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पारसनाथ में 4-5 नवंबर को आदिवासी धर्म महासम्मेलन, जानिये आदिवासियों के लिए क्यों खास है पारसनाथ पहाड़

संथाल समुदाय इसे मरांग बुरू यानी ‘महान पहाड़’ के नाम से पूजता है। संथाली समाज इसे सर्वोच्च आराध्य देवता के रूप में माना जाता है। जैन समुदाय इसे सम्मेद शिखरजी के नाम से जानता है। मान्यता है कि 24 में से 20 जैन तीर्थंकरों ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। इस वजह से दोनों समुदायों के बीच विवाद भी होता रहता है।

रांची। झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ के मधुबन में 4 और 5 नवंबर को मरांग बुरु धर्मगाढ़ महासम्मेलन आयोजित किया जाना प्रस्तावित है। इस आयोजन में शामिल होने के लिए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी आमंत्रित किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, मरांग बुरु घंटा बाड़ी धर्मगढ़ और संथाल समुदाय से जुड़े संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया। आयोजन का संबंध आदिवासी समुदाय की धार्मिक आस्था, परंपराओं और मरांग बुरु से जुड़े मुद्दों से है।

पारसनाथ पहाड़ आदिवासी समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। मरांग बुरु को आदिवासी समाज के एक महत्वपूर्ण आस्था केंद्र के रूप में देखा जाता है। इस क्षेत्र से जुड़े धार्मिक स्थलों और पारंपरिक अधिकारों को लेकर आदिवासी संगठनों की ओर से समय-समय पर मांगें उठाई जाती रही हैं।

झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ जैन धर्मावलंबियों के साथ-साथ संथाल और दूसरे आदिवासी समुदायों के लिए भी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का केंद्र है। संथाल समुदाय इसे मरांग बुरू यानी ‘महान पहाड़’ के नाम से पूजता है। संथाली समाज इसे सर्वोच्च आराध्य देवता के रूप में माना जाता है। यहां हर साल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। लेकिन इस पहाड़ पर धार्मिक अधिकार, परंपराओं और पहचान को लेकर जैन समुदाय और आदिवासी संगठनों के बीच लंबे समय से विवाद भी रहा है।

 समुद्र तल से करीब 1,350 मीटर की ऊंचाई वाला यह पहाड़ जैन धर्मावलंबियों के लिए पवित्र तीर्थस्थल है। जैन समुदाय इसे सम्मेद शिखरजी के नाम से जानता है। मान्यता है कि 24 में से 20 जैन तीर्थंकरों ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। गिरिडीह जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी इस बात का उल्लेख करती है कि संथाल समुदाय पारसनाथ को मरांग बुरू के नाम से जानता है।

आदिवासियों के लिए क्यों खास है पारसनाथ?

पारसनाथ पहाड़ पर संथाल आदिवासियों के कई महत्वपूर्ण धार्मिक और पारंपरिक स्थल मौजूद हैं। इनमें जुग जाहेर थान और दिसोम मांझी थान का विशेष महत्व है। जुग जाहेर थान संथाल समुदाय का पवित्र धार्मिक स्थल है। यहां प्रकृति और पारंपरिक देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। संथाल धर्म में पवित्र उपवनों और प्राकृतिक स्थलों का विशेष स्थान है। साल और सखुआ जैसे पेड़-पौधे भी उनकी धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं। जबकि दिसोम मांझी थान संथाल समुदाय की पारंपरिक नेतृत्व व्यवस्था और सामुदायिक पहचान से जुड़ा स्थल है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का भी महत्व है।

इसी पहाड़ के पूर्वी हिस्से में सोहरैया गांव के पास बोदा दारहा नामक स्थान का भी उल्लेख मिलता है। यह लो बीर बैसी नाम की पारंपरिक आदिवासी परिषद से जुड़ा है। संथाल समाज में गांव स्तर पर हल नहीं होने वाले विवादों और महत्वपूर्ण सामुदायिक मामलों पर इस परिषद में विचार किया जाता रहा है। इतिहासकारों और विभिन्न रिपोर्टों में इस परिषद का संबंध 1855 के संथाल हूल की तैयारियों से भी जोड़ा गया है। सिद्धू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह से पहले आदिवासी समुदायों के बीच सामूहिक विचार-विमर्श और फैसलों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस तरह पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासियों के लिए धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ उनकी पारंपरिक शासन व्यवस्था और ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति का भी केंद्र है।

यहां कब-कब होते हैं धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन?

पारसनाथ पहाड़ और उसके आसपास के क्षेत्रों में सालभर अलग-अलग अवसरों पर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। इनमें कुछ आयोजन संथाल आदिवासी परंपरा से जुड़े हैं, जबकि कुछ स्थानीय मेले और विशेष सम्मेलन हैं।

1. बाहा पर्व: प्रकृति और फूलों का त्योहार

बाहा संथाल आदिवासी समुदाय का महत्वपूर्ण पर्व है। ‘बाहा’ का अर्थ फूल होता है। इस पर्व में प्रकृति, पेड़-पौधों और विशेष रूप से साल या सखुआ के फूलों का धार्मिक महत्व है। यह पर्व आदिवासी समुदाय के प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाता है। पारसनाथ क्षेत्र में बाहा पर्व के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। फरवरी 2026 में यहां 18 से 20 फरवरी तक बाहा पर्व मनाए जाने की जानकारी स्थानीय मीडिया में प्रकाशित हुई थी। इस दौरान जुग जाहेर थान और दिसोम मांझी थान में पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।

2. सेंन्द्रा पर्व: बैसाख पूर्णिमा पर जुटते हैं आदिवासी

पारसनाथ पहाड़ पर आयोजित होने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण आयोजन सेंन्द्रा पर्व है। संथाल समुदाय की परंपरा में इसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है। यह आयोजन बैसाख महीने की पूर्णिमा के अवसर पर होता है, जो आमतौर पर अप्रैल के मध्य में पड़ती है। इस अवसर पर संथाल आदिवासी बड़ी संख्या में पारसनाथ पहाड़ पर जुटते हैं। परंपरागत रूप से यह तीन दिनों तक चलने वाला आयोजन है। इसमें पारंपरिक शिकार की रस्म भी शामिल रही है। इसके बाद आदिवासी समुदाय की बड़ी बैठक या सामूहिक सभा आयोजित होती है।

हालांकि, सेंन्द्रा पर्व को लेकर जैन और आदिवासी समुदायों के बीच विवाद भी सामने आते रहे हैं। जैन समुदाय के लिए पारसनाथ एक पवित्र तीर्थस्थल है, जबकि संथाल समुदाय के लिए यह उनकी धार्मिक परंपराओं का केंद्र है। ऐसे में शिकार की परंपरा और पहाड़ पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद रहे हैं।

3. मकर संक्रांति मेला

पारसनाथ पहाड़ के आसपास स्थित मधुबन क्षेत्र में मकर संक्रांति के अवसर पर मेला भी आयोजित होता है। जनवरी 2026 में यह मेला 13 से 16 जनवरी तक आयोजित किया गया था। मकर संक्रांति के दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की मौजूदगी रहती है। यह आयोजन क्षेत्र की स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा है।

4. अंतरराष्ट्रीय संथाल आदिवासी धर्म महासम्मेलन

नवंबर 2026 में पारसनाथ के मधुबन क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संथाल आदिवासी धर्म महासम्मेलन आयोजित किया जाना है। 4 और 5 नवंबर को प्रस्तावित इस सम्मेलन में संथाल धर्म, धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और आदिवासी अधिकारों जैसे विषयों पर चर्चा होनी है। आयोजकों के मुताबिक, इसमें करीब 1,300 प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है।

पारसनाथ को लेकर जैन और आदिवासी समुदायों के बीच विवाद क्या है?

पारसनाथ पहाड़ को लेकर जैन और आदिवासी समुदायों की धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं। जैन समुदाय इसे सम्मेद शिखरजी के रूप में पूजता है। वहीं संथाल आदिवासी इसे मरांग बुरू और अपने पवित्र धार्मिक क्षेत्र के रूप में देखते हैं। यह विवाद नया नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1911 में भी इस पहाड़ को लेकर विवाद सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचा था। 1957 के हजारीबाग जिला गजेटियर में भी बैसाख पूर्णिमा के अवसर पर संथाल आदिवासियों के यहां जुटने और उनके धार्मिक शिकार उत्सव का उल्लेख मिलता है।

विवाद का एक बड़ा पहलू यह है कि आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों और स्थलों पर अधिकार तथा मान्यता की मांग करता रहा है। दूसरी ओर, जैन समुदाय पहाड़ की पवित्रता और तीर्थस्थल की धार्मिक मर्यादा को लेकर अपनी चिंताएं रखता है। जनवरी 2023 में भी आदिवासी संगठनों ने पारसनाथ को मरांग बुरू के रूप में मान्यता देने और आदिवासी धार्मिक अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर आंदोलन किया था। इस दौरान झारखंड बंद का आह्वान भी किया गया था।

आदिवासी पहचान और धार्मिक अधिकारों का सवाल

पारसनाथ पहाड़ का विवाद केवल दो धार्मिक समुदायों की मान्यताओं का टकराव नहीं है। इसके साथ आदिवासियों की पारंपरिक धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक अधिकारों का सवाल भी जुड़ा हुआ है। आदिवासी समुदायों की धार्मिक परंपराएं प्रकृति, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और पवित्र उपवनों से गहराई से जुड़ी होती हैं। उनके लिए ये स्थान केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि आस्था और सामुदायिक जीवन का हिस्सा हैं। पारसनाथ पहाड़ भी इसी परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इसलिए इस पूरे मामले में कुछ अहम सवाल उठते हैं। क्या पारसनाथ को मरांग बुरू के रूप में आदिवासी धार्मिक स्थल की आधिकारिक मान्यता मिली है? पहाड़ पर मौजूद पारंपरिक आदिवासी धार्मिक स्थलों और अनुष्ठानों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? इन मामलों में ग्रामसभाओं और पारंपरिक आदिवासी संस्थाओं की क्या भूमिका है? और क्या जैन समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए आदिवासी समुदाय के पारंपरिक अधिकारों की भी रक्षा की जा सकती है?

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