सिर्फ अमित शाह नहीं, कांग्रेस के ये दिग्गज नेता भी हैं बिहार दौरे पर

पटना। जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गठबंधन और सीटों की रार सुलझाने के लिए बिहार दौरे पर हैं, ऐसे में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता भी पटना पहुंचे हैं. कांग्रेस कमेटी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत दो दिवसीय दौरे पर बिहार में हैं. पटना पहुंचे गहलोत ने इस दौरान आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से उनके आवास जाकर मुलाकात की. 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उनका ये दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

अपने दौरे के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जहां नीतीश कुमार से सीटों का मसला हल करने में जुटे रहें वहीं अशोक गहलोत भी 2019 चुनाव के मद्देनजर अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करते रहें. माना जा रहा है कि एनडीए के साथ महागठबंधन में भी सीटों के बंटवारे पर पेंच फंस सकता है. इसी के चलते गहलोत सक्रिय हो गए हैं. वे अपने दो दिवसीय दौरे के जरिए बिहार में कांग्रेस संगठन की जमीनी हकीकत को समझने के लिए विचार-विमर्श करेंगे. इस दौरान गहलोत द्वारा राजद से गठबंधन की संभावना भी टटोले जाने की बात सामने आई है.

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अमित शाह के दौरे के बावजूद बिहार में नहीं सुलझा ‘छोटे’ और ‘बड़े भाई’ का मामला

पटना। बिहार की अपनी यात्रा पर गुरुवार को पहुंचे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने घोषणा किया है कि जदयू के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा. नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद पटना के ज्ञान भवन में आयोजित भाजपा कार्यकर्ता सम्मेलन में अमित शाह ने यह घोषणा की. शाह ने कहा कि हम एकजुट हैं और भाजपा को अपने सहयोगियों को संभालने आता है. अमित शाह ने यह भी दावा किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में सभी 40 सीटों पर हमारे प्रत्याशी विजयी रहेंगे हालांकि उन्होंने इस बारे में चुप्पी साधे रखी कि कौन कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगा.

इससे पहले पटना पहुंचने के बाद एयरपोर्ट पर अमित शाह का स्वागत बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय, बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने स्वागत किया. शाह वहां से स्टेट गेस्टहाउस पहुंचे, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सुबह का नाश्ता किया. दोनों के बीच लगभग 45 मिनट तक बात हुई. खबर है कि इस बातचीत में अमित शाह और नीतीश कुमार ने 2019 चुनाव में गठबंधन की संभावनाओं और सीटों की संख्या पर अपनी-अपनी राय रखी. अब रात को डिनर पर दोनों नेता एक बार फिर से चर्चा करेंगे.

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FIFA WC 2018: क्रोएशिया ने इंग्‍लैंड को हराकर रचा इतिहास, फ्रांस से होगी खिताबी भिड़ंत

नई दिल्ली। फीफा वर्ल्ड कप 2018 में उलटफेरों का दौर सेमीफाइनल में भी जारी रहा. रूस में खेले गए दूसरे सेमीफाइनल मैच में क्रोएशिया ने इंग्लैंड को 2-1 से हरा दिया. एक गोल से पिछड़ने के बाद अतिक्ति समय में 109वें मिनट में मारिया मांड्जुकिक के गोल के दम पर क्रोएशिया ने फीफा विश्व कप के 21वें संस्करण के फाइनल में जगह बना ली है.

क्रोएशिया पहली बार विश्व कप के फाइनल में पहुंचा है जहां उसका सामना रविवार को 1998 की विजेता फ्रांस से होगा. वहीं इंग्लैंड तीसरे स्थान के मैच के लिए शनिवार को बेल्जियम से भिड़ेगा.

क्रोएशिया पहले हाफ में एक गोल से पीछे थी, लेकिन दूसरे हाफ में उसने मैच का पासा पलट दिया और बराबरी का गोल किया. तय समय में मैच 1-1 की बराबरी पर खत्म हुआ और मैच अतिरिक्त समय में गया जहां मांड्जुकिक ने गोल कर अपनी टीम के लिए इतिहास रचा. मांड्जुकिक ने यह गोल ईवान पेरीसिक के पास पर किया. पेरीसिक ने बॉक्स के अदंर मांड्जुकिक को गेंद दी जिन्होंने बेहद आसानी से उसे गोल के निचले कोने में डाल अपनी टीम को निर्णायक 2-1 की बढ़त दिलाई जो विजयी साबित हुई.

इंग्लैंड को इस मैच में अपनी गलतियों पर काफी पछतावा हो रहा होगा. पांचवें मिनट में ही 1-0 से आगे होने के बाद उसके पास तीन से चार गोल करने के बेहद आसान और साफ मौके आए, लेकिन इंग्लैंड के कप्तान और इस विश्व कप में अभी तक सबसे ज्यादा छह गोल करने वाले हैरी केन, जेसे लिंगार्ड और रहीम स्टर्लिग अहम मैच में आसान से मौकों को भी नहीं भुना पाए. अगर यह खिलाड़ी अपने पास आए मौकों पर गोल कर देते तो इंग्लैंड तय समय में क्रोएशिया को मात दे देता.

शायद किस्मत को भी कुछ और मंजूर था. क्रोएशिया शुरुआती पलों में भी गोल खाने के बाद डिगी नहीं और उसने शानदार वापसी करते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की.

इंग्लैंड को इस अहम मैच में जिस तरह की शुरुआत चाहिए थी वो उसे मिली. पांचवें मिनट में ही कीरान ट्रिपिर ने गोल कर इंग्लैंड को बढ़त दिलाई.

इंग्लैंड को फ्री किक मिली जिसे ट्रिपिर ने गोल के बाएं कोने में डाल अपनी टीम को 1-0 से आगे कर दिया. इसके बाद इंग्लैंड के पास कई मौके आए जब वो अपनी बढ़त को दोगुना या तीनगुना कर सकती थी, लेकिन एक भी मौके पर वो सफल नहीं रही.

15वें मिनट में उसे कॉर्नर मिला. हैरी मैग्यूर इस मौके पर सही हेडर नहीं लगा पाए. केन 30वें मिनट में क्रोएशिया के गोलकीपर को छका नहीं पाए. उनके पास रिबाउंड पर भी गोल करने का मौका था और इस बार भी कप्तान विफल रहे. 36वें मिनट में लिंगार्ड ने गेंद को बाएं कोने से बाहर खेल आसान सा मौका खो दिया.

क्रोएशिया हालांकि इस बीच शांत नहीं रही. अपनी मजबूत मिडफील्ड के लिए जानी जाने वाली इस टीम ने 19 से 23वें मिनट के भीतर तीन मौके बनाए. पेरीसिक ने अच्छी तरह से अपने लिए स्पेस बनाने के बाद गेंद को गोल पोस्ट में डालना चाहा, लेकिन उनका शॉट वॉल्कर से पैर से टकरा गया.

अगले ही मिनट एंटे रेबिक ने इंग्लैंड के एश्ले यंग को तो छका दिया लेकिन वो जॉन स्टोन्स को पार नहीं कर पाए. 23वें मिनट में पेरीसिक एक बार फिर गेंद को नेट में डालने से चूक गए.

पहले हाफ में एक गोल खाने के बाद दूसरे हाफ में क्रोएशिया ने वो खेल दिखाया जिसने इंग्लैंड को मिनट दर मिनट बीतने के साथ ही पीछे धकेला. वो ज्यादा अटैक कर रही थी और गेंद को उसने अपने पास भी ज्यादा रखा. वहीं इंग्लैंड ने इस हाफ में कुछ और मौके गंवाए.

क्रोएशिया हिम्मत नहीं हार रही थी और 68वें मिनट में पेरीसिक ने बराबरी का गोल दाग कर उसमें नई जान फूंक दी. पेरीसिक ने वॉल्कर को छकाते हुए गेंद सिमे वसाल्जको को दी जिन्होंने पेरीसिक को रिटर्न पास दिया और इस बार पेरीसिक ने मौका नहीं गंवाया.

इस गोल ने क्रोएशिया की टीम में उत्साह भर दिया. तीन मिनट बाद उसने अपने स्कोर का आंकड़ा दो कर दिया होता लेकिन पहले पेरीसिक की किक गोलपोस्ट से टकरा कर वापस आ गई और फिर रेबिक रिबाउंड पर गोल नहीं मार पाए.

यहां से क्रोएशिया ने पूरी तरह से इंग्लैंड पर दवाब बना लिया, हालांकि इस दवाब में इंग्लैंड के गोलकीपर जॉर्न पिकफोर्ड बिना किसी परेशनी के अपना काम करते रहे और क्रोएशिया को कई मौकों पर दूसरा गोल करने से महरूम रखा. नतीजन मैच तय समय में बराबरी पर खत्म हुआ.

अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ में मांड्जुकिक ने बेहतरीन गोल कर क्रोएशिया को जीत पक्की की.

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बच्चियां अब बच्ची नहीं रह गई

प्रतीकात्मक चित्र

आज से बमुश्किल दस साल पहले तक जब लड़कियां दस-बारह साल की हो जाती थी तो उन्हें एक लड़की के तौर पर देखा जाता था. उनके कपड़े और हावभाव को समाज बतौर लड़की देखने लगता था. लेकिन इन कुछ सालों में सब कुछ बदल सा गया है. अब तो जन्म लेते ही लड़का और लड़की की पहचान अलग हो गई है. अब वो जन्मते ही लड़की है, तभी तो छह महीने तक की बच्चियों के साथ भी लोग हैवानियत करने से नहीं चूकते हैं. आज के वक्त में बच्चियां बच्चियां नहीं रह गई हैं, वो पैदा होते ही लड़की बन जा रही है.

21 जून 2018 के हिन्दुस्तान अखबार में चार साल की बच्ची से गैंगरेप की खबर प्रकाशित हुई थी जो मन को झकझोरने वाली थी. तो वहीं बिहार से एम्स में इलाज कराने के लिए पहुंची एक किशोर लड़की ने यह कह कर डॉक्टर को चौंका दिया कि उसका पिता पिछले कई सालों से उसके साथ रेप कर रहा था. रिश्तेदारों और पड़ोसियों द्वारा तो बच्चियों के यौन शोषण की खबरे आम है. हमें पहले बेटी बचाओ का नारा देकर उसे पूरा करना चाहिए, क्योंकि आज छोटी बच्चियां सबसे सॉफ्ट टारगेट हो गई है. वो प्रतिरोध नहीं कर सकती, आसानी से बहलाई फुसलाई जा सकती हैं. सो इन्हें अपना शिकार बनाना मानसिक रोगियों के लिए सबसे आसान हो जाता है.

रिपोर्ट और आंकड़ों की बात करें तो बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले में साउथ अफ्रीका पूरे विश्व में नंबर वन पर आता है. 2009 में आई ट्रेड यूनियन सॉलिडेटरी हेल्पिंग हैण्ड के रिपोर्ट के मुताबिक साउथ अफ्रीका में हर तीसरे मिनट एक बच्चे के साथ रेप होता है. 2009 में ही इसी देश के मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने बताया कि हर चार में से एक व्यक्ति ने किसी का रेप करने की बात स्वीकार की है. यहां के मर्द इसे क्राइम नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि लड़कियां रेप को इन्जॉय करती हैं. दैनिक टेलीग्राफ के अनुसार सन् 2000 में साउथ अफ्रीका में रेप और यौन उत्पीड़न के 67 हजार केस दर्ज हुए हैं. यहां के लोगों की मान्यता है कि किसी वर्जिन लड़की के साथ सेक्स करने से एड्स ठीक हो जाता है. उनकी यही सोच उन्हें कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने के लिए उकसाती है. ये दोनों तर्क कितने बेबुनियाद और कमअक्ल लोगो के हैं, आप समझ सकते हैं.

बच्चियों से बलात्कार के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स 2013 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले महामारी के स्तर पर पहुंच गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 2001 से 2011 के बीच 48 हजार से ज्यादा बच्चों के रेप केस दर्ज हुए, जिसमें 2001 में 2113 केस थे तो 2011 में 7112 केस दर्ज हुए. सबसे दुख की बात यह है कि बच्चों के साथ सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न उनके पिता, भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी और टीचर ही करते हैं. भारत सरकार की 2007 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे भारत में 12 हजार 500 बच्चे जो कुल बच्चों की आबादी का 53 प्रतिशत है और जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे, बराबरी में यौन उत्पीड़न के शिकार हुए.

इस सूची में जिम्बांबे तीसरे नंबर पर आता है. सन् 2011 में बच्चों के ऊपर हुए रेप की संख्या यहां 3172 थी. सन् 2009 में गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार सालों में 30 हजार लड़के तथा लड़कियों का इलाज किया गया जो यौन उत्पीड़न के शिकार थे. इन देशों के अलावा विकसित देशों की गिनती में आने वाले देश यूके और यूएस में भी बच्चों के साथ होने वाले रेप और यौन उत्पीड़न की संख्या कम नहीं है. ये देश बाल उत्पीड़न और रेप के मामले में विश्व में क्रमशः चौथे और पांचवे नंबर पर हैं. 2012-13 में 18,915 बाल यौन उत्पीड़न के केस सिर्फ इंग्लैंड में दर्ज हुए. ये नेशनल सोसायटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रूआलिटि टू चिल्ड्रेन (NSPCC) की रिपोर्ट कहती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक यूके में 20 में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार होता है और 90 फीसदी बच्चे अपने जानने वालों से उत्पीड़ित होते हैं. वहीं यूएस के स्वास्थ विभाग के 2010 के रिपोर्ट के मुताबिक 16 फीसदी किशोर जिनकी उम्र 14 से 17 साल की होती है, यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं.

आंकड़ें और रिपोर्ट तो फिर भी सारी सच्चाई बयान नहीं करते मगर ये रिपोर्ट हमें झकझोरने के लिए काफी है. जहां बच्चे अपने घरों में, पड़ोस में और स्कूल में ही सुरक्षित नहीं हैं तो फिर वो कहां सुरक्षित होंगे. जब बेटियां बाप से असुरक्षित हैं, बहनें भाई से असुरक्षित हैं, बच्चे अपने शिक्षक से असुरक्षित हैं तो फिर आखिर किस पर विश्वास किया जाए. ये कैसी दुनिया हो गई है, जहां हर तरफ असुरक्षा का माहौल है.

– लेखिका शिक्षिका हैं. स्त्री मुद्दों पर लिखती हैं. संपर्क- raipuja16@gmail.com

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मुन्ना बजरंगी की हत्या ईश्वर ने की है- भाजपा विधायक

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में बयान बहादुरों की कमी नहीं है. एक ओर पीएम मोदी जहां बेधड़क बोलते दिखते हैं तो वहीं उनके नेता भी उन्हीं का अनुसरण करते हैं. ऐसे ही भाजपा के एक बयान बहादुर विधायक सुरेंद्र सिंह ने एक बार फिर अजीबो गरीब बयान दिया है. माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की हत्या पर विधायक ने कहा कि “डॉन मुन्ना बजरंगी की हत्या ईश्वर ने करवाई है, हालांकि संविधान उसकी हत्या में रुकावट बना था लेकिन आखिरकार ईश्वर उसकी हत्या करने में सफल हो गए.” ये वही विधायक है जिसने बलात्‍कार की बढ़ती घटनाओं पर कहा कि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भगवान राम भी आ जाएंगे तो इन घटनाओं (रेप) पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं है. यह सामाज का स्वाभाविक प्रदूषण है, जिससे कोई भी वंचित नहीं रहने वाला है. सुरेन्द्र सिंह यूपी के बैरिया से बीजेपी के विधायक हैं. गौरतलब है कि माफिया मुन्ना बजरंगी की हत्या कर दी गई थी. उसके शरीर पर सात गोलियां लगीं थीं. पुलिस ने गटर साफ कराकर उसमें से घटना में प्रयुक्त पिस्तौल, दो मैगजीन और 22 कारतूस बरामद कर लिये हैं. इस मामले में आरोपी हमलावर सुनील राठी को न्यायालय से रिमांड पर लेकर उससे पूछताछ की जा रही है. इस बीच विधायक के बयान का मजाक उड़ाया जा रहा है और इससे भाजपा की किरकिरी हो रही है. इसे भी पढ़े-तो क्या गुजरात पहुंचे मोहन भागवत के निशाने पर मोदी थे
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तो क्या गुजरात पहुंचे मोहन भागवत के निशाने पर मोदी थे

राजकोट। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रांत प्रचारकों की वार्षिक बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत गुजरात आए हैं. इससे पहले एयरपोर्ट पर जब पत्रकारों ने उनसे कुछ सवाल का जवाब चाहा तो मोहन भागवत ने ऐसा जवाब दिया, जिससे पत्रकार चौंक गए. इसके बाद पत्रकार भागवत के ‘उस’ बयान का मतलब निकालने में जुट गए हैं.

दरअसल एयरपोर्ट पर जब पत्रकारों ने भागवत से अपने सवालों के जवाब जानने चाहे तो संघ प्रमुख ने कहा कि “अगर मैं बोला तो मेरी नौकरी चली जाएगी, बोलने का काम किसी और को दिया गया है.” भागवत के इस बयान के बाद कयास है कि उनका निशाना नरेंद्र मोदी की ओर है.

दरअसल अखिल भारतीय प्रांत प्रचारकों की तीन दिवसीय सालाना बैठक 15 -17 जुलाई तक गुजरात के सोमनाथ में होने वाली है. इसको लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत 12 से 18 जुलाई तक सोमनाथ में रहेंगे. इस तीन दिवसीय बैठक में संघ प्रमुख, संघ के सर कार्यवाह भैया जोशी के अलावा सभी सह सर कार्यवाह, कार्यकारिणी सदस्य, क्षेत्र प्रचारक, प्रांत प्रचारक और सह प्रांत प्रचारक हिस्सा लेंगे. माना जा रहा है कि इस बैठक में आगामी लोकसभा व तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ देश के सामाजिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक विकास के मुद्दों पर मंथन होगा.

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मध्यप्रदेश में अम्बेडकर और संत रैदास का अपमान

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छतरपुर। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार जहां अपने आपको दलित हितैषी बता रही हैं वही दूसरी ओर यही सरकार दलितों पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाने में नाकाम है. मामला छतरपुर जिले के बमीठा थाना क्षेत्र में आने वाले कुटिया ग्राम पंचायत का है, जहां दलितों के साथ मारपीट की गई और बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और संत रैदास का अपमान किया गया.

छत्तरपुर के कुटिया में अहिरवार समाज के लोग बाबा साहब डॉ अम्बेडकर और संत रविदास जी के बैनर तले कन्या भोज का कार्यक्रम कर रहे थे. इस दौरान डी.जे. में संत रविदास जी की आरती बज रही थी. यह बात वहां के सामंती समाज को बर्दास्त नहीं हुई. वो वहां आकर गाली गलौच करने लगे और संविधान निर्माता बाबा साहब का बैनर और अन्य सामान कुएं में फेंक दिया. इस दौरान उन्होंने मोके पर मौजूद दलितों के साथ मारपीट की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी.

किसी तरह पीड़ितों ने मामले की जानकारी पुलिस को 100 पर दी, तब जाकर मामला दर्ज हो पाया. स्थानीय थाने में sc/st एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है. तो वहीं दलितों में बाबासाहेब और संत रविदास के अनादर को लेकर गुस्सा है. उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है. उनका कहना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी तक लड़ाई जारी रहेगी. रिपोर्ट- कालीचरण अहिरवार

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बहनजी के चुनाव लड़ने की खबर से राजनीतिक हलचल तेज

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। खबर है कि बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. चर्चा गरम है कि पार्टी बसपा प्रमुख के लिए सुरक्षित सीट तलाश करने में जुट गई है. इस खबर के आने के बाद देश की राजनीति में अचानक से हलचल तेज हो गई है. इस खबर के सामने आने के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी सकते में है तो वहीं बसपा कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह है.

बसपा प्रमुख के अम्बेडकर नगर चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने की खबर भी आ रही है. यह सीट बसपा के लिए सुरक्षित सीट मानी जाती है. मायावती ने अपना आखिरी लोकसभा चुनाव भी इसी सीट से लड़ा था. 2009 के पहले यह सीट अकबरपुर के नाम से जानी जाती थी. विधानसभा चुनाव में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बावजूद बसपा अपना यह गढ़ बचाने में कामयाब रही. इस लोकसभा क्षेत्र की तीन विधानसभा सीटों पर बसपा का कब्जा है. साल 1998, 1999 और 2004 में मायावती इस सीट से लोकसभा में जा चुकी हैं.

साल 2003 में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मायावती ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था. 2004 में अम्बेडकर नगर सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद कुछ समय बाद मायावती ने इस्तीफा देकर राज्यसभा की सदस्यता ले ली थी. तब से वह राज्यसभा की सदस्य रही हैं. पिछले साल सहारनपुर मामले के बाद उन्होंने राज्यसभा सीट से भी इस्तीफा दे दिया था.

आइडिया-वोडाफोन विलय को सरकार ने दी मंजूरी

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नई दिल्ली। दूरसंचार मंत्रालय ने सोमवार को वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्युलर के विलय को सशर्त मंजूरी दे दी. इस विलय के बाद बनने वाली नई कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी.सूत्रों ने बताया, ‘‘दूरसंचार विभाग ने सोमवार को वोडाफोन-आइडिया के विलय को मंजूरी दे दी. अंतिम अनुमति के लिए उन्हें कुछ शर्तों का पालन करना होगा.’’ विभाग ने आइडिया सेल्युलर को वोडाफोन के स्पेक्ट्रम के लिए 3,926 करोड़ रुपये का नकद भुगतान करने और 3,342 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी जमा कराने के लिए कहा है.

गौरतलब है कि विलय के बाद बनने वाली कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी जिसका मूल्य डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक (23 अरब डॉलर) होगा. नयी कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 35% होगी और इसके ग्राहकों की संख्या लगभग 43 करोड़ होगी.

इस विलय से कर्ज के बोझ में दबी दोनों दूरसंचार कंपनियों को थोड़ी राहत मिलेगी क्योंकि बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी. दोनों कंपनियों का कुल ऋण करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है.

विलय के बाद बनने वाली कंपनी देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी होगी जिसका मूल्य डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक (23 अरब डॉलर) होगा.

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अप्रैल विद्रोह

5 अप्रैल को देश भर के दलितों में भयंकर गुस्सा था. दो अप्रैल के आंदोलन के बाद उनका गुस्सा बढ़ गया था. खासतौर पर भाजपा शासित राज्यों में हालात ज्यादा बुरे थे. और चूंकि देश के अधिकांश राज्यों में सत्ता पर भाजपा का कब्जा है, सो पूरे देश के हालात बुरे थे. असल में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ 2 अप्रैल को देश भर के दलित सड़कों पर थे. जिसके बाद इस आंदोलन की कमर तोड़ने के लिए दलित युवाओं और आंदोलनकारियों की धर-पकड़ जारी थी.

‘दलित दस्तक’ के स्थानीय प्रतिनिधियों ने जो जानकारी मुहैया कराई, उसके मुताबिक इस आंदोलन के बाद देश के कई हिस्सों में दलितों पर पुलिस का कहर टूट पड़ा. हरिद्वार में 43 लोगों को गिरफ्तार किया गया. अलीगढ़ के खैर में 125 लोगों पर कार्रवाई हुई. मुजफ्फरनगर में 60 गिरफ्तारियां हुई, जिनमें कुछ की जमानत हो गयी कुछ अभी जेल में हैं बाकी अभी धर पकड़ जारी है. सहारनपुर में 900 लोगों पर अज्ञात एफआईआर हुई है. यह तब है जबकि सहारनपुर में विरोध प्रदर्शन शांति पूर्वक निकला था. मेरठ में गिरफ्तारियों का आंकड़ा 200 के पार था. बुलंदशहर में 135 की गिरफ्तारी हुई थी और उस तारीख तक किसी की बेल नहीं हुई थी. मथुरा में 600 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई तो मध्य प्रदेश के दतिया में यह आंकड़ा 250 था.

बिहार के छपरा जिले में दाउदपुर थाना क्षेत्र के हर्षपुरा गांव से रोशन कुमार ने दलित दस्तक को बताया कि 2 अप्रैल के दो दिन पहले उनके गांव में ऊंची जाति के लोगों ने संगठित होकर दलितों के ऊपर हमला किया और उन्हें यह धमकी देते रहे कि “अब तो सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को निष्प्रभावी बना दिया है. अब तुम दलित कहां जाओगे, क्या करोगे.” जयपुर से रिपोर्ट आई कि ज्योति नगर थाने में 20-25 के करीब अनुसूचित जाति एवं जनजाति के युवकों को पुलिस ने धर दबोचा और उनके साथ मारपीट की थी. उनमें से कइयों की परीक्षा भी चल रही थी. राजस्थान के ही बाड़मेर में 300 से अधिक जबकि नीम का थाना में 150 के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट दर्ज हुई.

ग्वालियर, मुरैना और भिंड में हालात इतने खराब हो गए थे कि दलितों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था. चंडीगढ़ में करीब 250 अम्बेडकरवादियों की गिरफ्तारी हुई, हालांकि उन्हें शाम को रिहा कर दिया गया. अजमेर से दो दर्जन युवाओं के गिरफ्तारी की खबर मिली. इसमें तमाम शहरों में पुलिस ने युवाओं पर 3 से 4 धाराओं में केस दर्ज किया, ताकि वे आसानी से बाहर न आ सकें. जाहिर है कि देश में इतने ही शहर नहीं हैं. तमाम शहरों की रिपोर्ट हम तक पहुंच भी नहीं पाई.

खास तौर पर उत्तर प्रदेश के हापुड़ और मेरठ में तो 2 अप्रैल के आंदोलन के बाद कई दिनों तक पुलिस लगातार दबिश देती रही. यहां ज्यादातर 18-30 साल के युवाओं को निशाना बनाया गया. पुलिस ने घर में घुस-घुस कर उन्हें गिरफ्तार किया. इस दौरान घऱ की महिलाओं से भी बदतमीजी की खबर है. पुलिस वालों का अत्याचार जब हद से आगे बढ़ गया तो मेरठ में महिलाओं ने जिला मुख्यालय पर धरना देकर अपने बच्चों की गिरफ्तारी और खुद से छेड़छाड़ का विरोध किया.

असल में ये सारी धर-पकड़ सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट में हुए संसोधन के खिलाफ 2 अप्रैल को सड़क पर उतरे दलितों के विरोध प्रदर्शन के बाद की गई थी. इस आंदोलन के बाद दलितों को न सिर्फ पुलिस के अन्याय का सामना करना पड़ा, बल्कि कई जगहों से ऐसे वीडियो वायरल हुए, जिसमें ऊंची जाति के लोग दलितों की भीड़ पर न सिर्फ पत्थर बरसाते दिखें बल्कि उन्होंने दलितों की भीड़ पर गोलियां भी चलाई. असल में यह प्रशासन और एक खास वर्ग के लोगों का गुस्सा था, जो नीले झंडे लिए उस हुजूम से खौफ खा रहा थे जो 2 अप्रैल को सड़कों पर उतर आई थी.

नीले आसमान के नीचे नीले झंडों से पटे देश भर की सड़कों पर यह नजारा किसी को भी हैरत में डालने वाला था. पूरा देश इस नीले सैलाब को अचरज से देख रहा था. सबके लिए उससे भी आश्चर्य की बात यह रही कि यह सैलाब किसी के बुलाए बिना अपनी मर्जी से उमड़ा था. लोगों का यह समुंदर तब था जब 2 अप्रैल की दोपहर तक देश के कई शहरों में यह साफ नहीं था कि प्रदर्शन करना है या नहीं. गोरखपुर से दलित दस्तक के प्रतिनिधि राजकुमार ने फोन कर बताया कि 12 बजे तक दलित संगठन इस बात को लेकर ऊहापोह की स्थिति में रहें कि शहर में विरोध का झंडा कौन उठाएगा और दो बजते-बजते स्थिति यह थी कि गोरखपुर का सबसे व्यस्त गोलघर चौराहे की सभी दुकानों के शटर गिरे हुए थे और योगी के गढ़ में जय भीम का नारा गूंज रहा था.

स्वतः स्फूर्त और बिना नेतृत्व हुए इस दलित आंदोलन पर समाजशास्त्री और जेएनयू में प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार कहते हैं “यह महज एक दिन का गुस्सा नहीं था, बल्कि यह सदियों से अपमानित समाज के संचित गुस्से का इजहार था. दलितों का अब राजनैतिक दलों की माई-बाप संस्कृति से मोहभंग हो गया है. दलित समाज अब अपने मुद्दों को उठाने के लिए किसी का मुंह ताकना नहीं चाहता.” यह इसलिए भी है क्योंकि यह समाज अब थोड़ा संबल हुआ है. शहरों में रह रहे इस समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक होने औऱ अपनी चुनावी ताकत का अहसास होने से स्थिति बदली है. सबके हाथों में मोबाईल है और पूरा समाज आपस में बिना रोक-टोक संवाद कर रहा है. अब वह अपना एजेंडा खुद तय कर रहा है.

दलित समाज का हर जागरूक व्यक्ति खुद के साथ औऱ अपने समाज के लोगों के साथ हर रोज हो रहे अत्याचार से गुस्से में है. भारत में हर 15वें मिनट में दलितों के साथ अपराध होता है. हर दिन छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना होती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट (2016) के मुताबिक पिछले दस सालों में दलितों पर होने वाले अत्याचार में 51 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. ये आंकड़े पीड़ित समाज में गुस्सा भरने के लिए काफी है. 1989 का अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम दलित समाज का बचाव करता था, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दलितों को अपनी सुरक्षा पर खतरा दिखने लगा. और खुद को असुरक्षित महसूस करने के कारण दलित समुदाय सड़कों पर आ गया. हैरान करने वाली बात यह रही कि सरकारी कर्मचारी भी अपने दफ्तरों से सामूहिक छुट्टी लेकर इस आंदोलन का हिस्सा बने. आरक्षण पर हमले और नौकरियों में डिमोशन होने से कर्मचारी वर्ग में भी बेहद गुस्सा था.

दलित समाज की यह असुरक्षा बेवजह नहीं थी. बीते सालों में कई ऐसी बातें हुई है जिसने दलितों में असुरक्षा का भाव भर दिया है. दलितों को सुरक्षा का भाव देश का संविधान देता है. चूंकि इस संविधान को बाबासाहब आम्बेडकर ने बनाया है सो दलित समाज का संविधान से लगाव भी ज्यादा है. इस संविधान में जो चीजें वंचित तबके को सुरक्षा देती है; वह राजनैतिक आरक्षण, नौकरियों में आरक्षण और अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम है. इसमें से किसी एक पर हमला दलित समाज को आक्रामक कर देता है. पिछले एक दशक में सरकारी नौकरियां लगातार कम हुई है. 2014 में मोदी के शासन में आने के बाद स्थिति और बदतर हुई है. पिछले दिनों कॉलेजों में नियुक्ति का एक मामला सामने आया. यह एससी-एसटी औऱ ओबीसी के लोगों की भर्ती का था, इसमें आरक्षण को कमजोर किया गया. नौकरियों में ठेका प्रथा, निजीकरण और विनिवेश ने भी आरक्षण के नियमों में छेड़छाड़ का मौका दे दिया है. दलित समाज का युवा इस स्थिति को समझ रहा है और अपना अधिकार छिनते देख उसमें गुस्सा है.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी-एसटी अधिनियम में बदलाव को लेकर जो फैसला सुनाया, उसमें उसने दलित उत्पीड़न के मामले में शिकायत मिलने पर अग्रिम जमानत की सुविधा दे दी और मुकदमा दायर करने से पहले जांच की बात जोड़ दी. साथ ही सरकारी कर्मचारियों के मामले में गिरफ्तारी से पहले डीएसपी रैंक के अधिकारी से मामले की जांच को जरूरी कर दिया. तर्क यह था कि ऐसा जातिवीहीन समाज बनाने के लिए किया जा रहा है. इस पूरी कवायद की जड़ में केंद्र सरकार की वह रिपोर्ट थी, जिसमें एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम कानून के दुरुपयोग की बात कही गई थी. झूठे मुकदमों के आरोप की हकीकत

ऊंची जातियों के लोगों द्वारा दलितों को लेकर झूठे मामलों की शिकायत कोई नई नहीं है, वो ऐसा काफी लंबे वक्त से करते रहे हैं. पिछले साल महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लोगों ने भी दलित उत्पीड़न कानून में नरमी को लेकर मांग की थी. उनका तर्क था कि मराठाओं के खिलाफ इस अधिनियम में कई फर्जी मामले दर्ज हैं. हालांकि तब इसके जवाब में महाराष्ट्र पुलिस ने राज्य सरकार को सौंपे अपने रिपोर्ट में कानून के दुरुपयोग का कोई सबूत होने से इंकार किया था. तो हाल ही में इसी सरकार की एक अन्य संस्था द्वारा जारी आंकड़ा बताता है कि झूठे मामले के 21 फीसदी केसों की संख्या घटकर अब 15 फीसदी हो गई है.

हालांकि यहां हमें झूठे मुकदमों की सच्चाई को समझना भी जरूरी है. इसमें कहीं न कहीं वह उच्च तबका भी शामिल है, जो इसके दुरुपयोग की शिकायत करता रहता है. कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि ऊंची जाति का एक व्यक्ति ऊंची जाति के ही अपने दूसरे विरोधी से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए अपने अधीन काम करने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों से झूठे मामले दर्ज करवा देता था. अपनी रोजी-रोटी जैसी जरूरी जरूरतों के लिए सामान्य वर्ग पर निर्भर रहने के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति का व्यक्ति दबाव में अपने बॉस के इशारे पर मामला दर्ज करवा देता था. लेकिन अब इस वर्ग में शिक्षा का प्रसार होने और सामान्य वर्ग पर निर्भरता कम होने से झूठे मामलों में कमी आई है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम में संशोधन से पहले दलितों के खिलाफ अपराध के मामले में कुल दर्ज मुकदमों में सिर्फ 9 फीसदी मामलों में ही सजा मिल पाती है.

यानि की एक तो दलितों को न्याय नहीं मिल रहा था और उस पर से कानून को कमजोर कर दिया गया. अनुसूचित जाति और जनजाति को न्याय मिलने की दर कितनी धीमी है, यह 2016 के इस आंकड़े से समझा जा सकता है-

प्रदेश कुल दर्ज मामले सजा

उत्तर प्रदेश 10,430 1582 बिहार 5,726 209 राजस्थान 6,329 680 मध्य प्रदेश 6,745 1159 आंध्र प्रदेश 2,740 33 ओडिशा 2,477 52 कर्नाटक 2,237 22 महाराष्ट्र 2,139 127 – स्रोतः राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो

अगर इस कानून के दुरुपयोग की बात मान भी लें तो क्या देश में ऐसा कोई कानून है, जिसके दुरुपयोग की बात न उठी हो या फिर जिसका दुरुपयोग न हुआ हो. कानून और ताकत के दुरुपयोग का सबसे ज्यादा मामला तो पुलिस से जुड़ा होता है. उत्तर प्रदेश में हाल में जो एनकाउंटर हुए हैं, उसमें कई एनकाउंटर के फर्जी होने की बात सामने आई है. घरवालों ने इस बात के सबूत भी दिए हैं. तो क्या पुलिस के अधिकार को कम कर दिया जाना चाहिए या फिर एनकाउंटर की व्यवस्था को खत्म कर देना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने अन्य कानूनों की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया?

एससी-एसटी एक्ट की हकीकत

प्रोफेसर विवेक कुमार कानून के दुरुपयोग से उलट एक दूसरा सवाल उठाते हैं. उनका कहना है, “ दुरुपयोग के उलट सच्चाई यह है कि इस कानून का पूरी तरह से पालन नहीं हो पाता है. यह बात इस मामले में रिहाई की ऊंची दर से साबित भी होती है. ” 1992 में राजस्थान में भंवरी देवी मामले का जिक्र करते हुए प्रो. विवेक कहते हैं कि इस मामले में तमाम सबूतों और बयानों को अनदेखा कर अदालत ने ऊंची जाति के बलात्कारियों को यह कहकर रिहा कर दिया था कि लड़के अपने पिता के सामने ऐसा कुकृत्य नहीं कर सकते हैं. तो बिहार में हुए दलितों के एक हत्याकांड में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

एससी-एसटी कानून में हालिया बदलाव से दलितों-आदिवासियों के बचाव का संवैधानिक कवच कमजोर हो गया है. आर्थिक रूप से तो देश का यह वंचित तबका पहले से ही काफी परेशान रहा है. आजादी के सात दशकों के बाद भी देश की तीन-चौथाई अनुसूचित जाति की आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. इनमें से 84 फीसदी आबादी की औसत मासिक आमदनी 5000 रुपये से भी कम है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 60 फीसदी से ज्यादा दलित आबादी किसी तरह की आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं होती है. छोटे-मोटे काम कर अपना जीवन जीने वाले दलितों में 55 फीसदी बटाईदार और खेतिहर मजदूर हैं. गांवों में रहने वाले दलितों में 45 फीसदी भूमिहीन हैं.

राजनीतिक घमासान

उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को जब दलित सड़क पर उतरे तो अचानक देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया. देश भर की सड़कों पर दलितों के सैलाब को अपने पाले में खिंचने के लिए राजनैतिक दलों में होड़ मच गई. तो इस जनसमूह के सामने आने से घबराई भाजपा और केंद्र सरकार ने आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर दी. हालांकि उसके पास इस बात का जवाब नहीं है कि उसने ऐसा करने में दो हफ्ते का समय क्यों लगाया. स्पष्ट है कि यह दलितों की बढ़ी हुई राजनीतिक शक्ति है, जिससे तमाम दल घबरा गए हैं. यह वही भाजपा है जिसके नेता पिछले चार साल से संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने की बात कर रहे हैं.

आगे क्या होगा

तो क्या दलितों के सड़क पर उतरने के बाद देश में और इस समाज में कुछ बदलेगा? इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, “ जो गुस्सा सामने आया वह एक दिन का गुस्सा नहीं था, बल्कि वो लंबे वक्त का असंतोष था. ऐसे गुस्से स्थायी नहीं होते. यह गुस्सा स्थायी तभी बन सकता है, जब इस प्रतिरोध का कोई सांगठनिक ढांचा बने और इसके बीच से कोई सांगठनिक ताकत प्रेरक शक्ति बनें. देश इस वक्त बड़ी क्राइसिस का शिकार है. बहुजन समाज के बीच से कोई बड़ा विजनरी लीडरशिप नहीं दिख रहा है.” उर्मिलेश का कहना है कि फिलहाल देश में नरेंद्र मोदी और भाजपा के पास एक विजन है. उनका विजन किसके लिए सही और किसके लिए गलत है या फिर यह कितना खतरनाक है, इस पर बहस हो सकती है. आप उससे सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता.

बकौल उर्मिलेश, “दो अप्रैल को सांगठनिक तौर पर दलित समाज जिस तरह से सामने आय़ा है उसने पूरे देश को चौंकाया जरूर है. इस बात की काफी संभावना है और यह हो भी सकता है कि लोग संगठित होकर भाजपा को हरा दें, लेकिन इससे ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा है. आज भारत को एक नए अम्बेडकर की जरूरत है.”

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राहुल गांधी ने संभाली कांग्रेस-बसपा गठबंधन पर चर्चा की कमान

नई दिल्ली। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गंठबंधन को लेकर खिंचतान मची है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के साथ आने के बाद हुई भाजपा की हार के बाद माना जा रहा था कि आगामी विधानसभा चुनावों में भी विपक्षी दलों के बीच गठबंधन आराम से हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. विपक्षी दल भाजपा को हराने पर तो एकमत हैं लेकिन सीटों के गणित ने गठबंधन की राह को मुश्किल बना दिया है.

कयास थे कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेगी. दोनों के वोट प्रतिशत को देखकर यह तय माना जा रहा था कि दोनों के साथ आने की स्थिति में भाजपा को आराम से सत्ता से बाहर किया जा सकता है. लेकिन पहले मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रभारी द्वारा कांग्रेस से विपक्ष की संभावनाओं को खारिज करने और बाद में छत्तीसढ़ के दिग्गज नेता अजीत जोगी और बसपा प्रमुख मायावती की मुलाकात ने कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है.

खबर यह आ रही है कि कांग्रेस पार्टी बसपा को सम्मानजनक सीट देने में आनाकानी कर रही है, जिसके बाद बसपा दूसरी संभावना टटोल रही है. अब बसपा को छिटकते देख कांग्रेस पार्टी एक बार फिर हरकत में आ गई है. राज्य के नेताओं से बात नहीं बनने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब खुद कमान संभाल ली है. 14 जुलाई को राहुल गांधी ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अपने प्रभारियों को दिल्ली तलब किया है, जिसमें वह स्थिति की समीक्षा करेंगे.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी इस बैठक में बसपा के साथ गठबंधन की संभावना को फिर से टटोलेंगे. खबर यह भी है कि राहुल तीनों राज्यों में बीएसपी से अलग-अलग गठबंधन की बजाय एक साथ पैकेज डील के मूड में हैं. वह बसपा को एक ही साथ ऐसा फार्मूला देना चाहते हैं, जिस पर बसपा राजी हो जाए. राहुल गांधी के आदेश पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बीएसपी नेतृत्व के संपर्क में हैं.

दरअसल बसपा सुप्रीमो मायावती की अजीत जोगी से मुलाकात के बाद कांग्रेस की बेचैनी तब साफ दिखी थी जब मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने सफ़ाई दी कि मायावती से बातचीत टूटी नहीं है और सीटों के बंटवारे को लेकर अभी भी बातचीत जारी है. उम्मीद है कि आने वाले हफ्ते में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की उम्मीद पर अंतिम मुहर लग जाएगी.

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इंग्लैंड में ODI सीरीज दौरान भारत की निगाहें वनडे में नंबर वन रैंकिंग पर

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नई दिल्ली. इंग्लैंड की सरजमीं पर 12 जुलाई से भारत और इंग्लैंड के बीच होने तीन एकदिवसीय मैचों की सीरीज में अगर भारत इंग्लैंड को 3-0 से हरा देता है, तो वह आईसीसी की वनडे रैकिंग में शीर्ष पर पहुंच जाएगा. इंग्लैंड और भारत अभी वनडे रैंकिंग में क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर हैं. इन दोनों के बीच पहला वनडे गुरुवार को नाटिंघम में होगा. इस मैच से एक महीने तक चलने वाले एकदिवसीय मैचों की शुरुआत भी होगी. इस दौरान कुल दस टीमें इस फॉर्मेट में खेलेंगी. इंग्लैंड को टी 20 अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला में 2-1 से हराने वाले भारत ने दो मई को सालाना अपडेट के बाद अपनी शीर्ष रैंकिंग गंवा दी थी लेकिन उसके पास फिर से इसे हासिल करने का मौका है.

शीर्ष रैंकिंग के लिए भिड़ेंगे भारत-इंग्लैंड

आईसीसी के अनुसार इसके लिये उसे इंग्लैंड को 3-0 से हराना होगा. दूसरी तरफ इंग्लैंड अगर इसी अंतर से जीत दर्ज करता है, तो वह शीर्ष पर अपनी स्थिति मजबूत कर देगा और उसकी बढ़त दस अंक की हो जाएगी.  भारत और इंग्लैंड के बीच श्रृंखला 17 जुलाई को समाप्त होगी. इस बीच जिम्बाब्वे पांच मैचों के लिये पाकिस्तान की मेजबानी करेगा. ये मैच 13 से 22 जुलाई के बीच खेले जाएंगे. वेस्टइंडीज 22 से 28 जुलाई के बीच बांग्लादेश के खिलाफ तीन वनडे खेलेगा. श्रीलंका 29 जुलाई से 12 अगस्त के बीच पांच मैचों के लिये दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी करेगा जबकि नीदरलैंड अपनी सरजमीं पर नेपाल के खिलाफ दो वनडे खेलेगा. नेपाल एक अगस्त को नीदरलैंड के खिलाफ वनडे में अपना पहला खेलेगा.

खिलाड़ियों के पास भी रैंकिंग सुधारने का मौका

इस बीच खिलाड़ियों के पास भी अपनी रैंकिंग में सुधार का मौका रहेगा. भारतीय कप्तान विराट कोहली अभी 909 अंक के साथ बल्लेबाजी रैंकिंग में शीर्ष पर हैं. वह दूसरे नंबर पर काबिज पाकिस्तान के बाबर आजम से 96 अंक आगे हैं. भारत के चौथी रैंकिंग के रोहित शर्मा टी 20 की अपनी फार्म को वनडे में भी बरकरार रखना चाहेंगे. इंग्लैंड के छठी रैंकिंग के जो रूट के पास रास टेलर को पीछे छोड़ने का मौका रहेगा. गेंदबाजी रैंकिंग में शीर्ष पर काबिज जसप्रीत बुमराह उंगली की चोट के कारण श्रृंखला में नहीं खेल पाएंगे जिससे अन्य को अंतर कम करने का मौका मिलेगा. तीसरे नंबर पर काबिज हसन अली फिर से शीर्ष पर पहुंचने की कोशिश करेंगे.

वनडे क्रकेट टीम की वर्तमान रैंकिंग

क्रम    देश                           रेंटिंग अंक
1     इंग्लैंड                             126 2      भारत                            122 3      दक्षिण अफ्रीका                 113 4      न्यूज़ीलैंड                        112 5      पाकिस्तान                      102 6      ऑस्ट्रेलिया                      100 7      बांग्लादेश                         93 8      श्रीलंका                            77 9      वेस्टइंडीज                         69 10    अफ़ग़ानिस्तान                   63 11    जिम्बाब्वे                         55 12     आयरलैंड                         38 13     स्कॉटलैंड                         28 14     संयुक्त अरब अमीरात           18 इसे भी पढ़े-गेंदबाजों के लिए डरावना होता जा रहा है वन डे क्रिकेट भी
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61 लाशें, मगर कहानी सबकी एक जैसी

अंग्रेजी में एक कहावत है, जिसका कामचलाऊ तर्ज़ुमा कुछ इस तरह होगाः “जो लोग मर गए हैं, वे अपनी कहानी नहीं कह पाते.”

अब आते हैं हकीकत पर. क्या वह 61 लोग, जो उत्तर प्रदेश में 20 मार्च 2017 से 7 जुलाई 2018 के बीच तथाकथित पुलिस मुठभेड़ों में मार डाले गए, अपनी-अपनी कहानी कह पाएंगे…? जाहिर है नहीं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्टियों का कहना है कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा इस तरह की मुठभेड़ें नकली व फ़र्ज़ी हैं और इनका मक़सद कानून व व्यवस्था की स्थिति सुधारने की आड़ में पुलिस द्वारा मुठभेड़ दिखाकर लोगों की हत्या कर देना रहा है.

ऐसी मुठभेड़ हत्याओं के संबंध में मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई 2018 को उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर उससे दो हफ़्ते के भीतर जवाब मांगा है. इसे राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार के लिए गंभीर झटके के रूप में देखा जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया, इसका मतलब कि उसे पहले नज़र में याचिका में दम दिखायी दिया.

अपनी याचिका में पीयूसीएल ने मांग की है कि मार्च 2017 से लेकर, जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी, इस साल अब तक जितनी मुठभेड़ हत्याए हुई हैं, उनकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) करे, और इस जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट का कोई अवकाशप्राप्त जज करे. याचिका में कहा गया है कि जिस बेलगाम छूट के साथ पुलिस मुठभेड़ की घटनाएं हो रही हैं, उससे पता चलता कि इन्हें राज्य सरकार का खुला समर्थन मिला हुआ है. इसमें कहा गया है कि कई मौक़ों पर योगी आदित्यनाथ के ऐसे बयान आये हैं, जो इन मुठभेड़ हत्याओं को जायज ठहराते हैं और इन्हें प्रोत्साहित करते हैं. पीयूसीएल का कहना है कि ऐसी स्थिति में राज्य पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट इन हत्याओं की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दे.

पीयूसीएल की याचिका में 31 मार्च 2018 तक की मुठभेड़ हत्याओं के आंकड़े दिये गए हैं. इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक तौर पर जो जानकारी मौजूद है, उसके मुताबिक राज्य में पिछले साल मार्च 2017 से लेकर इस साल मार्च 2018 तक 1100 से ज़्यादा मुठभेड़ें (एनकाउंटर) हुईं, जिनमें 49 लोग मारे गये और 370 लोग घायल हुए. याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिये गये आंकड़े का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि 1 जनवरी 2017 से 31 मार्च 2018 के बीच इन मुठभेड़ों में 45 लोग मारे गए.

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी किये गए ब्यौरे के अनुसार, 20 मार्च 2017 से लेकर 7 जुलाई 2018 तक पुलिस मुठभेड़ या एनकाउंटर की घटनाएं 1400 से उपर हो चुकी हैं, जिनमें 61 लोग मारे जा चुके हैं. पुलिस की निगाह में ये सभी शातिर बदमाश थे. हर जगह मुठभेड़ की कहानी व तौर-तरीक़ा लगभग एक जैसा था और पैटर्न भी एक-दूसरे से मिलता-जुलता था. इन मुठभेड़ों में से हर एक की जो विधि-सम्मत जांच-पड़ताल सरकार को करानी चाहिये थी, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है, वह नहीं हुई. न एफ़आरआई लिखी गयी, न मिजिस्ट्रेटी जांच हुई, न मुक़दमा दर्ज़ हुआ.

जो 61 लोग इन मुठभेड़ हत्याओं के शिकार हुए उनमें से 27 मामलों में पुलिस विभाग ने जांच कर अपने को पाक साफ़ घोषित कर दिया. शेष 34 मामलों की जांच अभी होनी है. जिन मामलों की अभी जांच होनी है, वह कुल मुठभेड़ हत्याओं का 50 प्रतिशत से ज़्यादा है.

ग़ौर करने की बात है कि राज्य में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के ठीक पहले के तीन सालों (2014, 2015 और 2016) में मुठभेड़ की घटनाएं कुल 16 हुईं. योगी सरकार बनने के बाद इन घटनाओं में जिस तरह अचानक बेतहाशा बढोतरी हुई है, उसमें लोकसभा में भी चिंता जताई जा चुकी है. पीयूसीएल ने अपनी याचिका में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा बार-बार दिये गए इस बयान को उद्धत किया है कि अपराधी या तो जेल जायेंगे या मुठभेड़ों में मार डाले जायेंगे. याचिका में पिछले साल 19 नवंबर को दिये गए मुख्यमंत्री के बयान का हवाला दिया गया है कि जो लोग समाज की शांति को भंग करना चाहते हैं और बंदूक में विश्वास करते हैं, उन्हें बंदूक की भाषा में जवाब दिया जाएगा. पीयूसीएल का कहना है कि यह कानून और विधि-विधान की भाषा नहीं है.

एक अन्य मानवाधिकार संगठन रिहाई मंच ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में, ख़ासकर आज़मगढ़ ज़िले और उससे सटे इलाक़े में, फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ की व्यापक जांच-पड़ताल की है. रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव के मुताबिक पिछले दिनों जिस तरह 5 लोगों– मोहन पासी, रामजी पासी, जयहिंद यादव, मुकेश राजभर और राकेश पासी—को पुलिस ने मुठभेड़ दिखाकर मार डाला, वह पुलिस की पोल-पट्टी खोल देता है. इन सभी तथाकथित मुठभेड़ों का तौर-तरीक़ा कमोबेश एक जैसा था, और यह पुलिस के हाथों की गई निर्मम हत्याएं थीं.

पता चला है कि आज़मगढ़ ज़िले के कंदरापुर थाने के दारोग़ा ने राजीव यादव को टेलीफ़ोन पर गालियां दी हैं और उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है. राकेश पासी की मुठभेड़ हत्या इसी इलाक़े में हुई थी.

अजय सिंह

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शर्मनाकः फीस के लिए स्कूल ने मासूमों को बनाया बंधक

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली से एक स्कूल से जुड़ी चौंकाने वाली खबर आई है. खबर है कि एक स्कूल ने फीस जमा नहीं होने के कारण स्कूल की 50 बच्चियों को बेसमेंट में बंद कर दिया. बच्चों को 4 से 5 घंटे तक स्कूल में बंद रखा गया. यह मामला दिल्ली के चांदनी चौक इलाके के राबिया गर्ल्स पब्लिक स्कूल का है. सभी बच्चे केजी के छात्र हैं.

अभिभावकों के आरोप के मुताबिक बच्चियां जब स्कूल पहुंची तभी उन्हें सुबह 7.30 बजे से ही स्कूल के बेसमेंट में रखा गया था. छुट्टी के समय जब छात्र बाहर नहीं निकले तब यह मामला सामने आया. अभिभावकों का आरोप है कि इस दौरान बच्चों को कुछ खाने-पीने को भी नहीं दिया गया. हद तो यह है कि स्कूल ने बच्चों को बेसमेंट में भेजने के बाद स्कूल में उनकी उपस्थिति को भी नहीं दर्शाया गया और उनकी अनुपस्थिति मार्क कर दी गई. क्योंकि स्कूल मैनेजमेंट को उनकी फीस प्राप्त नहीं हुई थी.

हालांकि हंगामे के बाद स्कूल प्रशासन बच्चों को बेसमेंट में बंद करने की बात से इंकार कर रहा है. मामले को बढ़ता देख स्कूल प्रिंसिपल ने आरोपों का खंडन किया है. प्रिंसिपल का कहना है कि बेसमेंट सजा देने का स्थान नहीं है और यह एक एक्टिनिटी रूम है जहां बच्चे खेलते हैं और उन्हें म्यूजिक सिखाया जाता है. यह एक क्लासरूम की तरह ही है.

दूसरी ओर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी है. साथ ही सचिव और शिक्षा निदेशक को सभी जानकारी के साथ बुलाया है. इस मामले में पुलिस ने भी प्राथमिकी दर्ज कर ली है.

करण कुमार

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किसानों को लुभाने पंजाब जाएंगे मोदी

मुक्तसर (पंजाब)। पीएम मोदी 2019 में वापसी को लेकर खासे परेशान है. मोदी ऐसे किसी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूक रहे हैं जो उन्हें आगामी चुनाव में फायदा पहुंचा सकता है. इसी सिलसिले में खरीफ की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने के बाद पीए मोदी पंजाब जाएंगे. मोदी की यह पंजाब में पहली रैली होगी. यह रैली मुक्तसर के मलोट में होगी, जहां मोदी की नजर किसानों पर रहेगी.

मोदी की इस रैली को पार्टी ‘किसान कल्याण रैली’ कह रही है, लेकिन असल में यह रैली पूरी तरह से राजनैतिक है, जिसमें किसानों को लुगाने की कोशिश होगी. क्योंकि सरकार द्वारा हाल ही में एमएसपी को लेकर की गई घोषणा के बाद यदि किसी राज्य के किसानों को सबसे ज्यादा फायदा होगा तो वो पंजाब के किसान हैं.

ऐसा इसलिए है क्योंकि पंजाब में पैदा होने वाले धान और गेहूं का 90 फीसदी हिस्सा सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीदा जाता है. ऐसे में हाल ही में एमएसपी को लेकर हुई घोषणाओं का सीधा असर यहां के किसान वोट बैंक पर दिखेगा. हालांकि एमएसपी की सच्चाई यह भी है कि सरकार की इस घोषणा का फायदा उन्हीं इलाकों के किसानों को मिलेगा, जहां उनकी उपज सीधे सरकारी क्रय केंद्रों में जाती है. तो वहीं कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक एक सच्चाई यह भी है कि देश में होने वाले गेहूं और धान की कुल उपज का केवल 35 फीसदी ही सरकारी क्रय केंद्रों में जाता है. दलहन और तिलहन के मामले में तो यह औसत और भी खराब होकर 20-25 फीसदी पर ठहर जाता है. पंजाब में बेस्ट क्वालिटी का खाद्यान्न उत्पादन होने की वजह से यहां का अधिकतर अनाज सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीद लिया जाता है.

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने देश में किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा है. लेकिन 2014 में सरकार गठन के तीन साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने इसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बनाया था. अब आनन-फानन में सरकार ये सब कर तो रही है लेकिन मोदी का दावा झूठा साबित होना तय है. अगर इस लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश सरकार ने 2015 में शुरू कर दी होती तो 2022 तक किसानों की वार्षिक आमदनी में लगातार 7 वर्षों तक 12 फीसदी का इजाफा होता और तय लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाता, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

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भारतीय सिनेमा में जातीय चरित्र

हिंदी पट्टी में बॉलीवुड के अस्पृश्य व अस्पृश्यता पर फिल्मों का भीषण अकाल रहा है. किसी भी सुपरस्टार जैसे दिलीपी कुमार, राजकुमार, राजेश खन्ना, मनोज कुमार या आज के हिंदी सिनेमा जगत के सुपरस्टार सलमान, आमिर, अमिताभ, धर्मेंद्र किसी ने भी अस्पृश्य समाज के व्यक्ति का किरदार नहीं निभाया है. ना ही किसी निर्देशक ने फिल्म बनाने की हिम्मत की और ना ही सवाल तक उठाया.

काला, आक्रोश, दामूल जैसी फिल्मों ने सामंतवाद की ज्यातदी पर फिल्म बनाई लेकिन कभी अस्पृश्य व अस्पृश्यता (सामाजिक व्यवस्था) पर फिल्म नहीं बनाई. पहली बार 1930 में सुजाता एवं अछूत कन्या जैसी फिल्म बनतीं हैं इनमें नायिकाएं अछूत हुआ करतीं थीं लेकिन नायक सवर्ण समाज का होता था. यह भी समाज में स्थापित मूलसंगत था क्योंकि समाज में अनुलोम विवाह जायज था. इससे स्थापित हुआ कि निम्न वर्ग की कन्याओं का उत्थान उच्च वर्ग का पुरुष कर सकता है.

यही धर्म सम्मत व्यवस्था 1980 में सौतन जैसी फिल्म में देखने को मिली. इसमें निम्न जाति की लड़की सवर्ण जाति के लड़के लिए न्यौछावर कर देती है. किंतु कोई भी सुपरस्टार निम्न जाति के रोल में नहीं दिखता है. 1980 के दशक फिल्म गुलामी में पुलिस वाला था जिसके बच्चे को घोड़े पर बारात नहीं निकालने दी क्योंकि वह निम्न वर्ग का था. हालांकि साफ तौर जाति तो नहीं दिखाई लेकिन फिल्म में कुलभूषण खरबंदा एक साइड कैरेक्टर थे जबकि लीड रोल में धर्मेंद्र थे.

नब्बे के दशक में पहली बार बाबा साहेब बीआर अंबेडकर पर ममूति ने किरदार निभाया जो कि साउथ के हीरो थे और वह फिल्म बनी लेकिन मुख्यधारा के सिनेमाघरों में लगाई ना जा सकी. मुझे याद है कि 1992-93 में रिलीज होने यूपी में आई जब मायावती का शासन था लेकिन काफी कोशिश के बाद उत्तर प्रदेश के कुछ सिनेमाघरों में लगाई गई लेकिन सिनेमा मालिकों के साजिशन जल्द ही उतार दी गई. यानी कुछ ही हफ्तों में निकाल दी गई. अस्पृश्य समाज के नायक पर जब फिल्म बनती है तो समाज कैसे उसे स्वीकार नहीं करता है. 2000 के आसपास लगान फिल्म के अंदर आमिर खान ने कचरा एक अस्पृश्य कैरेक्टर को दिखाया लेकिन वह मुख्य किरदार नहीं था यहां पर भी साइड कैरेक्टर के तौर दिखाया गया.

एकलव्य फिल्म बनी जिसमें पन्नालाल जौहार जिसमें पहली बार किसी उत्तर भारत के सुपरस्टार ने अस्पृश्य नायक का किरदार निभाया था लेकिन यहां पर मुख्य कलाकार के तौर अमिताभ बच्चन व सैफ अली खान को दिखाया गया और संजय दत्त के रोल को साइड हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया गया. आक्रोश एक ऐसी पिक्चर है जिसमें जिसमें विधिवत सुपस्टार अजय देवगन अस्पृश्य समाज के हीरो हैं व कैरेक्टर हैं. लेकिन यहां भी अजय देवगन अपने शिक्षक की लड़की को छोड़ देते हैं तो यहां पर भी दिखाया गया कि अस्पृश्य समाज को हीं कुर्बानी देनी पड़ी. लगातार हमनें देखा कि फिल्म के आरंभ से धर्म, परंपरा, राजा-रजवाड़ों, सामंतवाद पर अधारित फिल्म बनीं लेकिन अस्पृश्य समाज के किरदार पर फिल्मों का भारी अकाल रहा है.

21 वीं सदी में पहली बार साउथ का सुपस्टार रजनीकांत फिल्म काला में दलित समाज के चिन्हों (बुध्द धम्म, नीला झंडा, काला निशान) को लिए हुए आता है. आरक्षण में सैफ अली खान छोटी जात को प्रदर्शित करते हैं और दलित चिन्हों के साथ दिखाए जाते हैं लेकिन उनको साम्यावाद का रंग दे दिया जाता है. लेकिन लीड रोल में अमिताभ बच्चन का रोल इसे छुपा देता है. दलितों को आज भी नेपथ्य में रखा जाता है. काला फिल्म को आज भी दलितों या निम्न समाज को दिखाती है लेकिन सवर्ण समाज को नागवार गुजर रहा है. इससे पता चलता है कि आज भी उच्च जाति वाला समाज दलितों को किस नजरिए से देखता है.

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नवाजुद्दीन ने राजीव गांधी को कहा अपशब्द, मचा बवाल

नई दिल्ली। अपनी दमदार एक्टिंग के लिए लोकप्रिय एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी विवादों में घिर गए हैं. नवाज पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर अपशब्द कहने का आरोप लगाया गया है. इसको लेकर नवाज पर एफआईआर दर्ज कराने की बात सामने आई है. नवाज पहली बार अपनी एक्टिंग को लेकर विवादों में घिरे दिख रहे हैं.

दरअसल 6 जुलाई को सैफ अली खान और नवाजुद्दीन की वेब सीरीज सैक्रेड गेम्स रिलीज हुई. जो कि राजनीति पर आधारित है. इसमें राजनीतिक कारणों से विवादों में घिर चुकी है. अमर उजाला खबर के मुताबिक पश्चिम बंगाल के एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने यह कहते हुए नवाजुद्दीन और सीरीज के निर्माताओं पर एफआईआर दर्ज कराई है कि इस सैक्रेड गेम्स में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया है.

37 वर्षीय राजीव सिन्हा की माने तो सैक्रेड गेम्स के एक एपिसोड में नवाज राजीव गांधी को ‘फट्टू’ कहते हुए दिखाई देते हैं. सिन्हा ने इस पर पुलिस स्टेशन जाकर नवाजुद्दीन और निर्माताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांगी की है. बता दें कि यह वेब सीरीज विक्रम चंद्रा के नॉवेल पर आधारित है.

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दिल्ली सरकार बुजुर्गों को कराएगी मुफ्त तीर्थयात्रा

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सीएम अरविंद केजरीवाल ने बुजुर्गों को तोहफा दिया है. दिल्ली में रहने वाले बुजुर्गों को दिल्ली सरकार मुफ्त में यात्रा कराएगी. अरविंद केजरीवाल सरकार ने उपराज्यपाल अनिल बैजल की सभी आपत्तियों को दरकिनार कर तीर्थयात्रा योजना को मंजूरी दे दी है. इसके तहत 70 साल से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्गों को मुफ्त में तीर्थयात्रा कराई जाएगी.

इस योजना के पहले चरण में हर विधानसभा क्षेत्र से 11 हजार वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थयात्रा कराई जाएगी, यानी करीब 77 हजार श्रद्धालुओं को इसका लाभ मिलेगा.

दिल्ली सरकार की इस योजना के तहत तीर्थयात्रा पर बुजुर्गों के साथ परिवार का एक सदस्य भी जा सकेगा. इस तीर्थयात्रा योजना के तहत दिल्ली सरकार ने जो रूट चुने हैं, उसमें लोगों को दिल्ली से मथुरा, फिर वृंदावन, आगरा और फतेहपुर सीकरी होते हुए वापस दिल्ली लाया जाएगा. वहीं दूसरे रूट पर दिल्लीवासियों को हरिद्वार, ऋषिकेश और नीलकंठ की यात्रा कराई जाएगी, जबकि तीसरा रूट दिल्ली से अजमेर, पुष्कर, अमृतसर और फिर बाघा बॉर्डर व आनंदपुर साहिब का है. इसके अलावा दिल्ली के लोगों को जम्मू-कश्मीर व वैष्णो देवी की भी यात्रा कराई जाएगी.

इस योजना का लाभ लेने के लिए पहले आओ पहले पाओ की पध्दति अपनानी होगी. तीर्थयात्रा योजना के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया ऑनलाइन होगी. इसके लिए वृद्धि नागरिकों को एक माह के अंदर अपने क्षेत्र के विधायक, राजस्व विभाग के उपायुक्त और तीर्थ कमेटी के अध्यक्ष कार्यालय में आवेदन कर सकेंगे. केजरीवाल सरकार और LG के बीच विवाद के कारण ये योजना रुकी हुई थी जो कि अब चालू की गई है.

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PAK के पूर्व PM नवाज शरीफ पर हमला

लंदन में भर्ती अपनी पत्नी के साथ नवाज शरीफ

नई दिल्ली। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुश्किल बढ़ती जा रही है. भ्रष्टाचार के मामले में दस साल की सजा सुनाने के बाद खबर आ रही है कि नवाज शरीफ पर हमला किया गया है. लंदन में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर गुस्साए लोगों ने हमला किया है. यह हमला उनपर तब किया गया जब वह एवेनफील्ड स्थित अपने बेटे के घर में जा रहे थे.

पाकिस्तानी अखबार डॉन के मुताबिक युवा लोगों का एक समूह नवाज के बेटे हुसैन नवाज के अपार्टमेंट का दरवाजा तोड़ने का कोशिश कर रहे थे. कुछ लोग पहले से ही वहां प्रदर्शन कर रहे थे. एक प्रदर्शनकारी तो इतने गुस्से में था कि उसने पाकिस्तानी मुस्लिम लीग-नवाज की ब्रिटेन की शाखा के सदस्य पर सामान ढोने की ट्रॉली तक उठा कर फेंक दिया. वहीं दूसरे ने दरवाजे पर अंडे फेंके. वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह से मेट्रोपॉलिटन पुलिस आलीशान एवेनफील्ड हाउस के पास प्रदर्शनकारियों पहुंची और फिर उसने छानबीन भी शुरू की. हालांकि इस मामले में अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस ने बताया कि शरीफ फैमिली ने किसी भी तरह की शिकायत दर्ज नहीं कराई है.

बता दें कि नवाज शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज का इलाज चल रहा है. वह लंबे समय से बीमार चल रही हैं. नवाज पर किए गए हमलों की पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों ने निंदा की है. वहीं पीटीआई यूके के प्रवक्ता ने कहा कि हुसैन नवाज के घर पर किए गए प्रदर्शन पर पीटीआई पार्टी का कोई हाथ नहीं है.

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कैंसर से जूझ रही सोनाली बेंद्रे का हैरान करने वाला वीडियो आया सामने

नई दिल्ली। हिंदी फिल्म की हीट एक्ट्रेस सोनाली बेंद्रे कैंसर से जूझ रही हैं. इस खबर के सामने आने के बाद फैंस के साथ-साथ बॉलीवुड इंडस्ट्री को झटका लगा था. फिलहाल सोनाली न्यूयॉर्क में इलाज करा रही हैं. इलाज के दौरान का एक वीडियो सामने आया है जो कि आपको हैरान कर सकता है कि, मौत से जूझने वाला ऐसे कैसे खुश हो सकता है.

न्यूयॉर्क से सोनाली की पहली तस्वीर सामने आई है. ये तस्वीरें खुश कर सकती हैं लेकिन जैसे ही पता चलेगा कि सोनाली अभी पूरी तरह फिट नहीं हुई हैं तो निराशा हाथ लगेगी. फिर भी जिंदगी और मौत से जूझने के बाद भी सोनाली ने इंस्टाग्राम पर प्यारा सा हंसता हुआ वीडियो शेयर किया है. बीमारी के बावजूद सोनाली की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई है.

इस वीडियो में सोनाली के बाल काटे जा रहे हैं. इलाज के चलते उन्होंने अपने बाल जरूर छोटे करवा लिए हैं. इस नए लुक में भी सोनाली काफी सुंदर लग रही हैं. इस फोटो को शेयर करते हुए सोनाली ने एक लंबा-चौड़ा पोस्ट भी लिखा है.

सोनाली कहती हैं, ‘जब तक इंसान के सामने मुश्किलें ना आएं तब तक उसे अपनी शक्ति का अंदाजा ही नहीं लगता. पिछले कुछ दिनों में मुझे बहुत सारे लोगों का प्यार मिला है. ये लोग मुझे एहसास करवाते हैं कि मैं अकेली नहीं हूं.’ सोनाली की दूसरी फोटो में वो अपने पति गोल्डी बहल के साथ दिख रही हैं. गोल्डी अपनी पत्नी के माथे को चूम रहे हैं.

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