक्षित था कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूँ जो लद्दाख में शहीद हुए 21 सैनिकों की शहादत की खबर को दबाए, और अपनी गद्दी बचाने के लिए ये कहकर दुश्मन देश को क्लीनचिट दे दे कि सीमा में कोई नहीं घुसा, न कोई विवाद हुआ है। देश को बाकी लोगों से पता चले कि हमारे जवानों की हत्या कर दी गई है।
किसी भी पार्टी, छात्र, मजदूर, शिक्षकों, शिक्षामित्रों, दलितों के संगठन अपना विरोध करने के लिए सड़क पर आएं और पुलिस लाठियों से उनकी कमर तोड़ दे। तब मुझसे ये अपेक्षित किया जाता है कि उस पुलिसिया जुल्म के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री को मैं कहूं कि वे ‘शेमलेस’ हैं। हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर आठ महीने तक सड़कों पर पड़े रहें, उनमें से सैंकड़ों बुजुर्ग धरनास्थल पर ही दम तोड़ दें, और प्रधानमंत्री कहें कि मैं केवल एक कॉल दूर हूं, तब एक नागरिक के रूप में मुझसे उम्मीद की जाती है कि मैं उस प्रधानमंत्री को शेमलेस कहूं।
ऐसी हजार बातें और सैंकड़ों घटनाएं हैं जिन पर इस देश के प्रधानमंत्री को शेमलेस ही नहीं, धूर्त, चोर और निर्दोष नागरिकों के अधिकारों को कुचलने वाला एक कायर तानाशाह कहा जाए। इसलिए मुझे अपने कथन का, अपने कहे का कोई दुःख नहीं है। इस बात का भान मुझे नौकरी के पहले दिन से था कि देर सबेर मुझसे इस्तीफा मांगा जाएगा या किसी भी मिनट पीएमओ आवास की एक कॉल पर निकाल दिया जाऊँगा। हर ट्वीट करते हुए जेहन में ये बात आती थी कि इसके बाद कहीं FIR न हो जाए, कहीं नोटिस न भेज दिया जाए… कैसे निपटूंगा उससे? ये जोखिम मन में सोचकर भी लिख देता था…
मैंने वही बातें कहीं जो मुझसे एक पत्रकार के रूप में ही नहीं एक सिटीजन के रूप में भी अपेक्षित थीं, जिसकी उम्मीद सिर्फ मुझसे नहीं की जाती, बल्कि एक दर्जी से भी की जाती है कि वर्षों में कमाए इस देश की स्वतंत्रता के लुटने पर तुम बोलोगे। ये अपेक्षा मुझसे ही नहीं की जाती, प्राइमरी में पढ़ाने वाले टीचर से भी की जाती है, विश्वविद्यालयों के कुलपति, मकान बनाने वाले राजमिस्त्री, सड़क पर टेंपो चलाने वाले ड्राईवर, पढ़ने वाले छात्रों, कंपनियों में काम करने वाले हर कर्मचारी से ये उम्मीद की जाती है कि हर रोज हो रही भीड़ हत्याओं पर वे बोलेंगे। मैंने अपना काम चुकाया, जहां रहा हर उस जगह कोशिश की कि आम इंसानों की बेहतरी के लिए कुछ लिख सकूं।
चूंकि उम्र और तजुर्बें में बच्चा हूं। करियर के शुरुआती मुहाने पर हूं। जहां से आगे का मुझे पता नहीं… शुरुआत में ही मेरे लिखे के बदले मेरा रोजगार छीन लिया गया तो अंदर से कभी कभी कुछ इमोशनल हो जाता हूं। ऐसे लगता है जैसे कोई छोटी सी चिड़िया किसी जंगल में आई और उड़ने से पहले ही उसके पंख कुतर दिए गए हों। पर ये भी जरूरी है। उस नन्हीं चिड़िया पर ये विकल्प था कि वो कुछ दिन बिना उड़े ही अपने घोंसले में रहे, चुप बैठे, कहीं भी उड़ने न जाए। पर उस चिड़िया ने अपने पंख कुतर जाना स्वीकार लिया, लेकिन ये नहीं कि वो उड़ना छोड़ देगी। जमीन पर पड़े उसके पंख इस बात के रूप में दर्ज किये जाएंगे कि कोई ऐसा शासन था जिसमें पंछियों के पंख कुतर लिए जाते थे। अगर वो चिड़िया उड़ना बंद कर घोसले में ही बैठी रहती तो ये पंख कभी दर्ज नहीं होते और पंख कुतरने वाले शासन का नंगा चेहरा कभी नजर नहीं आता। ऐसी नन्हीं चिड़ियों के कुतरे हुए पंख, उस जंगल पर राज करने वाले राजा का चेहरा दर्ज करने के लिए कागजात हैं। इसलिए मुझे दुःख नहीं, अफ़सोस नहीं….. संतुष्टि जरूर है कि मैं अपना हिस्सा चुका के जा रहा हूँ। बाकी अपने हर अच्छे बुरे में इन पंक्तियों से हिम्मत मिलती रहती है कि
”हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं…
देश भर में अपने शानदार काम के लिए चर्चित तेलंगाना के आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण स्वैच्छिक सेवानिवृति (रिटायरमेंट) लेने जा रहे हैं। उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और अपने विभाग को इस संबंध में आवेदन दे दिया है। आऱ.एस प्रवीण वर्तमान में सोशल वेलफेयर रेसिडेंसियल स्कूल के सेक्रेट्री पद पर हैं। आर.एस प्रवीण ने इसकी जानकारी ट्विटर के माध्यम से साझा की। अपने रिटायरमेंट की जानकारी देने के लिए लिखे गई चिट्टी को शेयर करते हुए उन्होंने लिखा-
“एक आईपीएस अधिकारी के रूप में मातृभूमि की सेवा करते हुए मुझे 26 वर्ष हो गए। अब मैंने अपनी गति से अधिक जोश के साथ सामाजिक न्याय और समानता के लिए अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आज आवेदन किया है। मैं अपने पूरे करियर में मेरे साथ खड़े रहने के लिए आप सभी का धन्यवाद करता हूं।”
After 26 years of serving the motherland as an IPS officer, I have applied today for voluntary retirement to pursue my passion for social justice and equality with more vigour at my own pace. I thank you all for standing by me throughout my career.🙏🏼 pic.twitter.com/IZM9Jztimd
— Dr. RS Praveen Kumar (@RSPraveenSwaero) July 19, 2021
गौरतलब है कि आर.एस प्रवीण ने अपनी मेहनत के बूते सोशल वेलफेयर स्कूल की तकदीर बदल दी थी। इसके लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली है। उनके काम को आधार बनाकर फिल्म निर्माता एवं अभिनेता राहुल बोस ने पूर्णा नाम की फिल्म बनाई थी। दक्षिणपंथी धारा के लोग अक्सर आर.एस. प्रवीण के काम से खुन्नस में रहते हैं और उन्हें घेरने की कोशिश में जुटे रहते हैं। पिछले दिनों भाजपा नेताओं ने एक कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश की थी, जिसके बाद उनके समर्थकों ने पूरे तेलंगाना में काफी विरोध प्रदर्शन किया और आर.एस. प्रवीण कुमार के समर्थन में उतर गए, जिसके बाद भाजपाईयों को अपने पैर पीछे खिंचने पड़े।
हम यहां दलित दस्तक के संपादक अशोक दास द्वारा आर.एस. प्रवीण का लिया गया इंटरव्यू भी दे रहे हैं, ताकि आप उनके काम को बेहतर तरीके से समझ सकें।
नोट- इस लिंक पर जाकर भी आप आर.एस. प्रवीण कुमार के काम के बारें में दलित दस्तक द्वारा की गई वीडियो स्टोरी को देख सकते हैं- telangana social welfare dalit dastak – YouTube
बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन करने की घोषणा कर दी है। इसकी शुरुआत बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र 23 जुलाई को अयोध्या से करेंगे। पहले चरण में 23 जुलाई से 29 जुलाई तक ब्राह्मण सम्मेलन होगा। सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में यह सम्मेलन जिलेवार किया जाएगा। निश्चित तौर यह चुनाव के पहले की जाने वाली कवायद है और इसे चुनावी कार्यक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा हर दल करती है और बसपा भी अपवाद नहीं है।
यहां सवाल यह है कि बसपा को इस सम्मेलन से मिलेगा क्या, और क्या ब्राह्मण समाज बसपा से जुड़ेगा और 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए बसपा को वोट करेगा? उत्तर प्रदेश में करीब 12 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता हैं। मीडिया में ब्राह्मणों का वर्चस्व है, और उन्होंने ऐसा प्रचारित कर रखा है कि यूपी में ब्राह्मण समाज जिस पार्टी को समर्थन करता है उसकी सरकार बन जाती है। हालांकि यह कितना सच है, इसका कोई रिसर्च मौजूद नहीं है। लेकिन जब यूपी में समाजवादी पार्टी जीतती है, तो यही मीडियाकर्मी हल्ला मचाते हैं कि वह ब्राह्मणों के वोट से जीती है, और जब बसपा की सरकार आती है तो शोर मचाया जाता है कि सपा को रोकने के लिए ब्राह्मणों ने बसपा की सरकार बना दी है। और जब भाजपा की सरकार बनती है तो ब्राह्मणों को भाजपा के पाले में बताया जाता है। इस तरह जीत चाहे जिस पार्टी की हो, प्रदेश में चाहे जिसकी सरकार बने मीडिया की अपनी ताकत से ब्राह्मण समाज खुद को सत्ता के साथ हमेशा जोड़े रखता है।
इस बार मीडिया का एक खेमा कह रहा है कि ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में भाजपा से और खासकर योगी सरकार से नाराज हैं और इसलिए गुस्साए ब्राह्मण योगी सरकार को गिराने के लिए किसी और राजनीतिक दल को वोट देंगे। ऐसे में सपा और बसपा दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी होने का दावा करते हुए ब्राह्मण वोटों के लिए ‘जय परशुराम’ का नारा लगा रहे हैं। बसपा का ब्राह्मण सम्मेलन इसी कड़ी में लिया गया फैसला है।
हालांकि विचारधारा के स्तर पर बसपा और सपा में एक बहुत बड़ा फर्क है। बहुजन समाज पार्टी जहां ब्राह्मण वोटों के लिए अपने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को केंद्र में रखते हुए सारी रणनीति बनाती है तो वहीं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद मंदिरों, मठों और धर्मगुरुओं के चक्कर लगाते दिखते हैं। दूसरी ओर बसपा प्रमुख मायावती ब्राह्मणों के वोट के लिए मंदिरों और मठों के चक्कर नहीं लगातीं। न ही उनके धर्मगुरुओं को बहुत भाव देती हैं। जिस कारण बहनजी ब्राह्मण वोटों के लिए रणनीति बनाते हुए भी दलित वोटों को अपने साथ जोड़े रखने में सफल रहती हैं।
अब सवाल है कि यूपी में ब्राह्मण वोट कितना महत्वपूर्ण है। निश्चित तौर पर 12 प्रतिशत वोटर किसी भी पार्टी के लिए एक बड़ा नंबर होता है और वह सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का माद्दा रखता है। और इसको भी खारिज नहीं किया जा सकता कि जब भी कोई दल सत्ता में आता है तो उसे कमोबेश हर जाति का समर्थन मिलता ही होगा। 2007 में बसपा ने प्रदेश की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर तलहका मचा दिया था। तब बसपा को तीस प्रतिशत वोट मिला था। 2017 विधानसभा चुनाव में 325 सीटों के साथ बीजेपी की सरकार बन गई थी।
ऐसे में अगर बसपा एक बार फिर से ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कवायद में जुटी है तो इसे एक चुनावी रणनीति के रूप में स्वीकार करना चाहिए। दरअसल चुनावी रणनीति बनाते समय राजनीतिक दलों को कई स्तरों पर सोचना पड़ता है। 2017 विधानसभा चुनावों के दौरान जब बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को जमकर टिकट दिया था, तो माना गया कि दलित और मुस्लिम वोटों के जरिए बसपा ने एक मजबूत समीकरण तैयार कर लिया है और तमाम सीटों पर जहां भाजपा और बसपा में सीधा मुकाबला होगा, वहां यादव सहित अन्य पिछड़े वर्ग का वोट भी बसपा को जाएगा। इसे एक बेहतरीन रणनीति माना गया था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और बसपा को झटका लगा था। इस बार बसपा ब्राह्मण वोटों को साधने की कवायद में जुटी है। इस रणनीति से बसपा ब्राह्मण समाज को कितना जोड़ पाएगी और उसके इस कदम की आलोचना होगी या फिर सराहा जाएगा; यह चुनाव बाद जीती गई सीटों के नंबर पर निर्भर करेगा।
पिछड़े वर्ग को NEET में आरक्षण नहीं मिलने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इसी क्रम में मंडल आर्मी नाम का संगठन 19 जुलाई को अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन करने की तैयारी में है। मंडल आर्मी ने आवेदन देकर संबंधित अधिकारियों से इसकी अनुमति मांगी है। मंडल आर्मी की ओर से डीसीपी दिल्ली, एसएचओ तिलक मार्ग थाना और एसएचओ संसद मार्ग के नाम से दिये गए आवेदन में कहा गया है कि – हम लोग माननीय सु्प्रीम कोर्ट द्वारा रिट पिटीशन संख्या 596 (215) सलोनी कुमारी बनाम डायरेक्टर जनरल हैल्थ सर्विसेज और अन्य मामले में छह वर्षों से फैसला नहीं सुनाए जाने की वजह से केंद्र सरकार द्वारा NEET ऑल इंडिया कोटा में राज्यों को ओबीसी आरक्षण न देने की वजह से प्रति वर्ष पिछड़ा वर्ग को मेडिकल में हजारों सीटों के नुकसान को लेकर 19 जुलाई 2021 दिन सोमवार की सुबह साढ़े दस बजे संवैधानिक दायरे में रहकर एवं कोविड नियमों का पूर्णतया पालन करते हुए बेहद शांतिपूर्ण ढंग से सुप्रीम कोर्ट के सामने भगवानदास मार्ग पर धरना प्रदर्शन करने आ रहे हैं, जिससे किसी को भी कोई परेशानी नहीं होगी।
इस आवेदन को ट्विट करते हुए सोशल एक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने इसका समर्थन किया है। उन्होंने वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी की सभा का जिक्र करते हुए कहा किजब प्रधानमंत्री हज़ारों लोगों की जनसभाएं कर रहे हैं तो पुलिस किस मुँह से आपको मना करेगी? @DelhiPolice इजाजत दीजिए प्लीज़। ओबीसी हितों का सवाल है। देश की आधी से ज़्यादा आबादी उनकी है।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले तमाम दल अपनी-अपनी रणनीति को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं। एक-दूसरे की काट के लिए सभी दल बेहतर रणनीति बनाने की कवायद में जुटे हैं। यूपी की सियासत की बात करें तो यहां मुकाबला बसपा, समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच होना है। बहुजन समाज पार्टी जहां 2007 के फार्मूले पर चलने की रणनीति तैयार कर रही है तो वहीं समाजवादी पार्टी ने दलितों के वोट हासिल करने के लिए अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा फेरबदल किया है।
खबर है कि समाजवादी पार्टी लोहिया की तर्ज पर ही बाबासाहब के नाम से वाहिनी बनाने जा रही है। इसके साथ ही आगामी यूपी चुनाव के लिए सपा का चुनावी समीकरण MY यानी मुस्लिम यादव नहीं बल्कि MYD यानी मुस्लिम, यादव और दलित होने की बात सामने आ रही है। इस कवायद की बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जातियों को साधना है, खासकर उन जातियों को जो बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर में आस्था रखती हैं। दलित समाज के वोटों को साधने के लिए समाजवादी पार्टी ‘लोहिया वाहिनी’ की ही तर्ज पर ‘बाबासाहब वाहिनी’ का गठन करने जा रही है। बताया जा रहा है कि इसकी रुपरेखा काफी हद तक तय भी हो चुकी है।
समाजवादी पार्टी के भीतर से जो सूचना आ रही है, उसके मुताबिक सपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस वाहिनी का नेतृत्व उस दलित नेता के हाथ में देना चाहता है जो काफी ज्यादा पढ़ा-लिखा हो और दलित समाज के मुद्दों को समझता हो।
दरअसल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की इस कवायद के पीछे सोची-समझी रणनीति है। सपा ने पिछले दिनों में खुद को काफी बदला है। खासकर समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है। निश्चित तौर पर यह सपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। देखना होगा कि सपा की इस कवायद को दलित समाज कैसे लेता है और उस पर कितना यकीन करता है। तो वहीं यह भी देखना होगा कि समाजवादी पार्टी दलितों को सपा में कितना जोड़ पाती है।
वक्त-वक्त पर सफलता की ऐसी मिसाल सामने आती है, जो इस बात पर मुहर लगाती है कि इंसान अगर कुछ हासिल करना चाहे और उसके लिए ईमानदारी से कोशिश करे तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। राजस्थान के जोधपुर में एक महिला सफाईकर्मी ने इतिहास रच दिया है। कल तक सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली महिला अपनी लगन और मेहनत से जोधपुर म्युनिसिपल कारपोरेशन की एसडीएम बन गई है। शानदार सफलता हासिल कर मिसाल पेश करने वाली महिला का नाम आशा कंण्डारा है और वह वाल्मीकि समाज से ताल्लुक रखती हैं। राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आर एस 2018 में उसका चयन हो गया है। आशा की सफलता की चर्चा पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान में हो रही है, और अब उनकी सफलता देश भर में चर्चा का विषय बन गया है।
लेकिन आशा को सबकुछ तुक्के से नहीं मिल गया, बल्कि आशा ने अपनी हिम्मत से सफलता की यह इबारत लिखी है। आशा की कहानी शुरू होती है जोधपुर की उन सड़कों से जिसकी वह सफाई किया करती थी। सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते हुए आशा नगर निगम के अफसरों को देखा करती थीं और मन ही मन उसने ठान लिया कि उसे भी अफसर बनना है।
आशा ने सिलेबस का पता किया और तैयारी शुरू कर दी। आशा के साथ हमेशा किताबें होती थी, और जैसे ही उसे खाली समय मिलता, वह पढ़ने बैठ जाती थी। चाहे जोधपुर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की सीढ़ियां हो या कहीं सड़क किनारे… खाली वक्त में आशा का एक ही काम था… पढ़ाई करना। और उन्हीं किताबों के जादू ने आशा की जिंदगी में जादू कर दिया और वह जिस जिले की सड़कों पर झाड़ू लगाती थी, वहीं अब अधिकारी बन कर अपनी गाड़ी से गुजरती हैं।
हालांकि आशा की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। आठ साल पहले उनका पति से झगड़ा हुआ, जिसके बाद दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आशा पर थी। बच्चों को और खुद को जिंदा रखने के लिए आशा नगर निगम में झाड़ू लगाती थी। सफाई कर्मचारी के रुप में नियमित तौर पर नियुक्ति के लिए आशा ने दो सालों तक नगर निगम से लड़ाई लड़ी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। आशा निराश थी, लेकिन उसने हौंसला नहीं छोड़ा… लड़ना नहीं भूली। और आखिरकार आशा को एक ओर जहां नगर निगम की ओर से सफाई कर्मचारी के रूप में नियमित नियुक्ति मिल गई। तो वहीं राज्य प्रशासनिक सेवा में भी चयन हो गया और अब वह एसडीएम बन गई हैं।
निश्चित तौर पर आशा की सफलता लाखों युवाओं को प्रेरणा देने वाली है। खासकर उस वाल्मीकि समाज के युवाओं को, जो झाड़ू और कलम के बीच के अंतर को नहीं समझ पाते हैं। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सहित तमाम बहुजन नायक हमेशा कहते रहे हैं कि वंचितों-शोषितों का जीवन सिर्फ शिक्षा से ही बदल सकता है। आशा की सफलता इस पर मुहर लगाती है।
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक पार्टियां सियासी समीकरण और गठजोड़ बनाने में जुटी हुई हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कोई कोर कसर बाकी छोड़ने के मूड में नहीं हैं। यही वजह है कि बहनजी लखनऊ में डटी हुई हैं और 2022 की सियासी जंग फतह करने के लिए रणनीति तैयार कर रही हैं, जिसके आधार पर बसपा अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेगी।
बहनजी ने इस बार यूपी विधानसभा चुनाव के लिए जिला कोआर्डिनेटरों के बदले मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाया है। इन्हीं के जरिए बहनजी 2022 में विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों का चयन करेंगी। इस बार बसपा की रणनीति हर जिले से एक या दो ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट देने की है। ओबीसी की तमाम जातियां हैं और बसपा प्रमुख इन सभी को क्षेत्र के हिसाब से टिकट देने के मूड में हैं। उत्तर प्रदेश में पचास फीसदी पिछड़ी जाति के मतदाता हैं जो सियासी तौर पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सामान्य जाति के उम्मीदवारों में बसपा सबसे ज्यादा ब्राह्मण मतदाताओं को मौका देने के मूड में दिख रही है।
साल 2007 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में बसपा ने 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर सत्ता में शानदार तरीके से वापसी की थी। तब बसपा को 30 फीसदी वोट मिले थे। इस बार फिर बहनजी वही दांव चलने की तैयारी में हैं। तब बसपा ने जहां अपने प्रत्याशियों की घोषणा चुनाव से एक साल पहले ही कर दी थी, तो वहीं टिकटों के बंटवारे में पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यक वर्ग और सामान्य जातियों को साथ लेकर एक साझी रणनीति बनाई गई थी। सर्वसमाज को साथ लेकर चलने के कारण ही बहुजन समाज पार्टी ने शानदार सफलता दर्ज की थी। खबर है कि अगस्त और सितंबर के आखिरी महीने में बसपा की ओर से लगभग 200 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी जाएगी, जबकि बाकी उम्मीदवारों की घोषणा अक्टूबर के आखिर तक किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण कानून पेश होने के बाद ही इस पर बहस जारी है। इस बीच उत्तर प्रदेश से आ रही खबर के मुताबिक यदि जनसंख्या नियंत्रण कानून के भीतर विधायकों को लाया जाएगा तो भाजपा के आधे विधायकों की विधायकी चली जाएगी। यानी उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरिकरण और कल्याण) विधेयक, 2021 के प्रावधानों को राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी लागू कर दिया जाए तो खुद बीजेपी के ही 50% विधायक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित हो जाएंगे।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की वेबसाइट पर कुल 397 विधायकों की प्रोफाइल अपलोड है। इनमें 304 विधायक बीजेपी के हैं। इनके प्रोफाइल बताते हैं कि 152 यानी बिल्कुल आधे विधायकों को दो से ज्यादा बच्चे हैं। जनसंख्या नियंत्रण पर प्राइवेट मेंबर बिल पेश करने वाले गोरखपुर से लोकसभा सांसद रवि किशन खुद चार बच्चों के पिता हैं। उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण पर जारी अपने मसौदा विधेयक में दो बच्चों से अधिक के माता-पिता को स्थानीय चुनाव लड़ने, सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए आवदेन देने और सरकारी सब्सिडी पाने के अधिकार से वंचित करने का प्रावधान किया है।
कोरोना महामारी के दौरान तमाम लोगों ने जरूरतमंदों की ओर मदद का हाथ बढ़ाया। जब कोविड की मार अपने चरम पर था, लोग एक-दूसरे की मदद के लिए सामने आए। खास कर कई लोगों ने उस बच्चों की मदद करने का बीड़ा उठाया है, जो अपने अपनों को खो चुके हैं। इन्हीं में से एक हैं मुंबई पुलिस की रहीना शेख बगवान, जिन्होंने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के 50 आदिवासी बच्चों को गोद लिया है। उन्होंने तय किया है कि वह इन बच्चों की दसवी तक की शिक्षा की जिम्मेदारी लेंगी। हाल ही में जब मुंबई पुलिस के आयुक्त हेमंत नागराले ने उन्हें उत्कृष्टता प्रमाण पत्र से सम्मानित किया, तब जाकर इस बात की खबर फैली। 40 वर्षीय रहीना शेख बगवान को ‘मदर टेरेसा’ के नाम से भी जाना जाता है।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, रेहाना साल 2000 में एक कांस्टेबल के रूप में पुलिस बल में शामिल हुई थीं और जरूरतमंदों और दलितों के लिए काम करने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं। बच्चों को गोद लेने के बारे में बताते हुए रेहाना ने कहा कि पिछले साल जब वे अपनी बेटी का जन्मदिन मनाने वाले थे, तब उन्हें रायगढ़ के वाजे तालुका में ज्ञानी विद्यालय के बारे में पता चला और उन्होंने प्रिंसिपल से बात करने का फैसला किया जिसके बाद उन्हें स्कूल में आमंत्रित किया गया। स्कूल। इस स्कूल के ज्यादातर बच्चे काफी गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं। इनकी गरीबी का आलम यह था कि उनमें से कुछ के पास जूते भी नहीं थे। इसके बाद रेहीना और उनके परिवार ने अपनी बेटी के जन्मदिन और ईद की खरीदारी के लिए बचाई गई रकम का इस्तेमाल उन बच्चों की मदद करने के लिए किया। इस तरह वह बच्चों से जुड़ गईं।
रहीना एक बॉलीवाल खिलाड़ी हैं और उन्होंने साल 2017 में श्रीलंका में आयोजित एक प्रतियोगिता में पुलिस बल का प्रतिनिधित्व करते हुए खेलों में रजत और स्वर्ण पदक भी जीता था।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश के आदिवासी इलाकों में विकास की विभिन्न योजनाओं के लिए 100 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री गहलोत ने जनजाति जनभागीदारी योजना के लिए 10 करोड़ रुपये, मारवाड़ संभाग के जनजाति समुदाय के उन्नयन कार्यक्रम के लिए 15 करोड़, सामुदायिक वन अधिकार क्षेत्र के विकास के लिए 10 करोड़, आवासीय विद्यालयों में क्षमता विकसित करने के लिए 10 करोड़, कुपोषण, टीबी, सिकल सेल्स के रोगियों को चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 5 करोड़ रुपये की मंजूरी दी। इसके अलावा आवासीय विद्यालय और छात्रावासों की रैंकिंग सुधार और सुविधाओं के विकास के लिए 10 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी है।
इसी प्रकार मुख्यमंत्री ने टीआरआई प्रांगण में जनजाति म्यूजियम के विकास के लिए 3 करोड़, खेल छात्रावासों को खेल अकादमी में क्रमोन्नत करने और नवीन खेल अकादमी के निर्माण के लिए 5 करोड़, आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन निर्माण के लिए 10 करोड़, डेयरी, पशुपालन, कृषि, उद्यानिकी, कुसुम, कौशल उन्नयन के माध्यम से जनजाति परिवारों की आय संवर्द्धन के लिए 10 करोड़ और विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता, कोचिंग, गेस्ट फेकल्टी सहित अन्य गतिविधियों के लिए 12 करोड़ रुपए की सैद्धांतिक मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री की इस मंजूरी से जनजाति क्षेत्र विकास की योजनाओं को गति मिलने के साथ ही इन क्षेत्रों के निवासियों के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक उन्नयन में मदद मिल सकेगी।
दरअसल आदिवासी क्षेत्र के नेताओं ने सरकार पर पिछले दिनों यह आरोप लगाया था कि सरकार आदिवासी क्षेत्र के लोगों के साथ उपेक्षा कर रही है। इसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह निर्णय लिया है। हालांकि यह अभी एक घोषणा है। प्रदेश के आदिवासी नेताओं और एक्टिविस्ट को यह देखना होगा कि प्रदेश सरकार द्वारा जारी की गई राशि सही जगह खर्च हो रही है या नहीं। फिलहाल इन दिनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान में हो रहे दलित उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर दलित और आदिवासी समाज के निशाने पर हैं।
मंत्रिमंडल में शामिल करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ज्यातिरादित्य सिंधिया पर एक बार फिर से मेहरबान हैं। सोमवार को कैबिनेट समितियों का पुनर्गठन हुआ, जिसके बाद नई समितिययों में ज्योतिरादित्य सिंधिया, सर्बानंद सोनोवाल और मनसुख मांडविया को जगह दी गई है। राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति में भूपेंद्र यादव, सर्बानंद सोनोवाल और मनसुख मांडविया को जगह दी गई है। इसके अलावा गिरिराज सिंह और स्मृति इरानी भी इस समिति का हिस्सा हैं। इन नेताओं को रामविलास पासवान, रविशंकर प्रसाद और हर्षवर्धन जैसे नेताओं की जगह पर शामिल किया गया है।
इन्वेस्टमेंट और ग्रोथ पर निगरानी रखने वाली समिति में ज्योतिरादित्य सिंधिया, नारायण राणे और अश्विनी वैष्णव को शामिल किया गया है। यह समिति महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को समयबद्ध पूरा करने और अन्य कामों पर नजर रखती है। 1,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक के निवेश के मामलों पर यह कमिटी फैसला लेती है। यह कमिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और अन्य मामलों पर फैसले लेती है।केंद्र और राज्य सरकार से जुड़े मामलों में इस समिति की अहम भूमिका होती है। आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर फैसला लेने में भी इस समिति की राय अहम होती है।
मोदी सरकार की ओर से 2019 में दो नई समितियों का गठन किया गया था- इन्वेस्टमेंट और ग्रोथ एवं रोजगार एवं स्किल डिवेलपमेंट। अश्विनी वैष्णव और भूपेंद्र यादव को रोजगार एवं स्किल डिवेलपमेंट पर बनी कमिटी में शामिल किया गया है। संसदीय मामलों पर की कैबिनेट कमिटी में नए बने कानून मंत्री किरेन रिजिजू, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर, सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार और आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा को शामिल किया गया है। यह समिति संसद सत्रों के शेड्यूल और पेश किए जाने वाले बिलों को लेकर फैसला लेती है।
अगले साल 2022 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बसपा ने नया फार्मूला तैयार किया है। ऐसी चर्चा है कि बसपा प्रमुख मायावती इस बार पिछले चुनावों से अलग फार्मूला तैयार कर रही हैं। इस नए फार्मूले में मुख्य सेक्टर प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होने की बात कही जा रही है। टिकट बंटवारे को लेकर एक सूचना यह भी सामने आ रही है कि पार्टी प्रदेश चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने से पहले ही टिकटों का ऐलान कर सकती है।
दरअसल आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर जिस नए फार्मूले की बात कही जा रही है, उसके मुताबिक बसपा ने इस बार टिकट बंटवारे को लेकर जिला कोऑर्डिनेटर के बजाय मुख्य सेक्टर प्रभारियों से नामों का पैनल मांगेगी। इसी के आधार पर ही पार्टी टिकट का बंटवारा करेगी। खबर यह भी है कि बहनजी अपनी चुनावी रणनीति के तहत ब्राह्मणों और ओबीसी के उम्मीदवारों को टिकट बंटवारे में प्राथमिकता देगी। ब्राह्मणों पर दांव लगाने का कारण यह है कि पार्टी का मानना है कि ब्राह्मण समाज योगी आदित्यनाथ की सरकार से नाराज है। चर्चा है कि चुनाव मैदान में ज्यादा से ज्यादा युवा उम्मीदवारों को मौका दिया गया है। साफ है कि बहुजन समाज पार्टी और उसकी मुखिया बहन मायावती प्रदेश में 2022 के विधान सभा चुनाव के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में चुनावी अधिसूचना से पहले ही टिकटों का बंटवारा करने की रणनीति की बात करें तो अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर बसपा के उम्मीदवारों को चुनाव की तैयारी करने के लिए ज्यादा वक्त मिल जाएगा। ऐसी स्थिति में इस बार बसपा सितंबर-अक्टूबर में पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर सकती है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि बसपा द्वारा जल्दी अपना पता खोलने के कारण अन्य दलों को अपनी रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नई जनसंख्या नीति 2021-30 जारी कर दी है। रविवार को एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी ने इसका ऐलान करते हुए कहा कि पूरी दुनिया में बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या विकास में बाधा है। सीएम ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए जागरूकता जरूरी है।
इस दौरान सीएम योगी ने कहा कि जहां जनसंख्या नीति लागू है, वहां अच्छे परिणाम दिखे। जनसंखया नियंत्रण का मकसद प्रदेश में खुशहाली लाना है। सीएम योगी ने कहा कि नई जनसंख्या नीति में हर वर्ग का ध्यना रखा गया है। सीएम योगी ने कहा कि दो बच्चों के बीच उचित अंतराल नहीं होगा तो उसके पोषण पर असर पड़ेगा। हर तबके को इसके साथ जोड़ना पड़ेगा, तभी यह सफल हो पाएगा।
इससे पहले सीएम योगी ने विश्व जनसंख्या दिवस पर कहा कि बढ़ती हुई जनसंख्या समाज में व्याप्त असमानता समेत प्रमुख समस्याओं का मूल है। उन्होंने इस ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ पर लोगों से जनसंख्या से बढ़ती समस्याओं के प्रति स्वयं व समाज को जागरूक करने का प्रण लेने की अपील की। उन्होंने बढ़ती जनसंख्या को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि प्रदेश के विकास के लिए इसकी वृद्धि दर को नियंत्रित करना जरूरी है। सभी लोगों को बेहतर सुविधा देने के लिए जनसंख्या घनत्व को कम करना होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि छोटा परिवार ही खुशहाली का आधार हो सकता है। हालांकि जनसंख्या नीति के ऐलान के साथ इसके पक्ष-विपक्ष में बहस शुरू हो गई है।
हाल ही में पंजाब के पटियाला में 60वीं नेशनल इंटरस्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैम्पियनशिप 2021 (25-29 जून 2021) आयोजित हुई। इस नेशनल एथेलेटिक्स प्रतियोगिता में 10 हजार मीटर दौड़ में पूजा तेजी पहले स्थान पर रही और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। पूजा ने 35 मिनट 29 सेकेंड में यह दौड़ पूरी की। पूजा राज्स्थान के झालावाड़ा की रहने वाली हैं। पूजा राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर की अनेक प्रतियोगिताओं और मैराथन में कई मेडल जीत चुकी हैं। जितनी तेज रफ्तार पूजा तेजी की है उतना ही कड़ा संघर्ष पूजा तेजी ने अपने जीवन में भी किया है।
पूजा के जीत की खास बात यह रही कि उसने बिना किसी कोच के अपने दम पर यह पदक जीता। साथ ही साबित कर दिया कि भारत के ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। वैसे पूजा अपना कोच उत्तरप्रदेश के लोंग रनर लव चौधरी को मानती है ओर बताती है की मुझे किसी भी प्रकार के गाइड की आवश्यकता होती थी तो लव चौधरी सर ही मुझे गाइड करते हैं। पूजा बताती है कि वह रोजाना 10 घंटे प्रैक्टिस में बिताती है। इसमें सुबह 4 बजे से 10 बजे तक तथा शाम को 4 से 8 बजे तक रोज प्रैक्टिस करती हैं। पूजा के परिजनों ने बताया कि वो शुरू से ही बहुत मेहनती थी। रोज सुबह जल्दी उठकर प्रैक्टिस किया करती थी। लॉक डाउन में खेल संकुल बंद होने के कारण पूजा को भवानीक्लब अन्य जगह पर प्रैक्टिस करना पड़ा था। पूजा बताती है की लॉकडाउन में मेरे जुनून को देखते हुए पुलिसकर्मियों का सहयोग मिला मुझे लॉक डाउन मे परेशानी नहीं आने दी गई।
पूजा ने इस सफलता का श्रेय पहले माता–पिता को दिया। जिन्होंने इतनी मुश्किलों और पैसों की कमी के बावजूद भी कभी प्यार में कमी नहीं आने दी और मुझे हमेशा सपोर्ट किया। मुझे बिना किसी रोक टोक के हमेशा मोटिवेट किया ताकि में अपने सपने पूरे कर सकूं। मेरी जिंदगी में मेरा सबसे बड़ा मोटिवेशन ही मेरे माता – पिता रहे हैं। इनके बाद पूजा राम मेहर को सबसे नजदीकी दोस्त मानती है पूजा कहती है की राम मेहर ने मेरा दुख सुख मे साथ दिया है।
पूजा के पिता की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी और पूजा को आगे की तैयारी के लिए पैसों की आवश्यकता थी। पूजा ने पूर्व में 10 किलोमीटर की मैराथन जीती थी जिससे खुश होकर पूजा को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय व्यवसाय जुगनू चौधरी ने एक लाख रुपये का सहयोग दिया जिससे इस मुकाम तक पंहुचना संभव हो सक।
राजस्थान के झालावाड़ शहर के बस स्टैंड के पास बाल्मीकी मोहल्ले की रहने वाली पूजा तेजी का जन्म 07 जुलाई 1994 को दीनदयाल तेजी के घर पाँचवी संतान के रूप में हुआ। पूजा से बड़े दो भाई (सूरज, आकाश) एवं तीन बहने (किरण, कोमल,पूजा) पूजा सबसे छोटी पुत्री है। पूजा की शैक्षिक योग्यता दसवीं पास है। पूजा ने खुद के जुनून के लिए अपने दलित समाज और परिवार की बेड़ियों को तोड़ा। अपने सपनों को पूरा करने के लिए पूजा ग्राउंड में भागते-भागते झालावाड़ ही नहीं बल्कि राजस्थान में बड़ा नाम बन चुकी है। इसके अलावा पिछले 3 साल से झालावाड़ के लिए एथलेटिक्स में राजस्थान स्तर पर मेडल ला रही है। पूजा ने राज्य स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया और तेलंगाना, मथुरा, हैदराबाद और चंडीगढ़ जाकर भी उन्होंने मैडल जीता है।
पूजा ने एथलेटिक्स में अब तक चार गोल्ड व दो सिल्वर मैडल जीत चुकी
1. CROSS COUNTRY (10 KM) Alwar 10 Km, 30 Dec. 2018 Sunday (Gold Medal)
2. CROSS COUNTRY Dholpur 10 Km, 10 Nov. 2019 Sunday (Gold Medal)
3. CROSS COUNTRY Dholpur, 10 Km 11 Feb. 2021 Tuesday (Gold Medal)
4. Rajasthan State Sr. Athletics Shri Ganga nagar, 10 Km 13 April. 2021 (Silver Medal)
5. Rajasthan State Sr. Athletics Shri Ganga nagar, 5 Km 14 April. 2021 (Silver Medal)
6. 60th National Inter State Sr. Athletics Championships Shi Ganganagar, 10 Km 28 June. 2021 (Gold Medal)
पूजा का सपना नेशनल लेवल पर व ओलंपिक में देश के लिए गोल्ड मेडल लाकर दिखाने का है। हालांकि प्रतिभा होने के बावजूद कई बार आर्थिक बेड़ियां पूजा का रास्ता रोक देती हैं। पूजा ने आर्थिक सहयोग की अपील की है। उनका कहना है कि अगर मुझे आर्थिक सहयोग मिले तो मुझे और बेहतर प्रदर्शन कर समाज और देश का नाम ऊंचा करने में सहूलियत होगी।
AC Name- POOJA HARIJAN
AC NO- 1277104000057345
BANK-IDBIBANK, JHALAWAR, RAJASTHAN
IFSC-IBKL0001277
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झालावाड़ से विष्णु दयाल रैगर की रिपोर्ट
(लेखक -मुस्ताअली बोहरा) तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और अयोध्या मंदिर के बाद मोदी सरकार का अगला कदम यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करने का है। कामन सिविल कोड के बाद केन्द्र की भाजपा सरकार एनआरसी को पूरे देश में लागू करेगी। समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट भी वक्त-वक्त पर टिप्पणी कर चुका है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता का समर्थन किया है और केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक भारतीय समाज धीरे-धीरे सजातीय हो रहा है, धर्म, समुदाय और जाति की पारंपरिक बाधाएं खत्म हो रही है, और इन बदलावों के मद्देनजर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है।
हालांकि, केंद्र की बीजेपी सरकार अपने पहले ही कार्यकाल से यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की कोशिश कर करती रही है। तीन तलाक और 370 की तरह यूनिफॉर्म सिविल कोड को भी विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा था लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दरअसल, राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं है। इसे भी राजनीति से प्रेरित इसलिए माना जा रहा है क्योंकि मोदी सरकार के अब तक फैसलों से यही परिदृश्य उभरकर सामने आ रहा है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370, नोटबंदी आदि की तरह ही समान नागरिक संहिता को भी छदम देशभक्ति से जोडकर देखा जाएगा। आपको बता दें कि देश में तमाम मामलों में यूनिफॉर्म कानून हैं, लेकिन शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर अभी भी फैसला पर्सनल लॉ के हिसाब से फैसला होता है। यह मसला ऐसे समय में उठा है जब केंद्र की मोदी सरकार तीन तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसला ले चुकी है। बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहले से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत करते आए हैं।
दरअसल, केन्द्र की सत्त्सीन सरकार अपने उस एजेण्डे पर आगे बढ रही है जिसका उसने वादा किया था। केन्द्र सरकार पूरे देश में एक संविधान लागू करना चाहती है यानि हर शख्स के लिए एक ही कानून फिर चाहे वह किसी भी मजहब का हो। तीन तलाक को खत्म कर केन्द्र सरकार ने समान नागरिक संहिता की ओर कदम बढा दिए हैं। इसके बाद राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानि एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा जो अभी असम में लागू है। समान नागरिक संहिता के लिए ठीक वैसा ही माहौल तैयार हो रहा है जैसा पहले तीन तलाक और फिर अनुच्छेद 370 को लेकर हुआ था।
समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है विवाह, तलाक, संपत्ति बटवारे, उत्तराधिकार और बच्चा गोद लेने जैसे मामलों में सभी लोगों के लिए एक जैसे ही नियम। यानि जाति-धर्म अथवा परंपरा के आधार पर किसी को कोई रियायत नहीं मिलेगी। यहां बता दें कि देश में धर्म और परंपरा के नाम पर अलग नियमों का प्रचलन है। जैसे किसी समुदाय में पुरुषों को एक से ज्यादा शादी करने की इजाजत है तो कहीं-कहीं विवाहित महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देने की परंपरा है। ऐसे मामलों में पर्सनल लॉ के हिसाब से निर्णय लिया जाता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रक्रिया के तहत तलाक के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है लेकिन महिला को 4 महीने 10 दिन तक यानी इद्दत पीरियड पूरा होने तक इंतजार करना होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ चार शादियों की इजाजत देता है, जबकि हिंदू सहित अन्य धर्मों में एक शादी का नियम है।
शादी की न्यूनतम उम्र क्या हो? इस पर भी अलग-अलग व्यवस्था है। मुस्लिम लड़कियां जब शारीरिक तौर पर बालिग हो जाएं (पीरियड आने शुरू हो जाएं) तो उन्हें निकाह के काबिल माना जाता है। अन्य धर्मों में शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल है। जहां तक तलाक का सवाल है तो हिंदू, ईसाई और पारसी में कपल कोर्ट के माध्यम से ही तलाक ले सकते हैं, लेकिन मुस्लिम धर्म में तलाक शरीयत लॉ के हिसाब से होता है। हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत हिंदू कपल शादी के साल भर बाद तलाक की अर्जी आपसी सहमति से डाल सकते हैं। अगर पति को असाध्य रोग हो या वह संबंध बनाने में अक्षम हो तो शादी के तुरंत बाद तलाक की अर्जी दाखिल की जा सकती है। क्रिश्चियन कपल शादी के दो साल बाद तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते है उससे पहले नहीं।
1954-55 में विरोध के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हिन्दू कोड बिल लाए। इसके आधार पर हिन्दू विवाह कानून और उत्तराधिकार कानून बने। मतलब हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के लिए शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे नियम संसद ने तय कर दिए। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों को अपने-अपने धार्मिक कानून यानी पर्सनल लॉ के आधार पर चलने की रियायत दी गई। ऐसी छूट नगा सहित कई आदिवासी समुदायों को भी हासिल है, वो अपनी परंपरा के हिसाब से चलते हैं। यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद भी निकाह या विवाह की रस्म मौलवी या पंडित अदा करवाते रहेंगे, ये परंपराएं जारी रहेंगी।
यूनिफॉर्म सिविल कोड के विरोध में कहा जा रहा है कि ये सभी धर्मों पर हिंदू कानून को लागू करने की तरह है। मुस्लिम समुदाय के लोग तीन तलाक की तरह इस पर भी तर्क देते हैं कि वह अपने धार्मिक कानूनों के तहत ही मामले का निपटारा करेंगे। अभी कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। दूसरी तरफ कॉमन सिविल कोड के समर्थकों का कहना है कि सभी के लिए कानून एक समान होने से देश में एकता बढ़ेगी।
शाह बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, विवादित विचार धाराओं से अलग एक कॉमन सिविल कोड होने से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा। इसी केस में अदालत ने गुजारा भत्ता दिए जाने का आदेश दिया था। सरला मुदगल केस में कोर्ट ने कहा था, जब 80 फीसदी लोग को पर्सनल लॉ के दायरे में लाया गया है कि तो सभी नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड न बनाने का कोई औचित्य नहीं है। अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई तलाक कानून में बदलाव की मांग वाली याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था, देश में अलग अलग पर्सनल लॉ की वजह से भ्रम की स्थिति बनी रहती है। सरकार चाहे तो एक जैसा कानून बना कर इसे दूर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने लॉ कमीशन को मामले पर रिपोर्ट देने के लिए कहा था। लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यूनिफार्म सिविल कोड और पर्सनल लॉ में सुधार पर सुझाव दिए। लोगों से बात की और कानूनी, सामाजिक स्थितियों की समीक्षा के आधार पर लॉ कमीशन ने कहा कि अभी समान नागरिक संहिता लाना मुमकिन नहीं है। इसकी बजाय मौजूदा पर्सनल लॉ में सुधार किया जाना चाहिए। मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता में संतुलन बनाया जाए। पारिवारिक मसलों से जुड़े पर्सनल लॉ को संसद कोडिफाई करने पर विचार करे। सभी समुदायों में समानता लाने से पहले एक समुदाय के भीतर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में समानता लाने की कोशिश हो।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने कहा कि अदालतों को बार-बार पर्सनल लॉ कानूनों में उत्पन्न होने वाले संघर्षों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, भारत के युवाओं को जो अलग समुदायों, जातियों या जनजातियों में शादी करते हैं, उन्हें अलग-अलग पर्सनल लॉ में होने वाले टकरावों से उत्तपन्न मुद्दों से जूझने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, खासकर शादी और तलाक के मामलों में। दिल्ली हाई कोर्ट की जज ने कहा कि भारत में समान नागरिक संहिता, संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत परिकल्पित है, सुप्रीम कोर्ट की ओर से समय-समय पर दोहराया गया है। कोर्ट ने कहा, ऐसा सिविल कोड सभी के लिए एक जैसा होगा और शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामले में समान सिद्धांतों को लागू करेगा। कोर्ट ने कहा कि इससे समाज में झगड़े और विरोधाभासों में कमी आएगी, जो कि अलग-अलग पर्सनल लॉ की वजह से उत्पन्न होते हैं।
विदित हो कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मार्च में केंद्र सरकार से भारत में धर्म-तटस्थ विरासत और उत्तराधिकार कानून को लेकर जवाब मांगा था। सर्वोच्च अदालत में वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्विनी उपाध्याय सर्वोच्च अदालत में इस तरह की पांच याचिकाओं को स्वीकार कराने में सफल रहे हैं, इसे देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
विधिवेत्ताओं के अनुसार अनुच्छेद 44 पर बहस के दौरान बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था, व्यवहारिक रूप से इस देश में एक नागरिक संहिता है, जिसके प्रावधान सर्वमान्य हैं और समान रूप से पूरे देश में लागू हैं। लेकिन विवाह-उत्तराधिकार का क्षेत्र ऐसा है, जहां एक समान कानून लागू नहीं है। इसके लिए हम समान कानून नहीं बना सके हैं। उन्होंने कहा था कि इस दिशा में भी धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव लाया जाए।
बहरहाल, तीन तलाक, अयोध्या मंदिर, अनुच्छेद 370 के बीच देश से कई अहम मसले गायब हो गए जो लोकसभा चुनाव के दौरान चर्चाओं में थे। बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, शिक्षा-स्वास्थ्य, गरीबी आदि मुददों की बजाए कामन सिविल कोड, एनआरसी और जनसंख्या नियंत्रण कानून बडा मुददा बनकर उभरेगा।
लेखक मुस्ताअली बोहरा पेशे से अधिवक्ता हैं, जन मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं।