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स्कूल ठीक करो का अभियान कहां है???

मान लिया कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो जाए, तो क्या वो छोटे-छोटे बच्चे जिनमें बेहतर शिक्षा व्यवस्था की उम्मीद जगी थी, उनकी वह उम्मीद पूरी हो जाएगी? सवाल यह नहीं है कि चुनाव से जुड़े मुद्दे उठाना गलत है या सही। सवाल यह है कि जिस शिक्षा आंदोलन ने बच्चों और युवाओं के भीतर उम्मीद जगाई थी, उसका क्या हुआ?

अभिजीत दीपके और कॉकरोच जनता पार्टी ने भारत में उस छात्र आंदोलन को फिर से जिंदा किया; जो बीते दिनो की बात हो गई थी। उन्होंने उस सत्ता को हिला डाला, जो अकड़ में बैठी थी। यह किसके बूते हुआ? जाहिर है छात्रों और युवाओं के बूते।

उस आंदोलन के ठीक बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने स्कूलों को ठीक करने का अभियान शुरू किया। उस अभियान ने जेन अल्फा तक को हिम्मत दी। देश के दूर-दराज गांवों तक के बच्चे शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए आंदोलन करने लगे। वह स्कूलों की हालत ठीक करने, स्कूल तक पहुंचने वाले रास्ते को दुरुस्त करने और स्कूल में शिक्षकों की कमी का सवाल उठाने लगे। छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा के लिए लड़ते देखना भविष्य में बेहतर भारत की आस जगाने वाला था।

यह सिर्फ स्कूलों को ठीक करने का अभियान नहीं था। यह उन बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने की कोशिश थी। आदिवासी इलाकों में स्कूल तक पहुंचना, पर्याप्त शिक्षक मिलना, नियमित पढ़ाई होना, छात्रावासों में सुरक्षित माहौल और आगे की पढ़ाई के अवसर मिलना आज भी गंभीर सवाल हैं। ऐसे में ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान का महत्व केवल नारों तक सीमित नहीं था।

लेकिन फिर अभिजीत और उनके साथियों ने अचानक ट्रैक बदल दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आंदोलन शुरू कर दिया। आखिर दीपके और उनके साथियों को इसकी क्या जरूरत पड़ी? विपक्षी दल लगातार SIR का मुद्दा उठा रहे थे। लड़ भी रहे थे। फिर दीपके और उनके साथी इसमें क्यों कूद पड़े?

आज ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान कहां है? क्या स्कूलों की स्थिति का कोई राज्यवार सर्वे किया गया? कितने स्कूलों में शिक्षकों के खाली पदों का सवाल प्रशासन तक पहुंचा? कितने स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय, बिजली, भवन और पहुंच मार्ग की समस्याओं को लेकर कार्रवाई हुई? कितने बच्चों की शिकायतों पर प्रशासन ने जवाब दिया? और कितने स्कूलों में वास्तविक सुधार हुआ? अगर दीपके और उनकी टीम ने इस बारे में काम किया है तो वह आंकड़ा जारी करना चाहिए।

मान लिया कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो जाए, तो क्या वो छोटे-छोटे बच्चे जिनमें बेहतर शिक्षा व्यवस्था की उम्मीद जगी थी, उनकी वह उम्मीद पूरी हो जाएगी? सवाल यह नहीं है कि चुनाव से जुड़े मुद्दे उठाना गलत है या सही। सवाल यह है कि जिस शिक्षा आंदोलन ने बच्चों और युवाओं के भीतर उम्मीद जगाई थी, उसका क्या हुआ?

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