सड़क पर उतरी जातियां

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जाति… जिसके बारे में कहा जाता है कि वो जाति नहीं… जाति समाज की सच्चाई है. आप चाहे इससे जितना बचना चाहें, यह घूम फिर कर आपके सामने आ ही जाती है. खास कर वंचित तबके के सामने तो जाति का सवाल जन्म से लेकर मरण तक बना रहता है. गांवों में जाति के सवाल ज्यादा आते थे और माना जाता था कि महानगर जातिवाद से अछूते हैं. अगर वहां जातिवाद है भी तो ढके-छिपे रूप में. लेकिन जातिवाद ने अब महानगरों को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है.

बीते कुछ सालों में जातीय संघर्ष समाज के भीतर से निकल कर सड़क पर आ गया है. अब लोग जाति को अपने घर और समाज के भीतर नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि वो हर वक्त उससे चिपके हुए हैं. घर के बाहर.. सड़क पर भी. सड़क पर सरपट भागती इन गाड़ियां को देखिए… आपको खुद समझ में आ जाएगा. ये गाड़ियां सिर्फ इंसानों को नहीं ढो रही, बल्कि ये उस जातीय अहं का वाहक बन गई हैं, जिसे बार-बार दिखाने और बताने में कुछ खास तबके के लोग अपनी बहादुरी समझते हैं.

आप इन गाड़ियों को गौर से देखिए. इन पर लिखी पहचान को देखिए. ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर जैसे जातीय पहचान लेकर चलने वाली गाड़ियां पहले इक्का-दुक्का दिखती थीं लेकिन यह चलन अब आम हो गया है.

हालांकि उच्च जातीय पहचान लिए इन लोगों के बीच आपको वो जातियां भी दिख जाएंगी जो कल तक अपनी जाति बताने से हिचकती थी. इस ऑटो पर लिखा ‘चौरसिया’ और ‘सायकिल’ पर लिखा जाटव जी, कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं.

हालांकि गाड़ियों से पहचान को जोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है. तमाम गाड़ियों में आपको ईश्वर, अल्लाह, जीसस, गुरुनानक और बुद्ध आराम से देखने को मिल जाएंगे. लेकिन हाल तक ये गाड़ियों के भीतर ड्राइविंग सीट के सामने डैसबोर्ड पर लगाए जाते थे. हर कोई अपनी आस्था के हिसाब से तस्वीरों और नाम का चुनाव करता था. हालांकि यह अलग विषय है कि बावजूद इसके हर रोज सड़कों पर होने वाले एक्सिडेंट में कोई कमी नहीं आई है. खैर, यह आस्था का मुद्दा हो सकता है. लेकिन यही ईश्वर जब गाड़ियों से बाहर निकल आते हैं, क्या तब भी इसे महज आस्था माना जाए?

बहरहाल… जाति ढोती ये तस्वीरें कोई आम बात नहीं है, बल्कि यह समाज के बदलने की प्रक्रिया है. यह समाज के भीतर रहने वाले लोगों के एक खास पहचान के खाने में बंट जाने की तस्वीर है. ये तस्वीरें यह भी बताती हैं कि राजनीति ने समाज को किस तरह बांट दिया है. किसी भी बेहतर समाज के बेहतर भविष्य के लिए ऐसी तस्वीरें ठीक नहीं है.

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  1. दिल्ली में आजकल कुछ गाड़ियों में जाति सूचक शब्द देखने को मिला है। परन्तु ये सिलसिला 2008 के पहले से पंजाब राज्य में रविदास धर्म संगठन के आन्दोलन के साथ शुरू हुआ था। पंजाब के ज्यादातर गाड़ियों में पंजाबी भाषा में इस तरह के बड़े बड़े स्टिकर दिखाई पड़ता है। कई मकानों में भी दिखाई पड़ता है। इस संदर्भ में NDTV इंडिया पर रवीश कुमार की रिपोर्ट भी आ चुकी है।

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