क्या जनगणना पर ओबीसी से खेल रही है मोदी सरकार ?

भारत के बहुजन समाज को यह बात गंभीरता से सोचनी चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जिसके कारण वर्तमान या पूर्वर्ती केंद्र सरकारें जाति के आधार पर ओबीसी की अखिल भारतीय स्तर पर जनगणना नहीं करना चाहती। इस पर सालों से बहस जारी है और इसको लेकर कई तरह की बातें कही जाती हैं। हमें उन बहानों की पड़ताल करना भी जरुरी है। यह कहा जाता है कि जातीय जनगणना से देश विभाजित हो जाएगा। यह बिल्कुल मिथ्या प्रचार है, क्योंकि अभी तक जाति के आधार पर कभी भी देश के बंटवारे की बात किसी ने नहीं कही है। न तो अनुसूचित जाति, न अनुसूचित जनजाति और न ही पिछड़े वर्ग के द्वारा कभी भी इस तरह की कोई बात आधिकारिक तौर पर सामने आई है।

हां, जाति के आधार पर इन वर्गों ने रिजर्वेशन की मांग जरूर की है, लेकिन अलग देश की मांग नहीं कि गई है। जहां तक कुछ वर्गों द्वारा देश के बंटवारे की बात है तो यह मांग धर्म के आधार पर किया गया है, लेकिन धर्म के आधार पर गिनती अब भी जारी है। अगर सचमुच में सरकारों को यह डर है कि जाति और धर्म की गिनती करने से देश बंट जाएगा तो सरकारों को धर्म के आधार पर गिनती बंद कर दी जानी चाहिए। आखिर सरकारों ने ऐसा क्यों नहीं किया? सन् 1980 के वक्त को याद करना चाहिए जब देश में आतंकवाद भी धर्म के आधार पर शुरू हुआ था, और वो भी अलग देश की मांग कर रहे थे। इसलिए जनगणना के आधार पर देश के बंटवारे की बात मिथ्या प्रचार है।

देश के संविधान में यह साफ है कि पिछड़ी जातियों को जाति के आधार पर राजनीति में आरक्षण नहीं मिलना है। जाति के आधार पर पिछड़े वर्ग को सिर्फ शिक्षा और नौकरियों में रिजर्वेशन मिलेगा, जो मिल रहा है। इससे साफ है कि ऊपर जो हमने बातें कहीं है, सरकार उसकी वजह से पिछड़ों की जातीय जनगणना को टाल रही है। साफ है कि सरकार द्वारा जनगणना नहीं कराने के पीछे कोई बहुत बड़ा कारण छिपा हुआ है। सरकार में डर है कि पिछड़े वर्ग की जनगणना के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। ये कारण कौन से हैं, हमें इसकी पड़ताल करनी चाहिए।

जहां तक जातीय जनगणना का सवाल है, देश का संविधान यह अधिकार केंद्र को देता है, न कि राज्यों को। तो क्या जो बिल संसद के सदनों में पास किया गया है, वह राज्यों को पिछड़ी जातियों की जन गणना कराने का अधिकार दे देगा? या फिर राज्यों को सिर्फ जाति के आधार पर लिस्ट तैयार करने की ही अनुमति होगी, यह देखना बाकी है।

चिराग पासवान से छिनेगा सरकारी बंगला, मिला नोटिस

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रामविलास पासवान के बेटे और सांसद चिराग पासवान को एक के बाद एक झटका लग रहा है। केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने लोकसभा सदस्य चिराग पासवान को 12 जनपथ का सरकारी बंगला खाली करने का नोटिस भेज दिया है। दरअसल यह आवास पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को आवंटित था और अपने निधन से पहले बीते तीन दशक तक वह इस बंगले में रहे थे। वर्तमान में इस बंगले में रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य रह रहे हैं। गौरतलब है कि रामविलास पासवान का पिछले साल निधन हो गया था। बंगला खाली करने का नोटिस चिराग पासवान के लिए दूसरा बड़ा झटका है। चिराग पासवान और उनके चाचा के बीच पार्टी पर अधिकार को लेकर रस्सा-कस्सी चल रही है।

IAS टॉपर टीना डाबी के तलाक पर अदालत ने लगाई मुहर

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सिविल सेवा परीक्षा में साल 2015 की टॉपर रही टीना डाबी और दूसरे नंबर पर रहने वाले उनके पति अतहर आमिर अब अलग हो गए हैं। दोनों ने 20 नवंबर 2020 को तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसके बाद 10 अगस्त को अदालत ने उनके तलाक को मंजूरी दे दी। दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का फैसला किया था। दोनों की शादी काफी चर्चित रही थी और इनकी शादी में तमाम दिग्गजों ने शिरकत किया था। दोनों साल 2016 बैच के राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। वर्तमान में टीना वित्त विभाग में संयुक्त सचिव हैं तो तलाक की अर्जी दाखिल होने के कुछ महीने बाद ही आमिर डेप्युटेशन पर जम्मू कश्मीर चले गए थे।

बसपा में शामिल होने वाले पूर्व आईपीएस आर.एस. प्रवीण का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

हाल ही में अपने पद से इस्तीफा देने के बाद तेलंगाना के चर्चित आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण 8 अगस्त को बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए। बीते दिनों ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास ने आर. एस. प्रवीण कुमार का इंटरव्यू लिया था। देखिए आर.एस. प्रवीण की कहानी उन्हीं की जुबानी, देखिए यह एक्सक्लूसिव इंंटरव्यू-

 

लाखों समर्थकों के बीच पूर्व आईपीएस आर.एस. प्रवीण बसपा में शामिल

 लाखों समर्थकों की एक शानदार जनसभा के बीच पूर्व आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण कुमार 8 अगस्त को बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए। 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी प्रवीण कुमार ने हाल ही में रिटायरमेंट ले लिया था, और तभी से उनके राजनीति में जाने की अटकलें लग रही थी। बसपा का दामन थामने के बाद अब यह अटकलें शांत हो गई है। तेलंगाना के नलगोंडा में आयोजित ‘बहुजन राज्याधिकारा संकल्प सभा’ में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में बसपा की सदस्यता ग्रहण करते ही आर.एस. प्रवीण कुमार ने तेलंगाना में बहुजन राज लाने की हुंकार भर दी। उन्होंने कहा कि तेलंगाना में अब कोई भी ताकत बहुजन राज को आने से नहीं रोक सकती।

इस शानदार जनसभा के दौरान पू्र्व आईपीएस अधिकारी की प्रदेश के लोगों के बीच पकड़ भी साफ तौर पर नजर आई। तेलंगाना सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सेक्रेट्री के रूप में और स्वैरो नाम के संगठन के प्रमुख के रूप में आर. एस. प्रवीण ने अपने शानदार काम से जिस तरह प्रदेश के बहुजन समाज के बीच अपनी जगह बनाई है, वह इस सम्मेलन में साफ तौर पर दिखा। आमतौर पर पार्टी कार्यालय में कुछ बड़े नेताओं के बीच सदस्यता लेने की बजाय आर.एस. प्रवीण ने भारी जनसभा में लाखों समर्थकों के बीच बसपा की सदस्यता लेकर साफ कर दिया है कि वह प्रदेश में बड़ी और मजबूत सियासी पारी के मूड में हैं। इस दौरान उन्होंने अपनी ताकत दिखाकर जहां बसपा प्रमुख मायावती को भी आश्वस्त करने की कोशिश की तो साथ ही अपने राजनीतिक विरोधियों को चेतावनी भी दे डाली।

बतौर राजनेता अपने पहले भाषण में आर.एस. प्रवीण ने कहा कि पिछले 70 सालों से देश की मजबूत जातियों ने बहुजन समाज के साथ छल किया है। उन्होंने तेलंगाना में बहुजन राज लाने के लिए बहुजन समाज से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने साफ किया कि बहुजन राज्यम में सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार उनका प्रमुख एजेंडा होगा।

आर.एस. प्रवीण के बसपा में शामिल होने के दौरान बसपा अध्यक्ष बहन मायावती ने पार्टी की ओर से बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर रामजी गौतम को भेजा। इस दौरान रामजी गौतम ने घोषणा किया कि आर.एस. प्रवीण बसपा के तेलंगाना स्टेट को-आर्डिनेटर होंगे। तो वहीं आर.एस. प्रवीण ने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता तेलंगाना में बसपा को मजबूत करना होगा। राष्ट्रीय राजनीति में मेरी क्या भूमिका होगी, यह पार्टी तय करेगी। कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों से जब उन्होंने पूछा कि वो गुलाम बनना चाहते हैं कि राजा? तो समर्थकों के हुजूम के बीच से जोर से राजा बनने की आवाज आई। साफ है कि आर.एस. प्रवीण बहुजन समाज को तेलंगाना में राजा बनाने के लिए राजनीति में आए हैं। और जिस तरह से उऩ्होंने रेजिडेंशियल स्कूल के लाखों बच्चों को सफलता का मूलमंत्र दिया है, उसी तरह अब वह बहुजन समाज को भरोसा दिला रहे हैं कि मिलकर तेलंगाना में बहुजन राज लाया जा सकता है। निश्चित तौर पर आर.एस. प्रवीण जिस तरह काम करते हैं, ऐसा होना नामुमकिन नहीं है।

सभी फोटो क्रेडिट- राजशेखर

इस राज्य में बन रहा है देश का पहला आदिवासी विश्वविद्यालय, मुख्यमंत्री करेंगे शिलान्यास

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 ज्योतिबा फुले से लेकर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर तक तमाम बहुजन महापुरुषों ने भारत के मूलनिवासी समाज को साफ-साफ कहा था कि बिना शिक्षा के उनका भविष्य नहीं बदल सकता। बहुजन नायकों ने अपने समाज को यह संदेश दिया है कि भले ही दो रोटी कम खाना चाहिए लेकिन अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजना चाहिए। बहुजन महापुरुषों के इन्हीं सूत्र को अपना कर राजस्थान का अखिल भारतीय श्री मीना सामाजिक एवं शैक्षणिक समिति, नाम का संगठन देश का पहला आदिवासी विश्वविद्यालय बनाने जा रहा है। यह विश्वविद्यालय राजस्थान के कोटा के रानपुर में बनेगा। देश के इस पहले आदिवासी विश्वविद्यालय का नाम ‘जय मीनेष आदिवासी विश्वविद्यालय’ होगा। इसका शिलान्यास 8 अगस्त 2021 को कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत करेंगे। कोविड को देखते हुए पूरा कार्यक्रम वर्चुअल रखा गया है। इस विश्वविद्यालय के साथ ही मुख्यमंत्री गहलोत आदिवासी मीना बालिका छात्रावास का लोकार्पण भी करेंगे। कार्यक्रम के विशेष अतिथि उच्च शिक्षा राज्य मंत्री भंवर सिंह भाटी होंगे। कोटा में यह कार्यक्रम यूआईटी ऑडिटोरियम में रविवार सुबह 11 बजे होगा। इस कार्यक्रम में हाड़ौती के मीणा समाज के प्रमुख लोग मौजूद रहेंगे। वहीं प्रदेश भर के मीणा समाज के लोग राजीव सेवा केंद्रों के माध्यम से वीडियो कांफ्रेंस के जरिए इस समारोह से जुड़ेंगे।

प्रस्तावित आदिवासी विवि का नक्शा

 इससे पहले 18 जुलाई को बस्सी से विधायक और रिटायर डीजीपी लक्ष्मण मीणा और कोटा के संभागीय आयुक्त श्री के सी मीणा और आदिवासी समाज के सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में भूमि पूजन कार्यक्रम संपन्न हुआ। आयोजित समारोह में सम्भागीय आयुक्त कोटा, के.सी. मीणा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता बस्सी के विधायक श्री लक्ष्मण मीणा ने किया। इस दौरान समिति के निदेशक श्री आर डी मीना ने उपस्थित जनसमूह को कोटा में बनने जा रहे ‘जय मीनेश आदिवासी विश्व विद्यालय’ के बारे में विस्तृत जानकारी दी और आगे की योजना के बारे में विस्तार से बताया।

इस अवसर पर अध्यक्षता कर रहे विधायक लक्ष्मण मीना ने अपने उद्बोधन में कहा कि ये हम सबके लिए गर्व की बात है कि आज जयनमीनेश आदिवासी विश्वविद्यालय का भूमि पूजन आप सभी के सहयोग सम्पन्न हुआ। कभी एक समय हमारा आदिवासी समाज पढ़ाई के संस्थान स्कूल कॉलेज में पढ़ने के अवसर लिए तरसते थे, आज हम शिक्षा के संस्थान स्थापित कर शिक्षा देने की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। लक्ष्य कठिन जरूर है पर नामुमकिन नहीं। विश्वविद्यालय एक शहर बसाने जैसा है, घर बनाना आसान होता है, लेकिन शहर बसाना थोड़ा मुश्किल होता जरूर है।

लेकिन मुझे विश्वास है कि हम सामूहिक प्रयास, सहयोग से अपने इस सपने को साकार करेंगे। उन्होंने लोगों से आर्थिक मदद की अपील की। श्री मीणा ने यह भी कहा कि सबसे पहले हमे प्रथम चरण में 10 हजार वर्ग फिट का निर्माण कार्य नीयत समय एक वर्ष में पूरा करना ताकि विश्वविद्यालय को UGC की गाइडलाइन के अनुसार प्रारंभ कर सके जो कोई कठिन भी नही है। समाज के लोगों के पास जाकर हमें वांछित राशि लेने हेतु दिल से प्रयास करना पड़ेगा। आपके पास धन है तो अनुभव अपने आप आ जाता है। हम ये आदिवासी विश्वविद्यालय ही नहीं बना रहे है अपितु हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की नींव खड़ी कर रहे हैं, जिसमें हमारे समाज के बच्चों के साथ अन्य समाज के बच्चे भी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे।

इसके लिए मैं समाज के सभी बंधुओ से अपील करता हूं कि शिक्षा के इस पुनीत कार्य के लिए अधिक से अधिक धन राशि का बढ़-चढ़ कर सहयोग करे। चाहे वो समाज का अधिकारी हो या कर्मचारी या फिर गांव में रहने वाले पंच पटेल व किसान। हमें बस उनको विश्वविद्यालय निर्माण के लिए दान देने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। इस अपील पर समाज के लोगों ने लगभग दो करोड़ रूपये इकट्ठा कर लिया। अंत में समिति के निदेशक श्री आर डी मीना द्वारा समारोह में पधारे सभी समाज बंधुओं का धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

7 अगस्त मंडल दिवसः आधुनिक भारत में वर्ग संघर्ष के आगाज का दिन

 7 अगस्त एकाधिक कारणों से इतिहास का खास दिन है। यह लेख शुरू करने के पहले मैंने इस दिन का महत्व जानने के लिए लिए गूगल पर सर्च किया। विकिपीडिया पर इस दिन की प्रमुख घटनाओं के रूप में कई जानकारियां दर्ज है। लेकिन मुझे भारी विस्मय हुआ कि उन घटनाओं में मंडल दिवस का उल्लेख नहीं है, जबकि इसी दिन 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की संस्तुतियां लागू कर इस दिन को बेहद खास बना दिया था, जिसे देश-विदेश के सामाजिक न्यायवादी कभी नहीं भूल सकते।

1989 के चुनाव में जनता दल की ओर से वीपी सिंह ने घोषणा किया था कि अगर सत्ता में आये तो मंडल आयोग की संस्तुतियां लागू करेंगे और सत्ता में आने के बाद उन्होंने मौका-माहौल देखकर 7 अगस्त, 1990 को अपना वादा पूरा कर दिखाया। उन्होंने मंडल की संस्तुतियों को लागू करने की घोषणा करते समय कहा था, ‘हमने मंडल रूपी बच्चे को माँ के पेट से बाहर निकाल दिया है। अब कोई माई का लाल इसे माँ के पेट में नहीं डाल सकता। यह बच्चा अब प्रोग्रेस करेगा।’ मंडल मसीहा की बात सही साबित हुई। पिछड़ों के लिए नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने वाला मंडल रूपी बच्चा आज प्रोग्रेस करते–करते सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, धार्मिक न्यास, पुरोहितगिरी, आउट सोर्सिंग जॉब इत्यादि को स्पर्श करते हुए डाइवर्सिटी अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण का रूप अख्तियार करता प्रतीत हो रहा है। ऐसे में कहा जा सकता है 7 अगस्त प्रधानतः मंडल दिवस है। लेकिन 7 अगस्त का महत्त्व मुख्यतः मंडल दिवस तक ही सीमित नहीं है, यह आधुनिक भारत में वर्ग-संघर्ष के आगाज का भी दिन है।

इसे जानने के लिए महानतम समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स की मानव जाति के इतिहास की व्याख्या का सिंहावलोकन कर लेना पड़ेगा। मार्क्स ने कहा है अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात दूसरे शब्दों में जिसका शक्ति के स्रोतों, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है। अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है। पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है। मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित, ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है।’ मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा। जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, वर्ग-संघर्ष किसी न किसी रूप में कायम रहेगा और इसमें लोगों को अपनी भूमिका अदा करते रहने होगा। किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि जहां भारत के ज्ञानी-गुनी विशेषाधिकारयुक्त समाज के लोगों ने अपने वर्गीय हित में, वहीं आर्थिक कष्टों के निवारण में न्यूनतम रूचि लेने के कारण बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा मार्क्स के कालजई वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की बुरी तरह अनदेखी की गयी, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही। ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात मार्क्स की भाषा में उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है।

हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज, दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया। इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण को लेकर संघर्ष का एक नया दौर। मंडलवादी आरक्षण ने परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित एवं राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया। ऐसे में सुविधाभोगी वर्ग के तमाम तबके– छात्र और उनके अभिभावक, लेखक और पत्रकार, साधु-संत और धन्ना सेठ तथा राजनीतिक दल, अपने–अपने स्तर पर आरक्षण के खात्मे और वर्ग-शत्रुओं को खत्म करने में मुस्तैद हो गए। बहरहाल मंडल के बाद वर्ग शत्रुओं का खात्मा करने में जुटा भारत का जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग भाग्यवान जिसे जल्द ही ‘नवउदारीकरण’ का हथियार मिल गया, जिसे नरसिंह राव ने सोत्साहवरण कर लिया। इसी नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर राव ने हजारों साल के सुविधाभोगी वर्ग के वर्चस्व को नए सिरे से स्थापित करने की बुनियाद रखी, जिसपर महल खड़ा करने की जिम्मेवारी परवर्तीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आई। इनमें डॉ. मनमोहन सिंह ने अ-हिंदू होने के कारण बहुजनों के प्रति वर्ग- मित्र की भूमिका अदा करते हुए नवउदारीकरण की नीतियों को कुछ हद मानवीय चेहरा प्रदान करने का प्रयास किया।

इसी क्रम में ओबीसी को उच्च शिक्षा में आरक्षण मिलने के साथ बहुजनों को उद्यमिता के क्षेत्र में कुछ-कुछ बढ़ावा दिया। किन्तु वाजपेयी और मोदी हिन्दू होने के साथ उस संघ प्रशिक्षित पीएम रहे, जो संघ हिन्दू धर्मशास्त्रों में अपार आस्था रखने के कारण गैर- सवर्णों को शक्ति के स्रोतों के भोग का अनाधिकारी समझता है। मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के इतिहास की व्याख्या करते हुए यह अप्रिय सच्चाई बताई है कि वर्ग संघर्ष में प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है। मंडल के बाद भारत में जो नए सिरे से वर्ग संघर्ष शुरू हुआ, उसमें शासक वर्ग के हित-पोषण के लिए वाजपेयी और मोदी ने जिस निर्ममता से राज्य का इस्तेमाल अपने वर्ग शत्रुओं अर्थात बहुजनों के खिलाफ किया उसकी मिसाल वर्ग संघर्ष के इतिहास में मिलनी मुश्किल है। मंडल से हुई क्षति की भरपाई के लिए ही इन्होंने अंधाधुन सरकारी उपक्रमों को बेचने जैसा विशुद्ध देश-विरोधी काम अंजाम देने में सर्वशक्ति लगाया ताकि आरक्षण से मूलनिवासी बहुजनों को महरूम किया जा सके।

इस मामले में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी तक को बौना बनाया, उनके शासन में आरक्षण के खात्मे तथा जन्मजात सर्वस्वहारा वर्ग की खुशिया छीनने की कुत्सित योजना के तहत श्रम कानूनों को निरन्तर कमजोर करने तथा नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी-प्रथा को बढ़ावा देने में राज्य का अभूतपूर्व उपयोग हुआ। आरक्षण के खात्मे की योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दी गयी। गैर-सवर्णों के आरक्षण से महरूम करने के लिए ही हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, हॉस्पिटलों इत्यादि को निजी क्षेत्र में देने लिए राज्य का इस्तेमाल हो रहा है। वर्ग शत्रुओं को गुलामों की स्थिति में पहुचाने की दूरगामी योजना के तहत विनिवेशीकरण, निजीकरण के साथ लैटरल इंट्री में राज्य का अंधाधुंन उपयोग हो रहा है। जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हाथों में सबकुछ सौपने के खतरनाक इरादे से ही दुनिया के सबसे बड़े जन्मजात शोषकों ईडब्ल्यूएस के तहत 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया। कुल मिलाकर मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ गोलबंद हुए प्रभुत्वशाली वर्ग की ओर से राज्य के निर्मम उपयोग के फलस्वरूप भारत का सर्वस्व-हारा वर्ग उस स्टेज में पहुंचा दिया गया है, जिस स्टेज में पहुंच कर सारी दुनिया में ही वंचितों को शासकों के खिलाफ स्वाधीनता संग्राम छेड़ना पड़ा। इसी स्टेज में पहुंचने पर भारतीय लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई छेड़नी पड़ी थी।

बहरहाल अब लाख टके का सवाल यह है कि मंडलोत्तर काल में भारत के प्रभुत्वशाली वर्ग द्वारा छेड़े गए इकतरफा वर्ग संघर्ष के फलस्वरूप जो जन्मजात सर्वहारा वर्ग गुलामों की स्थिति में पहुच गया है, उसको आजाद कैसे किया जाय। कारण इस दैविक सर्वहारा वर्ग को अपनी गुलामी का इल्म ही नहीं है। उसे राष्ट्रवाद के नशे में इस तरह मतवाला बना दिया गया कि वह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की बदहाली देखकर अपनी बर्बादी भूल गया है। ऐसे में जन्मजात शोषितों को लिबरेट करना दूसरे देशों के गुलामों के मुकाबले कई गुना चुनौतीपूर्ण काम बन चुका है। लेकिन चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद भारतीय शासक वर्ग ने अपनी स्वार्थपरता से सर्वस्वहाराओं की मुक्ति का मार्ग खुद प्रशस्त कर दिया है और वह मार्ग है सापेक्षिक वंचना (Relative deprivation) का।

क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है। समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ‘दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें!’ सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना। दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना के अहसास ने ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमें वहां गोरों की तानाशाही सत्ता भस्म हो गयी। जिस तरह आज शासकों की वर्णवादी नीतियों से जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर बेहिसाब कब्जा कायम हुआ है, उससे सापेक्षिक वंचना के तुंग पर पहुंचने लायक जो हालात भारत में पूंजीभूत हुये हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं रहे। यहां तक कि फ्रांसीसी क्रांति या रूस की जारशाही के खिलाफ उठी वोल्सेविक क्रांति में भी इतने बेहतर हालात नहीं रहे। तमाम कमियों और सवालों के बावजूद यह सुखद बात है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय बहुजन बुद्धिजीवियों के सौजन्य से गुलामी का भरपूर इल्म न होने के बावजूद भी जन्मजात सर्वहाराओं में सापेक्षिक वंचना का अहसास पनपा है। इससे वोट के जरिये लोकतांत्रिक क्रांति के जो हालात आज भारत में पैदा हुए हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कभी किसी देश में उपलब्ध नहीं रहे। इस हालात में परस्पर शत्रुता से लबरेज मूलनिवासी वंचित समुदायों में क्रांति के लिए जरुरी ‘हम-भावना’ (we-ness) का तीव्र विकास का तीव्र विकास हुआ है। ऐसे में बहुजन बुद्धिजीवी/एक्टिविस्ट सबकुछ छोड़कर यदि बहुजनों में सापेक्षिक वंचना का भाव भरने में सारी ताकत झोंक दें तो वोट के जरिये भारत में लोकतान्त्रिक क्रांति स्वर्णिम अध्याय रचित होने के प्रति आशावादी हुआ जा सकता है।

दिल्ली में हाथरस जैसी हैवानियत, दलित उत्पीड़न आखिर कब तक?

 हाल ही में दिल्ली में भी हाथरस दुहराया गया। दिल्ली कैंट के पुराना नागल स्थित श्मशान घाट में वाटर कूलर से पानी लेने गई नौ साल की दलित (बाल्मीकि) बच्ची से कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म कर उसकी हत्या के बाद जबरन अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस भयावह और बर्बर घटना को जिस बेरहमी से अंजाम दिया गया उसने न केवल मानवता को तार-तार किया है बल्कि अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी हैं। सवाल है कि बलात्कारियों और दुराचारियों में ऐसी क्रूर घटनाओं को अंजाम देने का दुस्साहस कैसे पैदा होता है? क्या दलित महिलाएं और बच्चियां उनके लिए ‘ईजी या सॉफ्ट टारगेट’ होती हैं? दरअसल जातिवादी मानसिकता वाले दुराचारी सवर्ण उनकी जाति और गरीबी का फायदा उठाते हैं। उन्हें क़ानून का भय नहीं होता। क्योंकि क़ानून के रखवाले भी कथित उच्च जाति और जातिवादी मानसकिता वाले होते हैं।इसलिए दुराचारी यह मानकर चलते हैं कि दलित महिलाओं/बच्चियों के साथ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध करने की उन्हें सजा नहीं मिलेगी। और वे ऐसी वारदात के बाद भी खुलेआम घूमते हैं। पर इस मामले में करीब दो सौ लोगों के हंगामे के बाद पंडित राधेश्याम और उसके तीन साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया।

  उन पर पहले पुलिस ने गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया था। बाद में दिल्ली महिला आयोग और एससी/एसटी आयोग के दखल के बाद पुलिस ने प्राथमिक जांच के बाद सामूहिक दुष्कर्म, हत्या, साक्ष्य छुपाने, पोक्सो, एससी/एसटी एक्ट और धारा 506 के तहत मामला दर्ज किया। जन दबाब से मजबूर होकर पुलिस को चारों को गिरफ्तार करना पड़ा। जब देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी हैवानियत हो सकती है तो पूरे देश के बारे में आप सोच सकते हैं कि दलित बच्चियां और महिलाएं कितनी सुरक्षित होंगी।

गुड़िया (बदला हुआ नाम) की मां ने बताया कि रविवार शाम साढ़े पांच बजे बेटी शमशान घाट में लगे वाटर कूलर से ठंडा पानी लेने गई थी। साढ़े छः बजे वहां के पंडित राधेश्याम ने परिजनों को घाट पर बुलाया और उन्हें बताया कि बच्ची की करंट लगने से मौत हो गई है। जबकि बच्ची के होंठ नीले पड़े हुए थे और उसकी कलाईयों पर जलने के निशान थे। गुड़िया की मां के अनुसार जब उन्होंने पुलिस को फोन करने की कोशिश की तो पुजारी ने पोस्टमार्टम में अंगो की चोरी होने की बात कह कर उन्हें डराया और जबरन बच्ची का अंतिम संस्कार कर दिया। गुड़िया के पिता मोहनलाल ने बताया कि उनकी बच्ची उनकी एकमात्र संतान थी। जिन चार दरिंदों ने मेरी बेटी के साथ दरिन्दगी की है उनके लिए मैं जल्द से जल्द फांसी की सजा चाहता हूँ ताकि मेरी बेटी को और मुझे न्याय मिल सके।

बचे रह गए गुड़िया के अधजले पांव! दरिंदो ने 9 वर्षीया गुड़िया को जब जलाया (पता नहीं मारकर या जिन्दा!) तब जलाते समय उस मासूम के पांवों  का निचला हिस्सा अधजला रह गया। उसके इन अधजले पावों का किसी ने फोटो खींच कर वायरल कर दिया। उस मासूम के उन अधजले पांवों की तस्वीर देख कर ही मन विचलित हो गया। पता नहीं उस  मासूम के माता-पिता पर उन अधजले पांवों को देखकर क्या गुजरी होगी!

मामले को रफा-दफा करना चाहती थी पुलिस गुड़िया के परिजनों ने बताया कि पहले पुलिस आरोपियों से पीड़िता के पिता को 20 हजार रुपया दिलवा कर मामले को रफा-दफा करना चाहती थी। यहां तक कि पुलिस ने गुड़िया के पापा को डराया-धमकाया भी था। और जब अन्य परिजनों खासतौर से महिलाओं ने इसका विरोध किया तो पुलिस ने कहा कि तुम ज्यादा मत बोलो नहीं तो तुम्हें भी अन्दर कर देंगे।परिजनों का आरोप है कि पुलिस वालों ने शराब पी रखी थी। पुलिस मीडिया वालों से भी बात नहीं करने दे रही थी। दरअसल पुलिस पीड़ितों के साथ नहीं बल्कि आरोपियों के साथ खड़ी थी और पीड़ितों पर दबाब बना रही थी।

दलित संगठनो और सामाजिक संगठनों ने इस हैवानियत के खिलाफ बुलंद की आवाज जब मैं दिल्ली कैंट पुराना नागल में धरना स्थल पर पहुंचा तो मैंने देखा कि वहां दलित संगठनों के कार्यकर्ता तथा अन्य कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि आए हुए थे और मंच से अपनी बात रख रहे थे। दलित संगठनो में काफी आक्रोश दिख रहा था। वे प्रशासन और खासतौर से पुलिस प्रशासन से कह रहे थे कि वैसे तो हम संविधान और देश के क़ानून में विश्वास रखते हैं। और अपने हाथ में कानून नहीं लेना चाहते। हमें कानून व्यवस्था पर भरोसा है कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देगी। पर यदि कानून दोषियों को सख्त से सख्त सजा नहीं देगा तो उन्हें हम सजा देंगे। आक्रोशित दलित तरह-तरह के नारे लगा रहे थे जैसे– ‘गुड़िया हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिन्दा हैं’, ‘गुड़िया के हत्यारों को,गोली मारो….को’, ‘पुलिस प्रशासन हाय हाय’, ‘दोषियों को फांसी दो, फांसी दो’, ‘गुड़िया के दरिंदों को मौत की सजा दो’,  ‘गुड़िया को इन्साफ दो’,  ‘वी वांट जस्टिस’, ‘आवाज दो हम एक हैं’, ‘जय जय जय जय जय भीम’…आदि।

धरनास्थल को विभिन्न सामाजिक संगठनो के प्रतिनिधियों ने विशेषकर महिलाओं ने संबोधित किया। सबने गुड़िया के लिए न्याय की मांग की और दोषियों के लिए सख्त से सख्त सजा। दलित नेताओं जैसे बिरजू पहलवान, मुहर सिंह पहलवान, भीम आर्मी चीफ चन्द्र शेखर आजाद आदि ने भी अपने विचार रखे और गुड़िया को न्याय दिलाने के लिए तन-मन-धन अर्पित करने की बात कही।

सुरक्षित नहीं हैं हमारी बेटियां कुछ महिला वक्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” नारे पर तंज कसते हुए कहा कि हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं मोदी जी। दोष इसमें मानसिकता है। हमारी लचर क़ानून व्यवस्था का है। न्याय व्यवस्था का है।पुलिस प्रशासन का है। जातिवाद का है। दलितों की बेटियां भी इस देश की बेटियां होती हैं। जापान में चल रहे ओलिंपिक गेम में जब हमारी बेटियां चानू और सिंधू मैडल जीतती हैं तो उन पर गर्व करते हो दूसरी ओर हमारी दलित बिटियों के साथ जघन्य अपराध करते हो। तुम्हारे दिमाग में पितृसत्ता और जातिवाद बैठा हुआ है। रामराज्य की बात करते हो और गुंडाराज चलाते हो। पहले इस मानसिकता को बदलो।

पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को भड़काने की कोशिश धरनास्थल का दृश्य काबिले गौर था। तेज धूप थी और प्रदर्शनकारी भीषण गर्मी में सड़क पर बैठे हुए थे। सिर्फ एक छोटा सा मंच बना हुआ था। प्रदर्शनकारी छाया में बैठ सकें, इसके लिए टेंट लगाने का प्रयास करने पर पुलिस वाले मना करने लगे कि यहाँ टेंट नहीं लगा सकते। इससे नाराज लोगों की पुलिस से झड़प हो गई। पुलिस वाले प्रदर्शनकारियों को भड़काने लगे जिससे वे पुलिस से हाथापाई करने लगें। पुलिस को लाठीचार्ज करने का मौका मिल जाए और वे प्रदर्शनकारियों को खदेड़ दें। लेकिन मंच संचालन अच्छा था। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से निवेदन किया कि वे पुलिस से न भिड़ें। उन्हें कुछ न कहें। क्योंकि पुलिस वाले चाहते हैं कि आप हिंसा पर उतर आएं और वे लाठीचार्ज कर सकें। हमें धरना-प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से करना है जो कि हमारा संवैधानिक अधिकार है। इससे लोग शांत हुए और वापस आकर बैठ गए।

दलित संगठनों और अन्य सामाजिक संगठनों की मांगे

  1. पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाए।
  2. मामले को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाए।
  3. सभी दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।
  4. किसी प्रलोभन या दबाब के कारण जांच प्रभावित न हो यह सुनिश्त किया जाए।
  5. पीडिता के घरवालों को उचित मुआवजा दिया जाए।

जाति जनगणना एवं आरक्षण परस्पर पूरक हैं

 NEET में ओबीसी को आरक्षण मिलने के बाद अब जाति जनगणना को लेकर बहस छिड़ गई है। ऐसे में इसके समर्थक और विरोधी अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं। लेकिन कुछ कथित प्रगतिशील ऐसे भी हैं; जो अपनी छवि को बचाने के लिए सीधे तो जाति जनगणना का विरोध नहीं कर रहे है, लेकिन परोक्ष रूप से इसके खिलाफ तमाम तर्क दे रहे हैं। कुछ बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि, “यादव, कुर्मी, शाक्य, लोधी को आरक्षण का लाभ “संख्या से अधिक” मिल रहा है, इसलिए उनको जाति जनगणना का समर्थन नहीं करना चाहिए। उनका तर्क है कि उनकी फीस वैज्ञानिक आंकलन एवं पद्धतिशास्त्र में माफ़ लगती है, या उन्होंने इसकी कभी पढ़ाई ही नहीं की है।

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यहां हमें यह समझना होगा कि प्रतिनिधित्व या आरक्षण का वैज्ञानिक एवं पद्धतिशास्त्र अलग होता है। इसका आंकलन ‘indicies’ (सूचकांक) पर किया जाना चाहिए। अर्थात एक हजार या एक लाख आबादी पर कितने लोग शिक्षित हैं और उनमें से कितने लोगों को प्रतिनिधित्व मिला है। वैज्ञानिक एवं पद्धतिशास्त्र आधार पर यह आसानी से स्पष्ट हो जाएगा की किसी एक जाति की कितने लाख आबादी है और उसमें से कितने लोगों को प्रतिनिधित्व मिला है या मिल रहा है। अगर किसी जाति की संख्या लाखों में है और किसी जाति की संख्या हजारों में तो यह स्वाभाविक ही है कि लाखों की जनसंख्या वाले जाति के लोगों में प्रतिनिधित्व ज्यादा ही लगेगा। परन्तु जब आप आरक्षण की गणना प्रति हजार करेंगे तो इंडीसीस लगभग एक जैसा ही आएगा।

जो लोग प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का आंकलन जाति की संख्या बल के आधार पर कर रहे हैं, उनको प्रतिनिधित्व आरक्षण के दर्शन के बारे में भी कुछ ज्ञान नहीं लगता। क्योंकि प्रतिनिधित्व (आरक्षण) सामाजिक न्याय पर आधारित है। यद्यपि यह जाति की सामूहिक अस्मिता पर आधारित है परंतु इसका लाभ जाति में रह रहे व्यक्ति को एकांगी रूप में प्राप्त होता है। अर्थात अगर जाति में किसी एक व्यक्ति को प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का लाभ मिल गया है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके पूरे नाते-रिश्तेदारों या उसकी पूरी जाति को ही उसका लाभ मिल गया है। प्रतिनिधित्व (आरक्षण) पूरे वंचित समाज को सामाजिक न्याय के प्रति आशान्वित करता है जिससे उनके अंदर क्रांतिकारी बदलाव की सोच ना विकसित हो और वे संवैधानिक मार्ग पर उसमें प्रदत अधिकारों के आधार पर ही अपनी वंचना की को दूर कर सके। इसलिए प्रतिनिधित्व (आरक्षण) समाज में विघटन होने से भी बचाता है। अतः प्रतिनिधित्व (आरक्षण) उन वंचित समाजों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सत्ता, शिक्षा, संसाधन, उत्पादन, आदि संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देकर राष्ट्र एवं प्रजातंत्र को मजबूत करने की एक प्रक्रिया है, जिनको जातीय अस्मिता के आधार पर हजारों हजारों वर्षों से जीवन के हर क्षेत्र में यथा-आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक, आवासीय आदि आधार पर बहिष्कृत किया गया। सारांश में जाति जनगणना एवं प्रतिनिधित्व (आरक्षण) परस्पर विरोधी नहीं बल्कि परस्पर पूरक हैं।


(प्रोफेसर विवेक कुमार, लेखक जवाहरलाल नेहरू स्थित समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं। यह विचार व्यक्तिगत हैं।)

अडाणी पर भड़का शिवसैनिकों का गुस्सा, तोड़ा अडाणी का बोर्ड

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मुंबई एयरपोर्ट पर लगे अडाणी के बोर्ड को शिव सैनिकों ने तोड़ दिया है। दरअसल मराठी अस्मिता केंद्रित राजनीति करने वाली शिवसेना छत्रपति शिवाजी महाराज को अपना आइकन मानती है। ऐसे में जब अडाणी ग्रुप ने मुंबई एयरपोर्ट का अधिग्रहण करने के बाद उस पर जब अडाणी का बोर्ड लगाया, तो शिवसैनिकों ने इसे मराठी अस्मिता पर हमला बताया। अडाणी ग्रुप ने इसी साल जुलाई में मुंबई एयरपोर्ट के मैनेजमेंट का काम संभाला है। अडाणी ग्रुप के पास फिलहाल 74 फीसदी की हिस्सेदारी है।

इस बीच अडानी ग्रुप की ओर से कहा गया है कि एयरपोर्ट का नाम अब भी छत्रपति शिवाजी के नाम पर है। उसमें कोई तब्दीली नहीं की गई है। बता दें कि बीते कुछ सालों में अडानी ग्रुप ने एयरपोर्ट्स के मैनेजमेंट का अधिकार लेने में बड़ा निवेश किया है। केरल के कोच्चि एयरपोर्ट से लेकर मुंबई एयरपोर्ट तक का कॉन्ट्रैक्ट अडानी ग्रुप ने हासिल किया है।

मोदी के मंत्री की गजब बयानी

 दलितों के हितों को लेकर मोदी सरकार और उसके मंत्री कितने गैरजिम्मेदार हैं, यह हाल ही में देखने तब देखने को आया, जब मैनुअल स्केवेंजिंग को लेकर राज्यसभा में एक सवाल पूछा गया। 28 जुलाई को राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह सवाल पूछा था कि बीते पांच साल में हाथ से नाले की सफाई के दौरान कितनी मौते हुई हैं? जिसके जवाब में मोदी सरकार में सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास आठवले ने ऐसी किसी मौत से साफ इंकार कर दिया। अठावले ने कहा कि बीते पांच वर्षों में मैनुअल स्केवेंजिंग से किसी की मौत का मामला सामने नहीं आया है।

लेकिन यहां यह दिलचस्प है कि इसी साल फरवरी में बजट सत्र के दौरान लोकसभा में एक लिखित जवाब में मोदी सरकार के मंत्री रामदास आठवले ने ही बीते पांच साल में सेप्टिक टैंक और सीवर साफ़ करने के दौरान 340 लोगों की मौत की बात कही थी। अठावले ने जो डेटा दिया था, वह 31 दिसंबर, 2020 तक का था। तो यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर मोदी सरकार का कोई मंत्री एक ही सवाल का दो अलग वक्त पर अलग-अलग जवाब कैसे दे सकता है?

 दलितों के हितों को लेकर मोदी सरकार की अनदेखी का भांडाफोड़ उस रिपोर्ट से भी होता है, जिसे साल 2020 में सरकार की ही संस्था राष्ट्रीय सफ़ाई कर्मचारी आयोग ने जारी किया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि साल 2010 से लेकर मार्च 2020 तक यानी 10 साल के भीतर 631 लोगों की मौत सेप्टिक टैंक और सीवर साफ़ करने के दौरान हो गई। तो आखिर अब मोदी सरकार के मंत्री मैनुअल स्केवेंजिंग के कारण हुई मौतों की बात से कैसे और क्यों इंकार कर रहे हैं??

यहां यह समझना होगा कि साल 2013 में मैनुअल स्केवेंजिंग यानी हाथ से मैला उठाने को लेकर नियोजन प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम लाया गया था और इस पर पूरी तरह रोक लगाते हुए इसे गैरकानूनी कहा गया था। यहां सरकार ने ‘मैनुअल स्केवेंजर’ की परिभाषा तय की थी। इस परिभाषा के मुताबिक- “ऐसा व्यक्ति जिससे स्थानीय प्राधिकरी हाथों से मैला ढुलवाए, साफ़ कराए, ऐसी खुली नालियां या गड्ढे जिसमें किसी भी तरह से इंसानों का मल-मूत्र इकट्ठा होता हो उसे हाथों से साफ़ कराए तो वो शख़्स मैनुअल स्केवेंजरकहलाएगा।”

नियम के मुताबिक, इस अधिनियम के लागू होने के बाद कोई स्थानीय अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति किसी भी शख़्स को सेप्टिक टैंक या सीवर में ‘जोख़िम भरी सफ़ाई’ करने का काम नहीं दे सकता है। लेकिन यह सब महज सरकारी कागजों की बात है। जमीनी सच्चाई यह है कि देश में हर रोज सफाई कर्मचारी सीवर में बिना किसी सुरक्षा के उतर रहे हैं, और उनमें से कई अपनी जान गंवा रहे हैं। सिर्फ़ इस साल अब तक 26 लोगों की मौत हो चुकी है’।

सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन का दावा है कि इन पांच सालों में सफ़ाई करने के दौरान 472 सफ़ाईकर्मियों की मौत हुई है। इस बारे में बीबीसी को दिये अपने बयान में विल्सन ने कहा- सोचिए, लोग मर रहे हैं और कैसे एक मंत्री संसद में ये कह रहे हैं कि कोई मौत ही नहीं हुई है। सरकार तो ये भी कह रही है कि ऑक्सीज़न की कमी से देश में लोग नहीं मरे तो क्या हम जो देख रहे हैं या देखा है सबकी पुष्टि सरकार के बयानों से होगी? यह सबसे आसान तरीका है कि कह दो कि कोई डेटा ही नहीं है और सवालों और परेशानियों से बच जाओ क्योंकि अगर आपने डेटा दिया तो आपसे और सवाल पूछे जाएंगे और अगर डेटा सही नहीं हुआ तो लोग सवाल उठाएंगे।

ऐसे में जब मोदी सरकार मैनुअल स्केवेंजिंग से हुई मौतों को नकार रही है,  जमीनी हकीकत यह है कि मैनुअल स्केवेंजर्स की संख्या घटने की बजाए, लगातार बढ़ रही है। और यह खुद सरकारी आंकड़ें चीख-चीख कर कह रहे हैं। साल 2019 में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 में जब मैनुअल स्केवेंजिंग रोकने के लिए क़ानून लाया गया था तो उस वक्त देश में 14 हज़ार से अधिक ऐसे सफ़ाईकर्मी थे जिन्हें मैनुअल स्केवेंजर की श्रेणी में रखा गया था। 2018 के सर्वे में ये संख्या बढ़कर 39 हज़ार पार कर गई और साल 2019 में ये बढ़ कर 54 हज़ार से ऊपर हो गई। वर्तमान में ऐसे लोगों की संख्या 66 हज़ार से अधिक है। अकेले उत्तर प्रदेश में हाथ से मैला उठाने वालों की संख्या 37 हज़ार से ज्यादा है। तो सदन में मैनुअल स्केवेंजिग से हुई मौतों की संख्या जीरो बताने वाले रामदास अठावले के गृहराज्य महाराष्ट्र में 7300 लोग यह काम करते हैं।

 तो क्या अब भारत की सरकार, खासकर मोदी सरकार ऐसे ही काम करेगी। मौत चाहे ऑक्सीजन की कमी से हो, या फिर सीवर में उतरने से हो, क्या सरकार ने यह तय कर लिया है कि वह हर आंकड़े को बेशर्मी से झुठला कर उससे पल्ला झाड़ लेगी, चाहे देश की जनता जान गंवाती रहे। क्या सच को नकार करो विश्वगुरू बनने का खोखला दावा करना ही सरकार का काम रह गया है?

नीतीश के करीबी ललन सिंह बने जद (यू) के नए अध्यक्ष

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जनता दल युनाइटेड के नए अध्यक्ष ललन सिंह होंगे। दिल्ली में पार्टी ऑफिस में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में यह फैसला लिया गया। इस बैठक में शामिल होने के लिए नीतीश कुमार पटना से दिल्ली पहुंचे थे। आरसीपी सिंह के केंद्र में मंत्री बनने के बाद ही अटकलें लगाई जा रही थी कि किसी और को यह पद मिलेगा। ललन सिंह नीतीश कुमार के सबसे करीबी नेताओं में शुमार हैं। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के सभी सांसद और कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल थे।

बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन पर हंगामा क्यों?

 बहुजन समाज पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले किये जा रहे प्रबुद्ध वर्ग संगोष्ठी यानी ब्राह्मण सम्मेलन को लेकर दलित-बहुजन समाज के एक तबके में काफी रोष है। सोशल मीडिया पर बसपा प्रमुख बहन मायावती को नसीहत देने वालों की भरमार लगी है। तमाम लोग यह बता रहे हैं कि ब्राह्मणों का सम्मेलन करने से बसपा को कोई फायदा नहीं होने वाला है और इससे बसपा के अपने आधार वोट बैंक का नुकसान होगा। बहुजन समाज के कुछ लोगों की यह चिंता समझ से परे है। दरअसल दलित-बहुजन समाज में ऐसे प्रतिक्रियावादी लोगों की भरमार हो गई है, जो बिना आगा-पीछा सोचे, बस फैसला सुनाने को बेचैन नजर आते हैं। और सोशल मीडिया ने उन्हें इसका हक दे ही दिया है।

लेकिन दलित-बहुजन समाज को यह सोचना होगा कि क्या इस तरह की प्रतिक्रिया जल्दबाजी में दी गई प्रतिक्रिया नहीं है? उन्हें यह समझना होगा कि जब भी चुनाव आते हैं या किसी राजनीतिक दल को जब भी किसी समाज को खुद से जोड़ना होता है, तो इस तरह की कवायद सभी करते हैं। यह कोई अनोखी घटना नहीं होती, बल्कि एक आम राजनैतिक प्रक्रिया होती है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुंभ के दौरान सफाईकर्मियों का पैर धोया, या जब अमित शाह किसी दलित के घर जाकर खाना खाते हुए नजर आते हैं तो क्या इसका मतलब यह मान लिया जाए कि दोनों दलित समाज के हितैषी हो गए हैं? क्या यह मान लिया जाए कि प्रधानमंत्री मोदी वाल्मीकि समाज की सभी समस्याओं को दूर कर देंगे या अमित शाह दलित समाज के अधिकारों के लिए सड़क पर उतर कर आंदोलन करेंगे?

वाल्मीकि समाज का पैर धोने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्या उसके बाद उस समाज की खबर ली। क्या उसके बाद कभी उन्होंने यह ऐलान किया कि वह ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे वाल्मीकि समाज के किसी व्यक्ति को सीवर में मौत का सामना न करना पड़े। बिल्कुल नहीं। क्योंकि इस तरह की घटनाएं महज प्रतीक भर होती हैं और इनके सहारे तमाम दल और राजनेता खुद को सिर्फ उदार दिखाने की कोशिश करते हैं। और इन प्रतीकों का इस्तेमाल कर वोट के लिए ढोल बजाते फिरते हैं। यह बात उस समाज के वोटर भी समझते हैं इसलिए जब मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोते हैं और अमित शाह और राहुल गांधी दलितों के घर खाना खाते हैं तो उनका सवर्ण समाज जाति और धर्म भ्रष्ट होने का रोना नहीं रोता।

ऐसे में बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन को लेकर दलित-बहुजन समाज के एक तबके के भीतर मच रहा हो-हल्ला कहीं न कहीं बेमानी है। दलित-बहुजनों को समझना होगा कि सत्ता में आने के लिए सभी राजनैतिक दलों को हर जाति, धर्म और वर्ग का वोट चाहिए होता है। हर राजनीतिक दल इसके लिए प्रयास करता है और एक राजनैतिक दल होने के कारण बसपा इससे परे नहीं है। हर राजनीतिक दल में एससी-एसटी सेल होता है, जिसकी कमान पार्टी के दलित-आदिवासी समाज के नेताओं के पास रहती है और इससेल का दायित्व अपने समाज के वोटों को पार्टी के लिए संगठित करना है। बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा भी ब्राह्मण चेहरे हैं, लंबे वक्त से बसपा से जुड़े हुए हैं और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। निश्चित तौर पर उनकी जिम्मेदारी ब्राह्मण समाज के वोटों को बसपा के खेमे में लाने की है।

अगर उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले बहुजन समाज पार्टी सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है तो इसको लेकर हंगामे की कोई जरूरत नहीं दिखती है।कोई भी राजनीतिक दल तेरह प्रतिशत ब्राह्मण वोटों की अनदेखी करने का जोखिम नहीं लेगी।बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से भाईचारा समितियां गठित करती रही है।जहां तक विचारधारा का सवाल है तोयहां दलित-बहुजन समाज को यह भी ध्यान देना होगा कि बसपा प्रमुख मायावती कभी भी हिन्दू धर्म के धार्मिक नेताओं के घरों और मठों के चक्कर नहीं लगाती हैं और अपनी विचारधारा पर कायम हैं। और क्या कोई भी यह दावे के साथ कह सकता है कि दलित समाज की सभी जातियां बसपा के समर्थन में खड़ी हैं, और अगर बसपा ब्राह्मण सम्मेलन नहीं करती तो सभी दलित और पिछड़े एकमुश्त होकर बसपा को जीताने के लिए एक हो जाते? संभवतः ऐसा दावा कोई भी नहीं कर सकता।

उत्तर प्रदेश का चुनाव देश का सबसे बड़ा चुनाव होता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरे भारत की राजनीतिक तस्वीर तय करती है। ऐसे में हर पार्टी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए पूरा दम लगा रही है। ऐसे में अगर बहुजन समाज पार्टी अपनी राजनीतिक बिसात नहीं बिछाएगी तो निश्चित तौर पर पीछे रह जाएगी। और ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण समाज बसपा के टिकट पर चुनाव नहीं जीतता है। विधानसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी अपने सर्वसमाज के फार्मूले पर चलते हुए हर जाति, धर्म और वर्ग को चुनावी मैदान में उतारती है। ब्राह्मण समाज भी इसमें से एक है। बसपा के टिकट पर 2007 में 41 ब्राह्मण विधायक जीत कर आए थे, आखिर इस तथ्य को कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता है। राजनीति संभावनाओं का खेल है और अगर बसपा 23 प्रतिशत दलित वोट और 13 प्रतिशत ब्राह्मण वोट को एक करने की संभावना के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी करने की राह तलाश रही है तो यह उसका हक है। और चुनावी नतीजों से पहले इस फैसले को गलत कह देना ज्यादती होग।

बहुजनों के आंदोलन के आगे झुकी मोदी सरकार, NEET में OBC आरक्षण लागू करने की घोषणा

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मेडिकल की इंट्रेंस परीक्षा NEET में आरक्षण की मांग कर रहे ओबीसी समाज को बड़ी कामयाबी मिली है। पिछड़ी जातियों के भारी विरोध और सोशल मीडिया पर चली मुहिम के बाद आखिरकार मोदी सरकार झुक गई है और पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का आदेश जारी कर दिया है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए भी दस प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा हुई है। इस आदेश के बाद पांच हजार से ज्यादा ओबीसी छात्र आरक्षण का लाभ लेकर हर साल डॉक्टर बन सकेंगे।

नए आदेश के मुताबिक अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल, डेंटल कोर्स (एमबीबीएस, एमडी, एमएस डिप्लोमा, बीडीएस, एमडीएस) के लिए ओबीसी को सत्ताईस प्रतिशत और ईडब्लयूएस कोटे वाले को दस फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसका फायदा ऑल इंडिया कोटा स्कीम (AIQ) के तहत मिलेगा। आरक्षण का यह लाभ अभ्यर्थियों को वर्तमान 2021-22 सत्र से मिलेगा। इस घोषणा के बाद हर साल ओबीसी समाज के 1500 छात्रों को MBBS में 2500 ओबीसी छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएशन में फायदा मिलेगा।सरकारी मेडिकल कॉलेजों की कुल सीटों में से अंडर ग्रेजुएट की पंद्रह प्रतिशत और पोस्ट ग्रेजुएट की पचास प्रतिशत सीटें ऑल इंडिया कोटा में आती है।

दरअसल सरकार को यह फैसला मजबूरी और दबाव में लेना पड़ा है। एनईईटी में ओबीसी को आरक्षण दिये जाने की मांग को लेकर ओबीसी समाज ने मोर्चा खोल दिया था। सोशल मीडिया पर पिछड़े समाज के तमाम चिंतकों और बुद्धिजीवियों ने मुहिम चला रखी थी। दलित समाज ने भी इस मुहिम को अपना समर्थन दिया था। बहुजनों की इस एकता से मोदी सरकार दलित-पिछड़ा विरोधी छवि और मजबूत होने लगी थी।ओबीसी समाज के लोग मोदी सरकार में शामिल अपने समाज के मंत्रियों के खिलाफ भी हमलावर थे। यही वजह रही कि एनडीए के अन्य पिछड़ा वर्ग के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटे में ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारो के लिए आरक्षम लागू करने की मांग की थी, जिसके बाद सरकार ने इसको हरी झंडी दे दी है।

हालांकि आज भले ही मोदी सरकार एनईईटी में पिछड़े वर्ग को आरक्षण देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन पिछले चार साल में 11 हजार ओबीसी की मेडिकल सीटों को आरक्षण नहीं होने की वजह से नुकसान हुआ है। माना जा रहा है कि अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाने के लिए तैयार थे, इसी वजह से मोदी सरकार को यह फैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।  

सीएम योगी के गोरखपुर में ब्राह्मण लड़की से शादी करने पर धोबी समाज के युवक की हत्या

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर यानी CM योगी आदित्यनाथ के शहर में अनीश नाम के दलित युवक की हत्या कर दी गयी। अनीश कुमार चौधरी की 24 जुलाई को हत्या कर दी गई थी। अनीश ADO पंचायत (पंचायत अधिकारी) पद पर तैनात थे। उन्होंने प्रेम विवाह किया था और उनकी पत्नी ब्राह्मण समाज से थी। लड़की का नाम दीप्ति मिश्रा है। इस हत्या के पीछे अंतरजातीय विवाह का आरोप लगाया जा रहा है। आरोप है कि इस विवाह से लड़की पक्ष के लोग काफी नाराज थे। आरोप यह भी है कि लड़की के परिवारवालों कुछ अधिकारियों के साथ  मिलीभगत कर इस हत्याकांड को अंजाम दिया है। अनीश की हत्या दिन-दहाड़े गड़ासे से काटकर दर्दनाक तरीके से कर दी गई। हत्याकांड गोरखपुर में होने से यह मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। अनीश की हया के मामले में 17 लोग अभियुक्त बनाए गए हैं, जिनमें से चार लोगों को स्थानीय पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। फरवरी माह में अनीश कनौजिया और दीप्ति मिश्रा ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि CM योगी आदित्यनाथ की पुलिस उन्हें परेशान कर रही है। इस दंपत्ति ने आरोप लगाया कि पुलिस फ़र्ज़ी मुकदमा लगाकर उन्हें परेशान कर रही है। साफ है कि एक पढ़े-लिखे युवक को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि वह दलित था और ब्राह्मण समाज की युवती से शादी कर ली थी।
हालांकि चिंता की बात यह है कि इतना जघन्य हत्याकांड होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ है। सरकार जहां चुप्पी साधे है तो वहीं सरकार के भीतर बैठे इस समाज के मंत्री भी बोलने से बच रहे हैं। जबकि योगी सरकार में धोबी समुदाय की एक मंत्री सहित ग्यारह विधायक इसी समाज के हैं। धोबी समाज के लोगों का कहना है कि अगर ये लोग आवाज नही उठाते है तो इन सभी नेताओं का खुलेआम बहिष्कार होना चाहिए। धोबी समुदाय को बीजेपी की ऐसी भागीदारी और प्रतिनिधित्व नही चाहिए। जो अपने समाज के लिए आवाज नही उठा पाए। धोबी समुदाय के संगठनों का आरोप है कि सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार में 2017 से अब तक धोबी समुदाय के लगभग 50 से ऊपर लोगो की हत्या कर दी गयी है। उन परिवारों को अभी तक न्याय नही मिला हौ। हत्यारें बाहर घूम रहे है। जितनी हत्याएं योगी सरकार में धोबी समुदाय की हो रही है आज तक अन्य पार्टी की सरकारो में नही हुई हैं।
धोबी समाज के संगठनों ने आवाह्न किया है कि ऐसी स्थिति में यूपी के धोबी समुदाय को चाहिए कि जो उत्तर प्रदेश में सैकड़ों धोबी समुदाय के संगठन बने हुए हैं जिनके सैकड़ों राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं, वे सभी लोग एक मंच पर आकर न्याय की आवाज उठाये। समाज के भीतर से ब्राह्मण समाज के बहिष्कार की भी मांग उठ रही है। समाज के संगठनों का कहना है कि धोबी समुदाय को एक निर्णय लेना पड़ेगा कि ब्राह्मणों को पूजा-पाठ, शादी विवाह, ग्रह प्रवेश, मुंडन आदि कार्यक्रम में बुलाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगाना होगा। पंडितो को दान- दक्षिणा देने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना पड़ेगा और मंदिरों में जाना और लाखों रुपया चढ़ावा देना बंद करना होगा। दूसरी ओर बीबीसी में प्रकाशित खबर के मुताबिक अनीश पत्नी दीप्ति मिश्र का कहना है कि- अनीश के परिजन इस शादी से खुश नहीं थे। अनीश और दीप्ति ने एक साथ पंडित दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर से पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की थी। कैंपस में हुई मुलाकातों के बीच अनीश और दीप्ति का चयन ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर हो गया। नौकरी लगने के बाद उनकी अनीश से पहली मुलाकात नौ फ़रवरी 2017 को गोरखपुर स्थित विकास भवन में हुई थी एक ही पद पर चयनित होने के बाद यूनिवर्सिटी कैंपस से शुरू हुआ मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ने लगा। साथ में प्रशिक्षण के दौरान दोनों और क़रीब आ गए।
अनीश और दीप्ति ने अपनी शादी को कोर्ट में रजिस्टर्ड करायाशादी के काग़ज़ात के मुताबिक दोनों ने 12 मई 2019 को गोरखपुर में शादी कर ली थी। उनकी शादी को अदालत ने 9 दिसंबर 2019 को मान्यता दे दी थी। दीप्ति गोरखपुर ज़िले के गगहां थाना क्षेत्र के देवकली धर्मसेन गांव निवासी नलिन कुमार मिश्र की बेटी हैं। दीप्ति चार भाईबहनों में सबसे छोटी हैंउनकी दो बहनों और एक भाई की भी शादी हो चुकी है। उनका भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में हैइस समय उनकी तैनाती श्रावस्ती ज़िले में है। क्या इतने बड़े परिवार में किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया, इस सवाल के जवाब में दीप्ति कहती हैं किनहीं, उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने उनका साथ नहीं दिया। बीबीसी की खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिए।

बसपा में जाएंगे डॉ. आर.एस. प्रवीण!

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26 सालों तक एक आईपीएस अधिकारी के रूप में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना राज्य को अपनी सेवाएं देने के बाद डॉ. आर.एस प्रवीण कुमार अब राजनीति में आ रहे हैं। हमें जो खबर मिली है, उसके मुताबिक अंबेडकरवादी आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण कुमार बहुजन समाज पार्टी ज्वाइन करने जा रहे हैं। सूचना यह भी है कि वह तेलंगाना में बसपा को सत्ता में लाने के लिए काम शुरू करेंगे। खबर यह भी मिली है कि बसपा प्रमुख बहन मायावती उन्हें तेलंगाना में बड़ी जिम्मेदारी दे सकती हैं। इसकी आधिकारिक घोषणा अगस्त महीने में होने की उम्मीद है।

आर. एस. प्रवीण हाल ही में बहनजी से मुलाकात कर चुके हैं। इस मुलाकात के बाद ही उन्होंने अपने पद से वोलेंटरी रिटायरमेंट का फैसला किया है। 19 जुलाई को उन्होंने इसके संबंध में ट्विटर पर रिटायरमेंट को लेकर सूचना दी थी। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि वह सामाजिक न्याय और समानता के लिए काम करेंगे, जोकि उनका जुनून है।

डॉ. प्रवीण 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और फिलहाल एडीजीपी के पद पर थे। एक आईपीएस अधिकारी रहने के बावजूद वह लगातार समाज के कमजोर वर्ग की शिक्षा और बेहतरी के लिए सोचते और काम करते रहें। उन्होंने नौकरी में रहते हुए अमेरिका के हार्वर्ड युनिवर्सिटी में कुछ समय तक पढ़ाई की, जहां से लौटने के बाद साल 2012 में उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री से अनुरोध कर तेलंगाना सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सचिव का पद संभाला, जहां समाज के हाशिये पर पड़े दलित-आदिवासी समाज के बच्चे अपनी जिंदगी बेहतर करने पहुंचते हैं। हालांकि जब आर.एस प्रवीण ने सचिव का पद संभाला तो रेजिडेंशियल स्कूल की हालत खराब थी, लेकिन उन्होंने जल्दी ही इस रेजिडेंशियल स्कूल का नक्शा बदल दिया और सफलता की गाथा लिख दी। यह आर.एस. प्रवीण की मेहनत और दूरदर्शिता का ही नतीजा रहा कि रेजिडेंशियल स्कूल की सफलता को समझने के लिए हार्वर्ड युनिवर्सिटी में शोध हुआ।

आर.एस. प्रवीण की प्रेरणा से ही रेजिडेंशियल स्कूल की आदिवासी समाज की छात्रा पूर्णा मलवथ ने २५ मई २०१४ को सबसे कम उम्र में एवरेस्ट पर पहुंचने वाली लड़की होने का वर्ल्ड रिकार्ड बनाया। तो पूर्णा के साथ दलित समाज के आनंद ने भी एवरेस्ट फतह किया, जहां उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की तस्वीर हाथों में लेकर उन्हें याद किया। आनंद संभवतः पहले दलित हैं, जिन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई सफलता पूर्वक की थी। जाने-माने अभिनेता राहुल बोस ने पूर्णा की सफलता पर एक फिल्म पूर्णा बनाई थी, जिसमें आर.एस. प्रवीण के काम को दिखाया गया है। इस फिल्म में आर.एस. प्रवीण का किरदार खुद राहुल बोस ने निभाया था।

जहां तमाम अधिकारी बड़े पद पर जाने के बाद मिशन-मूवमेंट को भूल जाते हैं, डॉ. आर.एस प्रवीण हमेशा समाज को जगाने में लगे रहें। पिछले आठ साल से उनके मार्गदर्शन में तेलंगाना में भीम दीक्षा कार्यक्रम भी चल रहा है, जो हर साल मान्यवर कांशीराम की जयंती 15 मार्च से लेकर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल तक चलती है। इस दौरान बहुजन नायकों की शिक्षाओं के बारे में चर्चा होती है।

अंबेडकरी-फुले मूवमेंट के सिपाही डॉ. आर. एस प्रवीण कुमार मान्यवर कांशीराम से काफी प्रभावित हैं। जहां तक तेलंगाना में उनके सियासत में उतरने की खबर है तो निश्चित तौर पर यह बड़ी खबर है। तेलंगाना में दलित समाज की आबादी 18 प्रतिशत है जोकि एक बड़ा समाज है। यही वजह है कि उनको लुभाने के लिए मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने पिछले दिनों तमाम घोषणाएं की। प्रदेश में 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में निश्चित तौर पर आर.एस प्रवीण कुमार द्वारा बसपा में आने की खबर से प्रदेश में पार्टी को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। इसकी एक वजह यह भी है कि सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियल स्कूल के सचिव के रूप में उन्होंने जिस तरह से प्रदेश के हाशिये के समाज के लाखों बच्चों की जिंदगी बदल दी और उन्हें ऊंचा उड़ाने का सपना दिखाया, वो बड़ा समाज हमेशा डॉ. आर.एस प्रवीण के साथ खड़ा रहा है। निश्चित तौर पर यह बड़ा समूह आर.एस. प्रवीण के साथ बसपा के पाले में आ सकता है।

बसवराज बोम्मई ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया

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कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में बसवराज बोम्मई ने शपथ ले लिया है। इसके साथ ही कर्नाटक की सियासत में येदियुरप्पा युग समाप्त हो गया है और अब बसवराज का शासन शुरू हो गया है। सुबह जब बसवराज बोम्मई मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने राजभवन पहुंचे तो उनके साथ बी.एस. येदियुरप्पा भी थे।नए मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के करीबी हैं और लिंगायत समुदाय से ही आते हैं। शपथ ग्रहण के बाद बोम्मई ने कहा कि वह राज्य में गरीबों के कल्याण करने की बात कही।गौरतलब है कि इससे पहले पार्टी और येदियुरप्पा के बीच हफ्ते भर की खिंचतान के बाद येदियुरप्पा ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया था।

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यूपी में सबका खेल बिगाड़ सकता है यह गठबंधन

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 उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए हर राजनीतिक दल सियासी समीकरण साधने में जुट गया हैं। भाजपा ने जहां दलितों-पिछड़ों को केंद्र में सरकार में शामिल कर अपनी चाल चल दी है तो बसपा ने ब्राह्मण सम्मेलन शुरू कर दिया है। इन दोनों पार्टियों को टक्कर देने के लिए उत्तर प्रदेश में एक तीसरा सियासी गठबंधन भी तैयार है, जिसमें समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी शामिल हैं। इन दोनों युवा नेताओं के बीच रविवार 25 जुलाई को दिल्ली में बैठक हुई, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण पर चर्चा हुई है।

दरअसल पहली बार बिना अपने पिता अजीत चौधरी के चुनाव मैदान में उतरने जा रहे जयंत चौधरी पश्चिमी यूपी में जाट और मुस्लिम सहित अन्य जातियों को जोड़कर नई सोशल इंजीनियरिंग खड़ी करने की कवायद में जुट गए हैं। जाट-मुस्लिम एकता के लिए राष्ट्रीय लोकदल 27 जुलाई से भाईचारा सम्मेलन शुरू करने जा रही है। इसका आगाज, पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर के खतौली से किया जा रहा है।

 उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय की आबादी करीब 4 प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी यूपी में यह 17 फीसदी के करीब हैं। वहीं 20 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले यूपी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों पर मुस्लिम समाज की आबादी 35 से 50 फीसदी तक है। जाट और मुस्लिम वोटों की बात करें तो यह दोनों समुदाय मिलकर सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, अमरोहा, मुजफ्फरनगर, बागपत और अलीगढ़ एवं मुरादाबाद मंडल सहित विधानसभा की लगभग 100 सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। इसी समीकरण के सहारे आरएलडी खासतौर पर पश्चिमी यूपी में हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहती है। हालांकि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद कमजोर हुई है। जाट जहां भाजपा में चला गया तो मुस्लिम समाज अलग-अलग मौके पर बसपा और समाजवादी पार्टी के साथ जाता रहा।

इसके कारण अजीत चौधरी और जयंत चौधरी को भी 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। अपने पिता की मुत्यु के बाद जयंत चौधरी फिलहाल अखिलेश यादव के साथ मिलकर अपने भविष्य को बेहतर बनाने में जुटे हैं। जयंत चौधरी और अखिलेश यादव को उम्मीद है कि सपा और रालोद मिलकर जाट और मुस्लिम वोटों को फिर से एक साथ ले आएंगे। अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर यह दोनों दल यूपी की सियासत में बाकी दलों का खेल बिगाड़ सकते हैं।

किसानों के समर्थन में ट्रैक्टर से संसद पहुंचे राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को देश भर के लोगों को चौंका दिया। खासकर उन लोगों को जो संसद भवन के आस-पास मौजूद थे। दरअसल राहुल गांधी सोमवार को ट्रैक्टर से संसद भवन पहुंचे। ऐसा कर राहुल गांधी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे किसानों को अपना समर्थन दिया। किसानों ने जंतर-मंतर पर किसान संसद लगा रखा है, जो पूरे मानसून सत्र तक चलेगा। किसान सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों को हटाने की मांग को लेकर पिछले सात महीने से आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर किसानों के समर्थन में संसद में लगातार हंगामा जारी है। कांग्रेस इस पूरे आंदोलन में किसानों के साथ खड़ी है और कृषि कानूनों को वापस लेने की किसानों की मांग का समर्थन कर रही है।

इस दौरान राहुल गांधी के साथ रणदीप सुरजेवाला, दीपेंद्र हुड्डा और बीवी श्रीनिवास सहित कई कांग्रेसी नेता ट्रैक्टर पर राहुल गांधी के साथ दिखें। हुड्डा और सुरजेवाला को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया इस दौरान राहुल गांधी ने कहा कि किसानों की आवाज नहीं सुनी जा रही है। उन्होंने तीनों कानूनों को काला कानून बताते हुए कहा कि सरकार को इन कानूनों को वापस लेना होगा।

बीहड़ से संसद तक फूलन देवी की पूरी कहानी

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 फूलन देवी की हत्या 25 जुलाई 2001 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के बाहर कर दी गई थी। फूलन देवी एक ऐसी नायिका थीं, जिन्होंने अत्याचार के खिलाफ चुप रहने की बजाय लड़ने का रास्ता चुना। जिन्होंने अपने अपराधियों को अपने हाथों से खुद सजा दी। जो अपनी हिम्मत के बूते बीहड़ से संसद तक पहुंची। ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास ने फूलन देवी का सबसे पहली बार इंटरव्यू लेने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय का इंटरव्यू लिया है। जिन्होंने फूलन देवी की सारी कहानी बताई। एक ऐसी कहानी, जिसने फूलन से जुड़ी कई नई बातों पर प्रकाश डाला है। इस इंटरव्यू को देखने के बाद आप ऐसी फूलन को जान पाएंगे, जो उनके बारे में प्रचारित तमाम अफवाहों को नकारती हुई, असली फूलन देवी को सामने लाती है। 2018 में लिए गए इस इंटरव्यू को अब तक 10 लाख से ज्यादा दर्शक देख चुके हैं। तो जानिए, फूलन की पूरी कहानी। आप भी देखिए-