ऑस्कर अवार्ड में क्या मूलनिवासियों की अनदेखी हुई?

13 मार्च की तारीख भारत के लिए बेइंतहा सम्मान लेकर आई। इस दिन हर ओर ऑस्कर अवार्ड की चर्चा हो रही है। भारत की झोली में पहली बार दो ऑस्कर अवार्ड एक साथ आए हैं। भारतीय फिल्म RRR के गीत ‘नाटू-नाटू’ ने जहां बेस्ट ओरिजिनल सांग की श्रेणी में ऑस्कर जीता है। तो दूसरी ओर तमिल भाषा की डॉक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ ने ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’ केटेगरी में भारत के लिए पहला ऑस्कर जीत लिया है।

 डायरेक्टर एसएस राजमौली की फिल्म RRR का गाना इस कैटेगरी में नॉमिनेशन पाने वाली पहली भारतीय फिल्म है। नाटू-नाटू का मतलब होता है नाचना। यह गाना अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर पर फिल्माया गया है। जबकि डाक्यूमेंट्री को कार्तिकी गोंजाल्विस द्वारा निर्देशित किया गया था और इसे OTT प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने रिलिज किया था। यह डॉक्यूमेंट्री हाथियों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के बेहद शानदार रिश्ते को लेकर है।

इस तरह भारत के हिस्से में दो ऑस्कर अवार्ड आ गए हैं। 13 मार्च की सुबह जब इन अवार्ड की घोषणा हुई, दुनिया भर में भारत का डंका बज गया। लेकिन कुछ ऐसा था, जिसकी चर्चा होनी चाहिए थी और हुई नहीं। कुछ ऐसा था, जो रह गया।

दरअसल जो दोनों अवार्ड मिले, उससे भारत के मूलनिवासी समाज की कहानी जुड़ी थी। RRR जहां आदिवासी नायक कोमराम भीम को केंद्र में रखकर बनाकर बनाई गई थी, तो वहीं डाक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ में हाथी के जो साथी हैं, वो भी आदिवासी समाज के हैं।

ऑस्कर अवार्ड लेते वक्त गोंजाल्विस ने अकादमी पुरस्कार, निर्माता गुनीत मोंगा, उनके परिवार को धन्यवाद दिया और पुरस्कार को अपनी ‘‘मातृभूमि भारत” को समर्पित किया। उन्होंने कहा, ‘‘अकादमी का हमारी फिल्म को सराहने, मूल निवासियों और जानवरों पर ध्यान देने के लिए शुक्रिया… ‘नेटफ्लिक्स’ का हम पर विश्वास करने… मेरी निर्माता गुनीत के साथ अपनी आदिवासी समझ को साझा करने के लिए बोमन और बेली का शुक्रिया…।”

लेकिन कहीं न कहीं यहां उन नामों को कम तवज्जो दी गई, जिनकी वजह से ये फिल्में बन पाईं। जो असल तौर पर इस फिल्म के हीरो कहे जा सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इस मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है-

जब स्टेज पर चढ़कर ऑस्कर लेने के बारी आई तो फ़िल्म के दोनों, मदुमलै जंगल के, आदिवासी किरदार, जिनका वास्तविक जीवन ही ये डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है, सीन से ग़ायब हो गए।

ये उस मंदिर या मूर्ति की तरह है, जिन्हें बनाता कोई है, छेनी और हथौड़ा किसी और का चलता है, पसीना किसी और का गिरता है और प्राण प्रतिष्ठा का प्रपंच करके कोई और उसका स्वामी बन जाता है। बनाने वाले की अक्सर गर्भ गृह में एंट्री बैन हो जाती है।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक के सारे निर्माण, सारे नृत्य, डांस, कलाकारी जिनकी है, उनका इतिहास में नाम लेवा नहीं होता। देवदासियों का सादिर अट्टम सौ साल से कम समय में भरत नाट्यम बन गया और इसमें पैसा और नाम आते है देवदासियों को धकेलकर बाहर कर दिया गया। कितना निष्ठुर है ये सब।

दरअसल डाक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ के असली हीरो बोमन और बेली, अमु और रघु हैं। साथ ही कट्टुनायकन समाज के वो ट्राइबल, जिन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से और हाथियों को साध कर इस फिल्म की शूटिंग में मदद की।

“गांव में जिंदगी भर चमार बने रहतें, बाहर लोग हमें नाम से बुलाते हैं”

नागेश्वर दास
नागेश्वर दास

बिहार के सारण जिले की अपनी एक अंतरराष्ट्रीय पहचान है। वजह हैं लोक कलाकार और रंगकर्मी भिखारी ठाकुर। बिहार के चर्चित मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव का यह राजनीतिक क्षेत्र रहा है। इसी सारण जिले में एक गांव है अफौर। जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर भूमिहार और ब्राह्मण बहुल अफौर गांव में चमारों की भी ठीक-ठाक आबादी है।

चमारों की बस्ती के ठीक सामने से पक्की सड़क गुजरती है। लेकिन उनके दरवाजों तक वो सड़क नहीं जाती, बल्कि उन्हें मुंह चिढ़ाते सीधी निकल जाती है। हम यहां पहुंचे तो सबसे पहले गरजू राम से टकराएं। वह पास के ही नैनी गांव के रहने वाले हैं। उनकी बेटी की शादी इसी टोले के अशर्फी दास के सबसे बड़े बेटे संजीव कुमार दास से हुई है। गरजू राम फौज से रिटायर हैं। अपनी बेटी से मिलने आए थे। हमने उनसे पूछा कि इस इलाके दलितों की जिंदगी कितनी बदली है?

गरजू राम मानते हैं कि हमलोगों की स्थिति बहुत सुधरी है। उनका कहना है कि पिछले 50 सालों में और अब की स्थिति में बहुत फर्क है। बताते हैं कि पहले मिट्टी के घर थे, अब ज्यादातर लोगों के घर ईंट के छतदार बन गए हैं। सड़कें भी कमोबेश पहुंची है। बिजली भी मिल रही है और पानी भी। यानी कुल मिलाकर स्थिति बदल रही है।

छठ पर्व के लिए गांव पहुंचे चमटोली के लोग अपने साथियों से बात करते हुए
छठ पर्व के लिए गांव पहुंचे चमटोली के लोग अपने साथियों से बात करते हुए

हालांकि गरजू राम यह जोड़ना नहीं भूलते की बिजली पानी के अलावा बाकी चीजें लोगों ने अपनी मेहनत से हासिल की है।

इसी बस्ती में किशोर राम भी रहते हैं। लंबे वक्त तक कलकत्ता के जूट मिल में काम करने वाले किशोर राम रिटायर होकर वापस गांव आ चुके हैं। हाथ का इशारा करते हुए बताते हैं कि जब मैं छोटा था तो यहीं पास में ही हमारे बाप-दादा मरे हुए जानवरों की खाल उतारते थे। बहुत गरीबी का वक्त था। कई बार वही मांस बस्ती के हर घर में बनता था, जिससे हमारा पेट भरता था। लेकिन अब चीजें काफी बदल गई हैं। अब हमारी बस्ती में कोई यह काम नहीं करता।

 तो आखिर इससे निकले कैसे? उप मुखिया बलदेव दास इसका श्रेय अशर्फी दास को देते हैं। अशर्फी दास के पिता सरयू दास भी कोलकाता के जूट मिल में लंबे समय तक काम करते रहे। सरयू दास के पांच बेटे और दो बेटियां थी। अशर्फी दास भाईयों में चौथे नंबर के बेटे थे। बलदेव दास कहते हैं- अशर्फी दास हमारे टोले के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे। ग्रेजुएट थे। हम साथ ही बड़े हुए। वह जागरूक थे। छपरा शहर में जगदम कॉलेज में पढ़ने जाते थे, तो उनको सही गलत की जानकारी थी। घर-घर में घूमकर सबको समझाते थे। कई बार मरे जानवरों का जो मांस पकता था, वो बर्तन ही फेंक देते थे। उन्होंने बहुत समझाया, उससे बाद में लोगों को समझ में आने लगा कि यह गलत काम है।

अशर्फी दास, जिन्हें टोले की कुरीतियों को दूर करने का काफी श्रेय जाता है
अशर्फी दास, जिन्हें टोले की कुरीतियों को दूर करने का काफी श्रेय जाता है

हमें यहीं अशर्फी दास के भाई नागेश्वर दास जिसे सभी नगेसर कहते हैं, वह मिले। नागेश्वर दास अपने बड़े भाई को याद करते हुए पहले रुआसे हो जाते हैं। कहते हैं कि भईया अब इस दुनिया में नहीं रहे। हालांकि अगले ही पल खुद को संभालते हुए कहते हैं कि भईया काफी समझदार थे। उनकी कोशिशों से हमारा टोला काफी बदला। उनका एक प्रभाव था। छोटे-बड़े सभी लोग उनका लिहाज करते थे, इसलिए सभी उनकी बात मानते थे।

 नागेश्वर दास की छह बेटियां और एक बेटा है। वह खुद मजदूरी किया करते थे। अब शरीर कमजोर है तो मजदूरी नहीं कर पाते। गाय पाल रखी है, उसकी देखभाल में और थोड़ा-बहुत खेती में समय देते हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या गांव के बड़े लोग मजदूरी के पूरे पैसे देते हैं? नागेश्वर कहते हैं, ‘पहले जोर-जबरदस्ती थी, पूरे पैसे नहीं मिलते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है।’

राजेश दास, जो हैदराबाद मे रहते हैं
राजेश दास, जो हैदराबाद मे रहते हैं

यह बदलाव क्यों और कैसे आया, इसकी एक झलक टोले के दूसरे लोगों के चेहरे देखकर समझ में आ गया। एक साथ कई युवा बैठे बातें कर रहे थे। साफ-सुथरे कपड़े पहने। दाढ़ी बनी हुई। कईयों के हाथों में घड़ी और एंड्रायड  फोन भी थे। पता चला कि वो सब बाहर रहते हैं और कमाते हैं। छठ के त्यौहार में घर आए हैं। इन युवाओं में एक राजेश कुमार दास भी थे, जो पिछले 15 सालों से हैदराबाद की किसी कंपनी में काम करते हैं। मैंने गांव छोड़ने की वजह पूछी।

 राजेश बोल पड़े- क्या है यहां? यहां रहते तो गरीबी में पड़े रहते। बाहर जाकर आदमी बन गए। हालांकि उनको गांव-घर छोड़ने का दुख भी है। बोले, घरवाली और बच्चे यहीं रहते हैं। कौन नहीं चाहता अपने परिवार के साथ रहना, अपने बच्चों को बड़ा होते देखना। लेकिन अगर हमें इज्जत से जीना है तो हमारे पास घर छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं है। यहां जिंदगी भर चमार बने रहतें, बाहर लोग हमें नाम से बुलाते हैं।

लेकिन इसी टोले में किसुन और भगेसर की जिंदगी आज भी नहीं बदली। परिवार की जो हालत तीन दशक पहले थी, वही आज भी है। वजह, यह परिवार न तो बाहर कमाने निकल पाया, न ही बच्चों को पढ़ा पाया। नतीजा यह हुआ कि गांव के कुछ सामंत परिवारों के घर की चाकरी करने में पहले खुद की जिंदगी होम हुई, अब बच्चों की हो रही है। और यह सिर्फ इन दो घरों का मसला नहीं है, बल्कि शिक्षा के मामले में कई घरों की कहानी यही है।

 अशर्फी दास जिनको इस टोले से कुछ कुरितियां दूर करने का श्रेय जाता है, वह सिविल कोर्ट की सरकारी नौकरी में चले गए थे। उनके सभी बच्चे पढ़कर आगे बढ़ गए। लेकिन बाकी सब यहीं रह गए। किसी दूसरे परिवार का कोई बच्चा न तो उच्च शिक्षा हासिल कर सका, न ही सरकारी नौकरी में ही जा सका। पढ़ाई के नाम पर टोले के बाकी परिवारों के बच्चे 10वीं तक आते-आते हांफने लगते हैं। 15 साल की उम्र में ही ये अपना ठिकाना दिल्ली, गुजरात या फिर हरियाणा के किसी शहर को बना लेते हैं। फिर उनकी बाकी की जिंदगी वहीं कटती है। गांव बस त्योहार और शादियों में आना होता है।

लेकिन बाहर की दुनिया देखने से अब उनमें चेतना आ रही है। सोशल मीडिया पर वह अपना इतिहास ढूंढ़ रहे हैं। यही वजह है कि अब टोले में सरस्वती पूजा की जगह रविदास जयंती और अंबेडकर जयंती मनाई जाने लगी है। नागेश्वर के बेटे विक्की जो ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, का कहना है कि- अब हमलोग सही गलत समझने लगे हैं। इसके बावजूद जाति की वजह से हमें कई बार ताने सुनने पड़ते हैं। लेकिन अब गांव का कोई बड़ी जात का आदमी जाति के नाम पर हमें अपमानित करने की कोशिश करता है तो हम मुंहतोड़ जवाब देते हैं। हम समझ गए हैं कि बेहतर शिक्षा के जरिये अच्छे पैसे कमाकर हम इस स्थिति से निकल सकते हैं। मेरी उम्र के सभी बच्चे पढ़ रहे हैं और बेहतर भविष्य के सपने देखते हैं।

विक्की की यह बात एक उम्मीद देती है कि नई पीढ़ी का भविष्य बेहतर होगा। लेकिन यह मजह अफौर के इस टोले की हकीकत है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चमारों की बस्ती की कहानी अलग है। हर टोले को अशर्फी दास जैसे एक नायक की जरूरत है।

स्मृति दिवस विशेषः महाराष्ट्र में पुनर्जागरण की अगुवाई करने वाली महानायिका हैं सावित्रीबाई फुले

 आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र। बंगाली पुनर्जागरण मूलत: हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे। इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को चुनौती दी। वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया। महाराष्ट्र के पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं। इस पुनर्जागरण के दो स्तंभ थे- सावित्री बाई फुले और उनके पति जोतिराव फुले।
 हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है। ग्रंथों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं। हिंदू धर्मशास्त्र ये भी कहते हैं कि स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें। ये स्थापित मान्यताएं थीं और सभी वर्णों के लोग इनका पालन करते आए थे।
हिंदू धर्म, समाज व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए तय स्थान को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने संगठित रूप से चुनौती दी, उनका नाम सावित्री बाई फुले है। वे आजीवन शूद्रों-अति शूद्रों की मुक्ति और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करती रहीं।
ईसाई मिशनरियों से मिली पढ़ने की सीख
उनका जन्म नायगांव नाम के गांव में 3 जनवरी 1831 को हुआ था। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले में है, जो पुणे के नजदीक है। वे खंडोजी नेवसे पाटिल की बड़ी बेटी थीं, जो वर्णव्यस्था के अनुसार शूद्र जाति के थे। वे जन्म से शूद्र और स्त्री दोनों एक साथ थीं, जिसके चलते उन्हें दोनों के दंड जन्मजात मिले थे।
ऐसे समय में जब शूद्र जाति के किसी लड़के के लिए भी शिक्षा लेने की मनाही थी, उस समय शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वे घर के काम करती थीं और पिता के साथ खेती के काम में सहयोग करती थीं। पहली किताब उन्होंने तब देखी, जब वे गांव के अन्य लोगों के साथ बाजार शिरवाल गईं। उन्होंने देखा कि कुछ विदेशी महिला और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह की प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे। वे जिज्ञासावश वहां रुक गईं, उन महिला-पुरुषों में किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तिका थमायी। सावित्रा बाई पुस्तिका लेने में हिचक रही थीं। देने वाले ने कहा कि यदि तुम्हे पढ़ना नहीं आता, तब भी इस पुस्तिका को ले जाओ। इसमें छपे चित्रों को देखो, तुम्हें मजा आयेगा. वह पुस्तिका सावित्री बाई अपने साथ लेकर आईं। जब 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय जोतिराव फुले के साथ हुई और वे अपने घर से जोतिराव फुले के घर आईं, तब वह पुस्तिका भी वे अपने साथ लेकर आई थीं।
फातिमा शेख और सावित्री बाई बनी शिक्षिका: 1 जनवरी को खोला स्कूल जोतिराव फुले सावित्री बाई फुले के जीवनसाथी होने के साथ ही उनके शिक्षक भी बने। जोतिराव फुले और सगुणा बाई की देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करन के बाद सावित्री बाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की। उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण स्कूल में उनके साथ फातिमा शेख ने भी अध्यापन का प्रशिक्षण लिया। यहीं उनकी गहरी मित्रता कायम हुई। फातिमा शेख उस्मान शेख की बहन थीं, जो जोतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र और सहयोगी थे। बाद में इन दोनों ने एक साथ ही अध्यापन का कार्य भी किया।
फुले दंपत्ति ने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए पहला स्कूल पुणे में खोला। जब 15 मई 1848 को पुणे के भीड़वाडा में जोतिराव फुले ने स्कूल खोला, तो वहां सावित्री बाई फुले मुख्य अध्यापिका बनीं। इन स्कूलों के दरवाजे सभी जातियों के लिए खुले थे। जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए खोले जा रहे स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इनकी संख्या चार वर्षों में 18 तक पहुंच गई। फुले दंपत्ति के ये कदम सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती थे। इससे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल रही थी, जो समाज पर उनके वर्चस्व को तोड़ रहा था। पुरोहितों ने जोतिराव फुले के पिता गोविंदराव पर कड़ा दबाव बनाया। गोविंदराव पुरोहितों और समाज के सामने कमजोर पड़ गए। उन्होंने जोतिराव फुले से कहा कि या तो अपनी पत्नी के साथ स्कूल में पढ़ाना छोड़ें या घर। एक इतिहास निर्माता नायक की तरह दुखी और भारी दिल से जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले ने शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए घर छोड़ने का निर्णय लिया। जब सावित्री बाई पर फेंका गया गोबर और पत्थर परिवार से निकाले जाने बाद ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सावित्री बाई फुले का पीछा नहीं छोड़ा। जब सावित्री बाई फुले स्कूल में पढ़ाने जातीं, तो उनके ऊपर गांव वाले पत्थर और गोबर फेंकते। सावित्री बाई रुक जातीं और उनसे विनम्रतापूर्वक कहतीं, ‘मेरे भाई, मैं तुम्हारी बहनों को पढ़ाकर एक अच्छा कार्य कर रही हूं। आप के द्वारा फेंके जाने वाले पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि इससे मुझे प्रेरणा मिलती है। ऐसे लगता है जैसे आप फूल बरसा रहे हों। मैं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी बहनों की सेवा करती रहूंगी। मैं प्रार्थना करूंगी की भगवान आप को बरकत दें।’ गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी, इस स्थिति से निपटने के लिए वह अपने पास एक साड़ी और रखती थीं। स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं।
शिक्षा के साथ ही फुले दंपत्ति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना शुरू किया। सबसे बदतर हालत विधवाओं की थी। ये ज्यादातर उच्च जातियों की थीं। इसमें अधिकांश ब्राह्मण परिवारों की। अक्सर गर्भवती होने पर ये विधवाएं या तो आत्महत्या कर लेतीं या जिस बच्चे को जन्म देती, उसे फेंक देतीं। 1863 में फुले दंपत्ति ने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया। कोई भी विधवा आकर यहां अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी। उसका नाम गुप्त रखा जाता था। इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह का पोस्टर जगह-जगह लगाया गया। इन पोस्टरों पर लिखा था कि ‘विधवाओं! यहां अनाम रहकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कीजिए। अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें, यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा।’ सावित्री बाई फुले बालहत्या प्रतिबंधक गृह में आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देखरेख खुद करती थीं। इसी तरह की एक ब्राह्मणी विधवा काशीबाई के बच्चे को फुले दंपत्ति ने अपने बच्चे की तरह पाला। जिनका नाम यशवंत था। सत्यशोधक समाज का नेतृत्व सामाजिक परिवर्तन के लिए जोतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। उनकी मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्री बाई फुले के हाथों में सौंपी गई। 1891 से लेकर 1897 उन्होंने इसका नेतृत्व किया। सत्यशोधक विवाह पद्धति को भी अमलीजामा पहनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। सावित्री बाई फुले आधुनिक मराठी की महत्वपूर्ण कवयित्री भी थीं। उनका पहला काव्य संकलन 1854 में काव्य फुले के रूप में प्रकाशित हुआ, जब उनकी उम्र 23 वर्ष थी। 1892 में उनकी कविताओं के दूसरा संग्रह ‘बावन काशी सुबोध रतनाकर’ प्रकाशित हुआ। यह बावन कविताओं का संग्रह है। इसे उन्होंने जोतिराव फुले की याद में लिखा है और उन्हीं को समर्पित किया है। सावित्री बाई फुले के भाषण भी 1892 में प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे पत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पत्र उस समय की परिस्थितियों, लोगों की मानसिकता, फुले के प्रति सावित्री बाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं। 1896 में एक एक बार फिर पुणे और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा। सावित्री बाई फुले ने दिन-रात अकाल पीड़ितों को मदद पहुंचाने लिए एक कर दिया। उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि अकाल पीड़ितों को बड़े पैमाने पर राहत सामग्री पहुंचाए। शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की शिक्षिका और पथप्रदर्शक मां सावित्री बाई का जीवन अनवरत अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते और न्याय की स्थापना के लिए बीता। उनकी मृत्यु भी समाज सेवा करते ही हुई। 1897 में प्लेग की वजह से पुणे में महामारी फैल गई। वे लोगों की चिकित्सा और सेवा में जुट गईं। स्वंय भी इस बीमारी का शिकार हो गईं। 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कार्य और विचार मशाल की तरह देश को रास्ता दिखा रहे हैं।

दिल्ली में वर्ल्ड बुक फेयर में लगा है विचारों का मेला, 5 मार्च है अंतिम तारीख

दिल्ली के प्रगति मैदान में इन दिनों किताबों का मेला लगा है। विचारों का मेला लगा है। यह मेला 5 मार्च तक चलेगा। विश्व पुस्तक मेले का यह 50वां साल है। इस लिहाज से यह महत्पूर्ण है। भांति-भांति के प्रकाशक, भांति-भांति की पुस्तकों के साथ मौजूद हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस विश्व पुस्तक मेले में कहा जा रहा है कि यहां तकरीबन 2000 प्रकाशक स्टॉल लगे हैं। कोविड के कारण यह पुस्तक मेला तीन सालों बाद आयोजित हो रहा है। पुस्तक मेले में हर दिन कोई न कोई ख्याति प्राप्त लेखक पहुंचता है और उनको सुनने जुटती है भारी भीड़।

पुस्तक मेले में हर विचारधारा की पुस्तकें और लेखकों को आसानी से टहलते देखा जा सकता है। अंबेडकरी-फुले आंदोलन के प्रकाशकों की बात करें तो इस साल बहुजन वैचारिकी वाले छह बुक स्टॉल लगे हुए हैं। उसमें दलित दस्तक के स्टॉल के साथ-साथ जयपुर के प्रकाशक एम.एल. परिहार की बुद्धम पब्लिकेशन, फारवर्ड प्रेस सहित जाने माने प्रकाशक सम्यक प्रकाशन और गौतम बुक सेंटर का स्टॉल लगा हुआ है। ये सभी स्टॉल हाल नंबर 2 में आस-पास ही मौजूद हैं। हॉल नंबर दो में दलित दस्तक का स्टॉल नंबर- 378 है। इसके आस-पास ही बाकी सभी प्रकाशकों के स्टॉल भी मौजूद हैं। इसके अलावा आदिवासी साहित्य के साथ इस बार वंदना थेटे भी अपने प्रकाशन के साथ मौजूद हैं।विश्व पुस्तक मेला

खास बात यह भी है कि बीते दिनों में दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर तमाम बड़े-बड़े प्रकाशक भी पुस्तकें प्रकाशित करने लगे हैं। चाहे राजकमल हो, वाणी प्रकाशन हो या फिर पेंग्विन और अन्य प्रकाशन संस्थान, प्रकाशकों में बाबासाहेब के साहित्य को प्रकाशित करने की होड़ मची है। इस बारे में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास का कहना है कि भले ही तमाम प्रकाशक दलित साहित्य प्रकाशित कर रहे हों, कोई भी पुस्तक खरीदने से पहले पाठकों को यह भी देखना होगा कि उसको लिखा किसने है। क्योंकि लिखने वाला अगर अंबेडकरी विचारधारा की बजाय किसी अन्य विचारधारा से प्रेरित है तो फिर वह दलित साहित्य के साथ न्याय नहीं कर पाएगा, बल्कि वह पाठको को और भ्रम में ही डालेगा।

फिलहाल पुस्तक मेला अपने अंतिम चरण में है। साहित्य प्रेमियों का आना लगातार जारी है। खास बात यह भी है कि इस मेले में स्कूली छात्र भी खूब पहुंच रहे हैं। तो तमाम पुस्तक प्रेमी अपने बच्चों के साथ पुस्तक मेले में शिरकत कर रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि न्यू मीडिया और ट्विटर और इंस्टा के इस दौर में उनके बच्चे किताबों से भी जुड़े रहें और बेहतर इंसान बन सकें। इस दौरान पाठकों में अपने प्रिय लेखकों के साथ तस्वीरें लेने की होड़ भी देखी जा रही है।

 

अमेरिका में अंबेडकरवादियों की बड़ी जीत, सिएटल शहर में जातिगत भेदभाव पर लगा बैन

अमेरिका के सिएटल शहर में अब जाति को लेकर भेदभाव करने वालों की खैर नहीं होगी। सिएटल में जाति आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित कर दिया गया है। मंगलवार को एक बड़े फैसले में सिएटल सिटी काउंसिल ने शहर के भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल कर लिया। यानी अब इस शहर में अगर कोई किसी से जाति के आधार पर भेदभाव करता है, तो उस पर कार्रवाई होगी। पहले भेदभाव विरोधी कानून में रंग और नस्ल आधारित भेदभाव ही शामिल था। सिएटल सिटी काउंसिल ने इस अध्यादेश को 6-1 से पारित कर दिया।

सिटी काउंसिल में इस प्रस्ताव को सिटी काउंसिल मेंबर क्षमा सावंत लेकर आई थीं। क्षमा सावंत खुद ऊंची जाति की भारतीय हिन्दू हैं, लेकिन सामाजिक न्याय की पक्षधर हैं।  क्षमा सावंत का कहना है कि “हमें यह समझने की जरूरत है कि भले ही अमेरिका में दलितों के खिलाफ भेदभाव उस तरह नहीं दिखता जैसा कि दक्षिण एशिया में हर जगह दिखता है, लेकिन यहां भी भेदभाव एक सच्चाई है।”

अमेरिका की नगर परिषद में पेश हुआ ये अपनी तरह का पहला प्रस्ताव है। इसको लेकर लंबे समय से मांग की जा रही थी। इसके समर्थक इसे सामाजिक और समानता के लिए अहम कदम मान रहे हैं। हालांकि दक्षिण एशिया और खासकर भारत के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इस प्रस्ताव का मकसद दक्षिण एशिया के लोगों खासकर भारतीय अमेरिकियों को निशाना बनाना है। बता दें कि अमेरिका में भारतीय मूल के अप्रवासियों की संख्या दूसरे नंबर पर है। अमेरिकन कम्यूनिटी सर्वे के 2018 के आंकड़े के मुताबिक अमेरिका में भारतीय मूल के 42 लाख लोग रहते हैं। भारत में जाति आधारित भेदभाव पर 1948 से ही प्रतिबंध है।

इस कानून को बनाने के लिए अमेरिका में एक लंबी मुहिम चली थी। इसमें वशिंगटन युनिवर्सिटी के 8000 से ज्यादा लोगों एकेडमिक वर्कर्स ने अपना समर्थन दिया था। इस बिल को काउंसिल में रखने वाली काउंसिल मेंबर क्षमा सावंत को 50 विभिन्न संगठनों ने समर्थन दिया था, जिसमें अमेरिकी संगठन भी शामिल थे। इस बिल को 21 फरवरी को मंजूरी मिल गई। यह इस मायने में काफी अहम है कि अमेरिका में पहली बार किसी शहर में कास्ट डिस्क्रीमिनेशन को बैन किया गया है।

हालांकि बाद के दिनों में जब भारत से तमाम जातियों के लोग अमेरिका पहुंचे तो वहां वह अपने साथ जाति लेकर गए। जिससे जातिवाद की घटनाएं सामने आने लगी। पिछले दिनों अमेरिका में ही सिसको कंपनी में एक दलित के साथ भेदभाव का मामला सुर्खियों में रहा था, जिसके बाद से ही अमेरिका में भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल करने की मांग हो रही थी। सिएटल में जातिवाद को अपराध मानने का प्रस्ताव पेश होने के बाद अब अमेरिका के दूसरे शहरों में भी ऐसा होने की संभावना बढ़ गई है।

बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री के भाई ने दलितों को पिस्तौल दिखाकर धमकाया

 हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों को श्रद्धा से देखने की परंपरा रही है। लेकिन अब हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों की परंपरा को कलियुगी बाबा लगातार दागदार कर रहे हैं। इन दिनों बागेश्वर धाम का धीरेन्द्र शास्त्री चर्चा में है। बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री का भाई गुंडा निकल गया है। शास्त्री के भाई ने हथियारों के बल पर दलितों को धमकाया है, जिसका वीडियो वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडिया में बागेश्वर धाम वाले शास्त्री के भाई ने एक दलित महिला की शादी में घुसकर वहां मौजूद मेहमानों को पिस्तौल दिखाकर धमकाया।

इस दौरान धीरेन्द्र शास्त्री का भाई सौरभ गर्ग उर्फ शालिगराम शराब के नशे में था। वीडियों में एक हाथ में सिगरेट लिए सौरभ को एक शख्स को गाली देते हुए और उसके सिर पर पिस्तौल ताने हुए देखा गया। पुलिस का कहना है कि सौरभ बागेश्वर धाम के गीतों की बजाय शादी मे बुंदेलखंड के लोकप्रिय राई नृत्य संगीत को बजाने से नाराज था। हद है, अब कोई बाबा और उसका गुंडा भाई यह तय करेगा कि कौन अपनी शादी में किस गीत-संगीत को बजाएगा।

 दरअसल धीरेन्द्र शास्त्री और बागेश्वर धाम पिछले कुछ वक्त से लगातार विवाद में है। 26 साल के धीरेन्द्र शास्त्री पर जमीन के अवैध कब्जे से लेकर लोगों को चमत्कार के नाम पर गुमराह करने के भी आरोप लगते रहे हैं। पिछले दिनों धीरेन्द्र शास्त्री ने महाराष्ट्र के महान संत तुकाराम को लेकर भी विवादित बयान दिया था।

 बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक धीरेंद्र शास्त्री के साथ स्कूल में पढ़ चुके एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया था कि, ”स्कूल में धीरेंद्र पढ़ाई में बहुत ख़ास नहीं था। कहता था कि बड़े होकर धंधा करना है। फिर पता नहीं कहाँ, एक साल के लिए ग़ायब हो गया था। लौटा तो अलग ही था। धीरे-धीरे विधायकों, बाहुबलियों का आना शुरू हुआ। ये बना तो कांग्रेस नेताओं के कारण है पर आज जो हो रहा है, उसमें भाजपा का रोल है। वरना पाँच साल पहले तक साइकिल, मोटर-साइकिल से घूमा करता था।”

बीबीसी की इसी रिपोर्ट में चंदला के पूर्व विधायक आरडी प्रजापति ने भी शास्त्री पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि- ”गढ़ा में जो सरकारी ज़मीन थी, उस पर धीरेंद्र शास्त्री ने अपना निर्माण करवा लिया।” धीरेंद्र शास्त्री पर ज़मीन हड़पने के आरोप कुछ स्थानीय लोगों ने भी लगाया था और धरना भी दिया था, लेकिन इसपर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई।

आम जनता में इन जैसे लोगों को चमत्कारिक संत मान लेने की जो जल्दी होती है, वह चिंता की बात है। ऐसे में जिस तरह धीरेन्द्र शास्त्री के भाई का दलित समाज की बेटी की शादी में सिगरेट पीते हुए और हाथ में पिस्तौल लहराते हुए धमकाने का वीडियो सामने आया है, उससे साफ है कि बागेश्वर धाम की इमारत के नीचे काफी सच दबा है। धीरेन्द्र शास्त्री के भाई को लेकर पुलिस-प्रशासन की चुप्पी समझ से परे हैं। दलित संगठन परिवार को धमकाने के लिए सौरभ गर्ग पर एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं।

” हिंदी दलित नाटक और रंगमंच “

हिंदी दलित साहित्य की अवधारणा में नाटक या रंगमंच को देखे तो भारतीय समाज में जातियों के परस्पर टकराव झेलती जातियों का संघर्ष नजर आता है। यहाँ दर्द भी है और अधिकार की माँग भी। इसी चाह, आंदोलन और वैमनस्य तथा आक्रोश के गर्भ से दलित नाटक तथा रंगमंच का निर्माण हुआ। दलित नाटककार एवं रंगकर्मियों ने अपनी अस्मिता तथा संस्कृति को पहचाना और हिंदी हिंदू रंगमंच के समान अपनी मौजूदगी दर्ज की। जब हम दलित नाटक या दलित रंगमंच की ओर देखते हैं तो कुछ बातें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अत्याचार सहते हमारी जातीय बंधु, सवर्ण पुरूषों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हमारी माँ, बहने, बेटियाँ तथा देवदासी प्रथा के अंतर्गत हिंदू देवताओं के प्रतिनिधियों के हवस की शिकार धर्म भीरू महिलाएँ, मंदिरों में अपनी इज्जत बचाने के लिए चिल्लाती तथा अंधविश्वास की शिकार महिलाएँ यह सब जो होता है वह भारत में स्थापित सवर्णवादी व्यवस्था के कारण । सवर्णवादी व्यवस्था के उत्पीड़न की प्रतिक्रिया स्वरूप दलित साहित्य की एक मजबूत विधा के रूप में नाटक की उत्पत्ति हुई । सबसे पहले दलित समाज में इस व्यवस्था के प्रति आक्रोश निर्माण हुआ और इसी आक्रोश ने आंदोलन का रूप ले लिया । इसी आंदोलन के गर्भ से नाटक का जन्म हुआ । स्वयं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ”मेरे दस भाषणों से कई अधिक एक नाटक की प्रस्तुति लोगों पर असर डालती है।”1 मानवीय मूल्यों की स्थापना करना दलित नाटक तथा रंगमंच का मुख्य उद्देश्य रहा है। इसका निर्माता संवेदनशील होने के कारण अपनी वेदना, अपने उपर होने वाले अत्याचार, अपने अधिकारों का होता हनन, छटपटाहट को नाटक द्वारा व्यक्त कर समाज में चेतना निर्माण करने का कार्य करता है। उपर हमने कहाँ है कि दलित नाटक की उत्पत्ति बहुत मजबूत रूप से हुई है। किंतु इसके बावजूद भी यह विधा अचर्चित दिखाई देती है। इसके कई कारण हमें दिखाई देते हैं। यह नाटक जब-जब कहीं खेले जाते हैं या इसका मंचन होता है तब इसका काफी विरोध होता रहा है। व्यावसायिक नाटकों से इसका संघर्ष, रंगमंच की प्रतिकुलता, लेखकों की आर्थिक उदारता, प्रकाशक वर्ग द्वारा इनकी होती उपेक्षा आदि अनेक कारण इसके अचर्चा के रहे हैं ।

मूलत: नाटक यह विधा दलितों की ही देन है। शुरू से ही दलित समाज उत्पादक और श्रमजीवी रहा है। यह लोग दिन भर मजदूरी करके जब रात को वापिस आते हैं तो मनोरंजन के लिए अनेक कलाएँ प्रस्तुत करते थे । बिमारियों से मुक्ति, अकाल, अनावृष्टि से बचने के लिए यह लोग मुखौटा, जानवरों की खाल लगाकर नृत्य करते थे। नाटक का प्राथमिक रूप यही रहा है। मोहनदास नैमिशराय ने दलित नाट्य परंपरा को लोकनाट्य परंपरा से जोड़ते हुए लिखा है, ”मैं अगर कहूँ कि हर रंगकर्मी के भीतर उसकी स्मृतियों का दबाव होता है तो गलत नहीं होगा । थिएटर और लेखन के प्रति मेरे अनुराग का कारण भी वहीं रहा है। उसे विकसित किया सांग, ढोला तथा नौटंकी ने हमारे पड़ोसी लगभग अल्हा-उदल की कथा सुनते थे । बाद में मुझे पता चला वे हमारे पुरखे थे । उनकी बहादूरी के किस्से हमें रोमांचित करते थे। बिहार में ‘राजा सल्हेस’ का किस्सा लगभग इसी तरह का है। उस किस्से में अस्मिता का भाव है। साथ हमलावर को जवाब देने की प्रवृत्ति भी, दलितों के लिए नाटक से जुड़ना व्यक्तिगत रूची की बात कम और सामूहिक अधिक है।”2

मनोरंजन की जो तमाम विधाएँ है वह दलितों से ही विकसित होती नजर आती है। जैसे – नट, नृत्य, गायन इत्यादी । गाँव में नट-नटी के करतब दिखाने के लिए भाड़े-भड़ौती करना, विदूषक, मसखरा, बहरूपिया बनना, किसी के गुणों-अवगुणों का गा-गाकर प्रचार करना दलित लोग ही करते थे। इसी कलाओं को आगे चलकर नाटक का स्वरूप प्राप्त हुआ । कोई भी लोककला क्यों न हो, जैसे – जलसा, लावणी या नाटक उसमें काम करनेवाले ज्यादातर लोग दलित समाज के ही होते हैं । इससे पता चलता है कि नाटक दलितों के द्वारा ही खेला जाता है ।

वस्तुत: नाटकों का विवेचन दो रूपों में हम कर सकते है। वर्तमान में नाटक के दो रूप हमें दिखाई देते हैं। एक वह नाटक जो रंगमंच के अधिन है। जिसका निर्माण ही रंगमंच को आधार बनाकर किया जाता है । जिसे आज हम मूल प्रवाह का नाटक कहते हैं । जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन तथा अर्थ प्राप्ती ही होता है। लेकिन दलित नाटक इससे अलग है। यह दलितों द्वारा ही लिखा जाता है । यह अलग बात है कि आज गैर दलित लेखक भी दलितों के उपर लिख रहे हैं। लेकिन यह लेखन सहानुभूतिपरक होता है। परंतु आज दलितों को सहानुभूति नहीं चाहिए । क्योंकि सहानुभूति से कोई प्रश्न हल नहीं हो सकत हैं ।

एक तरफ वह नाटक है जिसके पास पूरी तरह से रंगमंच होता है और एक ओर वह नाटक है जिसके पास कोई विशेष रंगमंच ही नहीं है । इसे हम दलित नाटक कहते हैं । इसके पास न कोई रंगमंच है न रंगमंच की कोई साधन सामग्री। सही बात तो यह है कि दलित नाटकों को इन साधनों की कोई जरूरत ही नहीं होती । इसकी थीम ही इतनी सशकत होती है कि बिना किसी साधन-सामग्री तथा रंगमंच के बीना ही यह दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है । यह नाटक जिसने भोगा है, उसके द्वारा लिखने के कारण उसमें अभिव्यक्ति सामर्थ्य इतना होता है कि उसे संगीत, प्रकाश, वस्त्रसज्जा आदि साधनों की कोई जरूरत नहीं होती । इसीलिए इसे मुक्त नाटक भी कहा जाता है।

मूलत: हिंदी में दलित रंगमंच का जो प्रारूप है वह लोकरंगमंच है। लोकमंच पर काम करनेवाले लोग दलित ही रहे हैं । उसमें काम करने वाला वर्ग दलित ही रहा है। जो लोककलाएँ थी, उन्होंने ही आगे चलकर नाटक का रूप धारण किया । इस संदर्भ में दशरथ ओझा का मानना है कि, ”हिंदी नाटक की परंपरा का मूल स्रोत यह जन-नाटक ही है, जो स्वांग आदि नाम से अपने प्राचीन रूप से अब तक विद्यमान है। क्रमश: इन जन-नाटकों की एक शाखा ने विकसित होकर साहित्यिक रूप धारण किया।”3

आज दलित साहित्य के अंतर्गत नाटक विधा प्रमुखता के साथ हमारे सामने आती है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के प्रेरणा से आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी आगे बढ़ रही है। इतिहास में घटित अनेक प्रसंग एवं घटनाओं ने दलित नाटककारों को लिखने के लिए प्रेरित किया है। इतिहास में ऐसे कई पात्र है जिनके मानवी हक को नकार कर उन्हें केवल जैविक रूप में देखा गया है । ऐसे पात्रों की वकालत करने का काम इस रंगभूमी ने किया है। वरिष्ठ आत्मकथाकार कौशल्या बैसंत्री के अनुसार, ”निश्चित ही नकारे हुए मानवीय हक को प्राप्त करने के लिए दलित रंगभूमी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।”4

20 वीं सदी में सबसे पहले स्वामी अछूतानंद ने हिंदी दलित नाट्य लेखन को लेकर पहल की । इनके चार नाटक दृष्टिगोचर होते हैं । इनका पहला नाटक ‘रामराज्य न्याय’ में रामायण के उपेक्षित तथा जुल्म का शिकार पात्र शंबूक की हत्या का चित्रण है । उनके अन्य नाटक, ‘मायानन्द बलिदान’, ‘पारख-पद’, ‘बली छलन’, यह हिंदू शास्त्रों और वाङ्मय के ऐसे पात्रों पर लिखे गए हैं, जिनके उत्पीड़न को सवर्ण साहित्यकारों और समाज ने त्यागा या बलिदान की संज्ञा देकर सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण तथा सवर्ण पात्रों के छल को महिमामंडित करने का षड़यंत्र रचा था । अछूतानंद ने अपने नाटकों में ऐसे मर्म को छूनेवाले संवादों को रखा है जिससे दर्शक तथा पाठक को राम के प्रति अपनी मानसिकता बदलने को प्रेरित करते हैं और राम के वर्चस्ववाद को प्रस्तुत करते हैं ।

हिंदी दलित नाटक की इसी परंपरा में महत्त्वपूर्ण रूप से शिवप्रसन्नदास का ‘हरिजन’, माता प्रसाद का ‘अछूत का बेटा’, ‘धर्म के नाम पर धोखा’, ‘प्रतिशोध’, मोहनदास नेमिशराय का ‘अदालतनामा’, ‘हैलो कामरेड’, डॉ. एन.सिंह का ‘कठौती में गंगा’, एन.आर. सागर का ‘मार्ग का काटा’, ‘अन्तिम अवरोध’, सुनील कुमार सुमन द्वारा लिखित ‘एक बार फिर’, एल.एम. धर्मरत कृत ‘अछूत का प्यार’, कर्मशील भारती द्वारा लिखित ‘मान सम्मान’, ‘फांसी’, रूपनारायण सोनकर द्वारा लिखित ‘विषधर’, ‘एक दलित डिप्टी कलेक्टर’, ‘महानायक’, रत्नकुमार सांभरिया द्वारा लिखित ‘वीमा’, सुशीला टाकभौरे का ‘नंगा सत्य’, आदि प्रमुख नाटक है।

दलित नाटक और रंगमंच की दृष्टि से कर्मशील भारती और धर्मवीर ने दिल्ली में दलित न्याय मंच स्थापित किया था। जिसके द्वारा अनेक दलित नाटकों का मंचन हुआ । कर्मशील भारती के अनेक नाटकों का यहाँ सफलतापूर्वक मंचन भी हुआ है। जिसमें – ‘मेरा वजूद’, ‘फाँसी’, ‘संवादों के पीछे’, आदि प्रमुखता से देखे जा सकते हैं । उन्होंने 10 अक्टूबर, 1989 को विजयादशमी के दिन मुनीरका गाँव में ‘मेरा वजूद’, नाटक का मंचन किया था। उन्होंने ‘मान-सन्मान’, ‘श्रेष्ठ-कौन’, ‘झुठा अहंकार’, ‘आजादी किसकी’, आदि नाटकों का भी मंचन किया है। साथ ही वरिष्ठ दलित कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित ‘दो चेहरे’ नाटक भी कई नाट्य संस्थाओं द्वारा मंचित हुआ है।

60 के दशक में प्रसिद्ध रंगकर्मी रमेश मेहता ने एक नाटक लिखा था, जिसका नाम था – ‘रोटी और बेटी’। नाटक के माध्यम से उन्होंने जातीय आधार पर लोगों को उद्वेलित और उत्तेजित करती आ रही ज्वलंत समस्या को उजागर किया है। इसी परंपरा में आगे 1977 में मनोहर लाल मानव ने ‘चावली’ नामक नाटक की निर्मिती की। इसकी मूल थीम दलित समाज के पढ़े-लिखे तबके में मध्यवर्गीय मूल्यों के प्रति रूझान और समाज का झकझोर कर उन्हें शिक्षित समाज के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देना है। इस नाटक का निर्देशन आनन्द कुमार ने किया था।  यह नाटक अनेक सार्वजनिक सभाओं में और दलित बस्तियों में मंचित हुआ था । 1980 मे मनोहरलाल और डालचंद के संयुक्त प्रयास से एल.के. रैना के द्वारा ‘कबिरा खड़ा बाजार में’, विशेष रूप से दलित लोगों के लिए मंचित किया ।

जहाँ तक दलित समाज के शौकिया, नाटककारों की बात है, उसमें उत्तर प्रदेश के ही नाटककारों ने कई प्रस्तुतियाँ की । एकलव्य के जीवन पर वर्तमान के संदर्भ को लेकर भीमसेन संतोष द्वारा ‘शोषित के नाम संतोष का पैगाम’ नाटक लिखा, जो शोषित साहित्य प्रकाशन, दिल्ली की ओर से 1983 में प्रकाशित हुआ। इस नाटक में उन्होंने दलितों के भीतर की पीड़ा को बाहर लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार दलित नाटकों का लेखन और मंचन आज भी होता हुआ दिखाई देता है। वर्तमान समय में दलित नाटककार सिनेमा और सिरियल के चकाचौंध से प्रभावित तो हुए हैं, किंतु वह अपने मूल उद्देश्य से दूर नहीं गये । वह आंबेडकरी विचारों से हटे नहीं है। वह सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं । भले ही आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी के सामने अनेक समस्याएँ है किंतु बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणा से दलित नाटककार, दलित नाटक, दलित रंगभूमी और दलित कलाकार आज आगे बढ़ रहा है।

संदर्भ : 1) मोहनदास नेमिशराय, दलित साहित्य अवधारणा में रंगमंच, पृ. 54 2) संपा. मनोहर भंडारी, दलित साहित्य समग्र परिदृश्य, पृ. 149 3) दशरथ ओझा, हिंदी नाटक का उद्भव और विकास, पृ. 53 4) संपा. डॉ. उमाकांत बिरादार, डॉ. विजकुमार रोडे, दलित विमर्श : नाटक तथा रंगमंच, पृ. 138 संप्रति : 1)    प्रोफेसर डॉ. संजय राठोड हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004 चलभाष् – 9421686342 ई-मेल – drsanjayrathod5@gmail.com तथा 2) विकास सूर्यकांत वाघमारे शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), सेट, एम.फिल.,                 पी.जी. डिप्लोमा, पी-एच.डी. (कार्यरत) आदि । चलभाष् : 9518325363, 9075181603 ई-मेल :waghamarev12@gmail.com पत्राचार का पता : शोधार्थी, हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004 मौलिकता प्रमाणपत्र- ” हिंदी दलित नाटक और रंगमंच” शीर्षक शोध आलेख स्वलिखित,  अप्रकाशित है।

रामचरित मानस विवाद के बीच समाजवादी पार्टी का बड़ा फैसला

 समाजवादी पार्टी ने अपनी पार्टी के दो सवर्ण नेताओं को निष्कासित कर दिया है। इसमें पहला नाम रोली तिवारी मिश्रा जबकि दूसरा नाम ऋचा सिंह का है। ये दोनों नेता रामचरित मानस मुद्दे पर स्वामी प्रसाद मौर्य का लगातार विरोध कर रही थीं और मौर्य के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल रखा था। ऐसे में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के फैसले से साफ हो गया है कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के सवर्ण नेताओं की बजाय पिछड़े समाज के नेताओं के साथ खड़े हैं।

 दरअसल, रोली मिश्रा और ऋचा सिंह सोशल मीडिया पर स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान का लगातार विरोध कर रही थीं। और हिन्दू धर्म और रामचरित मानस के समर्थन में खड़े होने के साथ ही स्वामी प्रसाद मौर्य पर खुलकर तो अखिलेश यादव पर इशारों-इशारों में हमला कर रही थीं। लगातार ऐसा होने के बाद अखिलेश यादव ने दोनों नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

 इस बीच कई सपा नेताओं ने रोली तिवारी मिश्रा और ऋचा सिंह पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगा रहे थे। क्योंकि रोली तिवारी मिश्रा इस पूरे विवाद के बाद जिस तरह से हिन्दू धर्म की राजनीति पर उतर आई थीं, उससे साफ हो गया था कि आने वाले दिनों में उनका सपा में रहने का कोई इरादा नहीं है। सोशल मीडिया ट्विटर पर खुद को डॉ. रोली तिवारी मिश्रा लिखने वाली सपा नेत्री ने बाद में अपने नाम के आगे पण्डित जोड़ लिया था।

सपा से निकाले जाने के बाद मिश्रा ने अखिलेश यादव को टैग करते हुए लिखा कि राष्ट्रद्रोहियों, सनातन धर्मद्रोहियों, रामद्रोहियों के खिलाफ आवाज उठाती थी, उठाती रहूंगी। सनातन धर्म के स्वाभिमान प्रभु श्रीराम, श्रीरामचरित मानस के सम्मान के लिए ऐसे हजारों निष्कासन स्वीकार। अखिलेश यादव की इस कार्रवाई के खिलाफ जहां तमाम सवर्ण समाजवादी पार्टी को सनातन धर्म का विरोधी बताकर अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं तो वहीं अखिलेश यादव ने भी साफ कर दिया है कि धर्म और सम्मान की लड़ाई में वह सम्मान के साथ हैं।

People think who has come to live among us – Ramesh Bhangi

When a person lying in a corner of the village comes to live in the city and allegedly starts living in the midst of civilized society, there is a stir among the people around. He is harassed. People are not able to digest that till yesterday the person who used to serve at our place has come to live on an equal footing with us. This is to say of Ramesh Chand Gehlot i.e. Ramesh Bhangi.

Ramesh Bhangi of Valmiki Samaj is a well-known name in the world of Dalit literature and is practicing law these days. When he came to live in a society in Ghaziabad, there was a buzz in the neighborhood. He was harassed. Dirt was poured into their water tank. The neighbors wanted Ramesh to leave the Bhangi Society, but he stayed put as we faced difficulties.

It is not that Ramesh Bhangi promoted his caste. Ramesh Bhangi says my certificate name is Ramesh Chand Gehlot. It is a common name, it does not reveal caste, but in Indian society your caste goes ahead of you. As the fragrance of a flower moves forward, so does your caste. Can’t escape caste. I have to say that India itself means caste. The identity of India is only from caste.

How did Ramesh Bhangi become Ramesh Gehlot, and why? When asked, Ramesh says, “All the books on sociology, all start with caste. All the books written on India start with caste. So the reality of India is caste, it is difficult to avoid it, so I added my caste to my name.

Ramesh Bhangi struggled a lot in order to come to Delhi from the Dalit colony of the village. He was born in 1968 in Malakpur village of Baghpat district of Uttar Pradesh, situated on the edge of Delhi. From here he took education up to primary. When he was studying in the fifth standard, he and other children of his caste were made to sweep the school. The teacher then used to keep a separate stick for the children of the Dalit community. A big stick, so that he can beat the children of Dalit society and also stay away from them.

Later in the day, Ramesh Bhangi came to Delhi. During this he also did the work of scrap. He used to go around the city to collect papers. Ramesh Bhangi did not give up the desire to move forward despite doing many odd jobs during the days of struggle. His inspiration was Babasaheb Dr. Ambedkar, whose biography he got to read in his childhood. Babasaheb’s life struggle instilled in Ramesh Bhangi the belief that life can be successful if there is struggle. Ramesh realized how caste works when he went to the exchange office to enroll for a job. There was a vacancy for the bus conductor. But the clerk sitting there told him to work as a sweeper, what would he do by working as a bus conductor? However, later he got a job as a bus conductor and then later he was appointed as a translator in the Central Translation Bureau of the Ministry of Home Affairs. After which he saw closely what the Dalit community had to face while living in the residential colony.

He saw casteism closely while living in different government and private flats. And when he came to live in Vasundhara area of Ghaziabad situated at the mouth of Delhi, then there was an earthquake in the society. Ramesh Bhangi recollects, “I joined a society of Vasundhara in 2001. Everything went well for a few years. Then in the year 2006, my neighbor asked my wife about caste. Then the wife told her caste. Since then she started cutting off from us and gradually other people of the neighborhood also came to know about our caste.

After the truth of Ramesh Bhangi’s caste came to the fore, many times the neighbors argued with him. He was harassed in various ways. Ramesh says- “Everyone wanted us to leave from there. But if we stick to our identity, the neighbors start harassing us indirectly. Like broke the chairs kept on my terrace. They break our pots, they break the plants in them. Let’s break the water boil inside the water tank. Since we do not see who has done this, we cannot even say anything. So in this way there is an attempt to harass us.”

After all, in a society where all the people are educated, intelligent, who are called civilized, why do those people do this? When I ask, Ramesh Bhangi says that the people of Dalit society are still not being fully accepted in the residential areas of the cities. If the person in front belongs to the Valmiki community, the discrimination against him increases further. People also want to escape from our shadow. This is a mental illness and if the person in front has a mental illness, then he should also get treated. I am a Victim.

लोगों को लगता है कि हमारे बीच यह कौन रहने आ गया- रमेश भंगी

गांव के एक कोने में पड़ा हुआ व्यक्ति जब शहर में रहने के लिए आता है और कथित तौर पर सभ्य समाज के बीच में रहना शुरू करता है तो आसपास के लोगों के बीच में हलचल मच जाती है। उसे परेशान किया जाता है। लोग यह पचा नहीं पाते हैं कि कल तक जो व्यक्ति हमारे यहां चाकरी करता था, वह हमारे बराबर में रहने आ गया है। यह कहना है रमेश चंद गहलोत यानी रमेश भंगी का।

वाल्मीकि समाज के रमेश भंगी दलित साहित्य की दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम हैं और इन दिनों वकालत कर रहे हैं। जब वो गाजियाबाद की एक सोसाइटी में रहने आएं तो आस-पड़ोस में खुसर-फुसर शुरू हो गई। उन्हें परेशान किया गया। उनके पानी की टंकी में गंदगी डाली गई। पड़ोसी चाहते थे कि रमेश भंगी सोसाइटी छोड़ दें, लेकिन हम मुश्किल को झेलते हुए वह वहां जमें रहें।

ऐसा नहीं है कि रमेश भंगी ने अपनी जाति का प्रचार किया था। रमेश भंगी कहते हैं मेरा सर्टिफिकेट का नाम रमेश चंद गहलोत है। सामान्य नाम है, इससे जाती का पता नहीं चलता, लेकिन भारतीय समाज में आपसे आगे आपकी जाति चलती है। जैसे किसी फूल की खुशबू आगे चलती है, वैसे ही आपकी जाति भी आगे चलती है। जाति से बच नहीं सकते। मेरा तो कहना है कि भारत का मतलब ही जाति है। भारत की पहचान ही जाति से ही है।

रमेश गहलोत से रमेश भंगी कैसे बन गए, और क्यों? पूछने पर रमेश कहते हैं, “समाजशास्त्र की जितनी किताबें हैं, सब सब की सब जाति से शुरू होती हैं। भारत के ऊपर जितनी किताबें लिखी गई हैं, सभी जाति से ही शुरू होती है। तो भारत की जो इस सच्चाई है वह जाति है इससे बचना मुश्किल है इसलिए मैंने अपने नाम के साथ ही अपनी जाति जोड़ ली।”

रमेश भंगी ने गांव की दलित बस्ती से दिल्ली आने के क्रम में काफी संघर्ष किया। दिल्ली के किनारे पर बसे उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मलकपुर गांव में सन् 1968 में उनका जन्म हुआ। यहीं से उन्होंने प्राइमरी तक की शिक्षा ली। जब वो पांचवी में पढ़ते थे, तब स्कूल में उनसे और उनकी जाति के बाकी बच्चों से स्कूल में झाड़ू लगवाया जाता था। टीचर तब दलित समाज के बच्चों के लिए अलग से डंडे रखता था। एक बड़ा सा डंडा, ताकि वो दलित समाज के बच्चों को पीट भी दे और उनसे दूर भी रहे।

बाद के दिनों में रमेश भंगी दिल्ली आ गए। इस दौरान उन्होंने कबाड़ी का काम भी किया। वो शहर में घूम-घूम कर कागज चुना करते थे। संघर्ष के दिनों में कई छोटे-मोटे काम करने के बावजूद रमेश भंगी ने आगे बढ़ने की चाह नहीं छोड़ी। उनके प्रेरणा बने थे- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जिनकी एक जीवनी उन्हें बचपन में ही पढ़ने को मिल गई थी। बाबासाहेब के जीवन संघर्ष ने रमेश भंगी में यह विश्वास पैदा किया कि संघर्ष किया जाए तो जीवन सफल हो सकता है। जाति किस तरह काम करती है इसका अहसास रमेश को तब हुआ, जब वो नौकरी के लिए एक्सचेंज ऑफिस में नाम लिखवाने गए। बस कंडक्टर के लिए वेकैंसी थी। लेकिन वहां बैठे क्लर्क ने उनसे कहा कि वह सफाई कर्मचारी का काम कर लें, बस कंडक्टर की नौकरी कर वह क्या करेंगे?  हालांकि बाद में उन्हें बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई और फिर बाद में वह गृह मंत्रालय के केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो में अनुवादक के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई। जिसके बाद रिहायशी कॉलोनी में रहने के दौरान दलित समाज के व्यक्ति को क्या-क्या झेलना पड़ता है, उन्होंने इसे करीब से देखा।

अलग-अलग सरकारी और निजी फ्लैट में रहने के दौरान उन्होंने जातिवाद को नजदीक से देखा। और जब वो दिल्ली के मुहाने पर बसे गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में रहने आएं तब तो सोसाइटी में भूचाल आ गया। रमेश भंगी याद करते, “मैं 2001 में वसुंधरा की एक सोसायटी में आ गया। कुछ सालों तक सब ठीक चला। फिर साल 2006 की बात है, मेरी पड़ोसी ने मेरी पत्नी से जाति के बारे में पूछा। तब पत्नी ने अपनी जाति बता दी। तब से वह हमसे कटने लगी और धीरे-धीरे आस-पड़ोस के दूसरे लोगों को भी हमारी जाति पता चल गई।”

रमेश भंगी की जाति का सच सामने आने के बाद कई बार पड़ोसियों ने उनसे तू-तू मैं-मैं की। उनको तरह-तरह से परेशान किया गया। रमेश कहते हैं- “सब चाहते थे कि हम वहां से चले जाएं। लेकिन हम अपनी पहचान के साथ डटे रहें तो पड़ोसी हमें अप्रत्यक्ष रूप से परेशान करने लगे। जैसे कि मेरी छत पर रखी कुर्सियां तोड़ दी। हमारे गमले तोड़ देते हैं, उसमें लगे पौधे तोड़ देते हैं। वाटर टैंक के अंदर लगे वाटर बॉईल को तोड़ देते हैं। हम चूकि देखते नहीं है कि यह किसने किया है, इसलिए हम कुछ बोल भी नहीं पाते हैं। तो इस तरह हमें परेशान करने की कोशिश की जाती है।”

आखिर जिस समाज में सभी लोग पढ़े-लिखे हैं, समझदार हैं, जिन्हें सभ्य कहा जाता है, वो लोग ऐसा क्यों करते हैं? मेरे पूछने पर रमेश भंगी कहते हैं कि शहरों के रिहायशी इलाकों में दलित समाज के लोगों को अब भी पूरी तरह से एक्सेप्ट नहीं किया जा रहा है। सामने वाला वाल्मीकि समाज का हो तो उसके साथ भेदभाव और बढ़ जाता है। लोग हमारी परछाई से भी बचना चाहते हैं। यह एक मानसिक रोग है और मानसिक रोग सामने वाले को है तो इलाज भी उसे करना चाहिए। मैं तो विक्टिम हूं।

हिन्दू राष्ट्र की पोल खोलने वाली कहानी

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आज मैं मित्र अनुज के गांव में गया, जहां मुस्लिम ना के बराबर रहते हैं, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी का तो नामोनिशान तक नही गांव में, मैंने गांव के नुक्कड़ पर ही अनुज के घर के बारे में गांव के बाहर ही खड़े एक व्यक्ति मुकेश से पूछा कि भाईसाहब अनुज जी के घर जाना है।
मुकेश ने कहा की कौन अनुज?
मैंने बोला अनुज जी ,,
उसने फिर बोला भाई अनुज कौन से वाले?
मैंने कहा वही अनुज जी, अब वो आदमी गर्म हो गया, कहने लगा, अनुज-अनुज कर रहे, पूरा नाम बताओ?
मैंने बोला पूरा नाम जरूरी है क्या?
कहने लगा जरूरी है, बिल्कुल जरूरी है।
यहां कई अनुज रहते हैं, एक अनुज जाटों में है, दो अनुज चमारों में हैं, एक अनुज मालियों में हैं, एक त्यागियों में अनुज और एक अनुज तिवारी।
मैंने कहा अनुज हिन्दू,,
अब उस आदमी का पारा सातवें आसमान पर था, कहने लगा हिन्दू-हिन्दू नही , नाम बताओ पूरा नाम क्या है?
मैंने कहा अनुज जबभी मुझसे बहस करता है तो कहता है कि मैं “हिन्दू” हूँ,, हिन्दू राष्ट्र बनाने में अपना अहम योगदान दे रहा हूँ।
तो मुझे लगा कि जो व्यक्ति हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए ततपर हो , प्रयासरत हो, अग्रणी हो, कम से कम उसकी पहचान हिन्दू से तो होगी ही।
अब वो आदमी चिल्लाने भर पर आ गया, कहने लगा जब उसका पूरा नाम पता हो तब उसके बारे में पूछना उससे पहले नही।
मैं तब से यही सोच रहा हूँ कि जो व्यक्ति दिन-रात हिन्दू-राष्ट्र हिन्दू-राष्ट्र का राग अलाप रहा है वो अपने गांव तक को हिन्दू बना नही पाया वो देश को क्या हिन्दू राष्ट्र बनाएगा?
गांवों में आज भी ना केवल मोहल्ले बल्कि शमसान तक जातिओ के हिसाब से बंटे हुए हैं।
ऐसा देश जहां “जन्म से मृत्यु” के बाद भी “जाति नही जाती” वहां हिन्दू राष्ट्र की कल्पना मात्र करना भी हास्यस्पद नही तो क्या हे।
जाति । जाति । जाति ।
Mp Singh जी की पोस्ट से साभार 🙏

BBC पर छापे को लेकर मोदी की दुनिया भर में भारी फजीहत

दिल्ली और मुंबई स्थित बीबीसी दफ्तर पर आयकर विभाग के अधिकारियों के घंटों तक जमे रहने के बाद दुनिया भर में मोदी सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है। आलम यह है कि इस पर दुनिया के अलग-अलग देशों से निकलने वाले अखबारों ने मोदी सरकार पर हमला बोला है। अखबारों ने भारत में प्रेस स्वतंत्रता पर हो रहे हमले को लेकर पीएम मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साधा है। दुनिया के बड़े अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है-

‘भारत के अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के प्रति भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख़ की आलोचना करने वाली डॉक्यूमेंट्री के प्रसार को रोकने की कोशिश किए जाने के हफ़्तों बाद उनकी सरकार के आयकर विभाग के अधिकारियों ने मंगलवार को बीबीसी के दिल्ली और मुंबई दफ़्तरों पर छापा मारा है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की सरकारी एजेंसियों ने अक्सर ही स्वतंत्र मीडिया संस्थानों, मानवाधिकार संगठनों और थिंक टैंकों पर छापे मारे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सरकार की ओर से उनके फ़ंडिंग स्रोतों को निशाना बनाने को आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने की कोशिशों के रूप में देखते हैं।’

अमेरिका से ही प्रकाशित वॉशिंगटन पोस्ट ने मोदी सरकार की इस कार्रवाई पर एक बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर बात की गयी है। वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा है-

‘आयकर विभाग अधिकारियों के बीबीसी के मुंबई और दिल्ली स्थित दफ़्तरों पर पहुंचने से दुनिया भर का ध्यान भारत में प्रेस स्वतंत्रता के ख़राब हालातों पर गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसे ”सर्वे” कहा है जो कि टैक्स रेड को व्यक्त करने का ही एक अलग ढंग है। इसकी टाइमिंग को लेकर भी सवाल हैं क्योंकि ब्रितानी प्रसारक ने तीन हफ़्ते पहले ही एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ की थी जिसमें साल 2002 के गुजरात सांप्रदायिक दंगों में पीएम नरेंद्र मोदी की कथित भूमिका की ओर ध्यान खींचा गया था। इस मामले में मोदी काफ़ी संवेदनशील दिखे हैं। उनकी सरकार ने डॉक्यूमेंट्री ब्लॉक करने के साथ ही सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालयों में उसकी क्लिप्स को रोकने की कोशिश की।’

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भी इस कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल उठाया है। अखबार ने लिखा है- ‘ये कार्रवाई मोदी सरकार की ओर से बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया- द मोदी क्वेश्चन’ को और उसके अंशों को प्रतिबंधित करने के लिए आपातकालीन क़ानूनों को अमल में लाए जाने के एक महीने से भी कम समय में की गयी है। सरकारी एजेंसियों ने इस डॉक्यूमेंट्री को अपने विश्वविद्यालयों में सामूहिक रूप से देखने की कोशिश करने वाले छात्रों को भी हिरासत में लिया है।’

जर्मनी के प्रमुख मीडिया संस्थान डी डब्ल्यू ने इस मामले में ख़बर लिखते हुए बताया है कि ‘जनवरी में बीबीसी ने दो हिस्सों वाली एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ की थी। इस डॉक्यूमेंट्री में ये आरोप लगाया गया था कि मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए साल 2002 के दंगों में पुलिसकर्मियों को आंखें मूंदने का आदेश दिया था। इस हिंसा में एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी जिसमें ज़्यादातर लोग मुसलमान थे। डी. डब्ल्यू ने यह भी कहा है कि भारत सरकार ने अपने सूचना प्रोद्योगिकी क़ानून में निहित आपातकालीन ताक़तों का इस्तेमाल करते हुए डॉक्यूमेंट्री साझा करने वाले ट्वीट्स और वीडियो लिंक्स को ब्लॉक किया था।’

 हालांकि बीबीसी ने इस मामले पर जारी अपने बयान में बस इतना भर कहा है कि ‘हम अपने कर्मचारियों की मदद कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि स्थिति जल्द से जल्द सामान्य हो जाएगी। हमारा आउटपुट और पत्रकारिता से जुड़ा काम सामान्य दिनों की तरह चलता रहेगा। हम अपने ऑडियंस को सेवा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

 लेकिन जिस तरह से दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में मोदी सरकार की बीबीसी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बातें हो रही है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में भारत में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो सकती है। कुल मिलाकर दुनिया भर के अखबार मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं, जिससे मोदी सरकार की साख को बट्टा जरूर लग गया है।

डाइवर्सिटी एजेंडा लागू करवाने के लिए: क्यों नहीं आगे आ सकते बहुजनवादी दल!

आज भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता जिस तरह शिखर पर पहुंची है;जिस तरह नीचे की प्रायः 50% आबादी महज 3% नेशनल वेल्थ पर गुजर-बसर करने के लिए विवश है;जिस तरह भारत नाइजीरिया को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के ‘पॉवर्टी कैपिटल’ अर्थात ‘गरीबी की राजधानी ‘का ख़िताब अपने नाम किया है; जिस तरह देश की आधी आबादी को आर्थिक समानता पाने में 257 साल लगने के कयास लगाये जा रहे हैं और सर्वोपरि जिस तरह शासक वर्ग की नीतियों से बहुसंख्य वंचित समाज उस स्टेज में पहुंचा दिया गए है, जिस स्टेज में पहुंचने पर सारी दुनिया में वंचितों को मुक्ति- संग्राम में उतरना पड़ा है, ऐसी दशा

में अधिकांश बहुजन बुद्धिजीवियों को निगाहें बहुजन लेखकों के संगठन ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’(बीडीएम) पर टिक गयी हैं.बहुजन लेखकों का यह संगठन पिछले डेढ़ दशक से सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों, पौरोहित्य,डीलरशिप; सप्लाई,सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन; शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि,ग्राम-पंचायत,शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट;विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद; राज्यसभा;राष्ट्रपति,राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल अर्थात शक्ति के समस्त स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की वैचारिक लड़ाई शिद्दत से लड़ रहा है. इसके दस सूत्रीय एजेंडे को जहां भाजपा-कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ के साथ कई क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने चुनावी मैनिफेस्टो में जगह दिया है,वहीँ कई राज्य सरकारों ने लागू भी किया है. बहुजन बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि बीडीएम के दस सूत्रीय एजेंडे को ठीक से लागू कर दिया जाय तो दलित, आदिवासी,पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं शक्ति के स्रोतों में अपनी वाजिब हिस्सेदारी पा जाएँगी और भारत पलक झपकते आर्थिक विषमताजन्य समस्त समस्यायों से निजात पा जायेगा!

लेकिन बीडीएम के डाइवर्सिटी एजेंडे को लागू करेगा कौन, इस सवाल से इस लेखक को अक्सर दो-चार होते रहना पड़ता है! जहां तक वर्तमान सरकार का सवाल है, वह तो वर्ग संघर्ष का इकतरफा खेल खेलते हुए दलित, आदिवासी, पिछड़े और महिलाओं को उस हालात में पहुचाने मे सर्वशक्ति लगा रही है, जिस हालात में इन्हें रहने का निर्देश हिन्दू धर्मशास्त्र देते हैं.ऐसे में शक्ति के समस्त स्रोतों पर हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग (मुख-बाहु- जंघे) से जन्मे लोगों के हाथ में देने पर आमादा वर्तमान सरकार से कोई उम्मीद नहीं: फिर उम्मीद किससे की जाय बहुजनवादी दलों से? तमाम लोग यही कहेंगे कि जो हिंदी पट्टी देश के राजनीति की दिशा तय करती है, वहां मजबूती से पैर जमायी सपा-बसपा- राजद- जदयू -लोजपा इत्यादि पार्टियां ही सामाजिक न्याय के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के कारण बीडीएम के एजेंडे को लागू करने में रूचि ले सकती  हैं, इसलिए इन पर ही निर्भर होकर इसे लागू करवाने का प्रयास करना चाहिए. लेकिन इन पर निर्भर होने के पहले जरा इनके मौजूदा चरित्र का अध्ययन कर लिया जाय!

इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी पट्टी के बहुजनवादी दलों ने मंडल उत्तरकाल में विराट सम्भावना जगाया, किन्तु वह चिरस्थायी न हो सका और 2009 के लोकसभा चुनाव से वे सामाजिक न्याय की राजनीति से विचलन का संकेत देने लगे. दरअसल 2009 तक वे बहुजन समाज को अपने वोटों का गुलाम समझने लगे थे. वे यह मानकर निश्चिन्त थे कि कुछ नहीं भी करने पर बहुजनों का वोट उन्हें थोक भाव में मिलते रहेगा. इसलिए उन्होंने न सिर्फ सारा ध्यान सवर्णों पर लगाना शुरू किया, बल्कि उनके हिसाब से एजेंडा भी सेट करने लगे. वे बहुजनों की भागीदारी को दरकिनार कर गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की आवाज़ बुलंद करने लगे थे. इस समय तक खुद को जातिमुक्त दिखाने के लिए उन्होंने तिलक तराजू .. और भूराबाल जैसे नारों से पूरी तरह दूरी बना लिया था. वे सवर्णों के सहारे पीएम बनने के सपनों में विभोर हो गए थे. सामाजिक न्याय की राजनीति से उनके विचलन का परिणाम 2009 के लोकसभा चुनाव में गहरी शिकस्त के रूप में आया, जिस पर टिपण्णी करते हुए प्राख्यात बहुजन पत्रकार दिलीप मंडल ने ‘मंद पड़ने लगी है सामाजिक न्याय  की राजनीति’ शीर्षक से 25 मई, 2009 को ‘नवभारत टाइम्स’ में लिखा था –:

‘वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हिंदी पट्टी के दो राज्यों: बिहार और यूपी के राजनीति की एक हकीकत उजागर हो गयी है. लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती और यूपी में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद मुलायम सिंह यादव, ये सभी महारथी अपनी चमक खो चुके हैं. इसके साथ ही भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में वंचित समूहों की हिस्सेदारी बढ़ाने की जो प्रक्रिया लगभग 20 साल पहले शुरू हुई थी, उस मॉडल के नायक –नायिकाओं का निर्णायक रूप से पतन हो चुका है. हालाकि यह सब एक दिन में नहीं हुआ है, लेकिन अब वह समय है, जब इसके पतन और विखंडन की प्रक्रिया पूरी हो रही है. सामाजिक न्याय की राजनीति का सफ़र जिस उम्मीद से शुरू हुआ था, उसे याद करें तो इन मूर्तियों का इस तरह गिरना और नष्ट होना तकलीफ देता है. बात सिर्फ इतनी सी नहीं है कि लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक वजूद घट गया है और उनकी पार्टी सिर्फ चार सीटें जीत पाई है या रामविलास पासवान की पार्टी का अब लोकसभा में अब कोई नामलेवा नहीं बचा है. न ही इस बात का निर्णायक महत्त्व है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने का ख्वाब सजों रही मायावती की पार्टी का प्रदर्शन इस लोकसभा चुनाव में बेहद ख़राब रहा. मुलायम सिंह के पार्टी का प्रदर्शन पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले खराब होने का भी निर्णायक महत्त्व नहीं है.अहम बात यह है कि इनसे राजनीति के जिस मॉडल की बागडोर सँभालने की अपेक्षा की जा रही थी और इनके जनाधार की जो महत्वाकांक्षाएं थी, उसे पूरा करने में सभी नाकामयाब हो चुके हैं. यह एक सपने के टूटने की दास्तान है. यह सपना था भारत को बेहतर और सबकी हिस्सेदारी वाला लोकतंत्र बनाने और देश के संसाधनों पर खासकर वंचित समूहों की हिस्सेदारी दिलाने का. मायावती की बात करें तो दो दशक पहले जिस तेज-तर्रार नेता को देश ने उभरते हुए देखा था, अब की मायावती उसकी छाया भी नहीं लगतीं.’

बहरहाल 2009 में दिलीप मंडल ने सामाजिक न्याय के राजनीति के मंद पड़ने की जो घोषणा किया था, वह 2014 में और बदतर स्थिति में पहुँच गयी. 2009 के पराजय के बाद उन्हें सामाजिक न्याय की उग्र राजनीति की ओर लौटना था,पर वे खुद को नहीं बदले और अच्छे दिन लाने की उम्मीद जगा कर 2014 के लोकसभा में उतरे नरेंद्र मोदी नामक तूफ़ान के सामने उड़ से गए. सबसे बुरी स्थिति बसपा की हुई. सामाजिक न्याय से भारी दूरी बनाने के कारण मायावती जी की बसपा शून्य पर पर पहुँच गयी.2014 में मुखर बहुजन नेता रामविलास पासवान सामाजिक न्याय का खेमा बदलकर मोदी के साथ हो लिए. बहरहाल बहुजनवादी दलों में अगर 2009 में लोजपा; 2014 में  बसपा शून्य पर पहुंचने का रिकॉर्ड बनायीं तो 2019 में सामाजिक न्याय की बेहद मुखर पार्टी राजद शून्य पर पहुँच गयी. वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी के उदय के बाद बहुजनवादी पार्टियां चुनाव दर चुनाव अपनी स्थिति कारुणिक बनाती गईं. इसका प्रधान कारण यह रहा कि जिस सामाजिक न्याय के राजनीति की जोर से भाजपा को शिकस्त दी जा सकती थी, इन्होंने वह मुद्दा उठाया ही नहीं. एकमात्र अपवाद रहे लालू प्रसाद यादव जिन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में डाइवर्सिटी केन्द्रित मुद्दा उठाकर लोकप्रियता के शिखर पर काबिज मोदी की भाजपा को शिकस्त दे दिया.2015 के बाद हिंदी पट्टी में चार चुनाव हुए : 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव, 2019 में लोकसभा चुनाव, 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव और 2022 में फिर यूपी विधानसभा चुनाव. आश्चर्य की बात यह रही कि अज्ञात कारणों से यूपी और बिहार के बहुजन नेतृत्व ने इन चुनावों में सामाजिक न्याय से जुड़ा जरा भी मुद्दा नहीं उठाया. एक ऐसे दौर में जबकि मोदी सत्ता में आने के बाद राजसत्ता का अधिकतम इस्तेमाल निजीकरण, विनिवेशीकरण और लैटरल इंट्री के जरिये आरक्षण के खात्मे और संविधान के उद्देश्यों को व्यर्थ करने में कर रहे थे, इन्होंने चारों चुनावों में  आरक्षण को विस्तार देने वाला मुद्दा उठाया ही नहीं. जबकि इनके समक्ष लालू प्रसाद यादव का दृष्टांत था, जिन्होंने डाइवर्सिटी केन्द्रित हल्का सा मुद्दा उठाकर 2015 मोदी जी को आराम से शिकस्त दे दिया था. यदि इन्होंने कायदे से डाइवर्सिटी टाइप मुद्दा उठाया होता, मोदी की 2019 में न तो सत्ता में वापसी हो पाती और न ही बहुजनों के गुलामों की स्थिति में पहुचने की नौबत आती.

ऐसा लगता है मोदी के उत्तरोत्तर अप्रतिरोध्य बनते जाने के साथ अज्ञात कारणों से बहुजन नेतृत्व में सत्ता हासिल करने की इच्छाशक्ति मरती गयी, जबकि सत्ता में आने के बाद जिस तरह जूनून से मोदी आरक्षण के खात्मे और शक्ति के समस्त स्रोत सवर्णों के हाथ में देने में मुस्तैद हुए थे, उससे वंचित बहुजनों को आक्रोशित कर सत्ता दखल की बेहतर जमीन तैयार होने लगी थी. किन्तु जैसा पूर्व पंक्तियों में कहा कि इनमें सत्ता हासिल करने की इच्छाशक्ति ही विलुप्त सी हो गयी, इसलिए उन्होंने मोदी की बहुजन विरोधी नीतियों के सद्व्यवहार में कोई रूचि ही नहीं ली. अगर ऐसा नहीं होता तो वे कहते कि हम सत्ता में आने के 24 घंटे के अन्दर सवर्ण आरक्षण का खात्मा कर देंगे और जाति जनगणना कराकर उनको उनके संख्यानुपात में हर क्षेत्र में अवसर देंगे तथा उनके हिस्से का 65 से 75 प्रतिशत अतिरक्त अवसर दलित, आदिवासी पिछड़ो और अकलियतों के मध्य बाटेंगे. जिस तरह मोदीराज में लाभजनक सरकारी उपक्रमों को अन्धाधुन बेचा गया, वे कह सकते थे कि हम सत्ता में आने पर बेचीं गयी सरकारी कंपनियों और परिसंपत्तियों की समीक्षा कराएँगे और प्रयोजन होने पर पुनः राष्ट्रीयकरण करेंगे. वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति सहित सत्ता में आने पर सरकार के हर बहुजन विरोधी फैसलों को पलटने की बात कहकर अपने समर्थकों में सामाजिक न्याय का सपना दे सकते थे पर,इच्छाशक्ति ख़त्म होने के कारण ऐसा न कर सके.

सबसे बड़ी बात तो यह है कि मोदी सरकार ने अपनी बहुजन विरोधी नीतियों से सापेक्षिक वंचनाको तुंग पर पंहुचा दिया , किन्तु इच्छा शक्ति के अभाव में बहुजन नेतृत्व इसके  सद्व्यवहार से मीलों दूर रहे. क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब वंचित वर्गों में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है,तब उन में शक्ति संपन्न वर्ग के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी फूट पड़ती है और वे शासकों को सत्ता से दूर धकेल देते हैं.जिस तरह आज मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- पर बेहिसाब कब्जा कायम हुआ है, उससे सापेक्षिक वंचना के तुंग पर पहुंचने लायक आज जो हालात भारत में पूंजीभूत हुए  हैं,वैसे हालात विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं रहे: यहाँ तक कि फ्रांसीसी क्रांति और  रूस की जारशाही के खिलाफ उठी वोल्सेविक क्रांति में भी नहीं रहे !लेकिन मोदी सरकार द्वारा  लगातार देश को बेचने तथा बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुचाने का उपक्रम करते देखकर भी बहुजनवादी विपक्ष कभी सापेक्षिक वंचना के सद्व्यवहार के लिए आगे इसलिए नहीं आया, क्योंकि अदृश्य व अज्ञात कारणों से उसमें सत्ता हासिल करने की इच्छा शक्ति शायद विलुप्त हो गयी है. अतः जिन बहुजनवादी दलों में सत्ता में आने की चाह विलुप्त सी हो गयी, उनसे यह प्रत्याशा नहीं की जा सकती कि वे शक्ति के समस्त सोतों के वाजिब बंटवारे की हिमायत करने वाले बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के दस सूत्रीय एजेंडे में कोई रूचि लेंगे! ऐसे में इसे लागू करवाने के लिए अन्य विकल्पों पर विचार करना होगा!

बहनजी ने सीएम योगी पर बोला हमला, जानिए क्या है मामला

बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने मुख्यमंत्री योगी और उनकी सरकार पर जमकर हमला बोला है। कानपुर में हुई घटना से आहत बहनजी ने न सिर्फ इस मामले पर दुख जताया, बल्कि पीड़ित परिवार के लिए इंसाफ की भी मांग की है। दरअसल कानपुर देहात में अतिक्रमण हटाने के दौरान मां-बेटी की जल कर हुई मौत का मामला योगी सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा है। योगी प्रशासन की इस ज्यादती के खिलाफ देश भर में रोष है और हर कोई इसके लिए योगी सरकार की जमकर आलोचना कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने इस मामले में ट्विट किया है। अपने ट्विट में उन्होंने कहा कि- “देश व खासकर उत्तर प्रदेश जैसे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई व पिछड़ेपन आदि से त्रस्त विशाल राज्य में भाजपा सरकार की लोगों को अति-लाचार एवं आतंकित करने वाली बुल्डोजर राजनीति से अब निर्दोष गरीबों की जान भी जाने लगी हैं, जो अति-दुखद व निन्दनीय है। सरकार अपना जनविरोधी रवैया बदले।” बसपा प्रमुख ने कहा है कि- “कानपुर देहात जिले में अतिक्रमण हटाने के नाम पर हुई ज्यादती व आगजनी की घटना के दौरान झोपड़ी में रहने वाली माँ-बेटी की मौत तथा 24 घण्टे बाद उनके शव उठने की घटना यूपी सरकार के विज्ञापित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से ज्यादा चर्चाओं में है, ऐसे मंघ यूपी का जनहितकारी भला कैसे संभव?”

सवर्ण समाज के जो लोग भाजपा की सरकार को अपनी सरकार मानते हैं, इस घटना ने साफ कर दिया है कि सरकार किसी की नहीं होती, खासकर गरीब और वंचितों की तो बिल्कुल नहीं। घटना में पीड़ित परिवार का संबंध ब्राह्मण परिवार से बताया जा रहा है। इस घटना में मां-बेटी की अतिक्रमण हटाने के दौरान आग में जलकर मौत की घटना परेशान करने वाली है। परिवार के मुखिया कृष्ण गोपाल दीक्षित की चीत्कार करती हुई सामने आई तस्वीर किसी का भी कलेजा चीरने के लिए काफी है। यह तस्वीर योगी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े करती है। साफ है कि पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए। ऐसे में जब बहनजी भी खुलकर पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए आगे आ गई हैं, साफ है कि योगी सरकार और उसके प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है।

दो सौ रुपये के लिए दलित को मार डाला

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में जातिवादी किस कदर बेखौफ हैं यह आए दिन होने वाली घटनाओं से साफ हो गया है. ताजा घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जातिवादी गुंडों ने सिर्फ 200 रुपये के लिए दलित परिवार पर गोलियां चला दी। इस घटना में दलित परिवार के 35 साल के संजीव की मौके पर ही मौत हो गई जबकि बच्चों सहित एक अन्य युवक गोली लगने से घायल हो गया। घायलों की स्थिति गंभीर बनी हुई है।

घटना मुजफ्फरनगर जिले के जानसठ कोतवाली क्षेत्र के राजपुर कला गांव की है। मामला महज 200 रुपये के लेन-देन का था। इसको लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया। बात इतनी बढ़ गई की राजेन्द्र नाम के गुंडे ने अपने बेटे मोहित और एक अन्य साथी के साथ मिलकर अपनी लाइसेंसी बंदूक से दलित परिवार पर फायरिंग शुरू कर दी। जब तक किसी को समझ में आता और कोई बीच-बचाव को आता देर हो गई थी।

संजीव की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसका 4 साल का बेटा शौर्य, 5 साल की बेटी दिव्या और भाई मोहित गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना में मारा गया युवक और उसका परिवार वाल्मीकि समाज के हैं, जबकि आरोपी जाट समाज का है। मारे गए संजीव के घायल भाई मोहित का आरोप है कि वह दो सौ रुपये रख लेने की बात कह रहा था, लेकिन हमने उसके कोई पैसे नहीं रखे हैं। उसने अचानक गोली चला दी।

घटना को अंजाम देने के आरोपी आसानी से भाग निकले। तो दूसरी ओर प्रशासन ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए चार टीमों का गठन किया है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि जो भाजपा सरकार और उसके सीएम योगी आदित्यनाथ लगातार गुंडों को काबू में करने और गुंडों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाने की बात करने हैं उनके शासन में जातिवादी गुंडे क्यों नहीं काबू में आ रहे हैं। प्रदेश में दलितों पर अत्याचार आए दिन बढ़ता जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के एटा में भी एक रेस्तरां में योगेश यादव नाम के युवक को अपने चार साथियों के साथ सिर्फ इसलिए पीटा क्योंकि वो कुर्सी पर बैठ कर खा रहा था। योगेश याव ने पहले उसकी जाति पूछी, और फिर उसे पीटा।

बिहार क्यों आरएसएस-भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है?

केंद्र में भाजपा की सत्ता का आधार हिंदी पट्टी के 10 राज्य हैं। इन 10 राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं।
इन 10 प्रदेशों में लोकसभा की कुल 353 सीटों में 214 सीटें हैं यानि लोकसभा की करीब 61 प्रतिशत सीटें इन्हीं 10 राज्यों में हैं। शेष 143 सीटें यानि 39 प्रतिशत सीटें शेष 18 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में वितरित हैं।
2019 के लोकसभा चुनावों भाजपा को कुल 303 सीटों पर विजय मिली थी। जिसमें 178 सीटें हिंदी पट्टी के इन 10 राज्यों में मिली हैं। हिंदी पट्टी की 214 सीटों में से 178 सीटों पर भाजपा विजयी हुई थी। इन राज्यों में उसकी सफलता की दर 83 प्रतिशत से अधिक हैं।
दिल्ली की सभी सात सीटों, हरियाणा की सभी 10 सीटों और उत्तराखंड की सभी पांच सीटों पर भाजपा विजयी हुई। इन तीनों राज्यों में उसकी सफलता की दर 100 प्रतिशत रही। राजस्थान में उसे कुल 25 सीटों में से 24 सीटों पर जीत मिली।
यहां उसकी सफलता की दर 96 प्रतिशत रही। मध्यप्रदेश में उसे 29 सीटों में 27 सीटें मिलीं। यहां उसकी सफलता की दर 93 प्रतिशत रही। झारखंड में उसे 14 में से 12 सीटों पर विजय हासिल हुई। यहां उसकी सफलता की दर 86 प्रतिशत रही। छत्तीसगढ़ में उसे 11 सीटों में से 9 सीटों पर जीत हासिल हुई। यहां उसकी सफलता की दर 82 प्रतिशत रही।
उत्तर प्रदेश में उसे 80 सीटों में 62 सीटें मिलीं। यहां उसकी सफलता की दर 78 प्रतिशत रही। बिहार में उसे 40 सीटों में से 17 सीटें मिली। यहां उसकी सफलता की दर 42 प्रतिशत रही। 2014 में भाजपा को बिहार में 40 सीटों में से 22 सीटें मिली थीं। उस समय उसकी सफलता की दर 55 प्रतिशत थीं।
जहां हिंदी पट्टी के अन्य सभी शेष राज्यों में भाजपा की सफलता की दर 75 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक है, वहीं बिहार में उसकी सफलता की दर 42 प्रतिशत है। हिंदी पट्टी में बिहार एकमात्र राज्य है, जहां भाजपा आज तक विधान सभा चुनावों में अपने दम पर न तो बहुमत हासिल कर पाई है, न अभी तक अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बना पाई है।
प्रश्न यह आखिर भाजपा के सामने बिहार में कौन सी राजनीतिक और वैचारिक चुनौतियां हैं और कौन से सामाजिक समीकरण हैं, जिसके चलते बिहार हिंदी पट्टी में एकमात्र ऐसा किला बना हुआ है, जिसको पूरी तरह भाजपा फतह नहीं कर पाई है। यह मात्र संयोग है या इसके पीछे कुछ ठोस बुनियादी वजहें हैं या कुछ समय की बात है?

जातिवाद के दो बड़े मामले से दलित समाज में हलचल

IIT बॉम्बे के 18 साल के छात्र दर्शन सोलंकी ने हॉस्टल की सांतवी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। बी.टेक का छात्र दर्शन सोलंकी अहमदाबाद का रहने वाला था। उसने तीन महीने पहले ही इंजीनियरिंग कोर्स में दाखिला लिया था। 11 फरवरी को ही उसके पहले सेमेस्टर की परीक्षा समाप्त हुई थी, जिसके बाद 12 फरवरी को वह सातवीं मंजिल से कूद गया।

इसके बाद अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में इसे जातीय उत्पीड़न का मामला बताया है। तो कुछ लोग इसे पढ़ाई के दबाव के कारण उठाया गया कदम बता रहे हैं। हालांकि छात्र ने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा है, इस घटना के बाद कई तरह की सूचनाएं सामने आ रही हैं।

 इसी तरह के एक और मामले में स्कूल के प्रिंसिपल ने 11वीं के एक छात्र राजकुमार को इसलिए मारपीट कर के स्कूल से भगा दिया, क्योंकि उसने प्यास लगने पर बोतल से पानी पी लिया, जो प्रिंसिपल का था। यह घटना उत्तर प्रदेश के बिजनौर के अफजलगढ़ का है। पीड़ित राजकुमार सीरवासुचन्द्र स्थित चमनोदेवी इंटर कॉलेज में 11वीं का छात्र है। बीते 12 फरवरी को स्कूल में 12वीं के छात्रों का फेयरवेल था। जिसमें पीड़ित युवक पहुंचा था। युवक का आरोप है कि उसे प्यास लगी तो उसने सामने रखे बोतल से पानी पी लिया। जिसके बाद प्रिंसिपल योगेन्द्र कुमार और उसके भाई ने बोतल को अपनी बताते हुए उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक  शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसे स्कूल से भगा दिया। इस मामले में भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

 अगर दोनों मामलों को साथ मिलाकर देखें तो साफ है कि दोनों मामले जातिवाद के होते हुए भी अलग हैं। पहले मामले में छात्र ने खुदकुशी कर ली, जबकि दूसरे मामले में पीड़ित ने खुद को प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवा दिया। दरअसल जातिवाद ऐसी चीज है, जिसे रोकना दलित समाज के वश में नहीं है। घर से बाहर निकलने पर तमाम लोगों को जातिवाद झेलना ही पड़ता है। खासकर युनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए जाने वाले युवाओं को तो इसका ज्यादा ही सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपने बच्चों को जातिवाद से लड़ने की ट्रेनिंग दें। उन्हें यह बताएं कि जाति का सवाल उनके सामने आएगा, और जब आएगा तो उससे कैसे निपटना है। ताकि वो जातिवाद के खिलाफ लड़ें, जातिवादियों को मुंहतोड़ जवाब दें, न कि हथियार डाल दें और हॉस्टल की बिल्डिंग से छलांग लगा दें।

बी.आर. अंबेडकर को कहा ‘बीयर अंबेडकर’, मामला दर्ज

बेंगलुरु के जैन युनिवर्सिटी में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का अपमान का मामला सामने आया है। जिसके बाद जैन युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर मैनेजमेंट स्टडीज के प्रिंसिपल दिनेश नीलकांत और 7 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दरअसल इन सभी पर कॉलेज में नाटक के दौरान बाबासाहेब आंबेडकर और दलित समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है। जिसके बाद सभी आरोपियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत IPC 153A,149, 295A  के तहत मामला दर्ज किया गया है।

 विश्वविद्यालय के छात्रों की ओर से किए गए नाटक का एक वीडियो कुछ दिनों पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें युनिवर्सिटी के 6 दलित छात्रों और डॉ. आंबेडकर को अपमानजनक तरीके से दिखाया गया था, जिसके बाद लोग नाराज हो गए। इस नाटक में दलितों का मजाक उड़ाया गया और डॉ. बी. आर. आंबेडकर को ‘बीयर अंबेडकर’ कहा गया।

4 फरवरी को कॉलेज के ही कुछ छात्रों द्वारा नाटक देखने के बाद इसे जातिवादी  नाटक करार दिया गया और इसके खिलाफ ऑनलाइन याचिका दायर की गई। हैरानी की बात यह है कि इस नाटक को प्ले करने से पहले उसकी स्क्रिप्ट को कई लोगों ने देखा और उसे मंजूरी भी दे दी गई। अब आरोपियों से सार्वजनिक मांफी मांगने की मांग की जा रही है।

दरअसल पिछले कुछ दिनों में भारत रत्न और संविधान निर्माता डॉ. बी आर आंबेडकर के खिलाफ बोलने और उनके सार्वजनिक अपमान की घटनाएं बढ़ी हैं। पहले सिर्फ गांवों से बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमाओं को तोड़ने की खबरें आती थी, लेकिन वर्तमान में पढ़े-लिखे लोगों के बीच भी डॉ. आंबेडकर का मजाक बनाए जाने और उन्हें अपमानित करने की घटनाएं तेज हो गई हैं। कई लोग डॉ. आंबेडकर के फॉलोवर को ‘भीमटा’ कह कर संबोधित करते दिखते हैं, इससे बाबासाहेब और दलित समुदाय को लेकर उनके मन में भरा जहर सामने आ जाता है। बेंगलुरू की घटना भी ऐसी ही घटना है।

बीबीसी पर इंकम टैक्स विभाग की रेड

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पूरी भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यह साबित कर दिया है कि वह अव्वल दर्जे के तानाशाह हैं। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करेगा, वो उसे बख्शेंगे नहीं। जी हां, जिस बीबीसी ने पिछले दिनों गुजरात दंगों और रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर वीडियो सीरीज को रिलिज किया था, उसके दफ्तर पर आज आयकर विभाग ने छापा मारा है।

हालांकि विभाग इसे सर्वे बता रहा है, रेड नहीं। उनका कहना है कि अियमितताओं के इनपुट्स के आधार पर बीबीसी से जुड़े कुछ मामलों की जांच की जा रही है। दिल्ली के अलावा बीबीसी के मुंबई दफ्तर पर भी आयकर अधिकारी पहुंच गए हैं।

दिल्ली के क्नॉट प्लेस में मौजूद बीबीसी के दफ्तर में इंकम टैक्स के 60-70 लोगों की टीम पहुंची। इस दौरान स्टॉफ के फोन बंद करा दिये गए और यहां हर किसी के आने-जाने पर रोक लगा दी गई। इसकी जो वजह बताई जा रही है उसमें कहा जा रहा है कि बीबीसी पर इंटरनेशनल टैक्स में गड़बड़ी का आरोप है। इसकी सूचना बाहर आते ही विपक्ष ने भाजपा सरकार पर हमला बोल दिया है। कांग्रेस ने इसे अघोषित आपातकाल बताया है।

दरअसल कुछ दिन पहले ही बीबीसी ने गुजरात दंगों और रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर वीडियो सीरीज जारी किया था, जिसके बाद हंगामा मच गया था। मोदी सरकार इससे इस कदर परेशान हो गई कि उसने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को ही बैन कर दिया। और अब बीबीसी दफ्तर में इंकम टैक्स के अधिकारी पहुंच गए हैं। साफ है कि मोदी सरकार बीबीसी को सबक सिखाने के मूड में है।

मोदी सरकार पहले ही अडानी मामले को लेकर चारो ओर से घिरी हुई है। विपक्ष की घेराबंदी के बावजूद न तो सरकार का कोई मंत्री और न ही प्रधानमंत्री मोदी ही अडानी पर कुछ कह रहे हैं। मोदी सरकार पर अक्सर मीडिया को दबाने का आरोप भी लगता है। इसी कारण तमाम सोशल एक्टिविस्ट भारतीय मीडिया को गोदी मीडिया कहते रहे हैं। लेकिन इस बीच में यह माना जा रहा था कि भारत में काम करने वाली विदेशी मीडिया स्वतंत्र है। लेकिन बीबीसी पर आयकर विभाग के छापे ने साबित कर दिया है कि चाहे भारतीय मीडिया हो या फिर विदेशी मीडिया, मोदी सरकार में किसी को भी सरकार और उसके आका के खिलाफ कुछ भी कहने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लेकिन सोचना होगा कि क्या यह भारत के लोकतंत्र के लिए ठीक है?

अंबेडकर जिंदा होते तो उन्हें गोली मार देता- दलित नेता

राजनीति जो न करवाए। जी हां, सत्ता की लालच आज के राजनेताओं को इतना गिरा दे रही है कि वो उल-जलूल कोई भी बयान देने को तैयार रहते हैं ताकि किसी ‘खास’ की नजर में हीरो बन सके। दरअसल तेलंगाना में दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले और खुद को दलितों का नेता कहने वाले हमारा प्रसाद नाम के व्यक्ति ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि अगर डॉ. आंबेडकर आज जिंदा होते तो वह उन्हें उसी तरह से गोली मार देता, जैसे गोडसे ने गांधी को मारा था।

यह बयान देने वाला हजारा प्रसाद खुद को राष्ट्रीय दलित सेना का संस्थापक कहता है। डॉ. आंबेडकर की किताब ‘रीड्ल्स इन हिंदुइज्म’ को दिखाते हुए उसका कहना है कि डॉ. आंबेडकर ने हिन्दुओं की भावनाओं को आहत किया है। इस वीडियो के सामने आने के बाद बवाल मचा है। तेलंगाना में बहुजन समाज पार्टी के नेता और पूर्व आपीएस अधिकारी डॉ. आर.एस. प्रवीण कुमार ने इस वीडियो को साझा करते हुए ओरोपी हमारा प्रसाद को गिरफ्तार करने और कठोर कार्रवाई करने की मांग की। इसके बाद हैदराबाद की पुलिस ने हमारा प्रसाद के खिलाफ आईपीसी की धारा 153ए और 505 (2) के तहत मामला दर्जकर उसे गिरफ्तार कर लिया है।

दरअसल इन दिनों कुछ दलित नेताओं में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से निकटता करने की होड़ मची है। वह खुद को हिन्दुवादी साबित कर भाजपा से कोई राजनैतिक पद हासिल करने की जुगाड़ में लगे रहते हैं। इसके लिए सबसे आसान तरीका अंबेडकर की आलोचना और हिन्दू धर्म की तारीफ का है। हमारा प्रसाद की कोशिश भी कुछ ऐसी ही दिखती है। बता दें कि इन दिनों रामदास अठावले नाम के नेता भी संसद के भीतर लगातार मोदी की शान में कविताएं पढ़ते हुए दिखते हैं। अठावले जब भी बोलने के लिए खड़े होते हैं, उनका एकमात्र लक्ष्य भाजपा और उससे भी ज्यादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करना होता है। ऐसा कर वह अक्सर खुद ही मजाक बन जाते हैं, लेकिन अठावले रुकते नहीं।