रायपुर। दो दिवसीय दौर पर छत्तीसगढ़ पहुंची राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 23 अक्टूबर को जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार को संबोधित करेंगी। इस दौरान वह बस्तर के आदिवासियों से उनकी फरियाद सुनेंगी। इस खबर के सामने आने के बाद मुरिया दरबार को लेकर लोगों के मन में खासी उत्सुकता बढ़ गई है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर मुरिया दरबार क्या है? यह क्यों और कैसे लगती है और इसका इतिहास क्या है?
क्या है मुरिया दरबार
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है। यह आदिवासियों का अनोखा संसद होता है। इस रस्म के साथ ही बस्तर दशहरे का समापन होता है। यह दरबार आजादी के पहले से ही लगता रहा है। तब राजशाही का दौर था और तब से ही मुरिया आदिवासी इस संसद में अपनी समस्याएं उठाते आ रहे हैं।
खुद राजा-महाराजा इसका आयोजन कर दरबार लगाते थे। कहा जाता है कि मुरिया दरबार की एतिहासिक परंपरा के मुताबिक, इस दिन राजा राजाशाही पोशाक त्यागकर साधारण कपड़े पहनते थे। और जमीन पर बैठकर बस्तर संभाग के आदिवासी जनजाति मुरिया की समस्याओं को सुनते थे। ताकि बिना झिझक के जनता अपनी बातों को उन तक रख सकें।
देश को आजादी मिली और लोकतंत्र आया, लेकिन मुरिया आदिवासियों की यह परंपरा आज भी कायम है। हालांकि इसका स्वरूप बदल गया है। अब किसी रानी के पेट से जन्मा राजा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ताकत से चुना हुआ राजा इस दरबार का मुखिया होता है। अब इस मुरिया दरबार के मुखिया देश के राष्ट्रपति होते हैं। क्योंकि छत्तीसगढ़ की आदिवासी जनजाति बैगा, कोरवा, पंडो और मूरिया राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाते हैं। इसलिये राष्ट्रपति भी समय-समय पर उनकी फरियाद सुनते रहते हैं। राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राज्य के मुख्यमंत्री के जिम्मे यह जिम्मेदारी होती है।
15 अगस्त 2026 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में बस्तर के आदिवासी राष्ट्रपति मुर्मू से मिलकर उन्हें मुरिया दरबार में शामिल को न्यौता दिये था, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वीकार किया था। बता दें कि बीते 600 वर्षों से चली आ रही बस्तर की इस परंपरा को गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधानी दिल्ली में झांकी में प्रदर्शित भी किया गया था।
मुरिया जनजाति के बारे में
जहां तक मुरिया जनजाति की बात है तो मुरिया जनजाति गोंड जनजाति की एक प्रमुख उपशाखा और द्रविड़ समुदाय का हिस्सा है। मुरिया जनजाति मुख्य रूप से तीन उप-वर्गों में बंटी हुई है, जिनमें राजा मुरिया, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया शामिल हैं। यह मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागांव जिला, बीजापुर, जगदलपुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिले में पाई जाती है। इसके साथ ही ये छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में भी रहते हैं।

अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।

