भारत के 20 राजनीतिक दल 28 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का विरोध कर रहे हैं। इसमें देश के तकरीबन सभी प्रमुख राजनीतिक दल शामिल हैं। मुद्दा भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस दौरान आमंत्रित नहीं करने का है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसा कर राष्ट्रपति पद की गरिमा का अपमान किया गया। साथ ही विपक्ष की यह भी मांग है कि नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बजाय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को करना चाहिए क्योंकि वह भारतीय संघ की प्रमुख हैं।
इस विवाद के साथ दो और विवाद भी जुड़ गए हैं। दरअसल 28 मई की जिस तारीख को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नए संसद भवन का उद्घाटन करने की तैयारी में हैं, वह दिन विनायक दामोदर सावरकर की जयंती है। सावरकर हिन्दू राष्ट्र के समर्थक थे। भाजपा और आरएसएस उन्हें अपना नायक मानती है। वहीं दुसरी ओर संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर संसद के भीतर जिस सेंगोल की स्थापना की जाएगी, उसको लेकर भी बवाल मचा है। दरअसल, संगोल एक राजदंड है, जिसे सत्ता हस्थांतरण के तौर पर एक शासक से दूसरे शासक को सौंपा जाता है।
लेकिन जब हम सेंगोल का इतिहास टटोलेंगे और उसकी बनावट को देंखेंगे तो यह सवाल सामने आता है कि क्या भारत में इसके जरिये हिन्दू साम्राज्य को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है? जिसके पक्षधर सावरकर से लेकर मोहन भागवत सहित आरएसएस और भाजपा के तमाम नेता हैं? और कभी दबी जुबान से तो कभी खुलकर जिसकी वकालत नरेन्द्र मोदी से लेकर भारतीय जनता पार्टी से जुड़े तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री भी करते हैं।
दरअसल सेंगोल का संबंध चोल राजवंश से है। चोल राजवंश प्राचीन भारत का एक राजवंश था। भारत के दक्षिणी हिस्से सहित पास के अन्य देशों में तमिल चोल शासकों ने 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया था। इसी राजवंश में सेंगोल सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में जाना जाता था। इस राजवंश की भाषाएं तमिल और संस्कृत थी, जबकि धार्मिक समूह हिन्दू था। ऐसे में क्या यह नहीं माना जाए कि वर्तमान सरकार चोल राजवंश और उससे जुड़े प्रतीक सेंगोल के जरिये हिन्दू राष्ट्र की आहट का संकेत दे रही है।
सेंगोल की बनावट की बात करें तो इसके ऊपर गाय की आकृति है। भले ही गायें सड़कों पर कूड़ा खाती दिखे या फिर गंगा साल दर साल और ज्यादा मैली होती जा रही हो, वर्तमान सत्ता के हिन्दू धर्म में गाय, गोबर और गंगा का महत्व सबसे अधिक है। जबकि दूसरी ओर भारत का संविधान कुछ और कहता है। वह भारत को धर्म निरपेक्ष देश के तौर पर मान्यता देता है। भारतीय शासन का चिन्ह अशोक स्तंभ है, जिसके ऊपर एक-दूसरे से पीठ लगाए चार मुंह वाले शेर हैं। लेकिन इन शेरों की शक्ल बिगाड़ कर सरकार ने पहले ही अपनी मंशा जाहिर कर दी है। भले ही सीधे तौर पर सरकार अशोक स्तंभ के चिन्हों को हटाने और मिटाने की हिम्मत न कर पा रही हो, सांकेतिक रूप से सेंगोल और 28 अक्टूबर की तारीख के इतिहास को सामने लाकर वह अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है।
संविधान से लेकर संवैधानिक चिन्हों में इसी छेड़छाड़ के कारण तमाम जागरूक भारतीयों को वर्तमान सरकार के हाथों में देश सुरक्षित नहीं दिखता और इसलिए तमाम अमन पसंद और भारतीय संविधान में आस्था रखने वाले लोग, 2024 में इस सरकार को दुबारा सत्ता में लाने के पक्ष में नहीं हैं।…. अगर सरकार ईमानदार है तो यह सवाल उठता है कि भारत में सरकार के कितने प्रतीक चिन्ह होंगे? राजकीय प्रतीक चिन्ह क्या एक ही नहीं होना चाहिए?
पहले आदिवासी समाज के राष्ट्रपति की अनदेखी, फिर हिन्दू राम्राज्य के समर्थक चोल राजवंश के प्रतीक सेंगोल को लेना, फिर संसद भवन के उद्घाटन के लिए हिन्दू राष्ट्र के समर्थक सावरकर की जयंती की तारीख को चुनना क्या मोदी सरकार के असली चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी नहीं है?
क्या कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में आरएसएस और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। यह सवाल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे के बयान के बाद उठने लगा है। कर्नाटक में मंत्री पद की शपथ लेने वाले प्रियांक खड़गे ने आरएसएस और बजरंग दल सरीखे संगठनों को लेकर बड़ा बयान दिया है। खड़गे ने इन दोनों संगठनों को प्रतिबंधित करने को लेकर बयान दिया है। उनका कहना है कि “जो भी दल या संगठन राज्य की शांति भंग करने का साहस या प्रयास करेंगे उन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। उन्होंने आरएसएस और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने के मामले पर कांग्रेस के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा, “धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक कोई भी संगठन, जो असंतोष और वैमनस्य के बीज बोने काम करेगा, कर्नाटक में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम कानूनी और संवैधानिक रूप से उनसे निपटेंगे, चाहे वह बजरंग दल, पीएफआई (PFI) या कोई अन्य संगठन ही क्यों ना हो। हम उन्हें प्रतिबंधित करने में संकोच नहीं करेंगे, यदि वे कर्नाटक में कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बनने जा रहे हैं।”
बता दें कि अभी कर्नाटक में किसी को भी विभागों का बंटवारा नहीं हुआ है, लेकिन प्रियांक खड़गे के बयान के मतलब निकाले जाने लगे हैं। दरअसल प्रियांक खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे हैं। कर्नाटक चुनाव में जीतने वाले जिन विधायकों ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के साथ मंत्री पद की शपथ ली है, प्रियांक भी उनमें से एक हैं। ऐसे में आरएसएस और बजरंग दल को लेकर उनके बयान को अहम माना जा रहा है।
प्रियांक खड़ने यहीं नहीं रुके, उन्होंने भाजपा द्वारा शासित पिछली सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा करने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि जिनकी समीक्षा होनी है, उसमें पाठ्यपुस्तक संशोधन, धर्मांतरण विरोधी कानून, गौहत्या विरोधी कानून और भाजपा द्वारा पेश किये गए अन्य सभी कानून शामिल है।
पीलीभीत, यूपी। भारत में सिस्टम में बैठे हुए तमाम अधिकारी इतने घटिया और अमानवीय हैं कि उन्हें सजा के तौर पर नौकरी से निकाल कर सालों जेल में यातना दी जानी चाहिए। मामला पीलीभीत का है जहां दलित समाज की एक 14 वर्षीय लड़की का रेप कर दिया गया। पीड़ित बच्ची के पिता आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन पुलिस वाले समझौता करवाना चाहते थे, जिससे तंग आकर और बेटी को न्याय न दिलाने की कसक के साथ पिता ने 17 मई को अपनी जान दे दी।
घटना 9 मई की है और मामला उत्तम प्रदेश और राम राज्य वाले उत्तर प्रदेश का है। पीलीभीत जिले के अमरिया थाना क्षेत्र के एक गांव में तीन लड़कों ने दलित समाज की 14 साल की एक लड़की को खेत से जबरन उठा लिया। फिर उसे ले जाकर अपने साथी को सौंप दिया, जिसने उसके साथ रेप किया। जब मामला सामने आया और पीड़िता ने जब पूरी बात पुलिस और घरवालों को बताई तो मामला थाने पहुंचा। पीड़ित लड़की के पिता चारों दोषियों के खिलाफ केस दर्ज करवाने की मांग कर रहे थे। लेकिन अमरिया थाना क्षेत्र की पुलिस मामला दर्ज करने की बजाय मामले में समझौता करवाने पर अड़ी रही। इससे परेशान होकर पीड़ित लड़की के पिता ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।
दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर 23 मई को प्रकाशित खबर में कहा गया है कि पिता के आत्महत्या के बाद राहुल, होति, शेखर और मनोज नाम के युवक के खिलाफ मामला दर्ज हो गया है, लेकिन मुख्य आरोपी बताए जा रहे हरेन्द्र का नाम शामिल नहीं किया गया है। पीड़ित परिवार का कहना है कि आरोपियों की प्रशासन में पहुंच है। वो धमका रहे थे कि समझौता कर लो नहीं तो मार दिये जाओगे। पीड़ित के पिता ने थक हार कर मौत का रास्ता चुन लिया। हालांकि मामला के तूल पकड़ने के बाद 18 मई को सीओ ने अमरिया थाने के एसओ मुकेश शुक्ला को सस्पेंड कर दिया है,लेकिन इससे मामला खत्म नहीं हो जाता।
पीड़ित लड़की के भाई के बयान को समझना होगा और भारत में दलितों को इंसाफ पाना कितना मुश्किल है, यह भी समझना होगा। पीड़िता के भाई का कहना है कि जब हम और हमारे पिताजी थाने गए तो हम चाहते थे कि इस मामले में कार्रवाई हो, लेकिन पुलिस ने हमारी एक न सुनी। अमरिया थाने के एसओ मुकेश शुक्ला ने हम लोगों को गाली देकर भगा दिया। उन्होंने कहा कि भाग जाओ वरना जेल में डाल दूंगा। जिसके बाद अपनी बेटी के बलात्कार के बाद शर्म से दबे लड़की के पिता ने अपनी जान दे दी। ऐसे मामलों को अक्सर समय बीतने के साथ दबा दिया जाता है।
लेकिन इस मामले में मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, महिला आयोग और यूपी के मुख्यमंत्री क्या कार्रवाई करते हैं और पीड़ित परिवार को क्या न्याय दिलाते हैं, यह देखना होगा। सवाल उठता है कि अगर पीड़ित बच्ची किसी राजपूत और ब्राह्मण की बेटी होती तो क्या एसओ मुकेश शुक्ला पीड़िता के पिता और भाई को गाली देकर भगा पाता, क्या वह समझौता करने का दबाव बनाता, क्या वह कहता कि भाग जाओ नहीं तो जेल में डाल दूंगा।
नए संसद भवन का उद्घाटन वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से कराए जाने को मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पार्टी ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। साथ ही संसद भवन के उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति को निमंत्रण तक नहीं देने को भी कांग्रेस पार्टी ने बड़ा मुद्दा बना दिया है।
दरअसल पीएम मोदी ने 10 दिसंबर 2020 को नए संसद भवन का शिलान्यास किया था। तब तात्कालिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को निमंत्रण नहीं दिया गया था। अब जब 28 मई को नए संसद भवन का लोकार्पण हो रहा है, मोदी सरकार ने वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी निमंत्रण नहीं भेजा है। इसको लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पीएम मोदी और आरएसएस पर तीखा हमला बोला है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा-आरएसएस के दलित और आदिवासी प्रेम को महज दिखावा ठहराया है।
शिलान्यास में तत्कालिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उद्धाटन समारोह में वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को नहीं बुलाए जाने को मुद्दा बनाते हुए खड़गे ने एक के बाद एक चार ट्विट कर सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन वर्तमान राष्ट्रपति से कराने की मांग का समर्थन करते हुए कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार दलित और जनजातीय समुदायों को राष्ट्रपति केवल चुनावी वजहों से बनाती है।
मल्लिकार्जुन खड़गे का तर्क है कि संसद भारत गणराज्य की सर्वोच्च लेजिस्लेटिव बॉडी है और राष्ट्रपति इसका सबसे बड़ा संवैधानिक अथॉरिटी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु देश की प्रथम नागरिक हैं। वह सरकार और विपक्ष के साथ ही देश की हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करती हैं। अगर नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति करतीं तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार के कमिटमेंट का प्रतीक होता। ये तमाम आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इसे बड़ा मुद्दा बनाने जा रही हैं।
बता दें कि 28 मई की जिस तारीख को भाजपा सरकार ने नए संसद भवन के उद्घाटन के लिए चुना है, उसको लेकर भी कांग्रेस ने विरोध दर्ज कराया है। दरअसल इस दिन विनायक दामोदर सावरकर की जयंती होती है। सावरकर हिन्दू राष्ट्र के समर्थक थे और सावरकर को भाजपा अपना नायक मानती है। कांग्रेस ने इसे भी मुद्दा बनाते हुए इसे देश के नायकों का अपमान बताया है। नया संसद भवन 28 महीने में बनकर तैयार हो चुका है। नए चार मंजिला नए संसद भवन में लोकसभा के 888 और राज्यसभा के 384 सदस्य बैठ सकेंगे।
जाहिर है कि कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद 28 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही इसका उद्घाटन करेंगे, क्योंकि राजनीति में पत्थर पर नाम लिखवाना सबसे नेताओं का प्रिय शौक होता है। वर्तमान सरकार को देश का नया इतिहास ही लिखना चाहती है। लेकिन राष्ट्रपति को इस कार्यक्रम से दूर रखकर भाजपा खुद ही एक्सपोज हो गई है। और यह साफ हो गया है कि उसका दलित और आदिवासी प्रेम महज एक दिखावा है। देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को 2024 चुनावों से पहले कितना बड़ा बना पाती है। अगर कांग्रेस पार्टी के साथ ही वंचित समाज को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी इसे बड़ा मुद्दा बना दिया तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है।
8 नवम्बर की रात 12 से उठी नोटबंदी की सुनामी के तीन के तीन सप्ताह गुजर चुके हैं और इसकी चपेट में आने से देश का शायद एक भी नागरिक बच नहीं पाया है.विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक़ इससे राष्ट्र का जीवन जिस तरह प्रभावित हुआ,वैसा भारत-चीन या भारत-पाक के मध्य हुई लड़ाइयों में भी नहीं देखा गया.भारी आर्थिक क्षति के साथ ही इसमें 80 से अधिक लोग शहीद भी हो चुके हैं.इससे हुई हानि पर अपना कर्तव्य स्थिर करने में विपक्षी दलों ने कोई कमी नहीं की.इस मुद्दे पर एकबद्ध विपक्ष सड़क से संसद तक आक्रामक तरीके से मुखर रहा.वह जनता तक यह बात भी पहुंचा दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के जरिये आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला अंजाम दिया है.वह अपनी पार्टी,मित्रों तथा कुछ खास–खास उद्योगपतियों का पैसा ठिकाने लगाने में व्यस्त रहने के कारण बिना पूरी तैयारी के नोटबंदी का फैसला ले लिए,जिस कारण ही जनता को इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है.बहरहाल नोटबंदी से हुई दिक्कतों में अवाम का पूरा साथ देने और इस पर मोदी सरकार को बुरी तरह एक्सपोज करने के बाद विपक्ष को पूरा भरोसा हो चला था कि जनता मोदी से क्षुब्ध हो गयी है.इस विश्वास के कारण ही विपक्ष के बहुत से नेता मोदी सरकार को चुनाव में उतरने के लिए ललकारने लगे .किन्तु नोटबंदी के फैसले के दो सप्ताह बाद मोदी सरकार ने जो सर्वे कराया ,वह विपक्ष की उम्मीदों के विपरीत:कुछ हद तक चौकाने वाला रहा.सर्वे में पाया गया कि 92 प्रतिशत लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने का नोटबंदी का कदम पसंद आया है तथा उन्हें यह विशवास है कि इससे कालेधन,भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर लगाम लगेगी.विभिन्न सर्वेक्षणों के अतिरक्त सात राज्यों के लोकसभा व विधानसभा सीटों के उपचुनाव के बाद ही महाराष्ट्र और गुजरात में जो स्थानीय निकायों के उपचुनाव हुए, उनमें भी जनता को नोटबंदी के पक्ष खड़ा पाया गया.
किन्तु तमाम सर्वेक्षणों और उपचुनाव परिणामों से विपक्ष अप्रभावित नजर आया.उसे आज भी लग रहा है कि नोटबंदी के बाद जनता को जो तकलीफ उठानी पड़ी है उसकी कीमत मोदी को आने वाले चुनावों में अदा करनी पड़ेगी,इसलिए वह नोटबंदी के खिलाफ विरोध की नई-नई मंजिलें तय करते जा रहा है.लेकिन वह समझ नहीं पा रहा है कि ऐसा करने के क्रम में उसकी स्थिति उस तत्कालीन विपक्ष जैसी होती जा रही है जिसने 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स के खात्मे का विरोध किया था.
वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी ने जो नोटबंदी का फैसला लिया है भारत में उसकी तुलना सिर्फ इंदिरा गाँधी के 1969 के फैसले से ही हो सकती है.किन्तु 1969 और 2016 के साहसिक फैसलों में काफी साम्यता होने के बावजूद दो बड़े फर्क हैं.1969 में इंदिरा गाँधी ने अपनी छवि एक प्रगतिशील प्रधानमंत्री रूप स्थापित करने के लिए जो कठोर फैसले लिए उससे अवाम का जीवन आज जैसा नरक नहीं बना था,इसलिए उन्हें जनता के बीच रोने की नौबत नहीं आई थी. दूसरा बड़ा फर्क यह था कि बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवीपर्स का खात्मा सचमुच में भारी जोखिम भरा फैसला था .ऐसा करके इंदिरा गांधी ने राजे-महाराजे और धन्ना सेठों को सीधी चुनौती दी थी,जिसका राष्ट्र को चिरस्थाई लाभ मिला.इस लिहाज से नोटबंदी का फैसला कहीं से भी साहसिक और जोखिम भरा नहीं नजर आ रहा.इसमें जो भी तकलीफ हुई है साधारण और मध्यम वर्ग की जनता को हुई है,काले धन के लिए जो सचमुच में जिम्मेवार हैं,उन्हें कहीं से भी चुनौती मिली ही नहीं है.
नोटबंदी के फैसले को खुद मोदी द्वारा मना किये जाने के बावजूद उनके दल के साथ कुछ नोटबंदी समर्थक बुद्धिजीवि भी अतिउत्साह में इसे काले धन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बताये जा है.किन्तु वास्तव में यह काले धन की आड़ में विपक्षी दलों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है .इसके जरिये निर्ममता से विपक्षी दलों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का कार्य अंजाम दिया है.शायद नोटबंदी का मुख्य लक्ष्य विपक्ष को पंगु बनाना ही था क्योंकि प्रधानमंत्री इस बात से अनजान नहीं होंगे कि नकदी का योगदान कुल काले धन की मात्रा में ऊंट के मुंह में जीरे से अधिक नहीं है,लिहाजा नोटबंदी के जरिये काले धन और भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं किया जा सकता.हां ,इसके जरिये यह सन्देश जरुर दिया जा सकता था कि भले ही वह विदेशों से काला धन लाने में पूरी तरह विफल रहे ,किन्तु काले धन के खिलाफ कठोर हैं.हालांकि जिस तरह मोदी सरकार काला धन रखने वालों को आयकर कानून संशोधन विधेयक -2016 के जरिये आधा देकर काला धन सफ़ेद करने का अवसर मुहैया कराई है,उससे उसकी काला धन विरोधी छवि को काफी आघात लगा है.शायद इसीलिए उनके समर्थक काले धन के खात्मे के बजाय कैश्लेश लेस इकॉनमी का गुणगान करने लगे हैं. किन्तु एक दिसंबर से देश के संगठित व असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग वेतन लेने के लिए भटकते रहने के बावजूद जिस तरह सोत्साह नोटबंदी का समर्थन करते दिख रहे हैं ,उससे तय है कि प्रधानमंत्री मोदी राजग के सहयोगियों तथा संघ के तीन दर्जन संगठनों और मीडिया के जरिये 2017 के चुनाव में नोटबंदी को विपक्ष के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में सफल हो जायेंगे.
हालही में एक विद्वान ने लिखा है-‘भारतीय राजनीति की एक विशेषता यह बनती जा रही है कि जब परिस्थितियां सत्ताधारी दल के प्रतिकूल जाने लगे तो एक विवादास्पद निर्णय लेकर विमर्श की पूरी धारा को एक ही दिशा में प्रवाहित कर दो.’सत्ता में आने के पूर्व विदेशों से कालाधन ला कर प्रत्येक के खाते में 15-15 लाख जमा कराने तथा हर वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने जैसे भारी भरकम वादों को पूरा करने में बुरी तरह व्यर्थ प्रधानमंत्री के लिए विमर्श को उस काले धन ,जो नकदी के रूप में कुल काले धन का सिर्फ 5-6 %प्रतिशत है एवं कई विद्वानों के मुताबिक जिस पर वर्तमान सरकार का एक्शन मक्खी पर तोप चलाने जैसा है,पर केन्द्रित करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था.उन्हें इस बात का भलीभांति इल्म था कालेधन का मुद्दा ऐसा है जिस पर अवाम का भावनात्मक दोहन बड़ी आसानी से किया जा सकता है.इस कारण ही जन लोकपाल के जरिये कभी काला धन और भ्रष्टाचार के खात्मे का सब्ज बाग़ दिखाकर अन्ना-केजरी जैसे साधारण लोग सुपर हीरो बन गये थे .शायद उनकी सुपर छवि को दृष्टिगत रखकर ही मोदी ने अपनी सारी विफलता को ढकने के लिए विमर्श की पूरी धारा को काले धन पर केन्द्रित कर दिया है और पूरा विपक्ष इसके भंवर में फँस गया है.
सारी स्थिति देखते हुए यह बात जोर गले से कही जा सकती है मोदी ने नोटबंदी के जरिये यूपी चुनाव के लिए काले धन की पिच तैयार कर दी है और इस पर खेलने पर विपक्ष की स्थिति कोहली सेना के सामने टॉस हारी विदेशी टीमों जैसी होना तय है.ऐसे में आर्थिक रूप से लुंज-पुंज हो चुका विपक्ष यदि भारी पॉलिटिकल माइलेज ले चुके मोदी को मात देना चाहता है तो उसे मौजूदा विमर्श के भंवर से निकलना होगा.इसके लिए खुद मंडल के दिनों की भाजपा से प्रेरणा लेने से श्रेयष्कर कुछ हो ही नहीं सकता.
स्मरण रहे 7 अगस्त,1990 को जब मंडल रिपोर्ट के जरिये पिछड़ों को आरक्षण मिला तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित(दलित,आदिवासी ,पिछड़े और उनसे धर्मान्तरित ) हिन्दू धर्म द्वारा खड़ी की गयी घृणा और शत्रुता की प्राचीर तोड़कर भ्रातृ भाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगे,तब भाजपाइ अडवाणी ने यह कह कर राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया कि मंडल से समाज टूट रहा है.उसके बाद सारा विमर्श राम मंदिर पर केन्द्रित होने के साथ भाजपा के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हो गया .आज विपक्ष यदि एक बड़े तानाशाह के रूप में उभर रहे मोदी को मात देना चाहता है तो राम जन्मभूमि आन्दोलन से प्रेरणा लेते उसे विमर्श को सामाजिक न्याय की राजनीति पर केन्द्रित करने का सफल उपक्रम चलाना होगा.इसके लिए आर्थिक,राजनैतिक,न्यायिक,शैक्षिक,धार्मिक इत्यादि समस्त क्षेत्रों के अवसरों के बंटवारे में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने का मुद्दा खड़ा करना शायद बेहतर होगा।
सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच सेलिब्रिटी बन चुकी आईएएस टॉपर रहीं और फिलहाल राजस्थान के जैसलमेर की कलेक्टर टीना डाबी फिर से चर्चा में हैं। दरअसल टीना डाबी ने पाकिस्तान से भारत आए लोगों को लेकर जो फैसला लिया है, उससे वह सरकार के निशाने पर हैं। हुआ यह है कि जैसलमेर की कलेक्टर टीना डाबी ने पाकिस्तान से आए पचास से ज्यादा परिवारों को घर उजार दिये। जिसके बाद गहलोत सरकार में मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने टीना डॉबी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लेकिन वहीं दूसरी ओर जिन लोगों के घर उजारे गए हैं, वह टीना डाबी को दुआएं दे रहे हैं।
दरअसल पाकिस्तान से भारत के राजस्थान के जैसलमेर में 50 से ज्यादा विस्थापित परिवार प्राइम लैंड और केचमेंट एरिया के साथ ही अलॉटमेंट लैंड पर काबिज हो गए थे। जिला प्रशासन ने उन्हें अप्रैल में ही हट जाने का आदेश दिया था। लेकिन विस्थापितों ने प्रशासन की बात नहीं मानी। इस पर प्रशासन ने कलेक्टर टीना डाबी के आदेश पर विस्थापितों के अवैध मकानों को ढहा दिया।
टीना डाबी का कहना था कि, केचमेंट का यह एरिया प्राइम लोकेशन है और इसकी कीमत भी बहुत ज्यादा है, साथ ही यहां पर अतिक्रमण करने से तालाब के पानी के लिए भी ठीक नहीं होने की बात सामने आने पर हमने विस्थापितो को हटाया है। क्योंकि ऐसी आशंका थी कि इसमे भू-माफियाओं की भी भूमिका हो सकती थी।
हालांकि विस्थापितों को हटाने के बाद ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। हालांकि जिन विस्थापितों को टीना डाबी ने हटाया था और उनके घरों को प्रशासन ने जमींदोज कर दिया था, वही अब कलेक्टर मैडम की तारीफों के पुल बांध रहे हैं। जो विस्थापित पाकिस्तान से भारत आए थे, उनमें बड़ी आबादी वंचित समाज के लोगों की है। ज्यादातर लोग भील समाज के हैं।
पाकिस्तान के रहिमियार खान से भारत आए अजीत राम का कहना है कि, भारत आए तीन महीने हो गए हैं। हमारे पास जो भी था, बेच कर भारत आ गए। यूआईटी ने कच्चे मकान तोड़ दिये तो जैलसमेर प्रशासन जिला कलेक्टर टीना डाबी ने हमारी पुकार सुनी है। उन्होंने रहने को जगह दी है और खाने-पीने की व्यवस्था भी की है। हम खुश हैं।
एक अन्य विस्थापित कुर्बान राम का कहना था कि जिला कलेक्टर टीना डाबी ने हमारे भील समुदाय पर दया दिखाते हुए मानवता की मिसाल पेश की है। कुर्बान राम ने टीना डाबी का धन्यवाद भी किया।
बता दें कि टीना डाबी ने जिस तरह इस मामले को सुलझाया, उससे उनकी चारो ओर तारीफ हो रही है। उन्होंने विस्थापित पाकिस्तानी परिवारों की मदद के लिए प्लॉन बनाया है। जल्दी ही जमीन की तलाश कर इन परिवारों को वहां बसाया जाएगा। फिलहाल उन्हें रैन-बसेरे में शरण दी गई है।
भारतीय समाज एक सूखा जंगल है और जो भी चाहे धर्म और आग के गोले को फेंक कर आग लगा दे। ताजा उदाहरण मणिपुर का लिया जा सकता है। इम्फाल वैली में कभी भी इस तरह का नही हुआ कि एक विशेष वर्ग – कुकी को निशाना बनाया गया हो। 2001 में ग्रेटर नागा बनाने पर भी ऐसा नही हुआ जबकि सीएम हाउस और विधान सभा को जला दिया गया। झगड़ा मेइती और कुकी के बीच कराया गया। 15 वीं शताब्दी के अंत में हिंदू धर्म ने मैतेई साम्राज्य में प्रवेश किया। वैष्णव भिक्षुओं और बंगाल के अनुयायियों ने इनका हिंदूकरण किया। कहा जा रहा है कि मणिपुर में आरएसएस व बजरंग दल ने असली पहचान छुपाकर दो संगठन – अरंबाई तेंगगोल और दूसरा मेइती लीपुन खड़े किए। ये काले कपड़े में बंदूकों के साथ बाइक पर सैकड़ों के समूह में चर्चों को जलाए और आदिवासियों को लूटा। वहां के निवासी हैरान हैं कि ये लोग कहां से आए और इतना क्रूर और संगठित कैसे बन सके? ज़ाहिर सी बात है कि धार्मिक कट्टरता किसी ने तो पैदा की। बीजेपी की सरकार हो तो कौन सा मुश्किल है। आरोप लग रहा है कि आरएसएस ने वहां कि रणनीति बहुत पहले बनाई थी और अपना पारंपरिक भेष भूसा या चोला न धारण कर, उसका प्रकार बदल कर कट्टरता पैदा किया। वर्षो पहले से तैयारी चल रही थी और अब जाकर कामयाबी मिली। नॉर्थ ईस्ट राज्यों में ईसाइयत का प्रभाव है । बजरंग दल और आरएसएस ने वहां के हिसाब से रणनीति बनाकर उनसे घुले मिले और हिन्दुत्व का एजेंडा तैयार कर दिया। केंद्र में जिसकी सत्ता होती है उत्तर पूर्वी राज्य उनके साथ प्रायः हो जाते हैं और 2014 के बाद शासन और प्रशासन में इनकी पकड़ बन गई तो अपने उद्देश्य में कामयाब हो गए।
हरियाणा में जब जाटों ने आरक्षण के लिए आंदोलन किए तो कुछ तोड़ फोड़ भी हुआ। अवसर का फायदा उठाकर बीजेपी में प्रचारित किया कि जाट सभी जातियों के साथ अन्याय करते हैं और इसकी दशा ही बदल दिया। छत्तीस जाति बनाम जाट कर दिया और आराम से चुनाव जीत गए। जाति आग का गोला है और एक दूसरे के विरूद्ध खड़ा करने की क्षमता या षड्यंत्र करना आता है तो जाति वर्षों साथ लगी रहती । धर्म से कहीं ज्यादा जाति की भावना मज़बूत है बशर्ते खिलाड़ी चालाक हो। शोषित जातियां सम्मान और अधिकार के लिए एक जुट तो होती हैं लेकिन ज्यादातर का हश्र व्यक्ति पूजा तक सीमित हो जाता है। कुछ मामलों में सशक्तिकरण भी हुआ है। जाति व्यवस्था एक बीमा कंपनी की तरह है जो बिना किस्त चुकाए बहुत सारे लाभ पक्के हैं। शादी – विवाह, लेन – देन, मुसीबत में काम आ जाना, बिना कुछ लौटाए वोट पक्का, काम धंधा में मदद आदि। इतने लाभ बिना किस्त के कहां मिलता है। जो जातिवाद नही करते उनको भी जाति का लाभ मिलता है। उनका व्यवहार भले जातिवादी नही हैं और कथित उच्च जाति से आते हैं लेकिन वो क्षति पहुंचाते हैं। कुछ कथित सवर्ण जाति के लोग महसूस करते हैं और जान-बूझकर जंतर-मंतर पर पहलवान न्याय के लिए धरना दे रहे हैं लेकिन सरकार पर असर नही पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के दखल से कुछ कार्यवाही हो सकी। जाहिर सी बात है पहलवानों के जाति के लोग भावनात्मक रूप से चोटिल हुए और खाप पंचायत का प्रचंड समर्थन मिला। दूसरे तरह संदेश दिया गया कि ये तो एक विशेष जाति के लोग का मामला है। आरोपी का जनाधार खुद के जाति में अच्छा खासा है और अब पहलवानों के दबाव में कार्यवाही कर भी दिया जाय उनकी जाति के वोट का घाटा होगा। ऐसी स्थिति में पूरे आंदोलन को एक जाति का बताकर वोट को सुरक्षित करने का प्रयास हो रहा है।
भाजपा बिना मुसलमानों का भय दिखाए खड़ी नही रह सकती। भारतीय मुसलमान और पाकिस्तान न हो तो ये पार्टी अस्तित्व में ही नही आ सकती। 2019 के लोकसभा के ठीक दौरान पुलवामा की घटना हुई और बड़ी संख्या में हिंदू एक हो गए|
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म जनता के लिए अफीम है। भारत में तो दो अफीम हैं – जाति और धर्म। दोनो को जब भी फेंक दो आग लग जाती है। कुछ कारीगरी करना पड़ता है कि इन बारूदों को किस अनुपात में मिश्रण किया जाय। परिस्थिति पर भी निर्भर करता है और लोग किस प्रकार के हैं जहां एक गोला कामयाब होगा। चूंकि स्वतंत्रता आंदोलन किए लड़ाई लड़ने वाले बलिदानी थे और बड़ी कुर्बानी के साथ आजादी दी थी | इसलिए राज्य की बुनियाद धर्मनिरपेक्ष थी और उसका असर दशकों तक था। अब वो बुनियाद दरक रही और इसे केवल एक दल या विपक्ष ही नही बच सकते बल्कि देश की जनता को उठाना पड़ेगा। जब तक जाति के सवाल को नही महत्व दिया जाएगा, स्थिति ऐसे बनी रहेगी। जाति में बंटे भारत पर विदेशियों का कब्जा रहा है और आज भी राष्ट्र के अन्दर कितने जातियों के राष्ट्र कायम हैं। बिना वैज्ञानिक सोच के धर्मांधता को नही लड़ा जा सकता और न ही विकसित देश बन सकता है। सिंगापुर, कोरिया, चीन , अमेरिका, जापान आदि देशों को जब भी याद करते हैं तो उनके विकास के कारण। विश्व गुरु शिक्षा, विज्ञान, मजबूत अर्थव्यवस्था से बना जा सकता है। इस दोनों चुनौतियों से देश अभी भी लड़ने के लिया तैयार नहीं है तो इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भविष्य कैसा होगा।
आज स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, पसमांदा विकलांगों का विर्मश अश्वेत साहित्य आदि के साहित्यिक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि मसविदे विश्लेषित विमर्श में दलित एवं गैर दलित के शोषणों में समानता होने के बावजूद उनमें कुछ भिन्नता होने के कारण दलित स्त्रियों की कुछ समस्यायें छूट जा रही हैं, जिन्हें साथ लेकर चलना जरूरी है। गैर दलित स्त्री की अपेक्षा दलित स्त्री को एक नये दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है, क्योंकि जिस स्तर से गैर दलित स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए पित्रसत्तात्मक समाज से लड़ रहीं हैं । उस स्तर से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं , उस स्तर से दलित स्त्रियों की कुछ समस्यायें छूट रहीं हैं । हालांकि यह भी कि कुछ पढ़ी-लिखी दलित स्त्रियाँ सम्पूर्ण दलित स्त्रियों का प्रतिनिधित्व तो कर रहीं हैं, उनकी संख्या गैर दलित स्त्रियों की अपेक्षा बहुत कम है । इसका मूल कारण दलितस्त्रियों में उच्च शिक्षा का अभाव और दलित स्त्री का सीमित दायरे में आन्दोलन हो सकता है।
जब एक चेतनाशील नारी स्वयं यह कहती रही है कि एक स्त्री ही अपने भोगे हुए यथार्थ को ज्यादा मार्मिकता के साथ व्यक्त कर सकती है । पुरुष तो पढ़कर, सुनकर अथवा अपने समय के समाज के आधार पर ही सहानुभूति दिखाकर स्त्री अधिकारों की बात करता है । सवाल यह है कि जब पुरुष स्त्री के शोषण को व्यक्त कर पाने में असमर्थ है, तो एक गैर दलित स्त्री एक दलित स्त्री की वास्तविक संवेदना को क्या बखूबी बयां कर सकती है? और यदि कर सकती है तो दलित स्त्रियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में हिचकिचाती क्यों है ?दलित स्त्री के मुद्दों पर बहुतायत फ़ॉर्मेल्टी क्यों अदा करती है ? गैर दलित स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों पर कितनी किताबें लिखीं गईं । यही थोड़ा समझने की जरूरत है।
अधिकांशतः जब एक दलित स्त्री स्वतंत्र रूप जैसे ही विचरण करने की कोशिश करती है। किसी आततायी के स्पर्श पड़ने से केंचुए की तरह उसे सिमटना पड़ता है। वह केंचुआ बनाना नहीं चाहती लेकिन बनने पर मजबूर है। आततायी यदि सवर्ण हुआ तो लड़की के घरवाले उस दरिन्दे के खिलाफ कुछ नहीं बोलते स्वयं अपनी बेटी को ही चुप करा देते हैं। यदि वे कानून का सहारा लेते भी हैं या उसकी पुत्री ही स्वयं कानून की दहलीज पर अपना दुखड़ा रोती है, तो बीच में पूंजीवादी और मानुवाद की ऐसी दीवार घड़ी हो जाती है, जिसे तोड़ने की कोशिश में वह स्वयं टूट जाती रही है। इस सन्दर्भ में ओम प्रकाश वाल्मीकि की चंद पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं – “कौन हूँ मैं ?/ मेरा अस्तिव है क्या?/ मैं धीरे धीरे क्या खाक हो जाऊँगी ? ” प्रो० विमल थोरात का मानना है कि स्त्री तिहरे शोषण का शिकार है जाति के आधार पर, महिला होने के आधार पर और गरीब होने के आधार पर । चूँकि जाति के आधार पर मुद्दा छुआ-छूत और कर्म काण्ड का आता है। एक अछूत स्त्री से एक सवर्ण पुरुष का देह से किस प्रकार संबंध रहता है। इसको जानने के लिये कन्नड़ साहित्यकार यू०आर०अनन्तमूर्ति के उपन्यास ‘संस्कार’ को अवश्य पढ़ना चाहिए । भले ही कहानी झूठी हो लेकिन यह भी सत्य है कि साहित्य में कोई भी यूँ ही कल्पना थोड़ी नहीं होती वह समाज से ही पनपती है। ‘संस्कार’ उपन्यास में श्री पति और बेल्ली के शारीरिक संबंधों को एक दृश्य देखिए जिसमें श्रीपति एक ब्राहमण पुरूष और बेल्ली एक अछूत स्त्री है, “जानते हो, क्या हुआ था, आज पिल्य और उसकी बीबी मर गए, जैसेराक्षस उन पर टूट पड़ा हो ।”श्रीपति को इस घड़ी बातों के लिए समय नहीं था। बेल्ली नग्न खड़ी थी। उसने उसे जमीन पर खींच लिया। …… क्योंकि दोनों इसतरह मर गये थे, हमने उनके शवों को वहीं झोपड़ी में ही आग लगाकर जला दिया किसी प्रकार का ज्वर आया था, चल बसे। आखें ऐसे बन्द कीं कि फिर खोल भी न सके।” श्रीपति अधीर हो रहा था। वह कुछ कह रही है, कुछ खोई-खोई सी है। मैं काम-लिप्सा की इतनी उतावली में आया हूँ , यह किसी की मौत की बात ले बैठी है। श्रीपति ने धोती बांधी। अंगवस्त्र पहना। जेब से कंघी निकाल कर बाल संवारे टार्च जलाकर देखा और फिर जल्दी से भाग निकला। बेल्ली केवल साथ सोने के लिए ही ठीक थी, बातें करने के लिए नहीं ।”
उर्पयुक्त प्रसंग सम्पूर्ण दलित स्त्रियों और सवर्ण पुरूषों के बीच संबंधों की पहचान करा सकता है यानि सर्वण पुरूष एक दलित स्त्री को एक भोजन की थाली ही समझता है। वह भी छिपकर समाज में तो वह किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा ।यदि दलित स्त्री चाहेकि वह समाज में अपने शारीरिक शोषण का बखान कर उसे अपने जीवनसाथी बनाने की मांग करे तो सवर्ण समाज उससे पीछा छुड़ाने के लिए उसकी हत्या भी कर सकता है। इस तरह की कई घटनाएँ भी हो चुकी हैं। एक गैर दलित स्त्री का शोषण तो मात्र स्त्री होने के कारण है. लेकिन यहाँ एक दलित स्त्री स्त्री होने का शोषण झेल ही रही है। साथ ही दलित स्त्री होने का भी । राजी सेठ भी दलित और गैर दलित स्त्रियों में अंतर को अपनी कविता(औरत –औरत में भी अंतर है ) के माध्यम से स्पष्ट करने की कोशिश करती हैं – “ औरत-औरत होने में / जुदा – जुदा फर्क नहीं है क्या ?/ एक भंगी तो दूसरी बामणी । / एक डोम तो दूसरी ठकुरानी / दोनों सुबह से शाम तक खटकती हैं ।… एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण/ दूसरी सताई जाती है स्त्री और दलित होने पर । ” अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि एक स्त्री ही ननद और सास के रूप में एक स्त्री (बहू) का शमन करती है, लेकिन यह परिस्थितियाँ 60 के दशक के बाद से बदलने लगी हैं। संयुक्त परिवार एकल परिवार में परिवर्तित हो रहे हैं। संयुक्त परिवार जब बँटकर एकल परिवार में परिवर्तित होते हैं तो लड़के के हिस्से में दहेज व हिस्से में आई पिता की संपत्ति होती है । लेकिन दलितों में तो बहुतायत गरीबी ही रहती है। हिस्से में कभी-कभी खाने के बर्तन तो दूर रहने की जगह भी कम पड़ जाती है । ऐसी स्थिति में एक नई नवेली बहू को गृहस्ती बनाने में काफी मुसीबत का सामना करता पड़ता है। लड़का सारा गुस्सा अपनी पत्नी पर ही उतारता है। फिर धीरे धीरे शोषण के प्रकार और बढ़ने लगते हैं। उस अर्पयाप्त ग्रहस्थी को पूर्ण करने के लिए उस नई-नवेली दुल्हन को मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पढ़ता है, फिर काम पर जाते वक्त यदि किसी ने पूछ भी दिया कि कहाँ जा रही हो? तुम क्या फला की पतोहू हो? इस प्रकार की वार्तालाप में यदि परिवारों वालों ने देख लिया तो समझो उस पर कयामत आना तय है। हमारे भारतीय समाज में लोग गरीब की स्त्री को भौजाई ही समझते हैं, फिर उस नई नवेली बहू को ये हमारा समाज कैसे छोड़ सकता है। यदि लड़के में नशा पत्ती करने के गुण हैं तो वह जरूर अपनी पत्नी को मर्दानगी दिखायेगा ही । ऐसी इस्थितियों में उसका (बहू) जीवन शोषण से लबालब बरसात में पोखर की तरह भरने लगता है जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता । वह अपना जीवन सिसकियों में गुजारने परमजबूर हो जाती है ।
श्री वीर भारत तलवार ने स्त्री प्रश्न पर लिखे अपने एक लेख का शीर्षक ही दिया, “बातें जो कही नहीं जाती”। इस लेख के आरम्भ में उन्होंने वर्षों पहले सुनी एक गजल को लिखा था जो स्त्री की अभिव्यक्ति को परिभाषित करने की कोशिश करती है:- “उनको ये शिकायत है हम कुछ नहीं कहते, / अपनी तो ये आदत है हम कुछ नहीं कहते/ कुछ कहने से तूफान उठा लेती है दुनिया,/ और उसपे ये कयामत है कि हम कुछ नहीं कहते, /कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते,/ दुनिया की इनायत है कि हम कुछ नहीं कहते।”
डॉ० कृपाकिन्जल्कम् जी (हिन्दुस्तानी त्रैमासिक पत्रिका-जुलाई-सितम्बर 2016) में ‘स्त्री-विमर्श और दलित स्त्री प्रश्न’ शीर्षक लेख में लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य में अस्मितावादी विमशों के अन्तर्गत दलित – विमर्श एवं स्त्री-विमर्श के अंतर्गत दलित/गैर दलित स्त्री की विशिष्टता पर कई महत्वपूर्ण बहसें संचालित हुयी हैं। जिनकी केन्द्रीय नुक्ता पारिवारिक जीवन के भीतर पुरुष के पक्ष में झुके शक्ति सम्बन्धों एवं उच्चवर्णों के द्वारा दलित स्त्रियों के शोषण के साथ-साथ पारिवारिक दायरे के भीतर भी उनका शोषण है।”
कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ में लेखिका अपने वैवाहिक जीवन के चार दशकों में निष्क्रिय रहीं और अपने पति से अलग होकर बड़ी उम्र से सक्रिय हुई हैं। दलित नारी के सामाजिक यर्थाथ को बड़ी सादगी लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। ‘दोहरा अभिशाप’ में लेखिका ने अपने परिवार तथा माँ- बाबा द्वारा समझदारी से चलने के कारण जीवन में आने वाली प्रत्येक मुसीबत, बीमारी, संघर्ष और परेशानी का डटकर मुकाबला करने के मार्मिक चित्र अंकित किये हैं। वे अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि, “कभी मैं गोबर उठाती, तो बहन इधर-उधर देखती, कोई आता दिखता तो मुझे झट इशारा करती थी। मैं गोबर उठाना छोड़कर खड़ी हो जाती थी। गोबर उठाने में शर्म लगती थी परंतु उपले बन जाने से कुछ घर के काम में मदद होगी, यह भवना मन में रहती थी।” कौशल्या बैसंत्री जी ने अपने पति (देवेन्द्र कुमार) द्वारा किये गये शोषण को बड़ी ही मार्मिकता के साथ चित्रित किया है, जो यह बताता है कि एक पढ़ी-लिखी दलित स्त्री का भी शोषण दलित समाज में सामंजस्य के अभाव में होता है। वे अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि, “देवेन्द्र कुमार (लेखिका के पति) को पत्नी सिर्फ खाना बनाने और शारीरिक भूख मिटाने के लिए चाहिए थी। पैसे आलमारी में ताले में बन्द रखता था और रोज दूध सब्जी के लिए पैसा देता था। ..मेरे कोई बात पूछने पर 10 मिनट तक कोई उत्तर न देता था। मेरे कपड़े, चप्पल की सिलाई के लिए पैसे लेने के लिए बहुत ही पीछे पढ़ना पड़ता, तब पैसे देने की बात आती तब कुछ न कुछ कारण निकालकर झगड़ा करता, मारने दौड़ता ।”
गैर दलित और दलित स्त्रियों में कभी-कभी यह भी देखने को मिलता है कि वे अपने पति को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष के साथ चली जाती हैं। यह दशा दलित स्त्रियों में गैर दलित स्त्रियों की अपेक्षा अधिक देखने को मिलती है । स्त्री सोचती है कि यह पुरुष हम पर इतना मर रहा है तो यह हमको जरूर सुखी रखेगा । अतएव वे अपने पहले पति के शोषण से छुटकारा पाने के लिए उस गैर पुरूष के साथ चली जाती हैं, लेकिन शोषण का नया रूप तब सामने आता है जब वह उसे जी भर उपभोग करने के बाद किसी अनबन पर यह ताने मारता है कि “ जब तू अपने पहले पति की न हुई तो मेरी कैसी हो सकती है। ” गांव, मोहल्ले की औरतें तो इस मामले में चूकती ही नहीं। जरा सी बात पर यहाँ तक कि हँसी-मजाक में भी भगोडी, कलमुँही और न जाने कौन-कौन शब्दों से उसे अलंकृत कर अपनी जिह्वा में धार लगाया करती हैं। यहाँ उसका जीना और मुश्किल हो जाता है । कहावत है, “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का । ” हालांकि स्त्रियों का दूसरे पुरुषों के साथ जाने के और भी कारण हो सकते हैं, कभी-कभी जीवन सुखी भी बीतता है। पहले पति की अपेक्षा लेकिन यह बहुतायत कम ही देखने को मिलता है ।
श्योराज सिंह बेचैन अपनी आत्मकथा मेरा ‘बचपन मेरे कंधोंपर’ में अपनी माँ पर किये गये उस शोषण को लिखते हैं, जो उनके पिता द्वारा किया जाता है। वे लिखते हैं कि, “मुखी ( बेचैन की माता) के पति की मौत के बाद अपार दुःखों का सिलसिला शुरू हो जाता है। रामलाल यानि दूसरे पति के यहाँ / कुछ ठीक था लेकिन भिखारी यानि तीसरे पति ने तो जिन्दगी नरक ही बना दी। सबसे दुःखद यह है कि भिखारी अम्मा को लाठी डण्डे, कलाबू या पुरहे से मारा पीटा करता था।” अक्सर यह देखा जाता है कि जब एक दलित स्त्री अपनी ग्रहस्थी अच्छे से चलाने के लिए मजदूरी या छोटा-मोटा धंधा-पानी का काम शुरू कर देती है। बाहर काम में लेट-लपेट तो स्वाभाविक ही है। पुरुष घर में देर से आने पर खफा हो जाता है और उसे अपनी स्त्री पर शक करने की आदत हो जाती है । फलस्वरूप वह अपनी स्त्री को मारना पीटना शुरू कर देता है। मराठी में दलित लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ की आत्मकथा ‘उचक्का’ में इस प्रकार का प्रसंग आया है। लेखक (लक्ष्मण गायकवाड़) की माँ जब दूध बेचने जाती थी तो कभी-कभी देर हो जाती थी, तब लेखक के पिता उसे पीटते थे और भी बहुत प्रकार से उसका शोषण करते थे। लक्ष्मण गायकवाड़ लिखते हैं कि, “दूध बेचकर अगर किसी दिन माँ देर से आती, तो बाबा कहता, “क्यों आज अपने यार के यहाँ गई थी क्या?” और फिर पीटता । “सरू (मेरी बड़ी बहन) मेरी नहीं है, ” ऐसा भी कहता। ”
हालाँकि शक करने के और भी कई कारण हो सकते हैं। इस सन्दर्भ में मराठी दलित साहित्यकार दयापवार अपनी आत्मकथा ‘अछूत’ (जो पहली मराठी दलित आत्म कथा मानी जाती है) में एक जगह महारवाड़ा में बबन की छोटी बेटी का किस प्रकार से उसका पति सन्देह के कारण शोषण करता है कि एक प्रसंग देखिए जिसे दया पवार ने खुले मन से लिखा है:-
“बबन सभी लड़कियों को मन से चाहता। उसके मन में एक बात हमेशा खटकती रहती कि एक भी लड़की की शादी वह ठीक स नहीं कर पाया। उसकी छोटी बेटी वेणू के दुखान्त के समय का मैं स्वयं गवाह था। वेणू की शादी गांव में खूब धूम-धड़ाके से हुई थी । वेणू बहुत सुन्दर थी। नक्षत्रों सी। माँ बाप से उजली थी। उसे जो घर मिला वह धनवान लड़के के पिताजी बम्बई के किसी कम्पनी में फोरमैने थे। लड़का दिखने में बड़ा ऊँचा-पूरा । घर में खेती-बाड़ी देखता । वेणू को पति द्वारा बहुत अधिक तकलीफ दिया जाना शुरू होता है। पति रात-रात उसे सोने न देता। उस पर सन्देह भी करता । बाहर खेतों में जाता तो चाबी ताले में बन्द कर देता। स्कूल में जब था, तब मैंने भी एक-दो बार उसका छल कम करने की कोशिश की। पति छोटे-मोटे कारणों पर ही चिढ़ जाता। बैल-ढोरों सा पीटता । “
उधर जब वेणु के पिता बबन को जब अपनी बेटी के शोषण के बारे में पता चलता है, तो वह बहुत टूट जाता है । टूटना तो स्वाभाविक है । वह अपनी बेटी को उस जाहिल दामाद के चंगुल से आजाद कराकर अपने घर लाता है और मजबूरन अपनी बेटी वेणू का हाँथ काफी उम्रदराज पुरुष को थमाता है। वेणु भी पिता के इस फैसले को बिना किसी विचार के मंजूर कर लेती है । अब वेणु का पति छल – बल से वेणु को अपनाने का खूब प्रयास करता है, लेकिन सब व्यर्थ चला जाता है । इस संदर्भ में दया पवार जी स्वयं प्रश्न करते हैं कि, “ इतना वैभव छोड़कर वेणु क्यों आई ? बूढ़ा पति क्यों अपनाया ? दुख – तकलीफों का कँटीला रास्ता उसने क्यों अपनाया ,यह सवाल आज भी मुझे निरुत्तर कर देता है । ”
दयापवार जी का आत्ममंथन स्त्री – विमर्श की दृष्टि से काफी मायने रखता है । चेतनशील मनुष्य के मन में इस तरह के प्रश्नों का उठना वाजिब है । दया (पवार) ने जिस मुखरता के साथ दूसरों की कहानी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी ठीक उसी प्रकार अपनी और अपने परिवार की कहानी बेझिझक बयां की है । दयापवार जी अपने पिता के बारे में भी लिखतें हैं, जो उनके और माँ के बीच झगड़े का मुख्य कारण रहा करता था । इस शक की बीमारी में आकर उन्होंने ने भी अपनी पत्नी पर कई प्रकार के आक्षेप लगाने शुरू किये लेकिन गलीमत यह हुई कि स्त्री के प्रति स्वयं की स्त्री का भी अगाध प्रेम और उस मुसलमान लड़के जो महबूब नाम का था उसने रोते हुए कुरआन की कसम भी खाई कि “वो मेरी बहन है……..” फिर भी उसे मुम्बई छोड़कर अपने गाँव जाना ही पड़ा । दया पवार लिखते हैं कि, “उसके बाद वह कहीं नहीं मिला।” इस प्रकार शक की जड़े तुरंत उखड़ जाने के कारण वे अपनी पत्नी को प्रताड़ना न दे सके नहीं तो अंजाम कुछ भी हो सकता था। इसके मार्मिक उदाहरण भरे पड़े हैं।
आगे दया पवार जी ने अपनी आत्मकथा ‘बलूत’ में स्त्रियों के शोषण को दिखाया कि किस प्रकार वे घर के अन्दर और बाहर काम पर जाने पर शोषण झेलती हैं– “पुरूष हमाली (मजदूरी) करते। किसी मिल या कारखाने में जाते। स्त्रियों को कोई भी परदे में न रखता। उल्टे पुरूषों की अपेक्षा वे ही अधिक खटती थीं। शराबी पति उन्हें कितना भी पीटें वे उनकी सेवा करतीं । उनका शौक पूरा करतीं । सड़कों पर पड़ी चिन्दियाँ, कागज, काँच के टुकड़े, लोहा-लंगर, बोतलें बीनकर लाना उन्हें छाँट-छाँट कर अलग करना और सुबह बाजार में ले जाकर बेचना यही उनका धन्धा था। वहीं पास ही मंगलदास मार्केट में कपडे का व्यापार चलता था। उन दुकानों से फेंके गये कागज आदि ये औरतें इकट्ठा करती सबकी अपनी-अपनी दुकानें तय थीं । कचरा उठाने के लिए झगड़े होते वहाँ की दुकानों के नौकरों को छोटी-मोटी रिश्वत भी दी जाती। कुछ औरतें मास के ही वेश्यालय में वेश्याओं की साड़ियाँ धोतीं । कीमा-पाव से ऊबी वेश्याओं के लिए कुछ औरतें बाजरे की रोटियाँ और रायता पहुँचातीं । शौकीन ग्राहक इन आयाओं की ही माँग कर बैठता। ऐसे समय काँच -सी इज्जत बचाने के लिए वे सिर पर पैर रखकर भागतीं।”
और यही नहीं दलित स्त्रियाँ जाति के दंश में फँसकर किन हालातों से गुजरती हैं यह दया पवार जी के शब्दों में ही देखिए- “पानी लेने के लिए आते-जाते महार स्त्रियों की छाया हनुमान पर पड़ती। भगवान अपवित्र हो जाता है, इसलिए गांव वालों ने एक बार रास्ता बंद कर दिया। कुएँ पर यदि दूसरे रास्ते से जाना हो तो तालाब के किनारे-किनारे कीचड़ से लथपथ होकर जाना पड़ता, एक मील तक ।”
शोषणकारियों ने दलितों में कुछ ऐसी जातियाँ भी बनाई जिनको समाज में सम्मान तो बहुत दूर की बात एक गाली के रूप में आज भी जी रहीं हैं। इन जतियों में स्त्रियाँ ऐसे शोषण के जाल में फँसी हैं जो घर से लगाकर बाहर तक कदम-कदम पर या यूँ कहें कि हर वक्त शोषण का शिकार रहती हैं । ऐसी स्त्रियों माँ तो बनती हैं लेकिन पत्नी का दर्जा नहीं पा सकती। संतान तो जनती हैं लेकिन संतान को पिता का सुख तो दूर उसे पिता के नाम की मुहर लगवाने का भी हक नहीं मिल पाता । माँ ऐसे हालातों से गुजरती कि जिसके कारण अपने बच्चे को ममता का सुख भी नहीं परोस सकती। बच्चों को शिक्षा भी नहीं नसीब हो पाती। समाज में मानवता का झूठा ढिंढोरा पीटने वाले समाज में उच्च सम्मान पाने वाले राजनेता तक रंगरेलियाँ मनाने के लिए ऐसी स्त्रियों के पास आते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्हें हर सुख दूंगा, पत्नी की तरह रखूंगा, लेकिन वे पत्नी बनाकर रखूँगा नहीं कहते । ऐसे लोग उस स्त्री की देह से जी भर खेल लेने के बाद, उसेगर्भवती करके ऐसे छोड़ देते हैं जैसे, ढोर किलनी छोडता है ।
किशोर शांताबाई काले की ‘छोरा कोल्हाटी का’ एक ऐसी ही मराठी दलित आत्मकथा है, जिसमें इस तरह की शोषित महिलाओं और उनके प्रताड़ित बच्चों का वर्णन है । इसमें कोल्हाटी जाति के एक बच्चे (लेखक) और उसकी माँ की एक ऐसी संघर्षगाथा है, जो नाचने वाली का धंधा छोड़कर गृहस्थ स्त्री का जीवन जीना चाहती है। इस आकांक्षा में उसने कहने भर की सफलता तो पाई , परंतु उसे अपने बड़े बेटे को अपने से दूर रखना पड़ा । माँ के होते हुए भी वह बच्चा माँ का प्यार नहीं पा सका । तमाम अवर्णीय कष्टों को झेलकर आज वह बच्चा डॉक्टर बन चुका है. लेकिन समाज ने उसे नाजायज औलाद का ठप्पा लगा दिया । वह लड़का (किशोर शांताबाई काले ) एक कांग्रेस विधायक का बेटा है, जो उसकी माँ का ‘चिरा’ उतारने के बाद उसके शरीर का भरपूर आनंद लेने के बाद उसे छोड़कर चला गया । इस सन्दर्भ में आत्मकथाकार कहता है- “एम०एल०ए० साहब ने ‘माँ का ‘चिरा’ उतारा। चीरा उतारने की रस्म शादी-ब्याह जैसी ही होती है। नाचने वाली के जीवन में जो भी पहला आदमी आता है, उसे नाचने वाली के परिवार द्वारा मांगी गई रकम अदा करनी पड़ती है। अदायगी सोना, जमीन, जायदाद या रूपयों के माध्यम से भी हो सकती है। पहली रात नाचनेवाली को सुहागन की तरह सजाया जाता है। भगवान की पूजा होती है। उसे सब रिश्तेदारों के पैर छूने पड़ते हैं। गले में मंगलसूत्र और पांव में बिछुए पहनाये जाते हैं। सोने के जेवर हों तो वे भी पहनाए जाते हैं। सुहागरात का कमरा फूलों से सजाया जाता है । ‘चिरा’ उतारने वाले को नाचनेवाली के जीवन में पति का स्थान मिल जाता है। फिर वह ‘चिरा’ उसकी मर्जी से उतारा गया हो या किसी और की मर्जी से। जब तक वह व्यक्ति उसकी देखभाल करता है. नाचनेवाली किसी और से यौन – संबंध नहीं रखती । नाचनेवाली के साथ यौन संबंध रखने वाले को उसका मालिक कहा जाता है, कोल्हाटी समाज में उसे कब्जा कहते हैं।”
ऐसी हैं हमारे भारत के कुछ सम्मानित व्यक्तियों की करतूतें। इनकी दृष्टि में स्त्री केवल शारीरिक भूख से बढ़कर कुछ नहीं। यानि इन स्त्रियों का जीवन पशु से भी बदतर है। इन्हें समाज से न कोई शिकायत है न कोई गिला वाणी होते हुए भी मूक रहकर पुरुषों की कलेवा बनकर, शोषणकारियों द्वारा बनाये गये जाल को परम्परा मानकर एक कठौते की तरह बस जी भर रही हैं। इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए इसी आत्मकथा के कुछ एक उद्धरण और देना आवश्यक है।
दो बच्चों की माँ होने के बाद शांताबाई के जीवन में कृष्णराव वडकर (नाना) नाम का व्यक्ति आता है। वह शांताबाई से सम्बन्ध बनाने के लिए मनुहार करता है, लेकिन शांताबाई तो पहले धोखा खा चुकी होती है और आगे की हकीकत का अनुमान लगाकर कृष्णराव की बातों में फँसना नहीं चाहती । दूध का जला छाछ भी फूँक –फूँक कर पीता है । इसलिए वह मना कर देती है । जब बार-बार मना करती है तो नाना के दोस्त भी उसे फुसलाते , फिर भी शांताबाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तब उसकी ही पार्टी की अन्य औरतें भी उसे नाना के साथ जाने के लिए समझाती हैं, लेकिन उसी पार्टी में सुमित्रा मौसी जो शब्द नाना से कहती हैं वह कोल्हाटी जाति की समस्त स्त्रियों की आकांक्षाएँ और उनके यथार्थ का वर्णन अभिव्यक्त हो जाता है- “साहूकार, यूं अपने होश न खोइए। यह नाच गाना क्या हमें अच्छा लगता है? क्या यह सब हम अपनी मर्जी से करती हैं ? हमें भी लगता है कि हमारा पति हो। घर गृहस्थी हो, लेकिन यह सब शायद हमारी किस्मत में नहीं है। हमारे परिवार वाले हमें किसी के साथ भेजकर खुश नहीं हैं। आप जैसे लोग नये-नवेले रिश्ते का जादू खत्म होते ही हमें छोड़ देते हैं। फूल में जब तक खुशबू है, उसे सब सूंघते रहते हैं, जब वह सूखने लगता है, उसे फेंक दिया जाता है। उस सूरत में नाचनेवालियाँ क्या करें? जो अपना घर-परिवार छोड़कर आपके पास ठहरती हैं, उसे आप आसानी से बेदखल कर देते हैं। नाचने वाली की उम्र हो जाये तो उसे आप क्या उसके सगे-सम्बन्धी भी नहीं पूछते। यह कई नाचनेवालियों के साथ हो चुका है, कि बहला-फुसलाकर, ब्याह का वचन देकर, रूपये-पैसे का लालच दिखाकर उससे संबंध जोड़ जाते हैं और वह अपने घरवालों की नाराजगी मोल लेकर आपके साथ चल पड़ती है। लेकिन जैसे ही जवानी ढलने लगती है, उसे छोड़ दिया जाता है। जिस नाचने वाली के बच्चे होते हैं, वह फिर भी अच्छी स्थिति में रह सकती हैं। लेकिन बच्चे न हों तो सड़कों पर आकर भीख माँगने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकती, या फिर वह अपनी जान दे देती है। समाज उसे स्वीकार नहीं करता ।”
इसमें संदेह नहीं कि यह आत्मकथा नारी की अति दयनीय दशा को दिखाकर कठोर हृदय को भी पिघलाकर रख देती है।
इस प्रकार भिन्न-भिन्न दलित जातियों में भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कुरीतियों के प्रचलन एवं जातीय व्यवस्था के दंश से स्त्रियों का शोषण देखा जा सकता है। हमें इन सारे शोषणों की जड़ों को खत्म करने के लिए व्यापक स्तर पर एकजुट होकर भारतीय समाज को जागरूक कर शोषित दलित स्त्रियों को शिक्षित कराने और उनको समाज में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए वृहत स्तर पर काम करना चाहिए ।
बौद्ध धर्म के पतन के बारे में बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं है. लेकिन आधुनिक रिसर्च से आजकल कुछ बात स्पष्ट हो रही है. इस विषय को ठीक से देखें तो भारत में बौद्ध धर्म का पतन का और स्वयं भारत के एतिहासिक पतन और पराजय का कारण अब साफ़ होने लगा है.
इस प्रश्न का सीधा संबंध वैज्ञानिक दृष्टि और अंधविश्वास के बीच में हुए लंबे संघर्ष से जुड़ता है. इस बात को समझना अब संभव हो रहा है. आज के भारत में शोषण दमन और अंधविश्वास से लड़ने वाले लोगों को ये बात समझनी बहुत जरुरी है. आइये इसमें प्रवेश करें.
भारत सहित दुनिया भर में इंसानी समाज के शोषण की जो इबारत बनी है उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बात ही मुख्य रूप से जमीन बनती आई है. किसी भी तरह के संगठित धर्म द्वारा रचा गया शोषण हो उसके आधार में उसकी मूल प्रेरणा की तरह आत्मा परमात्मा या पुनर्जन्म में से कोई एक या दो या तीनों तत्व अवश्य मिलेंगे. किसी भी धर्म को उठाकर देख लीजिये.
यहाँ तक कि खुद बौद्ध धर्म में भी जब खुलकर पुनर्जन्म की वेदान्तिक अर्थ वाली व्याख्या प्रचलित हो गयी और इस व्याख्या के आधार पर जब राजसत्ता और राजनीति को सुरक्षा देने का षड्यंत्र रचा गया तब बौद्ध धर्म भी गरीबों और स्त्रीयों के शोषण का हथियार बन गया. इस बात को समझना जरूरी है. इसे दलाई लामा और तिब्बत के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है.
इसे एक नियम मानकर चाहिए कि अदृश्य, अव्यक्त, अगम्य, अगोचर और अस्पृश्य आदि के आधार पर दिव्यता की जो परिभाषाएं रची गयी हैं वे ही शोषण और पाखण्ड को जन्म देती हैं. जब तक बौद्ध धर्म में चार तत्वों या चार मूल-भूतों के आधार पर भौतिकवादी अर्थ की धर्मदृष्टि बनी हुई थी तब तक बौद्ध धर्म से गरीबों और स्त्रीयों सहित अन्यों को लाभ मिलता रहा.
लेकिन जैसे ही बौद्ध धर्म में भी वेदांती अर्थ के पुनर्जन्म का व्यापार शुरू होता है वैसे ही बौद्ध धर्म बुद्ध की मूल शिक्षाओं से दूर हो जाता है और सामंतवादी राजसत्ताओं का साथी बन जाता है. इतिहास में इस बात के काफी प्रमाण मौजूद हैं कि अदृश्य अव्यक्त आदि की चर्चा को बुद्ध ने हमेशा नकारा है और जो कुछ तर्कबुद्धि से और आँखों से नजर आता है उसी की बात की जाए.
इसीलिये बुद्ध का जोर भौतिक जगत, इस लोक के जीवन और इस लोक की सच्चाइयों पर अधिक है. इसीलिये अनात्मा के सिद्धांत की वे प्रतिष्ठा कर सके. उनके अनात्मा के सिद्धांत का सीधा सीधा अर्थ यही बनता है कि कोई आत्मा या स्व नहीं होता आत्मा या स्व या असल में एक “सोशल कंसट्रक्ट” है उसका स्वयं में कोई आत्यंतिक मूल्य नहीं है बल्कि वो देश काल परिस्थिति के अनुसार जन्मता और नष्ट होता है.
इसीलिये एक स्व या आत्मा के एक गर्भ से दुसरे गर्भ में जाने का प्रश्न ही नहीं उठाता, हर व्यक्ति दुनिया में पहली और आखिरी बार पैदा होता है. उसका न उससे पहले कोई जन्म है न उसके बाद कोई जन्म है. बुद्ध के लिए अनात्मा का बहुत सामान्य शब्दों में यही अर्थ है.
लेकिन बुद्ध के बाद स्वयं बौद्ध आचार्यों ने और बौद्ध धर्म से सामाजिक आर्थिक राजनीतिक लाभ उठाने वालों ने बौद्ध धर्म में अदृश्य अव्यक्त अगम्य और पारलौकिक की ब्राह्मणवादी बातें आरंभ कीं. ये बुद्ध की मूल शिक्षा के खिलाफ एक षड्यंत्र था जो खुद बौद्ध धर्म में घुस आये अवसरवादियों और सत्तालोलुपों ने आरंभ किया था.
बुद्ध ने अपने जीते जी इस संभावना को देख लिया था इसलिए उन्होंने चालीस से अधिक अव्याख्य प्रश्न बना छोड़े थे जिनमे ये साफ़ सन्देश था कि पारलौकिक से जुडी किसी बात को वो पसंद नहीं करते हैं और उनके शिष्यों को भी ऐसे पारलौकिक की चर्चा से दूर रहना चाहिए. लेकिन बुद्ध की सलाह के बावजूद ये खेल क्यों शुरू हुआ इसे समझना जरुरी है. इसका एक महत्वपूर्ण एतिहासिक और राजनीतिक कारण है. इस कारण को दलितों बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को समझ लेना चाहिए.
पिछले चालीस सालों में प्राचीन बौद्ध धर्म पर जो गहराई से रिसर्च हुई है उसमे बहुत नई तरह की बातें सामने आयीं हैं. उसमे न सिर्फ बौद्ध धर्म के पतन और ब्राह्मणवाद के उभार के कारणों की जानकारी मिलती है बल्कि यह भी पता चलता है कि ब्राह्मणवाद की सफलता से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म में अंधविश्वास और पुनर्जन्म का प्रचार भी भटके हुए बौद्धों ने आरंभ किया था. ये एक जटिल वक्तव्य है इसे कदम दर कदम समझना होगा.
बौद्ध धर्म या बुद्ध की शिक्षाएं मूल रूप से अनात्मा और अनीश्वरवाद पर आधारित थीं. इसके विपरीत ब्राह्मणों का ईश्वरवादी धर्म इश्वर और आत्मा सहित पुनर्जन्म के सिद्धांत पर खड़ा था. इतिहास में ये दोनों धर्म एक साथ बराबरी से चल रहे थे. प्राचीन समय में पश्चिमी भारत में पाकिस्तान, सिंध, वर्तमान दिल्ली से होते हुए गंगा जमुना के संगम तक इस ब्राह्मणी विचार का धीरे धीरे प्रवेश होता है.
इसके विपरीत श्रमण धर्मों (बौद्ध, जैन और आजीवक) का विस्तार मुख्य रूप से पूर्वी भारत में अर्थात आज के उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड उत्कल बंगाल उत्तरपूर्व सहित दक्षिण में भी था. इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण अब मिल चुके हैं.
भारत पर सिकंदर के आक्रमण के दौरान भी पश्चिमी भारत तक श्रमण दर्शन को मानने वाली फैलीं थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए ब्राह्मण आगे बढ़ रहे थे. सिकंदर की टक्कर श्रमण राजाओं से ही हुई थी. सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापतियों से इन राजाओं ने जो संधियाँ कीं उसके कारण इस इलाके में फैले ब्राह्मणी धर्म के लिए और उसपर आधारित शुरुआती राज्यों के लिए एक भयानक संकट पैदा हो गया था. उस दौर के ब्राह्मणी धर्म में यज्ञ, हवन, कर्मकांड, मांसाहार और पशुबलि भयानक रूप से फ़ैली थी.
लेकिन इन सबका स्वरूप कुछ अलग था, उस समय इनका स्वरूप समाज या राज्य को सम्मोहित करने के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि ये छोटे छोटे समूहों में एकांत में किये जाने वाले कर्मकांड थे जिनका लक्ष्य ब्राह्मणवादी धर्म को मानने वाले कबीलों को संगठित रखना था.
लेकिन सिकंदर और श्रमणों की संधि के बाद इस इलाके में ब्राह्मणी अस्तित्व को निर्णायक खतरा पैदा हो गया. ऐसी स्थिति में उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो गया. इस दशा में उन्होंने खुद को बचाने के लिए एक भयानक निर्णय लिया, उन्होंने पूर्व की तरफ आगे बढ़ते हुए अदृश्य, अगम्य पर आधारित परलोक का जाल फैलाना शुरू किया. उन्होंने जनता में अंधविश्वास और अदृश्य के भय को फैलाते हुए अपने तन्त्र-मन्त्र और यज्ञ हवन आदि की दिव्यता का जहर फैलाना शुरू किया.
अपने आप को अनुशासित करते हुए व्यक्तिगत जीवन में जैनों और बौद्धों की शुचिता और शाकाहार सहित कठोर तप और आत्मपीडन के श्रमण-योगिक व्यवहार को अपनाकर उसमे अपनी महारथ सिद्ध करके दिखाई और जनता को प्रभावित करना शुरू किया.
उन्होंने ये जतलाना शुरू किया की वे जैनों और बौद्धों से अधिक शाकाहारी और तपस्वी या सदाचारी हैं. जैनों और बौद्धों के इस व्यवहार को सीखकर उसका प्रदर्शन करने के साथ ही उन्होंने अपने मूल कर्मकांडी विचारों को जादू की तरह पेश किया और श्रमण बौद्ध सदाचार और तप के साथ ब्राह्मणी अंधविश्वास का एक भयानक गठजोड़ बनाया. इससे आम जनता तेजी से प्रभावित होने लगी. असल में ये गठजोड़ जनता के मनोविज्ञान को जकड़ने और राजनीति सत्ता हथियाने के लिए ही बुना गया था.
इस काम में सफल होने के बाद ब्राह्मणी तकनीक ने एक करवट और ली, उन्होंने बाद की शताब्दियों में श्रमण धर्मों के सदाचार को गौण बनाते हुए कर्मकांड और अंधविश्वास को अधिक से अधिक मूल्य देना शुरू किया.
बाद में राजसत्ता और राज्य के उदय ने एक अन्य एतिहासिक भूमिका निभायी जिसने बौद्ध धर्म को भारत में पूरी तरह से खत्म कर दिया. ब्राह्मणों के पूर्व की तरफ बढने के दौर में भारत और अन्य पडौसी समाजों में अन्य ऐतिहासिक विकास भी हो रहा था. बड़े और संगठित राज्यों का उदय हो रहा था जो व्यापार और युद्ध पर आधारित थे. पूर्वी भारत के श्रमण धर्म जिस खेती आधारित और जनजातीय प्रष्ठभूमि में पैदा हुए थे वे गणों और गणतन्त्र पर आधारित थे.
इन श्रमण राज्यों के विपरीत पश्चिम की तरफ से आक्रमण करने वाली शक्तियों की राजनीति मूलतः राजा के दैवीय वैधता के सिद्धांत पर और पिता से पुत्र तक आने वाली राजसत्ता के सिद्धांत पर आधारित थी जो कि सामंतवाद के प्राचीन रूपों से शक्ति प्राप्त करती थी. ये सामंती और दैवीय सिद्धांत पर खडी राजसत्ता अपनी जनता को अन्धविश्वासी बनाकर ताकत हासिल करती थी. स्वाभाविक रूप से ये सत्ताएं पूर्व में बसे श्रमण राज्यों और उनकी गण आधारित राजनीति से अधिक ताकतवर सिद्ध हुई. इस तरह श्रमण धर्मों पर आधारित राज्यों का पतन होने लगा.
इसका भी मूल कारण वही था कि आम जनता को राज्यसत्ता और राजा की दिव्यता से सम्मोहित करने का श्रमणों के पास कोई तरीका नहीं था. वे सोच भी नहीं सकते थे कि धर्म या तप या सदाचार से जुडी बातों को राजनीति या राज्य या राजा के पक्ष में षड्यंत्र की तरह कैसे इस्तेमाल करें. ये षड्यंत्र ब्राह्मणों का नया और खतरनाक आविष्कार था.
उन्होंने अपने आप को बचाने के लिए ऐसे-ऐसे सिद्धांत और कर्मकांड रचे जिन्हें देखकर आम जनता इश्वर और अदृश्य से भयभीत हो जाती थी और इसके बाद राजाओं और राज्य ने ये समझ लिया कि ब्राह्मणों का ये हुनर आम जनता को बड़ी आसानी से काबू कर लेता है और इस तकनीक का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जा सकता है.
धीरे धीरे ये बात तय हो गयी कि राज सत्ता को मजबूत करने या फैलाने की दृष्टी से श्रमण धर्म के आचार्यों और गुरुओं से कोई लाभ नहीं होने वाला है. साथ ही उन्होंने ये भी समझ लिया कि ब्राह्मणों की ये परलोकवादी कर्मकांडीय तकनीक जनता को अधिक प्रभावित करने लगी है, तब तत्कालीन राजसत्ताओं ने ब्राह्मण गुरुओं को मौक़ा दिया कि वे जनता में इश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म आदि का भय फैलाकर राज्य और राजसत्ता को अतिरिक्त वैधता देते हुए राजाओं की मदद करें.
यही ब्राह्मण चाहते थे, इसके बाद ब्राह्मणों ने राजा और इश्वर के लिए जो सिद्धांत रचे और जिस तरह से राजा को इश्वर का प्रतिनिधि बताना आरंभ किया वह स्वयं में एक इतिहास है. ये तकनीक बहुत सफल रही. इसके जवाब में बौद्धों, जैनों और आजीवकों के पास कोई तरीका नहीं था. अंधविश्वास के खिलाफ लिए गये उनके पुराने निर्णय उभरती हुई नई राजसत्ताओं के दौर में उन्ही पर भारी पड़ गये और अंधविश्वास को अपना गुरुमंत्र बना चुके ब्राह्मणवाद की जीत शुरू हो गयी.
बाद के इतिहास में साफ़ नजर आता है कि राजाओं ने ब्राह्मणी तकनीकों के आधार पर सफलता से आम जनता को काबू में रखा और लंबे समय तक राज करने में सफलता पायी. इसी सफलता के दौर में वर्ण और जाति सहित जातिगत व्यवसाय की प्रस्तावनाएँ रचीं गयी जिससे राजा और इश्वर की सम्मिलित सत्ता को चुनौती न दी जा सके. इस पूरे फ्रेमवर्क में राजा और इश्वर दोनों को एकसमान महत्त्व दिया गया.
इतना ही नहीं इश्वर को भी सम्राट की तरह ही चित्रित किया गया. ये बातें राजाओं को बहुत पसंद आयीं. इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मणों को राजगुरु की तरह प्रचारित और इस्तेमाल किया. इस तरह ‘राजा, इश्वर और ब्राह्मण’ का ये गठजोड़ अपने अंधविश्वास के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर बौद्ध जैन और आजीवक धर्म से जीत गया.
इस हार के बाद जैन और आजीवक भारत में ही या तो समाप्त हो गये या ब्राह्मणी सत्ता से समझौते करके उनके साथ जीने लगे. लेकिन बौद्धों के कई आचार्यों ने दूसरे देशों में पलायन किया. लेकिन इस हार की स्मृति उनके दिमाग में हमेशा जीवित रही. वे समझ गये कि अंधविश्वास के बिना जनता और राजसत्ता को प्रभावित करना मुश्किल है.
इसलिए उन्होंने दूसरे देशों में और भारत में (जिन इलाकों में अभी भी उनका प्रभाव था) ब्राह्मणों की सफलता को दोहराते हुए खुद अपने दर्शन में अंधविश्वास परलोक और पुनर्जन्म आदि का आविष्कार किया. चीन में जिस तरह का महायान उन्होंने विकसित किया वो इसी अनुभव और ज्ञान पर आधारित था.
चीन के राजवंशों ने भी इस बात को धीरे धीरे समझ लिया कि ये तकनीक उनकी खुद की राजसत्ता के लिए कितनी काम की साबित हो सकती है. इसीलिये इन चीनी राजाओं ने बाद के बौद्ध आचार्यों को खूब सम्मान से आमंत्रित करना शुरू किया. इसी क्रम में आचार्य पद्मसंभव ने एक बड़ा प्रयोग किया और तिब्बत में पुनर्जन्म को प्रचारित किया. उस विचार की शक्ति को भांपते हुए दलाई लामा नाम की एक संस्था उभरी.
दलाई लामा के नाम से राज करने वाले राजाओं ने ब्राह्मणी अंधविश्वास को अपने राज्य और सत्ता को वैधता देने का मुख्य उपकरण बना लिया और तन्त्र मन्त्र सहित न जाने कैसे कैसे अंधविश्वासों के आधार पर पूरी जनता के मनोविज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर लिया. भयभीत और प्रभावित जनता ने इसके बाद कभी गरीबी, शोषण और दमन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. सैकड़ों साल तक ये तकनीक काम करती रही, इससे तिब्बत गरीब से गरीब और अंधविश्वासी होता गया ठीक उसी तरह जैसे भारत गरीब कमजोर और नाध्विश्वासी होता गया.
ब्राह्मणी अंधविश्वास के आधार पर जनता को भयभीत बनाये रखते हुए राजसत्ताओं ने खूब धन बटोरा, राज्य विस्तार किया और लंबे समय तक राज किया लेकिन इसकी वजह से आम जनता में ज्ञान विज्ञान, तर्क, बुद्धि, साहस, उद्यम, तकनीक और सामूहिक प्रयास सहित राष्ट्र की अवधारणा का कोई विकास नहीं हो सका. एक तरफ तिब्बत में बौद्ध राजा ब्राह्मणी अंधविश्वास का सफल प्रयोग कर रहे थे और दूसरी तरफ भारत में भी इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा था.
फिर जैसा कि होना ही था, जनता और पूरा देश राजनीतिक, सामाजिक चेतना से दूर होता गया और सभ्य और शिक्षित और समर्थ न हो सका. बाद में जब मुस्लिमों, ब्रिटिशों के आक्रमण आरंभ हुए तो भारत उनके सामने नहीं टिक सका. उधर साम्यवादी क्रान्ति के बाद उभरे नये चीन के सामने तिब्बत ने जिस बेचारगी और लाचारी का प्रदर्शन किया वो भी भारत की पराजय का ही एक अन्य रूप है.
इन दो मुल्कों के उदाहरण से साफ़ नजर आता है कि राजाओं और राजसत्ता ने अंधविश्वास से भरे ब्राह्मणी प्रचारतंत्र के आधार पर सफलता हासिल की. उसी सफलता को वे आज और अगले दौर में भी दोहराना चाहते हैं. इसके विपरीत श्रमण दर्शनों – बौद्धों जैनों आजीवकों – ने अंधविश्वास को सामाजिक नियंत्रण के उपकरण की तरह कभी इस्तेमाल नहीं किया.
इससे ये साफ़ पता चलता है कि आधुनिक दौर की लोकतांत्रिक और तर्कबुद्धि से संचालित राजनीति या जीवनशैली के लिए श्रमण दर्शन अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे. अब विज्ञान और तकनीक के दौर में जनता को अशिक्षित और अंधविश्वास से भयभीत बनाते हुए एकजुट करने की जरूरत नहीं है.
इसके विपरीत आज के और भविष्य के लोकतान्त्रिक समाज में जनता को सुशिक्षित और जागरूक बनाकर अधिक आसानी से और अधिक सृजनात्मक ढंग से संगठित किया जा सकता है. यूरोप ने पुनर्जागरण के बाद जिस तरह की राजनीति और समाज दर्शन बनाया है उसमे अंधविश्वास से भयभीत जनता को नहीं बल्कि वैज्ञानिक बोध से जागी हुई जनता को आधार बनाया गया है.
इसके विपरीत अरब, मध्यपूर्व, और भारत सहित दक्षिण एशिया के अन्य देशों में अभी भी राजसत्ता और धर्मसत्ता के गठजोड़ का अन्धविश्वासी ब्राह्मणी माडल चल रहा है.
अगर ये देर तक चलता रहा तो ये मुल्क प्राचीन भारत और तिब्बत की तरह फिर से कमजोर होकर गुलाम होंगे. यूरोप ने जिस तरह से अपने समाज को अपनी राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान तकनीक आदि को विकसित किया है उसका मुकाबला कोई भी “राजा-इश्वर-ब्राह्मणवाद” की त्रिमूर्ति और अंधविश्वास पर खड़ा समाज या देश नहीं कर सकता.
आज के दलितों, बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को इस बात से शिक्षा लेते हुए ये ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अंधविश्वास को घुसने न दिया जाए. इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म – ये तीन ऐसे जहरीले हथियार हैं जिनमें से कोई एक भी आपको और पूरे मुल्क को हजारों साल के लिए बीमार कर सकता है.
इनसे बचकर रहना जरुरी है और वर्तमान ब्राह्मणवादियों सहित दलाई लामा जैसे पुनर्जन्म के अंधविश्वास पर जीने वाले राजनेताओं से सावधान रहना चाहिए. दलाई लामाओं ने बहुत होशियारी से पुनर्जन्म के अन्धविश्वास के आधार पर निष्कंटक राज किया है इसी से उनकी सभ्यता संस्कृति और देश बर्बाद हुआ. दुर्भाग्य की बात है कि अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करने वाले इन महोदय को दुनिया भर में ज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.
हालाँकि इसका अपना राजनीतिक कारण है. यूरोप अमेरिका के देश इन महोदय को चीन के खिलाफ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इन सज्जन से पूछा जाना चाहिए कि आपका दिव्य ज्ञान आपके अपने लोगों देश और संस्कृति को अगर बर्बाद कर चुका है तो आपको जगत में ज्ञान बांटने का क्या अधिकार है? इस बात को भारत के दलितों को भी समझना जरुरी है. आजकल बहुत सारे दलित, बहुजन भाई बहन बौद्ध धर्म के गुरु के रूप में दलाई लामा से बहुत प्रभावित हो रहे हैं. ये एक खतरनाक बात है.
अंतिम रूप से मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि भारत के गरीबों दलितों बहुजनों और विशेष रूप से स्त्रीयों को वैज्ञानिक विश्लेषण पर खड़े श्रमण दर्शनों औ प्राचीन भारतीय भौतिकवाद का अध्ययन करना चाहिए. हालाँकि एसा करते हुए यह नहीं माना जा सकता कि प्राचीन बौद्ध धर्म अगर लौट आयेगा तो भारत में या भारत के शोषितों और स्त्रीयों के जीवन में खुशहाली आ जायेगी.
एक बात हजार बार नोट कर लेनी चाहिए कि अतीत के सभी धर्म अब हमारे किसी काम के नहीं हैं. सबका अपना हिंसक, पाखंडी और अन्धविश्वासी इतिहास रहा है.
हमें अपने भविष्य के लिए अतीत से आने वाले या अतीत के किसी स्वर्णयुग की प्रशंसा करते हुए किसी भी धर्म को आधार नहीं बनाना है. बल्कि हमें भविष्य की तरफ देखती हुयी लोकतांत्रिक चेतना और तर्कबुद्धि का सहारा लेना है.
अब चूँकि इस आशय से तुलनात्मक रूप से बुद्ध सबसे वैज्ञानिक नजर आते हैं इसलिए मैं बुद्ध की प्रशंसा कर रहा हूँ. प्राचीन बौद्ध धर्म और महायान का इतिहास भी दलितों के लिए बहुत उत्साहवर्धक या आश्वासन देने वाला नहीं कहा जा सकता.
लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि बुद्ध की मूल अनात्म्वादी और अनीश्वरवादी शिक्षाएं भविष्य के भारत के लिए उपयोगी सिद्ध होंगी. ये बात याद रखी जानी चाहिए कि तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि इसलिए महान नहीं हैं क्योंकि उन्हें बुद्ध ने प्रचारित किया है, बल्कि बुद्ध इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि का प्रचार किया है.
जो लोग बुद्ध या बौद्ध धर्म में आश्वासन खोज रहे हैं उन्हें अपने नजरिये में एक बात और जोड़ लेनी चाहिए कि बुद्ध या बौद्ध धर्म अगर उन्हें अधिक तर्कशील या वैज्ञानिक नहीं बना रहा है तो उनकी बुद्ध की शिक्षाओं की समझ में कुछ कमी है और इस कमी का फायदा उठाकर अन्धविश्वासी ताकतें उन्हें फिर से गड्ढे में गिरा सकती हैं.
इसीलिये डॉ. अंबेडकर ने प्राचीन या ज्ञात बौद्ध धर्म को नहीं चुना बल्कि उन्होंने वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक चेतना दृष्टि पर आधारित बौद्ध धर्म का आविष्कार किया है.
ये नया धर्म या नवयान सफल होगा या नहीं ये बात महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन ये बात अधिक महत्वपूर्ण है कि शोषितों दलितों की मुक्ति के लिए डॉ. अंबेडकर ने किस तरह के बुद्ध या बौद्ध धर्म को चुना या निर्मित किया है. इसका मतलब साफ़ है. हमें अतीत से आने वाले रेडीमेड बौद्ध धर्म में नहीं बल्कि ज़िंदा और भविष्य की फ़िक्र करने वाली “बुद्ध-दृष्टि” की आवश्यकता है.
ये बात बहुत बहुत महत्वपूर्ण है. इस प्रकार बुद्ध और बुद्ध की शिक्षाओं में आश्वासन खोजने वाले लोगों के कंधों पर अपने भविष्य के हित लिए ही नहीं बल्कि भारत के भविष्य के हित लिए भी एक बड़ी जिम्मेदार आन पड़ी है.
गुजरात के मेहसाणा जिले में बीते रविवार (14 मई) को एक धार्मिक आयोजित था। इसमें शामिल दलित समाज के लोगों का आरोप है कि वहां उनसे जातिगत भेदभाव किया गया। अनुसूचित जाति के लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजन में दावत के दौरान उन्हें पाटीदार समाज के लोगों ने अलग बैठाकर खाना खिलाया।
इस मामले में भटरिया गांव के दलित समाज के लोगों का कहना है कि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर पाटीदार समाज ने रात्रिभोज का आयोजन किया दलित समाज के लोगों को सबके साथ नहीं खिलाकर, उनके लिए मंदिर से कुछ दूरी पर गांव के एक स्कूल में खाने की व्यवस्था की गई थी। दलित समाज के लोगों का कहना है कि इससे उन्हें अपमान महसूस हुआ और उन्होंने खाने से मना कर दिया। यहीं नहीं इस गांव की मुखिया विजयाबेन परमार जो कि दलित समाज से हैं, उन्होंने भी आरोप लगाया कि ग्राम पंचायत का प्रधान होने के बावजूद उन्हें दावत के दौरान अन्य ग्रामीणों से अलग बैठने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा कि हम इस अपमान को बर्दास्त नहीं करेंगे। इस घटना के बाद दलित समाज के लोगों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर इस भेदभाव के दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
हालांकि मामला तूल पकड़ने के बाद अब पाटीदार समाज के लोग इन आरोपों को गलत बताते हुए लीपापोती कर रहे हैं और मामले में सुलह की कोशिशें तेज हो गई है। हालांकि इस घटना ने दलितों के साथ होने वाले भेदभाव के कई अन्य मामलों को भी उजागर कर दिया है। कुछ स्थानीय दलितों, जिनमें कांतिभाई नादिया शामिल हैं, उनका आरोप है कि भटरिया गांव में दलितों के साथ अछूतों की तरह व्यवहार होता है। हमारे समाज की महिला सदस्यों को आंगनबाड़ी केंद्रों में खाना बनाने की अनुमति नहीं है। कुछ मामलों में तो नाई भी बाल काटने से इंकार कर देते हैं। उन्होंने कहा कि आखिर हमें इस तरह के अन्याय और अपमान को कब तक सहना पड़ेगा।
साफ है कि देश के तमाम हिस्सों में जिस तरह दलितों के साथ भेदभाव की खबरें हर रोज सामने आती हैं, वह भारत के गांव-गांव में मनुवदियों के दिमाग में भरे हुए जातीय सड़ांध की पोल खोलता है।
कर्नाटक का मुख्यमंत्री कौन होगा, इसको लेकर लगातार मंथन जारी है। इस पर किसी भी वक्त फैसला आ सकता है कि कर्नाटक का ताज या तो डी के शिवकुमार को मिलेगा या फिर सिद्धारमैया को। इस बीच में कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद जो तमाम आंकड़े सामने आ रहे हैं, उसने साफ कर दिया है कि प्रदेश में दलित और आदिवासी समाज ने भाजपा को नकार दिया है और कांग्रेस को भर-भर कर वोट दिया है। यह तब हुआ है जब भाजपा ने वादा किया था कि कर्नाटक में सत्ता में आने पर वह इनका रिजर्वेशन बढ़ाएगी।
बावजूद इसके अगर समाज के इन दो महत्वपूर्ण हिस्सों ने भाजपा को खारिज कर दिया तो इसकी वजह क्या है? क्या यह भाजपा के लिए कर्नाटक के साथ-साथ केंद्र और तमाम दूसरे राज्यों के लिए भी खतरे की घंटी है? दरअसल कर्नाटक में दलितों और आदिवासियों ने किस तरह भाजपा के पसीने छुड़ा दिये हैं, उसे समझना जरूरी है।
कर्नाटक में अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी समाज के लिए 15 सीटें रिजर्व हैं। 2018 के चुनाव में भाजपा ने इसमें से 7 सीटें जीती थी। लेकिन इस बार वह एक भी सीट नहीं जीत सकी है। इसी तरह पिछले चुनाव में भाजपा ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 36 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की थी, जो कि इस बार 12 पर रुक गई। यानी भाजपा को दलित और आदिवासी समाज ने जोरदार झटका दिया है।.
भाजपा को मिला यही झटका कांग्रेस के लिए संजीवनी बन गया। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने 7 एसटी सीट जबकि 12 एससी सीट जीती थी। जबकि इस बार कांग्रेस को अन्य समाजों के साथ दलित और आदिवासी समाज का भरपूर समर्थन मिला है। कांग्रेस पार्टी ने अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व 36 सीटों में से 21 पर जीत हासिल की है। जबकि जनजाति के लिए रिजर्व 15 सीटों में से 14 जीत ली है। एक सीट जनता दल सेकुलर के हिस्से आई है। यानी इन दोनों समाजों ने कांग्रेस की झोली में 35 सीटें डाली है।
अगर प्रदेश में जातीय समीकण को देखें तो आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक की सियासत में सबसे मजबूत लिंगायत समाज का प्रभाव 67 सीटों पर है। जबकि वोक्कालिगा का 48 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा मुस्लिम समाज का प्रभाव 50 सीटों पर है, जबकि दलित समाज 36 सीटों पर प्रभाव रखता है। ब्राह्मणों की बात करें तो इस समाज का प्रभाव 15 सीटों पर है जबकि कोरबा का 10 और ओबीसी का 24 सीटों पर प्रभाव है।
ऐसे में दलितों और आदिवासियों का भाजपा से मोहभंग भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ी खबर है। कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए सबसे अहम है। क्योंकि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था। तो क्या यह माना जाए कि भाजपा की केंद्र से उल्टी गिनती शुरू हो गई है?
केरला स्टोरी फिल्म को लेकर भारतीय जनता पार्टी और उसके बड़े-बड़े दिग्गज नेता जिस तरह सक्रिय हो गए हैं, उससे लगता है कि यह फिल्म नहीं, बल्कि पार्टी का अपना एजेंडा हो। अब भाजपा नेता आदिवासियों समाज की महिलाओं को यह फिल्म दिखाने को उतावले हो गए हैं। पश्चिम बंगाल के बीजेपी लीडर दशरथ तिरकी हो या झारखण्ड के बाबुलाल मरांडी, सभी नेता आदिवासी महिलाओं को इस फिल्म को देखने पर जोर दे रहे हैं।
कोई पूरी हॉल आदिवासी महिलाओं के लिए राँची में बुकिंग कर रहा तो कोई अलीपुरद्वार से असम ले जाकर बस में यह फ़िल्म दिखाने को बेताब हुए बैठे हैं। आदिवासी महिला का सवाल जैसे इस फ़िल्म में खूब बारीकी से दिखाया गया है। थू है! ऐसे नेताओं पर जो अपनी आदिवासी महिलाओं को गाय-बकरी समझ कर चाय बागानों से उठा कर असम में केरला स्टोरी दिखाने ले जा रहे। तो कोई कॉलेज की आदिवासी लड़कियों को फ्री में यह दिखाने के लिए टिकट खरीदे बैठे हैं। सवाल उठता है कि आखिर क्यों?
इन नेताओं को अगर आदिवासी महिलाओं के सवाल को इस समाज की महिलाओं और बच्चियों को समझाना है तो वह केरला स्टोरी में नहीं बल्कि निर्मला पुतुल की कविताओं में देखिए। ग्रेस कुजूर और रोज केरकेट्टा की लेखनियों में देखिए। जसिंता केरकेट्टा के लेखन में देखिए। पूनम वासम की चिंताओं में देखिए। उज्ज्वला ज्योति तिग्गा की कवितई में देखिए।
आदिवासी स्त्री के सवाल नहीं है तथाकथित ‘लव जिहाद’
आदिवासी स्त्री का सवाल नहीं है उनको इस्लामिक स्टेट में टार्चर करने की कहानी। एक काल मिथकों का था जब आप सभी तथकथित सभ्यों ने महाकाव्य (रामायण, महाभारत आदि) लिखकर आदिवासियों को नीचा दिखाया। अब नए युग के ये युगपुरुष फिल्मों के हवाले से अपना प्रोपेगंडा फैला रहे हैं।
इस्लाम के प्रति जो फोबिया है , मनगढ़ंत उसको हवा देती हुई इस घटिया वाहियात फ़िल्म को बैन किया जाना चाहिए। और आदिवासी महिलाओं को इस फ़िल्म दिखाने के पीछे का सीधा अर्थ है कि आदिवासी महिलाएं जो आज तक धर्म के नाम पर कभी हिंसक नहीं रही उन्हें इस फ़िल्म के बहाने से एक खास सम्प्रदाय के प्रति घृणा से भरा जाए। उनको भी मुस्लिम हैट्रेड का एक प्याला दिया जाए।
आदिवासी महिलाओं पर लिबरल दिखने का दबाव क्यों?
कट्टर हिन्दू महिलाओं की भांति क्यों न ये सभी भी तलवार, भाला, और हथियार उठाये। दुर्गावाहिनी, काली सेना, आदि संगठनों की तरह यह भी हिन्दू राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका तय करें। क्यों आखिर ये आदिवासी महिलाएं यह उच्चारण तख्तियां लेकर करें कि – “आदिवासी हिन्दू नहीं हैं।”
आदिवासी धर्म का कॉलोम जनगणना में देना होगा।”
“आदिवासी सरना कोड लेकर रहेंगे।”
परेशानी का सबब मुख्यतः यही है।।
आदिवासी महिलाओं ने इस हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को नकारा है। आदिवासी महिलाओं ने प्रेम की महत्ता को हमेशा स्वीकारा है। अदिवासी महिलाओं के मन मस्तिष्क में आज तक धार्मिक उन्मादी बनने की कोई इच्छा आज तक नहीं दिखी है। आदिवासी समाज आज तक इस्लामोफोबिया के गिरफ्त में नहीं आया है। आदिवासी महिलाओं के सवाल से कोई वास्ता न रखने वाले यह नेतागण 2024 में लोकसभा इलेक्शन की तैयारी में अपने आकाओं को खुश करने के लिए इस तरह के आयोजन में लिप्त है। आदिवासी समाज को इस तरह के लॉलीपॉप बेचने वाले नेताओं का सामाजिक राजनैतिक बहिष्कार करने चाहिए।
हम आदिवासी महिलाएं जहाँ कही हैं, अपनी आदिवासी पहचान के कारण शोषित हैं। चाहे वह जंगल हो, चाहे वह विश्वविद्यालय हो, चाहे वह सरकारी दफ्तर हो, चाहे वह डोमेस्टिक हेल्प के नाम पर महानगरों में हों। मानसिक हिंसा से वह लगातार त्रस्त है। शारीरिक हिंसा से भी वह त्रस्त है। सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाली सत्ताएं आज आंख मूंदकर सिनेमाघरों का हवाला दे रही हैं। मणिपुर को जलता छोड़कर मल्टीप्लेक्स में अपने अय्याशी का पैसा उड़ा रही है।घिन आती है इस राजनीति पर।
आदिवासी महिलाएं इतनी नासमझ नहीं कि आपके एक फ़िल्म दिखा देने से वे आपके हत्यारी मंसूबों का औजार बन जाएंगी। फूलों-झानो, सिनगी दई- कईली दई की वंशज हैं हम। आपकी मंशाओं पर पानी फेरकर रहेंगी।
कनाडा से लौटने से पहले की शाम को मैं रो पड़ा था। दरअसल दूसरे दिन सुबह मेरी फ्लाइट थी और मेरी विदाई के लिये तमाम साथी इकट्ठा हुए थे। सभी बारी-बारी से मेरे बारे में अपने अनुभव बता रहे थे। फिर मेरी बारी आई, और मेरा गला रुंध गया। मैं रोने लगा। मेरे लिये कुछ भी कह पाना मुश्किल हो रहा था। फिर मेरे साथ बाकियों की आँखें भी गीली हो गई।
जब चेतना एसोसिएशन, कनाडा के जय बिरदी सर से कई दौर की बातचीत के बाद 21-26 अप्रैल 2023, तक चलने वाले Dr. Ambedkar International Symposium and Emancipation and Equality Day के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कनाडा जाने का कार्यक्रम तय हुआ था तो मुझे अंदाज़ा नहीं था कि #Jai_Birdi जी और सहयोगी संस्था #AICS के #Param_Kainth जी मेरे लिये 20 दिन लंबा कार्यक्रम बना रहे हैं। जब उन्होंने मुझे फ्लाइट का टिकट भेजा तो मैं भी परेशान था कि इतने दिन करूँगा क्या? क्योंकि देश से बाहर जाकर अकेले घूमना भी मुश्किल होता है, ख़ासकर वहाँ; जहां का एक डॉलर हमारा 63₹ हो।
मैं प्रोग्राम के दो दिन पहले पहुँच गया था, ताकि जेटलैक (लंबे हवाई सफ़र के कारण होने वाली परेशानी) से उबर कर रिलैक्स हो जाऊँ। इस कारण मैं जय बिरदी जी और परम कैन्थ जी के साथ आख़िरी की तैयारियों में शामिल हो गया। और 21 अप्रैल, 2023 को कार्यक्रम के पहले दिन तक मैं आयोजक मंडल का हिस्सा बन चुका था। लगने लगा कि मैं कार्यक्रम में शामिल होने नहीं आया, बल्कि ये कार्यक्रम मेरा ही है। इसके बाद तो 21-26 अप्रैल तक एक के बाद एक शानदार कार्यक्रम हुए।
शुरुआत बुद्धिज्म पर चर्चा के साथ हुई। विषय था- Contemporary Buddhism and Emancipation. फिर ज्यूडिशियल सिस्टम, Caste in academic settings in Canada and other jurisdictions, Caste and Entrepreneurship, वंचित समूहों की महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण जैसे अहम विषयों पर भी शानदार चर्चा हुई। पैनल में शामिल हर वक्ता शानदार थे और अपने विषय पर तैयारियों के साथ अपना पक्ष रख रहे थे। अमेरिका के सुपीरियर कोर्ट की #Judge_Neetu_Badhan और अलबर्टा की MLA Leela_Aheer और भारत से गए राजरतन अंबेडकर जी ने तो शानदार बोला। और इन तमाम दिग्गजों को कार्यक्रम के संयोजक संगठनों #AICS और #Chetna_Association_Canada जिस तरह एक मंच पर लाए, वो सराहनीय था।
एक और बात जो बताने वाली है वो है चेतना एसोसिएशन के जय बिरदी जी और उनके टीम की दूरदृष्टि और सोच। छह दिनों के इस इंटरनेशनल सिंपोज़ियम के लिए British_Columbia State के बड़े विश्वविद्यालयों को चुना गया था। शुरुआती तीन दिनों कार्यक्रम University of British Columbia (UBC) में हुआ, तो बाद के तीन दिन का सेमिनार Simon Fraser University, Burnaby, University of Fraser Valley, Abbotsford और University of Victoria में हुआ। सुखद यह भी रहा कि इन तमाम कार्यक्रम में अम्बेडकरी समाज के युवाओं के साथ-साथ एशियाई और कनाडा मूल के Student भी शामिल रहे।
23 April को अंबेडकर जयंती के कार्यक्रम में अपने परिवार के साथ शामिल लगभग 500 अम्बेडकरवादियों के जुटान से साफ़ जो हो गया कि कनाडा के वैंकूवर क्षेत्र में बाबासाहेब का आंदोलन मज़बूत हाथों में है। मुझे इस कार्यक्रम से भविष्य में बेहतर उम्मीद दिखती है। मैंने अपनी इस यात्रा में 30 से ज्यादा वीडियो स्टोरी की, जिसने मुझे कनाडा में अंबेडकरी आंदोलन को समझने में मदद की।
इस बीच एक दिन के लिए 29 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अमेरिका के सियाटल शहर जाना भी हुआ। सियाटल और वैंकुअर के बीच महज 4 घंटे की दूरी है। कार्यक्रम से इतर मुझे ब्रिटिश कोलंबिया स्टेट की वादियाँ और यहाँ के लोगों से प्यार हो गया है। यह इतना खूबसूरत है कि आपको मनाली, शिमला, रोहतांग और कश्मीर इसी जगह मिल जाते हैं। यहाँ की वादियाँ दुनिया की सबसे खूबसूरत वादियों में है। उसी तरह से मुझे यहाँ बेहतरीन लोग मिले। उनका जिक्र किये बिना यह रिपोर्ट पूरी नहीं होगी। जय बिरदी जी और उनकी पत्नी निर्मला आंटी ने जिस तरह 20 दिनों तक मुझे अपने परिवार के सदस्य की तरह साथ रखा और प्यार एवं अपनापन दिया, वो अपनापन भारत लौटने के बाद भी मेरे साथ है। परम कैन्थ जी और हरमेश जी से बड़े भाई जैसा प्यार मिला। सुरजीत बैन्स और मनजीत बैन्स जी ने हमेशा घर जैसा अहसास कराया। मनजीत कैन्थ, गुरप्रीत और सीमा जी जैसे दोस्त मिले। मनजीत कैन्थ और उनके भाईयों की मंडली के साथ डाउन टाउन इलाके में देर रात तक घूमना यादगार रहेगा।
बरजिंदर जी और सियाटल के चैतन्य जी ने बिना शोर किये जिस तरह दलित दस्तक की मदद को हाथ बढ़ाया, उसके लिए शुक्रिया शब्द कम है। इसी तरह अलबर्टा स्टेट में हरजिंदर मल जी और चंचल मल जी और सियाटल में चरणजीत जी और उनकी पत्नी निर्मला जी से मिला स्नेह याद रहेगा। आप सभी मेरी ज़िंदगी की एक ख़ास वक़्त का हिस्सा बने, इसके लिए आप सबका धन्यवाद।
हमारी जिंदगी में कई मोड़ और पड़ाव आते हैं। कनाडा की यह यात्रा मेरे लिए एक सुखद मोड़ और नया पड़ाव लेकर आया है। वहां मैंने एक परिवार बनाया है। मैं वहां के लोगों के परिवार में शामिल हो गया हूं। मुझे आप सभी से प्यार हो गया है। आपलोग बहुत दिलदार हैं। आपने खूब तोहफे दिये। उन्हें संभाल कर रखूंगा। यह यात्रा मेरे जीवन में एक सुखद याद बनकर रहेगी। आखिर में एक शख्स का नाम लिखकर और उनसे एक बात कह कर खत्म करना चाहूंगा। जय बिरदी सर- थैंक्यू। लव यू। खूब सारा आदर। जय भीम।
सुदूर रेगिस्तान के दलित-किसान-मजदूर परिवार में पैदा हुये भट्टाराम एक ऐसे इलाके से आते है,जहां पर जातिगत भेदभाव व छुआछूत भयंकर रूप में विद्यमान है.यह इलाका आज भी सामंतवाद की चपेट में है.आज भी यहां दलितों को छूने तक से परहेज किया जाता है.बच्चों के साथ स्कूलों में भेदभाव आम बात है.
ऐसी विपरीत सामाजिक आर्थिक व भौगोलिक पृष्ठभूमि से आने वाले भट्टाराम ने बाड़मेर जिले के पचपदरा ब्लॉक के टापरा गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से 2014 में हिंदी माध्यम से 12वीं तक शिक्षा ग्रहण की.भट्टा राम के परिवार वाले खरीफ सीजन में खेतों में पर्व करते है और चार महीने के लिए वहीं रहते है.खेती के समय भट्टा राम को 6 किमी पैदल विद्यालय जाना पड़ता था,फिर 2017 में एमबीआर राजकीय कॉलेज बालोतरा से बीए कम्पलीट किया.
उच्च शिक्षा के लिए पैसा जमा करने के लिए अप्रेल 2015 से अगस्त 2017 तक आईडिया डिस्ट्रीब्यूटर के यहां सेल्स एक्सिक्यूटिव की नौकरी की और भवन निर्माण में अकुशल श्रमिक के तौर पर मजदूरी भी की. इसके बाद 8 महीने तक नालंदा एकेडमी वर्धा में रहकर उच्च शिक्षा के लिए तैयारी की और 2018 में जल नीति और शासन के परास्नातक पाठ्यक्रम हेतू टाटा इंस्टीट्यूट मुम्बई पहुंचे.
भट्टाराम में अपने इलाके के कालूडी गांव में 70 दलित परिवारों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले आतंकी जातिवादी तत्वों के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष किया और कालूडी के मुद्दे को यूएनओ तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की.भट्टाराम ने टाटा इंस्टीट्यूट में जल नीति का अध्ययन किया और TISS छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा था। जिसमे वो भारी मतों से विजयी हुए थे।
भट्टा राम ने मास्टर की पढ़ाई के बाद 2020 में इनरेम फाउंडेशन में पानी की गुणवता और स्वास्थ्य मुद्दो पर राजस्थान में काम किया.उसके बाद 2021 में उन्नति विकास शिक्षण संगठन में बाड़मेर और जैसलमेर में परंपरागत पानी के स्रोतों के जीर्णोद्धार के लिए काम किया.
अक्तूबर 2021 में भट्टा राम का कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की 02 वर्षीय महात्मा गांधी नेशनल फैलोशिप में चयन हुआ,जिसमें आईआईएम उदयपुर से पब्लिक पॉलिसी और मैनेजमेंट की पढ़ाई की है.इस फैलोशिप में वह जिला प्रशासन के साथ मिलकर कौशल विकास और आजीविका के क्षेत्र में काम करते रहे है.
भट्टा राम अपने जॉब के साथ साथ छात्रहित के मुद्दो पर भी लगातार काम कर रहे है। अभी उनका युनेस्को के IHE Delft जल शिक्षा संस्थान,नीदरलैंड्स में जल और सतत विकास में मास्टर की पढ़ाई के लिए चयन हुआ है.नीदरलैंड्स में पढ़ाई के लिए भट्टा राम ने रोटरी इंटरनेशनल के रोटरी फाउंडेशन की स्कॉलरशिप के लिए आवेदन किया था.इस छात्रवृति के लिए पूरे विश्व से हजारों आवेदन आते है, जिसमे सिर्फ 15 विधार्थियों का चयन होता है.भारत से 4 विधार्थियों का चयन हुआ है उसमे भट्टा राम का भी नाम है.
अद्भुत जीवट और संघर्षशील के धनी युवा साथी भाई भट्टा राम को उच्च शिक्षा के लिए हार्दिक मंगलकामनाएँ और ख़ूब ख़ूब बधाइयाँ
राहुल गांधी ने कर्नाटक में एक चुनावी भाषण में एक नारा दिया, “जितनी जिसकी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” इसका अर्थ है कि किसी समाज और किसी विशिष्ट सामाजिक समूह की हिस्सेदारी जनसंख्या में उनके हिस्से के अनुरूप होना चाहिए। अपनी बात राहुल गांधी ने इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘यदि 70 प्रतिशत भारतीय ओबीसी/एससी/एसटी जातियों के हैं, तो विभिन्न व्यवसायों और क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व भी मोटे तौर पर 70 प्रतिशत होना चाहिए।”
राहुल गांधी की इस बात का कि ‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का व्यवहारिक मतलब है कि भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 11,310 वरिष्ठ अधिकारियों में से 8,000 अधिकारी ओबीसी/एससी/एसटी जातियों से होने चाहिए या 104 स्टार्टअप यूनिकॉर्न में से 70 की स्थापना ओबीसी/एससी/एसटी जातियों के लोगों द्वारा की जानी चाहिए थी। लेकिन इन जातियों का कोई नहीं है। या इसका मतलब है कि भारत सरकार में 225 संयुक्त सचिव और सचिव ओबीसी/एससी/एसटी जातियों के होने चाहिए, लेकिन हैं, सिर्फ 68। या नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की शीर्ष 50 कंपनियों में से 30 का नेतृत्व इन उत्पीड़ित जातियों के लोगों द्वारा किया जाना चाहिए, लेकिन इन जातियों का कोई नहीं है।
यह सूची बहुत लंबी है। दूसरी ओर मनरेगा कार्यक्रम के 15.4 करोड़ श्रमिकों में से 80 प्रतिशत ओबीसी/एससी/एसटी हैं। मैला ढोने वाले सभी 60,000 भारतीय दलित या आदिवासी हैं। भारत सरकार के 44,000 सफ़ाई कर्मचारियों में से 75 प्रतिशत दलित या आदिवासी हैं। पेशेवर सफलता में जाति के प्रतिनिधित्व में भारी असमानता महज संयोग नहीं है। अनुभवजन्य साक्ष्य इस बात को प्रमाणित करते हैं कि ऐसी सफलता को निर्धारित करने में जाति महत्वपूर्ण कारक हैं।
जब जातिगत असमानता के ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं, तो आम तौर पर ऐसी प्रतिक्रिया आती है कि इस तरह की सफलता (प्रोफेशनल) शिक्षा और योग्यता का मामला है, इसका जाति से कोई लेना-देना नहीं है। यह तर्क हास्यास्पद है कि प्रोफेशनल सफलता के लिए आवश्यक सभी ‘योग्यता’ ऊपर की शीर्ष 30 प्रतिशत ऊंची जातियों के पास है। जबकि नीचे के 70 प्रतिशत ( एसी, एसटी और ओबीसी) के पास कोई योग्यता नहीं है। अगर शिक्षा पेशेवर सफलता की सीढ़ी है, तब सीढ़ी उत्पीड़ित जातियों के बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती है।
भविष्य के नेताओं और नीति निर्माताओं को तैयार करने वाले एक प्रतिष्ठित निजी संस्थान, अशोका यूनिवर्सिटी को फंड देने वाले सभी 175 दानकर्ता ऊंची जातियों से हैं। इस स्थिति में कोई आश्चर्च नहीं होना चाहिए कि जहां इस तरह की प्राइवेट संस्थाओं से सिर्फ 6 प्रतिशत स्नातक एससी,एसटी और ओबीसी समाज से आते हैं, जबकि आईआईटी (IIT) जैसे उच्च सरकारी संस्थान से 35 प्रतिशत स्नातक इन तबकों से आते हैं।
भारत में सामाजिक पहचान को रेखांकित किए बिना योग्यता आधारित समाज का विचार एक धोखा है। यदि जातिगत असमानता की इस तरह की कटु सच्चाई हमारे सामने है और यह निश्चित तौर पर सबसे पुरजोर तरीके से प्रस्तुत होने वाला मुद्दा है, तो हमारी नीतिगत चर्चा इसे पर्याप्त रूप में क्यों नहीं दर्शाती है? शायद इसका एक कारण यह है कि इस बारे में जो विमर्श हो रहा है, उस पर इन उत्पीड़ित जातियों के लोगों का वर्चस्व नहीं है। उदाहरण के तौर पर जिन 600 लेखकों ने पिछले चार महीनों में अंग्रेजी भाषा के प्रमुख प्रकाशनों में वैचारिक लेख लिखे, उनमें 96 प्रतिशत अपरकॉस्ट के थे।
ये प्रकाशन द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द प्रिंट और एनडीटीवी हैं। एक लेखक के तौर पर मुझे स्वयं और अन्य लेखकों को अपनी जाति का फायदा मिला। उत्पीड़ित जातियों के हितों के पक्ष में खड़े होने के लिए यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति विशेष उनकी जाति का हो, लेकिन इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि जिन 96 प्रतिशत उच्च जाति के प्रभावशाली विमर्शकार यह लेख लिखते हैं, वे एससी, एसटी और ओबीसी की कठिनाइयों से परिचित न हों।
जब जीविका के साधन के आधार पर गरीब और अमीर के बीच का वर्ग विभाजन अच्छी तरह स्वीकार किया जाता है, हमारे देश में जीविकोपार्जन के साधन को निर्धारित करने में जाति अधिक महत्वपूर्ण कारक है। इसे स्पष्ट शब्दों में कहें तो भारत में किसी बच्चे के जन्म लेते ही जो लॉटरी खुलती है, उसमें अमीर दलित परिवार में पैदा हुए बच्चे की सफलता की संभावना भी गरीब उच्च जाति के परिवार में पैदा हुए बच्चे की तुलना में कम होती है। भारत में सामाजिक नेटवर्क, पूर्वाग्रह और कलंक वे कारक हैं, जन्म के आधार मिलने वाली लॉटरी के परिणाम तय करते हैं।
यह एक छात्रवृत्ति है। इसके सैद्धांतिक और अनुभवजन्य दोनों प्रमाण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इस स्थिति ये सवाल उठते हैं कि भारत में जातिगत दरार कितनी गहरी है? और एक सभ्य समाज में यह स्थिति किस कदर स्वीकार्य है? क्या इसको ठीक करने के लिए सक्रिय प्रयास होने चाहिए और यदि हां तो इस समस्या के समाधान का उपाय क्या हो सकता है? संक्षेप में कहें तो पूरी तरह समानता हासिल करना तो बहुत दूर की चीज है, ऐसे में हमें ‘ जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ वाले समाज निर्माण को किस कदर अपनाना चाहिए?
नवीन सामाजिक न्याय के मिशन शुरू करने के लिए पहला कदम समस्या कहां तक और किस कदर है, इसको समझना। इसके लिए जाति जनगणना के आंकड़ों की जरूरत है। जातिगत जनगणना हमें न केवल जाति के अनुसार जनसंख्या की भागीदारी के बारे में जानकारी देगी बल्कि विभिन्न जातियों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक गतिशीलता के बारे में भी जानकारी देगी। जो किसी भी नए सामाजिक न्याय कार्यक्रम की नींव है। जाति समस्या के समाधान के रूप में सिर्फ तुरंत आरक्षण के प्रतिशत को उच्च स्तर पर बढ़ाने और उसका विस्तार करने की मांग करना अपरिपक्व और बौद्धिक आलस्य से भरा कदम है।
जन्म के आधार मिली ‘दैवीय’ लॉटरी से पैदा हुई असमनाताओं को दूर करने के लिए अमेरिका, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देशों ने शिक्षा, कौशल और नौकरियों के लिए सामाजिक लॉटरी जैसे समाधानों को अपनाया है। अब समय आ गया है कि इसे भारत में भी लागू करने के बारे में विचार किया जाए। 21वीं सदी में जातिगत असमानताओं का समाधान सिर्फ आरक्षण के ढांचे और अफर्मेटिव एक्शन (सकारात्मक भेदभाव) तक सीमित रखना सच्चाई से आंख मूदना होगा। एक खुली, जीवंत सावर्जनिक बहस और विमर्श भारतीय संदर्भ के लिए रचनात्मक समाधान उत्पन्न कर सकते हैं। इससे पहले पहला कदम जातिगत जनगणना के माध्यम से समस्या के बारे में विस्तृत आंकड़ा और जानकारी प्राप्त करना है।
(इंडियन एक्सप्रेस से साभार लिए गए प्रवीन चक्रवर्ती के इस लेख का हिंदी अनुवाद डॉ. सिद्धार्थ ने किया है।)
ब्राह्मणवादी परंपरा में सबसे ‘महान’ राज्य ‘रामराज्य’ और सबसे ‘महान’ राजा राम हुए हैं, लेकिन इस रामराज्य में लोगों का मूल कर्तव्य वर्णव्यवस्था का पालन था। यानी शूद्र और अतिशूद्र द्विजों की सेवा करेंगे और स्त्रियां पुरुषों की। यदि कोई इसका उल्लंघन करता, तो स्वयं राजा राम अपने हाथों उसकी हत्या कर देते थे। इसके बरक्स बहुजन-श्रमण परंपरा में ऐसे राजा हुए हैं, जिनका राज्य सचमुच में न्याय और जनता के कल्याण की स्थापना के लिए था और जिन्होंने वर्ण-जाति व्यवस्था एवं इस पर आधारित भेदभाव को ध्वस्त करने में अपना जीवन लगा दिया। ऐसे ही एक राजा शाहू महाराज थे। वे एक ऐसे राजा हुए जिन्होंने जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले के सपनों को साकार कर दिया।
शाहू जी महाराज 2 जुलाई 1894 में कोल्हापुर के राजा बने थे। राजा बनते ही उन्होंने राज्य और समाज पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोड़ने की शुरूआत कर दी। 26 जुलाई 1902 को भारतीय इतिहास में उन्होंने वह काम कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। शाहू जी महाराज ने चितपावन ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के मध्य 26 जुलाई को अपने राज्य कोल्हापुर की शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में दलित-पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह आधुनिक भारत में जाति के आधार पर मिला पहला आरक्षण था। इस कारण शाहू जी आधुनिक आरक्षण के जनक कहलाये। परवर्तीकाल में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने शाहू जी द्वारा लागू किये गए आरक्षण का ही विस्तार भारतीय संविधान में किया। संविधान में दलितों के लिए आरक्षण तो लागू हो गया, लेकिन ओबीसी जातियों के लिए आरक्षण भविष्य पर छोड़ दिया गया। जबकि शाहू जी ने अपने राज्य में पिछड़ों और दलितों दोनों के लिए आरक्षण लागू किया था। भारत में पिछडे या ओबीसी जातियों को आरक्षण आजादी के करीब 45 वर्षों बाद 16 नवंबर 1992 को मिला। यानी शाहू जी द्वारा आरक्षण लागू करने के 90 वर्ष बाद।
1894 में जब शाहू जी महाराज राजा बने थे, उस समय कोल्हापुर राज्य के अधिकांश पदों पर चितपावन ब्राह्मणों का कब्जा था। सन 1894 में, जब शाहू महाराज ने राज्य की बागडोर संभाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिक के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। शाहू जी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को 50 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराने के कारण 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी।
शाहू जी महाराज फुले की गुलामगिरी में व्यक्त किए गए इस विचार से सहमत थे कि–
‘विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना वित्त गया
वित्त बिना शूद्र टूटे
इतने अनर्थ
एक अविद्या ने किए’
शाहू महाराज ने पिछड़ी-दलित जातियों के बीच व्याप्त अविद्या के नाश का बीड़ा उठाया। भारत के इतिहास में वे पहले राजा थे, जिन्होंने 25 जुलाई 1917 को प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निःशुल्क बना दिया। इसके पहले 1912 में ही उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। स्त्री-शिक्षा के फुले दंपत्ति के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया। 500 से 1000 तक की जनसंख्या वाले प्रत्येक गांव में स्कूल खोला गया। उन्होंने 1920 में नि:शुल्क छात्रावास खुलवाया। इस छात्रावास का नाम ‘प्रिंस शिवाजी मराठा फ्री बोर्डिंग हाउस’ रखा गया था।
हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि पेशवाओं के ब्राह्मणवादी शासन की स्थापना के बाद महाराष्ट्र के धार्मिक जीवन के साथ-साथ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी ब्राह्मणों का वर्चस्व और नियंत्रण कायम हो गया था। इस वर्चस्व और नियंत्रण को तोड़ने के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के साथ ही शाहू जी ने धार्मिक प्रभुत्व को भी तोड़ने का निर्णय लिया। 9 जुलाई 1917 को उन्होंने एक आदेश जारी किया कि कोल्हापुर राज्य के समस्त देवस्थानों की आय और संपत्ति पर राज्य का नियंत्रण होगा। इसके साथ ही उन्होंने मराठा (पिछड़ी) जाति के पुजारियों की नियुक्ति का भी आदेश जारी किया। 1920 में उन्होंने पूजा और पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालय खुलवाया। डॉ. आंबेडकर के हिंदू कोड बिल से तो हम सभी परिचित हैं, लेकिन 11 नवंबर 1920 को ही शाहू जी महाराज ने भी एक हिंदू कोड बिल पास किया था, यह शायद ही किसी को पता है। इस बिल के माध्यम से उन्होंने संपत्ति के उत्तराधिकार के संदर्भ में मिताक्षरा न्याय सिद्धांत को समाप्त कर दिया। मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है। इसकी मूल बात यह है कि स्त्री को संपत्ति उत्तराधिकार में नहीं मिल सकती। इस पर तरह-तरह की शर्तें और प्रतिबंध लगाये गये हैं। उन्होंने गांवों में पुरोहितों और पुजारियों की प्रणाली को समाप्त कर दिया।
अछूतों (दलितों) को समाज में बराबरी का हक दिलाने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए शाहू जी ने अन्य विशेष कदम भी उठाये। 1919 से पहले अछूत कहे जाने वाले समाज के किसी भी सदस्य का इलाज किसी अस्पताल में नहीं हो सकता था। 1919 में शाहू जी ने एक आदेश जारी किया, जिसके अनुसार अछूत समाज का कोई भी व्यक्ति अस्पताल आकर सम्मानपूर्वक इलाज करा सकता है। इसके अलावा उन्होंने 1919 में ही यह आदेश भी जारी किया कि प्राइमरी स्कूल, हाई स्कूल और कॉलेजों में जाति के आधार पर छात्रों के साथ कोई भी भेदभाव न किया जाय। उन्होंने दलितों को नौकरियों में जगह देने के साथ ही इस बात का आदेश दिया कि सरकारी विभागों में कार्य कर रहे दलित जाति के कर्मचारियों के साथ समानता और शालीनता का बर्ताव किया जाय। किसी प्रकार का छुआछूत नहीं होना चाहिए। जो अधिकारी इस आदेश का पालन न करने के इच्छुक हों, वे 6 महीने के भीतर त्यागपत्र दे दें।
हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि पेशवाओं के ब्राह्मणवादी शासन की स्थापना के बाद महाराष्ट्र के धार्मिक जीवन के साथ-साथ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी ब्राह्मणों का वर्चस्व और नियंत्रण कायम हो गया था। इस वर्चस्व और नियंत्रण को तोड़ने के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के साथ ही शाहू जी ने धार्मिक प्रभुत्व को भी तोड़ने का निर्णय लिया। 9 जुलाई 1917 को उन्होंने एक आदेश जारी किया कि कोल्हापुर राज्य के समस्त देवस्थानों की आय और संपत्ति पर राज्य का नियंत्रण होगा। इसके साथ ही उन्होंने मराठा (पिछड़ी) जाति के पुजारियों की नियुक्ति का भी आदेश जारी किया। 1920 में उन्होंने पूजा और पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालय खुलवाया। डॉ. आंबेडकर के हिंदू कोड बिल से तो हम सभी परिचित हैं, लेकिन 11 नवंबर 1920 को ही शाहू जी महाराज ने भी एक हिंदू कोड बिल पास किया था, यह शायद ही किसी को पता है। इस बिल के माध्यम से उन्होंने संपत्ति के उत्तराधिकार के संदर्भ में मिताक्षरा न्याय सिद्धांत को समाप्त कर दिया। मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है। इसकी मूल बात यह है कि स्त्री को संपत्ति उत्तराधिकार में नहीं मिल सकती। इस पर तरह-तरह की शर्तें और प्रतिबंध लगाये गये हैं। उन्होंने गांवों में पुरोहितों और पुजारियों की प्रणाली को समाप्त कर दिया।
अछूतों (दलितों) को समाज में बराबरी का हक दिलाने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए शाहू जी ने अन्य विशेष कदम भी उठाये। 1919 से पहले अछूत कहे जाने वाले समाज के किसी भी सदस्य का इलाज किसी अस्पताल में नहीं हो सकता था। 1919 में शाहू जी ने एक आदेश जारी किया, जिसके अनुसार अछूत समाज का कोई भी व्यक्ति अस्पताल आकर सम्मानपूर्वक इलाज करा सकता है। इसके अलावा उन्होंने 1919 में ही यह आदेश भी जारी किया कि प्राइमरी स्कूल, हाई स्कूल और कॉलेजों में जाति के आधार पर छात्रों के साथ कोई भी भेदभाव न किया जाय। उन्होंने दलितों को नौकरियों में जगह देने के साथ ही इस बात का आदेश दिया कि सरकारी विभागों में कार्य कर रहे दलित जाति के कर्मचारियों के साथ समानता और शालीनता का बर्ताव किया जाय। किसी प्रकार का छुआछूत नहीं होना चाहिए। जो अधिकारी इस आदेश का पालन न करने के इच्छुक हों, वे 6 महीने के भीतर त्यागपत्र दे दें।
दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतकारी साबित हुईं। पहला, 1917 में उन्होंने उस ‘बलूतदारी-प्रथा’ का अंत किया, जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी-सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गाँव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं। इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा ‘वतनदारी’ का अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया। इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई। दलित हितैषी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-‘मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हें तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है। मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे।’ उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया।
पिछड़ों, दलितों और महिलाओं को न्याय और समता का हक दिलाने के लिए शाहू जी महाराज को महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों के कोप और क्रोध का शिकार होना पड़ा। उन्हें विभिन्न तरीकों से अपमानित करके की कोशिश की गई।
शाहू जी के प्रति साधारण ब्राह्मणों की घृणा के कारणों को समझा जा सकता है। जिस व्यक्ति ने उनके सभी प्रकार के वर्चस्व को तोड़ दिया, उससे उनका घृणा करना लाजिमी था। दुखद बात यह थी कि बाल गंगाधर तिलक और डांगे (वामपंथी) जैसे व्यक्तियों ने भी उनके प्रति क्रोध और घृणा व्यक्त की है। तिलक से तो शाहू महाराज का निरंतर संघर्ष चलता रहा।
पिछड़ों और दलितों के मुक्तिदाता राजा शाहू जी महाराज का जन्म कुनबी (उत्तर भारत में कुर्मी) जाति में 26 जून 1874 में हुआ था। 20 वर्ष की उम्र में वे 1894 कोल्हापुर राज्य के राजा बने। 26 जुलाई 1874 को कोल्हापुर राजमहल में जन्मे शाहू जी छत्रपति शिवाजी के पौत्र तथा आपासाहब घाटगे कागलकर के पुत्र थे। उनके बचपन का नाम यशवंत राव था। तीन वर्ष की उम्र में अपनी माता को खोने वाले यशवंत राव को 17 मार्च 1884 को कोल्हापुर की रानी आनंदी बाई ने गोद लिया तथा उन्हें छत्रपति की उपाधि से विभूषित किया गया। बाद में 2 जुलाई 1894 में उन्होंने कोल्हापुर का शासन अपने हाथों में लिया और 28 साल तक शासन किया। 19-21 अप्रैल 1919 को कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय कुर्मी महासभा के 13वें राष्ट्रीय सम्मलेन में उन्हें राजर्षि के ख़िताब से नवाजा गया। जून 1902 में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एलएलडी की मानद उपाधि प्राप्त हुई जिसे पानेवाले वे पहले भारतीय थे। इसके अतिरिक्त उन्हें जीसीएसआई, जीसीवीओ,एमआरइएस की उपाधियाँ भी मिलीं।
पिछडे-दलितों के अपने इस राजा का शासनकाल सिर्फ 28 वर्ष ही रहा। मात्र 48 वर्ष की उम्र में 6 मई 1922 को उनका देहांत हो गया, लेकिन जो मशाल उन्होंने फुले से प्रेरणा लेकर जलाई थी, उसकी रोशनी आज भी कायम है।
प्लेटो ने अपनी चर्चित किताब ‘रिपब्लिक’ में एक ऐसे राजा की कल्पना की है जिसमें दार्शनिक जैसी मानवीय गरिमा, साहस और राजनीतिक श्रेष्ठता एवं बौद्धिकता का मेल हो. उसका कहना था कि ऐसा राजा मानव जाति को तमाम अभिशाप से मुक्त कर सकता है और अंधेरे से निकाल कर रोशनी की ओर ले जा सकता है. भारत में ऐसे राजाओं की गिनी-चुनी मिसालें ही हैं.
ऐसे ही एक राजा का नाम है- छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून, 1874- 6 मई, 1922), जिन्होंने अपने राज्य कोल्हापुर की करीब 90 प्रतिशत आबादी को उन सभी अभिशापों से मुक्त करने के लिए ऐसे ठोस एवं निर्णायक उपाय किए, जो अभिशाप उनके ऊपर जाति व्यवस्था ने लाद रखे थे. शाहूजी महाराज की एक ख्याति ये भी है कि वे छत्रपति शिवाजी महाराज की वंश परंपरा से थे और प्रजापालक राजा होने की विरासत उन्हें शिवाजी महाराज से हासिल हुई थी. डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सामाजिक अभियान में भी शाहूजी महाराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसका जिक्र रिसर्चर अरविन्द कुमार ने अपने आलेख में विस्तार से किया है.
भारत में सामाजिक आरक्षण के जनक
अधिकांश पाठक एवं अध्येता शाहूजी महराज को आरक्षण के जनक के रूप में जानते हैं जो कि वह हैं भी. आज से करीब 118 वर्ष पूर्व यानी 26 जुलाई, 1902 में उन्होंने राजकाज के सभी क्षेत्रों में उच्च जातियों का एकछत्र वर्चस्व तोड़ने के लिए पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया था. यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि पिछड़े वर्ग में मराठा, कुनबियों एवं अन्य समुदायों के साथ दलितों एवं आदिवासियों को भी उन्होंने शामिल किया था. उन्होंने इस संदर्भ में जो आदेश जारी किया था, उसमें साफ लिखा है कि पिछड़े वर्ग में ब्राह्मण, प्रभु, शेवाई और पारसी को छोड़कर सभी शामिल हैं.
शाहूजी द्वारा असमानता को खत्म करने एवं न्याय के लिए उठाए गए इस कदम का अनुसरण करते हुए 1918 में मैसूर राज्य ने, 1921 में मद्रास जस्टिस पार्टी ने और 1925 में बाम्बे प्रेसीडेंसी (अब मुंबई) ने आरक्षण लागू किया. ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को लागू संविधान के बाद सिर्फ एससी-एसटी समुदाय को आरक्षण मिल पाया. आजादी के बाद कई राज्यों में पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया गया लेकिन केंद्र सरकार की नौकरियों (1993) और शैक्षणिक संस्थाओं (2006) में पिछड़े वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण का अधिकार काफी देर से मिला.
आखिर शाहूजी ने आरक्षण क्यों लागू किया, इसका मुकम्मल जवाब उनके द्वारा बाम्बे (अब मुंबई) के पूर्व गर्वनर लॉर्ड सिडेनहम को लिखे पत्र में मिलता है. करीब 3 हजार शब्दों के इस पत्र में उन्होंने कोल्हापुर राज्य में जीवन के सभी क्षेत्रों में नीचे से ऊपर तक ब्राह्मणों के पूर्ण वर्चस्व और गैर-ब्राह्मणों की अनदेखी का वर्णन किया. उन्होंने पुरजोर तरीके से यह तर्क दिया है कि गैर-ब्राह्मणों को पृथक प्रतिनिधित्व एवं आरक्षण दिए बिना कोल्हापुर राज्य में न्याय का शासन स्थापित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि गैर-ब्राह्मणों के हित में उठाए जाने वाले हर कदम को नीचे से लेकर ऊपर तक (गांव से लेकर ऊपर के शीर्ष पद तक) नौकरशाह एवं कर्मचारी के रूप में कब्जा जमाए ब्राह्मण लागू नहीं होने देते हैं.
कोल्हापुर राज्य में ब्राह्मणों की आबादी करीब 3 से 4 प्रतिशत के बीच थी लेकिन शासन-प्रशासन के पदों और शिक्षा पर उनकी हिस्सेदारी करीब 70-80 प्रतिशत तक थी. 1894 में शाहूजी जब राजा बने तो सामान्य प्रशासन के कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी मौजूद थे. शाहूजी महाराज के निर्देश पर 1902 में अन्य जातियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ और 20 वर्षों में स्थिति बदल गई. 1922 में सामान्य प्रशासन के कुल 85 पदों में से 59 पदों पर गैर-ब्राह्मणों अधिकारी नियुक्त थे. शाहूजी द्वारा आरक्षण लागू करने का उद्देश्य न्याय एवं समता आधारित समाज का निर्माण करना था और इसके लिए सामाजिक विविधता जरूरी थी.
शिक्षा के जरिए सामाजिक बदलाव
शाहूजी जानते थे कि बिना शिक्षा के पिछड़े वर्गों का उत्थान नहीं हो सकता है. उन्होंने 1912 में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और नि:शुल्क बनाने का निर्णय लिया. 1917-18 तक नि:शुल्क प्राथमिक स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई. इसने शिक्षा के मामले में ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के अनुपात में निर्णायक परिवर्तन ला दिया.
आरक्षण एवं शिक्षा के साथ जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों में आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए शाहूजी ने अनेक कानून बनाए, प्रशासनिक आदेश जारी किए और उनको पूरी तरह लागू कराया, जिसने कोल्हापुर राज्य के सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया. इसी के चलते शाहूजी के जीवनीकार धनंजय कीर उन्हें एक क्रांतिकारी राजा के रूप में संबोधित करते हैं और अधिकांश अध्येता उन्हें सामाजिक लोकतंत्र का एक आधार स्तंभ कहते हैं.
सच यह है कि शाहूजी ने अपने राज्य में न्याय एवं समता की स्थापना के लिए जो कदम उठाए, उसमें बहुत सारे कदम ऐसे हैं जिन्हें उठाने में आजाद भारत की सरकार को दशकों लग गए और कुछ कदम तो ऐसे हैं, जिन्हें आज तक भारत की कोई सरकार उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है. उसका एक उदाहरण है, 20 सितंबर 1917 को सभी धर्म स्थलों को राज्य के नियंत्रण में लेने का आदेश जारी करना. न केवल सार्वजनिक धर्म स्थलों, बल्कि उन धर्म स्थलों को भी राज्य के नियंत्रण में ले लिया गया, जिन्हें राज्य की ओर से किसी भी तरह की आर्थिक सहायता मिलती हो. इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने शीर्षस्थ धार्मिक पदों पर पिछड़े वर्ग के लोगों की नियुक्ति कर दी.
जिस बंधुआ मजदूरी प्रथा को पूरे भारत के स्तर पर भारत सरकार 1975 में जाकर कर खत्म कर पाई, उस प्रथा को 3 मई 1920 के एक आदेश से शाहूजी ने कोल्हापुर राज्य में खत्म कर दिया. इसके पहले उन्होंने 1919 में महारों से दास श्रमिक के रूप में काम कराने की प्रथा को समाप्त कर दिया था. इतना ही नहीं, उन्होंने मनु संहिता की मूल आत्मा को उलटते हुए अन्तरजातीय विवाह की अनुमति प्रदान करने के लिए भी कानून पारित कराया.
महिलाओं को समता का अधिकार दिलाने के लिए जो हिंदू कोड बिल डॉ. आंबेडकर ने प्रस्तुत किया था, उसका आधार शाहूजी ने 15 अप्रैल 1911 को प्रस्तुत कर दिया था. इसमें उन्होंने विवाह, संपत्ति एवं दत्तक पुत्र-पुत्री के संदर्भ में महिलाओं को समता का अधिकार प्रदान करने की दिशा में ठोस कदम उठाए थे.
सामाजिक क्रांति के प्रणेता
कोल्हापुर राज्य से अस्पृश्यता का नामो-निशान मिटाने का तो शाहूजी ने संकल्प ही ले लिया था. छुआछूत खत्म करने की अपनी कोशिशों के तहत 15 जनवरी 1919 को उन्होंने आदेश जारी किया कि यदि किसी भी सरकारी संस्थान में ‘अछूत’ कहे जाने वाले लोगों के साथ अस्पृश्यता और असमानता का व्यवहार किया है, और उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाया जाता है तो ऐसे अधिकारी-कर्मचारियों को 6 सप्ताह के अंदर इस्तीफा देना होगा.
उन्होंने दलित वर्ग के विद्यार्थियों के लिए नि:शुल्क हॉस्टल खोले और उनके लिए स्कॉलरशिप का इंतजाम किया. 30 सितंबर 1919 को शाहूजी ने सिर्फ दलित समुदाय के बच्चों के लिए खोले गए पृथक स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया और सभी स्कूलों को उनके प्रवेश के लिए खोल दिए गया. उन्होंने अपने आदेश में कहा कि सभी जातियों एवं सभी धर्मों के बच्चे एक साथ, एक तरह के स्कूल में पढ़ेंगे. दलितों के सशक्तीकरण के कदम के रूप में उन्होंने गांव के अधिकारी के रूप में उनकी नियुक्त की.
अन्याय के शिकार लोगों के प्रति संवेदना और अन्याय को खत्म करने के साहस का एक बड़ा प्रमाण शाहूजी द्वारा 1918 में उठाए गए उस कदम में मिलता है, जिसके तहत उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा अपराधी घोषित किए गए आदिवासियों को पुलिस थाने में उपस्थिति दर्ज कराने के नियम को रद्द कर दिया और उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए उनमें से कुछ को अपने सहायक के रूप में रख लिया.
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पी. बी. सावंत शाहूजी को विशाल ह्रदय एवं व्यापक विजन वाले एक महान व्यक्तित्व के रूप में याद करते हुए कहते हैं कि वे एक असाधारण राजा थे और बुनियादी तौर पर सामान्य जन के साथ खड़े थे. उनका यह भी कहना है कि उनके जीवन, चिंतन एवं कार्यों का सिर्फ एक लक्ष्य था, वह यह कि कैसे दबे-कुचले एवं उत्पीड़ित लोगों की जीवन स्थितियों को बेहतर बनाया जाए. कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने शाहूजी को डॉक्टर ऑफ लॉ (एलएलडी) की मानद उपाधि से सम्मानित किया.
बहुजनों के जागरण का आह्वान करने वाली उपरोक्त पंक्तियां स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ की हैं। वे उत्तर भारत में बहुजन नवजागरण के पहले चिंतक, कवि, नाटककार, संपादक, पत्रकार, मुद्रक और अगुवा थे। हिंदी भाषा के वे पहले आधुनिक विद्रोही प्रगतिशील साहित्यकार हैं। उत्तर प्रदेश में 80 और 90 के दशक में बहुजन आंदोलन का जो उभार हुआ, उससे कई दशक पहले ऐसा आंदोलन चलाने की कोशिश स्वामी अछूतानंद ने की थी। हालांकि, उनका आंदोलन सामाजिक स्तर पर रहा। लेकिन इसमें सामाजिक सत्ता संघर्ष के बीज मौजूद थे। इस आंदोलन ने बहुजनों खास कर दलितों की चेतना को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई।
यह सर्वविदित तथ्य है कि द्विज परंपरा के दक्षिणपंथी, उदारपंथी और वामपंथी अध्येताओं, इतिहासकारों, आलोचकों और लेखकों ने वर्ण-जाति व्यवस्था को चुनौती देने वाले किसी भी बहुजन चिंतक, विचारक और लेखक पर दो शब्द भी नहीं लिखे। चूंकि ज्ञान की स्थापित परंपरा पर इन्हीं द्विज लेखकों का कब्जा था, जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुजन परंपरा के महान से महान विचारक और लेखक भी लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहे। उपेक्षा के शिकार इन, विचारकों और लेखकों में उत्तर भारत में बहुजन नवजागरण के प्रवर्तक स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ भी शामिल हैं।
स्वामी अछूतानंद डॉ. आंबेडकर के समकालीन थे। दोनों के बीच वर्ण-जाति व्यवस्था और दलितों के मुक्ति के प्रश्न पर गंभीर विचार-विमर्श भी हुआ। अछूतानंद ने आंबेडकर के सुझाव पर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के संघर्ष में उनका साथ दिया। दोनों लोगों की पहली मुलाकात 1928 में तत्कालीन बंबई में ‘आदि हिन्दू’ आंदोलन के राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई थी। दोनों नेताओं ने दलितों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर विचार किया था। डॉ. आंबेडकर ने उन्हें राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी का सुझाव दिया था।
बहुजन नवजगारण के अन्य नायकों की तरह अछूतानंद ने भी वर्ण-जाति व्यवस्था का खंडन किया और वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करने वाले हिंदू धर्मशास्त्रों को चुनौती दी। वे अपनी बहुचर्चित और लोकप्रिय कविता ‘मनुस्मृति से जलन’ में शूद्रों की स्थिति का वर्णन इन शब्दों में करते हैं–
निशदिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है
ऊपर न उठने देती, नीचे गिरा रही है
ब्राह्मण व क्षत्रियों को सबका बनाया अफसर
हमको पुराने उतरन पहनो बता रही है
हमको बिना मजूरी, बैलों के साथ जोतें,
गाली व मार उस पर, हमको दिला रही है
लेते बेगार, खाना तक पेट भर न देते,
बच्चे तड़पते भूखे, क्या जुल्म ढा रही है
ऐ हिन्दू कौम सुन ले, तेरा भला न होगा,
हम बेकसों को ‘हरिहर’ गर तू रुला रही है
अछूतानंद का जन्म 6 मई, 1879 में उत्तर प्रदेश में ग्राम उमरी, पोस्ट सिरसागंज, जिला मैनपुरी में हुआ था। उनके बचपन का नाम हीरा लाल था। उनके पिता मोतीराम और उनके चाचा मथुरा प्रसाद अंग्रेजों की फौज में भर्ती हो गए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सैनिक छावनी में हुई थी। 14 वर्ष की आयु तक उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में अच्छा अभ्यास कर लिया था। अछूतानंद का पालन-पोषण मूलत: उनके अविवाहित चाचा मथुरा प्रसाद ने किया। जो विचारों से कबीरपंथी। वे कबीर के पद गा-गा कर बालक हीरा लाल (अछूतानंद) को सुनाया करते थे, जिसका गहरा असर अछूतानंद पर पड़ा। यहां ध्यान योग्य तथ्य यह है कि डॉ. आंबेडकर के पिता रामजी सूबेदार भी कबीरपंथी थे। स्वयं आंबेडकर बुद्ध के बाद कबीर को अपना दूसरा और जोतीराव फुले को तीसरा गुरु मानते थे।
कबीर के पदों के प्रभाव में अछूतानंद को साधु-संतों का साथ अच्छा लगने लगा। वे घर छोड़ कर कबीर पंथी साधुओं के एक दल के साथ चले गए और उनके साथ जगह-जगह भ्रमण करते रहे। वे 24 साल की आयु तक घुमक्कड़ी करते रहे। अछूतानंद के अध्येता कंवल भारती लिखते हैं कि इसी दौरान उन्होंने धर्म, दर्शन और लोक-व्यवहार का बहुत-सा ज्ञान अर्जित किया तथा गुरुमुखी, संस्कृत, बंगला, गुजराती और मराठी भाषाएँ भी इसी घुमक्कड़ी में सीख लीं।
अछूतानंद 1905 में आर्य समाजी संन्यासी सच्चिदानन्द के सम्पर्क में आये और उनके शिष्य बन गए। आर्य समाज का प्रचार करने लगे। उनका नाम बदलकर हीरालाल से ‘स्वामी हरिहरानन्द’ कर दिया गया। इस दौरान उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ और वेदों का गहन अध्ययन किया और 1912 तक आर्य समाज का प्रचार करते रहे।
इसी दौरान उन्हें बोध हुआ कि आर्य समाज भी ब्राह्मण धर्म और वर्ण-व्यवस्था की रक्षा के लिए बना हुआ। इसका भी मूल ध्येय द्विज वर्चस्व को कायम रखना है। आर्य समाज की सच्चाई को उजागर करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘यह ईसाई और मुसलमानों के प्रहारों से ब्राह्मणी धर्म को बचाने के लिए गढ़ा गया वैदिक धर्म का एक ढोंग है। इसकी बातें कोरी डींग और सिद्धांत ऊटपटांग हैं। इसकी शुद्धि महज धोखा और गुण-कर्म की वर्ण व्यवस्था एक झूठा शब्द जाल है। यह इतिहास का शत्रु, सत्य का हन्ता और झूठी गप्पें मारने वाला है। इसकी दृष्टि दोषग्राही, वाणी कुतर्की, स्थापना थोथी और वेदार्थ निरा मनगढ़ंत है। यह जो कहता है, उस पर इसका अमल नहीं। इसका उद्देश्य ईसाई-मुसलमानों से शत्रुता करा कर हिन्दुओं को वेदों और ब्राह्मणों का दास बना देना है।’ आर्य समाज के संदर्भ में इसी तरह का मत डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में प्रस्तुत किया है।
आर्य समाज से बाहर आने के बाद 1917 में ब्राह्मणवादी नाम हरिहरानंद की जगह उनका नाम अछूतानंद रख दिया गया। कंवल भारती लिखते हैं कि स्वामी अछूतानन्द जी ने दलित समाज में जागृति लाने के लिए 1922 में ‘आदि हिन्दू’ आंदोलन की घोषणा की। ‘आदि हिन्दू’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी ने ‘अछूत’ का अर्थ ‘छूत विवर्जित’ अर्थात ‘पवित्र’ बताया।
उन्होंने लिखा है कि आर्यों ने यहां के मूल निवासी महाप्रतापी राजाओं को छल-बल से पराजित कर के उनका सब कुछ छीन लिया और उनकी हत्या कर दी। इसके बाद यहां के मूल निवासियों को शूद्र बनाकर उनकी संस्कृति को नष्ट कर दिया और अपनी सामंतवादी संस्कृति को स्थापित कर दिया। हम उन्हीं मूल निवासियों के सन्तान हैं। इसलिए हम आदिवंशी हैं। हमें अपने खोये हुए प्राचीन गौरव को इस देश में फिर से पाना है :–
हैं सभ्य सबसे हिन्द के प्राचीन हैं हकदार हम
हा-हा! बनाया शूद्र हमको, थे कभी सरदार हम
अब तो नहीं है वह जमाना, जुल्म ‘हरिहर’ मत सहो
अब तो तोड़ दो जंजीर, जकड़े क्यों गुलामी में रहो
अछूतानंद ने ‘आदि हिन्दू’ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कई सभाएं की। सन् 1930 तक स्वामी जी के नेतृत्व में इस आंदोलन के आठ राष्ट्रीय अधिवेशन, तीन विशेष सम्मेलन और पन्द्रह प्रान्तीय सभाओं के साथ-साथ सैकड़ों की संख्या में जनपदीय सभाएं हुईं। पहला वार्षिक अधिवेशन दिल्ली (1923) में, दूसरा नागपुर (1924), तीसरा हैदराबाद (1925), चौथा मद्रास (1926), पांचवां इलाहाबाद (1927), छठा बम्बई (1928), सातवां अमरावती (1929) और आठवां अधिवेशन (1930) में इलाहाबाद में हुआ।
प्रान्तीय सभाएं लखनऊ, कानुपर, इलाहाबाद, मेरठ, मैनपुरी, मथुरा, इटावा, गोरखपुर, फर्रूखाबाद तथा आगरा में आयोजित हुई थीं। इन सभाओं में हजारों की संख्या में दलित जातियों के लोगों ने गांव-गांव से पैदल चलकर भाग लिया था। तीन विशेष सभाएं दिल्ली, मेरठ और इलाहाबाद में की गयी थीं। इस सबका उद्देश्य बहुजन नवजागरण की अलख जगाना था।
उन्होंने 1922-23 में दो साल दिल्ली से ‘प्राचीन हिन्दू’ और 1924 से 32 तक कानपुर से ‘आदि हिन्दू’ पत्र निकाला था। आदि हिन्दू नाम से ही उन्होंने कानपुर में 1925 में प्रिंटिंग प्रेस लगाया था। उसी प्रेस से वे अपने पत्र और साहित्य का प्रकाशन करते थे। वे हिंदी के पहले दलित कवि थे, जिनकी कविता में हमें कबीर और रैदास की निर्गुणवादी वैचारिक परंपरा का विकास मिलता है। कविता में उनका उपनाम ‘हरिहर’ था।
उनके काव्य संग्रहों में, ‘हरिहर भजन माला, ‘विज्ञान भजन माला’, ‘आदि हिन्दू भजनमाला’ एवं ‘आदिवंश का डंका’ का उल्लेख मिलता है वर्तमान में इन रचनाओं में से केवल ‘आदिवंश का डंका’ ही उपलब्ध है। ‘आदिवंश का डंका’ लोक छन्दों में रचित कृति है, जिसमें कव्वाली, गज़ल, भजन, मरसिया आदि शामिल है। दलित साहित्य में नाटक लिखने की परम्परा भी स्वामी जी से ही आरम्भ होती है। उनके दो नाटक हमें मिलते हैं– मायानंद बलिदान और रामराज्य न्याय। ‘राम राज्य न्याय’ नाटक में राजा राम द्वारा शूद्र ऋषि शम्बूक की हत्या किए जाने का चित्रण है। ‘मायानन्द बलिदान’ पूरी तरह से पद्य में लिखा गया नाटक है। यह नाटक हिंदू संस्कृति में विद्यमान नरबलि प्रथा को रेखांकित करता है। प्रो. चमनलाल लिखते हैं, ‘स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ का साहित्य प्रकाश में आने से उनको हिन्दी में आधुनिक दलित साहित्य का जनक माना जा सकता है व हीरा डोम की कविता उनकी परवर्ती कविता कही जा सकती है।’
54 वर्ष की अल्पायु में ही 20 जुलाई, 1933 को कानपुर में उनका निधन हो गया। अछूतानंद जी की मृत्यु पर बहुजन नवजागरण एक अन्य पुरोधा चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ ने लिखा कि ‘एक आला दिमाग था, न रहा। आदिवंशी चिराग था, न रहा।’
जिस एक व्यक्तित्व ने मानव इतिहास को सर्वाधिक प्रभावित किया, उस व्यक्तित्व का नाम कार्ल हेनरिख मार्क्स है। वे पहले दार्शनिक थे, जिन्होंने यह व्याख्यायित किया कि मानव इतिहास की गति एवं उसकी विकास यात्रा की बुनियाद में क्या है? क्यों पूरी दुनिया में कमोबेश आदिम साम्यवाद के बाद दास प्रथा, सामंतवाद और उसके गर्भ से पूंजीवाद का जन्म हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि पूंजीवाद के गर्भ से जो नया समाज जन्म लेगा, उसमें शोषण-उत्पीड़न एवं अन्याय के सभी रूपों का खात्मा हो जाएगा और एक ऐसे लोकतांत्रिक समाज का जन्म होगा, जिसमें अभाव, दरिद्रता, शोषण-उत्पीड़न, अन्याय का नामोनिशान नहीं होगा। सभी मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के समान गरिमा एवं आत्मसम्मान के साथ जीने का हक होगा। कोई किसी का शोषण-उत्पीड़न करने की स्थिति में नहीं होगा। सबके लिए समान रूप से स्वतंत्रता एवं समता उपलब्ध होगी। मनुष्य-मनुष्य के बीच एक मात्र प्रेम एवं बंधुता का रिश्ता होगा। हर मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विकास का समान अवसर प्राप्त होगा और हर मनुष्य के आत्मिक विकास के लिए पूरी परिस्थिति मौजूद होगी। मनुष्य-मनुष्य के बीच रिश्ते का आधार व्यक्तिगत स्वार्थ एवं लेन-देन नहीं, बल्कि प्रेम होगा। कोई भी रिश्ता बाध्यता या मजबूरी पर आधारित नहीं होगा। इस समाज में हर उस परिस्थिति का अंत कर दिया जाएगा, जो मनुष्य को व्यक्तिगत स्वार्थों में सिमटे रहने वाला क्षुद्र इंसान बना देती हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ पर सामाजिक हितों को वरीयता प्राप्त होगी। पूरा मानव समाज पूर्ण रूप से इतना विकसित मनुष्य बन जाएगा कि न तो राज्य की जरूरत होगी और न दंड की। ऐसा समाज किसी क्षेत्र (देश की सीमा) में सिमटा नहीं होगा। पूरी दुनिया एक होगी।
सारे संसाधनों पर पूरी मनुष्य जाति का मालिकाना होगा और उनका इस्तेमाल सबके लिए किया जाएगा। सारे संसाधन, तकनीक, वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं कौशल का इस्तेमाल किसी वर्ग, समुदाय या व्यक्ति के लिए नहीं, पूरे मानव समाज के लिए किया जाएगा। देशों की कोई सीमा नहीं होगी, इसलिए सेना एवं हथियारों की भी कोई जरूरत नहीं होगी। मनुष्य अपने विकास के उस पायदान पर होगा, जहां उसे दंडित करने के लिए किसी पुलिस या जेलखाने की जरूरत नहीं होगी।
सारे संसाधनों एवं ज्ञान-विज्ञान का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ मानव जाति के भौतिक एवं आत्मिक उन्नति के लिए किया जाएगा। मनुष्य प्रकृति से उतना ही लेगा, जितना उसको जरूरत होगी। इस तरह समाज के इस मंजिल को उन्होंने साम्यवाद का नाम दिया था।
लेकिन मार्क्स कोई खयाली सपने देखने वाले भाववादी दार्शनिक या संत नहीं थे, वे एक वैज्ञानिक भौतिकवादी क्रांतिकारी दार्शनिक थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि कौन सा वर्ग ऐसे समाज को किसी हालात में बनने नहीं देगा और कौन सा वर्ग ऐसे समाज के निर्माण की अगुवाई करेगा और साम्यवादी समाज के निर्माण के लिए मनुष्य जाति को किन संघर्षों एवं चरणों से गुजरना पड़ेगा। पहली बार इसकी विस्तृत रूपरेखा उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र ( 1848) में प्रस्तुत किया।
कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि अब तक का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है और इस वर्ग संघर्ष में एक संपत्तिशाली वर्ग ने दूसरे संपत्तिशाली वर्ग को हटाकर उसका स्थान लिया। दास प्रथा में दास मालिकों को हटाकर उनका स्थान सामंती भूस्वामियों-राजा एवं महाराजों ने लिया। सामंती भूस्वामियों एवं राजा-महाराजाओं को हटाकर उनका स्थान पूंजीपतियों ने लिया। लेकिन सत्ता पर कब्जा करने वाले हर संपत्तिशाली वर्ग ने इसका इस्तेमाल मेहनतकश लोगों के शोषण-उत्पीड़न के लिए किया। लेकिन पूंजीपतियों द्वारा स्थापित पूंजीवाद ने एक ऐसे वर्ग को पैदा कर दिया है, जो वर्ग समाज में अब तक चली आ रही निजी संपत्ति की व्यवस्था को खत्म कर देगा, उसके साथ ही शोषण-उत्पीड़न एवं अन्याय के सभी रूपों का भी खात्मा हो जाएगा। निजी संपत्ति की व्यवस्था का खात्मा कर शोषण-उत्पीड़न के सभी रूपों का खात्मा करने वाले इस मेहनतकश वर्ग को मार्क्स ने सर्वहारा नाम दिया। यह नाम उन्होंने इसलिए दिया क्योंकि यह मेहनतकश वर्ग हर तरह की संपत्ति खो चुका था, उसके पास सिर्फ और सिर्फ जिंदा रहने के लिए एक चीज है, वह है उसका श्रम। उसी को बेंच कर ही वह जिंदा रह सकता है और उसके पास जीवित रहने का और कोई उपाय नहीं है। मार्क्स ने बताया कि इस श्रम को खरीद कर पूंजीपति वर्ग मुनाफा कमाता है और अपना श्रम बेचने वाले मजदूर को सिर्फ वह इतना ही देता है, जिससे कि वह जिंदा रह सके और भविष्य में श्रम करने वाले मजदूर (बेट-बेटियों के रूप में) पैदा कर सकें।
मार्क्स इस मेहनतकश सर्वहारा वर्ग को मजबूर या असहाय शक्ति के रूप में नहीं देखते थे, वे इस वर्ग को इतिहास के ऐसे निर्माता के रूप में देखते थे, जिसकी मुक्ति की अनिवार्य शर्त है कि वह निजी संपत्ति की व्यवस्था का अंत करे और स्वयं को मुक्त करने के संघर्ष की प्रक्रिया में पूरी मनुष्य जाति को मुक्त करे और एक राज्य विहीन समाज का निर्माण करे, जिसमें अभाव, शोषण-उत्पीड़न एवं अन्याय का कोई नामोनिशान न हो। हर व्यक्ति अपनी क्षमता अनुसार कार्य करे और अपनी आवश्यकता के अनुसार ले।
लेकिन वैज्ञानिक ऐतिहासिक भौतिकवादी मार्क्स को इस तथ्य का गहरा अहसास था कि संपत्तिशाली वर्ग अपने-आप उस संपत्ति पर अपना एकाधिकार नहीं छोड़ेगा, जिस संपत्ति का इस्तेमाल वह मेहनतकशों के श्रम का शोषण करके मुनाफा कमाने के लिए करता है। ऐसे समय सर्वहारा वर्ग को संपत्तिशाली वर्ग से उनकी वह संपत्ति छीननी होगी, जिसका इस्तेमाल वे दूसरों के श्रम का शोषण करने के लिए करते हैं। जब सर्वहारा वर्ग ऐसी संपत्ति छीनने या उस पर कब्जा करने जाएगा, तो तटस्थ होने का दिखावा करने वाला राज्य अपनी पूरी मशीनरी के साथ संपत्तिशालियों की संपत्ति की रक्षा करने आएगा, जिसका सामना सर्वहारा वर्ग को करना होगा। यानी सर्वहारा वर्ग को उस सत्ता ( राज्य) पर भी कब्जा करना पड़ेगा, जो संपत्तिशाली शोषक वर्गों की रक्षा करता है, सत्ता पर कब्जे की इस कार्यवाही को मार्क्स ने सर्वहारा क्रांति का नाम दिया। यह स्वत: स्फूर्त कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि इसका नेतृत्व सर्वहारा वर्ग की पार्टी करेगी।
मार्क्स के जीते-जी 1871 में फ्रांस ( पेरिस) के मजदूरों ने संपत्तिशाली वर्गों को हटाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया था, लेकिन वे उसे बनाए नहीं रख सके। इसे हम पेरिस कम्यून के रूप में जानते हैं। इसका सार संकलन करते हुए मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सर्वहारा वर्ग यदि सत्ता कब्जा कर लेता है, तो पुराना संपत्तिशाली वर्ग-पूंजीपति वर्ग उसकी सत्ता को उलटने की हर कोशिश करेगा। इसके लिए ही मार्क्स ने पूंजीवाद एवं साम्यवाद के बीच की एक संक्रमणकालीन मंजिल समाजवाद की बात की थी। इस संक्रमणकालीन समाजवादी दौर में सर्वहारा वर्ग सत्ता पर कब्जा कायम रखेगा और राज्य भी बना रहेगा। यह राज्य पूंजीपतियों या अन्य संपत्तिशाली वर्गों का शोषण-उत्पीड़क राज्य नहीं होगा, बल्कि बहुसंख्यक मेहनतकशों का राज्य होगा। इसे मार्क्स ने सर्वहारा राज्य या समाजवाद नाम दिया, जो 90 प्रतिशत मेहनतकश लोगों के लिए पूरी तरह लोकतंत्र होगा, लेकिन 10 प्रतिशत पुराने परजीवी संपत्तिशाली वर्ग के लिए तानाशाही होगी, क्योंकि मेहनतकशों के राज्य को उलटने की उसकी कोशिश के लिए इन 10 प्रतिशत संपत्तिशाली वर्गों पर थोड़े दिनों के लिए यह तानाशाही जरूरी होगी।
लेकिन सर्वहारा वर्ग की यह कोशिश होगी कि वह जल्द से जल्द संक्रमणकालीन समाजवादी समाज को खत्म कर साम्यवादी समाज की स्थापना करे। मार्क्स केवल दार्शनिक व्याख्याकार नहीं थे। उन्होंने स्वयं कहा था कि अब तक के दार्शनिकों ने समाज की व्याख्या की है, जरूरत है, समाज को बदलने की। मार्क्स ने स्वयं के जीवन को सर्वहारा क्रांति के लिए समर्पित कर दिया, जिसका लक्ष्य निजी संपत्ति की व्यवस्था का विनाश कर मानव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना था। उन्होंने खुद को सर्वहारा वर्ग के साथ एकाकार कर लिया, क्योंकि वे जानते थे कि इतिहास का यह पहला वर्ग है, जो मानव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा।
आजीवन मार्क्स जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम एवं इंग्लैंड की क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहें। उनकी क्रांतिकारी सोच एवं गतिविधियों के चलते उनका देश निकाला होता रहा है, जर्मनी से निकाले गए, तो फ्रांस गए, फ्रांस से निकाले गए तो बेल्जियम, बेल्जियम से पुन: फ्रांस, फ्रांस से पुन: जर्मनी और फिर जर्मनी से इंग्लैंड। अंतिम समय उन्होंने इंग्लैंड में बिताया, वहीं उनकी समाधि बनी।
मार्क्स ने अपनी प्रतिभा, मेधा, ज्ञान, संपत्ति और शरीर सब कुछ क्रांति के लिए समर्पित कर दिया। इस प्रक्रिया में उन्होंने भयानक गरीबी एवं अभावों की जिंदगी जी और अपनी पैतृक संपत्ति क्रांतिकारी संघर्षों के लिए सौंप दिया। असमय इलाज के बिना बच्चों को खोया। दर-दर भटकते रहें। भौतिक अर्थों में कभी सुख नसीब नहीं हुआ, लेकिन वे हमेशा सुखी रहें, क्योंकि उनका कहना एवं मानना था कि संघर्ष ही सुख है।
17 वर्ष की उम्र में ‘संघर्ष में ही सुख है’, इसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी कविता में इस रूप में किया था-
कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं,
नहीं, मेरे तूफानी मन को यह स्वीकार नहीं।
मुझे तो चाहिये एक महान ऊंचा लक्ष्य
और उसके लिए उम्र भर संघर्षों का अटूट क्रम ।
ओ कला ! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार
मेरे लिए खोल !
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं!
आओ,
हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्योंकि-
छिछला, निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन जीवन
हमें स्वीकार नहीं।
हम, ऊँघते कलम घिसते हुए
उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे ।
हम-आकांक्षा, आक्रोश, आवेग, और
अभिमान में जियेंगे !
असली इन्सान की तरह जियेंगे ।
जैसा कि मार्क्स ने अपनी कविता की अंतिम पंक्ति में संकल्प व्यक्ति किया है कि ‘असली इंसान की तरह जिएंगे’ तो वे असली इंसान की तरह ही जीए।
उन्होंने 1835 में 17 वर्ष की उम्र में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- ‘पेशा चुनने के बारे में एक नौजवान के विचार’। इस लेख में उन्होंने लिखा था कि “हमारी जीवन-परिस्थितियां यदि हमें अपने मन का पेशा चुनने का अवसर दें तो हम एक ऐसा पेशा अपने लिए चुनेंगे जिससे हमें अधिकतम गौरव प्राप्त हो सकेगा, ऐसा पेशा जिसके विचारों की सच्चाई के संबंध में हमें पूरा विश्वास है। तब हम ऐसा पेशा चुनेंगे जिसमें मानवजाति की सेवा करने का हमें अधिक से अधिक अवसर प्राप्त होगा और हम स्वयं भी उस सामान्य लक्ष्य के और निकट पहुंच सकेंगे जिससे अधिक से अधिक समीप पहुंचने का प्रत्येक पेशा मात्र एक साधन होता है।”
सचमुच में मार्क्स ने ऐसा ही पेशा चुना। वह पेशा था- दुनिया की वैज्ञानिक व्याख्या और दुनिया को बदलने के लिए क्रांतिकारी कार्य। आजीवन मार्क्स यही कार्य करते रहें। जब क्रांतियों का दौर चलता, तो उसमें शामिल हो जाते और जब क्रांतियों का दौर ठंडा पड़ता, तो दुनिया की वैज्ञानिक व्याख्या में जुट जाते। इसी व्याख्या का एक महान परिणाम पूंजी
(तीन खंडों में) जैसी अद्वितीय कृति भी है, जिसने पूंजीवाद के रेशे-रेशे को उघाड़ कर रख दिया और बताया कि पूंजीवाद के विनाश के बाद ही मानव मुक्ति का रास्ता प्रशस्त होगा।
मार्क्स आजीवन क्रांतिकारी दार्शनिक की तरह जीए। उनके इसी क्रांतिकारी पक्ष को उनके व्यक्तित्व का मूल तत्व मानते हुए उनके प्रिय दोस्त एंगेल्स ने लिखा कि “ मार्क्स और जो कुछ रहे हों, सबसे पहले क्रांतिकारी थे। उनके जीवन में असल संकल्प पूंजीवादी समाज को इस या उस विधि से उखाड़ फेंकना ही था। उसके पैदा किए हुए राज्य संस्थानों को उखाड़ फेंकना था। जिस आधुनिक सर्वहारा को उन्होंने अपनी स्थिति के प्रति सचेत-जागरूक बनाया था, जिसे उन्होंने अपनी वर्ग-मुक्ति की शर्तों का भान कराया था, उनकी मुक्ति में योगदान करना ही मार्क्स के जीवन का संकल्प था। संघर्ष में विजय ही उनका तत्व था और संघर्ष करते हुए भी ऐसी गर्म-जोशी, ऐसा अटल जीवटता का परिचय और ऐसी कामयाबी के साथ कि इन मामलों में शायद ही कोई उनकी छाया भी छू सके।”
ऐसे क्रांतिकारी दार्शनिक मार्क्स को उनके जन्मदिन पर सलाम!
As the saying goes, “all good things must come to an end”, such is the case with the Dr. Ambedkar International Symposium on Emancipation and Equality Day Celebrations. Purpose of the symposium was to rethink, restrategize, and rebrand the struggle and pathways for accomplishing emancipation. Delegates and panel members were fully engaged, involved, and impactful in stimulating discussion and formulating strategies and actions.
The Opening Day:
The symposium opened on April 21 with a session on contemporary Buddhism, as envisioned by Dr. Ambedkar and prescribed in His monumental book, Buddha and His Dhamma. The session was moderated by Dr. Jessica Main (Associate Professor at University of British Columbia) and panel members were Bhante Dr. Saranpala, H.L. Virdee, Raj Kumar Osho, Dr. Rajratana Ambedkar. Dr. Main was introduced by Manjit Bains, chair of Chetna’s Women Empowerment Committee.
The day concluded with a session on how India’s legal framework enables emancipation. The session was moderated by Advocate Lovleen Gill and on the panel were Consul General Manish (Indian Consulate General of India, Vancouver), Judge Neetu Badhan-Smith (Los Angeles County Court Supreme Judge), and Leela Aheer (Alberta Legislative Assembly).
Day 2:
A full day session was hosted at the Sauder Business School at University of British Columbia. The first session provided an opportunity to reflect on the International Dalit Conference that was hosted in Vancouver in 2003. Panel members shared their reflections on what has been gained over the past twenty years and highlighted areas of improvement and potential actions to consider. Panel members included Harmesh Sandhi (Shri Guru Ravidass Sabha of Ontario), Jagiri Bance (Entrepreneur and political leader from Ontario), and Major Mal (president, Ambedkar International Mission – Calgary, Canada)
A session on Caste in academic settings in Canada and other jurisdictions provided opportunity for students and faculty to share their perspectives and observations on the presence of caste and highlighted a need for adding caste as a protected category. This session was moderated by Dr. Priti Narayan of Center for India and South Asia Research at UBC.
Other sessions for the day focussed on entrepreneurship, and youth and women empowerment.
Dr. Ambedkar’s Collected Speeches and Writings were gifted to the University of the Fraser Valley by Harmesh Sandhi and other delegates from Ontario. A portrait of Dr. Ambedkar, made by Raghavendra Rao Karla, was also presented to the University of Fraser Valley in Abbotsford. Title of the painting is, ‘Dr. Ambedkar & the idea of dissent, towards the creation of a working Democracy”.
Day 3:
In the morning and early afternoon of Sunday, April 23, delegates visited Guru Ravidass Community Center in Burnaby and paid respects. They were welcomed and honoured by the management committee of Shri Guru Ravidass Sabha.
The evening offered a gala reception where delegates and business sponsors were honoured for their support and contributions. Songs of self respect and dignity were performed by Jyotika Jasuja and Pamma Sunner.
Day 4:
On April 24, a celebration was hosted at the WAC Bennett Library, Simon Fraser University where City of Burnaby was honoured for being the first city outside of India to proclaim April 14- Dr. B.R. Ambedkar Day of Equality. Simon Fraser University’s Vice president of External Relations (Dr. Joanne Curry), Dean of Libraries (Ms. Gwen Bird), and Indigenous Studies (Dr. Deanna Redder) welcomed the delegates to the library. Indian Consul General Mr. Manish also also shared his greetings for the equality day and commended the organisers and partners for hosting the symposium. As a part of the Equality Day Celebrations, the library exhibited a sample of writings on Dr. Ambedkar and caste issues.
Musical songs were performed by Jyotika Jasuja and a theatrical performance on women empowerment was played by Simran Kranti.
In the evening, some delegates visited the City of Burnaby and attended the open council meeting to witness City’s motion on adding caste as a protected category to its existing policy framework. The motion was approved unanimously and it was a remarkable experience to see history in the making.
Day 5:
April 25 started with a journey to Victoria, capital city of the Province of British Columbia, where over 25 delegates took the early ferry and observed the Question Period at the BC Legislature. MLA Aman Singh welcomed Dr. Rajratana Ambedkar and delegates to the legislature and acknowledged the symposium that was being hosted across various settings in British Columbia. Delegates also met BC’s first house speaker, Hon. Raj Chouhan, in his office. Mohinder and Krishna Ralh of Victoria (and members of Chetna Association of Canada) hosted a wonderful lunch for the delegates.
In the afternoon, delegates visited the law school library at University of Victoria and observed Equality Day with Dr. Rita Dhamoon and Dr. Pooja Parmar. The discussion focussed on developing a pathway for emancipation based on the recommendations made during the symposium.
Day 6:
A final day for the formal component of the symposium was hosted at University of the Fraser Valley (UFV) in Abbotsford. Dr. Satwinder Bains, Director of South Asian Studies Institute at UFV, facilitated a session and presented an overview on the caste structure and explained what actions UFV was contemplating for adding caste as a protected category to its policy framework on equity and Inclusion. Seema Mahi, Ph.D. candidate at Delhi University, read excerpts from her dissertation, Formation of the Dalit Identity.
What is the impact of the symposium?
According to the organisers, the symposium succeeded at having a meaningful dialogue and exploring pathways to emancipation.
“While there are many pathways to Emancipation, right pathways need to be selected that are effective and efficient” noted Jai Birdi, co-chair for the symposium and general Secretary for Chetna Association of Canada.
“We believe the process provided for the meaningful and inclusive dialogue helped in developing effective strategies and actions”, concurred Parm Kainth, co-chair for the symposium and vice President of Ambedkarite International Coordination Society.
What’s Next:
Organisers are very grateful for the delegates, partners, and supporters who contributed in one form or another.
The organisers are also thankful to the team, led by Dr. Rita Dhamoon of University of Victoria, for compiling a summary of discussion held and recommendations made during the symposium. Organisers plan to establish a working group to review the summary and develop an action plan so the progress can be monitored and evaluated to support the implementation of the recommendations.
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Written by – Jai Birdi and Param Kainth, co-chairs of the Steering Committee for the Dr. Ambedkar International Symposium on Emanicipation and Equality Day Celebrations.