अक्सर आंबेडकर की मूर्तियों को ही क्यों तोड़ा जाता है

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आंबेडकर की मूर्तियों का
अक्सर सिर ही क्यों तोड़ा जाता है
जब भी उनकी टूटी मूर्तियों को देखता हूं
यह प्रश्न परेशान करता है
आंबेडकर का सिर
उनकी अद्वितीय मेधा
असाधारण प्रतिभा
विलक्षण बुद्धि
अतुलनीय तर्कणा शक्ति
महान विवेक
गहन इतिहासबोध का प्रतीक है
इसी सिर ने
वेदों के ‘महान’ ऋृषियों की महानता को
बेनकाब कर दिया
इसी ने स्मृतिकारों को ललकारा
इसी ने पुराणकारों की पोल-पोट्टी खोल दी
इसी ने गीता के दर्शन की
मिट्टी पलीत कर दी
इसी मनु को ठिकाने लगा दिया
इसी ने ब्राह्मण, विष्णु, महेश की असल सच्चाई बताई
इसी ने राम की हकीकत का पर्दाफाश किया
इसी ने हिदुत्ववादियों को उनकी औकात बताई
इसी ने ब्राह्मणों-द्विजों की श्रेष्ठता को प्रश्नांकित किया
इसी ने मर्दों को स्त्रियों की तुलना में
श्रेष्ठ मानने से इंकार कर दिया
इसी ने तिलक के स्वराज
गांधी के रामराज को चुनौती दी
इसी ने ब्रह्मा और मनु के विधान को उलट कर
आधुनिक विधान, संविधान बना दिया
इसी ने वैदिक आरक्षण को तोड़ने के लिए
संवैधानिक आरक्षण का प्रावधान किया
इस सिर ने
वैचारिक-संवैधानिक तौर पर ही सही
भारत के इतिहास को उलट-पुलट दिया
इसी ने बुद्ध-कबीर-फुले को
भारत के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित कर दिया
आंबेडकर का सिर
ब्राह्मणवादियों-मनुवादियों के जी का जंजाल बना हुआ है
इसने उनके चिर स्थायी वर्चस्व को
हिलाकर कर रख दिया
इस सिर ने, उन्हें
शंबूक की औलादों को
बराबरी देने के लिए मजबूर किया
आंबेडकर का सिर
उनके जीते जी
और उनके मरने बाद भी
हिंदुत्वादियों-मनुवादियों-ब्राह्मणवादियों के लिए
गले की हड्डी और आंख की किरकी बना रहा
वे तब भी उनके सिर को कुचल देना चाहते थे
अब उनके सिर को तोड़ देते हैं
लेकिन उन्हें पता नहीं
उस सिर से निकले हुए विचार
करोड़- करोड़ दलित-बहुजनों के सिरों में
जगह बना चुके हैं
उनका वे
क्या करेंगे?

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