पंजाब में आम आदमी पार्टी से दर्जनों नेताओं ने एकसाथ छोड़ी पार्टी

चंडीगढ़। पंजाब में तेजी से उभरती दिख रही आम आदमी पार्टी (AAP) को करारा झटका लगा है. पार्टी के एक दर्जन से ज्यादा नेताओं ने सोमवार को एक साथ पार्टी छोड़ दिया है. सामूहिक इस्तीफा देने वाले नेताओं में 5 जिला अध्यक्ष, 6 क्षेत्रीय प्रभारी और 2 महासचिव हैं. इस सामूहिक इस्तीफे के बाद पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पंजाब मामलों के प्रभारी मनीष सिसौदिया को करारा झटका लगा है.

चंडीगढ़ के इन सभी 16 नेताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पंजाब पार्टी मामलों के प्रभारी मनीष सिसोदिया को अपना इस्तीफा भेजा है. इन सभी का इस्तीफा मंजूर हुआ है या नहीं, अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. ‘आप’ छोड़ने वाले नेताओं ने केजरीवाल को भेजे इस्तीफा में डॉ. बलबीर सिंह गुट पर तानाशाही रवैये का आरोप लगाया है. इनमें से अधिकतर नेता प्रतिपक्ष के नेता सुखपाल खैरा से जुड़े हुए हैं. सामूहिक इस्तीफे में इन नेताओं ने डॉ. बलबीर सिंह पर कई नेताओं को मनमाने ढंग से निकालने का आरोप लगाया है.

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दलित इंडियन आइडल की सच्चाई पर बवाल क्यों

इंडियन आईडल नाम की सिंगिंग प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है. खास बात यह है कि इस शो के प्रोमों के दौरान प्रतियोगियों की पृष्ठभूमि के बारे में बताया जा रहा है. इस शो में दलित समाज के युवा सौरभ वाल्मीकि भी पहुंचे हैं. सौरभ का प्रोमो सुपरहिट है. प्रोमों के बाद यह तय माना जा रहा है कि अपनी शानदार आवाज की बदौलत सौरभ इस गायकी प्रतियोगिता में मजबूत दावेदारी पेश करेंगे. लेकिन प्रोमो रिलिज होने के बाद सौरभ अपने ही शहर वालों के निशाने पर हैं.

दरअसल प्रोमो के दौरान सौरभ ने जातिवाद के दंश का जिक्र किया है. प्रोमो में सौरभ कह रहे हैं… कहते हैं कि म्यूजिक की कोई धर्म और जाति नहीं होती लेकिन म्यूजिक सीखने के लिए मुझे जातिवाद का सामना करना पड़ा…. सौरभ इस प्रोमो में कहते हैं कि हमें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता, प्रसाद फेंक कर दिया जाता है. सौरभ का यह भी कहना है कि सार्वजनिक नलों से पानी नहीं पीने दिया जाता.

सौरभ के इसी बयान से उनके शहर लखीमपुर के लोग भड़क गए हैं. शहर में लोग सौरभ के इस बयान की निंदा कर रहे हैं. उनका तर्क है कि सौरभ नेशनल टीवी पर अपने लखीमपुर शहर के बारे में गलत छवि पेश कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि सौरभ जिस तरह की बातें कर रहे हैं उससे समूचे उत्तर प्रदेश और खासकर खीरी जिले को लेकर के मुंबई और दिल्ली में बैठे हुए लोगों का नजरिया बहुत ही बदल जाएगा.

हालांकि अगर आप सौरभ के प्रोमों को ध्यान से देखेंगे तो यह साफ हो जाएगा कि सौरभ जातिवाद और छूआछूत की बात दलित समाज के लिए कह रहे हैं न कि व्यक्तिगत तौर पर अपने लिए…

सौरभ साफ कह रहे हैं कि हमें यानि दलित समाज को मंदिर में नहीं जाने दिया जाता और प्रसाद फेंक कर दिया जाता है, जो कि सच्चाई है. भारत में दलितों को आए दिन जिस कदर जातिवाद का सामना करना पड़ता है वो कोई छुपी बात नहीं है, बल्कि सरकारी आंकड़ों में दर्ज है. दलित समाज के साथ हर 18वें मिनट में अत्याचार होता है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले दिनों कानपुर देहात में मंगलपुर कस्बे में पुजारी ने दलित महिलाओं को मंदिर में जाने से रोक दिया था और धमकाने लगा. जब महिलाएं जबरन मंदिर में घुस गई तब पुजारी ने उनके निकलने के बाद पत्नी के साथ मिलकर पूरे मंदिर परिसर को गंगाजल से धुलवाया. इसी तरह पिछले साल अगस्त में आई एक खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मौदाहा कस्बे के गदाहा गांव में रामायण पाठ के दौरान दलितों को मंदिर परिसर से दूर रहने का नोटिस चिपका दिया गया था. तो वहीं राजस्थान के झुंझुनू जिले में बुहाना तहसील के गांव चुडिना में एक दलित के मंदिर में प्रवेश करने पर पूरे गांव के दलितों की लाठी-डंडों से पिटाई की गई.

ये महज कुछ खबरे हैं जिसे उदाहरण के तौर पर दिया जा रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर कि शूद्र मंदिर परिसर में प्रवेश न करें तमाम लोगों के सामने से जरूर गुजरी होगी.

इसलिए जाति की बात कह कर शहर की इज्जत को खराब करने का लखीमपुर के लोगों का तर्क भी एक तरह का जातिवाद ही है. असल में सौरभ ने समाज की उस कुरीति को कुरेद दिया है, जिसे समाज का उच्च तबका हमेशा से दबा कर रखना चाहता है. स्थानीय लोगों को यही हजम नहीं हो रहा है.

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FIFA World Cup Final 2018: 20 साल बाद फ्रांस ने किया फुटबाल विश्व कप पर कब्जा

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नई दल्ली। फीफा वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में जैसे ही फ्रांस के गोलकीपर ह्यूगो लोरिस ने गेंद विपक्षी टीम के हाफ की ओर मारी, रेफरी ने सीटी बजा दी. नीली जर्सी में मौजूद फ्रांसीसी टीम के खिलाड़ी एक दूसरे के गले मिलने लगे, रोने लगे, चिल्लाने लगे. जश्न का दौर कुछ इस तरह से शुरू हुआ, मानों स्कूली बच्चे पहली ट्रोफी जीतने पर खुशी में झूम रहे हों. पूरा लुजनिकी स्टेडियम जश्न के शोर में डूब गया. आखिर यह होता भी क्यों नहीं. 20 साल बाद फ्रांस एक बार फिर फुटबॉल का सरताज बन चुका था. वहीं दूसरी तरफ लाल-सफेद जर्सी में मौजूद क्रोएशिया टीम आंसुओं में डूबी थी. खुद को संभालते हुए 40 लाख की आबादी वाले इस मुल्क के प्लेयर्स फ्रांस के सम्मान में तालियां भी बजा रहे थे.

महत्वपूर्ण मौकों पर स्कोर करने की अपनी काबिलियत और किस्मत के दम पर फ्रांस ने रविवार को यहां फीफा विश्व कप के रोमांचक फाइनल में दमदार मानी जा रही क्रोएशिया टीम को 4-2 से हराकर दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया. फ्रांस ने 18वें मिनट में मारियो मैंडजुकिच के आत्मघाती गोल से बढ़त बनाई लेकिन इवान पेरिसिच ने 28वें मिनट में बराबरी का गोल दाग दिया. फ्रांस को हालांकि जल्द ही पेनल्टी मिली जिसे एंटोनी ग्रीजमैन ने 38वें मिनट में गोल में बदला जिससे फ्रांस हाफ टाइम तक 2-1 से आगे रहा.

पॉल पोग्बा ने 59वें मिनट में तीसरा गोल दागा जबकि किलियान एमबापे ने 65वें मिनट में फ्रांस की बढ़त 4-1 कर दी. जब लग रहा था कि अब क्रोएशिया के हाथ से मौका निकल चुका है तब मैंडजुकिच ने 69वें मिनट में गोल करके उसकी उम्मीद जगाई.

फ्रांस ने इससे पहले 1998 में विश्व कप जीता था. तब उसके कप्तान डिडियर डेसचैम्प्स थे जो अब टीम के कोच हैं. इस तरह से डेसचैम्प्स खिलाड़ी और कोच के रूप में विश्व कप जीतने वाले तीसरे व्यक्ति बन गये हैं. उनसे पहले ब्राजील के मारियो जगालो और जर्मनी फ्रैंक बेकनबऊर ने यह उपलब्धि हासिल की थी.

कहीं खुशी…..

क्रोएशिया पहली बार फाइनल में पहुंचा था. उसने अपनी तरफ से हर संभव प्रयास किए और अपने कौशल और चपलता से दर्शकों का दिल भी जीता लेकिन आखिर में जालटको डालिच की टीम को उप विजेता बनकर ही संतोष करना पड़ा. बेशक क्रोएशिया ने बेहतर फुटबॉल खेली लेकिन फ्रांस अधिक प्रभावी और चतुराईपूर्ण खेल दिखाया, यही उसकी असली ताकत है जिसके दम पर वह 20 साल बाद फिर चैंपियन बनने में सफल रहा. दोनों टीमें 4-2-3-1 के संयोजन के साथ मैदान पर उतरी.

क्रोएशिया ने इंग्लैंड की खिलाफ जीत दर्ज करने वाली शुरुआती एकादश में बदलाव नहीं किया तो फ्रांसीसी कोच डेसचैम्प्स ने अपनी रक्षापंक्ति को मजबूत करने पर ध्यान दिया. क्रोएशिया ने अच्छी शुरुआत और पहले हाफ में न सिर्फ गेंद पर अधिक कब्जा जमाये रखा बल्कि इस बीच आक्रामक रणनीति भी अपनाए रखी. उसने दर्शकों में रोमांच भरा जबकि फ्रांस ने अपने खेल से निराश किया. यह अलग बात है कि भाग्य फ्रांस के साथ था और वह बिना किसी खास प्रयास के दो गोल करने में सफल रहा. फ्रांस को पहला मौका 18वें मिनट में मिला और वह इसी पर बढ़त बनाने में कामयाब रहा.

फ्रांस को दाईं तरफ बाक्स के करीब फ्री किक मिली. ग्रीजमैन का क्रास शॉट गोलकीपर डेनियल सुबासिच की तरफ बढ़ रहा था लेकिन तभी मैंडजुकिच ने उस पर हेडर लगा दिया और गेंद गोल में घुस गयी. इस तरह से मैंडजुकिच विश्व कप फाइनल में आत्मघाती गोल करने वाले पहले खिलाड़ी बन गये. यह वर्तमान विश्व कप का रेकॉर्ड 12वां आत्मघाती गोल है. पेरिसिच ने हालांकि जल्द ही बराबरी का गोल करके क्रोएशियाई प्रशंसकों और मैंडजुकिच में जोश भरा. पेरिसिच का यह गोल दर्शनीय था जिसने लुजनिकी स्टेडियम में बैठे दर्शकों को रोमांचित करने में कसर नहीं छोड़ी. क्रोएशिया को फ्री किक मिली और फ्रांस इसके खतरे को नहीं टाल पाया.

मैंडजुकिच और डोमागोज विडा के प्रयास से गेंद विंगर पेरिसिच को मिली. उन्होंने थोड़ा समय लिया और फिर बाएं पांव से शाट जमाकर गेंद को गोल के हवाले कर दिया. फ्रांसीसी गोलकीपरी ह्यूगो लोरिस के पास इसका कोई जवाब नहीं था. लेकिन इसके तुरंत बाद पेरिसिच की गलती से फ्रांस को पेनल्टी मिल गयी. बाक्स के अंदर गेंद पेरिसिच के हाथ से लग गयी. रेफरी ने वीएआर की मदद ली और फ्रांस को पेनल्टी दे दी. अनुभवी ग्रीजमैन ने उस पर गोल करने में कोई गलती नहीं की. यह 1974 के बाद विश्व कप में पहला अवसर है जबकि फाइनल में हाफ टाइम से पहले तीन गोल हुए.

कहीं गम……

क्रोएशिया ने इस संख्या को बढ़ाने के लिए लगातार अच्छे प्रयास किये लेकिन फ्रांस ने अपनी ताकत गोल बचाने पर लगा दी. इस बीच पोग्बा ने देजान लोवरान को गोल करने से रोका. क्रोएशिया ने दूसरे हाफ में भी आक्रमण की रणनीति अपनायी और फ्रांस को दबाव में रखा. खेल के 48वें मिनट में लुका मोड्रिच ने एंटे रेबिच का गेंद थमाई जिन्होंने गोल पर अच्छा शॉट जमाया लेकिन लोरिस ने बड़ी खूबसूरती से उसे बचा दिया. लेकिन गोल करना महत्वपूर्ण होता है और इसमें फ्रांस ने फिर से बाजी मारी.

दूसरे हाफ में वैसे भी उसकी टीम बदली हुई लग रही थी. खेल के 59वें मिनट में किलियान एमबापे दायें छोर से गेंद लेकर आगे बढ़े. उन्होंने पोग्बा तक गेंद पहुंचायी जिनका शॉट विडा ने रोक दिया. रिबाउंड पर गेंद फिर से पोग्बा के पास पहुंची जिन्होंने उस पर गोल दाग दिया. इसके छह मिनट बाद एमबापे ने स्कोर 4-1 कर दिया. उन्होंने बायें छोर से लुकास हर्नाडेज से मिली गेंद पर नियंत्रण बनाया और फिर 25 गज की दूरी से शॉट जमाकर गोल दाग दिया जिसका विडा और सुबासिच के पास कोई जवाब नहीं था.

एमबापे ने 19 साल 207 दिन की उम्र में गोल दागा और वह विश्व कप फाइनल में गोल करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गये. पेले ने 1958 में 17 साल की उम्र में गोल दागा था. क्रोएशिया लेकिन हार मानने वाला नहीं था. तीन गोल से पिछड़ने के बावजूद उसका जज्बा देखने लायक था लेकिन उसने दूसरा गोल फ्रांसीसी गोलकीपर लोरिस की गलती से किया. उन्होंने तब गेंद को ड्रिबल किया जबकि मैंडजुकिच पास में थे. क्रोएशियाई फारवर्ड ने उनसे गेंद छीनकर आसानी से उसे गोल में डाल दिया.

इसके बाद भी क्रोएशिया ने हार नहीं मानी. उसने कुछ अच्छे प्रयास किए लेकिन उसके शॉट बाहर चले गए. इस बीच इंजुरी टाइम में पोग्बा को अपना दूसरा गोल करने का मौका मिला लेकिन वह चूक गए. रेफरी की अंतिम सीटी बजते ही फ्रांस जश्न में डूब गया.

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भाजपा नेता से परेशान 200 दलितों ने दिया धर्म परिवर्तन का अल्टीमेटम

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पटना। बिहार के समस्तीपुर जिले से चौंकाने वाली खबर है. यहां दलित समाज के 200 लोगों ने स्थानीय प्रशासन को इस्लाम धर्म कबूलने का अल्टीमेटम दिया है. इस लोगों ने स्थानीय भाजपा नेता रघुवीर मिश्रा के भाई रणवीर मिश्रा पर प्रताड़ित करने का आरोप लगा है. मामला समस्तीपुर जिले के उजियारपुर प्रखंड अंतर्गत हरपुर रेवाड़ी गांव का है

पीड़ित सुजीत कुमार राम के अनुसार 24/06/2018 को वह घर के पास अपने पंचर बनाने की दुकान पर काम कर रहा था जहां दबंग रणबीर मिश्रा अपने साथियों के साथ आए और बोला कि मेरा पंक्चर बनाओ. सुजीत ने पंक्चर बनाने से मना कर दिया क्योंकि पहले से ही आरोपी लोग दबंगता के साथ सुजीत के दुकान पर काम करवाया करता था और पैसा नहीं देता था जिसके कारण पहले का भी बकाया पैसा था.

पीड़ित सुजीत ने कहा कि पहले पहले का पैसा दो तब मैं आपका पंचर बना दूंगा जब सुजीत ने पंचर बनाने से मना कर दिया तो सुजीत से भाजपा नेता के भाई रणवीर मिश्रा ने हाथापाई करना शुरू कर दिया और अपने साथियों के साथ घर पर हमला बोल दिया. पीड़ित लोगों का कहना है कि पूरे दुकान का सामान और घर का सामान माल मवेशी के साथ हमलावरों ने लूट लिया और लाठी डंडे से पिटाई भी की. घटना के बाद स्थानीय अंगार घाट थाना में FIR दर्ज की गई लेकिन Fir पर आज तक कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है.

पीड़ितों का आरोप है कि आरोपी स्थानीय भाजपा नेता का भाई है और प्रशासन पर भाजपा के नेता लोग दबाव बना रहे हैं जिसके कारण प्रशासन कोई कार्यवाही नहीं कर रही है. प्रशासन के तरफ से इस तरह के संवेदनहीन रवैया पर लगातार भाजपा नेता के द्वारा मिल रही धमकी और दबंगों के अत्याचार से ऊबकर दलित समाज के 31 परिवार के 200 से अधिक लोगों ने सामूहिक धर्म परिवर्तन करने का आवेदन स्थानीय जिला अधिकारी को दिया है.

दलित समाज के लोगों का आरोप है कि आरोपी उनलोगों पर दबाव बना रहे हैं कि तुम लोग केस वापस लो और सुलह लगाकर चैन से रहो नहीं तो चैन से नहीं रह पाओगे. आपको बता दें कि एससी एसटी एक्ट के निष्प्रभावी होने के बाद बिहार कथादेश में दलितों पर लगातार अत्याचार की घटनाएं बढ़ रहा है. जिस में आए दिन हत्या वह इस तरह की घटनाएं सामने आती है समस्तीपुर की यह घटना भाजपा और संघ परिवार की राजनीति पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने वाला है. इस घटना ने भाजपा के समरसता के ढोंग की पोल भी खोलकर रख दी है.

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मीडिया में MP में बसपा-कांग्रेस गठबंधन की खबर को बसपा ने किया खारिज

नई दिल्ली। मीडिया में बसपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरें जोर से चल रही है. एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ने तो बसपा-कांग्रेस के गठबंधन का फार्मूला भी पेश कर दिया है. मीडिया संस्थान के मुताबिक प्रदेश में बसपा 26 सीटें जबकि कांग्रेस 204 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हालांकि बहुजन समाज पार्टी के मध्यप्रदेश अध्यक्ष ने इस खबर को खारिज किया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस ने चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन तय कर लिया है. कांग्रेस राज्य में बीएसपी को 26 सीटें देने को राजी हो गई है, जबकि 204 सीटों पर कांग्रेस खुद अपने प्रत्याशी उतारेगी. रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी से गठबंधन को लेकर मिली हरी झंडी के बाद कमलनाथ ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलकर सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा की है. इसमें तय हुआ है कि बसपा विंध्य, बुंदेलखंड, चंबल में अपने प्रभाव वाली सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी. इस खबर पर दलित दस्तक ने मध्य प्रदेश के बसपा अध्यक्ष से बात की तो उन्होंने इस खबर को भ्रामक बताया. प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार का कहना था कि कांग्रेस पार्टी जान बूझ कर इस तरह की खबरें प्रायोजित कर रही हैं. अहिरवार के मुताबिक कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अभी तक हमें केंद्रीय नेतृत्व की ओर से कोई सूचना नहीं मिली है. गौरतलब है कि इससे पहले भी बसपा के प्रदेश स्तर के नेता कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरों से इंकार करते रहे हैं. तो सवाल है कि आखिर गठबंधन की खबरें मीडिया में कैसे तैर रही है?

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Jio इ्स्टीट्यूट और मोदी सरकार का हैरान करने वाला फैसला

Jio Institute of Reliance Foundation नाम जानते हैं इस संस्थान का? या कोई फ़ोटो है इस संस्थान की ? या किसी स्टूडेंट को जानते हैं जो वहाँ पढ़ रहा है?? यक़ीनन कुछ नहीं पता होगा इस संस्थान के बारे में. लेकिन अंबानी को बिकी हुई मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने जो छः एमिनेंस संस्थान की घोषणा की है उसमें जियो यूनिवर्सिटी का भी एक नाम है वो भी निजी कोटे से.

दरअसल ऐसा कोई संस्थान है ही नहीं. अभी स्थापना नहीं हुई लेकिन सरकार को शायद ज्योतिषों-पंडो या किसी ओझा-तांत्रिक ने बताया होगा कि जब भी जियो फाउंडेशन बनेगा बिल्कुल टॉप क्लास वाला बनेगा. यानी हवाई किला है फिर भी यह देश के सब संस्थानों से ऊपर है. सरकार द्वारा जारी तस्वीरों में बाकी चयनित इंस्टिट्यूट IIT( दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू) BITS पिलानी, मनिपाल यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग्स की ऑरिजनल फ़ोटो हैं, लेकिन जिओ इंस्टिट्यूट का नहीं. यहाँ तक कि गूगल बाबा भी आपको कोई फ़ोटो नहीं दिखा सकता है. इस सूची में जेएनयू क्यों नहीं है आपको बताने की ज़रूरत है क्या??

एकतरफ़ सरकार ने यूजीसी को खत्म कर दिया है और एक सुपरस्पिशियल अथॉरिटी बना दी है जिसमें साफ प्रावधान है कि सरकार जिसे पसंद करेगी या चाहेगी उसे ही पैसा देगी. और दूसरी तरफ सरकार को पसंद क्या आया रिलायंस का हवाई संस्थान जिसका अब तक कोई अस्तित्व ही नहीं है.

अब इस जियो यूनिवर्सिटी पर हम टैक्सपेयरों का पैसा लगेगा जो सरकार देगी. इसका मुनाफा जाएगा अम्बानी की जेब में और उस मुनाफे का कुछ हिस्सा भाजपा को. इस तरह देश की उच्च शिक्षा का कल्याण होगा.

आरक्षण खत्म करके, रोस्टर सिस्टम लागू करके, उच्च शिक्षा को महँगी करके, निजीकरण करके इस देश के बहुजनों को तो उच्च शिक्षा से बेदख़ल करने के लिए सब क़वायद शुरू कर ही ली गई है. रही सही कसर पूरी करेंगे हम लोगों के खून-पसीने की कमाई को चूस कर.

तो बच्चा लोग बजाओ ताली विकास अब हवा में भी आ रहा.

दीपाली तायडे

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भाजपा दलितों का सबसे ज्यादा हितैषी होने की बात तो करती है किंतु…

मैंने जब से होश संभाला है, हमेशा यही सुना कि हरेक सरकार ने गरीबों के हक में जीजान से काम किया है…. करती रही हैं. गरीबी और जातियों को मिटाने के नाम पर न जाने हर सरकार ने कितनी ही योजनाएं बनाईं किंतु समझ नहीं आया कि आजादी के सत्तर साल बाद भी गरीबी का प्रतिशत टस से मस नहीं हो पाया है. जातियां तो और भी पुख्ता होती जा रहीं हैं.  माना कि समाज के गरीब और निरीह समाज में वक्त बदलने के साथ-साथ जरूर कुछ परिवर्तन हुए हैं किंतु उतने नहीं, जितने की जरूरत है/थी. इस प्रकार के परिवर्तन केवल भारत में ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए हैं. अत: इसका श्रेय किसी भी राजनीतिक दल को देना तर्कसंगत नहीं होगा. यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रेत्येक राजनीतिक दल ने दलितों के हक में केवल और केवल वोट बैंक को साधने के लिए हमेशा खोखले वादे किए हैं.

आज की भाजपा यानि कि मोदी सरकार भी यही कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी होने की बात तो जरूर करते हैं पर हकीकत कुछ और ही है. भारतीय जनता पार्टी दलितों के वोट हासिल करने के लिए जोरदार कोशिश करती हुई दिखती है, लेकिन अपनी पार्टी के पुराने दलित नेता और उनके परिजनों की बेकदरी करने से बाज नहीं आती. फिर ये कैसे आशा की जा सकती है कि मोदी सरकार आम जनमानस के हित की बात पर यकीन रखती है. और तो और देश के और भाजपा द्वारा बनाए गए दलित राष्ट्रपति का दर्जा आज भी दलित होने का ही बना हुआ है. उनके साथ भी जगन्नाथ के मन्दिर में अपमान जनक सुलूक किया गया. अब राम कोविन्द जी को राष्ट्रपति तो बना दिया गया किंतु ‘जाति’ है कि जाती ही नहीं.  फिर भी दलित मन्दिर जाने से भला परहेज क्यों नहीं करते?

भाजपा आज पूरे देश में शासन कर रही है. उसी भारतीय जनता पार्टी के जनक रहे अटल बिहारी बाजपेयी के समय जनसंघ से लखना विधानसभा सुरक्षित सीट से दो बार विधायक रहे रामलखन धोबी का परिवार आज गुजारे के लिए परेशान है. रामलखन धोबी 1974 में पहली बार ‘दीपक’ चुनाव निशान वाली जनसंघ पार्टी से व 1977 में जनसंघ के बाद बनी जनता पार्टी से विधायक लखना विधानसभा से जीते थे. आज भी उनके परिवार की निष्ठा भाजपा के साथ है. घर के दरवाजे पर आज भी कमल के निशान वाला भाजपा का स्टिकर चिपका है. किंतु लखना का परिवार दलितीय जिन्दगी जीने को ही मजबूर है. अब इसे लखना के साथ भेदभाव वाला रवैया कहें या इतना होने पर भी लखना के परिवार की अदूर्शिता? खैर! ये तो एक परिवार की बात रही. समूचे समाज के प्रति भाजपा का इस प्रकार का ही उपेक्षापूर्ण रवैया आज भी बना हुआ है.

भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह अपनी किसी भी सभा में यह कहने से नहीं चूकते कि भाजपा दलितों के साथ है. किंतु वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा बजरिए सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को कमजोर करा दिया गया. और जब 2 अप्रैल 2018 को भाजपा के इस पराक्रम के खिलाफ दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों  द्वारा सामूहिक आन्दोलन किया गया तो इसी भाजपा सरकार ने दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के अनेक नौजवानों को झूटे मामले बनाकर जेलों में ठूंस दिया गया. बहुत से तो आज तक जेल की सलाखों के पीछे हैं. माब लिंचिग के जितने भी मामले हैं, सबके शिकार दलित अथवा अल्पसंख्यक ही हुए है; गोरक्षा के नाम पर सबसे ज्यादा दलितों और अल्पसंख्यकों को ही निशाना बनाया गया है; महिला बलात्कार के मामले भी ज्यादातर इसी वर्ग की महिलाओं के साथ हुए हैं.  किंतु अमित शाह बारबार यह आश्वासन देने से नहीं चूकते कि केंद्र सरकार दलित समुदाय के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी. भाजपा प्रमुख ने एक साथ कई ट्वीट करते हुए कहा, ‘सरकार दलितों के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करना जारी रखेगी…..’ किंतु धरातल पर उनकी घोषणा के विपरित ही काम हो रहे हैं.

काफी शोरशराबे के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी एक्ट पर आदेश देने के दिन से ही केंद्र सरकार तत्काल और सजगता के साथ सक्रिय तो हो गई किंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले को ठंडे बस्ते में ही डाल दिया गया. हुआ यूँ कि समाज में दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के खिलाफ और भी भयावह घटनाएं घटने लगीं हैं. न्यायलाय से बेल मिलने के बावजूद भीम सेना के रावण को रासुका के तहत जेल में डाल दिया गया. रोहित विमोला के कातिलों को आजतक नहीं पकड़ा गया. पुलिस को तो केवल बहाना चाहिए था… वो सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर असल में अमल करने में लग गई. यदि भाजपा सरकार दलितों के हक में है तो फिर इस बाबत पुराने एक्ट को ही लागू कराने के लिए सरकारी विधेयक क्यों नहीं लाई? भाजपा सरकार में मंत्री पद पर विराजमान दलित नेता पासवान यह कह कर कि सरकार अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को पुन: अपने प्राथमिक रूप में बनाए रखने के लिए ‘अध्यादेश’ लाएगी. किंतु अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है.

अमित शाह का ये कहना कि सरकार द्वारा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 2015 में संशोधन कर वास्तव में उसे और शक्ति प्रदान की है, किसी अत्यंत ही भद्दे मजाक से कम नहीं है. कमाल की बात तो ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जिस जज आदर्श गोयल ने ‘उदय ललित’ के साथ मिलकर SC,ST एक्ट को बर्बाद कर दिया, उसे सेवा निवृत्त होते ही  नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के चेयरमैन जैसे मालदार पद पर अगले पांच साल के लिए बैठा दिया. फिर ये कैसे मान लिया जाय कि एस सी/एस टी एक्ट को कमजोर करने में मोदी सरकार का हाथ नहीं है? क्या इसके बाद भी SC-ST को आगामी चुनावों अपनी भूमिका तय नहीं करनी चाहिए? कहने को तो भाजपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपने को पूरा करने को भाजपा की प्रतिबद्धता बताती है पर करती कुछ नहीं.

अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों में एस सी/ एस टी/ओ बी सी को आरक्षण दिए जाने का सवाल उठाकर भाजपा अपने किए पर पर्दा डालने का काम ही नहीं रही अपितु उसे  वंचितों की फिक्र कम राजनीति की ज्यादा चिंता है. सरकारी नौकरियों में आरक्षण को कायम रखने के नाम पर भी भाजपा दोहरी भूमिका में नजर आ रही है. प्रशासनिक नौकरियों में सीधे भर्ती करना, निजी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था न करना, ठेकेदारी प्रथा को बढावा देना और न जाने कितने ही अघोषित दलित विरोधी कार्यक्रम मोदी सरकार द्वारा चलाए गए हैं, उनकी गणना करना ही दुर्लभ है. यदि विपक्षी राजनीतिक दल उनके इस घृणित कार्य की ओर उंगली उठाते हैं तो भाजपा के प्रवक्ता इतिहास पर ही सवाल करके विपक्षियों के सवाल को खारिज करने का काम करते हैं. अब कोई इनसे पूछे कि यदि आज के विपक्षी दलों ने गलतियां न की होती तो भाजपा की सरकार किस बिना पर बनती. इस प्रकार भाजपा पुरानी सरकारों की कमियों को सामने लाकर अपनी कमियों को छुपाती रहेगी?

अब मोदी जी तो कुछ बोलते नहीं है. पहले वो कहते थे कि मनमोहन सिंह मौनी बाबा है. उनके अनुसार, क्या अब ये कहा जाए कि मनमोहन सिंह जी तो कम बोलते थे, किंतु मोदी जी तो किसी की सुनते ही नहीं. शाह कहते हैं कि भाजपा का मत स्पष्ट है कि हम बाबा साहेब द्वारा प्रदत्त संविधान और इसमें एससी तथा एसटी समुदाय को दिए गए अधिकारों में पूर्ण विश्वास रखते हैं…..किंतु शाह केवल और केवल बयान देते हैं, होता-जाता कुछ नहीं.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के संबंध में दलित सांसदों ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की. उन्हें आश्वासन दिया गया कि सरकार उनके अधिकारों की रक्षा और उनके भले के लिए सब कुछ कर रही है….और दलित सांसद इतना सुनकर शांत हो गए. प्रत्युत्तर में एक का भी मुंह नहीं खुला कि जो सरकार इस बाबत विधेयक कब तक लाएगी. … अब बेचारों को अपनी कुर्सी भी तो बचानी है कि नहीं.

चलते-चलते इस बात और कि दिनांक 16.07.2018 के दैनिक जागरण  के राष्ट्रीय संस्करण में खबर है कि भाजपा एस सी /एस टी वर्ग के पढे-लिखे लोगों को जमीनी संगठन का सरताज बनाएगी. मिशन 2019 को लेकर भाजपा ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लोगों को बूथ कमेटियों का कर्णधार बनाने का लक्ष्य तय किया है. पार्टी नेतृत्व ने तय किया है कि संगठन के पदाधिकारी से लेकर नेता और बड़े कार्यकर्ता भी इस मुहिम को सफल बनाने के लिए गांवों में कैंप करेंगे. स्मरण रहे कि भाजपा का यह निर्णय मिशन 2019 के तहत लिया गया है. भाजपा 2019 के लोक सभा चुनाव में ‘साम, दाम दण्ड, भेद’ जैसे सारे हथकंडे अपनाएगी, इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता. यह आज की राजनीति का सबसे भयानक चेहरा है.

बिहार दौरे पर गए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रति बूथ एससीएसटी वर्ग से 10 कार्यकर्ताओं का चयन कर संगठन में शामिल करने का जो निर्णय लिया है इसके पीछे भाजपा की हताशा साफ झलकती है.  भाजपा का मानना है कि इस पहल से विपक्षी दलों के आधार वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ संगठन के लिए यह मुहिम वरदान साबित होगी. इतना ही नहीं इस प्रकार भाजपा एस सी /एस टी वर्ग के युवाओं को पद का लालच/झांसा देकर भाजपा से विमुख दलितों को अपने पाले में खींचने का नापाक काम करना चाहती है. अब दलितों पर निर्भर है कि वो भाजपा के इस झांसे से बच पाते है कि नहीं. और इसमें एस सी /एस टी वर्गे के युवाओं को भाजपा इस झांसे में न आने की भूमिका निभानी होगी कि वो भाजपा द्वारा बांटी जाने वाली बूर को तिलांजली देकर समूचे दलित समाज के हक में काम करें.

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बहनजी ने दिया मोदी की आजमगढ़ रैली का जवाब

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने कहा है कि पीएम मोदी हताश हैं और लोकसभा चुनाव इसी साल संभव है. बसपा प्रमुख ने एक बयान जारी कर पीएम मोदी को घेरते हुए कहा कि मोदी विकास की राग छोड़कर जिस प्रकार श्मसान-कब्रिस्तान, तलाक, हिन्दू-मुस्लिम, विपक्ष के खिलाफ फेक न्यूज व जातिवादी एवं सांप्रदायिकता आदि की वकालत व सरकारी संरक्षण करने में लगे हैं. इससे साफ हो रहा है कि वो हताश हैं.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि हताशा में भाजपा देश को जातिवादी और साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने को तैयार हैं. मायावती ने यह भी कहा कि हताश मोदी लोकसभा का चुनाव समय से पहले इस साल के अंत तक करवा सकते हैं. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की सरकार को गिराकर बीजेपी इसकी भूमिका पहले ही तैयार कर चुकी है.

पीएम मोदी के आजमगढ़ व मिर्जापुर में दिए गए भाषण को चुनावी जुगाड़ों वाला भ्रामक भाषण बताते हुए उन्होंने कहा कि कर्नाटक में विपक्ष के साथ मिलकर भाजपा को पटखनी देने वाली बसपा प्रमुख ने कहा कि कर्नाटक में तमाम हथकंडे अपनाने के बावजूद सरकार नहीं बना पाने के कारण बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कुण्ठा व हताशा से ग्रस्त है. देश भर में व उत्तर प्रदेश में अटकी तमाम सरकारी परियोजनाओं की ओर इशारा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि तमाम परियोजनाओं के अटके, लटके व भटके रहने में बीजेपी की सरकारों का भी खास योगदान है, आखिर पीएम मोदी इसे स्वीकार करने से क्यों कतराते हैं.

मध्यप्रदेश की 80 सीटों का फैसला करेंगे दलित-आदिवासी दल

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के चुनाव में सारी बहस कांग्रेस और भाजपा के बीच टिक गई है. इस बीच बसपा किसको समर्थन देगी यह भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इसकी वजह भी है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 44.88 फीसदी और कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोट मिले थे. वहीं, बहुजन समाज पार्टी के पास 6.29 फीसदी वोट थे. इस लिहाज से ये प्रदेश की राजनीति में ये तीनों दल काफी महत्वपूर्ण हैं.

लेकिन इन तीनों दलों से इतर कुछ और राजनीतिक दल भी मध्यप्रदेश की राजनीति में काफी मायने रखते हैं. और प्रदेश में सत्ता किसके पास जाएगी, इसमें इन दलों की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. इन दलों में सबसे पहले गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का नाम आता है. पिछले विधानसभा चुनाव में उसके पास एक फीसदी वोट था. यूं तो ऊपर से देखने पर यह वोट प्रतिशत बहुत कम नजर आता है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को गौर से देखें, तो बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और दूसरे छोटे दलों ने 80 से अधिक सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. विधानसभा चुनावों में इतने वोट काफी मायने रखते हैं.

अगर मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनावी नक्शे पर बीएसपी को गौर से देखें तो यह उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में खासा असर रखती है. इसमें मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, अशोक नगर, सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी और सिंगरौली जैसे 14 जिलों में बीएसपी का खासा असर है. यानी एक तिहाई मध्यप्रदेश में बीएसपी की पकड़ है. 2013 विधानसभा चुनाव में 62 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं, जहां बीएसपी के प्रत्याशी ने 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. तो 62 में से 17 सीटें ऐसी हैं जहां बीएसपी को 30,000 से ज्यादा वोट मिले हैं.

जहां तक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का सवाल है तो आदिवासी बहुल सीटों पर उसने अपनी ताकत दिखाई है. पिछले विधानसभा चुनाव में जीजीपी ने ब्योहारी, जयसिंहनगर, जैतपुर, पुष्पराजगढ़, शाहपुरा, डिंडोरी, बिछिया, निवास, केवलारी और लखनादौन सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. अशोक भारती की जन सम्मान पार्टी भी अपनी दावेदारी जता रही है.

इसके अलावा जय आदिवासी युवा शक्ति यानि जेएवाईएस भी आगामी विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने को तैयार है. एम्स की नौकरी छोड़कर इस संगठन की कमान संभालने वाले 35 साल के डॉ. हीरा अलावा का संगठन आदिवासियों के लिए प्रदेश में आरक्षित सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने या फिर दूसरों को समर्थन देने को तैयार है. संगठन की नजर उन 50 सीटों पर भी है, जहां आदिवासी समाज का 20 फीसदी से ज्यादा वोट है.

इस संगठन के दावे को इसलिए हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि पिछले साल अक्टूबर में हुए छात्र संघ के चुनावों में धार जिले के छात्र परिषद में उसके नौ अध्यक्ष और 162 सदस्य जीतकर आए थे. इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह संगठन राज्य सरकार के तमाम कार्यक्रमों में ‘वनवासी’ शब्द को ‘आदिवासी’ शब्द में बदलवाने में कामयाब रहा था. मध्य प्रदेश की राजनीति में ये छोटे दल चुनाव बाद बड़े खिलाड़ी बनकर उभर सकते हैं.

उन चार लोगों के बारे में जानिए जो राज्यसभा के लिए हुए हैं फाइनल

राज्यसभा के लिए चयनित चार नए नाम

नई दिल्ली। राज्यसभा में अब चार नए चेहरे दिखेंगे. भाजपा सरकार की अनुशंसा पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इन नामों को फाइनल किया है. इसमें संघ के विचारक राकेश सिन्हा, मशहूर नृत्यांगना सोनल मानसिंह, किसान नेता राम शकल सिंह और प्राचीन धरोहरों को संजोने वाले रघुनाथ महापात्र का नाम शामिल है. इन सभी नामों को राष्ट्रपति की ओर से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया है.

राज्यसभा के लिए चुने गए इन नामों की बात करें तो 53 साल के राकेश सिन्हा संघ के विचारक हैं और मीडिया में संघ का पक्ष रखने के लिए जाने जाते हैं. सिन्हा ‘इंडिया पालिसी फाउंडेशन के संस्थापक और मानद निदेशक हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में मोतीलाल नेहरू कॉलेज में प्रोफेसर और भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान के सदस्य हैं. राकेश सिन्हा ने संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखी है जिसे भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है. माना जा रहा है कि सिन्हा को इसी का इनाम मिला है.

उत्तर प्रदेश के राम शकल सिंह ने दलित समुदाय के कल्याण एवं बेहतरी के लिए काम किया है. एक किसान नेता के रूप में उन्होंने किसानों, श्रमिकों के कल्याण के लिए काम किया, वे तीन बार सांसद रहे और उत्तर प्रदेश के राबर्ट्सगंज का प्रतिनिधित्व किया था. राम शकल सिंह की उम्र 55 साल है.

एक अन्य नामित सदस्य रघुनाथ महापात्रा का पारंपरिक स्थापत्य और धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उनके प्रसिद्ध कार्यों में 6 फुट लंबे भगवान सूर्य की संसद के सेंट्रल हाल में स्थित प्रतिमा और पेरिस में बुद्ध मंदिर में लकड़ी से बने बुद्ध हैं. जाने-माने मूर्तिकार महापात्रा पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित हैं. रघुनाथ महापात्रा 75 साल के हैं और इनकी मूर्तिकारी का डंका भारत ही नहीं, विदेशों में भी बजता है.

जबकि सोनल मानसिंह प्रख्यात भरतनाट्यम और ओडिसी नृत्यांगना हैं. मौजूदा सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए नवरत्न चुने तो उसमें इन्हें भी जगह दी गई. सोनल मानसिंह भारत सरकार ने 1992 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था. सोनल मानसिंह मशहूर नृत्यांगना हैं और पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं.

अलग-अलग विधा और क्षेत्र के इन नामों को नामित कर सरकार ने जहां प्रतिभाओं का सम्मान किया है तो वहीं जनता के बीच एक साकारात्मक संदेश देने में भी सफल रही है.

मदर टेरेसा से भारत रत्न सम्मान वापस लेना चाहते हैं संघ और भाजपा नेता

नई दिल्ली। आरएसएस और भाजपा के कुछ बड़े नेता दिवंगत संत मदर टेरेसा से भारत रत्न का सम्मान वापस लेना चाहते हैं. इन नेताओं का कहना है कि रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केंद्रों से बच्चे बेचने की बात सही साबित होती है तो दिवंगत मदर टेरेसा को दिया भारत रत्न सम्मान वापस लेना चाहिए. मदर टेरेसा से यह सम्मान लेने की वकालत आरएसएस के दिल्ली प्रचार प्रमुख राजीव तुली ने की है तो वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तुली की इस मांग का समर्थन किया है.

तुली के मुताबिक मदर टेरेसा ने कभी भी ‘लोक कल्याण के लिए काम नहीं किया. जबकि सुब्रह्मणयम स्वामी का कहना है कि ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर की किताब ‘द मिशनरी पोजीशन: मदर टेरेसा इन थ्योरी ऐंड प्रैक्टिस’ में पूरा दस्तावेज दिया गया है कि किस प्रकार मदर टेरेसा ने जालसाजी की.

File Photo: मदर टेरेसा को ‘भारत रत्न’ देते भारत के राष्ट्रपति एन. संजीव रेड्डी

दरअसल ये पूरा मामला इस साल मई में सामने आया, जब मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े होम से एक नवजात शिशु को एक दंपति ने 1.20 लाख रुपए में लिया था. इस दंपति से नवजात के जन्म और चिकित्सा देखभाल के नाम पर ये रकम ली गई थी. दंपति का आरोप है कि चैरिटी संस्थान ने ये आश्वासन देकर बच्चा वापस ले लिया कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद बच्चा लौटा दिया जाएगा. जब बच्चा वापस नहीं मिला तो दंपति ने इसकी शिकायत चाइल्ड वेलफेयर कमेटी से कर दी.

गौरतलब है कि मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया था. मदर टेरेसा को पिछले साल ही वेटिकन से संत की उपाधि मिली है.

हिन्दू राष्ट्र पर शिवसेना का भाजपा पर वार

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा बार-बार हिन्दू राष्ट्र के समर्थन में बयान देने पर शिवसेना ने भाजपा को घेरा है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे पर कहा कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए 2019 तक रुकने की जरूरत नहीं है. ऐसी घोषणा पीएम मोदी अब भी कर सकते हैं और यह घोषणा वे तत्काल करें, ऐसा हमारा आग्रह है.

संपादकीय में शिवसेना ने बीजेपी विधायक सुरेंद्र नारायण सिंह के उस बयान पर अमित शाह से मांफी की मांग की है, जिसमें विधायक ने कहा था कि प्रभु श्री राम भी बलात्कार को नहीं रोक सकते. शिवसेना ने कहा है कि यह समस्त हिंदुओं का अपमान है. इसके लिए अमित शाह माफी मांगेंगे क्या? भाजपा पर कटाक्ष करते हुए संपादकीय में लिखा गया है कि अयोध्या में राम का मंदिर नहीं बन पाता, लेकिन लोगों की भावनाओं को छेड़ने के लिए रेलवे रामायण एक्सप्रेस चलाने का काम करती है. 2019 तक ये गैस के गुब्बारे हवा में छोड़े जाएंगे और 2019 में फिर से नई घोषणाएं होंगी. इसे राम राज्य नहीं कहा जा सकता. थरूर के बयान पर संपादकीय में कहा गया है कि थरूर भाजपा की ही भाषा बोलते हैं और संघ को प्रणव बाबू की तरह ही शशि थरूर को भी संघ को प्रवचन देने बुलाना चाहिए.

जानिए कौन है एथलीट की दुनिया में इतिहास रचने वाली हिमा दास

गुरुवार को जब देश सोया हुआ था 18 साल की एक लड़की ने वो कर दिखाया, जिसका देश को पिछले कई सालों से बेसब्री से इंतजार था. उस लड़की का नाम हिमा दास है. आज देश में हर कोई हिमा दास का नाम जानता है. उस शानदार एथलीट ने वो कर दिखाया है जिसे करने से मिल्खा सिंह चूक गए थे, हिमा दास ने वो कर दिखाया है, जिसे पी.टी ऊषा नहीं कर पाईं थीं. देश के खेल के मैदान से जिस खबर का इंतजार सालों से था, वह इंतजार गुरुवार देर रात खत्म हो गया, जब फ़िनलैंड के टैम्पेयर शहर में हिमा दास ने IAAF विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में सबको पछाड़ते हुए सोने का तमगा अपने नाम कर लिया. हिमा ने यह दौड़ 51.46 सेकेंड में पूरा किया. इसके साथ ही हिमा अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स ट्रैक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बन गई हैं.

अब हम आपको बताते हैं कि कौन है हिमा दास. हिमा दास असल के नौगांव नाम के जिले की रहने वाली हैं. एथलिट बनने से पहले हिमा को फ़ुटबॉल खेलने का शौक था. वह आस-पास के इलाके में छोटे-मोटे फ़ुटबॉल मैच खेलकर 100-200 रुपये जीत लेती थी. ये कुछ रुपये हिमा के परिवार वालों के लिए बहुत मायने रखते थे. क्योंकि कई बार तो इन्हीं पैसों से उसके घर का चूल्हा जलता था. हिमा के घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब है. उनके पिता एक छोटे किसान हैं और खेती-बाड़ी करते हैं, जबकि मां घर संभालती हैं.

हिमा के एथलीट बनने की कहानी जनवरी 2017 में शुरू हुई. हिमा राजधानी गुवाहाटी में एक कैम्प में हिस्सा लेने आई थीं. तभी निपुण दास की नज़र उन पर पड़ी. हिमा जिस तरह से ट्रैक पर दौड़ रही थी, निपुण दास को लगा कि इस लड़की में आगे तक जाने की काबिलियत है. हिमा ने निपुण को इतना प्रभावित किया कि वो हिमा के गांव में उनके माता पिता से मिलने पहुंच गए. उन्होंने हिमा के माता-पिता को बेटी की खासियत बताई और कहा कि वे हिमा को बेहतर कोचिंग के लिए गुवाहाटी भेज दें. अब दिक्कत यह थी कि हिमा के माता-पिता बेटी के गुवाहाटी में उनके रहने का खर्च तक उठाने की स्थिति में नहीं थे. हालांकि वो बेटी को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे.

तब निपुण ने एक रास्ता निकाला. उन्होंने तय किया कि अगर हिमा के घरवाले उसे गुवाहाटी भेजने को तैयार हो जाएं तो हिमा के गुवाहाटी में रहने का खर्च वो खुद उठाएंगे.  हिमा के घरवाले इसके लिए मान गए और इस तरह हिमा गुवाहाटी आ गई.

हिमा की सफलता की पटकथा यहीं से लिखी जानी शुरू हो गई. हिमा फुलबाल खेलती थीं तो उनमें काफी स्टेमिना था. निपुण जब हिमा को फ़ुटबॉल से एथलेटिक्स में आने के लिए तैयार करने लगे तो शुरुआत में उन्होंने 200 मीटर की तैयारी करवाई, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हो गया कि हिमा 400 मीटर में अधिक कामयाब रहेगी. बस फिर क्या था…. हिमा दौड़ने लगी.

 अप्रैल में गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में हिमा दास छठे स्थान पर रही थीं. तो वहीं हालिया राष्ट्रमंडल खेलों की 4X400 मीटर स्पर्धा में भी वे शामिल थीं, हालांकि तब भारतीय टीम सातवें स्थान पर रही थी. लेकिन हिमा को सिर्फ स्वर्ण पदक दिख रहा था. वो इससे कम पर समझौते के लिए तैयार नहीं थीं. और आखिरकार हिमा ने जब फिनलैंड के टैम्पेयर में स्वर्ण पदक जीतकर वो कर दिखाया, जिसे न कर पाने की कसक पूरे देश को कई सालों से खल रहा था.

हिमा को मिली इस कामयाबी के बाद पूरा देश उन्हें बधाइयां दे रहा है. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री  तक ने उन्हें इस ऐतिहासिक कामयाबी के लिए ट्वीट कर बधाई दी है. हिमा ने भी सभी का धन्यवाद दिया है कि और कहा है कि वे देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर बेहद खुश हैं, वे आगे भी और अधिक मेडल जीतने की कोशिश करेंगी.

लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि बड़े-बड़े मैदानों में सारी सुविधाओं से लैस खिलाड़ी जब पीछे छूट जाते हैं तो वहीं पी.टी. उषा, मिल्खा सिंह और हिमा दास जैसे गरीबी और अभाव के बीच से निकले खिलाड़ी देश का नाम और नाक ऊंचा करते हैं. फिनलैंड में तिरंगा लहराती भारत की नई उड़न परी हिमा दास और उनकी प्रतिभा को पहचानने वाले कोच निपुण दास ने देश को फख्र करने का मौका दिया है.

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सांप्रदायिक राजनीति के भगवा रंग के खिलाफ ताल ठोकता आदिवासी धर्म

झारखंड के गुमला जिले के घाघरा प्रखंड की एक खबर के मुताबिक अपने आदिवासी सरना धर्म और आस्‍था के केंद्र मड़ई (देवी मंडप) पर होने वाले हिंदुत्‍ववादी हमलों और इन हमलावरों को प्राप्त राज्‍य की भाजपा सरकार के मौन समर्थन से आदिवासी समाज आहत है. आहत समाज ने समीर भगत के नेतृत्‍व में 100 से अधिक सरना धर्मालंबी आदिवासी परिवारों ने इस्‍लाम धर्म अपनाने की चेतावनी दी है. अभी तक ब्राह्मणवादी ताकतों की ज्‍यादतियों के खिलाफ दलित जातियों के लोग ही इसप्रकार से इस्‍लाम अपना लेने की धमकियाँ देते रहे हैं और इस्‍लाम अपनाते भी रहे हैं. किंतु आदिवासियों के द्वारा इस्‍लाम अपना लेने की यह धमकी साबित करती है कि आदिवासी भी दलितों के जैसे ही हिंदुत्‍ववादी ताकतों की निरंकुशता के शिकार हैं. झारखंड के सरना धर्मालंबियों की यह चेतावनी भारत के आदिवासियों की स्‍वायत्‍त धार्मिक-सांस्‍कृतिक पहचान को मिटा उन पर हिन्दू धर्म का ठप्‍पा लगा देने की हिन्दुत्‍ववादी सांस्‍कृतिक परियोजना के खिलाफ खदबदाते आदिवासी असंतोष की अभिव्‍यक्ति है.

 यह पूरा प्रसंग राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) द्वारा दिखाये जाने वाले हिन्दू राष्‍ट्र के स्‍वप्‍न में निहित खतरों की ओर साफ संकेत करता है. आर.एस.एस. और उसके राजनीतिक संस्करण भाजपा का हमारे देश के संविधान द्वारा प्रदत्‍त धार्मिक स्‍वतंत्रता के मौलिक अधिकार में कतई विश्‍वास नहीं है. संविधान ने अनुच्‍छेद 25 से 28 तक हर भारतीय व्‍यक्ति को धार्मिक स्‍वतंत्रता से जुड़े कुछ मौलिक अधिकार दिये हैं. इनके अनुसार हर भारतीय नागरिक को यह छूट है कि वह किसी खास धर्म में विश्‍वास रखे या न रखे अथवा धर्म मात्र में ही उसकी आस्‍था न हो. किंतु लगता है कि आर.एस.एस. और भाजपा आदिवासियों को हमारे देश का नागरिक ही नहीं मानते अन्‍यथा वे क्‍यों झारखंड के आदिवासियों के सरना धर्म के प्रति असम्‍मान दिखातेॽ असल में हकीकत यह है कि आर.एस.एस. और भाजपा संविधान प्रदत्‍त लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देने वाले आदिवासियों और उनके शुभचिंतकों को राष्‍ट्रविरोधी और नक्‍सली आरोपित करके हिन्दू राष्‍ट्र के अपने हिंसक यज्ञ में उन्‍हें स्‍वाहा करने की कुनीति को ही अपना धर्म मानते हैं.

 लंबे समय से इस देश के मूल निवासी आदिवासी स्‍वयं को मर्दुमशुमारी में हिन्दू धर्म समेत मुख्‍यधारा के अन्‍य धर्मों के बट्टेखाते में डालने का विरोध करते आ रहे हैं. वे मानते हैं कि उनका धर्म सरना है और हिन्दू धर्म से उनका कोई लेना-देना नहीं है. वास्‍तव में देशभर के तमाम आदिवासी समुदाय प्रकृति के उपासक रहे हैं. वे प्रकृति के साथ समन्‍वय और सहयोग के दर्शन पर आधारित प्राकृतिक धर्म में आस्‍था रखते हैं. चाहे इस आस्‍था को अलग-अलग आदिवासी समुदायों में अलग-अलग नाम दिया जाता हो, किंतु इन सभी नामों के पीछे मूल दर्शन एक ही है. लेकिन गैर आदिवासी सत्‍ता समय-समय पर आदिवासियों की धार्मिक पहचान के खिलाफ राजनीतिक-धार्मिक-कानूनी षड्यंत्र करती रही हैं. प्राचीन काल से ही हिन्दू आर्य आदिवासियों के धर्म और उनकी संस्कृति को लेकर अपने धर्म ग्रंथों में उन्‍हें राक्षस और असुर कहकर तमाम नकारात्‍मक दुष्‍प्रचार करते रहे हैं. औपनिवेशिक काल में विदेशी साम्राज्‍यवाद की शह पाकर चर्चों और मिशनरियों ने भौतिक प्रलोभनों आदि के बल पर आदिवासियों का धर्मांतरण करवाया तो आ‍जादी के बाद भी कांग्रेस की केंद्रीय सरकार ने आदिवासियों की पृथक धार्मिक पहचान को जनगणना में जगह नहीं दी. और केंद्र तथा राज्‍य में सत्‍तारूढ़ आज की हिंदुत्‍ववादी सरकारों के संरक्षण में आर.एस.एस. और उसके आनुषांगिक संगठन आदिवासियों के हिन्दूकरण की मुहिम में जोर-शोर से लगे हुये हैं.

यह मुहिम पूरे दंडकारण्‍य में पहले से ही चलाई जा रही थी. इसमें प्रवासी भारतीयों के पैसे तक लगे थे. आदिवासी इलाकों में वनवासी स्‍कूलों और हनुमान मंदिरों की स्‍थापना, आदिवासियों के बीच हनुमान लॉकेट समेत त्रिशूल वितरण और सारंडा विश्‍व कल्‍याण आश्रम की स्‍थापना– ये सब इसी मुहिम का हिस्‍सा थे. गैर ईसाई आदिवासियों को ईसाई आदिवासियों के खिलाफ भड़काकर कंधमाल का दंगा आदि करवाया गया और उनका शुभचिंतक होने का ढोंग किया गया. दूसरे चरण में धीरे-धीरे उनकी आदिवासी पहचान खत्‍म करके आदिवासी धर्म-संस्‍कृति को भगवा रंग में रंगने की कुत्सित कोशिश की गई.

 जी.एस.घुर्ये (गोबिंद सदाशिब घुर्ये) आदिवासी को हिन्दू साबित करने की जिहादी जिद पकड़े हुए हैं. घुर्ये ने ‘तथाकथित मूल निवासी और उनका भविष्य’ शीर्षक एक पुस्तक लिखी थी जो कई संस्करणों के पश्‍चात् ‘भारत की अनुसूचित जनजातियां’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. इन्होंने हिन्दू समाज के साथ आदिवासियों के समायोजन के आधार पर आदिवासियों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करते हुए उन्हें ‘पिछड़ा हुआ हिन्दू’ साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. इनके सारे तर्क बाण एक ही धनुष से निकलते हैं जो आदिवासियों के जीववादी धर्म और हिन्दू धर्म की तथाकथित मूलभूत समानता के ख्याली तत्वों से बना है.

किंतु अब पढ़-लिख रही आदिवासी पीढ़ी अपनी पहचान के प्रति धीरे-धीरे मुखरित होने लगी है. यह पीढ़ी अब सवाल पूछ रही है कि जब 45 लाख जैनियों और 84 लाख बौद्धों के अल्‍पसंख्‍यक धर्मों को जनगणना में पृथक धर्मों के रूप में मान्‍यता दी गई है तो आदिवासियों को क्‍यों पृथक धार्मिक पहचान के इस लोकतांत्रिक अधिकार से साजिशन वंचित रखा जा रहा है जबकि उनकी संख्‍या इन अल्‍पसंख्‍यक धर्मालंबियों की जनसंख्‍या से कहीं ज्‍यादा ही है. अगर प्राचीनता की बात करे तब भी भारत के अन्‍य धर्मालंबियों की तुलना में आदिवासियों का धर्म कहीं भी उन्‍नीस नहीं ठहरता. अन्‍य धर्मालंबियों के बारे में कटु सत्‍य यह है कि ये सब इतिहास के किसी न किसी चरण में बाहर से आकर यहां बसे हैं अथवा इनका धर्मातंरण हुआ है लेकिन आदिवासी इसी देश के मूल निवासी हैं और उन्‍होंने किसी दूसरे धर्मालंबी का अपने धर्म में धर्मांतरण भी नहीं कराया है.

 वास्‍तव में आर.एस.एस. को आदिवासियों की स्‍वतंत्र स्‍वायत्‍त धार्मिक पहचान इसलिए स्‍वीकार्य नहीं है क्‍योंकि इसके कारण बहुंख्‍यक हिन्दूवाद का उसका दावा दरक जाता है. आर.एस.एस. को तो ‘आदिवासी’ शब्‍द से भी चिढ़ है क्‍योंकि यह एक संज्ञा ही उनके आर्य हिन्दू राष्‍ट्रवाद को मुँह के बल गिरा देती है. आर.एस.एस. बारंबार आदिवासियों के लिए ‘वनवासी’ संज्ञा का प्रयोग करके इन्‍हें हिन्दू किंतु पिछड़ा हिन्दू साबित करने की कोशिश करता रहता है. गौरतलब है कि 2015 के अंतिम चतुर्थांश में रांची में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित अपने अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के अधिवेशन के दौरान भी उसने आदिवासियों के सरना धर्म के दावे को सिरे से खारिज करते हुये कहा था कि सभी आदिवासी हिन्दू होते हैं. आर.एस.एस. के सह सरकार्यवाहक डॉ. कृष्‍ण गोपाल ने सरना धर्म कोड की मांग को संविधान के खिलाफ तक बताया था. आर.एस.एस. की सरना विरोधी इस नीति के खिलाफ उस समय रांची में जमकर विरोध प्रदर्शन हुये थे और आर.एस.एस. के सरकार्यवाहक डॉ. मोहन भागवत समेत सह सरकार्यवाहक डॉ. कृष्‍ण गोपाल के पुतले फूंके गये थे.

 सरना और सनातन धर्म को एक बताये जाने के साथ-साथ हिन्दूवादी लोग आदिवासियों को मूलत: रामभक्‍त भील और शबरी की संताने बताते रहते हैं. इस प्रकार के बेसिर-पैर के हिन्दूवादी मिथकों और मंसूबों के खिलाफ सरना धर्म को लेकर आज झारखंड के विभिन्न आदिवासी संगठनों और राजनीतिक दलों में मतैक्‍य नज़र आता है. सरना महासभा, एशिया पेसिफिक यूथ इंडिजिनेस पीपुल्‍स फोरम, आदिवासी सरना महासभा, आदिवासी जन परिषद्, आदिवासी छात्र संघ, आदिवासी सेंगेल अभियान, झारखंड दिशोम पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि – ये सब समय की मांग को देखते हुये आदिवासी और आदिवासी धर्म-संस्‍कृति की रक्षा के लिए लामबंद होते नज़र आते हैं. 2013 में चार आदिवासी संगठनों – अखिल भारतीय मांझी परगना समिति, अखिल भारतीय सरना धर्म मंडप, ऑल इंडिया संथाली एजुकेशन काउंसिल और झारखंड दिशोम पार्टी ने रांची के आदिवासी यूथ क्‍लब में सरना धर्म के रीति-रिवाजों को संहिताबद्ध करने के लिए तीन दिवसीय सम्‍मेलन का भी आयोजन किया था जिसमें इन संगठनों के लगभग 1000 सदस्‍यों ने शिरकत की थी.

 ईसाइयों और मुस्लिमों की जनसंख्‍या में होने वाली कथित वृद्धि को हिन्दू राष्‍ट्र के खिलाफ इन धर्मों का षड्यंत्र बताने वाला आर.एस.एस. विकास की आड़ में अपनी ही जमीन पर अल्‍पसंख्‍यक बनाये जाते आदिवासियों की त्रासदी पर एक शब्‍द तक नहीं बोलता. अगर हिन्दुओं की ठेकेदारी करने का दंभ भरने वाला आर.एस.एस. वास्‍तव में आदिवासियों को हिन्दू मानता है तो इन अभागे हिन्दुओं की इस त्रासदी पर वह मौनासन में क्‍यों पड़ा रहता हैॽ असल में आर.एस.एस यह कभी सहन नहीं कर सकता कि जनगणना में आदिवासियों को अपने सरना आदिवासी धर्म का विकल्‍प भरने का मौका दिया जाये. उसे यह बात अखरती है कि पिछली जनगणना में झारखंड की कुल जनसंख्या में से 42 लाख 35 हजार 786 लोगों ने अन्‍य के कॉलम में टिक मारा. यह बताने की जरूरत नहीं है कि इतनी बड़ी संख्‍या में अकेले झारखंड से अन्‍य धर्मालंबी का विकल्‍प चुनने वाले ये लोग कौन थे.

 आदिवासी धीरे-धीरे आर.एस.एस. और भाजपा की आदिवासी विरोधी राजनीति का रंग पहचानने लगे हैं और वे जनगणना से लेकर धार्मिक कोड बिल तक में आदिवासी धर्म को संवैधानिक पहचान देने की मांग करने लगे हैं. आदिवासियों की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी आदिवासी समुदायों की पृथक–पृथक पहचानों के नीचे छिपी साझा आदिवासियत को भी रेखांकित कर रही है. आज यह पीढ़ी एक साझा आदिवासी धर्म और आदिवासी कोड बिल की मांग कर रही है. लेकिन आर.एस.एस. आदिवासियों की इस साझा धार्मिक पहचान की मार्ग में अड़ंगे लगाने में जुटी है.

जो लोग झारखंड की राजनीति को निकट से देखते आये हैं, वे पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस आदिवासी राज्‍य में आदिवासियों द्वारा दक्षिणपंथी हिंदुत्‍ववादी रानीतिक पार्टी भाजपा के पक्ष में मतदान करने से हतप्रभ थे. वास्‍तव में यह ईसाई और मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक हिन्दुत्‍व की लहर ही थी कि झारखंड के आदिवासी भी अन्‍य भारतीय आदिवासियों के जैसे अपना भला-बुरा नहीं पहचान पाये थे. लेकिन आज आर.एस.एस. और भाजपा के लोग जिस प्रकार सरना धर्म के प्रतीकों के हिन्दूकरण के माध्‍यम से आदिवासी पहचान को मिटा देने के षड्यंत्रों में खुले आम लिप्‍त हैं, उससे झारखंड के गैर ईसाई आदिवासी भी ईसाई विरोधी सांप्रदायिक राजनीति के असली रंग को पहचानने लगे हैं.

– प्रमोद मीणा लेखक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी में हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. Read it also-मुन्ना बजरंगी की हत्या के लिए जेल में ऐसे पहुंचा था हथियार
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मुन्ना बजरंगी की हत्या के लिए जेल में ऐसे पहुंचा था हथियार

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मुन्ना बजरंगी (फाइल फोटो)
लखनऊ। मुन्ना बजरंगी की हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, एक के बाद एक कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. जेल में हथियार कैसे पहुंचा था, यह एक बड़ी पहेली बनी हुई थी, जिसे पुलिस ने सुलझा लिया है. दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के मुताबिक जांच के बाद यह बात सामने आई है कि पिस्टल को टिफिन में बंद कर के जेल के भीतर पहुंचाया गया था. यह भी कहा जा रहा है कि बागपत जेल में हत्या के बाद आरोपी सुनील राठी नहाया था, ताकि उसके शरीर में गन पाउडर का कोई सबूत न रहे. राठी ने अपने कपड़े भी धुलवा दिए थे, ताकि फोरेंसिक जांच के दौरान पुलिस को कोई सबूत नहीं मिले. इन तमाम गतिविधियों में अपराधियों ने जेल में सीसीटीवी नहीं होने का भी भरपूर फायदा उठाया. इससे पहले एफआईआर से भी कई नई जानकारियां मिली थी. हत्या में इस्तेमाल पिस्टल को खोजने के लिए पुलिस को घंटों मशक्कत करनी पड़ी. सूचना के आधार पर पुलिस ने जेल के गटर से एक बड़े चुंबक की मदद से पिस्टल को बरामद किया. इस दौरान पुलिस को कई कारतूस भी मिले थे.

हिमा दास ने भारत को दिलाया गौरव, ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड जीता

नई दल्ली। भारत में जो अब तक नहीं हो पाया था, हिमा दास ने कर दिखाया है. भारत की हिमा दास ने गुरुवार को फिनलैंड के टेम्पेरे में चल रहे आईएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण जीत कर इतिहास रच दिया है. हिमा दास ने वो कारनामा कर दिखाया है, जिसे करने से मिल्खा सिंह और पीटी उषा चूक गए थे.

हिमा दास से पहले भारत की कोई महिला या पुरुष खिलाड़ी जूनियर या सीनियर किसी भी स्तर पर विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड या कोई मेडल नहीं जीत सका था. पीटी उषा ने जहां 1984 ओलंपिक में 400 मीटर हर्डल रेस में चौथा स्थान हासिल किया था. मिल्खा सिंह 1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर रेस में चौथे स्थान पर रहे थे. इन दोनों के अलावा कोई भी खिलाड़ी ट्रैक इवेंट में मेडल के करीब नहीं पहुंच सका.

हिमा ने राटिना स्टेडियम में खेले गए फाइनल में 51.46 सेकेंड का समय निकालते हुए जीत हासिल की. इसी के साथ वह इस चैंपियनशिप में सभी आयु वर्गो में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला बन गई हैं. एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भी हिमा दास को शानदार सफलता के लिए बधाई दी है. बुधवार को हुए सेमीफाइनल में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 52.10 सेकंड का समय निकालकर वो पहले स्थान पर रही थीं.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी बधाई

हिमा की इस ऐतिहासिक सफलता पर उन्हें देशभर से बधाइयां मिल रही हैं. राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हिमा को बधाई देते हुए कहा कि हिमा से अब ओलंपिक में पदक का इंतजार है. हिमा की सफलता पर किए गए ट्विट में राष्ट्रपति कोविंद ने लिखा-

“विश्व अंडर-20 चैंपियनशिप में 400 मीटर स्वर्ण जीतने के लिए हमारी शानदार स्प्रिंट स्टार हिमा दास को बधाई. विश्व चैंपियनशिप में यह भारत का पहला ट्रैक गोल्ड है. यह असम और भारत के लिए बहुत गर्व का विषय है; हिमा से अब ओलंपिक में पदक का इंतज़ार! — राष्ट्रपति कोविन्द”

तो वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि यह जीत आने वाले समय में युवाओं को प्रेरित करेगी. अपने ट्विट में पीएम मोदी ने लिखा-

“India is delighted and proud of athlete Hima Das, who won a historic Gold in the 400m of World U20 Championships. Congratulations to her! This accomplishment will certainly inspire young athletes in the coming years.

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दुनिया का यह ताकतवर नेता हो सकता है गणतंत्र दिवस पर मेहमान

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नई दिल्ली। साल 2019 में गणतंत्र दिवस पर भारत का मेहमान कौन होगा, इसको लेकर आखिरी चर्चा खत्म हो गई है. सरकार ने गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को न्योता भेजा है. अब सबकी नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर है कि वह इसे स्वीकार करते हैं या नहीं.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इस साल अप्रैल माह में ही यह न्योता भेजा था और अभी अमेरिकी सरकार से इस पर आधिकारिक जवाब का इंतजार है. लेकिन ऐसे संकेत मिले हैं ट्रंप प्रशासन इस निमंत्रण पर सकारात्मक तरीके से विचार कर रहा है. यह न्योता भेजने के बाद इस बारे में अब तक कई दौर का राजनयिक स्तरीय संवाद भी हो चुका है. गौरतलब है कि ट्रंप से पहले उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा के साल 2015 में रिपब्लिक डे परेड के चीफ गेस्ट थे. अगर ट्रंप इस न्यौते को स्वीकार करते हैं तो इसे विदेश नीति के लिहाज से मोदी सरकार की बड़ी सफलता मानी जाएगी.

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नोएडा में फ्लैट खरीदनें वालों के लिए बड़ी खुशखबरी

नोएडा में अपना फ्लैट खरीदने की चाहत रखने वालों को जिला प्रशासन के एक फैसले से बड़ी खुशखबरी मिली है. दरअसल जिला प्रशासन द्वारा लिए गए एक फैसले के मुताबिक एक अगस्त से नोएडा में फ्लैट का नया सर्किल रेट लागू किया जाएगा. यानि इस राहत से जिले में इस वर्ष सर्किल रेट नहीं बढ़ेगा. प्रशासन ने सुविधाओं के नाम पर लगने वाला तीन फीसदी सर्किल रेट हटा लिया है. इसमें पॉवर बैकअप और लिफ्ट के नाम पर तीन फीसदी चार्ज लगता था जो एक अगस्त से हटा दिया जाएगा.

इसके अलावा मिलने वाले अन्य राहतों में फ्लैट खरीदने वाले लोगों को अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी नहीं देनी होगी. अतिरिक्त चार्ज को 15 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी कर दिया गया है. सर्किल रेट को भी 75 फीसदी से घटाकर 65 फीसदी कर दिया गया है. यह रेट ग्राउंड और अपर ग्राउंड फ्लोर पर लागू होगा. प्रशासन का यह नियम होटलों पर भी लागू रहेगा. दादरी और जेवर में भी पुरानी दरें लागू रहेंगी.

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जातिवादियों ने तोड़ा दलित का निर्माणाधीन पीएम आवास

झुमरीतिलैया। दलित समाज के एक व्यक्ति द्वारा पीएम आवास योजना के तहत बनाया जाने वाला मकान गांव के ही जातिवादियों द्वारा तोड़ने की खबर है. इस संबंध में पीड़ित कौशल्या देवी (पति हरि दास असना इंदरवा वार्ड नंबर पांच निवासी) ने थाना में आवेदन देकर मामले की जांच कर दोषी लोगों पर कार्रवाई करने की मांग की है.

अपने आवेदन में पीड़ित कौशल्या देवी ने कहा है कि उसके ससुर कुंजील रविदास ने 1956 में गांव के ही उगर सिंह (पिता झरी सिंह) से खाता नंबर 108, प्लॉट नंबर 1013, रकवा 16 डिसमिल जमीन खरीदी थी. इस जमीन को उनका परिवार पिछले 61 सालों से जोत रहा है. इस जमीन में चार गोतिया का हिस्सा है. इसी जमीन पर पीड़ित जब अपने हिस्से में पीएम आवास योजना के तहत मकान निर्माण करा रही थी, जातिवादियों ने इसे तोड़ दिया.

पीड़िता के मुताबिक निर्माणाधीन आवास 10 फूट ऊंचा उठाया गया था. मगर 10 जुलाई को ईश्वरधारी सिंह, बैजनाथ सिंह, मुकेश सिंह, किशोर सिंह, गोपाल सिंह उर्फ घप्पु, रोबिन सिंह, सुनील सिंह, हरी सिंह आदि ने हरवो हथियार से लैस होकर कार्य स्थल पर पहुंचे और धमकी दी कि इस मकान को तोड़ों नहीं तो जान से मार देंगे. आरोप यह भी है कि इस दौरान आरोपियों ने गाली गलौज करते हुए जाति सूचक शब्द का भी प्रयोग किया. मना करने के बावजूद भी उन लोगों ने दीवार तोड़ दी, जिससे पीड़िता का काफी नुकसान हो गया.

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जानिए कब आएगा UPSC Civil Services Prelims का रिजल्ट, कैसे देखें रिजल्ट

नई दिल्ली। UPSC Civil Services Prelims Result 2018: यूपीएससी प्रिलिम्स परीक्षा का रिजल्ट जल्द जारी करेगा. प्रिलिम्स परीक्षा का रिजल्ट (UPSC Prelims Result 2018) ऑफिशियल वेबसाइट upsc.gov.in पर जारी किया जाएगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपीएससी प्री रिजल्ट (UPSC Pre Result) की तारीख की घोषणा 13 जुलाई को की जाएगी. प्री परीक्षा का रिजल्ट (UPSC Prelims Exam Result) 22 जुलाई को जारी कर दिया जाएगा. पीएससी प्रीलिम्स (UPSC Prelims Exam 2018) इस साल 3 जून को हुआ था. इस परीक्षा में 3 लाख अभ्यर्थियों ने इस परीक्षा में भाग लिया था. ये परीक्षा देश के कई केंद्रों में आयोजित कराई गई थी. प्रिलिम्स परीक्षा के रिजल्ट के बाद यूपीएससी मुख्य परीक्षा (Civil Services Main examination) के लिए आवेदन लेने शुरू कर देगा. यूपीएससी सिविल सर्विसेज की मुख्य परीक्षा (UPSC Civil Services Main Exam) 28 सितंबर से 7 अक्टूबर तक होगी.

UPSC Prelims Result 2018/UPSC Civil Services Prelims Result 2018 ऐसे करें चेक

स्टेप 1: ऑफिशिल वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं. स्टेप 2: UPSC Prelims Exam Result 2018 के लिंक पर क्लिक करें. स्टेप 3: अपना रोल नंबर और अन्य जानकारी भरें. स्टेप 4: रिजल्ट खुलने पर प्रिंट आउट ले लें.

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