लोकसभा में भी ऐसे ही रहा तो ये होंगे नतीजे

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नई दिल्ली। देश के 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मना जा रहा था. इन चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है. ऐसे में अगर 2019 लोकसभा चुनाव में वोटिंग ट्रेंड ऐसा ही रहा तो फिर बीजेपी और मोदी की सत्ता में वापसी की राह मुश्किल हो जाएगी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोराम में कुल 83 लोकसभा सीटें है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन किया था. पांच राज्यों की 83 लोकसभा सीटों में से बीजेपी के पास 63 सीटें हैं. जबकि कांग्रेस को महज 6 और अन्य को 14 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे कांग्रेस के लिए बेहतर रहे हैं. जबकि बीजेपी के खिलाफ था. इसी तर्ज पर अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग और नतीजे रहे तो कांग्रेस बीजेपी 63 सीटों से घटकर 23 पर आ जाएगी और कांग्रेस 6 से बढ़कर 40 पर पहुंच जाएगी. बाकी सीटें अन्य के खाते में जा सकती है. राजस्थान राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें में से 199 पर चुनाव हुए है, जिनमें से कांग्रेस को 99, बीजेपी को 73, बसपा को 6 और अन्य को 18 सीटें मिली है. लोकसभा की 25 सीटें राज्य में हैं. बीजेपी ने 2014 के चुनाव में सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. विधानसभा चुनाव के नतीजों को लोकसभा से तुलना की जाए तो कांग्रेस को 12 सीटें मिल सकती है. वहीं, बीजेपी को 9 सीटों से संतोष करना पड़ सकती है. जबकि बाकी सीटें अन्य के खाते में जा सकती है. मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 114, बीजेपी को 109 और 7 सीटें अन्य को मिली हैं. सूबे में कुल 29 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 27 सीटें और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थी. विधानसभा चुनाव की तर्ज पर अगर 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे तो कांग्रेस को 16 और बीजेपी 13 सीटें मिल सकती हैं. छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 90 सीटों में से कांग्रेस को 68, बीजेपी को 15 और अन्य को 7 सीटें मिली हैं. राज्य में कुल 11 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने बीजेपी को 10 और कांग्रेस को 1 सीट मिली थी. विधानसभा चुनाव की तर्ज पर लोकसभा के नतीजे रहे तो कांग्रेस को 9 और बीजेपी व अन्य को 1-1 सीटें मिल सकती है. तेलंगाना तेलंगाना में विधानसभा चुनाव 119 सीटों में से कांग्रेस गठबंधन को 21 सीटें, केसीआर को 88, AIMIM को 7 और अन्य को 3 सीटें मिली है. राज्य में 17 लोकसभा सीटें है. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 2, कांग्रेस को 2 और टीआरएस को 11 सीटें मिली थी. विधानसभा की तर्ज पर लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुलेगा. जबकि कांग्रेस को 3 और केसीआर 13 सीटें जीत सकते हैं. मिजोरम मिजोरम में विधानसभा चुनाव 40 सीटों में से कांग्रेस को 5 और बीजेपी को 1 सीटें मिली है. जबकि एमएनएफ को 29 सीटें मिली है. राज्य में एक लोकसभा सीटें है और वो कांग्रेस के पास है. लेकिन ऐसे ही नतीजे रहे तो कांग्रेस को वो सीट गंवानी पड़ सकती है. स्रोतः आज तक

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बसपा का क्या हुआ, यहां देखिए

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File Photo

नई दिल्ली। पांच राज्यों के चुनाव नतीजें साफ हो चुके हैं। अब बहस इस पर हो रही है कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा और कौन मंत्री। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा जिस तीसरी पार्टी पर सबकी नजर थी, वो बहुजन समाज पार्टी है। ऐसे में इस बात का भी विश्लेषण करना जरूरी है कि आखिर इन चुनावों में बसपा कहां ठहरती है।

चुनाव से पहले माना जा रहा था कि बहुजन समाज पार्टी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पूरी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में कामयाब रहेगी। इसकी जायज वजह भी थी। मध्य प्रदेश में बसपा एक मजबूत ताकत मानी जाती है और प्रदेश के कुछ खास हिस्सों में उसकी अच्छी पकड़ है। जबकि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी से गठबंधन के बाद बसपा को तीसरी ताकत के तौर पर देखा जा रहा था। क्योंकि इसके पहले कर्नाटक में जेडीएस के साथ गठबंधन कर बसपा यह साबित कर चुकी थी। लेकिन नतीजों को देखें तो बसपा की उम्मीदों को सबसे बड़ा झटका छत्तीसगढ़ में ही लगा है। तो वहीं मध्यप्रदेश में 2008 के बाद लगातार फिसल रही बसपा इस बार भी नहीं संभल सकी और ज्यादा नीचे चली गई।

आईए आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि इन तीनों राज्यों में बसपा का क्या हाल रहा। सबसे पहले बात सीटों की।

 बसपा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन राजस्थान में किया, जहां उसने 6 सीटें जीती है। जबकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसके दो-दो विधायक जीते हैं।

फायदे नुकसान की बात करें तो बसपा को सीटों और वोट प्रतिशत के लिहाज से राजस्थान में बड़ा फायदा हुआ है। 2013 में बसपा यहां 3 सीटें जीती थी, जो बढ़कर 6 हो गई हैं। उसे 4 फीसदी वोट मिले हैं।

छ्त्तीसगढ़ में बसपा के पास एक विधायक था। इस चुनाव में उसे एक सीट का फायदा हुआ है। लेकिन बसपा का वोट प्रतिशत 2013 के 4.45 प्रतिशत से गिरकर 3.8 प्रतिशत पर आ गया है।

मध्यप्रदेश में बसपा के लिए चिंतन की स्थिति है। 2008 के बाद बसपा यहां संभल नहीं पाई है। राज्य में उसकी सीटें एक बार फिर कम हो गई हैं और वोट शेयर भी गिरा है। 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को यहां 6.29 प्रतिशत वोट मिला था और उसने 4 सीटें जीती थी। इस बार उसकी सीटें दो हो गई हैं और वोट प्रतिशत भी घटकर 4.9 प्रतिशत हो गया है।

जिन सीटों पर बसपा जीती है

अब हम आपको बताते हैं कि बसपा ने कौन-कौन सी सीट जीती है। मध्यप्रदेश में बसपा ने भिंड और पथरिया सीट जीती है,भिंड से बसपा उम्मीदवार संजीव सिंह ‘संजू’ ने जीत हासिल की है। उन्होंने भाजपा को हराया है।

उऩ्हें 69107 वोट मिले हैं,जबकि पथरिया विधानसभा से रामबाई गोविंद सिंह ने भी भाजपा को हराकर जीत दर्ज की है। रामबाई गोविंद सिंह को 39267 वोट मिले हैं।

 राजस्थान में बसपा के 6 उम्मीदवार जीते हैं। इसमें

–    नगर विधानसभा से – वाजीब अली

–    करौली विधानसभा से – लाखन सिंह मीणा

–    नदवई विधानसभा से – जोगेन्द्र अवाना

–    किशनगढ़ वास विधानसभा से – दीपचंद खेड़िया

–    तिजारा विधानसभा से – संदीप कुमार यादव

–    उदयपुर वाटी विधानसभा से – राजेन्द्र गूढ़ा

जबकि छत्तीसगढ़ में बसपा ने पामगढ़ और जैजेपुर की सीट जीती है। पामगढ से इंदू बंजारे ने जीत हासिल की है, जबकि जैजैपुर सीट को बसपा ने बरकरार रखा है। यहां से पार्टी के सिटिंग एमएलए केशव चंद्र दुबारा जीत कर आए हैं।

चुनाव परिणाम के बाद बसपा अध्यक्ष मायावती ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है। मायावती ने 13 दिसंबर को सभी विजयी विधायकों और चुनावी प्रदेशों के पदाधिकारियों को दिल्ली तलब किया है, जहां वह चुनाव परिणाम पर मंथन करेंगी। बहरहाल 2019 के पहले यह चुनाव परिणाम बसपा के लिए भी एक सबक है।

गुजरात में सड़क पर क्यों उतरे हजारों अम्बेडकरवादी

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जूनागढ़ (गुजरात)। डॉ बाबा साहब आंबेडकर जी के 63 वे महापरिनिर्वाण दिन पर गुजरात राज्य के जूनागढ स्थित शहर मे गुजरात भर और अन्य राज्य के आए हुवे स्वयम सैनिक दल परिवार के सैनिक द्वारा डॉ बाबा साहब जी को मान वंदना और सलामी दी गई और साथ मे उनके कार्य को याद किया गया और बडे ही पैमाने मे आए हुवे सभी सैनिक को द्वारा मानवंदना के साथ सामुहिक तौर पर राज्यस्तरीय अधिवेशन मे उनके कार्य को लेकर विचार-विमर्श किया गया और किस तरह बहुजन समाज मे से कुरीतिया व्यसन, और जो सामाजिक बुराई या को नाबुद किया जाए उस पर सामाजिक जागृति के माध्यम से किस तरह यह समाज अपनी हर क्षेत्र मे अग्रसर हो उस पर बाते सभी सैनिक द्वारा रखी गई.

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उर्जित पटेल के बाद एक और अर्थशास्त्री का इस्तीफा

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नई दिल्ली। भारत के जाने माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया है. रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे के अगले ही दिन यह खबर सामने आई है. ख़ास बात ये है कि उन्होंने अपना इस्तीफ़ा एक दिसंबर को दिया था, लेकिन इसकी जानकारी 11 दिसंबर को तब सार्वजनिक हुई जब उन्होंने इस बारे में ट्वीट किया है. सुरजीत भल्ला ने ट्वीट में कहा है कि, “मैंने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की पार्ट टाइम सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है.” भल्ला ने इस्तीफ़ा क्यों दिया है, इसको लेकर उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी है.

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उर्जित पटेल के इस्तीफा मोदी सरकार के लिए कितना बड़ा झटका

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नई दिल्ली। आमतौर पर भारतीय समाज क्रिकेट और राजनीति तक की सीमित रहता है. आर्थिक मुद्दों पर उसकी रुचि कम ही रहती है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था एक ऐसा पहलू है, जिसका प्रभाव हर एक व्यक्ति पर पड़ता है. इसी से जुड़ी एक बड़ी खबर सोमवार 10 दिसंबर को सामने आई, जब भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. पटेल रिजर्व बैंक के 24वें गवर्नर थे. उनका कार्यकाल अगले साल 4 सितंबर को खत्म होना था. कार्यकाल खत्म होने के 9 महीने पहले इस्तीफा देने के उर्जित पटेल के फैसले से सरकार को बड़ा झटका लगा है. पटेल ने 4 सितंबर 2016 से प्रभार संभाला जो जनवरी 2013 से डिप्टी गवर्नर पद पर थे.

हालांकि उन्होंने इस्तीफे का कारण व्यक्तिगत बताया है लेकिन पिछले काफी समय से सरकार के साथ उनका मतभेद चल रहा था. सरकार के साथ कथित मतभेद के कारण कार्यकाल के बीच में ही पद छोडऩे वाले वह देश के दूसरे गवर्नर हैं. इससे पहले बेनेगल रामा राव ने तत्कालीन वित्त मंत्री के साथ विवाद की वजह से 1957 में इस्तीफा दे दिया था.

मोदी सरकार के साथ कई मसलों पर लंबी तनातनी के बाद उनके इस्तीफ़े की अटकलें लगाई जा रही थी, हालांकि ऐसे इस्तीफे को व्यक्तिगत कारणों से दिया गया ही बताया जाता है लेकिन माना जा रहा है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता, कैश फ्लो और ब्याज दरों में कमी नहीं करने को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव था.

पटेल के इस्तीफ़े की टाइमिंग भी अहम है. पटेल का इस्तीफ़ा ऐसे समय पर आया है, जब पूरा देश पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहा था. तो वहीं एक दिन बाद ही संसद का शीतकालीन सत्र भी शुरू होना था. इसके अलावा चार दिन बाद यानी 14 दिसंबर को रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक निर्धारित है.

रिज़र्व बैंक और मोदी सरकार के बीच तनातनी पहली बार तब उभर कर सामने आई थी जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता की वक़ालत की थी. विरल आचार्य ने मुंबई में देश के बड़े उद्योगपतियों के एक इवेंट में कहा था, ‘केंद्रीय बैंक की आज़ादी को कमज़ोर करना त्रासदी जैसा हो सकता है. जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.’

इस्तीफे के पीछे का एक कारण रिजर्व बैंक के खजाने पर सरकार की नजर होना भी है. सरकार आरबीआई के खज़ाने में पड़ी जमा राशि में बड़ा हिस्सा चाहती थी. इसको लेकर सरकार के साथ रिजर्व बैंक के गवर्नर का विवाद चल रहा था. हालाँकि सरकार की तरफ से स्पष्ट किया गया था कि उसे अभी किसी तरह की रकम की ज़रूरत नहीं है. केन्द्र सरकार और आरबीआई के बीच विवाद का एक और विषय आरबीआई एक्ट का सेक्शन 7 था. इस सेक्शन के तहत केन्द्र सरकार जनहित में अहम मुद्दों पर आरबीआई को निर्देश दे सकती है. हालांकि केन्द्र सरकार ने कहा था कि उसने इस सेक्शन का इस्तेमाल नहीं किया है.

अब सवाल है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से इस्तीफे का कितना प्रभाव पड़ेगा.

विश्लेषकों की राय

ऑर्गनाइजेशन फोर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी OECD ने 2019 के लिए भारत का जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.3 फ़ीसदी रखा है. ऐसे में आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना है कि ग्रोथ रेट घटाने की ख़बरों के बीच गवर्नर का पूरा कार्यकाल किए बगैर बीच में पद छोड़ देना रेटिंग एजेंसियों को और चौकन्ना कर देगा.

बंद्योपाध्याय कहते हैं, “सबसे बड़ी मुश्किल ये होगी कि भारत की ग्रोथ स्टोरी से विदेशी निवेशकों का डिग सकता है. वैसे भी रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं हैं और इस घटनाक्रम के बाद हालत और बदतर होंगे.”

विश्लेषकों का कहना है कि इस ख़बर का बेहद नकारात्मक असर आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है. इलारा कैपिटल की वाइस प्रेसिडेंट गरिमा कपूर का कहन है, “भारत के लिए ये बेहद नकारात्मक ख़बर है. भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़राब होगी. विदेशी संस्थागत निवेशक भी इसे सकारात्मक रूप से नहीं लेंगे. आखिरकार केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता का सवाल है. अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिहाज से ये नकारात्मक होगा.”

दूसरी ओर सरकार के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या ये आने वाली है कि वो इस पद पर किसे बिठाते हैं. पहले रघुराम राजन और फिर उर्जित पटेल, दोनों ही गवर्नरों के कार्यकाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे ये लगा है कि सरकार रिज़र्व बैंक पर दबाव बनाना चाहती है. निश्चित तौर पर भारत में निवेश कर मुनाफ़ा कमाने की इच्छा रखने वाले विदेशी निवेशकों का सेंटिमेंट बिगड़ेगा.”

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी कहा है कि उर्जित का इस्तीफ़ा अर्थव्यवस्था पर गहरा आघात है. जो भी हो रिजर्व बैंक के प्रमुख पद से गवर्नर का इस्तीफा देश की सत्ता पर सवाल खड़े करने वाला है.

गौरतलब है कि पटेल ने ब्रिक्स देशों के बीच अंतर-सरकार संधि और इन देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच अंतर बैंक समझौते (आईसीबीए) की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाई थी. इससे इन देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच आरक्षित विदेशी मुद्रा व्यवस्था (सीआरए) तथा विदेशी मुद्रा की अदला-बदली की सुविधा के नियम निर्धारित किए जा सके.’ पटेल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में भी काम कर चुके हैं. वो 1996-1997 के दौरान आईएमएफ से प्रतिनियुक्ति पर भारत आए थे.

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विपक्षी मंच से सपा-बसपा के गायब रहने के मायने

नई दिल्ली। तीन राज्यों के चुनावी नतीजों में भाजपा के पिछड़ने की खबर भऱ से ही विपक्ष की बांछे खिल गई है. चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले ही जहां ज्यादातर विपक्षी दलों ने एक साथ आकर भाजपा के खिलाफ मोर्चे की कवायद शुरू कर दी तो वहीं बिहार से एनडीए में शामिल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही है.

गठबंधन से अलग होते ही कुशवाहा को मोदी के द्वारा बिहार के लिए किए गए वादों की याद आ गई. तो चार साल से ज्यादा समय तक सत्ता की मलाई खाने के बाद कुशवाहा को सामाजिक न्याय का एजेंडा भी याद आ गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय के एजेंडे से हटकर RSS के एजेंडे को लागू किया जा रहा है. इससे पहले कुशवाहा तेजस्वी यादव औऱ शरद यादव से भी मुलाकात कर चुके थे.

हालांकि महागठबंधन की कवायद को मायावती और अखिलेश यादव के शामिल नहीं होने से झटका लगा. अखिलेश यादव ने चुनावी नतीजों से पहले महागठबंधन की कवायद को जल्दबाजी बताया. तो वहीं मायावती पहले ही कह चुकी हैं कि जब तक सीटों को लेकर कोई पुख्ता बातचीत नहीं हो जाती, तब तक गठबंधन बनाने का कोई फायदा नहीं है. पिछले दिनों एक प्रेस विज्ञप्ति में बसपा प्रमुख ने कहा था कि चुनाव पूर्व बने गठबंधन अक्सर सीटों के तालमेल के समय टूट जाते हैं, इसलिए सीटों पर सहमति के बाद ही बसपा किसी गठबंधन में घोषित तौर पर शामिल होगी.

दोनों प्रमुख दलों के महागठबंधन की बैठक में शामिल नहीं होने की एक वजह  दोनों की कांग्रेस पार्टी से नाराजगी भी है. अखिलेश यादव खुलकर कांग्रेस से अपनी नाराजगी जता चुके हैं। तो वहीं मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव से पूर्व कांग्रेस के अड़ियल रवैये के कारण गठबंधन की बात नहीं बनने पर बसपा प्रमुख मायावती भी कांग्रेस से नाराज हैं.

उत्तर प्रदेश के इन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के महागठबंधन की बैठक में शामिल नहीं होने से जहां विपक्षी उम्मीदों को झटका लगा है तो वहीं भाजपा इसे अधूरे विपक्ष की गोलबंदी बता रही है. जो भी हो सत्ता और विपक्ष की असली लड़ाई पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ही तय करेंगे. इन परिणामों के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का रुख क्या होगा, यह भी बड़ा सवाल है.

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10 साल बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया को उसी की ज़मीन पर हराया

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एडिलेड में खेले गए पहले टेस्ट मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 31 रनों से हरा दिया है. खेल के आख़िरी दिन ऑस्ट्रेलिया के सारे बल्लेबाज़ 291 रन पर ही आउट हो गए. इससे पहले भारत ने एडिलेड ओवल में 2003 में टेस्ट मैच जीता था.

भारत ने कभी भी एक टेस्ट सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पहला मैच नहीं जीता था. इस जीत के साथ ही यह रिकॉर्ड भी टूट गया. भारत ने दूसरी पारी के बाद ऑस्ट्रेलिया को 323 रनों का लक्ष्य दिया था. इस जीत के साथ ही भारत ने चार मैचों की टेस्ट सिरीज़ में 1-0 की बढ़त ले ली है. ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से एस मार्श ने दूसरी पारी में सबसे ज़्यादा 60 रन बनाए. दूसरी पारी में मार्श के अलावा किसी भी खिलाड़ी का निजी स्कोर 50 तक भी नहीं पहुंच पाया. मार्श के बाद कप्तान टिम पेन ने सबसे ज़्यादा 41 रन बनाए. चेतेश्वर पुजारा को मैन ऑफ द मैच मिला. पुजारा ने पहली पारी में 123 और दूसरी पारी में 71 रनों की शानदार पारी खेली थी. इस मैच में पुजारा ने 16वां शतक मारा.

मैच के चौथे दिन भारत ने 307 रन बनाए थे. भारत को पहली पारी में 15 रनों की बढ़त मिली थी और इस आधार पर ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 323 रनों का टारगेट मिला था. चौथे दिन ऑस्ट्रेलिया ने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की लेकिन भारतीय गेंदबाज़ों ने खेल ख़त्म होने तक चार विकेट चटका दिए थे और स्कोर 104 का था.

पाँचवे दिन ऑस्ट्रेलिया ने खेलना शुरू किया तो मोहम्मद शामी और ईशांत शर्मा ने हैंडस्कॉम्ब और ट्रैविस हेड को 14-14 रन के निजी स्कोर पर ही आउट कर दिया. बुमराह ने टिम पेन का सबसे अहम विकेट लिया. टिम पेन ने ऑस्ट्रेलिया की उम्मीद जगा दी थी, लेकिन बुमराह ने 41 रन के निजी स्कोर पर उन्हें चलता कर दिया.

इस मैच में ऋषभ पंत ने रिकॉर्ड 11 कैच लिए. पंत ने ऐसा कर जैक रसल और एबी डिविलियर्स की बराबरी कर ली है. जीत के बाद विराट कोहली ने अपने गेंजबाज़ों की जमकर तारीफ़ की. कोहली ने कहा कि गेंदबाज़ों ने मौक़ों का फ़ायदा उठाया. इसके साथ ही कोहली ने पुजारा और रहाणे की बल्लेबाज़ी की प्रशंसा की. कोहली ने कहा कि पुजारा और रहाणे ने जीत की बुनियाद रखी दी थी. भारतीय कप्तान ने बैटिंग में मिडल ऑर्डर के बाद के प्रदर्शन पर चिंता जताई है. इस जीत के बाद सुनील गावसकर ने कहा कि भारत ने पहली पारी में 15 रन का लीड लेकर आत्मविश्वास हासिल कर लिया था. गावसकर का मानना है कि इस हार के बाद ऑस्ट्रेलिया दबाव में होगा.

आख़िर विकेट के लिए भारतीय गेंदबाज़ों को जूझना पड़ा, लेकिन आर अश्विन ने हेज़लवुड के रूप में 10वां विकेट लेकर ऐतिहासिक जीत दिला दी. इस जी के साथ ही विराट कोहली भारत के पहले कप्तान बन गए हैं, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका में टेस्ट मैच जीता. इस जीत से भारत दूसरा एशियाई देश बन गया है जिसने ऑस्ट्रेलियाई ज़मीन पर टेस्ट सिरीज़ का पहला मैच जीता. इससे पहले पाकिस्तान ने ही ऐसा किया था. अश्विन ने कुल 6 विकेट लिए और ऑस्ट्रेलिया में उनका यह बेहतरीन प्रदर्शन था.

2003 में राहुल द्रविड़ के बाद विराट कोहली की टीम ने यह इतिहास रचा है. इस जीत में भारतीय गेंदबाज़ों की ख़ूब सराहना हो रही है. आख़िरी पारी में जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शामी और अश्विन ने तीन-तीन विकेट लिए. पहली पारी में भारत ने 250 रन बनाए थे. इसके जवाब में ऑस्ट्रेलिया 235 रन ही बना पाया और भारत को 15 रनों की बढ़त मिली थी.

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सांसद सावित्री बाई फुले का मायावती कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. चर्चा है कि सावित्रीबाई फुले बहुजन समाज पार्टी में जाना चाहती हैं. जब मायावती राज्यसभा की सांसद थीं, तब संसद के गलियारे में भी फुले ने बहनजी से मिलकर उनसे बसपा में शामिल होने की इच्छा जताई थी, हालांकि तब मायावती ने उन्हें अपने सांसद का कार्यकाल खत्म करने का सुझाव दिया था. मायावती और बहुजन समाज पार्टी को लेकर सावित्री बाई फुले का झुकाव कोई नया नहीं है, बल्कि फुले का मायावती से पुराना लगाव रहा है. हम आपको बताते हैं कि आखिर क्या है, सावित्री बाई फुले का मायावती कनेक्शन.

सावित्री बाई फुले कई मामलों में बसपा प्रमुख को फॉलो करती हैं. मसलन उनकी कद-काठी से लेकर हेयर स्टाइल तक बसपा प्रमुख जैसा ही हैं. फुले ने भी संन्यास ले लिया है और बहुजन आंदोलन के हित के लिए अपना जीवन देने की घोषणा कर चुकी हैं.

बहरहाल राजनीति से इतर सावित्री बाई का जीवन भी संघर्षों भरा रहा है. जब वह 6वीं में थीं तो उनके शिक्षक ने उनका वजीफा हड़प लिया और विरोध करने पर उन्हें स्कूल से बाहर कर दिया. दिलचस्प बात ये है कि तब उन्हें बसपा सुप्रीमो मायावती से सीधे बड़ी सहायता मिली थी.

सावित्री बाई फुले ने एक इंटरव्यू में एक घटना का जिक्र किया था. फुले के मुताबिक, “जब मैं कक्षा 6 पास हुई थीं. तब मुझे 480 रुपए वजीफा मिला था. पहले छात्रवृत्ति खाते में नहीं आती थी. मास्टर के खाते में आती थी. मैंने उनसे वजीफा मांगा लेकिन उन्होंने कहा कि चूंकि मैंने तुम्हें पास किया है, इसलिए मैं वजीफा नहीं दे सकता. यही नहीं उन्होंने मेरा नाम काटकर स्कूल से भगा दिया. साफ कह दिया कि मैं नहीं पढ़ाऊंगा.”

इसके बाद मजबूरन सावित्री बाई फुले की पढ़ाई रुक गई. सावित्री ने एक इंटरव्यू में कहा था, “इसके बाद अचलेंद्र नाथ कनौजिया मुझे लखनऊ लेकर गए. उस समय मायावतीजी यूपी की मुख्यमंत्री थीं. वहां मुझे जनता दरबार में पेश किया गया. इसके बाद मैंने सीधे मायावती जी से बात की. मैंने उनसे कहा कि मेरे टीचर ने नाम काट दिया है. कई सालों से मैं घर बैठी हूं. अब आगे पढ़ना चाहती हूं. इसके बाद मायावतीजी ने उनसे पूछा कि कहां पढ़ना चाहती हैं? इस पर मैंने बताया कि नानपारा के इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहती हूं. इसके बाद मायावती ने तुरंत डीएम को फोन किया और डीएम से मेरी टीसी, मार्कशीट मंगवाई और सीधे मेरा एडमिशन इंटर कॉलेज में करवा दिया.”

भाजपा छोड़ने के बाद अब फुले एक बड़ी रैली की तैयारी में हैं जहां वह अपनी आगामी रणनीति का खुलासा करेंगी. देखना यह होगा कि आखिर उनकी यह रणनीति क्या होगी. और यह बसपा और बसपा प्रमुख मायावती के कितने करीब होगी.

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संसद का शीतकालीन सत्र कल से, ये होंगे प्रमुख मुद्दे

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संसद का शीतकालीन सत्र हंगामेदार रहने के आसार हैं. मंगलवार से शुरू होने वाले इस सत्र के दौरान सरकार तीन तलाक, उपभोक्ता संरक्षण, चिट फंड, डीएनए, गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम जैसे विधेयकों सहित करीब तीन दर्जन विधेयक पारित कराना चाहती है. इनमें 20 विधेयक नये हैं जबकि बाकी सदन में पहले ही पेश किये जा चुके विधेयक हैं.

कांग्रेस सहित विपक्षी दल राफेल मुद्दा, कृषि एवं किसानों की समस्याओं, सीबीआई में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के बीच झगड़े जैसे मुद्दे उठाकर सरकार को घेरने का प्रयास करेंगे. राज्यसभा में कांग्रेस के नेता भुवनेश्वर कालिता ने ‘हम संसद सत्र के दौरान राफेल समेत अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे उठायेंगे और सरकार से जवाब मांगेंगे.’

उन्होंने कहा कि संसद में उठाये जाने वाले विषयों की रूपरेखा पार्टी की बैठक में तय की जाएगी लेकिन किसानों के मुद्दे, सीबीआई में वर्तमान स्थिति, साम्प्रदायिक सौहार्द के समक्ष चुनौती जैसे विषय निश्चित तौर पर उठेंगे. वहीं, संसदीय कार्य राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि सरकार के लिये यह सत्र महत्वपूर्ण है. तीन अध्यादेश के संबंध में विधेयक आने हैं. ‘हम तीन तलाक संबंधी विधेयक पारित कराना चाहते हैं.’

उन्होंने कहा कि लोकसभा में पेश किये गए करीब 15 विधेयक और राज्यसभा में पेश 9 विधेयक पारित होने हैं. अन्य महत्वपूर्ण नये विधेयक भी पेश किये जाने हैं और पारित होने हैं.

यह पूछे जाने पर कि, विपक्ष राफेल समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास करेगा, गोयल ने कहा कि विपक्ष नियमों के तहत कोई भी मुद्दा उठा सकता है और सरकार इसके लिये तैयार है. सरकार का दामन और नीयत दोनों साफ हैं. ‘हम नियमों के तहत चर्चा कराने को तैयार हैं.’

संसद का शीतकालीन सत्र ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब पांच राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना मिजोरम के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने वाले हैं. इनमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस के लिये महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि संसद सत्र पर चुनाव परिणाम का प्रभाव देखने को मिल सकता है.

सत्र के दौरान लोकसभा में पेश होने वाले नये विधेयकों में तीन तलाक संबंधी विधेयक, कंपनी संशोधन विधेयक, भारतीय चिकित्सा परिषद संशोधन विधेयक, भारतीय औषधि प्रणाली के लिये राष्ट्रीय आयोग संबंधी विधेयक, राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग विधेयक, राष्ट्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आयोग विधेयक, राष्ट्रीय विमान संशोधन विधेयक, जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक संशोधन विधेयक, सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय जांच एजेंसी संशोधन विधेयक, गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम संशोधन विधेयक, बांध सुरक्षा विधेयक, एनसीईआरटी विधेयक आदि शामिल हैं.

श्रोत :- न्यूज18 Read it also-रिटायर होते ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने खोली चुनावों की पोल

बदलेगा पाटीदार आंदोलन का चेहरा, हार्दिक पटेल लड़ेंगे लोकसभा चुनाव

पाटीदार आंदोलन का चेहरा अब हार्दिक नहीं होंगे. पाटीदार आंदोलन समिति ने अल्पेश कथिरिया को पाटीदार आंदोलन का नया चेहरा बनाने की क़वायद तेज कर दी है. अल्पेश कथिरिया के जेल से बाहर आते ही पाटीदार संस्थाओं के नेता एकजूट होंगे. हार्दिक अब सक्रिय राजनीति में जाने का मन बना चुके है. हार्दिक पटेल लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

पाटीदार आंदोलन समिति का नियम यह है कि समिति में रहकर कोई भी राजनीति में नहीं जा सकता.ऐसे में अब अल्पेश कथिरिया जो कि हार्दिक के साथ राजद्रोह का आरोप झेल रहे हैं, वो पिछले तीन महीनों से जेल में थे. उनकी जमानत पर रिहाई के बाद अब पाटीदार आंदोलन का चेहरा अल्पेश को बनाया जा सकता है. गौरतलब है कि हार्दिक के बाकी साथी पहले ही हार्दिक को छोड़कर चले गए हैं, अल्पेश ही अभी तक उनके साथ जुड़े हुए थे.

श्रोत:- न्यूज18 Read it also-हिन्दुस्तान का गोत्र कॉपर है, जाति मर्करी और धर्म सल्फेट….  

गिनती से पहले स्ट्रांग रूम के बाहर वाई-फाई पर कांग्रेस का बवाल

नई दल्ली। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती मंगलवार को होनी है, लेकिन ईवीएम की सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. ताजा मामला मध्य प्रदेश के इंदौर और कुछ अन्य इलाकों में स्ट्रॉन्ग रूम के क्षेत्र में वाईफाई चलने का है. दरअसल, निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा कारणों से स्ट्रॉन्ग रूम और आसपास वाईफाई और इंटरनेट सेवा पर प्रतिबंध लगाया हुआ है.

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तनखा ने चुनाव आयोग का ध्यान आकर्षित करते हुए ट्वीट किया, ‘इंदौर और कुछ अन्य जगहों पर जहां ईवीएम रखे गए हैं, वहां वाईफाई चल रहा है. इससे मतगणना की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह खड़ा होता है. आखिर इस घड़ी में इसकी क्या जरूरत है. इससे आसानी से ईवीएम चिप तक पहुंचा जा सकता. बेहद गंभीर मामला.’कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी विवेक तनखा के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए लिखा, ‘क्या चुनाव आयोग स्पष्ट करेगा? राज्य चुनाव आयोग ने वादा किया था कि स्ट्रॉन्ग रूम जहा ईवीएम रखे गए हैं और जहां गिनती होनी है उस जगह वाईफाई नहीं होगा.’

वहीं मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतगणना की वेबकास्टिंग न करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही यह निर्देश जारी किए गए हैं कि काउंटिग हॉल में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और मतगणना के दौरान वाईफाई का इस्तेमाल न हो.

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.

इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.

चुनाव आयोग द्वारा जारी बयान में कहा गया कि मशीनों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. मशीने देरी से पहुंचने के लिए नायब तहसीलदार राजेश मेहरा को सस्पेंड कर दिया गया है. वहीं, शुक्रवार को शाजापुर जिले में एक बीजेपी नेता के होटल में ईवीएम मशीनों के साथ अधिकारियों के वीडियो सामने आने पर भी चुनाव आयोग ने कहा कि अधिकारियों द्वारा होटल में ईवीएम मशीनों के साथ जाना नियमों की अनदेखी थी और जैसे ही खबर मिली संबंधित अधिकारियों को हटा दिया गया.

एक तरफ कांग्रेस के नेता लगातार ईवीएम की सुरक्षा पर सवाल उठा रहे हैं तो वहीं मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी कार्यकर्ताओं स्ट्रॉन्ग रूम पर 11 दिसंबर तक नजर रखने के निर्देश दिए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को ट्वीट में लिखा, ‘कांग्रेस पार्टी कार्यकताओं, यह सतर्क रहने का समय है. मध्य प्रदेश में वोटिंग के बाद ईवीएम का व्यवहार अजीब रहा है. कुछ ने एक स्कूल बस चुराई और दो दिन के लिए गायब हो गईं. कुछ अन्य होटल में पीते हुए पाई गईं. मोदी के भारत में ईवीएम के पास रहस्यमयी ताकते हैं.’

वहीं, मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने ट्वीट में लिखा था कि, ‘सभी कांग्रेसजन , कांग्रेस प्रत्याशियों से अपील 11 दिसम्बर मतगणना तक स्ट्रॉन्ग रूम व ईवीएम पर निगरानी रखे, विशेष सावधानी रखे. कांग्रेस की सरकार बनना तय है.”

श्रोत:- आजतक

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गंगा मुक्ति आंदोलन

बिहार के दो बड़े सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश जी के नेतृत्व में और रामशरण जी की अगुआई में 22 फरवरी 1982 को संगठित रूप से कहलगांव, भागलपुर, बिहार की धरती से गंगा मुक्ति आंदोलन का शुरुआत होता है. आंदोलन का मुख्य मुद्दा था, ‘मछली मारने का हक़ मछुआरों को मिलना चाहिए’ और 80 किलो मीटर तक गंगा, पर जो दो जमींदारों के कब्जों से गंगा को मुक्त कराना. महाशय महेश घोष और मुसर्रफ़ हुसैन मानी ये दो जमींदार थे. जिसके अन्दर सुल्तानगंज से लेकर बरारी फिर बरारी से पीरपैती तक की जमींदारी थी. तीसरा बड़ा मुद्दा जो बाद में आंदोलन के साथ जुड़ा, वो नदी पार करने वाले से जबरन पैसा वसूलने का जो मामला था ये हाल-फिलहाल तक बिहार के विभिन्न भागों में देखने को मिलता रहा है.

इन जमींदार के पास ये जमींदारी देवी-देवता के नाम पर सेवेत (अनुयायी) अधिकार मुग़लकाल से मिला हुआ था. जमींदारी उन्मुलन कानून लागू होने के 32 वर्ष बाद भी ये जमींदारी कायम रहना शोषण का प्रतीक ही था. स्थानीय स्तर पर संघर्ष करने वाले कुछ लोगों द्वारा ये लड़ाई जब कोर्ट में ले जाया गया तो जमीदारों का कोर्ट में कहना था कि हमलोग भैरवनाथ और देवी-देवता आदि-आदि का सेवेत (अनुयायी) है. ये हक़ हमलोगों को मुगलकाल से ही देख-रेख में दिया गया है. हमलोग तब से इसकी देख-रेख करते आ रहे हैं. और इसमें जो भी मछली आदि निकलता है, उस पर मेरा अधिकार है. इसलिए हमलोग इसका कमाई खाते हैं. जमींदार अपने पक्ष से यह तर्क दिया करते थे कि पानी पर मेरा अधिकार है. ये स्टेट नहीं है, परिसंपत्ति नहीं है. महाशय डेयहरी, नाथनगर, भागलपुर, बिहार में कई तरह के देवी-देवता है. जिसके नाम से सेवेत कायम था. उसका अपना नियम था, जो सामंतवाद के नीति की तरह होता था. ये लोग गंगा को पेटी कांटेक्टर के पास बेच देते थे. पेटी कांटेक्टर बड़ी रकम वसूलने के लिए क्षेत्र के आधार पर बोलवाला लोगों के माध्यम से उस इलाके में बड़ी रकम वसूलते थे. पेटी कांटेक्टर उस क्षेत्र के दबंग लोगों के माध्यम से नाव के साइज के हिसाब से टेक्स बसूल किया करते थे. जमींदारों तक तो बड़ी रकम पहुँचती ही नहीं थी. यानी हर जगह लठैत था. बड़े लठैत अपना कुछ हिस्सा लेकर छोटे-छोटे लठैत के बीच वसूली के लिए छोटा-छोटा इलाका दे दिया करता था. ये लोग बड़ी रकम मछुआरों से वसूलते थे. आंदोलन की एक वजह तो यह थी.

एक ख़ास जाति वर्ग समूह का जो लोग सदियों से गंगा पर ही अपना जीवन यापन किया करते थे. बिहार में जमींदारी उन्मुलन कानून लागू होने के बाद भी गंगा नदी पर 80 किमी तक दो व्यक्ति की जमीनदारी कायम रहना कानूनी रूप से गुलामी का प्रतीक था. जिसे कानूनी रूप से पानीदारी के नाम से जाना जाता है. कहलगांव के स्थानीय मछुआरे इस सवाल को उठाये जिसमें कई संगठन के लोग थे. जब उन लोगों को सफलता नहीं मिली तब वे लोग आंदोलन से वापस भी हो गए थे. मामला हायकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक गया. हाईकोर्ट में निषादसंघ केस हार चुके थे. लेकिन छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के स्थापना के तुरंत बाद छात्र- युवा संघर्ष वाहिनी ने बोधगया में मठ के खिलाफ भूमि मुक्ति आंदोलन शुरू किया था. उसकी प्रेरणा से भागलपुर के छात्र-यूवा संघर्ष वाहिनी के साथी ने पहल करके कहलगांव के साथियों को बोधगया मठ के खिलाफ संघर्ष में शामिल किया. भागलपुर के छात्र-यूवा संघर्ष वाहिनी के साथी कार्यकर्ता बोधगया भूमि आंदोलन से प्राप्त अनुभवों को, वहाँ के कामों के तर्ज पर भागलपुर में गंगा पर पानीदारी-जमीनदारी को खत्म करने के लिए आंदोलन करना चाहिए विचार किया. फिर रामशरण जी के अगुआई और अनिल प्रकाश जी के नेतृत्व में छात्र-यूवा संघर्ष वाहिनी से निकला बैनर ‘गंगा मुक्ति आंदोलन’ के बैनर तले लड़ाई की शुरुआत हुई. यहाँ छात्र-यूवा संघर्ष वाहिनी की भूमिका एक उत्प्रेरक की रूप में देखा जा सकता है. बोधगया का एक बड़ा आंदोलन था. पचमोनिया जैसी छोटी जगह पर भूमि के सवाल पर चल रहे आंदोलन वक्त साथी अनिल प्रकाश जो छात्र-यूवा संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व कर रहे थे ने निर्णय किया कि जब छोटे से गाँव में आंदोलन हो तकता तो कहलगांव में भी कुछ किया जाय.

भग्गू सिंह और रत्नेश सिंह नाम का दो परिवार जो गंगा पार करने वाले से जबरन पैसा वसूला करता था. नाव से पार होने वाले जो पैसा देने से इनकार करता था. उसे घर में बंद कर दिया जाता था, और कुत्ते से कटवाया करता था. उसके खिलाफ लड़ाई शुरू हुई. साथ ही दियारे में कुछ बेनामी जमीन थी. लगभग 513 बीघा जमीन शंकरपुर दियारे में हुआ करती थी. उसके खिलाफ लड़ाई शुरू हुई. परिणाम स्वरूप जमीन दलित, अतिपिछड़े भूमिहीन के बीच बांटी गई. दबंगों-सामंतों के आतंक के खिलाफ ‘दियारा जागरण समिति’ के बैनर तले शुरू किया गया यह लड़ाई भी गंगा मुक्ति आंदोलन इकाई संगठन था. इसके तहत वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा दिया गया ‘जिसकी लड़ाई उसका नेतृत्व’ इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया. इसके कारण मछुआरे व झुग्गी-झोपडी के कम पढ़े लिखे लोगों का नेतृत्व आगे आया. बहुत सारे लोग आज नेतृत्व की भूमिका में है. एक तरह से गंगामुक्ति आंदोलन वह प्रशिक्षण स्कूल हो गया जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं का उस प्रशिक्षण से निकले हुए लोग आज नेतृत्वकारी भूमिका में अलग-अलग जगहों पर स्थापित हैं आज गंगामुक्ति आंदोलन के दरम्यान कई इस तरह के प्रयोग भी हुये हैं. जैसे कई बार मछुआरों का अपराधियों ने जाल छीन लिया. आंदोलन का असर इस कदर था कि लोग यानी मछुआरे सजग हो गए, जाल व नाव छिनने पर मछुआरे 250-300 की संख्या में अपराधियों का घर-घेर लिया करता था. गाँव के लोग और अपराधी के पिता छीने हुए जाल और नाव वापस करवाता था. अपराधियों का घर घेरने का काम महिलाओं द्वारा होता था. ‘घेरावारी उखाड़ेंगे, ऑक्सन नहीं होने देंगे’. ये नारा हुआ करता था. यानी जिस भी अपराधियों का घर घेरा जाता था. उसके पहले इसकी सूचना प्रशासन को दे दिया जाता था. तब कहलगांव के आस-पास जितनी भी शराब की भठ्ठी थी उन सभी को तोड़ डाला गया और अपने शराबी पति के खिलाफ सत्याग्रह शुरू कर दिया. जैसे खाना बंद, चुल्हा बंद, बात-चीत बंद, रिलेशनशिप बंद जैसे सत्याग्रह कर सहारा लेकर भारतीय समाज के जनमानस में वसा पुरुष सत्ता का प्रतिकार कर गंगा मुक्ति आंदोलन को सक्रियता प्रदान किया. ये शांतिमयता का प्रयोग गंगा मुक्ति आंदोलन के दरम्यान अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा था. इस तरह लड़ाई को मुख्य सफलता मिली की पानी पर का जमींदारी 1991 में पूरी तरीके से समाप्त करने की घोषणा हुई. 80 किमी की जमींदारी खत्म हुई. उस समय बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार बन गई थी. उसने एक कदम आगे जाकर बिहार की तमाम नदियों को उस समय बिहार- झारखण्ड एक हुआ करता था. को कर मुक्त कर दिया. ये कॉपरेटिव अथवा सहकारी समितियों के हाथ में भी नहीं रहेगा. नदी-नाला, कोल-धाव सबको टेक्स फ्री कर दिया गाया. बाद में सचिव स्तर के अधिकारी ने बहुत ही चालाकी से मुख्य करेंट को प्रमुख धार (मैंन कैरेंट) से जुडी हुई यानी जिन्दाधार केवल वही फ्री रहेगा. बांकी जो डीसकनेक्ट होगा, उसका नहीं. उसे निलाम कर देंगे. गंगा के मुख्यधार से कटकर फोहा नाला और जमुनिया धार वो भी फ्री रहेगा. उसे बांधा नहीं जायेगा. लेकिन आज उसे बांधा जाने लगा है, उन माफियाओं-दंबंगों के खिलाफ आज भी आंदोलन चल रहा है. एक तो जमींदारी खत्म हुई, 80 किमी की… दूसरा की बिहार की तमाम नदियों की ट्रेक्स फ्री किया गया. ट्रेक्स फ्री हुआ पारम्पारिक मच्छुआरे के लिए… ये दो प्रमुख काम हुआ इस आंदोलन से… दियारे में 500 बीधा जमीन बांटी गई.

अनिरुद्ध जी जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ता भी इस आंदोलन ने दिया जो आज तक कभी स्कूल नहीं गए लेकिन देश-दुनिया की सामाजिक-राजनीतिक समझ एक स्कॉलर की तरह है. विकासनीति की अच्छाई और बुराई दोनों की समझ बहुत ही अच्छी तरह से करना जानते हैं. यही इस आंदोलन की सफलता है. इस आंदोलन से निकले लोग बिहार-झाड़खंड के विभिन्न हिस्सों में और देश के अन्य हिस्सों में उत्प्रेरक, संगठक और प्रशिक्षक के रूप में कार्य कर रहे हैं. पत्रकारिता, सांस्कृतिक संरचना, कला-साहित्य और अन्य-अन्य क्षेत्रों में इस आंदोलन से निकले लोग अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं. नमामी-गंगे के नाम पर चलाए जा रहे अभियान का मुख्य लक्ष्य गंगा को प्रदुषण मुक्त करना नहीं है. जैसे एक नारा आया ‘जमीन जिसकी जोत उसकी’, ‘गंगा किसकी, जो उस पर जीवन यापन करता है उसकी’. गंगा पर जीने वाले लोगों की गंगा है. किसान, मछुआरे, जो गंगा का पानी पीते है और कृषि के सिंचाई के उपयोग में लाते हैं. वह नहीं होकर गंगा किसकी हो गई जो गंगा की आरती उतारे, उसकी हो गई. आस्था के नाम पर गंगा को बचायेंगे तो नहीं बचेगा. आस्था और आजीविका दोनों जब-तक नहीं जुड़ेगा तब-तक गंगा मुक्ति सही अर्थों में संभव नहीं है.

गंगा मुक्ति आंदोलन जहाँ अपने परम्परागत रोजगार को बचाने के लिए महत्वपूर्ण हुआ वही पत्तिसत्ता से लड़ने का बड़ा हथियार भी बना. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सभ्याताओं के विकास के साथ-साथ पनपने वाली समस्या ने अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह के सांस्कृतियों को जन्म दिया. जिसके परिणाम स्वरूप शोषण, अत्याचार और भ्रष्टाचार भी जन्म लिया. उन मान्यताओं को स्थानीय प्रयास से ही समाप्त करना संभव हो पाया है. गंगा मुक्ति आंदोलन उसके उत्कृष्ट उधारण में से एक हैं.

नीरज कुमार, पी-एच.डी, शोधार्थी Read it also-दलित आंदोलन बनाम सवर्ण आंदोलन

भाजपा छोड़ने के बाद बड़े धमाके की तैयारी में सावित्री बाई फुले

नई दिल्ली। भाजपा सांसद सावित्रीबाई फुले ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. भाजपा से दो-दो हाथ करने को तैयार फुले ने कहा है कि उनका इस्तीफा भाजपा के ताबूत में आखिरी कील होगा. उन्होंने इसी महीने में एक बड़ी जनसभा कर एक और धमाका करने की बात कही है. फुले उत्तर प्रदेश के बहराइच लोकसभा सीट से सांसद हैं. 6 दिसंबर को बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस पर उन्होंने भाजपा छोड़ने की घोषणा की. पिछले काफी वक्त से यह माना जा रहा था कि वह भाजपा छोड़ सकती हैं, बावजूद इसके उनके द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप से भाजपा तिलमिला गई है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को भेजे अपने इस्तीफे में सावित्रीबाई फुले ने भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया. उनका आरोप है कि दलित होने के कारण पार्टी के भीतर अपनी आवाज को अनसुना किया गया. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने भाजपा को दलित, पिछड़ा और मुस्लिम विरोधी कहा और पार्टी पर आरक्षण ख़त्म करने की साज़िश रचने का आरोप लगाया. इस्तीफे के बाद अपनी भविष्य की रणनीति पर सावित्रीबाई फुले ने का कहना है कि वह 16 दिसंबर को एक रैली कर अपनी अगली रणनीति का खुलासा करेंगी. बहरहाल उत्तर प्रदेश में पहले से ही मुसीबत में दिख रही भाजपा को सावित्रीबाई फुले के इस्तीफे से एक और झटका लगा है. फुले जिस तरह से अपनी संस्था नमो बुद्धाय जनसेवा समिति के बैनर तले उत्तर प्रदेश में लगातार सक्रिय हैं, वह भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती हैं.

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हनुमान को दलित कहे जाने पर दलितों को ही आपत्ति क्यों?

आज के चुनावी माहौल में देशभर में राजनीतिक दलों ने  दलितों\ पिछ्ड़ों और अल्पसंख्यकों के सामने कुछ ऐसे मुद्दों को उछाल दिया जाता है जिनके जाल में फंसकर दलित\ पिछड़े और अल्पसंख्यक अपने मूल मुद्दों को भूलकर फालतू के मुद्दों में उलझकर अनाप-सनाप बहस में उलझकर आपस में ही एक दूसरे के बीच दीवार खींच लेते हैं. राजस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा तथाकथित भगवान हनुमान को दलित व वंचित बताया जाना, राज्य के बहुत से लोगों को रास नहीं आया है. जहाँ योगी आदित्यनाथ के बयान पर दलितों में रोष देखने को मिल रहा है वहीं ब्राह्मण समाज में योगी आदित्यनाथ के बयान के प्रति रोष है. खबर है कि जयपुर के एक संगठन ‘सर्व ब्राह्मण समाज’ ने तो हनुमान को दलित बताये जाने वाले बयान पर योगी जी को नोटिस भेजकर माफी मांगने को कहा है. ‘सर्व ब्राह्मण समाज’ का कहना है कि बजरंग बली न तो दलित हैं, न वंचित और न ही लोकदेवता है. ‘सर्व ब्राह्मण समाज’ की इस कार्यवाई से तो महज एक  ही बात समझ में आती है कि ये लोग दलितों का समर्थन  हासिल करने के लिए दलित समाज को  इस चुनावी दौर में केवल अपने पाले में खींचने पर का प्रयास कर रहे हैं.
ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश मिश्रा ने अपने वकील के जरिए भेजे गए नोटिस में योगी आदित्यनाथ से इस मामले में माफी मांगने को कहा है और तीन दिन में ऐसा नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी है. अब सुरेश मिश्रा जी को यह जान लेना चाहिए कि योगी जी के खिलाफ केस डालना भी इतना आसान नहीं, जितना आसान ये लोग समझ रहे हैं. किसी भी सरकार के मुखिया के खिलाफ केस दायर करने के लिए राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति की अनुमति की आवश्यकता होती है….जो नितांत असंभव है. उल्लेखनीय है कि आजकल ही नहीं हमेशा से, सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की रही हो, राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति की अनुमति मिलना आसान इसलिए नहीं होता क्योंकि राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों पदों पर केन्द्रीय सरकार के द्वारा अपने ही दल के राजनीतिक लोग चुने जाते हैं. जबकि ये लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है. विधान तो ये है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे पदों पर राजनितिक लोग न होकर गैर राजनीतिक बुद्धीजीवी वर्ग के लोग होने चाहिएं जिनकी सोच लोकतांत्रिक और आजाद होनी चाहिए किंतु आज तक भी ऐसा नहीं हुआ है. कहना गलत न होगा कि देश में लोकतंत्र की व्यवस्था राजनीतिक दलों की रखैल होकर रह गई है…और कुछ नहीं. सारी की सारी राजनीतिक पार्टियाँ एक दूसरे को देशद्रोही ठहराने का प्रयत्न करती हैं जबकि पक्ष और विपक्ष दोनों का राजनीतिक चरित्र लगभग एक जैसा ही होता है. आजकल तो सत्ता पक्ष द्वारा राष्ट्रप्रेमी और राष्ट्रद्रोही होने तक के प्रमाण पत्र बांटे जाने लगे हैं. जो सरकार का पक्षधर वो राष्ट्रवादी और जो सरकार से सवाल करे वो राष्ट्रद्रोही. खैर! सुरेश मिश्रा जी की हनुमान के प्रति इस तरफदारी में भी दलितों को अपने खैमें में खींचकर भाजपा में कोई न कोई बेहतर जगह तलाशने की कोशिश माना जा सकता है.
पुन: उल्लिखित है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों के समर्थन में राजस्थान में ताबड़तोड़ जनसभाएं कर रहे योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को मालाखेड़ा अलवर में कहा था कि ‘बजरंग बली’ ऐसे लोकदेवता हैं जो स्वयं वनवासी हैं, गिरवासी हैं दलित हैं वंचित हैं…. यहाँ सवाल ये उठता है कि योगी आदित्य के दिमाग में केवल  हनुमान् की जाति का ध्यान ही क्यों आया, हनुमान की सेना में तो अनेक बानर शामिल थे. योगी आदित्य नाथ उनकी जाति के बारे में उल्लेख करने में क्यों चूक गए? …शायद इसलिए कि तथाकथित भगवान राम उनके सेनापति थे…और हनुमान केवल एक सेवक की भूमिका निभा रहे थे. यदि अन्य सेना की जाति पर चर्चा की गई होती तो फिर सेनापति राम की जाति पर सवाल उठाना उनकी मजबूरी हो गई होती… कि नहीं?  जबकि भाजपा की पैत्रिक संस्था सारे चुनाव भगवान राम और उनका मन्दिर बनाने के नाम पर लड़ रही है फिर भगवान हनुमान कहाँ से और किस लिए राजनीतिक क्षेत्र में लाकर खड़े कर दिए गए? रामायण के और भी इतने कितने ही पात्र हैं जिनकी जाति पर योगी जी ने कोई सवाल नहीं किया, केवल हनुमान जी पर ही किया….. आखिर क्यों? …. शायद इसका कारण यह है कि हनुमान और उनके सहयोगियों को बानर माना जाता रहा है और अब क्योंकि योगी जी का मानना है कि भारतीय समाज का दलित वर्ग हनुमान को अपना भगवान मानता है. इसलिए योगी जी ने दलितों को भाजपा के हक में करके केवल और केवल राजनीतिक रोटिया सेकने के लिए के लिए ये दाव खेला होगा. जाहिर है बाकी देवताओं को सब ब्राह्मण ही बताते हैं किंतु आज वो सब जातियां भाजपा से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं, जाहिर है उनकी जातियां गिनाने से इन्हें को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं होने वाला है .
उल्लेखनीय है कि योगी जी की इस टिप्पणी से नाराज ब्राह्मण समाज ने नोटिस में कहा है कि हनुमान भगवान हैं. उन्हें वंचित और लोकदेवता बताना न केवल उनका बल्कि लाखों हनुमान भक्तों का अपमान है. कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने भी योगी के इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा, ‘भाजपा अभी तक इंसान को बांटने का काम कर रही थी,  लेकिन अब यह भगवान को भी जाति में बांट रहे हैं.’ उनके कहने का साफ साफ मतलब है कि भाजपा ने कभी भी देश और समाज को जोड़ने का काम नहीं किया.
यह कहना अतिश्योक्ति न होगा किदेश की राजनीति में इन दिनों जो चल रहा है, उसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे. जो राजनेता और संगठन अब तक इंसानों की जाति पर राजनीति कर रहे थे, वे अब भगवान की जाति को भी राजनीति में लपेट रहे हैं. इससे पहले एक सवाल है कि क्या आप भगवान राम के परम भक्त हनुमान जी किसी जाति के बारे में कुछ जानते थे…. योगी जी के इस बयान के बाद अनेक राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक/धार्मिक संगठन के सदस्य भी हनुमान जी की जाति खोज लाए. ….आलम ये हो गया  है कि कोई हनुमान को दलित, तो कोई आदिवासी, तो कोई ब्राह्मन मान रहा है….. यहाँ तक कि कोई उन्हे आर्य मानने का तर्क तक दे रहा है. ऐसे में योगी के सामने इन सबका कोई उत्तर नहीं है.
योगी के इस बयान से राजस्थान के दलितों को ही नहीं अन्य राज्यों के दलितों को भी  अत्याधिक हैरान किया हैं… सुना है कि  ब्राह्मण सभा के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश मिश्रा ने भी कानूनी नोटिस भेज कर योगी से अपने बयान पर माफी मांगने को कहा है…. इस तरह योगी का बयान एक राजनीतिक मुद्दा बन सा गया है. … यहाँ कहना न होगा कि योगी के  बयान पर सबसे ज्यादा आपत्ति भारत के द्लित समाज को हुई है. अफसोस तो ये है पी एम मोदी की इस ओर पूर्ण चुप्पी साध्रक योगी जे के बयान का समर्थन ही किया है.
मेरी नजर में दलितों की यही सबसे बड़ी नाकामयाबी है कि वो गैर-दलितों के इस प्रकार के बयानों के दूरगामी उद्देशयों का मतलब/ हकीकत को समझे बिना ही अपना खूंटा गाड़ने लगते हैं जबकि ऐसे बयान केवल और केवल दलितों को असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश होती है. ऐसे बयानों से दलितों का कुछ भला नहीं होने बाला, बल्कि उन्हें अपने मूल मक्सद से भटकाने का प्रयास होता है. प्रयास होता है कि दलितों को भावनात्मक विषयों में उलझाकार उन्हें रोजी-रोटी, रोजगार जैसे मुद्दों, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बरकारारी, एस. सी./एस. टी. एक्ट की बात करने के मौंको से दूर ही रखा जाय. और सच ये है कि दलितों के कुछ छ्दम नेता जो इन वर्चस्वशाली राजनीततिक दलों के चमचे योगी के जैसे बयानों को तूल देने के लिए धरने/ मिथ्या आन्दोलनों पर उतारू होकर दलित समाज को भ्रमित करने का काम करके दो रोटी की बासी रोटी का जुगाड़ करते है किंतु ऐसी हरकतों से समूचे समाज का निहायत ही नुकसान है. मुझे तो दुख ये भी है कि हनुमान जी चाहे जिस भी जाति के थे, दलित अथवा बहुजन  समाज को इससे क्या फर्क पडता है. अब हनुमान दलित थे अथवा नहीं, इसका आज के दलितों पर क्या प्रभाव पड़ता है, पता नहीं? फिर दलितों ने इस मुद्दे पर किसलिए चिल्लपौं लगा रखी है. किंतु योगी जैसे एक मुख्य मंत्री के द्वारा  छोड़े गए सुगूफे  को दलितों द्वारा गहरे से लेना सीधे- सीधे बाबा साहेव अम्बेडकर के विचारों से असहमति रखना है. जाहिर है कि ऐसे बयानों का केवल और आम दलित शिकार नहीं है अपितु वो दलित भी है जो राजनीतिक दलों के दलाल बने हुए हैं. कहने को आज के दलित अपने आप को अम्बेडकरवादी कहते हैं किंतु अम्बेडकरवाद को समझना शायद उनके बूते से परे रहा है. दरअसल अम्बेडकरवा बाबा साहेब अम्बेडकर की विचारधारा और दर्शन है. स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, बौद्ध धम्म, विज्ञानवाद, मानवतावाद, सत्य, अहिंसा आदि के विषय आम्बेडकरवाद के सिद्धान्त हैं. छुआछूत को नष्ट करना,  दलितों में सामाजिक सुधार, भारत में बौद्ध धम्म का प्रचार एवं प्रचार, भारतीय संविधान में निहीत अधिकारों तथा मौलिक हकों की रक्षा करना, एक नैतिक तथा जातिमुक्त समाज की रचना और भारत देश प्रगति….यह प्रमुख उद्देश शामिल हैं. आम्बेडकरवाद सामाजिक, राजनितीक तथा धार्मिक विचारधारा है.
आज (05.12.2018) की ही खबर है कि कुछ दलित कनाट प्लेस के हनुमान मन्दिर पर कब्जा करने के लिए गए तो कुछ लोग मुज्जफरनगर के हनुमान मन्दिर पर कब्जा करके अपने अधिकारों का दिखावा करने से पीछे नहीं थे. किंतु दुख की बात ये है कि इस प्रकार की कोशिश किसी अम्बेडकरवादी संगठन के बुलावे पर नहीं अपितु वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों के बेनर तले काम कर रहे कुछ लोगों का उपक्रम थी. हैरत तो तब हुई कि जब भीम आर्मी के चन्द्रशेखर ने हनुमान मन्दिरों पर कब्जा करने की कवायद करने को बढ़ावा दिया. मैं आर्मी चीफ से ये पूछना चाहता हूँ कि क्या उनका ये आन्दोलन बाबा साहेब की बाईस प्रतिज्ञाओं का उलंघन नहीं तो और क्या है? सच तो ये है कि मुझे यह ही समझ में नहीं आ रहा कि  हनुमान को दलित कहे जाने पर दलितों को ही आपत्ति क्यों है? इन घटनाओं से मुझे तो यही लगता है कि योगी जी अपने मकसद में सफल हो गए हैं. क्योंकि दलित समाज के तथाकथित बोद्ध बाबा साहेब द्वारा दिलाई गई बाइस प्रतिज्ञायों को दरकिनार करके हनुमान मन्दिरों के दरवाजे पर भजन-कीर्तन करने में जुट गए हैं. ऐसे लोग बाबा साहेब के इन बोलों को भी भूल गए कि दलितों अर्थात गरीबों और निरीहों की उन्नति का मार्ग मन्दिरों से नहीं स्कूलों और पुस्तकालयों से होकर निकलता है.

परिनिर्वाण दिवस पर सामने आया मनुवादी मीडिया का जातिवादी चेहरा

6 दिसंबर को बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर का परिनिर्वाण दिवस होता है. इस साल बाबासाहेब का 63वां परिनिर्वाण दिवस है. अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोग इस दिन देश भर में कार्यक्रम आयोजित कर बाबासाहेब को श्रद्धांजलि देते हैं. लेकिन क्या डॉ. आम्बेडकर सिर्फ वंचित तबके के लिए ही महत्वपूर्ण हैं. अगर आप अपने दिमाग को खुला रख कर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ेंगा तो जवाब होगा नहीं.

क्योंकि डॉ. आम्बेडकर ने न सिर्फ देश के शोषित समाज के लोगों को संविधान में अधिकार दिलवाया, बल्कि महिलाओं और मेहनतकशों की बेहतरी और मुक्ति के लिए भी कई कानून बनाएं. वह भारत के संविधान निर्माता थे, देश के पहले कानून मंत्री थे. रिजर्व बैंक के गठन में भी डॉ. आम्बेडकर का महत्पूर्ण रोल रहा. देश की इस महान शख्सियत के परिनिर्वाण के मौके पर “दलित दस्तक” ने देश के प्रमुख अखबारों और वेबसाइटों को खंगाला और जानने की कोशिश की कि आखिर उन्होंने बाबासाहेब को और उनके काम को कितना याद किया है.

हमारी इस पड़ताल के नतीजे चौंकाने वाले थे. तमाम महान कामों के जरिए देश की आधी से ज्यादा आबादी की जिंदगी बदल कर रख देने वाले डॉक्टर आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर इस देश की मीडिया ने चुप्पी साध रखी है.

हमने प्रमुख अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस को खंगाला. तो वहीं हिन्दी के अखबार हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला को भी टटोला. जबकि नवभारत, आजतक और एनडीटीवी की वेबसाइट को सर्च किया. इसके बाद हमें जो नतीजा मिला, वह सुनिए. किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर डॉ. आम्बेडकर से जुड़ी कोई खबर नहीं थी. यहां तक की एडिटोरियल में भी डॉ. आम्बेडकर को पूरी तरह नजर अंदाज कर दिया गया. उनको याद नहीं किया गया. सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में वरिष्ठ नेता डी. राजा का लिखा एक आर्टिकल अखबारों की इज्जत बचा रहा है.

लेकिन अगर हिन्दी अखबारों की बात करें तो हिन्दुस्तान से लेकर जागरण और अमर अजाला तक ने पुरी तरह से चुप्पी साध रखी है. हां, तमाम अखबारों ने बाबरी विध्वंस की खबर का जिक्र प्रमुखता से जरूर किया है.

हमने हिन्दी के जिन वेबसाइटों को खंगाला उनमें कुछ वेबसाइटों ने नीचे एक खबर जरूर डाली है, लेकिन उसे प्रमुख रूप से नहीं दिखाया गया है.

हां, तमाम अखबार सरकारी विज्ञापन बटोरने में जरूर कामयाब रहे हैं. इसमें एक विज्ञापन केंद्र सरकार द्वारा दिया गया है तो दूसरा दिल्ली के केजरीवाल सरकार के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम द्वारा.

आप फर्ज करिए कि आज दो अक्टूबर होता, या फिर जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, जवाहर लाल नेहरू जैसे नेताओं की पुण्यतिथि होती, तो भी क्या अखबार ऐसे ही खामोश रहतें. जाहिर है… नहीं. फिर आखिर इस देश का मीडिया डॉ. आम्बेडकर को नजरअंदाज क्यों करता है, वह उनके विचारों का जिक्र करने से आंखें क्यों चुराता है. जाहिर है कि बाबासाहेब के विचार इस देश की सत्ता और मीडिया पर कब्जा जमाए लोगों को रास नहीं आता. शायद इसीलिए वंचित तबके को भी अपनी एक मीडिया की जरूरत है.

अशोक दास, संपादक (दलित दस्तक) इसे भी पढ़ें-महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस: ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता है

वर्तमान कृषि संकट का विकल्प

वर्तमान कृषि संकट का विकल्प तलाशने के लिए हमें भारत को समझना जरुरी है. भारत एक कृषि प्रधान देश है यहाँ आज भी 65 से 70 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है. यूँ कहें अर्थव्यवस्था का एक पूरा हिस्सा कृषि पर आधारित है. जबकि कृषि पर आधारित हर वो वस्तु का आज बाजार मूल्य नहीं है, जो जिस अर्थ व्यवस्था द्वारा संचालित होता है, वो अर्थ व्यवस्था उस समाज को प्रभावित करता है. भारत कोई अकेला देश नहीं है जो किसी एक व्यवस्था के अंदर रहते हुए वे अपनी सारी चीजों को संचालित कर पाने में या व्यस्थित-व्यवस्था दे पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं. चूँकि भारत दुनिया का ही हिस्सा है. दुनिया की आर्थिक स्थिति बहुत ही तेजी से बढ़ता जा रहा और हम उसके मुकावले अपनी आर्थिक स्थिति को गति नहीं दे पा रहे है. जबकि सभ्यता के विकास में कृषि व्यवस्था का बड़ा योगदान है. कृषि-पशुपालन ही हमारे आर्थिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु है. आज भी विकास की गतिशीलता कृषि-पशुपालन को छोड़कर तय नहीं किया जा सकता है. ऐसा हो ही नहीं सकता है. यही कारण है की दुनिया के विकास के दौर में भारतीय अर्थ व्यवस्था भी अपना स्वरूप बदलता चला गया और जब हम कृषि पर बात करते हैं तो कहते हैं कि हम अपनी सभ्याता और संस्कृति को छोड़ देते है.

सभ्याता- संस्कृति आती कहाँ से है. यह निश्चित रूप सी ही, वर्गीय सोच है और वर्गीय शासन व्यवस्था के अंतर्गत हर शासन व्यवस्था का विस्तार हुआ है तो सभ्यता संस्कृति उसका परिणाम लेकर आएगी. किस व्यवस्था में कौन सा अर्थनीति होगी और कौन सा कृषि नीति होगी. यदि कोई कहे की सामाजवादी व्यवस्था में क्या होगा तो समाजवादी व्यवस्था में किसी एक व्यक्ति के हाथ में कृषि नही रहेगा. वह पूरी व्यवस्था सरकार के हाथ में होगा. पूंजीवादी व्यवस्था में क्या होगा, वहाँ हर व्यक्ति के हाथ में व्यवस्था होगी, जो मन होगा लोग करेंगे. इस व्यवस्था के अंतर्गत किसी के पास हजारो एकड़ जमीन है, किसी के पास दस बीघा जमीन होगा तो किसी के पास कट्टा, दस कट्टा जमीन होगा तो कोई भूमिहीन होगा. वहां मुनाफ़ा पर आधारित सारी नीतियाँ होगी. जहाँ मुनाफे पर आधारित नीतिया होगी वहां मानवीयता जरुर सम्माप्त होगी. मानवीयता जिसकी चिंता हमलोग करते है, पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में हम कितनो चाह ले भाईचारा, बंधुत्व, परिवार को बचा ले संभव ही नहीं है, क्योंकि यहाँ हर चीज मुनाफे पर तय होता है. पारिवारिक संबंध भी होगा तो घाटे-नाफे पर होगा. कोई उद्योग भी होगा तो घाटे-नाफे पर होगा. कृषि भी होगा तो घाटे- नाफे पर होगा. ये कौन सा व्यवस्था है की किसान घाटे में जा रहा है. जबकि पहले प्रतेक किसान के पास अपने उत्पादन के फसलों में ही बीज रखने का चलन था. उस बीज को खाने के उपयोग में नहीं लाते थे, चाहे भूखे क्यों न रह जाय. बीज संयोज कर रखना हमारी परम्परा में था. अब जो उत्पादन हो रहा है, उस उत्पादन के आनाज को बीज के रूप में रखने का कोई फाइदा ही नहीं है. क्योंकि इस अनाज को बीज के रूप में उपयोग करना आज संभव ही नहीं है, ये बीज के रूप में उत्पादन के काम में नहीं लाया जा सकता है. उससे उत्पादन नहीं हो पाता है, ये जो बदलाव है. ये तमाम विदेशी कम्पनियों और पूँजीवादी व्यवस्था का देन है, जिसने भारतीय कृषि व्यवस्था को चौपट किया है. आज कृषि को उद्योग की दर्जा देना जरुरी हो गया है, तभी कृषि संकट से निपट पायेंगे.

जब हमारी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर आधारित है ऐसे में हमें कृषि के उत्पादन पर जो भी खर्च है वह सरकार के द्वारा उसकी छति-पूर्ति हो. सिचाई की व्यवस्था, नहर की व्यवस्था, टुबेल की व्यवस्था करनी होगी. जैसे सोवियत संघ में क्रांति हुई तो वहां के प्रथम “हेड ऑफ़ गवर्नमेंट” रहे ‘व्लादिमीर इलीइच उल्यानोव’ ने कहा की सारे विकास की धुरी में बिजली है. बिजली ही शक्ति का एक मात्र साधन है जो हर क्षेत्र में विकास कर सकता है. और आज हम देख पा रहे हैं कि बिजली के बिना किसी भी तरह की विकास को कर पाना संभव नहीं है. 1917 में क्रांति होता है, और तेजी से सोवियत रूस दुनिया में विकास करता है उसका मुख्य कारण है, कृषि के क्षेत्र में तमाम साधनों को जोड़ना है. वह ध्वस्त हुआ भुखमरी के कारण नहीं, बेरोजगारी के कारण नहीं. बल्कि दुनिया के निगाह में वो समाजवादी देश जो ध्वस्त हुआ उसके पीछे पूंजीवादी देश का हाथ रहा है. दुनिया के कोई भी छोटा सा देश पूँजीवादी देश को चुनौती दे सकता है. अगर वो कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो.

आज हमारे देश में कृषि संकट गहरा रहा है. उसके पीछे का बड़ा कारण कुछ और नहीं बीज को पेटेंट कर देना महत्वपूर्ण कारण है. आज हम बीच के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं है. नीम का पेटेंट, गेंहूँ के बीज का पेटेंट, मक्के का पेटेंट हुआ है (कृषि उत्पादित वस्तुओं का पेटेंट होना) जो कृषि को बर्बाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है. उत्पादन जितना चाहे कर लें, उसे बीज के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. नवगछिया, भागलपुर बिहार के किसान मक्के का विदेशी बीज को लाकर खेत में लगाया तो जरुर है, लेकिन उस भुट्टे में दाना नहीं है. ऐसे में कृषि संकट गहराएगा ही… भारतीय कृषि नीति देश की आर्थिक स्थिति को बर्बाद करने में बड़ी भूमिका निभायी है. जिस तरह नील की खेती भूमि को बंजर बनाने के लिए था ठीक उसी तरह की नीति आज देश के अंदर अपनाया जा रहा है. पेटेंट के माध्यम से जो बीज और रसायनिक खाद बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है. उससे खेती बंजर ही होगा. देश की आर्थिक व्यवस्था को सुधारने और बिगारने में सरकार जिम्मेवाद होती है.

कृषि संकट का विकल्प को देखे तो पहला है किसानों को संगठित होना होगा, संगठित होकर किसान विरोधी सरकारी नीतियों का विरोध करना, किसान की बात करने वाली पार्टियों को अपना मत देना होगा. दूसरा है सहकारी खेती, पशुपालन और मार्केंटिंग का विस्तार करते हुए तमाम तरह की व्यवस्था में सहकारी भाव पैदा करना (सहकारी समिति को बढ़ावा देना होगा). यह तो अपने देशा में हो रहा है, गुजरात में अमूल है, महाराष्ट्र में कॉपरेटिव, बिहार में सुधा है एवं अन्य दुग्ध उत्पादन समितियाँ है जिसने किसानों की जीवन स्तर को उठाया है.

गांधी ने कहा था ऊँची कल्पनाओं से और उचे आर्दशों से जीवन नहीं चलता है. जीवन चलता है अच्छे काम करने से… इसलिए अब जरूरत है, जीरो वजट नेचुरल फार्मिंग को अपनाने का तभी भारत में कृषि व्यवस्था को नये सिरे से सुधारा जा सकता है. जो पुराना कृषि व्यवस्था था उसे अपनाते हुए उसमें कुछ परिवर्तन लाते हुए परम्परा विकसित करने का. उसके तहत कृषि कार्य में लागत मूल्य जैसी बहुत कुछ नहीं था. मनुष्य का श्रम और पशु का श्रम से कृषि कार्य होता रहा है, इस आधार पर भारत में सभ्यता-संस्कृति, दर्शन और विकास का परिप्रेक्ष्य देखा जा सकता है. ये केवल कृषि का सवाल नहीं है. ये पुरे जीवन शैली का सवाल है. गांधी जी की बात करें तो उनके वक्तव्य टुकड़ों में आये हैं. वो न ही अर्थशास्त्री थे, न राजनीतिशास्त्री थे, न ही दर्शनशास्त्री थे और न ही वो सामाजशास्त्री थे. लेकिन वो सबकुछ थे. उनके लेख और वक्तव्य टुकड़ों में भले है, लेकिन समग्रता में है. और एक-दुसरे से जूडा हुआ है. जब हम कृषि संकट की बात करेंगे तो भारतीय परिपेक्ष्य में गांधी को छोड़कर कृषि संकट उवर पाना संभव नहीं है. कृषि संकट का विकल्प गांधी जी के स्थानीय संसाधोनों के उपयोग पर ही संभव है, न की पूंजीवादी व्यवस्था में है.

नीरज कुमार, पी-एच.डी, शोधार्थी इसे भी पढ़ें-वर्तमान कृषि संकट और उसका समाधान  

दलित कहकर मंदिर में कथा कराने से रोका!

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रेवाड़ी। हरियाणा के रेवाड़ी की गढ़ी बोलनी रोड स्थित एंप्लॉयीज कॉलोनी के श्रीकृष्ण मंदिर में एक अनुसूचित समाज की महिला को कथा कराने से रोकने का मामला सामने आया है. शिकायत मिलने के बाद डीएसपी सतपाल यादव पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए मंदिर परिसर व उसके आसपास पुलिस बल व दुर्गा शक्ति को तैनात कर दिया. पुलिस ने मामले की नजाकत को समझते हुए मंदिर को ताला लगा दिया.

जानकारी के मुताबिक, एंप्लॉयीज कॉलोनी में रहने वाली पीड़िता ने बताया कि वह श्रीकृष्ण मंदिर में कथा कराना चाहती थी. इसके लिए उसने लोगों को न्योता भी दिया था. शुरू में मंदिर कमिटी के सदस्यों ने कुछ नहीं कहा, लेकिन तारीख नजदीक आने पर उसे मना कर दिया गया. मंदिर कमिटी ने उसे दलित कहकर प्रवेश से रोक दिया. इसके बाद पुलिस को शिकायत दी गई. इस पर डीएसपी सतपाल यादव अपने स्टाफ के साथ मंदिर पहुंचे और हालात का जायजा लिया. उन्होंने बताया कि पूरे मामले की छानबीन की जाएगी.

दूसरी ओर मंदिर कमिटी सदस्यों का कहना है कि महिला द्वारा लगाए गए आरोपों में सच्चाई नहीं है और उसे दलित कहकर कथा से नहीं रोका गया. मंदिर कमिटी के एक सदस्य ने कहा, ‘कमिटी के नियमों को पूरा नहीं करने पर उसे कथा करने से मना किया गया है.’ उनका कहना है कि कमिटी का नियम है कि जब भी मंदिर में कथा या अन्य प्रोग्राम होता है तो पहले अनुमति ली जाती है और कार्यक्रम के बाद मंदिर परिसर में शौचालय व अन्य निर्माण करवाना होता है. महिला से भी कुछ निर्माण करने को कहा गया था. वह कमिटी नियमों को पूरा कर कथा कर सकती है. उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.

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डिक्की नार्थ के कार्यक्रम में मंत्री ने की बड़ी घोषणा

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में दलित उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार सस्ता लोन मुहैया कराएगी. इस लोन पर उद्यमियों से पांच साल तक कोई ब्याज नहीं लिया जाएगा. इसकी घोषणा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री सत्यदेव पचौरी ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित एससी-एसटी उद्यमी सेमिनार में की. यह कार्यक्रम दलित उद्यमियों के संगठन डिक्की नार्थ के द्वारा आयोजित किया गया. मंत्री ने कहा कि दलित उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए कॉमन फैसिलिटी सेंटर और विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजनाएं जल्द शुरू की जाएंगी. दलित उद्यमियों के प्रॉडक्ट्स की मार्केटिंग भी सरकार करेगी.

कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में एमएसएमई मंत्री सत्यदेव पचौरी और मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने आश्वासन दिया कि दलित उद्यमियों की मांगों पर मुख्यमंत्री से वार्ता के बाद निर्णय लिया जाएगा. सत्यदेव पचौरी ने कहा कि जो भी दिक्कतें आएंगी. उनको दूर करने का प्रयास किया जाएगा.

प्राइवेट सेक्टर में भी मिलना चाहिए आरक्षण

कार्यक्रम के दौरान मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि दलितों को प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण मिलना चाहिए. साथ ही दूसरे राज्यों की तरह ठेकेदारी में भी छूट दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार दूसरे राज्यों में दलित उद्यमियों को दी जाने वाली सुविधाओं का अध्ययन करेगी. इसी के मुताबिक दलित उद्यमियों को सुविधाएं राज्य सरकार की तरफ से दी जाएगी.

इससे पहले कार्यक्रम में डिक्की नार्थ के चेयरमैन आरके सिंह ने संगठन की मांगों को रखा. कार्यक्रम के दौरान दलित उद्यमी सुभाष सिंह ग्रोवर, विपिन कुमार, डिक्की नार्थ के चेयरमैन आरके सिंह, बीना सिंह, लक्ष्मी और अशोक कुमार को सम्मानित किया गया.

दलित उद्यमियों की प्रमुख मांगे

डिक्की (नार्थ) के चेयमैन आरके सिंह ने कार्यक्रम में 16 सूत्रीय मांग पत्र रखा. इसमें मुख्य रूप से एससी-एसटी के उद्यमियों को ऑर्नेस्ट मनी में छूट देने की मांग, कार्यादेश होने के बाद जो बैंक गारण्टी दी जा रही है, उसमें 1 प्रतिशत एससी व एसटी के लोगों को मान्य करने, एससी-एसटी के उद्योगपतियों को औद्योगिक क्षेत्रों में भूखंडों पर 50 प्रतिशत की सब्सिडी देने की मांग की गई. इसके साथ ही छोटी औद्योगिक इकाइयों से राज्य की खरीद का 50 प्रतिशत स्टेट की यूनिटो से क्रय किया जाए नई उद्योग नीति के निर्धारण करने वाली समिति में डिक्की नार्थ के अध्यक्ष अथवा अध्यक्ष द्वारा नामित उद्यमी को सदस्य नामित किया जाए.

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वर्तमान कृषि संकट और उसका समाधान

नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट को देखें तो 1995 से 2015 तक में 3, 60,000 किसानों ने अब-तक आत्महत्या कर चुके हैं. प्रत्येक साल 15 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं. इसको कैसे रोका जाये, भारत जैसे देश में किसान ऋण में पैदा लेता और ऋणग्रस्त होकर मरता है. अपने बच्चों को सरकार एवं साहूकारों का ऋणी बनाकर चले जाते थे. 1960-65 से लेकर आज-तक की स्थिति में कुछ ख़ास बदलाव नहीं हुआ है. अब क्या है भारतीय किसान बिना ऋण के जन्म लेते है और ऋण के कारण मर जाते हैं. 2011 के सेन्सर्स के अनुसार पिछले सेन्सर्स यानी 2001 से 2011 के बीच के अनुसार डेढ़ करोड़ किसानों ने खेती करना छोड़ दिया. दिन पर जोड़ा जाय तो प्रतिदिन दो हजार चालीस किसान खेती को छोड़ रहे है. खेती छोड़ने वाले किसान, किसान से खेतिहर मजदूर हो जाते हैं.

चूँकि खेती के साधन मंहगे होते जा रहे हैं और उससे आमदनी कम होते जा रही है. उनकी किसान बने रहने की हैसियत नहीं रहती है. या फिर वो अपने गाँव को छोड़ कर छोटे शहरों में, बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में जाते हैं. जहाँ उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता है ये है कृषि संकट का बड़ा कारण, और ये कृषि संकट है क्या? कृषि उद्योग की तरह घाटे में जाने पर कृषक को कहीं से कोई राहत नहीं मिल पाना ही उदासीनता की दिशा में बढ़ते जा रहा है. मुनाफ़ा नहीं होता है. कृषि मुनाफे का धंधा नहीं रहा इसलिए खेती छोड़ते जा रहे किसान, किसान ऋण लेते हैं खेती के लिए खेती मारी जाति है और किसान आत्महत्या के लिए विवस होते हैं. किसान ऋण कहाँ से लेते हैं. ज्यादातर महाजनों से ऋण लेते हैं, क्योंकि बैंक आदि के द्वारा ऋण सभी को नहीं मिल पाता है. और जिसे मिलता भी है तो प्रयाप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है. उसे ऑफिसों का चक्कर काटना पड़ता है. ऋण का एक तिहाई हिस्सा घुस खिलाना पड़ता है. आखिरकार उसे महाजनों से ही ऋण लेना पड़ता है. महाजन अधिक ब्याज पर ऋण देता है. जिसके कारण वो खेती करके परिवार को चलते हुए ऋण चुका नहीं पाते हैं. फिर वो कर्ज में चला जाता है. यही कारण है कि कई किसान खेती को छोड़कर खेतिहर मजदूर हो जाता है या फिर शहर की ओर पलायन कर जाता है. ऐसे में किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है.

44-45 प्रतिशत जो कृषि शाख है वो इसी तरह से आता है. कृषि लाभकारी रहा क्यों नहीं अर्थशास्त्र के अनुसार लाभ है लागत और कीमत का अंतर… अगर हम विश्लेषण कर ले की कीमत क्यों मिलता है लागत और कीमत में अंतर क्यों नहीं है तो समझ जायेंगे. वर्तमान कृषि संकट में वर्तमान कृषि संकट के कारण… किसानों को कीमत क्या मिलता है. किसानों को उचित कीमत मिले, इसके लिए समर्थन मूल्य की नीति अपनाई गई, कृषि पर लागत और समय को जोड़ कर जो बनता है उसके अनुपात में लागत मूल्य को आँका जाता है. इसी के आधार पर समर्थन मूल्य तय होता है. न्यूनतम समर्थन मूल्य: इसका उद्देश्य था की किसान को उतना कीमत मिल जाय की उनको इतना समर्थन मूल्य मिल जाए की उसको खेती में घटा नहीं हो. खेती में लगाये गए लागत के अनुरूप घाटा न हो, इसलिए प्रतेक साल समर्थन मूल्य सरकार के द्वारा घोषित हो अभी ये समर्थन मूल्य बहुत विवाद में है. क्योंकि अभी के वर्तमान सरकार चुनाव में वादा करके कुछ आई थी और सरकार में आने के साथ ही पूंजीपतियों के नीतियों पर चलने लगते हैं.

हम स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसाओं को लागू करेंगे. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिस थी की किसानों को उसके लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर उसे कीमत दिया जाय. (वर्तमान समय में इसको लागू करने के लिए किसान आंदोलित हैं.) वित्त मंत्री ने तो कहा हम लागत में 50 प्रतिशत जोड़कर कीमत घोषित करेंगे. रबी फसल में किया है और खरीफ में भी करेंगे. वित्त मंत्री के कहने के बाद समस्या कहाँ रह गया. समस्या यह है कि कृषि लागतों को कई तरीके से जोड़ा जाता है. किसान ने खेती के दरम्यान विभिन्न तरीके का खर्च किये हैं उसकी लागत जैसे बीज, खाद. कीट नाशक, बिजली, डीजल और श्रमिक आदि पर खर्च है. एक लागत हुई किसान अपने जेब से खर्च करता है, दूसरा लागत हुआ किसान अपना और अपने परिवार का श्रम लगाता है. अपने खेत में काम नहीं करता तो दूसरे जगह काम करता उसे मजदूरी मिलता, तो किसान और उसके परिवार का जो आनुमानित लागत मजदूरी हो वो जोड़ा जाय. स्वामीनाथन आयोग द्वारा जो जोड़ा गया है, a2+f l से जोड़ा है. तीसरा है, जिसे कहा जाता है समग्र कीमत : किसान अपने खेत पर खेती नहीं करता तो उसे लगान आता, वह लगान की राशि और उसके पास जो ट्रेक्टर है, थ्रेसर है, हार्वेसर है या अन्य तरह के जो भी कृषि उपकरण है. जिसको हम कृषि पूँजीगत सामान कहते है. इसको खरीदा तो इस पर ब्याज लग रहा है, उसकी कीमत क्या होगी फिर किसान अपनी उत्पादन को मंडी में ले जाता है तो ट्रांसपोर्ट कोस्ट लगता है. किसान अपना फसल मंडी में ले जाता है तो उसे कमिशन देना पड़ता है, उसे अपने फसल का बीमा कराता है तो प्रीमियम भरना पड़ता है. समग्र लागत को स्वामीनाथन कमिटी ने C2 कहा है, समग्र लागत पर 50 प्रतिशत जोड़कर समर्थन मूल्य घोषित करने की जरूरत है. लेकिन समर्थन मूल्य में लगातार कमी होती रही है.

बाजार को निगरानी करने वाली कृषि एक रेटिंग एजेंसी है उसने एक अध्ययन करके निकाला है. 2009 और 2013 के बीच में समर्थन मूल्य की वृद्धि की दर थी वह थी 19.3 प्रतिशत और 2014 से 17 के बीच सर्मथन मूल्य की दर रही है 3.6 प्रतिशत, उस समय यूपीए के समय में जो सर्मथन मूल्य था वो समग्र मूल्य के बराबर नहीं था, कम था. समग्र लागत से कम था लेकिन उसके करीब था. अब क्या है उसके करीब बिल्कुल नहीं रहा यानी कि 19 प्रतिशत से बढ़ा रहा था, तो लागत मूल्य के करीब था, समर्थन मूल्य लेकिन जब से 3.6 प्रतिशत के करीब समर्थन मूल्य पहुँच गया तबसे कृषि संकट गहरा सा गया है. एक अध्ययन आया दाल की लागत जिसने कहा 1916-17 में लागत में वृद्धि 3.7 प्रतिशत, उसके पहले के वर्ष में लागत वृद्धि थी 2.8 प्रतिशत यानी की लागत मूल्य में 3.7 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है तो समर्थन मूल्य में 3.6 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है. लागत मूल्य से भी कम की वृद्धि हो रही है. फिर किसान की लागत और समर्थन मूल्य के बीच के अंतर में लाभ नहीं दिखाई दे रहा है. अर्थात लागत मूल्य से भी कम समर्थन मूल्य तय करना कृषि कार्य हानि की दिशा में जा रहा है. पहला यह की वाजिब लागत पर 50 प्रतिशत समर्थन मूल्य जोड़कर वस्तु की कीमत तय करना है.

महत्वपूर्ण यह है कि समर्थन मूल्य केवल 26 वस्तुओं पर घोषित होता है. लेकिन लागू सिर्फ तीन-चार वस्तु पर ही हो पाता है. बाजार से घोषित मूल्य पर सरकार वस्तु को खरीदेगा. जितनी मात्रा में किसान अपनी वस्तु बेचना चाहे बेच सकता है. यानी सरकार को जब वस्तु खरीदना होता है तो वो सिर्फ दो ही वस्तु खरीदती है. धान और गेंहूँ तीसरी वस्तु प्रायः नहीं खरीदी जाती है किसान तो प्रायः सभी वस्तुओं की उत्पादन करती है. ये जो धान और गेंहूँ की बात है तो मोदी सरकार ने एक समिति बनाया ‘शांता कुमार समिति’ जिसने अपने अध्ययन में कहा ये समर्थन मूल्य का लाभ केवल 6 प्रतिशत किसान को मिलता है. इस समर्थन मूल्य के लाभ से 94 प्रतिशत किसान इससे बाहर रह जाता है. पुरानी सरकार और नई सरकार ने ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं किया है कि किसान अपने कृषि उत्पादन के वस्तु बेचना चाहे तो उस बस्तु को सरकार आसानी से खरीद ले जाय. इसलिए यह सवाल समर्थन मूल्य की घोषणा का नहीं है. सवाल खरीदने का भी है जो भविष्य में दिखाई नहीं पर रहा है. समर्थन मूल्य जो भी घाषित करता है, दूसरा यह जो समर्थन मूल्य घोषित होता है उस समर्थन मूल्य पर खरीद ले इसकी भी कोई गारेंटी नहीं है. तो कीमतें लगातार घटती जा रही है वही दूसरी तरफ खाद, बीज, कृषि से संबंधित उपकरण और कृषि पर तमाम तरह की लागते बढ़ते जा रही है. आखिर ऐसा हो क्यों रहा है. जैसा नीति हमने राजनीति को बनाया है ऐसा ही होगा.

दूसरा 1991 के बाद 1995 से ही कृषि संकट गहराते जा रहा है. ये कोई आज का संकट नहीं है. एक तरफ आर्थिक संकट शुरू होती है दूसरी तरफ कृषि संकट साल-दर-साल गहराता जा रहा है. 1991 के बाद से जिसे नव उदारवादी व्यवस्था कहते है, उदारवादी नीति में वृत्तीय घाटा को कम रखना है. वृत्तीय घटा को बनाए रखने के लिए कर राज्वस्व की वसूली को बढ़ाइए. कर राजस्व को बढाना नहीं क्योंकि हमें निजी क्षेत्र को मुनाफ़ा देना है. नव उदारवाद सिद्धांत के तहत हमें निजी क्षेत्र को बढ़ाना है. इसलिए कर राजस्व को बढ़ाना नहीं है. निजी क्षेत्र को बढाने के लिए उसे कर में छुट देना है और सरकार ऐसा करते रही है सरकार कीमत नहीं बढ़ा सकती है तो खर्च घटाये, ऐसा सरकारी क्षेत्र में कर को बढ़ा नहीं सकती है तो कृषि क्षेत्र में कर राजस्व बढ़ा देती है. ग्रामीण क्षेत्र बचा है, कृषि क्षेत्र बचा है जहाँ सरकार अपने व्यय में कटैती कर रही है. तो समर्थन मूल्य इसलिए भी नहीं बढ़ा रही की बाजार मूल्य और समर्थन मूल्य के बीच का अंतर को सरकार को भुक्तान करना पड़ेगा.

वृत्तीय घाटा को बनाए रखने के लिए समर्थन मूल्य पर नियंत्रण बनाए रखना सरकार की नियती है. ये तो नवउदारवाद की नीति भी यही कहता है. दूसरा WTO का जो समझौता है उसका भी यही नीति है कि कृषि पर छुट कम रखना है. भारत में जिसकी भी सरकार हो सब्सीडी लागत के अनुपात कम ही दिया जाना है. बाजार की बस्तुओं की कीमते बढ़ रही है वहीं उत्पादित बस्तुओं की कीमत मिल नहीं रही है. चूँकि दुनिया की बाजार आपस में जुड़ गई है. जुड़ने की वज़ह से यह होने लगा है कि बम्पर क्रॉप होने पर किसानों को उसके फसलों का कीमत नहीं मिल पाता है किसान आलू, टमाटर, बैंगन फेकते हैं और दूध बहाते हैं. और कभी कम उत्पादन होता है खराब मौसम की वज़ह से या किसी कारणों की वज़ह से तो ये सरकार है जो शहरी वर्ग से डरती है, चूँकि बाजार में उत्पादन कम होने के कारण बस्तुओं की कीमत कम होने के कारण वस्तुओं की दामों में वृद्धि को लेकर हाय तोवा मचा देती है. तब सरकार वस्तुओं को आयात कर लेती है बाजार को नियंत्रण कर लेती है. वहीं जब वस्तुओं का उत्पादन अधिक होता है तो उसका उचित कीमत नहीं मिल पाता है. जब वस्तु आयात की जाती तो उसका अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार कीमत निर्धारित होने लगता है समर्थन मूल्य कम तो बाजार मूल्य भी कम होने लगता है. इसका असर बाजार की कीमतों पर पड़ता है. किसान मारा जाता है कृषि मारी जाती है. जब उत्पादन अधिक होता है तब भी जब उत्पादन कम होता है तब भी… और इस तरह से किसान का शोषण हो रहा है.

शोषण कई तरह का होता है. ब्राह्मणवादी शोषण होता है, सामंतवादी शोषण होता है और पूंजीवादी शोषण होता है. ये जो किसानों के साथ शोषण हो रहा है यह शुद्ध पूंजीवादी शोषण हो रहा है. सामंतवादी शोषण होता है मजदूर को मुफ्त में काम कराया जाता है. कम मजदूरी देकर विदा कर देते हैं डंडे की जोड़ पर, ये पूंजीवादी शोषण हो रहा है, पूंजीवादी शोषण मूल्य के द्वारा होता है. किसानों की फसलों की कीमत कम मिलती है लेकिन जब वही फसल बाजार-मंडी से बाहर चली जाती है प्रोसेसिंग में चली जाती है तो उसका कीमत बढ़ जाती है. टमाटर की कीमत में और सोस की कीमत में, आलू की कीमत में और चिप्स की कीमत में, मकई के कीमत में और कान्फेक्स की कीमत में आसमान-जमीन का अंतर रहता है. डेढ़ रुपए में एक बोतल पानी तैयार होता है और वही पानी बाजार में 15 रुपए में बिकता है. ये जो मूल्य के द्वारा किसानों और आम जनता का शोषण हो रहा है यह शुद्ध रूप से पूंजीवादी शोषण है. किसान की हालत दिन-व-दिन वद-से-वद्तर होती जा रही है, कृषि संकट में पड़ते जा रहा है. ये मोटा-मोटी कृषि संकट का परिणाम है. सवाल है कि इसका निदान क्या है.

अर्थशास्त्री कई तरह के निदान बताते है 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी कर दी जायेगी, अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया है कि अगर कृषि उत्पादन में 14 या 8 या 6 प्रतिशत की वृद्धि प्रतेक साल हो तो 2022 तक में किसानों की आय दुगनी की जा सकती है. वस्तु की कीमते ठीक मिलते रहे, सरकार इसे नहीं मानती है लेकिन नीति आयोग यह कहता है की 2022 तक में किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिए कृषि उत्पादन में 10.4 प्रतिशत की बार्षिक वृद्धि होनी चाहिए तभी किसानों की आय दुगनी हो पाएगी. हो कितनी रही है, इकोनोमिक सर्वे कहता की 2.1 प्रतिशत वृद्धि की ही संभावना है आगे के वर्षों में भी 2.1 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है. और वातावरण में परिवर्तन हो रहा है इसके कारण आने वाले वर्षों में औसतन कृषि उत्पादन में 15 से 18 प्रतिशत की कमी होगी. और जहाँ असिंचित क्षेत्र है वहां पर 20 से 25 प्रतिशत कमी होगी. इसका कारण यह है की किसानों के प्रति सरकार का कोई रुची है ही नहीं… अभी हाल में आंदोलन कई हुआ है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली में बिहार में लखीसराय से वख्तियारपुर तक सड़क जाम हुआ. इस लिए की दलहन खरीद लो. आंदोलन तो हो रहा है लेकिन असर नहीं हो रहा है क्योंकि संसद में अब किसानों का बात करने वाला कोई नहीं है. संसद में अब किसान लॉबी नहीं है क्यों लॉबी नहीं है क्योंकि वोट तो हम दे रहे हैं धर्म और जात के नाम पर… धर्म-जाति और साम्प्रदाय में बंटे हुए भी है और हमें लगातार बांटने की कोशिश भी हो रही है. किसान की तो कोई जात है ही नहीं, न ही किसान हिन्दू है, न किसान सिख है, न किसान मुस्लिम है. न किसान उच्च वर्ग और न ही किसान निम्न वर्ग का हो सकता है. परंतु यहाँ तो किसान यादव है, कोयरी है, कुम्हार है, मुस्लिम है, सिख है, इसाई है, राजपूत है, ब्राह्मण है, तेली है, धनुक है, कुर्मी है और दलित है. इसलिए जरूरत है जाति और धर्म से ऊपर उठकर किसानों को संगठित होने की जरूरत है.

आत्मनिर्भरता जरुरी है लेकिन सहकारिता के बिना सामाजिक व्यवस्था संभव नहीं है. गांधी के ग्राम स्वराज्य का सिद्धांत से निकला हुआ सहकारिता का दर्शन दुनिया के मानवता के लिए है. ये जीवनशैली, जीवन पद्धति है. चीन में रेगुलेटेड मार्केट है, वहां सभी वस्तुओं का मूल्य सरकार तय करती है चूँकि वहाँ सरकार के नियंत्रण में कृषि उत्पादन से संबंधित वस्तु है, उन पर मूल्य निर्धारण करती है और प्रोसेसिंग मार्केट के तहत सरकार फेक्टरियों में वस्तु पहुंचाते है जिससे वहां के किसान को उसके वस्तु का कीमत मिल जाता है. और यहाँ खुला बाजार है, पूंजीपति और व्यापारी वर्ग यह चाहता है कि उसे कम दाम में उत्पादित फसल मिल जाय, कभी-कभी जब भारत के किसान को अपने फसल का कीमत मिलने की स्थिति बनती है. वैसे में व्यापारी वर्ग खुला बाजार के कारण सरकार के सहयोग से विदेशों से आनाज आयात कर लेती है. इसके कारण किसान को दोहरा मार का शिकार होता है. मार्केटिंग एक रास्ता है जिसके माध्यम से लागत-कीमत का अंतर के साथ-साथ बहुत सारे समस्याओं का निदान हो सकता है. सहकारी पशुपालन और सहकारी कृषि होगा तो अपने आप ग्रामीण हाट-बाजार बढेगा. बीज संरक्षण केंद्र होगा, जीरो वजट नेचुरल फार्मिंग जैसे कृषि के दिशा में भारत बढेगा. सहकारी खेती, सहकारी पशुपालन, सहकारी मार्केटिंग केवल हिन्दू के लिए नहीं होगा, केवल मुस्लिम के लिए नहीं होगा, न ही केवल सवर्णों के लिए होगा और न ही दलित-पिछड़ों के लिए होगा. इसका लाभ सबको मिल पायेगा. दरअसल सहकारिता से सभी के बीच रिश्ते वेहतर होगा. हिन्दू-मुस्लिम के बीच का झगड़े खत्म होंगे, दलित-पिछड़ों और अगड़े के बीच का झगड़ा खत्म होगा. आपस में पारिवारिक संबंध विकसित होगा, तब सायद उस मूल्य की भी पूर्ति होगी जिसके दंभ पर मानवता टिका है. आज जिस तरीके से लोग पढ़ते-लिखते जा रहे है और अपने गाँव व कस्बे को भूलते जा रहा है. तब मेनेजमेंट किया हुआ लड़का बैंक में न जा कर सहकारी खेती व्यवस्था से जुड़ेगा, क्योंकि तब हमें मेनेजमेंट की जरूरत पड़ेगी.

आज किसानों को लामबंद होने की जरूरत है, विभिन्न झंडों के तले नही बल्कि एक बैनर तले, तभी कृषि संकट से भारत बाहर निकल पायेगा. (30 नवम्वर को दिल्ली में किसान रैली में अठारह विपक्षी दलों के नेताओं को एक मंच पर आना) गांधी जी का ट्रस्टीशीप का सिद्धांत आज भी प्रसांगिक है. ग्राम स्वराज्य में ट्रस्टीशीप के सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए गांधीजी ने कहा कि मनुष्य के द्वारा अब-तक की सभ्यता के विकास से पनपी समस्याओं का विकल्प यही है. जिसमें सहकारी खेती, सहकारी पशुपालन और सहकारी बाजार व्यवस्था से ही सभी का जीवनशैली उत्कृष्ट हो पायेगा. अकेला व्यक्ति, अकेला किसान, अकेला मजूदर सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता है. गाय को या फिर किसी भी तरह के जानवरों की रक्षा करना और उसके दूध का लाभ अन्य लाभ लेना हो तो ये अकेले संभव नहीं है. सौ किसान मिलकर वो अपने पशुओं का अच्छी तरीके से इलाज कर सकता है. उसकी देख भाल अच्छी तरीके से हो सकता है एक किसान की तुलना में, जो बात सहकारी पशुपालन से ही संभव हो सकता है. वही बात कृषि पर भी लागू होता है. गांधीजी के जीवनशैली को देखें तो उन्होंने सहकारी कृषि की भी बात की थी. सौ किसान अपने खेतों को मिला दे और उसपर खेती करे फिर अपने उत्पादन को बाँट ले, इससे उत्पादन भी बढ़ेगा और संसाधनों की भी वचत होगा. गांधी जी ने सहकारी पशुपालन और सहकारी कृषि की बात की, वर्धा स्थित गोपुरी इसका उदहारण है. इसके साथ उन्होंने सहकारी लघु-कुटीर उद्योग का भी विचार दिया जिसका स्थानीय स्तर पर ग्रामीण स्तर पर अपना ग्रामीण हाट, बाजार होगा.

नीरज कुमार, पी-एच.डी, शोधार्थी गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग, म.गां.अं.हिं.वि.वर्धा.

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डिक्की नार्थ का सेमिनार 5 दिसंबर को लखनऊ में

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लखनऊ। डिक्की नार्थ एस.सी./एस.टी  उद्यमियों के लिए लखनऊ के गौमती नगर में दिनांक 05 दिसम्बर 2018, दिन बुद्धवार को प्रातः 09:30  से सांय 5:30 बजे तक एक सेमिनार का आयोजन करने जा रही है जिसके मुख्य अतिथि श्री सत्यदेव पचौरी मंत्री,उ0प्र0 सरकार,  विशिष्ट अतिथि श्री स्वामी प्रसाद मौर्य मंत्री, उ0प्र0, और श्री कौशलकिशोर सांसद लोकसभा होगें.

गौरतलब है कि साल 2005 में दलित उद्यमियों को एक मंच पर लाने और आपस में जुड़कर एक ताकत बनने की चाह में उभरे दलित उद्यमियों के संगठन डिक्की का अगस्त 2018 दो फाड़ हो गया था. संगठन के हरियाणा और उत्तर प्रदेश के फाउंडर प्रेसिडेंट सुभाष सिंह ग्रोवर और आर.के सिंह ने डिक्की से अलग होकर अपना एख अलग संगठन बनाया था जिसका नाम Developing Indian Chamber of Commerce & Industry North रखा. जिसका शार्ट नाम DICCI होता है. इसके अध्यक्ष डिक्की के पूर्व यूपी प्रेसिडेंट आर.के सिंह हैं जबकि उपाध्यक्ष हरियाणा के फाउंडर प्रेसिडेंट सुभाष सिंह ग्रोवर हैं. अन्य पदाधिकारियों में लक्ष्मी जनरल सेक्रेट्री और विपिन कुमार ट्रेजरार हैं. अशोक कुमार और सोबेस सिंह संस्था के सदस्य हैं.

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