इस समय पूरे देश की निगाहें कनार्टक विधानसभा चुनाव प्रचार पर लगी हैं, जहाँ 10 मई को 224 सीटों के लिए वोट पड़ने हैं.वोटों की गिनती 13 मई को होगी. चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है, जबकि जेडीएस के साथ बसपा, आम आदमी पार्टी जैसी छोटी पार्टियाँ भी अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटी हुई हैं. इस चुनाव में जहाँ बीजेपी दक्षिण भारत के अपने इकलौते दुर्ग की रक्षा में सारी ताकत झोंक दी है, वहीँ कांग्रेस कर्णाटक की सत्ता में वापसी के लिए कोई कोर कसर छोडती नहीं दिख रही है.इनसे इतर जेडीएस एक बार फिर खुद को किंगमेकर की भूमिका लाने के लिए बेताब नजर आ रही है. बहरहाल 2024 के लोकसभा का सेमी फाइनल कहे जा रहे कर्णाटक चुनाव में राजनीति के पंडितों के मुताबिक कांग्रेस का पलड़ा भारी है और वह विजय हासिल कर सकती है,जबकि बीजेपी मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नकारेपन के चलते 50-70 सीटों तक सिमट सकती है.बीजेपी के विरुद्ध कर्णाटक का यह रिकॉर्ड भी जा रहा है कि वहां 1985 के बाद कोई भी राजनीतिक दल लगातार दो बार विधानसभा चुनाव में विजय दर्ज नहीं कर पाया है. शायद बीजेपी को भी इन सब बातों का भान हो गया है, इसलिए वह योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह, अमित शाह जैसे बड़े नेताओं को प्रचार के मोर्चे पर तैनात कर दी है. इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल चुनाव प्रचार के जरिये वहां के 50 लाख कार्यकर्ताओं से संपर्क साध चुके हैं. कर्णाटक चुनाव में उनकी कुल 15 रैलियां होनी हैं. बहरहाल बीजेपी ने कर्णाटक में दोबारा वापसी के लिए जो सबसे बड़ा दांव खेला है, वह है मुस्लिम आरक्षण के खात्मे का.
भाजपा ने खेला : मुस्लिम आरक्षण के खात्मे का दांव
मार्च में मुख्यमंत्री बसवराज ने एक कैबिनेट मीटिंग बुलाई, जिसमें कई महत्वपूर्ण मसलों पर चर्चा हुई. इनमे सबसे अहम मसला था मुस्लिम आरक्षण का. उस बैठक के बाद 24 मार्च को एक सरकारी आदेश जारी हुआ. इस आदेश के तहत सरकार ने ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम कोटे को बाहर कर दिया. कर्णाटक में ओबीसी आरक्षण कुल 32 प्रतिशत था, जिसमे 4 प्रतिशत कोटा मुस्लिमों का था. नए आदेश के तहत नौकरियों और शिक्षा में मुस्लिम कोटे का 4 फीसद आरक्षण वीरशैव-लिंगायत और वोक्कालिगा में दो –दो प्रतिशत बांट दिया गया है. दरअसल, वहां ओबीसी आरक्षण पहले पांच कैटेगरी में बंटा था. सरकार ने इसमें बदलाव करते हुए अब चार कैटेगरी: 1,2(ए),2 (सी), और 2(डी ) में बाँट दिया और 2(बी) को ख़त्म कर दिया है. मुस्लिमों को आरक्षण से महरूम करने के पीछे सरकार ने यह दलील दी है कि संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए कोई प्रावधान नहीं है.फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ओबीसी कोटे के नए विभाजन पर 9 मई तक के लिए रोक लगा दी गयी है. बहरहाल चुनाव को देखते हुए भाजपा ने मुस्लिम आरक्षण को ख़त्म करने का जो निर्णय लिया, उसका सद्व्यवहार करने के लिएवह अपने स्टार प्रचारकों के जरिये मैदान में कूद चुकी है. इसके जरिये वह खुद को हिन्दू हितैषी और कांग्रेस को मुस्लिमपरस्त बताने में जुट चुकी है.
मुसलमानों के खिलाफ चल रही हैनफरत की आंधी
अपने नफरती भाषणों के लिए मशहूर यूपी के सीएम योगी ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा के नेतृत्व वाले जदएस के मजबूत गढ़ और वोक्कालिंगा बहुल क्षेत्र, मांड्या में अपनी पहली चुनावी सभा के जरिये सन्देश दिया है,’ कांग्रेस पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया(पीएफआई) का तुष्टिकरण करती है और धर्म के आधार पर आरक्षण देती है, जो संविधान के विरुद्ध है.’ उन्होंने आगे कहा है ,’1947 में भारत का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था. देश धर्म के आधार पर आरक्षण का समर्थन नहीं कर सकता और हम एक और विभाजन के लिए तैयार नहीं हैं.’ योगी जी की भांति कर्णाटक के बैलगावी पहुंचे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा है कि उसने सत्ता में आने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया है. भारत के इतिहास में अगर कोई पार्टी है,जिसने सत्ता में आने के लिए धर्म का सहारा लिया है तो वह कांग्रेस है.यह हिन्दू, मुस्लिम, इसाई की राजनीति करती है.इस तरह की राजनीति कभी नहीं की जानी चाहिए.अमित शाह ने कर्णाटक के चुनावी सभाओं में घोषणा किया है कि 10 मई को होने वाला विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के विकास की राजनीति बनाम कांग्रेस के तुष्टिकरण की राजनीति के बारे में है. कांग्रेस आज भी तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है. कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को दिया गया चार प्रतिशत आरक्षण भाजपा ने समाप्त कर दिया है और उसने लिंगायत, वोक्कालिंगा, एससी और एसटी के लिए आरक्षण बढ़ा दिया है. कांग्रेस के डीके शिवकुमार ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वे एक बार फिर मुसलमानों के लिए आरक्षण लायेंगे. मैं काग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार से पूछना चाहता हूँ , आप एक बार फिर मुस्लिम आरक्षण लाने के बारे में बोल रहे हैं, लेकिन आप किसका हिस्सा कम करेंगे? कर्णाटक के लोगों को जवाब दें ! क्या आप वोक्कालिंगा या लिंगायत या एससी/ एसटी के आरक्षण को कम करेंगे. कुल मिलाकर यदि कोई कर्णाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रचार पर ध्यान दे तो लगेगा कि वहां मुसलमानों के खिलाफ नफरत की आंधी चल रही है
दरअसल कर्नाटका विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुस्लिम आरक्षण के खात्मे के जरिये एक बार फिर डॉ. हेडगेवार द्वारा इजाद उस हेट पॉलिटिक्स(नफरत की राजनीति) का दांव चल दिया है, जिसके सहारे ही कभी वह दो सीटों पर सिमटने के बावजूद नयी सदी में अप्रतिरोध्य बन गयी. अडवाणी-अटल, मोदी-शाह की आक्रामक राजनीति से अभिभूत ढेरों लोगों को यह पता नहीं कि जिस हेट पॉलिटिक्स के सहारे आज भाजपा विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली पार्टी के रूप में इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा चुकी है, उसके सूत्रकार रहे 21 जून,1940 को इस धरा का त्याग करने वाले चित्तपावन ब्राहमण डॉ. हेडगेवार,जिन्होंने 1925 में उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी, जिसका राजनीतिक विंग जनसंघ आज की भाजपा का रूप अख्तियार किया है. अपने लक्ष्य को साधनेके लिए उन्होंने एक भिन्न किस्म के वर्ग-संघर्ष की परिकल्पना की थी
डॉ.हेडगेवार ने अंग्रेजों की जगह मुसलमानों को बनाया:हिन्दुओं का वर्ग शत्रु!
वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्तकर मार्क्स मार्क्स ने कहा है कि दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसका उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो इससे बहिष्कृत व वंचित है. इन उभय वर्गों में कभी समझौता नहीं हो सकता. इनके मध्य सतत संघर्ष चलते रहता है. कोलकाता की अनुशीलन समिति, जिसमे गैर-सवर्णों का प्रवेश निषिद्ध था, के सदस्य रहे डॉ. हेडगेवार के समय पूरा भारत अंग्रेजों को अपना ‘वर्ग- शत्रु’ मानते हुए,उनसे भारत को मुक्त कराने में संघर्षरत था. किन्तु डॉ.हेडगेवार ने एकाधिक कारणों से मुसलमानों के रूप में एक नया ‘वर्ग-शत्रु’ खड़ा करने की परिकल्पना की. उन्हें पता था भारत अंग्रेजों के लिए बोझ बन चुका है और वे जल्द ही भारत छोड़कर चले जायेंगे. ऐसे में उन्होंने आजाद भारत की सत्ता ब्राहमणों के नेतृत्व में सवर्णों के हाथ में देने के लिए हिन्दुओं को एक वर्ग में संगठित करने की योजना बनाया. उन्हें पता था जिन ब्राह्मणों को तिलक- नेहरु इत्यादि ने विदेशी प्रमाणित किया है, उनको आजाद भारत का बहुसंख्य समाज ब्राहमण के नाम पर हरगिज वोट नहीं देगा: वोट दे सकता है सिर्फ हिन्दू के नाम पर. ऐसे में उन्होंने आजाद भारत की सत्ता सवर्णों के हाथ में देने के लिए अंग्रेजों की जगह ‘मुसलमानों को प्रधान शत्रु’ चिन्हित करते हुए उनके विरुद्ध जाति-पाति का भेदभाव भुलाकर सवर्ण-अवर्ण सभी हिन्दुओ को ‘ हिन्दू – वर्ग’ (संप्रदाय) में उभारने का बलिष्ठ प्रयास किया. उन्हें पता था असंख्य भागों में बंटे हिन्दू आसानी से तभी एक होते हैं, जब उनके समक्ष मुसलमानों का खौफ खड़ा किया जाता है.
इस दूरगामी सोच के तहत ही डॉ. हेडगेवार ने ‘हिन्दू धर्म-संस्कृति के जयगान और मुख्यतः मुस्लिम विद्वेष के प्रसार की हेट पॉलिटिक्स के आधार पर आरएसएस को खड़ा करने की परिकल्पना किया. हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पाकर संघ लम्बे समय से चुपचाप काम करता रहा. किन्तु मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जब बहुजनों के जाति चेतना के चलते सत्ता की बागडोर दलित –पिछड़ों के हाथ में जाने का आसार दिखा,तब संघ ने राम जन्मभूमि मुक्तिके नाम पर, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिए, जिसमे हिन्दू- धर्म- संस्कृति के जयगान और खासकर मुस्लिम विद्वेष के भरपूर तत्व थे. राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये मुस्लिम विद्वेष का जो गेम प्लान किया गया, उसका राजनीतिक इम्पैक्ट क्या हुआ इसे बताने की जरुरत नहीं है. एक बच्चा भी बता देगा कि मुख्यतः मुस्लिम विद्वेष के प्रसार के जरिये ही भाजपा केंद्र से लेकर राज्यों तक में अप्रतिरोध्य बनी है, जिसमें संघ के अजस्र आनुषांगिक संगठनों के अतिरक्त साधु-संतों, मीडिया औरपूंजीपतियों की भी जबरदस्त भूमिका रही.
मंडल उत्तरकाल में भाजपा ने केंद्र से लेकर राज्यों तक जितने भी चुनाव जीते हैं, वह अधिकांशतः मुसलमानों के खिलाफ नफरत की राजनीति के जरिये ही जीते गए हैं.मोदी राज में 24 घंटे चुनावी मोडमे रहने वाली भाजपा मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने में लगातार मुस्तैद रही है. उन के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने के लिए ही भाजपा की ओर से विगत वर्षों में अनुच्छेद 370 के खात्मे, सीएए, एनपीआर और एनसीआर मुद्दा खड़ा किया गया.इसी मकसद से उसने 2020 के अगस्त में कोरोना के जोखिम भरे दौर में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी से राममंदिर निर्माण का भूमि पूजन कराया . इसी मकसद से 2021 के 13 दिसंबर को बहुत ही ताम झाम से प्रधानमंत्री द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण कराया गया. मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल पैदा करने लिए ही पिछले वर्ष देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले यूपी विधानसभा चुनाव को 80 बनाम 20 पर केन्द्रित किया गया. इसी मकसद से कर्णाटक में मुसलमानों की खिलाफ नफरत की आंधी पैदा की जा रही है. लेकिन मुस्लिम विद्वेष को बढ़ावा देकर कर्णाटक में चुनाव जीतने की रणनीति में भाजपा ने इस बार एक नया बदलाव किया है.
मुसलमान बने आरक्षण के नए हकमार वर्ग
राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के ज़माने से भाजपा ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत का जो लगातार माहौल पैदा करने की कोशिश किया, उसमें उसने उनको विदेशी आक्रान्ता , हिन्दू धर्म-संस्कृति का विध्वंशक, आतंकवादी, पाकिस्तानपरस्त, भूरि-भूरि बच्चे पैदा करने वाले जमात इत्यादि के रूप में चिन्हित करने की स्क्रिप्ट रचा. किन्तु कर्णाटक में उन्हें एक नए रूप में चिन्हित करने का प्रयास हो रहा है. यहां उन्हें आरक्षण का अपात्र बताकर हिन्दुओं के आरक्षण के हकमार- वर्ग के रूप में उसी तरह चिन्हित करने का प्रयास हो रहा है, जैसे भाजपा यादव,कुर्मी, जाटव, चमार, दुसाध इत्यादि को दलित- पिछड़ों के आरक्षण के हकमार वर्ग के रूप में चिन्हित कर बहुजन समाज की अनग्रसर जातियों को इनके खिलाफ आक्रोशित कर चुकी है. भाजपा के लोग कर्णाटक के लिंगायत, वोक्कालिगा, दलितों इत्यादि को लगातार सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह मुसलमानों का आरक्षण छीन कर हिन्दुओं को दे रही है. कर्णाटक में जिस तरह मुसलमानों का आरक्षण ख़त्म कर हिन्दुओं की पिछड़ी जातियों के मध्य वितरित किया गया है, वह जबरदस्त हिन्दू ध्रुवीकरण का सबब बन सकता है. दरअसल हिन्दू धर्म-संस्कृति के आक्रान्ता के रूप में मुसलमानों प्रचारित कर भाजपा जितना लाभ उठा सकती थी, उठा चुकी है. अब उसे नए उपाय तलाशने होंगे और इसकी शुरुआत उसने कर्णाटक से कर दी है.अतः जो विपक्ष अबतक भाजपा के ध्रुवीकरण की राजनीति की काट ढूंढने में असहाय रहा है, कर्णाटक चुनाव ने उसकी सिरदर्दी में और इजाफा कर दिया है . वह आने वाले हर चुनाव में ओबीसी के कोटे में मिलने वाले मुसलमानों के आरक्षण के खात्मे का मुद्दा उठाकर हिन्दुओं को ललचा सकती है. इस लेखक का यह दावा कोई ख्याली पुलाव नहीं, तथ्यों पर आधारित है, इस बात का साक्ष्य तेलगाना है!
तेलंगाना में होने जा रहा है : कर्णाटक का प्रयोग
बीजेपी ने मुस्लिम आरक्षण को तेलगाना में केसीआर के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. दरअसल केसीआर की पार्टी मुस्लिमों को मिलने वाले आरक्षण को बढ़ाकर 12% करने की कोशिश कर रही है. ‘भारतीय राष्ट्र समिति’ के घोषणापत्र में भी इसका वादा किया गया था, हालांकि फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अब बीजेपी ने इसी मुद्दे को पलट दिया है और मुस्लिम आरक्षण को खत्म करने की बात कर केसीआर पर निशाना साधा है. अमित शाह ने सीधे ये मैसेज दिया है कि तेलंगाना सरकार दलितों के हितों का खयाल नहीं रख रही है और धर्म के नाम पर राजनीति कर रही है. उन्होंने कहा है कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी की सरकार आएगी तो इस गैर-संवैधानिक मुस्लिम आरक्षण को हम समाप्त करेंगे. एससी, एसटी और ओबीसी को अपना अधिकार मिलेगा. अर्थात मुसलमानों के कारण दलित,आदिवासी, ओबीसी अपने अधिकारों से महरूम हैं, तेलंगाना में ऐसा सन्देश भाजपा की ओर से दे दिया गया है.और जिस दिन भाजपा लाखों साधु- संतो, लेखक-पत्रकारों और चैनलों में छाए सुधीर चौधरियों , अंजना ओम कश्यपों, रुबिया लियाकतों के सहारे मुसलमानों से दलित,आदिवासी,ओबीसी को अधिकार दिलाने का मुद्दा लेकर सडकों पर उतरेगी: हिन्दू ध्रुवीकरण का ऐसा एक नया सैलाब उठेगा, जिसमें बह जायेगा विपक्ष ! ऐसे में विपक्ष को कर्णाटक और तेलंगाना से सबक लेकर भविष्य में मुसलमानों के खिलाफ उठने वाले नफरत के सैलाब की काट ढूंढने में लग जाना चाहिए.विपक्ष अगर कर्णाटक में नफरत की राजनीति की काट पैदा करने के प्रति गंभीर है तो ऐसे मुद्दे की तलाश करनी होगी, जिससे मुसलमानों की जगह कोई और बहुजनों के वर्ग-शत्रु की जगह ले ले. और विपक्ष खासकर, सामाजिक न्यायवादी दल चाह दें तो आजाद भारत में सवर्णवादी सत्ता की साजिशों से प्रायः सर्वहारा की स्थिति में पहुंचे मुसलमानों की जगह भाजपा के चहेते वर्ग को बहुत आसानी से दलित, आदिवासी , पिछड़ों के वर्ग- शत्रु के रूप में खड़ा किया जा सकता है.
मुस्लिम आरक्षण की काट के लिए : विपक्ष करे सवर्णों को संख्यानुपात पर सिमटाने की घोषणा !
दुनिया जानती है कि भाजपा ब्राहमण, ठाकुर, बनियों की पार्टी है और उसकी समस्त गतिविधियां इन्हीं के हित-पोषण के पर केन्द्रित रहती है. अपने इसी चहेते वर्ग के लिए ही वह देश बेच रही है; इन्हीं के लिए वह देश को धर्म और जातियों के नाम पर विभाजन कराती है.चूकि उसकी समस्त नीतियां सवर्ण हित को ध्यान में रखकर लागू की जा रही हैं, इसलिए आज सवर्णों का शक्ति के स्रोतों(आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक) पर बेहिसाब कब्ज़ा हो गया है.यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स सवर्ण मालिकों के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की हैं. चार से आठ-आठ, दस-दस लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद विधान सभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धार्मिक और नॉलेज सेक्टर में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय विशेष का नहीं है. आंकडे चीख-चीख कर बताते हैं कि आजादी के 75 सालों बाद भी हजारों साल पूर्व की भांति सवर्ण ही इस देश के मालिक हैं! समस्त क्षेत्रों में इनके बेहिसाब कब्जे से बहुजनों में वह सापेक्षिक वंचना(रिलेटिव डिप्राईवेशन) का अहसास तुंग पर पहुच चुका है, जो सापेक्षिक वंचना क्रांति की आग में घी का काम करती है.
मोदी राज में जिस तरह सवर्णों का बेहिसाब कब्ज़ा हुआ है; जिस तरह उनके खिलाफ दलित ,आदिवासी,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों में सापेक्षिक वंचना का भाव तुंग पर पहुंचा है, उसे देखते हुए यदि विपक्ष यह घोषणा कर दें कि 2024 में सत्ता में आने पर हम जातीय जनगणना कराकर शक्ति के स्रोतों पर 70-80% कब्ज़ा जमायें 7.5% आबादी वाले सवर्ण पुरुषों को अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में उनके संख्यानुपात पर रोककर उनके हिस्से का 60-70% अतिरिक्त(सरप्लस) अवसर मोदी द्वारा गुलामों की स्थिति में पहुचाये गए जन्मजात वंचित वर्गों के मध्य वितरित करेंगे, स्थिति रातों-रात बदल जाएगी: भाजपा की साजिश से मुसलमानों के खिलाफ बहुजन में पूंजीभूत हुई नफरत नाटकीय रूप से सवर्णों की ओर शिफ्ट हो जाएगी.और विपक्ष द्वारा ऐसी घोषणा करना समय की पुकार है. अगर सवर्णों की आबादी 15 प्रतिशत है तो उसमे उनकी आधी आबादी अर्थात महिलाएं भी कमोबेश बहुजनों की भांति ही शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत व वंचित है. अगर ग्लोबल जेंडर गैप की पिछली रिपोर्ट के मुताबिक भारत की आधी आबादी को आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर आने में 257 साल लगने हैं तो उस आधी आबादी में सवर्ण महिलाएं भी हैं . सारी समस्या सवर्ण पुरुषों द्वारा सृष्ट है, जिन्होंने सेना, पुलिस बल व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों; राजसत्ता की संस्थाओं,पौरोहित्य,डीलरशिप; सप्लाई,सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन; शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि पर 70-80 प्रतिशत कब्ज़ा जमा कर भारत में मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या :आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को शिखर पर पंहुचा दिया है. सवर्णों को उनके संख्यानुपात में सिमटाने की घोषणा से बहुजनों में उनका छोड़ा 60 से 70 प्रतिशत अतिरिक्त अवसर पाने की सम्भावना उजागर हो जाएगी. ऐसे में वे मुस्लिम आरक्षण के खात्मे से सिर्फ नौकरियों में मिलने वाले नाममात्र के अवसर की अनदेखी कर सवर्णों को निशाने पर लेने का मन बनाने लगेंगे. इससे डॉ. हेडगेवार द्वारा इजाद मुस्लिम विद्वेष का वह हथियार भोथरा हो जायेगा,जिसके सहारे भाजपा अप्रतिरोध्य बनी है


आंबेडकर की मूर्तियों का
तेलंगाना में 14 अप्रैल को 125 फीट की बाबासाहेब अंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण हुआ। तेलंगाना सरकार की ओर से यह शानदार प्रतिमा बनाई गई है। इसके उद्घाटन के मौके पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने बाबासाहेब के पोते प्रकाश आंबेडकर को आमंत्रित किया था। जो तस्वीरें आई है, उसमें साफ दिख रहा है कि प्रकाश आंबेडकर फीता काट कर इसका उद्घाटन कर रहे हैं। बगल में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव खड़े हैं।
दरअसल तेलंगाना की कुल आबादी 10.03 मिलियन है, जिसमें दलितों की आबादी 1.82 मिलियन है। यह प्रदेश की कुल आबादी का 17.53 प्रतिशत है। प्रदेश के 33 जिलों में से 9 जिलों में दलितों की आबादी 20 प्रतिशत से अधिक है। दलितों की इस बड़ी आबादी को अपने पाले में लाए बिना तेलंगाना में सरकार बनाना संभव नहीं है। के.सी.आर इसी आबादी को लुभाने के लिए ये सभी कदम उठा रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि तेलंगाना की यह आबादी चुनाव में के.सी.आर के लोक लुभावन वादों के साथ खड़ी होती है या फिर लाखों बच्चों की जिंदगी बदल कर अपना काम दिखा चुके आर.एस. प्रवीण के साथ।
वे आगे कहते हैं कि इस कंकड़ीली ज़मीन पर टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा, भिन्डी, हरीमिर्च, लौकी और बोदी की फली की अच्छी पैदावार होती है। युवाओं ने कुछ महीनों से लाख की खेती करना भी आरम्भ किया है।
बंद पड़े खदानों में मछली पालन
एक मुर्गी से एक दिन में सामान्यतः 32 से 36 ग्राम बीट मिलता है। इसमें 40 फीसदी नमी होती है। यह जैविक फर्टिलाइजर सब्जियों के लिए अत्यधिक लाभकारी है। हॉर्टिकल्चरिस्ट राकेश कुशवाहा बताते हैं कि इस खाद में फॉस्फोरस की मात्रा अन्य खादों के मुकाबले अधिक होती है और यही फॉस्फोरस सब्जियों के आकार को बढ़ाने का काम करता है। मुर्गी की बीट से बना खाद पूरी तरह जैविक होता है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है। पॉल्ट्री बीट में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, कैल्सियम एवं मैग्नेशियम पाया जाता है, जो पौधों के अत्यंत लाभदायक है। मुर्गी की बीट का अधिक उत्पादन होने पर किसान बीट की बिक्री करके भी अच्छी कमाई सकते हैं।
1 जून, 1873 को ज्योतिराव फुले (11अप्रैल 1827 – 28 नवम्बर 1890) की रचना ‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन हुआ था। यह किताब मराठी में लिखी गयी। इसकी प्रस्तावना फुले ने अंग्रेजी में और भूमिका मराठी में लिखी है। इस किताब को लिखने का मूल उद्देश्य बताते हुए फुले ने लिखा है कि ‘इस किताब को लिखने का एकमात्र उद्देश्य सभी उत्पीड़ित लोगों को उनकी गुलामी का अहसास दिलाना, उनको इस योग्य बनाना कि वे अपनी इस हालात के कारणों को पूरी तरह समझ सकें और अपने आप को ब्राह्मणों की गुलामी, उत्पीड़न एवं अन्याय से मुक्त करने के लिए सक्षम बना सकें (गुलामगिरी की भूमिका)।
फुले ने करीब 12 किताबें लिखी हैं। इन सभी किताबों में उन्होंने ऐसी शैली और भाषा का प्रयोग किया है, जिससे ये किताबें व्यापक दलित-बहुनजों और मेहनतकशों स्त्री-पुरुषों को समझ में आ जाएं। अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए फुले ने गुलामगिरी भी संवाद शैली में लिखा और उसे विभिन्न छोटे-छोटे परिच्छेदों में विभाजित किया। गुलामगिरी में कुल सोलह परिच्छेद हैं। इसके अलावा उन्होंने इसमें एक लंबा पंवाड़ा और बहुजन संत तुकाराम की शैली पर लिखित तीन अभंग भी समाहित किया है।
जब भारत आते हैं; तब उनके लिए इस देश के मायने कुछ और हो जाते हैं। सिंपल भाषा में कहें तो ये देश बुद्ध का देश नहीं रहता, भगवान चेंज हो जाते हैं। यह बात साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरे देशों से संबंध बनाने के लिए भगवान बुद्ध को इस्तेमाल करते हैं। कई बार इसमें उनका स्वार्थ और मौका परस्ती भी झलक जाती है। जब विदेश में कुछ बड़ा होता है, तब यही मीडिया पीछे–पीछे तक विदेश चला जाएगा। वहां से जाकर रिपोर्टिंग करेगा। रशिया और यूक्रेन की लड़ाई में यूक्रेन तक चला जाएगा, जिसमें उसका टीआरपी छोड़ कोई राष्ट्र परस्त भाव दिखता नहीं है। लेकिन जब देश के सबसे बड़े राष्ट्र निर्माता को दुनिया भर में तवज्जो दी जा रही है, तब भारतीय मीडिया गूंगी हो गई है। क्यों गूंगी हो गई है, यह बड़ा सवाल है?
इस बार आज 29 मार्च 2023 को सम्राट अशोक की जयंती मनाई गई। ऐसे लोगों द्वारा जो अशोक की महानता को, भारत के लिए उनके योगदान को और बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में उनके योगदान को भूले नहीं है। लेकिन भारत की सरकारों ने उस सम्राट अशोक को अनदेखा कर दिया, जिसके राज्य का चिन्ह आज भी इस्तेमाल होता है। जिसका दिया चक्र, जिसे अशोक चक्र कहा जाता है, भारत के तिरंगे में है। चाहे कांग्रेस की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो, गठबंधन की सरकारें रही हों, या अब भाजपा की सरकार हो, भारत की तमाम सरकारों ने अगर सम्राट अशोक को नजरअंदाज कर दिया, तो सवाल उठता है ऐसा क्यों?
मध्यप्रदेश का मण्डला जिला एक आदिवासी बाहुल्य है। जो पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। इस जिले में बसे आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख साधन खेती है। लेकिन, सहजता से खेती कर पाना इतना सरल नहीं है, यह हमें मण्डला जिले का मोहगांव ब्लॉक बताता है। इस ब्लॉक के 12 गाँव में आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी लोग पीढ़ियों से राजस्व और वन भूमि पर खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों को आजतक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) प्रदान नहीं किये गये हैं। भूमि के पट्टे ना मिलने से आदिवासी और अन्य परंपरागत निवासी सरकार की किसान सम्मान निधि, कृषि क्षतिपूर्ति जैसी अन्य योजनाओं से वंचित रह जाते है। वहीं, पट्टा न मिलने से लोग जमीन पर आधिकारिक हक भी नहीं जता पाते।
किसानों की काबिज भूमि के पट्टे प्राप्ति का अभियान चलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा का कहना है कि, ‘यह कहानी मंडला जिले के मोहगांव ब्लॉक के 12 गाँवों की है। जहां पीढ़ियों से लोग काबिज भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें अब तक पट्टा नहीं मिला। जिससे किसानों को कृषि योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिलता। सिन्हा आगे कहते हैं, ‘मेरे ख्याल से मध्यप्रदेश में अगर सर्वे किया जाए, तो ऐसे हजारों परिवार मिलेगें। जो कि पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें पट्टे नहीं मिले।


मध्यप्रदेश में जमीन पट्टे की मांग सिवनी (पांचवीं अनुसूची क्षेत्र) जिले से भी उठ रही है। जिले की जनपद पंचायत घंसौर, ग्राम पंचायत बखारी माल और धूमामाल के बरगी बांध विस्थापितों ने एक पत्र, दिनांक 22-02-2023 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम लिखा है। पत्र में कहा गया कि, वन अधिकार कानून 2006 के तहत पूर्व से काबिज दावेदारों को जांच उपरांत भू-अधिकार पत्र प्रदान किये जाएंगे। इस पत्र के जरिए प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि ना मिलने जैसी कई मूलभूत समस्याओं के समाधान की मांग की गयी।
विचारणीय है कि एक तरफ आदिवासी वर्ग सालों से जमीन पट्टों की मांग करता आ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ लाखों भू-अधिकार दावें निरस्त हो रहें हैं और दावों का निपटारा भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थति में, आदिवासी वर्ग के गरिमा पूर्ण जीवन जीने की आजादी, न्याय, विश्वास, समता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट बरकरार है। आदिवासी वर्ग को लेकर हमें बार-बार सुनने मिलता हैं कि,‘‘जल, जंगल और जमीन, ये हैं आदिवासी के अधीन, लेकिन हकीकत बिल्कुल इससे उलट है। आदिवासी वर्ग आज भी भूमि जैसे अन्य संसाधनिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।


चुनावों पर करीब से नजर रखने वाली संस्था सीएसडीएस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का फार्मूला दिया है। सीएसडीएस का दावा है कि अगर इस फार्मूले पर काम किया जाए तो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को आसानी से सत्ता से बाहर किया जा सकता है।
दरअसल सीएसडीएस ने 2024 चुनावों को लेकर जो सर्वे किया है, उसके मुताबिक अगर भाजपा को छोड़कर सारा विपक्ष साथ मिलकर चुनाव लड़े तो आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को दुबारा सत्ता में आने से आसानी से रोका जा सकता है। सर्वे करने वाली संस्था का कहना है कि ऐसा होने पर विपक्ष को आसानी से बहुमत मिल जाएगा। दरअसल सीएसडीएस के इस दावे के पीछे पिछले चुनावों में तमाम दलों को मिली सीटें और वोट प्रतिशत है।
एक सच्चा अंबेडकरवादी जब हुंकार भरता है, तो बड़ी-बड़ी तानाशाह सरकार घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। यह तस्वीर तेलंगाना के बसपा प्रमुख आर.एस प्रवीण कुमार की है, जो जीत के बाद अपना आमरण अनशन तोड़ रहे हैं। दरअसल तेलंगाना में भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद तेलंगाना के तमाम विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लेकिन आईपीएस की नौकरी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामने वाले चर्चित अंबेडकरवादी आर.एस. प्रवीण ने सरकार के खिलाफ आमरण अनशन का ऐलान कर दिया था। उन्होंने 16 मार्च को घोषणा की थी कि जब तक ग्रुप-वन की प्रारंभिक परीक्षा रद्द नहीं होती, वह आमरण अनशन पर रहेंगे।
उन्होंने 17 मार्च से बसपा मुख्यालय पर आमरण अनशन भी शुरू कर दिया। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर घर पर छोड़ दिया। उन्होंने वहां भी अनशन जारी रखा। इस बीच मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव पर दबाव बढ़ता गया, जिसके बाद आखिरकार 24 घंटे के भीतर सरकार को बसपा और छात्र संगठनों की मांग माननी पड़ी। तेलंगाना राज्य लोक सेवा आयोग ने ग्रुप वन की प्रारंभिक परीक्षा सहित दो अन्य परीक्षाएं रद्द कर दी। जिसके बाद आर.एस प्रवीण ने अनशन वापस ले लिया। इस बीच आर.एस प्रवीण की बेटी का भी एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह पिता के आमरण अनशन की घोषणा के बाद रोती हुई नजर आई थी।
