शहरों/ नगरों /सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति नई तो नहीं है किंतु ….

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आज के दौर में हम केवल भारतीय नहीं रह गए हैं. वैसे पहले भी हम कभी भारतीय नहीं रहे. भारतीय समान को जातियों में विभाजित कर देना इस देश की जनता के सिर सबसे बड़ा कलंक है. देश आजाद हुआ तो देश की जनता राजनीतिक खैमों में विभाजित हो गई. कोई कांग्रेसी तो कोई भाजपाई, कोई सपाई तो कोई कुछ…..होता चला गया और आज सद्विचारों की सहमति के बजाय खैमेंबाजी से सहमति का दौर चल रहा है. दरअसल हम स्वस्थ विचारधारा के नहीं, अपितु राजनीतिक मानसिकता के गुलाम होकर रह गए हैं. हम सोचते हैं कि वो राजनीतिक दल जिससे हम मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं, वो जो भी कुछ अच्छा-बुरा करता है, अपने चहेतों के लिए ठीक ही करता है. और आपके पसंदीदा राजनेता आपकी निजी रुचि के विषय धर्म, जाति, समाज को राजनैतिक मुद्दा बनाकर सत्ता सुख की सीढ़ियों पर चढ़ जाते हैं. इन राजनीतिक दलों को इस बात से कुछ लेना-देना नहीं कि किसी भी शहर/नगर/सड़क का नाम बदलने में सरकारी खजाने से भारी रकम खर्च होती है और लाखों- करोडो के ठेके नेताओ के अपने सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों, अनुयाइयों में बांट दिए जाते हैं. नाम बदलने का सिलसिला भी राजनीति के रोजगार का जरिया बन गया है.

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि सरकार केवल मदारी की भूमिका में होती है, उसे कटोरा थामना पड़े या कटोरा छिनना पड़े, हर हाल  पैसे कमाने से मतलब है…., वो ऐसा खेल ही दिखायेगी जिससे जनता पैसे के साथ साथ ताली भी बजाए… और हम वही कर रहे हैं…

शहरों/नगरों/सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति के चलते, गए दिनों में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के चलते हुए तीन बड़े नाम बदले गए हैं| मुगल सराय स्टेशन का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया तो इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखा गया| (2018) दीवाली के एक दिन पहले ही सीएम योगी आदित्याथ ने फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या कर दिया है. पता नहीं … अब अयोध्या का क्या नाम होगा? इस तरह अब महाराष्ट्र के शहर उस्मानाबाद और औरंगाबाद के नाम बदलने की भी मांग की जा रही है. अब हैदराबाद का नाम बदलने की बात सामने आई है तो कल अहमदाबाद का नाम बदलने की बात होगी, इसमें शंका की कोई जगह नहीं है. बताते चलें कि ताजा खबर है…भाजपा द्वारा शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया को विश्वभर में तिरछी निगाह से देखा जा रहा है. लेकिन भाजपा, खासकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके सिपहसालार आए रोज इस बारे में कोई न कोई बयान देते ही जा रहे हैं और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आँख और मुंह दोनों बन्द किए हुए है. विदित हो कि अब मुज्जफरनगर, आगरा, आजमगढ़, अलीगढ़ आदि अन्य शहरों के नाम बदलने की बात सामने आई है. अब इसमें योगी आदित्यनाथ का कोई दोष थोड़े ही है… वो तो हैं ही योगी. भला एक योगी को शासन-प्रशासन चलाने की कला से क्या लेना-देना? जो कर सकते हैं, कर रहे हैं.

शहरों/नगरों/सड़कों का नाम बदलने का राजनीतिक इतिहास कोई नया नहीं है. सिद्धार्थ झा के अनुसार विलियम शेक्सपियर ने एक बार कहा था- ‘नाम में क्या रखा है?  किसी चीज का नाम बदल देने से भी चीज वही रहेगी. गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, गुलाब ही रहेगा.’ कम से कम मैं तो शेक्सपीयर की बात से इसलिए सहमत हूँ कि यदि भारत का नाम बदलकर ‘अमेरिका’ रख दिया जाए तो क्या भारत अमेरिका हो जाएगा? … नहीं…कतई नहीं.

लेकिन आज की भाजपा सरकार को नाम प्रासंगिक हो उठा है, इसलिए भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश की बहुत ही ख्यातिप्राप्त चिर-परिचित जगह का नया नामकरण किया गया है. मुगलसराय एक ऐसा ही नाम है जिससे देशी ही नहीं, विदेशी भी भली-भांति परिचित हैं, क्योंकि यहां से न सिर्फ उनके लिए काशी का रास्ता जाता है बल्कि सारनाथ की ख्याति इसे दूर-दूर तक लोकप्रिय करती है. इसका नाम अब ‘दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन’ कर दिया गया है. मुगलसराय स्टेशन का नाम संस्कृति, इतिहास और सभ्यता को दर्शाता है. ये काशी का अहम हिस्सा है. मुगलसराय के इतिहास में अगर हम झांकें तो इसमें हमारे अतीत की खुशबू महकती है जिसको भारत से अलग करना कठिन है. भले ही राष्ट्रवाद के दौर में हम सांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर मुगलिया इतिहास की अनदेखी करें लेकिन नाम बदलने से जज्बात नहीं बदला करते… यह हरेक को जान लेने की बात है.

अतीत के झरोखों में झांकें तो मुगलसराय कभी भी सिर्फ एक स्टेशन भर नहीं रहा. मुगल साम्राज्य के दौर में अक्सर लोग पश्चिम-दक्षिण से उत्तर-पूरब जाते वक्त शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित ग्रांड ट्रंक रोड का इस्तेमाल करते थे. दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में जीटी रोड पर दूरी को दर्शाने वाली कोस-मीनारें अब भी मौजूद हैं, जो दिशा और किलोमीटर बताती थीं. ये सड़क बेहद अहम थी व ढाका से पेशावर, कोलकाता-दिल्ली व अम्बाला-अमृतसर को जोड़ती थीं….तो क्या ये भाजपा सरकार जी. टी. रोड का नाम बदलेगी या इसे नेस्तोनाबूद करके नई सड़क बनाने का काम करेगी. … यह भी तो शेरशाह सूरी ने ही द्वारा बनवाई गई थी.

अब बात करते हैं कि मुगलसराय स्टेशन का नाम राष्ट्रवादी चिंतक और जनसंघ नेता के नाम पर क्यों रखा गया है? साल 1968 में इसी स्टेशन पर दीनदयाल उपाध्याय की लाश लावारिस हालत में मिली थी. जेब में 5 रुपए का मुड़ा-तुड़ा नोट और एक टिकट था और इसके अलावा कोई पहचान नहीं थी. स्टाफ लावारिस लाश समझकर अंतिम संस्कार करने जा रहा था लेकिन तभी किसी ने पहचान लिया और फिर अटलजी और सर संघसंचालक गोवलकर जी आए और दिल्ली ले जाकर इनका अंतिम संस्कार किया गया. उनकी मृत्यु एक राज ही रही…. क्यों, कैसे हुई? इस पर से पर्दा आज तक भी नहीं उठ पाया है. भाजपा इस वर्ष (2018) को दीनदयाल शताब्दी वर्ष मना रही है और उनको सम्मान देने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को ये सुझाव दिया जिसको केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया गया. अब क्योंकि राजनीति की सेहत कमजोर पड़ती जा रहा है, सो विभाजनकारी राजनीति अपने चरम पर है….विभाजनकारी राजनीति ही भाजपा की शक्ति है. किंतु आज लोगों में इस विभाजनकारी राजनीति के प्रति काफी रोष तो है किंतु विपक्ष का एकजुट होना अति-आवश्यक है. किंतु भाजपा सरकार और भाजपा के विभाजनकारी नेता इस नाम बदलाव की प्रक्रिया को अति महत्त्वपूर्ण समझ रहे हैं, शायद यह उनकी सबसे बड़ी भूल होकर उभरेगी, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है.

ऐसा भी नहीं है कि पहली बार किसी शहर/नगर/सड़क का नाम बदला गया हो. नाम बदलने का लंबा इतिहास है. कभी राज्यों, कभी शहरों तो कभी सड़कों का…नाम बदलने का काम हमेशा होता ही रहा है. सड़क-मुहल्लों की गिनती नहीं कर पा रहा नगर निगम का जो भी आका होता है, वो मनमानी करता रहता है. आसपास नजर दौड़ाएंगे तो तमाम पार्षदों के मां-बाप, रिश्तेदारों के नाम पर सड़कें मिल जाएंगी. राज्यों या शहरों का नाम बदलने के लिए केंद्र की स्वीकृति लेनी होती है. किंतु आज की तारीख में ऐसा कतई भी देखने को नहीं मिल रहा. विगत में नाम बदलने की प्रक्रिया किसी न किसी प्रकार पारदर्शी होती थी और साम्प्रदायिक मसलों के आधार पर तो कतई नहीं होती थी, किंतु आज का सत्य ये है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया एक खास द्वेश के कारण की जा रही है और वह है ‘हिन्दू…मुसलमान’ का द्वेश-राग.

उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत में साल 1950 में सबसे पहले ‘पूर्वी पंजाब’ का नाम ‘पंजाब’ रखा गया. 1956 में ‘हैदराबाद’ से ‘आंध्रप्रदेश’, 1959 में ‘मध्यभारत’ से ‘मध्यप्रदेश’ नामकरण हुआ. सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ… 1969 में ‘मद्रास’ से ‘तमिलनाडु’, 1973 में ‘मैसूर’ से ‘कर्नाटक’, इसके बाद ‘पुडुचेरी’, ‘उत्तरांचल’ से ‘उत्तराखंड’,  2011 में ‘उड़ीसा से ओडिशा’ नाम किया गया. लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती. मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, शिमला, कानपुर, जबलपुर लगभग 15 शहरों के नाम बदले गए. सिर्फ इतना ही नहीं, जुलाई 2016 में मद्रास, बंबई और कलकत्ता उच्च न्यायालय का नाम भी बदल दिया गया. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इससे मिलते-जुलते नामों से बदलाव किया गया है. अब तक शहरों का नाम नेताओं के नामों पर करने की कवायद नहीं की गई थी… हां! कांग्रेस और अन्य दलों की सरकारों ने नए प्रतिष्ठानों के नाम जरूर नेताओं के नाम पर रखे किंतु किसी भी पुराने शहर/नगर/सड़क के नाम नेताओं को श्रेय देने के नाम पर नहीं बदले. संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है. एयरपोर्टस/ रेलवे स्टेशंस के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे गए हैं. हैरत की बात तो ये है कि  मुगलसराय में स्टेशन के साथ-साथ नगर निगम का नाम भी बदल दिया गया.

विदित हो कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में जो भी परिवर्तन किए जाते है, ज्यादातर बदलाव राजनीतिक कारणों से किए जाते हैं…. लेकिन कुतर्क ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करने की दीए जाते हैं …और कुछ नहीं. नाम बदलने से सरकारों को फायदा ये होता है कि उन्हें कम समय में सुर्खियां बटोरने को मिल जाती हैं, दूसरा गंभीर विषयों से जनता का ध्यान भटकाना होता है…. 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा का यह हथकंडा कितना काम आएगा यह तो समय ही बताएगा … किंतु भाजपा की कोशिश तो यही है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन के जाल में फंसाकर जनता को अपनी असफलता के मुद्दे से भटकाकर अपना राजनीतिक उल्लू साध लिया जाए.

यूँ तो कांग्रेस की सरकार ने भी कुछ ऐसे काम किए थे. आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के समय में ‘कनाट प्लेस’ और ‘कनाट सर्कस’ का नाम बदलकर ‘राजीव चौक’ और ‘इंदिरा चौक’ कर दिया गया था. किंतु हुआ क्या…. इस बात को दो दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग ‘कनाट प्लेस’ को ‘कनाट प्लेस’ ही कहते हैं. अगर ‘कनाट प्लेस’ का नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं आई होती. भाजपा को इस प्रकरण से कुछ न कुछ तो सीख लेनी चाहिए ही कि नहीं? क्यों न शहरों/ नगरों/ सड़कों/ गलियों के नाम बदलने के लिए भी एक आयोग का गठन कर देना चाहिए? आखिर नाम बदलने के पीछे कोई तर्क-वितर्क तो होना ही चाहिए कि नहीं?

मै ये मानता हूँ कि हिन्दू और मुसलमान भारत की विरासत का अटूट हिस्सा हैं. नाम बदलने की इस प्रक्रिया के चलते समाज में फूट डालने की कोशिश, मुझे तो लगता है कि भाजपा के राजनीति को ही भारी पड़ेगी. अब आप कहेंगे कि मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए कई जिलों के नाम बदले थे, हाँ! मैं मानता  उस पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं? स्मरण रहे कि मायावती ने किसी भी शहरों/नगरों/सड़कों के नाम तो कतई नहीं बदले थे, अपितु समाज को एक करने वाले महानायकों के नाम पर केवल और केवल नए नामों से जिले भर ही बनाए थे. जबकि भाजपा भारतीय समाज में विभाजनकारी संदेश पहुँचाने वाले लोगों के नाम पर शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन का काम करने पर उतारू है. यह प्रक्रिया देश के लिए हितकारी नहीं है, सो शहरों/नगरों/सड़कों के नए सिरे से  नामकरण की राजनीति बंद होनी चाहिए.

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