सम्राट अशोक के पुत्र महिंद थेर को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रसार से जुड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक हस्तियों में गिना जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार, वे श्रीलंका पहुँचे और वहाँ बौद्ध धर्म की स्थापना तथा विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब भी महिंद थेर का जिक्र होता है तो साथ ही राजगला का भी जिक्र होता है। राजगला की विशेषता यहाँ मिला एक शिलालेख है। श्रीलंका द्वारा यूनेस्को की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में प्रस्तुत दस्तावेज़ के अनुसार, इस शिलालेख में उल्लेख है कि अरहंत महिंद के अवशेष एक स्तूप में प्रतिष्ठित किए गए थे। इसी कारण राजगला को महिंद थेर से जोड़कर देखा जाता है।
राजगला को 27 फरवरी 2020 को यूनेस्को की Tentative List, यानी संभावित विश्व धरोहर स्थलों की सूची, में शामिल करने के लिए प्रस्तुत किया गया था। इस जगह की खासियत यह है कि यह केवल एक स्तूप नहीं, बल्कि घने जंगल और पहाड़ी के बीच फैला प्राचीन बौद्ध मठ परिसर है। यूनेस्को की Tentative List में इसका नाम Ancient Ariyakara Viharaya in the Rajagala Archaeological Reserve के रूप में दर्ज है।
राजगला पुरातात्त्विक परिसर श्रीलंका के पूर्वी प्रांत के अम्पारा (Ampara) ज़िले में स्थित है। यह एक पहाड़ी और जंगलों से घिरा हुआ प्राचीन बौद्ध मठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए अम्पारा–महा ओया मार्ग से राजगला टेन्ना गाँव की ओर जाया जाता है। इस परिसर का विस्तार लगभग 400 हेक्टेयर में बताया गया है। यहाँ पुरातात्त्विक सर्वेक्षण में 593 महत्त्वपूर्ण अवशेषों का उल्लेख है। इनमें स्तूप, भिक्षुओं की गुफाएँ, पत्थर की सीढ़ियाँ, जल-संग्रह के कुंड और मठों के खंडहर शामिल हैं।
इसका निर्माण कब हुआ था?
राजगला का इतिहास ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक जाता है। यूनेस्को के दस्तावेज़ के अनुसार, इस बौद्ध मठ के निर्माण की शुरुआत राजा लज्जितिस्स (King Lajjitissa) ने लगभग 167–137 ईसा पूर्व के बीच की थी। मठ को पूरा करके भिक्षुओं को सौंपने का समय लगभग 116–109 ईसा पूर्व बताया गया है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना ज़रूरी है कि ये तारीखें पूरे मठ परिसर के निर्माण और उसके विकास से संबंधित हैं। फोटो में दिखाई दे रहे विशेष स्तूप का निर्माण ठीक किस वर्ष हुआ था, इसकी स्वतंत्र और सटीक तारीख उपलब्ध दस्तावेज़ से तय नहीं होती।
इस मठ के निर्माण की कहानी
राजगला की कहानी केवल एक स्तूप बनवाने की नहीं, बल्कि पहाड़ और जंगल के बीच एक ऐसे बौद्ध केंद्र के निर्माण की है जहाँ साधना, ध्यान और सामुदायिक धार्मिक गतिविधियाँ साथ-साथ चलती थीं। राजा लज्जितिस्स के संरक्षण में पहाड़ी को बौद्ध मठ के रूप में विकसित किया गया। प्राकृतिक भू-भाग का उपयोग करते हुए पत्थर की सीढ़ियाँ और रास्ते बनाए गए, ताकि लोग पहाड़ी के ऊपरी हिस्से तक पहुँच सकें।
भिक्षुओं के लिए गुफाएँ और ध्यान-स्थल एवं आम लोगों की गतिविधियां
प्राकृतिक गुफाओं को रहने और ध्यान करने के लिए तैयार किया गया। कुछ गुफाओं के सामने पत्थर की दीवारें बनाई गईं। यूनेस्को के दस्तावेज़ में लगभग 50 ऐसे आवासों और करीब 500 भिक्षुओं के रहने की संभावना का उल्लेख है। मठ में स्तूपों, धार्मिक अनुष्ठानों के भवनों, भोजन तैयार करने की जगहों और पानी जमा करने की व्यवस्था के अवशेष मिले हैं। इससे पता चलता है कि यह केवल एकांत साधना का स्थान नहीं था; आम लोग भी यहाँ धार्मिक गतिविधियों और दान के लिए आते थे।
यह स्थान उजड़ क्यों गया?
राजगला कई शताब्दियों तक सक्रिय बौद्ध केंद्र रहा। यूनेस्को के दस्तावेज़ में राजा उदय प्रथम के शासनकाल (797–801 ईस्वी) में मठ की मरम्मत और नए भवन बनाए जाने का उल्लेख है। बाद के दौर में दक्षिण भारत से हुए चोल आक्रमणों और क्षेत्र में आए राजनीतिक बदलावों के कारण यह परिसर उजड़ने लगा। नामांकन दस्तावेज़ में 993 और 1017 ईस्वी के आक्रमणों का उल्लेख है। समय के साथ प्राकृतिक क्षरण और खजाने की तलाश में की गई तोड़फोड़ से भी इसके अवशेष प्रभावित हुए।
राजगला हमें यह समझने का अवसर देता है कि प्राचीन श्रीलंका में बौद्ध धर्म केवल पूजा या स्तूपों तक सीमित नहीं था। पहाड़ियों और जंगलों के बीच पूरे मठ-समुदाय विकसित किए गए थे, जिनमें ध्यान, भोजन, पानी, आवास और आम लोगों की धार्मिक भागीदारी के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ थीं।

डॉ. पूजा राय पेशे से शिक्षिका हैं। भारत की सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में उनकी गहरी रुचि है। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘आधी आबादी का दर्द’ खासी लोकप्रिय हुई थी।

