
जयपुर। राजस्थान के नागौर के डांगावास में 11 साल पहले 23 बीघा जमीन को लेकर हुए विवाद में 5 दलितों समेत 6 लोगों की हत्या कर दी गई थी। जातिवादी गुंडों ने दलितों के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाकर उनकी कुचल कर हत्या कर डाली थी। इस हैवानियत को करने वाले आरोपियों के चेहरे और नाम उस क्षेत्र में चर्चा का विषय रहे। पीड़ित परिवार न्याय की आस लिए सालों तक अदालतों के चक्कर काटता रहा। लेकिन उस परिवार सहित हर न्याय पसंद इंसान को बुधवार 5 अगस्त को तब बड़ा धक्का लगा, जब मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट के जज आशीष बिजराणियां ने ठोस और विश्वसनीय सबूत न होने के कारण सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद देश भर में बड़ी बहस शुरू हो गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर दलितों को किसने मारा? कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र पाल गौतम ने गंभीर सवाल उठाया है।
राजस्थान के नागौर जिले के बहुचर्चित डांगावास दलित हत्याकांड में सभी 40 आरोपियों का बरी होना देश के न्याय तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जब दलितों की निर्मम हत्या के मामलों में भी न्याय नहीं मिलता, तो आखिर पीड़ित समाज किस पर भरोसा करे..?
क्या दलितों की जान इतनी सस्ती हो गई है… pic.twitter.com/v30VGyzoei
— (समण) Rajendra Pal Gautam (@AdvRajendraPal) August 5, 2026
मामला 14 मई 2015 का है। जब डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन पर कब्जे को लेकर खूनी संघर्ष हुआ था। इस घटना ने न सिर्फ पूरे राजस्थान को, बल्कि देश भर के इंसाफ पसंद लोगों को झकझोर दिया था और दलित संगठनों के बड़े आंदोलन के बाद मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी। न्याय की लंबी आस टूटने के बाद आरोपियों के बरी होने से बड़ी बहस शुरू हो गई है। राजस्थान में दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने कहा है कि- डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों के बरी होने का फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है,बल्कि यह दलितों के न्याय के अधिकार पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है। सवाल सीधा है कि क्या उन छह निर्दोष लोगों को किसी ने नहीं मारा? क्या वे अपने आप मर गए थे? जब देश आजादी का उत्सव स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियों में जुटा है, उसके ठीक पहले आई यह खबर बताती है कि यह केवल पीड़ित परिवारों की हार नहीं,बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस वादे की भी हार है जिसमें कहा गया था कि कानून सबके लिए समान है।

दलित दस्तक (Dalit Dastak) साल 2012 से लगातार दलित-आदिवासी (Marginalized) समाज की आवाज उठा रहा है। मासिक पत्रिका के तौर पर शुरू हुआ दलित दस्तक आज वेबसाइट, यू-ट्यूब और प्रकाशन संस्थान (दास पब्लिकेशन) के तौर पर काम कर रहा है। इसके संपादक अशोक कुमार (अशोक दास) 2006 से पत्रकारिता में हैं और तमाम मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। Bahujanbooks.com नाम से हमारी वेबसाइट भी है, जहां से बहुजन साहित्य को ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। दलित-बहुजन समाज की खबरों के लिए दलित दस्तक को सोशल मीडिया पर लाइक और फॉलो करिए। हम तक खबर पहुंचाने के लिए हमें dalitdastak@gmail.com पर ई-मेल करें या 9013942612 पर व्हाट्सएप करें।

