HomeआदिवासीForest Rights Act: छत्तीसगढ़ में हजारों आदिवासियों के वनाधिकार दावे खारिज

Forest Rights Act: छत्तीसगढ़ में हजारों आदिवासियों के वनाधिकार दावे खारिज

रिपोर्ट के मुताबिक, बिलासपुर जिले में वनाधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत वन पट्टों के लगभग 25 हजार दावों में से 17 हजार से अधिक आवेदन खारिज किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 8,580 पात्र हितग्राहियों के दावों को मान्यता मिली है।

रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों को जल, जंगल और जमीन पर कानूनी अधिकार देने वाले वनाधिकार अधिनियम, 2006 के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बिलासपुर जिले में वनाधिकार के व्यक्तिगत दावों में बड़ी संख्या में आवेदन खारिज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। वहीं, केंद्र सरकार ने हाल ही में राज्यों को लंबित दावों के समयबद्ध निपटारे, निरस्त दावों की समीक्षा और ग्राम सभाओं को मजबूत करने के लिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

बिलासपुर में 66 फीसदी से अधिक व्यक्तिगत दावे खारिज
‘नई दुनिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, बिलासपुर जिले में वनाधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत वन पट्टों के लगभग 25 हजार दावों में से 17 हजार से अधिक आवेदन खारिज किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 8,580 पात्र हितग्राहियों के दावों को मान्यता मिली है। आवेदन खारिज होने के पीछे तकनीकी कमियों और दस्तावेजों से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया गया है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, जिले में 824 सामुदायिक वनाधिकार दावों में से 563 को मंजूरी दी गई, जबकि 261 दावे खारिज हुए। दूसरी ओर, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के लिए प्राप्त 49 दावों को मंजूरी मिलने की जानकारी दी गई है। ये आंकड़े बिलासपुर जिले से संबंधित हैं, पूरे छत्तीसगढ़ के नहीं।

बड़ी संख्या में व्यक्तिगत दावे खारिज होने से यह सवाल उठता है कि क्या दावेदारों को पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज जुटाने में सहायता मिल रही है? साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि निरस्त आवेदनों के कारणों की जानकारी संबंधित परिवारों को स्पष्ट रूप से दी गई है या नहीं और पात्र दावेदारों को कानून के तहत उपलब्ध समीक्षा की प्रक्रिया का लाभ मिल रहा है या नहीं।

पूरे छत्तीसगढ़ में क्या है वनाधिकार दावों की स्थिति?
केंद्र सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 30 जून 2026 तक छत्तीसगढ़ में व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकार को मिलाकर कुल 9,47,479 दावे प्राप्त हुए थे। इनमें से 5,34,068 दावों के तहत अधिकार-पत्र जारी किए गए थे, जबकि 4,06,787 दावे खारिज किए गए थे। उस समय 6,624 दावे लंबित थे।
ये आंकड़े 30 जून 2026 तक की स्थिति दर्शाते हैं। इन्हें मौजूदा तारीख के अंतिम आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी, आंकड़े बताते हैं कि राज्य में बड़ी संख्या में वनाधिकार दावों पर निर्णय हो चुका है और खारिज किए गए आवेदनों की समीक्षा तथा पात्र परिवारों को कानूनी प्रक्रिया की जानकारी देना एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।

केंद्र ने राज्यों को दिए समयबद्ध समीक्षा के निर्देश
बता दें कि वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए 9 अक्टूबर 2026 को कोलकाता में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आठ राज्यों के साथ क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इसमें छत्तीसगढ़ के अलावा पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश शामिल थे। वनाधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के उन अधिकारों को मान्यता देना है, जिन्हें लंबे समय तक दर्ज नहीं किया गया था। कानून के तहत पात्र लोगों को व्यक्तिगत वनाधिकार के साथ-साथ सामुदायिक वनाधिकार और सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण व प्रबंधन से जुड़े अधिकार भी मिल सकते हैं।

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