सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली वाल्मीकि महिला बनी नगर निगम की SDO

वक्त-वक्त पर सफलता की ऐसी मिसाल सामने आती है, जो इस बात पर मुहर लगाती है कि इंसान अगर कुछ हासिल करना चाहे और उसके लिए ईमानदारी से कोशिश करे तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। राजस्थान के जोधपुर में एक महिला सफाईकर्मी ने इतिहास रच दिया है। कल तक सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली महिला अपनी लगन और मेहनत से जोधपुर म्युनिसिपल कारपोरेशन की एसडीएम बन गई है। शानदार सफलता हासिल कर मिसाल पेश करने वाली महिला का नाम आशा कंण्डारा है और वह वाल्मीकि समाज से ताल्लुक रखती हैं। राजस्थान प्रशासनिक सेवा में आर एस 2018 में उसका चयन हो गया है। आशा की सफलता की चर्चा पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे राजस्थान में हो रही है, और अब उनकी सफलता देश भर में चर्चा का विषय बन गया है।

लेकिन आशा को सबकुछ तुक्के से नहीं मिल गया, बल्कि आशा ने अपनी हिम्मत से सफलता की यह इबारत लिखी है। आशा की कहानी शुरू होती है जोधपुर की उन सड़कों से जिसकी वह सफाई किया करती थी। सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते हुए आशा नगर निगम के अफसरों को देखा करती थीं और मन ही मन उसने ठान लिया कि उसे भी अफसर बनना है।

आशा ने सिलेबस का पता किया और तैयारी शुरू कर दी। आशा के साथ हमेशा किताबें होती थी, और जैसे ही उसे खाली समय मिलता, वह पढ़ने बैठ जाती थी। चाहे जोधपुर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की सीढ़ियां हो या कहीं सड़क किनारे… खाली वक्त में आशा का एक ही काम था… पढ़ाई करना। और उन्हीं किताबों के जादू ने आशा की जिंदगी में जादू कर दिया और वह जिस जिले की सड़कों पर झाड़ू लगाती थी, वहीं  अब अधिकारी बन कर अपनी गाड़ी से गुजरती हैं।

हालांकि आशा की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। आठ साल पहले उनका पति से झगड़ा हुआ, जिसके बाद दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आशा पर थी। बच्चों को और खुद को जिंदा रखने के लिए आशा नगर निगम में झाड़ू लगाती थी। सफाई कर्मचारी के रुप में नियमित तौर पर नियुक्ति के लिए आशा ने दो सालों तक नगर निगम से लड़ाई लड़ी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। आशा निराश थी, लेकिन उसने हौंसला नहीं छोड़ा… लड़ना नहीं भूली। और आखिरकार आशा को एक ओर जहां नगर निगम की ओर से सफाई कर्मचारी के रूप में नियमित नियुक्ति मिल गई। तो वहीं राज्य प्रशासनिक सेवा में भी चयन हो गया और अब वह एसडीएम बन गई हैं।

निश्चित तौर पर आशा की सफलता लाखों युवाओं को प्रेरणा देने वाली है। खासकर उस वाल्मीकि समाज के युवाओं को, जो झाड़ू और कलम के बीच के अंतर को नहीं समझ पाते हैं। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सहित तमाम बहुजन नायक हमेशा कहते रहे हैं कि वंचितों-शोषितों का जीवन सिर्फ शिक्षा से ही बदल सकता है। आशा की सफलता इस पर मुहर लगाती है।

 

 

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