HomeTop Newsमदारी पासी: अंग्रेजों और जमींदारों को चुनौती देने वाले एका आंदोलन के...

मदारी पासी: अंग्रेजों और जमींदारों को चुनौती देने वाले एका आंदोलन के नायक

एका आंदोलन के दौरान मदारी पासी के समर्थक किसी गांव में पहुंचकर एक पोटली के जरिए लोगों को शपथ दिलाते थे। पोटली में ज्वार की रोटी और मांस का एक टुकड़ा होता था। रोटी किसानों की रोजी-रोटी और पेट की लड़ाई का प्रतीक थी, जबकि मांस का टुकड़ा संघर्ष के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने की तैयारी का संकेत था।

क्रांतिकारी मदारी पासी का सांकेतिक चित्र (AI Image)“खेत हम जोतें और फसल ले जाएं सेठ, साहूकार और जमींदार। बेगार भरें सो अलग।”
किसानों के शोषण के खिलाफ उठी यह आवाज अवध के गांवों में गूंज रही थी। इसके पीछे थे क्रांतिकारी मदारी पासी, जिन्होंने किसानों को जाति और सामाजिक भेदभाव की दीवारों से ऊपर उठकर एकजुट होने का संदेश दिया। उनका एका आंदोलन केवल लगान और बेगारी के खिलाफ संघर्ष नहीं था, बल्कि किसानों में आत्मसम्मान और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस पैदा करने की कोशिश भी था।

जमींदारी शोषण के खिलाफ संघर्ष
मदारी पासी का जन्म इतिहासकार राजकुमार के अनुसार, 24 अक्टूबर 1860 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले की संडीला तहसील के मोहनखेड़ा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहन पासी था। उनका परिवार किसान था। बचपन से ही मदारी पासी को जमींदारों के अत्याचार से चिढ़ थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वे उन कुओं में जानवरों की हड्डियां डलवा देते थे, जिनसे जमींदार गरीबों को पानी नहीं पीने देते थे।

1857 के विद्रोह के बाद अवध में अंग्रेजी शासन ने जमींदारों और ताल्लुकेदारों के सहारे अपनी पकड़ मजबूत की। किसानों पर लगान का बोझ बढ़ा और बेगारी, साहूकारी कर्ज तथा जमीन छिनने जैसी समस्याएं गहराती गईं। कई जगह किसानों के परिवारों को जमींदारों की मनमानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। ऐसे माहौल में किसानों के भीतर अंग्रेजी शासन और स्थानीय शोषक व्यवस्था, दोनों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था।

एका आंदोलन का नेतृत्व
1920 के अंत तक अवध के हरदोई, सीतापुर, बहराइच, लखनऊ, बाराबंकी और उन्नाव समेत कई जिलों में किसान आंदोलन तेज होने लगा। इसी दौर में एका आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व मदारी पासी ने किया। इसमें पासी, चमार, अहीर, गड़ेरिया, तेली और अन्य वंचित समुदायों के किसान शामिल हुए। आंदोलन का उद्देश्य किसानों को एकजुट करके जमींदारों की मनमानी रोकना था।
आंदोलन की सभाओं में किसान प्रतिज्ञा करते थे कि वे तय लगान के अलावा नजराना और दूसरे अवैध भुगतान नहीं करेंगे, बेगारी नहीं करेंगे और साहूकारों के अनुचित ब्याज की मांग का विरोध करेंगे। यदि किसी किसान की जमीन छीन ली जाती, तो दूसरे किसान उस जमीन को बटाई पर लेने या उसकी नीलामी में बोली लगाने से इनकार करते थे। किसी किसान के जेल जाने पर बाकी गांव के लोग उसके परिवार और खेत की देखभाल करने का संकल्प लेते थे।
मदारी पासी किसानों को समझाते थे कि उनकी जमीन और मेहनत का लाभ दूसरों को मिल रहा है। इस शोषण से मुक्ति का रास्ता एकता में है। उनके नेतृत्व में आंदोलन ने किसानों के बीच यह भावना मजबूत की कि अन्याय के खिलाफ सामूहिक रूप से खड़ा हुआ जा सकता है।

रोटी और मांस की प्रतीकात्मक शपथ
एका आंदोलन की एक दिलचस्प परंपरा किसानों को एकता की शपथ दिलाने की थी। मदारी पासी के समर्थक किसी गांव में पहुंचकर एक पोटली के जरिए लोगों को शपथ दिलाते थे। बताया जाता है कि पोटली में ज्वार की रोटी और मांस का एक टुकड़ा होता था। रोटी किसानों की रोजी-रोटी और पेट की लड़ाई का प्रतीक थी, जबकि मांस का टुकड़ा संघर्ष के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने की तैयारी का संकेत था।
मदारी पासी का आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन से अलग अपनी दिशा में आगे बढ़ा। चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बावजूद एका आंदोलन जारी रहा। इसका केंद्र किसानों की जमीन, लगान, बेगारी और जमींदारी अत्याचार जैसे सवाल थे। 1921 में संयुक्त प्रांत की सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने के उद्देश्य से अवध राजस्व अधिनियम में संशोधन भी किया, लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

अंग्रेजी शासन की कार्रवाई और गिरफ्तारी
आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से अंग्रेजी सरकार परेशान थी। मदारी पासी को गिरफ्तार करने के लिए व्यापक प्रयास किए गए और उनकी गिरफ्तारी पर एक हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हरदोई और आसपास के जिलों में पुलिस बल तैनात किया गया, लेकिन लंबे समय तक उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। बाद में एक जमींदार की मुखबिरी पर मदारी पासी को एक गड़रिये के घर से गिरफ्तार किया गया। अंग्रेजी शासन और जमींदारों के भय के कारण उनकी जमानत लेने के लिए कोई आगे नहीं आया। हरदोई जेल में मुकदमे के बाद उन्हें पांच महीने की सजा हुई। उनके जीवन के इस दौर से जुड़ी कुछ अन्य घटनाओं और जेल में भगत सिंह से मुलाकात के दावे का स्वतंत्र ऐतिहासिक सत्यापन आवश्यक है। बताया जाता है कि 1928 में जेल से छूटने के बाद मदारी पासी साधु के वेश में अटरियाडीह में रहने लगे। 8 मार्च 1930 को वहीं उनका निधन हुआ।

इतिहास में उचित स्थान की प्रतीक्षा
मदारी पासी को अवध के किसान आंदोलन और एका आंदोलन के प्रमुख नायक के रूप में याद किया जाता है। उनके संघर्ष ने किसानों को यह समझाने में भूमिका निभाई कि जाति और सामाजिक स्थिति से परे, साझा आर्थिक शोषण के खिलाफ एकता जरूरी है। उनका आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें किसानों ने केवल अंग्रेजी शासन ही नहीं, बल्कि स्थानीय जमींदारी शोषण को भी चुनौती दी।

मदारी पासी का जीवन इस बात की याद दिलाता है कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय आंदोलनों की कहानी नहीं थी। इसमें गांवों के किसान और वंचित समुदाय भी अपने अधिकार, सम्मान और बेहतर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। इतिहास में मदारी पासी जैसे नायकों के योगदान को उचित स्थान देना इसी व्यापक संघर्ष को समझने की दिशा में जरूरी कदम है।

लोकप्रिय

अन्य खबरें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Skip to content