अब ट्रेन से अयोध्या जाएंगी प्रियंका गांधी

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नई दिल्ली। गंगा नदी के रास्ते इलाहाबाद से वाराणसी जाने के बाद प्रियंका गांधी अब रेल से अयोध्या जाएंगी. कांग्रेस की महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका 27 मार्च को दिल्ली से फैजाबाद के बीच रेल यात्रा करेंगी. इस यात्रा के दौरान वह ट्रेन में मौजूद लोगों से बातचीत भी करेंगी. अयोध्या यात्रा के दौरान प्रियंका गांधी हनुमान गढ़ी भी जाएंगी.

सूचना यह भी आ रही है कि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के अयोध्या में रोड शो भी करेंगी. उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के सचिव राजेन्द्र प्रताप सिंह के मुताबिक प्रियंका गांधी दिल्ली से कैफियत एक्सप्रेस से फैजाबाद के लिये रवाना होंगी. ट्रेन के सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर फैजाबाद पहुंचने का समय है.

सिंह के मुताबिक, ‘फैजाबाद रेलवे स्टेशन के नजदीक थोड़ी देर होटल में रुकने के बाद वह सुबह 10 बजे अयोध्या में रोड शो करेंगी. लगभग 50 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद रोड शो कुमारगंज में समाप्त होगा.’ इस रोड शो में 32 पड़ाव होंगे. इस दौरान प्रियंका स्थानीय लोगों से मिलेंगी और फैजाबाद में दो जनसभाओं को भी संबोधित करेंगी. उनका एक स्थानीय स्कूल में बच्चों से भी मिलने का कार्यक्रम है.

वाराणसी के बाद, विंध्याचल और फिर अब अयोध्या की यात्रा के जरिए प्रियंका गांधी भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व का जवाब नरम हिन्दुत्व के जरिए दे रही है. साथ ही इसके जरिए कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश के अपने परंपरागत ब्राह्मण वोटरों को भी अपने पाले में खिंचने की कोशिश कर रही हैं.

अक्षय कुमार ने ‘केसरी’ से बनाया साल की सबसे बड़ी ओपनिंग का रिकॉर्ड

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मुंबई।होली के दिन रिलीज़ हुई अक्षय कुमार की फ़िल्म ‘केसरी’ ने बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया है. पहले दिन की कमाई देखकर ऐसा लगता है कि होली पर इस बार सिर्फ़ केसरिया रंग ही फ़िज़ा में उड़ा है.

21 मार्च को ‘केसरी’ देश में 3600 स्क्रींस और ओवरसीज़ में 600 स्क्रींस पर रिलीज़ की गयी. ट्रेड जानकारों के मुताबिक, फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर ₹21.06 करोड़ का कलेक्शन पहले दिन किया है, जो 2019 में सबसे बड़ा ओपनिंग कलेक्शन है. फ़िल्म ने इस साल रिलीज़ हुई सभी फ़िल्मों को पीछे छोड़ दिया है. जानकार बताते हैं कि ‘केसरी’ ने गुरुवार को 3 बजे के बाद रफ़्तार पकड़ी, क्योंकि दोपहर तक देशभर में होली के त्योहार का असर रहता है. गोल्ड के बाद केसरी अक्षय कुमार की दूसरी सबसे बड़ी ओपनर है. गोल्ड ने ₹25.25 करोड़ का कलेक्शन किया था. ‘केसरी’ को चार दिनों का ओपनिंग वीकेंड मिला है और उम्मीद की जा रही है कि फ़िल्म ₹100 करोड़ का पड़ाव आसानी से छू लेगी.

2019 की सबसे बड़ी ओपनिंग का रिकॉर्ड

इस साल सबसे बड़ी ओपनिंग का रिकॉर्ड अब तक रणवीर सिंह की ‘गली बॉय’ के नाम था, जिसने पहले दिन ₹19.40 करोड़ का कलेक्शन किया था. केसरी के पहले नंबर पर आने के बाद अब तीसरे स्थान पर अजय देवगन की ‘टोटल धमाल’ आ गयी, जिसे ₹16.50 करोड़ की ओपनिंग मिली थी. चौथे स्थान पर कंगना रनौत की ‘मणिकर्णिका- द क्वीन ऑफ़ झांसी’ है, जिसने ₹8.75 पहले दिन जमा किये थे. वहीं, पांचवें नंबर पर विक्की कौशल की ‘उरी द सर्जीकल स्ट्राइक’ है, जिसने ₹8.20 करोड़ की ओपनिंग ली थी.

इतिहास का सबसे भीषण युद्ध है बैटल ऑफ़ सारागढ़ी

अनुराग सिंह निर्देशित ‘केसरी’ एक वॉर फ़िल्म है, जो इतिहास प्रसिद्ध बैटल ऑफ़ सारागढ़ी पर आधारित है. अक्षय कुमार ने हवलदार ईशर सिंह का रोल निभाया है, जिनके नेतृत्व में महज़ 21 सिख जवानों ने 10 हज़ार की तादाद में आये अफ़ग़ान हमलावरों से मोर्चा लिया था और अपनी चौकी पर क़ब्ज़ा करने से रोका था. ये सारे 21 जवान इस युद्ध में शहीद हुए थे. बैटल ऑफ़ सारागढ़ी को भारतीय इतिहास के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है, जिसमें शौर्य और बलिदान की एक ऐसी दास्तां लिखी गयी थी, जिसका असर शायद ही कभी ख़त्म हो. हालांकि ब्रिटिश हुकूमत के लिये किये इस युद्ध को भारतीय इतिहास में उस तरह से सेलिब्रेट नहीं किया गया, जो सम्मान इसे मिलना चाहिए था.

‘केसरी’ को ज़्यादातर समीक्षकों ने अच्छे नंबर दिये हैं और अक्षय की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंसेज़ में से एक बताया है. परिणीति चोपड़ा पहली बार अक्षय के साथ पेयर अप हुई हैं. फ़िल्म में वो उनकी पत्नी के रोल में हैं.

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विराट बनाम धोनी से होगा IPL-12 के टूर्नामेंट का आगाज

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दुनिया की सबसे लोकप्रिय क्रिकेट लीग आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग के 12वें संस्करण की शुरुआत शनिवार से होने जा रही है.इस सीज़न का पहला मैच पिछले साल की चैंपियन चेन्नई सुपर किंग्स और रॉयल चैलेंजर्स बैंग्लोर के बीच खेला जाएगा. महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में खेलने वाली चेन्नई सुपर किंग्स साल 2010, 2011 और पिछले साल 2018 में यानी तीन बार चैंपियन रही है. इतना ही नहीं चेन्नई सुपर किंग्स चार बार उपविजेता भी रही. साल 2008, 2012, 2013 और 2015 में ऐसा हुआ. यानी यह एकमात्र ऐसी टीम है जिसने सबसे अधिक सात बार आईपीएल का फ़ाइनल मुक़ाबला खेला.इतनी कामयाबी हासिल करने के बावजूद इस टीम को सबसे अधिक बदनामी का सामना भी करना पड़ा.

पिछले सीज़न की चैम्पियन सीएसके

चेन्नई सुपर किंग्स जब शनिवार को अपने ही घर के एमए चिदांबरम स्टेडियम में भारत के कप्तान विराट कोहली की कप्तानी में खेलने वाली रॉयल चैलेंजर्स बैंग्लोर के ख़िलाफ मैदान में उतरेगी तो पिछले साल की सुनहरी यादें भी उनके दिमाग़ में होंगी. महेंद्र सिंह धोनी ने लगभग अपने ही दम पर बीते साल चेन्नई को चैंपियन बना कर तमाम क्रिकेट पंडितो को हैरान कर दिया. उन्होंने दो साल का प्रतिबंध झेलने वाली टीम के हर सदस्य में इतना जोश भर दिया कि तमाम विरोधी टीमें त्राहीमाम त्राहीमाम कर उठीं. पिछला फ़ाइनल तो चेन्नई सुपर किंग्स के शेन वॉटसन ने एकतरफ़ा ही बना दिया था. फ़ाइनल में उनके सामने सनराइजर्स हैदराबाद थी. फ़ाइनल में जीत के लिए 178 रनों का लक्ष्य चेन्नई ने शेन वॉटसन के नाबाद 117 रनों की मदद से 18.3 ओवर में केवल दो विकेट खोकर हासिल कर लिया.

चेन्नई की टीम में इस बार भी कप्तान धोनी के अलावा आईपीएल के सबसे कामयाब बल्लेबाज़ों में से एक सुरेश रैना, फॉफ डुप्लेसी, अंबाती रायडू, मुरली विजय और सैम बिलिंग जैसे धुरंधर बल्लेबाज़ हैं. इसके अलावा केदार जाधव, ड्वेन ब्रावो, रविंद्र जाडेजा और शेन वॉटसन जैसे आलराउंडर हैं. हरभजन सिंह में भले ही पहले जैसी धार नहीं है पर उनका अनुभव किसी से कम नहीं है. और फिर इमरान ताहिर कभी भी विकेट लेने की क्षमता रखते हैं.

दूसरी तरफ विराट कोहली की कप्तानी में खेलने वाली रॉयल चैलेंजर्स बैंग्लौर पिछली बार प्लेऑफ में भी यानी अंतिम चार में भी अपनी जगह नहीं बना सकी. इस बार बैंग्लौर का दारोमदार कप्तान विराट कोहली के अलावा एबी डिविलियर्स, पार्थिव पटेल, नाथन कल्टर नाइल और शिमरोन हेटमायर पर होगा. गेंदबाज़ी में अनुभवी तेज़ गेंदबाज़ उमेश यादव, टिम साउदी, स्पिनर युज्वेन्दर चहल और पवन नेगी पर सबकी नज़रें रहेंगी. वैसे आईपीएल शुरू होने से पहले चेन्नई को तब बड़ा झटका लगा जब उसके तेज़ गेंदबाज़ दक्षिण अफ्रीका के लुइंगी एनगिडी मांसपेशियों में खिचाव के कारण टूर्नामेंट से बाहर हो गए है.

पिछली बार चेन्नई सुपर किंग्स के अंबाती रायडू ने 16 मैचों में एक शतक और तीन अर्धशतक सहित 602 रन बनाए और वह सर्वाधिक रन बनाने वालों में चौथे स्थान पर थे. उनके अलावा शेन वॉटसन ने 15 मैचों में दो शतक और दो अर्धशतक की मदद से पांचवें स्थान पर रहते हुए 555 रन बनाए. गेंदबाज़ी में पिछली बार बैंग्लोर के तेज़ गेंदबाज़ उमेश यादव ने चौथे स्थान पर रहते हुए 14 मैचों में 20 विकेट झटके.

इस बार का आईपीएल पूरी तरह भारत में ही खेला जाएगा.

पहले अटकले थीं कि शायद आगामी लोकसभा चुनाव के कारण आईपीएल का दूसरा चरण विदेश में आयोजित हो सकता है, लेकिन बीसीसीआई ने नॉकआउट मुक़ाबलों के अलावा पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया है. आईपीएल 23 मार्च से शुरू होगा और 12 मई तक खेला जाएगा. इस बार आईपीएल इसलिए भी चर्चा में रहेगा क्योंकि इसके बाद विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट होना है. विश्व कप का क्रिकेट टूर्नामेंट 30 मई से 14 जुलाई तक इंग्लैंड में होगा. ज़ाहिर सी बात है कि भारत के कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री चाहते हैं कि सभी खिलाड़ी ख़ुद को बचाकर खेलें और अपनी फिटनेस और फॉर्म पर अधिक ध्यान दें.

हांलांकि यह एक बहुत बड़ी चुनौती है. कोई भी फ्रैंचाइज़ी यह नहीं चाहेगी कि उसके खिलाडी उन्हें चैंपियन बनाने में कोताही बरते. इसी बीच किंग्स इलेवन पंजाब के कोच माइक हेसन ने कहा है कि भारत के तेज़ गेंदबाज़ केएल राहुल और तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद शमी को मैचों के बीच में प्रयाप्त आराम भी दिया जाएगा.

ख़ैर अब जो होगा देखा जाएगा. शुरुआती दौर में हार-जीत से कोई असर नही पड़ेगा लेकिन फिर भी हर टीम जीत के साथ ही शुरुआत करना चाहेगी.

इस आईपीएल के साथ ही गेंद से छेडछाड़ करने के मामले में निलंबन का सामना कर रहे ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ और पूर्व कप्तान स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर की भी अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी हो जाएगी. स्टीव स्मिथ राजस्थान रॉयल्स और डेविड वार्नर सनराइजर्स हैदराबाद से खेलेंगे. इनका आईपीएल में किया गया प्रदर्शन ऑस्ट्रेलियाई टीम के लिए विश्व कप में खेलने का दावा भी मज़बूत करेगा.

और हां इस बार आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स दिल्ली कैपिटल्स के नाम से खेलती नज़र आएगी. अब देखना है कि इस बार का आईपीएल विश्व कप से पहले खिलाड़ियों के जोश, दमख़म, फिटनेस और प्रदर्शन पर कितना खरा उतरता है.

फ़िलहाल तो शनिवार को चेन्नई सुपर किंग्स और रॉयल चैलेंजर्स का मुक़ाबला देखते है जिसमें किसके हाथ जीत की बाज़ी लगती है इसे छोड ही दिया जाए तो बेहतर है. वैसे आईपीएल में दोनो टीमें 23 बार आमने-सामने हुई हैं जिनमें से 15 बार जीत चेन्नई की हुई है. सात बार बैंग्लौर जीती है. पिछली बार तो दोनों मुक़ाबलों में चेन्नई ने बैंग्लोर को मात दी थी.

दोनों टीमें इस तरह हैं : चेन्नई सुपर किंग्स : महेंद्र सिंह धौनी (कप्तान) , सुरेश रैना, अंबाती रायडू, शेन वॉटसन, फाफ डु प्लेसिस, मुरली विजय, केदार जाधव, सैम बिलिंग्स, रविंद्र जडेजा, ध्रुव शोरे, चैतन्य विश्नोई, रितुराज गायकवाड़, ड्वेन ब्रावो, कर्ण शर्मा, इमरान ताहिर, हरभजन सिंह, मिशेल सेंटनेर, शार्दुल ठाकुर, मोहित शर्मा, के एम आसिफ, डेविड विले, दीपक चाहर, एन जगदीशन.

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर : विराट कोहली (कप्तान), एबी डिविलियर्स , पार्थिव पटेल, मार्कस स्टोइनिस, शिमरोन हेटमायर, शिवम दुबे, नाथन कूल्टर नाइल, वाशिंगटन सुंदर, उमेश यादव, युजवेंद्र चहल, मोहम्मद सिराज, हेनरिच क्लासेन, मोईन अली, कोलिन डि ग्रैंडहोम, पवन नेगी, टिम साउदी, अक्षदीप नाथ, मिलिंद कुमार, देवदत्त पी, गुरकीरत सिंह, प्रयास राय बर्मन, कुलवंत केजरोलिया, नवदीप सैनी, हिम्मत सिंह.

पाक ने पहली बार भगत सिंह को क्रांतिकारी माना

पाकिस्तान के लाहौर में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का 88वां शहीदी समागम शनिवार को मनाया जाएगा. इससे पहले लाहौर प्रशासन ने एक लेटर जारी किया, जिसमें तीनों के शहादत स्थल शादमान चौक को भगत सिंह चौक के तौर पर जिक्र किया. वहीं, प्रशासन ने भगत सिंह को क्रांतिकारी नेता भी बताया. इसके अलावा शहीदी समागम के लिए कड़ी सुरक्षा मुहैया करने के भी आदेश दिए.

भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के चेयरमैन इम्तियाज राशिद कुरैशी की पहल पर शादमान चौक पर हर साल शहीदी समागम होता है. कई बार कट्टरपंथियों ने ऐतराज जताया, लेकिन कुरैशी ने समागम मनाना बंद नहीं किया. इस बार 88वां शहीदी समागम शनिवार शाम मनाने जा रहे हैं. उन्होंने 19 मार्च को डीसी लाहौर को सुरक्षा मुहैया करवाने की मांग की थी. उनकी अर्जी को मंजूरी दे दी गई.

डीसी की तरफ से जारी लेटर में समागम वाले स्थान को भगत सिंह चौक (शादमान चौक) लिखा गया है. पहला मौका है जब जिला प्रशासन ने भगत सिंह को क्रांतिकारी माना है. इम्तियाज यह मांग लंबे समय से उठाते आ रहे हैं. उन्होंने इसके लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था. अदालत ने लाहौर के मेयर को इस पर काम करने के निर्देश दिए थे.

शादमान चौक वही जगह है जहां शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने (23 मार्च 1931 को) फांसी दी थी. कुरैशी ने बताया कि हम चौक का नाम बदलने की मांग लंबे समय से करते आ रहे थे. अब चाहते हैं को इस चौक पर भगत सिंह की प्रतिमा लगाई जाए. इसके अलावा हम उन्हें (भगत सिंह) निशान-ए-हैदर का खिताब देने की भी मांग भी कर रहे हैं. प्रशासन ने भगत सिंह को पहली बार क्रांतिकारी माना. यह अच्छी पहल है.

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भाजपा ने इस वजह से काट दिया दलित-पिछड़ों का टिकट

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के महागठबंधन ने भाजपा के दलित-पिछड़े नेताओं को मुश्किल में डाल दिया है. पार्टी द्वारा गुरुवार 21 मार्च को जारी उत्तर प्रदेश की पहली लिस्ट में यह देखने को भी मिला. पार्टी ने अपनी इस लिस्ट में छह बहुजन नेताओं का टिकट काट दिया. जिन 6 सांसदों का टिकट कटा है उनमें से 4 दलित और 2 अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं.

बीजेपी की गुरुवार को जारी पहली सूची में शाहजहांपुर, सुरक्षित से सांसद कृष्णा राज और आगरा, सुरक्षित सीट से सांसद राम शंकर कठेरिया के अलावा हरदोई सुरक्षित सीट से वर्तमान सांसद अंशुल वर्मा के अलावा मिश्रित सुरक्षित सीट से सांसद अंजू बाला और फतेहपुर सीकरी से सांसद बाबू लाल चौधरी और संभल से सांसद सत्यपाल सिंह का टिकट काटा गया है. इन सीटों पर जो नए प्रत्याशी घोषित किए गए हैं, उनमें एसपी सिंह बघेल को आगरा, परमेश्वर लाल सैनी को संभल, राजकुमार चाहर को फतेहपुर सीकरी, जयप्रकाश रावत को हरदोई, अशोक रावत को मिश्रिख और अरुण सागर को शाहजहांपुर से टिकट दिया गया है.

चर्चा है कि एससी-एसटी एक्ट और रोस्टर के मुद्दे पर दलितों-पिछड़ों के आंदोलन को नहीं संभाल पाने की वजह से इनके टिकट काटे गए हैं. तो वहीं बसपा और सपा के एक साथ आने से भी प्रदेश में दलित-पिछड़े वोटों का समीकरण बदल गया है. अब भाजपा अपने उन दलित-पिछड़े नेताओं पर दांव लगा रही है, जो सपा और बसपा के परंपरागत वोटरों के अलावा अन्य जातीय समीकरणों को साधने का माद्दा रखते हैं. इसका सबसे बड़ा सबूत आगरा के सांसद राम शंकर कठेरिया का टिकट कटना है. कठेरिया भाजपा के कद्दावर दलित नेता माने जाते हैं. पार्टी और संघ परिवार में उनकी पैठ तब भी देखने को मिली जब उन्होंने कई नेताओं को पीछे छोड़कर कर अनुसूचित जाति के अध्यक्ष का पद हासिल किया था.

ऐसे में कठेरिया का टिकट काटकर एसपी सिंह बघेल को टिकट देना साफ बताता है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए अब नए चेहरों पर दांव लगा रही है. और इस सरकार में हुए दलित आंदोलन को संभाल नहीं पाने की सजा अपने ही दलित और पिछड़े सांसदों को दे रही है.

बसपा ने 11 उम्मीदवारों का आधिकारिक एलान किया

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी ने यूं तो काफी समय पहले ही लोकसभा का प्रभारी बनाकर यह साफ कर दिया था कि वो किस लोकसभा सीट पर किस नेता को टिकट देगी, लेकिन इसके बाद भी पार्टी के आधिकारिक घोषणा का इंतजार सभी कर रहे थे. पार्टी ने आज एक प्रेस रिलिज जारी कर पार्टी के 11 उम्मीदवारों के आधिकारिक नामों की घोषणा कर दी है.

पार्टी ने जिन उम्मीदवारों का ऐलान किया है, उनमें- सहारनपुर से हाजी फजर्लुरहमान, बिजनौर से श्री मूलक नागर, नगीना सुरक्षित सीट से गिरीश चन्द्र, अमरोहा से कुंवर दानिश अली, मेरठ से हाजी मोहम्मद याकूब, गौतमबुद्ध नगर से सतबीर नागर, बुलंदशहर से योगेश वर्मा, अलीगढ़ से अजीत बालियान, आगरा से मनोज कुमार सोनी, फतेहपुर सीकरी से राजवीर सिंह और आंवला से रूचि वीरा को टिकट दिया गया है.

ये कैसा राष्ट्रवाद और कैसा चौकीदार?

सरकार हो तो ऐसी? जो कहा वो नहीं किया मगर वो काम कर गयी जिसके कारण भाजपा को आरएसएस की मुखौटा वाली पार्टी कहा जाता है वोट के लिए सबका साथ और सबका विकास का नारा दिया. मगर पांच वर्षों में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में क्या क्रांति आयी महसूस किया जा सकता है. पांच वर्षों के शासन में सबसे ज्यादा सुख और चैन से कोई जिया तो अमीर और पूंजीपति वर्ग. बैंक खाली कर कुछ अमीर देश की सम्पत्ति को लूट ले गए. और देश के गरीब किसान और बेरोजगार आत्महत्या करने को मजबूर हुए. बेरोजगारी दर आजादी के बाद सबसे शिखर स्तर पर रही. भुखमरी में भी आंकड़े सन्तोष जनक नहीं कहे जा सकते हैं.

वास्तव में देश का विकास हुआ है. चाय वाला पांच साल में चौकीदार बन गया इससे अच्छे दिन और क्या आ सकते हैं. इस चुनाव में जितनी बम्पर भर्तियां चौकीदार की हुई हैं अगर इतनी भर्तियां वास्तव में चौकीदारों की भी देश मे हुई होती तो बेरोजगारी के आंकड़े कुछ कम हो सकते थे. ये है मेरे सपनों का भारत जहां नेता तो सब कुछ बन जा रहे हैं मगर जरूरत मन्द अपनी हालातों से निरन्तर जूझ रहा है. आज चौकीदारों की लिस्ट बहुत लंबी होती जा रही है. मगर चौकीदार की नौकरी मागने वाले सड़कों पर लाठी खाते नजर आते हैं. क्या यही न्यू इंडिया है? सिर्फ चाय वाला और चौकीदार ही 21वीं सदी के भारत का सपना है? इससे आगे बढ़ना नहीं है. ये विडम्बना और देश के करोडों बेरोजगार गरीबों के आखों में धूल झोंकने जैसा नही है? इस चुनाव में गालियों और अमर्यादित भाषा ने अपनी चरम सीमा को छुवा है. राजनीति की गाली सबको सहन करने की आदत सी डाल दी है नेताओं ने. क्या सभी चौकीदार चोर हैं? इस देश और समाज की सबसे बड़ी कुसभ्यता कही जाएगी कि गाली के मुहावरे की तुलना उन्ही से की गई है जो समाज शास्त्र और धर्मशास्त्रों में सबसे निचले पायदान पर रखे गए है. यथा “ढोल, गंवार, शुद्र, पशु नारी सब ताड़न के अधिकारी”आदि – आदि किसी को नीच कहकर गाली दी जाती है. ये नीच जाति गाली में सुमार है और यही वोटों की बोट को भी पार लगाती है.

एक जमाना वो भी था जब गर्व से कहो हम हिन्दू का नारा गूंजा करता था. कितना गर्व महसूस हुआ ये देखने वाली बात है. अब गर्व से कहो सब चौकीदार है!चुनाव की महिमा भी अजीब है जनता नारो और घोषणाओं,भाषणों की डोपिंग का शिकार हो जाती है. और ये चौकीदार तब जागते हैं जब संसद पर हमला हो जाता है ,चोरी हो जाती है. ये चौकीदार तब जागते हैं जब सैनिक शहीद हो जाते हैं. ये चौकीदार रात भर सोये रहते हैं जब चौकिदार को चौकन्ना होना होता है. ये विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी प्रचार का टॉम एंड जरी वाला ही खेल कहा जाए तो बुरा न होगा.

हादसों पर हादसे कभी इमारत गिर जाती है निर्माणाधीन,कभी पुल,कभी फ्लाईओवर गिर जाते हैं और लोग मौत के मुँह में समा जाते हैं. और सबसे बड़ी बहस होती है दलित,गाय ,मुसलमान,जाति, मन्दिर और मस्जिद पर. बेरोजगारी और भ्र्ष्टाचार कभी बड़ी बहस का मुद्दा ही नहीं बना. अच्छे दिन आएंगे ये पिछलीबार का नारा था. लेकिन अच्छे दिन लाने वाले खुद ही चाय से चौकीदार तक ही पहुँच पाए हैं तो अब बड़ी उम्मीद भी करना नासमझी के सिवा कुछ भी नहीं होगी. फुटओवर भी मौत का, फ्लाईओवर भी मौत ये अप्रत्यक्ष आतंकवाद नहीं तो और क्या है?जो देश की सैलरी से ही देश के लोगों के लिए मौत की पुल, मौत की इमारत, मौत की ओवरब्रिज बनाते हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?पाकिस्तान या हिंदुस्तान? बार्डर में सैनिक सुरक्षित नहीं और महानगरों में जनता सुरक्षित नहीँ, महिलाएं न मन्दिर में न ही किसी आश्रम में न ही सरकारी संरक्षण गृहों में. ये कैसा राष्ट्रवाद अपने देश के लोगों के कातिल अपने ही देश के ये किसके इसारे पर होता है पाकिस्तान के या भारत की राज्य सरकारों के इसारे पर? कश्मीर में आतंक से मारे गए लोगों के लिए तो पाकिस्तान जिम्मेदार होता है. जितने लोग और सैनिक कश्मीर में आतंकवाद का शिकार होते हैं. उससे ज्यादा मौतें हमारी निर्माण एजंसियों की लापरवाही, घूसखोरी, भुखमरी, कुपोषण, मिलावट, और माबलिनचिंग से होती है. ये किस चौकी के चौकीदार हैं जहाँ जहरीली शराब गली – मोहल्लों में गंगाजल की तरह बांटी जा रही है और सैकड़ों लोग इस जहरीली शराब से मर रहे हैं. और न चौकी को पता है न चौकीदार को. जहर से मारने वाले राष्ट्रवादी नहीं आतंकवादियों से ज्यादा दुश्मन हैं. बात चली थी सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनों एवं विकास की गति के बारे में, डिजिटल इंडिया बनाने की, स्मार्ट सिटी बनाने की, बुलेट ट्रेन चलाने की,देश को गुजरात मॉडल बनाने की,काल धन वापस लेकर देश की जनता को बांटने की,हर हाथ को काम देने की,भारत को 2025 तक विश्व गुरु बनाने की, नोट बन्दी से अच्छे दिन लाने की आतंकवाद की कमर तोड़ने की . और एक बेहतर सपना ये भी था कि हवाई चप्पल पहनने वाला व्यक्ति भी हवाई जहाज की यात्रा कर सकेगा ये सब याद कर फिल्मी गाने के बोल याद आते हैं”क्या हुवा तेरा वादा वो——-,”

ये कैसा राष्ट्रवाद जहाँ न्याय पाने में समानता नहीं, स्वास्थ्य उपचार में समानता नहीं, शिक्षा में समानता नहीं. ये कैसा राष्ट्रवाद किसी के पास सर छुपाने को छत नहीं और किसी के छत पर जहाज उतरते हैं,1978 के अल्माटा घोषणा पत्र में वर्ष 2000 तक” सभी के लिए स्वास्थ्य “का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. मगर ये कितना साकार हो पाया है उन माताओं बहिनो से पूछना चाहिए जो फर्स और सड़कों पर प्रसव पीड़ा से तड़प कर मर जाती हैं. संविधान की कार्य प्रणाली की समीक्षा करने के लिए सन 2000 में भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एम0एन0 वेंकटचलैया की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने कुल 249 सिफारिशें की हैं जिनमें 58 सिफारिशें संविधान के संशोधन से सम्बन्धित,86 विधायिका तथा 105 सिफारिशें कार्यपालिका से संबंधित हैं. कुक प्रमुख सिफारिशें जिन पर बड़ी बहस होनी चाहिए थी 1-न्यायालय अधिकरण तक पहुँचने एवं त्वरित न्याय पाने का अधिकार सबको मिलना चाहिए. 2-समान न्याय एवं निःशुल्क विविध सहायता पाने का अधिकार. ३-प्रत्येक पाँच वर्ष में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित किया जाए. 4-सामाजिक सौहार्द एवं सामाजिक दृढ़ता के लिए एक अंतर-आस्था आयोग का गठन होना चाहिए. 5-उच्च एवं उच्चतम न्यायालय की खंडपीठों में अनुसूचित जाति,जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जानी चाहिये. 6-सामाजिक नीतियाँ ऐसी होनी चाहिए जो अनुसूचित जाति,एवं पिछड़े वर्गों का भला कर सके. 7-5 वर्ष में एक बार रोजगार के व्यापक अवसरों की खोज करने वाले एक आयोग का गठन हो आदि कई अहम सिफारिशें हैं ज8न पर अमल करने की जरूरत थी मगर रोजगार खोज नहीं पाए तो हनुमान की जाति ही खोज डाली,न्यू इंडिया नहीं बना तो नए नामकरण कर दिए मुद्दे हजारों और जिन पर सकारात्मक राजनीति से समाधान खोजा जा सकता था चोर और सिपाही या चौकीदार के खेल में सब भुला दिया गया है. वोट के लिए राम के बाद अब राष्ट्र को भी शामिल कर दिया है . एक विचारक ने कहा है”भूखा पेट कोई देशभक्त नहीं हो सकता” जनता मालिक नहीं भ्रमित हो रही है मादित हो रही है और राजनीतिक डोपिंग का शिकार हो रही है. ये राजनीतिक डोपिंग बन्द होनी चाहिए.

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लोकसभा आमचुनाव मे बसपा सुप्रीमो का अहम फैसला

नई दिल्ली। बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने आज मीडिया को सम्बोधित करते हुये कहा कि जैसाकि आप लोगो को यह मालूम है कि आज से रंगों का पर्व होली पूरे उमंग के साथ मनाना शुरु हो गया है. इस मौके पर मैं अपनी पार्टी की ओर से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देशवासियों को होली की हार्दिक बधाई व शुभकामनायें देती हूँ और साथ ही कुदरत से यही प्रार्थना करती हूँ कि अपना देश खासकर गरीबी, बेरोजगारी व जातिवाद तथा साम्प्रदायिकता आदि से मुक्त होकर हमेशा अमन-चैन, आपसी सौहार्द व सद्भावना वाला बने.

इसके साथ-साथ इस मौके पर उन्होने अपने खुद के लोकसभा आमचुनाव लड़ने के बारे में भी यह कहा कि बी.एस.पी. एक राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर एवं बी.एस.पी. मूवमेन्ट के जन्मदाता व संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी द्वारा चलाया गया यह करोड़ों शोषितों, पीड़ितों व उपेक्षितों के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान का मूवमेन्ट भी है, जिसका हित मेरे लिए सर्वोंपरि है. इसे खास ध्यान में रखकर ही मुझे बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते बीच-बीच में काफी कड़े फैसले भी लेने पड़ते हैं और यदि मैं ऐसा नहीं करती हूँ तो फिर हमारी मूवमेन्ट को बहुत छति हो सकती है, क्योंकि इस मूवमेन्ट के हमारे विरोधी लोग किस्म-किस्म के हथकण्डे अपनाकर व षड़यन्त्र करके इसे अक्सर फेल करने में ही लगे रहते हैं और खासकर चुनावों के समय में तो ये लोग अनेकों प्रकार के साम, दाम, दण्ड, भेद आदि हथकण्डे इस्तेमाल करके हमारी इस मूवमेन्ट को चुनावी आघात लगाने के षड़यन्त्र में लग जाते हैं, जिससे निपटना भी हमारे लिए बहुत जरुरी होता है.

अगर इसके खिलाफ मजबूती से नहीं लड़ा जायेगा तो फिर यहाँ विशेषकर हमारे करोड़ों दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों का और इन वर्गों में कनवर्टेड खासकर मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समाज के लोगों का भी जीवन फिर से यहाँ अन्धकार में चला जायेगा और फिर ये लोग पुनः यहाँ दासता व गुलामी की जंजीर में जकड़ लिये जायेंगे. इसे हर हाल में हमें रोकना है. और यह वर्तमान सन्दर्भ में मेरे लोकसभा आमचुनाव लड़ने से जुड़ा हुआ एक मामला है, जिसके बारे में यह सर्वविदित है कि मैं उत्तर प्रदेश में जहाँ से भी चाहूँ चुनाव लड़ सकती हूँ और वैसे भी मैंने यहाँ उ.प्र. से चार बार लोकसभा का चुनाव जीता है तथा दो बार विधानसभा की सदस्य भी रही हूँ तथा चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रही हूँ.

ऐसी स्थिति में मुझे प्रदेश की किसी भी सीट पर केवल नामांकन भरने के लिए ही जाना होगा और बाकी जीत की जिम्मेदारी हमारे लोग खुद निभा लेंगे, यह निश्चित है. लेकिन अपनी बहनजी को भारी से भारी मतों से जिताने के लिए जब पार्टी के लोग मेरे लाख मना करने के बावजूद भी मेरे लोकसभा क्षेत्र में काम करने चले जायेंगे तो मुझे यह आशंका है कि इससे फिर हमारा दूसरे क्षेत्र का चुनाव कुछ ना कुछ जरुर प्रभावित होगा, जो मैं कतई भी नहीं चाहती हूँ.

इसके साथ ही, बहन जी ने कहा वैसे आप लोगों को यह भी मालूम है कि इस देश में गरीब, मजदूर, किसान, बेरोजगार व अन्य मेहनतकश विरोधी बीजेपी की वर्तमान अहंकारी, निरंकुश, जातिवादी व साम्प्रदायिक सरकार को उखाड़ फेकने का तैहया करने के तहत् ही यहाँ उ.प्र. में बसपा, सपा व आर.एल.डी. का गठबन्धन किया गया है और इस गठबन्धन की तीनों पार्टियों की हर सीट को जीतने के लिए पूरे जी-जान से लगी हुई है जिसे मैं किसी भी कीमत पर थोड़ा सा भी नुकसान होते हुये नहीं देखना चाहती हूँ. इसलिए मेरे खुद के जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस लोकसभा चुनाव में यहाँ प्रदेश की एक-एक लोकसभा की सीट को जीतना, जिससे फिर यहाँ हमारी पार्टी के सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति के मिशन को भी पूरा बल मिलेगा.

उन्होने यह भी कहा के अपनी पार्टी के इसी मूवमेन्ट के हित को ध्यान में रखकर ही मैंने राज्यसभा से इस्तीफा देकर अपने मूवमेन्ट को धरातल पर संघर्षशील बनाया है और वैसे मैं कभी भी संसद में चुनकर जा सकती हूँ लेकिन वर्तमान हालात को देखकर अगर चुनाव बाद मौका आयेगा तो मैं जिस सीट से चाहुँगी तो उस सीट को खाली कराकर लोकसभा सांसद बन सकती हूँ.

इसीलिए देश के वर्तमान हालात व जरुरत को देखते हुये तथा अपनी पार्टी की मूवमेन्ट के व्यापक हित के साथ-साथ जनहित व देशहित का भी यही तकाजा है कि मैं लोकसभा का चुनाव अभी नहीं लड़ूँ. और यही कारण है कि मैंने फिलहाल लोकसभा का आमचुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है. मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा भरोसा है कि हमारी पार्टी के लोग, मेरे लिये गये इस मिशनरी फैसले को जरुर समझेंगे और मेरे इस फैसले का स्वागत करके ये लोग पूरे जी-जान व तन, मन, धन के साथ अपने बसपा, सपा व आर.एल.डी गठबन्धन की एक-एक सीट को जरूर जिताने में लग जायेंगे. साथ ही अपनी बहनजी की दूरदर्शिता व कुर्बानी का सम्मान पहले की तरह ही जरुर करेंगे, इसका मुझे अपनी पार्टी के लोगों पर यह पूरा-पूरा भरोसा भी है.

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दलित विमर्श के सशक्त हस्ताक्षर मूलचंद सोनकर का निधन

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मूलचंद सोनकर अपने दौर के अत्यंत महत्वपूर्ण गजलकार, अंबेडकरवादी चिंतक व समालोचक थे. उनका जन्म 5 मार्च 1946 को इलाहाबाद के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके दादा नेहरु परिवार के एस एस नेहरू (आईसीएस)के विशाल बगीचे का ठेका लिया करते थे और अपने बड़े कुनबे के साथ उसी में रहते भी थे।बचपन में मूलचंद जी को कई बार जवाहरलाल नेहरू ,विजयलक्ष्मी पंडित और इंदिरा गांधी के सानिध्य का अवसर मिला. छात्र जीवन में उन्हें कई बेहतरीन अध्यापकों ,सहपाठियों का भी सानिध्य मिला. वे शुरू से ही मेधावी विद्यार्थी थे और अपने घर के पहले व्यक्ति हैं जिसने उच्च शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में नौकरी की और वहीं से प्रधान प्रबंधक (कार्मिक) के पद से सेवानिवृत्त हुए. वह एक दलित चिंतक, समीक्षक, कवि व शाइर. दलित विमर्श के सशक्त हस्ताक्षर, समसामयिक ज्वलंत सामाजिक समस्याओं पर सतत चिंतन एवं लेखन का अहम हिस्सा थे. कल का सवेरा एसा दुखद पल को अपने साथ ले कर आया जब पता चला के मूलचंद सोनकर जी अब हमारे बीच नही रहे. दिनांक 19 मार्च 2019 को उन्होने अपनी अंतिम सांस ली.

काली चरण स्नेही लिखते हैं-

प्रख्यात हिन्दी आलोचक और दलित कवि मूलचन्द सोनकर के आकस्मिक निधन की खबर से सारा साहित्य जगत स्तब्ध है।आपकी लेखनी से सृजित साहित्य, कालजयी है।आलोचना के क्षेत्र में अभी उनसे बहुत उम्मीद थी,पर मौत के आगे सब विवश हैं।शोक की इस घड़ी में हमारा पूरा परिवार, सोनकर जी के परिवार के साथ है। मैं अपनी ओर से उन्हें अश्रुपूर्ण हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।

देश के जाने माने धम्म प्रचारक भंते चंदिमा ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है –

आदरणीय मूलचंद सोनकर जी को श्रद्धा का सुमन। जब देश में बहुत से लेखक, विचारक, समाजसेवी, वक्ता और ख्याति प्राप्त नेता बिरादरीवाद वाली बिमारी से पीड़ित हो तो ऐसे समय मे “बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय” के संदेश को आगे बढ़ाने वाले सोनकर साहब बार-2 याद आयेंगे।

राकेश पटेल उनको याद करते हुए लिखते हैं-

बहुत ही अध्ययनशील और अपने विचारों के प्रति अडिग रचनाकार थे। खूब पढ़ लिख और शोध करके बोलते थे। उनके विचार उनकी किताबों के माध्यम से हमारे बीच ज़िंदा रहेंगे। विनम्र आदरांजलि

प्रकाशित कृतियां-

01. गालिब मेरी नजर से 02. दर्द की लकीरें (ग़ज़ल संग्रह) 03. कहीं कुछ धड़क रहा (कविता संग्रह) 04. दलित विमर्श : विकल्प का साहित्य (लेखों का संग्रह) 05. संतप्त साये (सॉनेट संग्रह) 06. ‘नजीर’ बनारसी की शायरी (सम्पादन) 07. दलित विमर्श और डॉक्टर अंबेडकर : एक प्रसांगिक हस्तक्षेप (लेखों का संग्रह) 08. अब रास्ता इधर से ही है (ग़ज़ल संग्रह) 09. चिनार हरी रहेंगे -ग़ज़ल संग्रह (प्रकाशनाधीन)

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दुनिया के तीसरे सबसे बड़े बैंक के साथ SBI का समझौता, ग्राहकों को सीधे मिलेगा ये फायदा

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नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े बैंक बैंक ऑफ चाइना के साथ करार किया है. इसके तहत दोनों बैंकों के ग्राहक एक दूसरे की सर्विसेज का फायदा उठा पाएंगे. बैंक की ओर जारी बयान में कहा गया है कि इस समझौते से एसबीआई तथा बीओसी दोनों को संबंधित बाजारों में सीधी पहुंच का फायदा होगा. एसबीआई की एक शाखा शंघाई में है जबकि बैंक ऑफ चाइना मुंबई में अपनी शाखा खोल रही है. आपको बता दें कि बैंक ऑफ चाइना के अलावा ईरान के तीन, साउथ कोरिया के दो, मलेशिया और नीदरलैंड के एक-एक बैंक ने भारत में बिजनेस शुरू करने के लिए आरबीआई से मंजूरी मांगी थी. इनमें से साउथ कोरिया और मलेशिया के बैंकों के आवेदन खारिज कर फिर से आवेदन के लिए कहा गया.

भारत में विदेशी बैंकों की संख्या 46 हो जाएगी-इससे पहले इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना इस साल जनवरी से भारत में बिजनेस शुरू कर चुका है. बैंक ऑफ चाइना समेत भारत में विदेशी बैंकों की संख्या 46 हो जाएगी. यूके का स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक भारत में सबसे ज्यादा 100 शाखाओं वाला विदेशी बैंक हैं.

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सफाई कर्मचारी का बेटा बना मिस्टर इंडिया

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यमुनानगर। नगर निगम में सफाई कर्मचारी के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे बलदेव के बेटे टीनू चनालिया ने बॉडी बिल्डिंग के एक 55 किलो भार वर्ग में मिस्टर इंडिया का खिताब जीतकर प्रदेश का नाम रोशन किया है. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में गत दिवस आयोजित इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में लगभग 150 प्रतिभागियों ने देश के विभिन्न हिस्सों से भाग लिया था. मिस्टर इंडिया का खिताब जीतने के बाद अपने शहर लौट कर आए टीनू ने बताया कि उनके ट्रेनर उनके बड़े भाई अमन है जो कि वर्ष 2013 में मिस्टर यमुनानगर रह चुके हैं. प्रतियोगिता में खिताब हासिल करने के लिए वे पिछले 3 माह से लगातार मेहनत कर रहे हैं. टीनू के मिस्टर इंडिया बनने के बाद उनके घर में बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है. 150 प्रतिभागियों को पछाड़ कर मिस्टर इंडिया का खिताब जीतकर टीनू ने साबित कर दिया है कि यदि दिल में लगन हो तो कोई भी खिताब जीतना है जितना असंभव नहीं है. इससे पूर्व भी वह तीन राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं उनका सपना है कि वह एक दिन बॉडीबिल्डिंग के क्षेत्र में वर्ल्ड चैम्पियन बनकर मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीतें.

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2014 में चायवाला और अब चौकीदार, मायावती ने नरेंद्र मोदी पर साधा निशाना

नई दिल्ली। आम चुनाव 2019 के लिए राजनीतिक मैदान सच चुका है. राजनेता अपने तरकश से सियासी तीरों के जरिए एद दूसरे पर निशाना साधने का एक भी मौका नहीं चूक रहे हैं. इस समय देश में चौकीदार पर चर्चा छिड़ी हुई है. पीएम नरेंद्र मोदी अपने आप को चौकीदार कहते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें चौकीदार चोर कहते हैं. इन सबके बीच कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल चौकीदार का जवाब देते हुए अपने नाम से पहले बेरोजगार जोड़ लिया. इसके साथ ही कपिल सिब्बल ने कहा रि द लाई लामा इज ऑवर चौकीदार.

इन सबके बीच बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने पीएम मोदी पर निशाना साधा है.मायावती ने कहा कि अब पीएम नरेंद्र मोदी चायवाला नहीं रह गए हैं उनकी पहचान बदल चुकी है. पिछले चुनाव तक वो चायवाला थे. लेकिन अब चौकीदार बन गए हैं. आप देख सकते हैं कि बीजेपी शासन में किस तरह से बदलाव आ रहा है.

मायावती कहती हैं कि सादा जीवन उच्च विचार के विपरीत शाही अन्दाज में जीने वाले जिस व्यक्ति ने पिछले लोकसभा आमचुनाव के समय वोट की खातिर अपने आपको चायवाला प्रचारित किया था, वे अब इस चुनाव में वोट के लिये ही बड़े तामझाम व शान के साथ अपने आपको चोकीदार chowkidar घोषित कर रहेे हैं. देश वाकई बदल रहा है?

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कांग्रेस पर इतनी हमलावर क्यों हैं मायावती

बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी एक बार फिर साफ तौर पर यह स्पष्ट कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी से हमारा किसी भी प्रकार का कोई तालमेल व गठबंधन आदि बिल्कुल भी नहीं है। हमारे लोग कांग्रेस पार्टी द्वारा आये दिन फैलाये जा रहे, इनके किस्म-किस्म के हथकण्डों के भ्रम में कतई भी ना आयें.

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में भी पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह यहाँ की सभी 80 लोकसभा की सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करके अकेले यह चुनाव लड़े. और वैसे भी हमारा यहाँ बना गठबंधन अकेले बीजेपी को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है. इसलिए कांग्रेस पार्टी जबर्दस्ती यूपी में गठबंधन हेतु 7 सीटें छोड़ने की भ्रान्ति ना फैलायें.

यह बहुजन समाज पार्ट की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती का बयान है, जो उन्होंने 18 मार्च को मीडिया को जारी किया है. मायावती ने अपने इस बयान को ट्विट भी किया था.

इससे पहले 12 मार्च को बसपा द्वारा जारी एक बयान में बसपा अध्यक्ष के हवाले से यह कहा गया था कि बीएसपी किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी चुनावी समझौता या तालमेल आदि करके यह चुनाव नहीं लड़ेगी. तमाम अखबारों और चैनलों ने बसपा प्रमुख के इस बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया.

अपने इन दो बयानों में मायावती ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है. हालांकि यूपी के अलावा उत्तराखंड और मध्यप्रदेश में गठबंधन की उसकी सहयोगी समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस को लेकर लचीला है. अखिलेश यादव कई बयानों में कांग्रेस को लेकर बात कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने हालिया बयानों से कांग्रेस से दुश्मनी नहीं दिखाई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर मायावती कांग्रेस को लेकर इतनी हमलाकर क्यों हैं और बार-बार कांग्रेस पार्टी को निशाने पर क्यों ले रही हैं?

इसकी दो वजहें हो सकती हैं… विधानसभा चुनावों के दौरान पहले गुजरात, फिर मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन को लेकर बात हुई थी. लेकिन तब कांग्रेस पार्टी बसपा को सम्मानजनक सीटें देने को तैयार नहीं हुई थी. इसको लेकर मायावती काफी नाराज थीं.

दूसरी बात यह हो सकती है कि बसपा की रणनीति के मुताबिक इस बार उसका जोड़ दलित-पिछड़े गठबंधन के अलावा मुस्लिम और ब्राह्मण वोटों पर है. बसपा पहले भी इस गठजोड़ के भरोसे चुनाव में उतर चुकी है और सफल भी रही है. कांग्रेस पार्टी भी शुरू से ही ब्राह्मण-दलित और मुस्लिम गठबंधन के सहारे दशकों तक सत्ता में रही है. संभव है कि बहनजी को डर हो कि कहीं इस समुदाय का कुछ हिस्सा केंद्र में नेतृत्व बदलने के नाम पर कांग्रेस के साथ न हो जाए.

बीच में एक खबर यह भी आई थी कि कांग्रेस और बसपा के बीच अखिल भारतीय स्तर पर गठबंधन को लेकर बात चल रही है. हालांकि किसी पार्टी ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं कि लेकिन इसको लेकर काफी चर्चा रही. फिर खबर आई कि आखिरी वक्त में यह फार्मूला सफल नहीं हो सका. इसके पीछे कांग्रेस पार्टी के अड़ियल रुख की बात कही गई. दरअसल जिन राज्यों में कांग्रेस मजबूत है, वहां वह बसपा के लिए सीटें छोड़ने को तैयार नहीं होती है. और जिस उत्तर प्रदेश में वह कमजोर है वहां वह बसपा से गठबंधन की चाहत रखती है. इसलिए यह गठबंधन नहीं हो पाता. संभव है कि कांग्रेस पार्टी के इसी अड़ियल रुख से बहनजी ने भाजपा के साथ कांग्रेस को भी लगातार निशाने पर लिया है.

अगर उत्तर प्रदेश से बाहर अन्य राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में बसपा को न सिर्फ वोट मिले हैं बल्कि वह विधानसभा सीटें जीतने में भी कामयाब रही है. यूपी से बाहर बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 11 विधायकों तक का रहा है.

हालांकि गठबंधन के सवाल पर जिस तरह से बसपा प्रमुख लगातार कांग्रेस पर हमलावर हैं, वह समझ से परे है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने कभी भी बसपा और सपा के साथ गठबंधन की कोई बात नहीं की है. प्रदेश में सब जानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन में बसपा शामिल नहीं है. इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर हमला करना संभव है मायावती की किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो.

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पर्रीकर थे ताजी हवा के झोंकों का अहसास

गोवा के मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर पैंक्रियाटिक कैंसर से एक वर्ष तक जूझने के बाद देह से विदेह हो जाना न केवल गोवा बल्कि भाजपा एवं भारतीय राजनीति के लिए दुखद एवं गहरा आघात है. उनका असमय निधन हो जाना सभी के लिए संसार की क्षणभंगुरता, नश्वरता, अनित्यता, अशाश्वता का बोधपाठ है. उनका निधन राजनीति में चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के एक युग की समाप्ति है. भाजपा के लिये एक बड़ा आघात है, अपूरणीय क्षति है. आज भाजपा जिस मुकाम पर है, उसे इस मुकाम पर पहुंचाने में जिन लोगों का योगदान है, उनमें मनोहर पर्रीकर अग्रणी है.

मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु पर्रिकर का जन्म 13 दिसम्बर, 1955 को हुआ. वे राज्य के पारा गांव के कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते थे. वे उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद थे. उन्होंने सन 1978 मे आई.आई.टी. मुम्बई से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करी. भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आई.आई.टी. से स्नातक किया. 1994 में उन्हें गोआ की द्वितीय व्यवस्थापिका के लिये चयनित किया गया था. जून 1999 से नवम्बर 1999 तक वह विरोधी पार्टी के नेता रहे. 24 अक्टूबर 2000 को वे गोआ के मुख्यमन्त्री बने किंतु उनकी सरकार 27 फरवरी 2002 तक ही चल पाई. जून 2002 में वह पुनः सभा के सदस्य बने तथा 5 जून, 2002 को पुनः गोआ के मुख्यमन्त्री पद के लिये चयनित हुए. 13 मार्च 2017 को पर्रिकर ने छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चैथी बार गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. प्लानिंग कमीशन ऑफ इन्डिया तथा इंडिया टुडे के द्वारा किय गए सर्वेक्षण के अनुसार उनके कार्यकाल में गोआ लगातार तीन साल तक भारत का सर्वश्रेष्ठ शासित प्रदेश रहा. कार्यशील तथा सिद्धांतवादी श्री पर्रीकर को गोआ में मि. क्लीन के नाम से जाना जाता है.

मनोहर पर्रीकर भारतीय राजनीति के जुझारू एवं जीवट वाले नेता थे, यह सच है कि वे गोआ के थे यह भी सच है कि वे भारतीय जनता पार्टी के थे किन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि वे राष्ट्र के थे, राष्ट्रनायक थे. देश की वर्तमान राजनीति में वे दुर्लभ व्यक्तित्व थे. टैक्नोलोजी के धनी, उच्च शिक्षा और कुशल प्रशासक के रूप में उन्होंने देश के गौरव को बढ़ाया. उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी, सरलता और इतनी सचाई ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया है. वे तो कर्मयोगी थे, अन्तिम साँस तक देश की सेवा करते रहे. पर्रीकर का निधन एक राष्ट्रवादी सोच की राजनीति का अंत है. वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की शंृखला के प्रतीक थे. उनके निधन को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, राजनीति की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा सकता है. हो सकता है ऐसे कई व्यक्ति अभी भी विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हों. पर ऐसे व्यक्ति जब भी रोशनी में आते हैं तो जगजाहिर है- शोर उठता है. पर्रीकर ने तीन दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे. घाल-मेल से दूर. भ्रष्ट राजनीति में बेदाग. विचारों में निडर. टूटते मूल्यों में अडिग. घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित. उनके जीवन से जुड़ी विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया.

इस शताब्दी के भारत के ‘राजनीति के महान् सपूतों’ की सूची में कुछ नाम हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हंै. मनोहर पर्रीकर का नाम प्रथम पंक्ति में होगा. पर्रीकर को अलविदा नहीं कहा जा सकता, उन्हें खुदा हाफिज़ भी नहीं कहा जा सकता, उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकती. ऐसे व्यक्ति मरते नहीं. वे हमंे अनेक मोड़ों पर राजनीति में नैतिकता का संदेश देते रहेंगे कि घाल-मेल से अलग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है. निडरता से, शुद्धता से, स्वाभिमान से. उन्हें आधुनिक गोवा का निर्माता माना जाता है, मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गोवा को एक नई पहचान दी. केन्द्र में वे नरेन्द्र मोदी सरकार में एक सशक्त एवं कद्दावर मंत्री थे. रक्षामंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान को कड़ा सन्देश दिया, कई नए अभिनव दृष्टिकोण, राजनैतिक सोच और कई योजनाओं की शुरुआत की तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सुधार किया, उनमें जीवन में आशा का संचार किया. उरी हमले के बाद पाक में आतंकियों के शिविरों को नेस्तनाबूद करने वाली सर्जिकल स्ट्राइक में पर्रिकर की अहम भूमिका रही. इसने सादगी के लिए मशहूर पर्रिकर की कुशल प्रशासक की छवि को पुख्ता किया. उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय सेना के सर्जिकल हमले का श्रेय भी संघ की शिक्षा को दिया था.

अपनी सादगी एवं सरलता से उन्होंने राजनीति को एक नया दिशाबोध दिया. आधी बाजू की कमीज और लेदर सैंडल उनकी पहचान थी. मुख्यमंत्री हो या केन्द्रीय मंत्री या अन्य उच्च पदों पर होने के बाद भी पर्रिकर ने अपने रहन-सहन में जरा भी बदलाव नहीं किया. कहा जाता है कि वे अपने राज्य की विधानसभा खुद स्कूटर चलाकर जाया करते थे. इतना ही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने घर को नहीं छोड़ा और सरकार द्वारा दिए गए घर में नहीं गए. गोवा के मुख्यमंत्री रहते हुए एक दफा उन्होंने अपने जन्मदिन पर खर्च होने वाले पैसे को चेन्नई रिलीफ फंड में भेजने की अपील की थी. वे सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों से जुड़े रहते थे और उनकी मदद करते थे. पर्रिकर ने बहुत छोटी उम्र से आरएसएस से रिश्ता जोड़ लिया था. वह स्कूल के अंतिम दिनों में आरएसएस के मुख्य शिक्षक बन गए थे. संघ के साथ अपने जुड़ाव को लेकर कभी भी किसी तरह की हिचकिचाहट उन्होंने नहीं दिखाई. आईआईटी बांबे से इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद भी संघ के लिए काम जारी रखा और पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 26 साल की उम्र में मापुसा में संघचालक बन गए. टेक्नोक्रेट पर्रिकर अक्सर संघ के गणवेश और हाथ में लाठी लिए नजर आते थे. पर्रिकर की शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेहद बीमार होने के बाद भी गोवा में 2019-20 का बजट पेश करने विधानसभा पहुंचे. इस दौरान उन्होंने बेहद आत्मविश्वास से कहा था, ‘मैं जोश में भी हूं और होश में भी हूं.’ उनके इस जोश पर सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्ष ने भी खड़े होकर अभिवादन किया.

वे गोवा के लिए अपनी आवाज उठाने और उसके हक में लड़ने वाले विशिष्ट नेताओं में से एक थे. वे भाजपा संगठन के लिए एक धरोहर थे. उन्होंने भाजपा को गोवा में मजबूत करने के लिए कठोर परिश्रम किया. वह अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे. वे युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आये और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की. भारतीय राजनीति की वास्तविकता है कि इसमें आने वाले लोग घुमावदार रास्ते से लोगों के जीवन में आते हैं वरना आसान रास्ता है- दिल तक पहुंचने का. हां, पर उस रास्ते पर नंगे पांव चलना पड़ता है. पर्रीकर इसी तरह नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले राजनेता थे, उनके दिलो-दिमाग में गोवा एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी. काश! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनके निधन से बोधपाठ लें. निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया.

पर्रीकर भाजपा के एक रत्न थे. उनका सम्पूर्ण जीवन अभ्यास की प्रयोगशाला थी. उनके मन में यह बात घर कर गयी थी कि अभ्यास, प्रयोग एवं संवेदना के बिना किसी भी काम में सफलता नहीं मिलेगी. उन्होंने अभ्यास किया, दृष्टि साफ होती गयी और विवेक जाग गया. उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने के लिए नहीं. खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं. उनके जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें. बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों. इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिनों पर छाये रहे. उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श राजनीतिक व्यक्तित्व हैं जिन्हें सेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है. उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा. यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं. आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया. यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता. आपके जीवन की खिड़कियाँ राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही. इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी.

ललित गर्ग

 

मुजफ्फरनगर में दलित किशोरी के साथ हुआ सामूहिक रेप

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मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 17 वर्षीय एक दलित किशोरी से पांच युवकों ने कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया. पुलिस ने सोमवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि आरोपियों ने घटना का एक वीडियो भी बनाया.

उन्होंने बताया कि यह घटना रविवार को रतनपुरी पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले फुलेट गांव में हुई. पीड़ित के भाई द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, किशोरी पशुओं के लिए चारा एकत्र करने खेतों में गई थी जहां आरोपियों ने उसे पकड़ लिया. शिकायत में कहा गया है कि आरोपियों ने पीड़ित को घटना की जानकारी किसी को भी देने पर वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी दी.

थाना प्रभारी कमल सिंह चौहान ने बताया कि पुलिस ने मामला दर्ज कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. शेष दो को पकड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं.

आपको बता दें कि इस महीने में यह दूसरा मामला है, इससे पहले 8 मार्च को मुजफ्फरनगर में ही एक 15 वर्षीय लड़की के गैंग रेप का मामला सामने आया था. जहां बंदूक के बल पर लड़की के साथ चार लोगों ने रेप किया था.

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चंद्रेशेखर मोदी को हराना चाहते हैं या जिताना?

पिछले कुछ दिनों से, विशेष रूप से जब से लोकसभा चुनावों की सरगर्मी तेज़ हुई है, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद को मीडिया द्वारा काफ़ी स्पेस दिया जा रहा है. कुछ दिन पहले बिना प्रशासनिक अनुमति के रैली करने के लिए उनकी गिरफ़्तारी और 15 मार्च के दिन उनकी हुंकार रैली की ख़बर को कई न्यूज़ चैनलों द्वारा दिखाया गया. अब वाराणसी से उनके चुनाव लड़ने की घोषणा को कई राष्ट्रीय समाचार-पत्रों द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. चंद्रशेखर को मीडिया में स्थान मिले यह अच्छी बात है. चंद्रशेखर ही क्यों, विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दलित-बहुजन समाज की सभी प्रमुख हस्तियों को देश की मीडिया में समुचित स्थान मिलना चाहिए, तभी मीडिया का स्वरूप लोकतांत्रिक बनेगा तथा समाज और राष्ट्र के लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में उसका यह एक महत्वपूर्ण क़दम होगा, जिसकी उससे अपेक्षा है. ऐसा करके मीडिया देश में बन रही अपनी दलित-बहुजन विरोधी छवि से भी उबर सकेगा. किंतु, मीडिया की ऐसी कोई सदिच्छा दूर-दूर तक दिखायी नहीं देती है.

दलित-बहुजनों के प्रति शोषण और अन्याय के प्रतिकार तथा न्याय के लिए उनके संघर्ष को देश के मीडिया का कोई समर्थन नहीं है. समर्थन तो दूर की बात है उनके बड़े-बड़े प्रदर्शनों, रैलियों और अन्य घटनाओं तक को भी वह अपनी ख़बरों में कोई ख़ास जगह नहीं देता है. इसके विपरीत, दलित-बहुजन विरोधी विचारों, व्यक्तियों और घटनाओं को प्रमुखता से दिखाता है. यह सब दलित-बहुजनों के प्रति देश के मीडिया की द्वेषपूर्ण और नकारात्मक सोच और उसके चरित्र को परिलक्षित करता है. इसलिए चंद्रशेखर को मीडिया द्वारा प्रमुखता दिया जाना इस दिशा में सोचने को बाध्य करता है.

सवाल यह है कि चंद्रशेखर क्यों अचानक से मीडिया के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उनकी हुंकार रैली से लेकर चुनाव लड़ने की घोषणा तक मीडिया की बड़ी ख़बर बन रही है. जबकि इसके बरक्स मायावती और अखिलेश यादव जैसे बड़े बहुजन नेताओं की रैलियां, वक्तव्य और घोषणाएं कई बार मीडिया की ख़बर नहीं बन पाते हैं. केंद्र और अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी तथा उसकी सरकार की नीतियों और नेताओं के वक्तव्यों के प्रति सकारात्मक भाव पैदा करने वाली तस्वीर और समाचारों की ही मीडिया में प्रायः भरमार रहती है. ऐसे में यह प्रश्न उभरना अस्वाभाविक नहीं है कि जो मीडिया मायावती और अखिलेश यादव जैसे बड़े नेताओं को भी अपेक्षित महत्व नहीं देता और दलित-बहुजनों के प्रति प्रायः उदासीनता और उपेक्षा का भाव रखता है, वह चंद्रशेखर के प्रति इतना उदार कैसे है कि उनकी रैली और चुनाव लड़ने की घटना को इतना महत्व दे रहा है. मीडिया के इस क़दम को यदि थोड़ी देर के लिए दलित-बहुजनों के प्रति उसकी उदारता मान लिया जाए तो उसकी यह उदारता चंद्रशेखर जैसे चेहरों तक ही सीमित क्यों है, उसका विस्तार दलित-बहुजन समाज की अन्य हस्तियों की गतिविधियों और उनकी वैचारिकी तक क्यों नहीं है?

चंद्रशेखर बाहर से भले ही भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की आलोचना करें और उनके विरूद्ध बयान दें किंतु वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध उनके चुनाव लड़ने की घोषणा से वह भाजपा का मोहरा बनते दिखायी दे रहे हैं. चंद्रशेखर अभी युवा हैं और उनके अंदर युवोचित भावुकता भी है. इसके साथ ही उनके अंदर अपने समाज के लिए कुछ करने का उत्साह और जुनून भी दिखता है. समाज को ऐसे उत्साही युवाओं की बहुत आवश्यकता है. समाज को समानता के अधिकार के प्रति जागरूक बनाने और शोषण का प्रतिकार करने हेतु प्रेरित करने के लिए यह आवश्यक है कि समाज के बीच रहकर सामाजिक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी जाए. राजनीति आंदोलनधर्मी चेतना को सोख लेती है और अपनी पेचीदगियों में उलझाकर आंदोलन से अलग कर लेती है. चंद्रशेखर राजनीति की पेचीदगियाँ शायद उतनी अच्छी तरह से अभी नहीं समझते हों. उनके जैसे क्रांतिकारी और ऊर्जावान युवक को अपने अंदर की आग को मरने या बुझने नहीं देना चाहिए. उनको उन लोगों से सीखना चाहिए जो राजनीति में आने से पहले बहुत क्रांतिकारी थे, किंतु राजनीति में आने के कुछ वर्षों के अंदर ही उनकी आंदोलनधर्मिता शांत हो गयी. राजनीति में आने की जल्दबाज़ी से उनको बचना चाहिए था.

यदि चंद्रशेखर अपनी घोषणा पर अमल करते हुए वाराणसी से नरेंद्र मोदी के विरूद्ध लोक सभा का चुनाव लड़ते हैं और सपा-बसपा गठबंधन के साथ मिलकर लड़ने के बजाए भीम आर्मी के बैनर के साथ लड़ते हैं तो वह मोदी को हराने का नहीं अपितु अप्रत्यक्ष रूप से उनको जिताने का काम ही करेंगे. क्योंकि उनको दलित समाज का वही वोट मिलेगा जो सपा-बसपा गठबंधन को मिलना सम्भावित है. ऐसे समय में जब दलित-पिछड़ा वर्ग अपने हितों के प्रतिकूल काम करने वाली भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेंकने पर आमादा हैं और सपा-बसपा गठबंधन भाजपा को कड़ी चुनौती देता दिखायी दे रहा है, चंद्रशेखर ‘रावण’ द्वारा अलग से चुनाव लड़ने से उनको भले ही कुछ लाभ मिल जाए किंतु भाजपा विरोधी बहुजन समाज की चेतना को बहुत बड़ा झटका लग सकता है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मायावती की राजनीतिकि दिशा और मूल्य बिलकुल सही हैं, अपितु मायावती के नेतृत्व में सपा-बसपा गठबंधन आज के समय में बहुजन समाज की आवश्यकता और मांग है.

पिछले समय के दौरान पहले अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न निवारण एक्ट और फिर विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्थानों में 200 पवाइंट रोस्टर को समाप्त कर विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर लागू किए जाने के बाद उस निर्णय को निरस्त कराने के लिए देश के बहुजन समाज को सड़कों पर उतरकर विशाल प्रदर्शन और आंदोलन करना पड़ा. इससे, दलित-बहुजन समाज में भारतीय जनता पार्टी की नकारात्मक छवि बनी है. भाजपा से दलित-बहुजन समाज का न केवल मोह भंग हुआ है, बल्कि दलित-बहुजन विरोधी कार्यों के लिए सबक़ सिखाने के लिए वह हर हाल में भाजपा को हराना चाहता है. निस्सन्देह, चंद्रशेखर उभरते हुए दलित नायक हैं. युवावर्ग को उनका लड़ाकू अन्दाज़ प्रभावित करता है. यद्यपि वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए वह नरेंद्र मोदी को हराने की बात कर रहे हैं, किंतु यदि सपा-बसपा गठबंधन के साथ न मिलकर उनके विरूद्ध चुनावी मैदान में उतरते हैं तो ऐसा न हो कि नायक बनते-बनते वह दलित समाज के खलनायक बन जाएं.

जयप्रकाश कर्दम

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गंगा यात्रा का आगाज कर प्रियंका गांधी करेंगी ‘बोट पे चर्चा’, छात्रों से करेंगी बात

कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा सोमवार से यूपी के प्रयागराज से गंगा यात्रा के जरिए अपने चुनावी मिशन का आगाज करेंगी. प्रियंका यहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ वाराणसी जाएंगी. अपनी पहली चुनावी यात्रा में बीजेपी को घेरने के लिए वह पीएम मोदी के ‘चाय पे चर्चा’ की तर्ज पर ‘बोट पे चर्चा’ का आगाज करेंगी. इसके जरिए वह प्रयागराज के छात्रों के शिष्टमंडल से बात करेंगी. प्रयागराज से वाराणसी तक चुनाव यात्रा को ‘सांची बात, प्रियंका के साथ’ नाम दिया है. प्रियंका रविवार शाम को ही प्रयागराज पहुंच गईं जहां उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के पैतृक आवास आनंद भवन का दौरा किया.

प्रियंका के तय कार्यक्रम के अनुसार, 18 मार्च को वह सुबह साढ़े नौ बजे मनैया पहुंचेंगी. इसके बाद वह नाव की सवारी करते हुए यात्रा की शुरुआत करेंगी. वह मनैया से सीतामढ़ी तक स्टीमर से यात्रा करेंगी और फिर सीतामढ़ी में ही रात्रि विश्राम करेंगी. संगम के पास छतनाग की बजाय अब प्रियंका मनैया से स्पेशल स्टीमर की सवारी कर यात्रा करेंगी. मनैया निषादों द्वारा बसाया गया गांव है, जो संगम से 10 किमी दूर है.

मनैया से यात्रा शुरू करने से पहले प्रियंका इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक समूह से बात करेंगी. यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के उपाध्यक्ष अखिलेश यादव ने बताया, ‘मैंने उन्हें यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था लेकिन उनके बिजी शेड्यूल की वजह से अब 15 छात्रों का समूह उनसे नाव पर बातचीत करेगा.’

मनैया से यात्रा शुरू करके प्रियंका दमदमा की ओर जाएंगी. यह गांव गंगा के बांये तट पर स्थित है. वह यहां घाट पर गांव के लोगों से मुलाकात करेंगी. 12 बजे के करीब वह सिरसा गांव के तट पर पहुंचकर गांव का दौरा करेंगी. यहां वह पुलवामा हमले में शहीद महेश कुमार के परिवार से भी मुलाकात करेंगी. इसके बाद प्रियंका अपनी यात्रा की शुरुआत करके हंडिया के लक्षागृह पहुंचेंगी जहां वह स्थानीय लोगों को संबोधित करेंगी.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, दुर्योधन ने कुंती और उनके पुत्रों को मारने की कोशिश की थी. यहां से वह मांडा की ओर जाएंगी और दो बजे वहां पहुंचकर वह स्थानीय लोगों से बातचीत के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी. इसके बाद वह सीतामढ़ी जाएंगी, यह जगह सीता से जुड़ी बताई जाती है. प्रियंका इसी जगह पर रात में विश्राम करेंगी. बता दें कि 3 दिन के दौरे पर प्रियंका प्रयागराज से मिर्जापुर, जौनपुर होते हुए वाराणसी जाएंगी. 20 मार्च को प्रियंका वाराणसी में होंगी. इस दौरान वह गंगा की बदहाली पर पीएम मोदी को घेरेंगी.

श्रोत- नवभारत टाइम्स

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पणजी में होगा पर्रिकर का अंतिम संस्कार, राजकीय सम्मान से विदाई

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पणजी। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का रविवार को निधन हो गया. वह अग्नाशय के कैंसर से जूझ रहे थे. पर्रिकर के निधन के बाद केंद्र सरकार ने 18 मार्च को राष्ट्रीय शोक का ऐलान कर दिया है. सोमवार को सुबह 11 बजे हुई कैबिनेट बैठक में पर्रिकर को श्रद्धांजलि दी गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैबिनेट की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर्रिकर को श्रद्धांजलि देने गोवा जाएंगे. वहीं, गोवा में 18 मार्च से 24 मार्च तक 7 दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया है. इस दौरान पूरे प्रदेश में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा.

सुबह 9.30 बजे से 10.30 बजे पणजी में स्थित भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर में पर्रिकर के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया. इसके बाद पर्रिकर के पार्थिव शरीर को कला अकादमी लाया गया, जहां पर शाम 4.00 बजे तक आम लोग अपने चहेते नेता को श्रद्धांजलि दे सकेंगे. मीरामार में शाम 5 बजे अंतिम संस्कार किया जाएगा. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह शाम को पर्रिकर के अंतिम संस्कार में शामिल होंगे.

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मनोहर पर्रिकर के दोनों बेटे राजनीति से दूर, जानिए क्या करते हैं

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नई दिल्ली। गोवा के सीएम मनोहर पर्रिकर के निधन से पूरे देश में शोक है. पर्रिकर राजनीति में अपनी सादगीपूर्ण जीवनशैली और सरल व्यवहार के लिए जाने जाते थे. सिर्फ बीजेपी ही नहीं बाकी दलों के नेता भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते. मनोहर पर्रिकर सियासत में लंबे समय से थे बल्कि गोवा की सियासत की धुरी माने जाने लगे थे. हालांकि सियासत में उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को आगे नहीं बढ़ाया. आपको जानकर एक बार आश्चर्य हो सकता है कि मनोहर पर्रिकर के दो बेटों में किसी का भी राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है.

उनके बेटों का नाम उत्पल और अभिजीत है. उत्पल अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं. जबकि, अभिजीत बिजनेसमैन हैं. उत्पल की पत्नी उमा सरदेसाई हैं. दोनों की लव मैरिज हुई थी. उमा ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पढ़ाई की है. दोनों का एक बेटा है, जिसका नाम ध्रुव है. कुछ दिनों पहले ही उत्पल ने कहा था कि राजनीतिक पद कड़ी मेहनत से मिलती है. इसे कोई भी पुश्तैनी जागीर समझकर हासिल नहीं कर सकता. दूसरे बेटे अभिजीत बिजनेसमैन हैं. उनकी शादी उनकी पुरानी दोस्त साई से 2013 में हुई. उनकी पत्नी साई फार्मासिस्ट हैं.

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