“बहुजन मीडिया के कंधो पर बड़ी ज़िम्मेदारी”

 पिछले 5 सालों में जिस तरह से बहुजन मीडिया ने ज़बरदस्त प्रगति की है वो वाकई प्रशंसनीय है. असल में ये समय की मांग भी थी क्यूंकि जिस तरह से मनुवादी ताकतों ने टीवी सैटलाइट मीडिया पर कब्ज़ा कर लिया है उससे पुरे अम्बेडकरवादी आन्दोलन के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गयीं हैं. जहाँ एक तरफ बहुजन मीडिया की पहुँच बढती जा रही है वहीं अभी भी इस बात को नकारा नहीं जा सकता की विमर्श और विचार को आज भी काफी हद तक टीवी मीडिया ही निर्धारित कर रहा है. लेकिन इस बात में दो राय नहीं की बहुजन मीडिया के सशक्त होने से समाज में नई जाग्रति आई है. टीवी मीडिया दो तरह से इस बहुजन आन्दोलन का नुक्सान करता था. एक तो वह जातीय उत्पीड़न और अत्याचार की ख़बरों को पूरी तरह दरकिनार करके उन्हें राष्ट्रीय प्रशन नहीं बनने देता था वहीँ दूसरी तरफ मनुवादी ताकतों को लाभ पहुंचाने के लिए सच को झूठ और झूठ को सच बना कर पेश करता था. बहुजन मीडिया के मोर्चा संभालने के बाद से इस समाज की निर्भरता टीवी न्यूज़ चैनल पर ख़त्म हो चुकी है. अत्याचार, उत्पीड़न के मामले इन यूट्यूब और फेसबुक चैनलों की वजह से आज दबाये नहीं जा सकते और ये मुद्दे सरकार के सामने चुनौती बनकर उभरते हैं. दूसरा, बहुजन मीडिया के निरंतर प्रयासों के चलते इन वर्गों को ये समझ आ गया की टीवी किस तरह से इस बहुजन आन्दोलन को पटरी से उतारने में रात दिन लगा रहता था. समाज ने एक स्वर से इस बात का संकप लिया की टीवी न्यूज़ चैनल को बहिष्कार करने से समाज इस षड्यंत्र से बच सकता है. और ऐसा इसलिए भी होना चाहिए क्यूंकि मनुवादी मीडिया ने भी इन समाज के कार्यक्रमों, इनके मुद्दो और बहुजन राजनैतिक दलों का काफी हद तक बहिष्कार कर रखा है.

बहुजन मीडिया ने अपने कंधो पर बड़ी ज़िम्मेदारी ले रखी है. हालाकि अभी भी बहुजन मीडिया अपने शैशव काल में है और अभी असल ताकत का प्रदर्शन करना बाकी है. इस बात को नकारा नहीं जा सकता अभी भी हमारा बहुजन समाज का एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है और हर हाथ में अभी समार्टफ़ोन नहीं आया है. इन्टरनेट की उपलब्धता दूर दराज़ के इलाकों में उतनी सरल नहीं है. यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर के बारे में जानकारी का भी अभाव है. फिर भी इन सब चुनौतियों के बावजूद समाज के जागरूक और जुझारू युवाओं ने केवल अपने दम पर ये बीड़ा उठाया हुआ है. एक चैनल के संपादक के रूप में मैंआपको ये बता सकता हूँ की बहुजन मीडिया के सामने ज़बरदस्त आर्थिक चुनौतियां रहती है क्यूंकि जिनसे लोहा लेना है वो अरबो रूपये के साजोसमान और स्टूडियों में बैठकर काम करते हैं. समाज इस बात को और बहुजन मीडिया की अह्मियात को धीरे धीरे समझ रहा है.

आने वाला समय टीवी का नहीं, बल्कि स्मार्ट फ़ोन का है. अभी जैसे जैसे समय बीतता जायेगा और स्मार्ट फ़ोन हर हाथ की अनिवार्यता बनता जायेगा, इन्टरनेट और बेहतर होता जायेगा और जिस दिन 5जी अपनी असल स्पीड के साथ देश में शुरू हो जायेगा उस दिन टीवी मीडिया को पूरी टक्कर देगा बहुजन मीडिया. तब तक संगठित रहिये, शिक्षित बनिए और संघर्ष करिए. बहुजन मीडिया को समझिये और प्रत्येक बहुजन को समझाइये.

जय भीम जय भारत वैभव कुमार, मुख्य संपादक दलित न्यूज़ नेटवर्क

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Delhi University: कैंपस प्‍लेसमेंट 2 अप्रैल से शुरू, PG और ग्रेजुएशन के छात्रों का होगा चयन

नई दिल्ली। दिल्‍ली यूनिवर्स‍िटी में एक बार फिर कैंपस सेलेक्‍शन का दौर शुरू होने जा रहा है. 2 अप्रैल 2019 से दिल्‍ली यूनिवर्स‍िटी में कैंपस प्‍लेसमेंट की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. इससे पहले फरवरी में कैंपस सेलेक्‍शन हुए थे, जिसमें विप्रो और एमेजॉन ने कई छात्रों को नौकरियों के ऑफर दिए थे. विप्रो ने 69 छात्रों को नौकरी का मौका दिया, वहीं एमेजॉन ने 43 छात्रों का प्‍लेसमेंट किया.

हालांकि इस बार प्‍लेसमेंट प्रक्रिया में सिर्फ एक ही कंपनी शामिल हो रही है. पर उम्‍मीद की जा रही है कि कुछ अन्‍य कंपनियां भी इसमें हिस्‍सा ले सकती हैं. इस बार फरीदाबाद से शाही एक्‍सपोर्ट कंपनी कैंपस आ रही है.

शाही एक्‍सपोर्ट फाइनेंस और अकाउंट्स और मैनेजमेंट के लिए हायरिंग करेगी. BSc, BSc maths, BSc stat., गणित और अर्थशास्‍त्र, बिजनेस स्‍टडीज और फाइनेंशियल और इनवेस्‍टमेंट एनालिसिस के छात्रों को प्‍लेसमेंट में हिस्‍सा लेने का मौका मिलेगा. इसके अलावा MA अर्थशास्‍त्र और MA-MSc Maths के छात्र भी कैंपस प्‍लेसमेंट में हिस्‍सा ले सकेंगे.

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पुणे में ईंट भट्टा मालिक ने मजदूर को मानव मल खिलाया

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पुणे। पुलिस ने एक दलित को जबरन मानव मल खिलाने के आरोप में एक ईंट भट्टा मालिक को गिरफ्तार किया है. पीड़ित अनुसूचित जाति के मातंग समुदाय से आता है, जो ईंट भट्‌टा मालिक के यहां पिछले दो साल से काम कर रहा था. जांच में यह भी सामने आया है कि पीड़ित ने आरोपी से 50 हजार रुपए का ऋण ले रखा था.

पुलिस ने मुल्शी तालुका के जम्भे गांव से आरोपी को संदीप पवार (42) को गिरफ्तार किया है. आरोप है कि गिरफ्तार ईंट भट्टा मालिक ने छोटी सी बात के लिए पीड़ित को जबरन मानव मल खिलाया. हिंजेवाड़ी पुलिस के अनुसार, पीड़ित सुनील अनिल पावले (22) अनुसूचित जाति के मातंग सुमदाय का है. वह और उसका परिवार पिछले दो सालों से पवार के ईंट भट्टा में काम करता है और वहीं रहता आया है.

पावले के मुताबिक, घटना बुधवार (13 मार्च) दोपहर करीब दो बजे की है. वह और उसके पिता अनिल, मां सविता और दादा-दादी दोपहर का खाना खाने के बाद ईंट भट्टा पर बैठे थे. इसी दौरान पवार वहां पहुंचा और उनसे अपना काम शुरू करने को कहा.

इस पर पीड़ित ने कहा- “हमने बस अभी खाना खत्म किया है. कुछ देर में काम शुरू कर देंगे.

इस पर भट्टा मालिक नाराज हो गया और उसकी और उसकी पत्नी के अलावा पिता की पिटाई कर दी. आरोपी मौके पर गाली-गलौज करता रहा. यहीं नहीं रुका. उसने मानव मल मंगवाया और हथियार के बल पर जबरन खाने को मजबूर किया. जब ये सब हुआ तो भट्टा पर काम करने वाले कई मजदूर भी वहां खड़े थे. लेकिन, किसी ने मदद नहीं की.”

पावले का परिवार मूल रूप से उस्मानाबाद से संबंध रखता है. अब यह परिवार कई सालों से पुणे में रह रहा है. पीड़ित के मुताबिक, उसने भट्टा मालिक पवार से पचास हजार रुपए का ऋण लिया है. ऋण का अधिकांश हिस्सा भी चुका भी दिया है. इसके बाद भी उसने उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया. हालांकि, पवार और उसके परिवार के सदस्यों ने आरोप से इनकार किया है.

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क्राइस्टचर्च मस्जिद हमला: गुजरात के युवक की मौत, 9 भारतीय अब तक लापता

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न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमले में एक भारतीय की मौत हो गई है. मरने वाले का नाम जुनैद कारा है और वह गुजरात के नवसारी का रहने वाला था. पिछले कई साल से वह न्यूजीलैंड में अपने परिवार के साथ रह रहा था और वहां स्टोर चलाता है. शुक्रवार को वह भी मस्जिद में नमाज अदा करने गया था. इस दौरान हमलावर ने उसे गोली मार दी.

इस बीच शनिवार को आरोपी ब्रेंटन हैरिसन टारंट को कोर्ट में पेश किया गया. उसे बिना किसी दलील सुने 5 अप्रैल तक हिरासत में भेज दिया गया. बता दें, ब्रेंटन ने दो मस्जिदों पर गोलीबारी की थी और लाइव वीडियो बनाते हुए 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. ब्रेंटन हैरिसन की पहचान ऑस्ट्रेलियाई नागरिक के रूप में हुई थी.

हमले को आरोपी

हथकड़ी और सफेद जेल शर्ट पहने हुए ऑस्ट्रेलियाई मूल के पूर्व फिटनेस प्रशिक्षक ब्रेंटन हैरिसन टारंट ने जमानत की अपील नहीं की. इस कारण उसे 5 अप्रैल तक हिरासत में भेज दिया गया. शुक्रवार को क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में गोलीबारी हुई थी. इस दौरान 49 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इस घटना के लिए ब्रेंटन को जिम्मेदार बताया जा रहा है.

न्यूजीलैंड की पीएम ने इसे आतंकी हमला बताया

प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था कि इसमें प्रभावित लोग या तो प्रवासी हैं या फिर शरणार्थी हैं. यह स्पष्ट है कि इसे अब केवल आतंकवादी हमला ही करार दिया जा सकता है. हम जितना जानते हैं, ऐसा लगता है कि यह पूर्व नियोजित था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले में मारे गए लोगों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट की और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की. मोदी ने इस कठिन घड़ी में न्यूजीलैंड के मित्रवत लोगों के प्रति पूरी एकजुटता व्यक्त कीप्रधानमंत्री ने जोर दिया कि भारत आतंकवाद के हर स्वरूप और ऐसे कार्यों का समर्थन देने वालों की कड़ी निंदा करता है.

भारत, न्यूजीलैंड सरकार के साथ

शुक्रवार देर रात विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया, ‘‘हम क्राइस्टचर्च में धर्मस्थलों पर हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा करते हैं. हमारी संवेदनाएं प्रियजनों को खोने वालों के साथ हैं. हमारी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं पीड़ित परिवारों के साथ हैं. दुख की इस घड़ी में भारत न्यूजीलैंड की सरकार और जनता के साथ एकजुटता से खड़ा है’’

9 भारतीयों के लापता होने की खबर

न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त संजीव कोहली ने कहा कि ताजा आंकड़ों के मुताबिक कई सूत्रों से मिली जानकारी के बाद पता चल रहा है कि भारतीय नागरिकता/मूल के 9 व्यक्ति लापता हैं. इस बावत आधिकारिक सूचना का इंतजार है. उन्होंने कहा कि मानवता के खिलाफ ये गंभीर अपराध है. हमारी प्रार्थनाएं उन परिवार वालों के साथ हैं जिन्होंने इस हादसे में अपने परिवार वालों को खोया है.

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दक्षिण में बसपा और जन सेना पार्टी का गठबंधन तय

गठबंधन के बारे में मीडिया को संबोधित करते पवन कल्याण और मायावती (फोटो क्रेडिट- ANI)

नयी दिल्ली। 17वीं लोकसभा चुनाव को लेकर चल रही सरगर्मी के बीच बहुजन समाज पार्टी तमाम राज्यों में अलग-अलग राजनैतिक दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरने को तैयार है. दक्षिण में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य में बसपा ने जन सेना पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर साउथ के सुपरस्टार और जन सेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण और बसपा प्रमुख मायावती के बीच गठबंधन को लेकर आखिरी बात हो गई है.

मान्यवर कांशीराम जी की जयंती के मौके पर इस गठबंधन की घोषणा कर दी गई. दोनों नेताओं ने एक साथ मीडिया के सामने आकर गठबंधन का ऐलान किया. इस दौरान पवन कल्याण ने कहा कि वे बहनजी को देश का प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहेंगे. तो वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने साफ किया कि वो 3 और 4 अप्रैल को आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में रैली को संबोधित करने जा रही हैं.

चंद्रशेखर का मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान, अखिलेश पर किए कई वार

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दिल्ली के जंतर मंतर पर 15 मार्च को भीम आर्मी द्वारा आयोजित हुंकार रैली में चंद्रशेखर

नयी दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने मान्यवर कांशीराम के जन्मदिन के मौके पर दिल्ली के जंतर मंतर पर बहुजन हुंकार रैली का आयोजन किया. इस दौरान उन्होंने साफ किया कि वो संत शिरोमणि रविदास की नगरी काशी यानि बनारस से पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरेंगे. उन्होंने इशारों में बसपा-सपा गठबंधन से समर्थन देने की भी अपील की. चंद्रशेखर ने कहा कि यूपी की 79 सीटों पर भीम आर्मी गठबंधन को समर्थन दे रही है, ऐसे में उसे एक सीट पर उन्हें समर्थन देना चाहिए. हालांकि अपने पूरे भाषण के दौरान चंद्रशेखर ने एक बार भी बहुजन समाज पार्टी और उसकी अध्यक्ष मायावती का नाम नहीं लिया.

इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी पर भी हमला बोला और कहा कि मोदी को दिल्ली की गद्दी नहीं छूने देंगे. खुद को कई लोगों द्वारा एजेंट कहने से भड़के चंद्रशेखर ने कहा कि सब जानते हैं कि कौन किसका एजेंट है. उन्होंने कहा कि मैं बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम जी के सपने को पूरा करना चाहता हूं. मेरा लक्ष्य दिल्ली में लाल किले पर नीला झंडा फहराना है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से ऐलान किया कि वो बनारस में पहुंच कर उनकी मदद करें. उन्होंने बहुजन समाज से अपील किया कि वो देश भर में भाजपा को हराने वाला उम्मीदवार को वोट दें.

इस दौरान भीम आर्मी प्रमुख ने अखिलेश यादव पर जमकर निशाना साधा. आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दस प्रतिशत आरक्षण का विरोध किसी ने नहीं किया. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने संसद में रिजर्वेशन इन प्रोमोशन का बिल फरवाया. उनकी सरकार ने 58 हजार दलित कर्मचारियों का डिमोशन किया. उन्हें इस मामले में अपना रुख साफ करना चाहिए.

कार्यक्रम में मान्यवर कांशीराम जी की बड़ी बहन को भी आमंत्रित किया गया था. चंद्रशेखर ने कहा कि मान्यवर के परिवार ने बहुत कुर्बानी दी है, उनकी बड़ी बहन को संसद में भेज कर उसका कर्ज उतारना चाहिए. हालांकि अपने पूरे भाषण के दौरान चंद्रशेखर ने प्रियंका गांधी से मुलाकात का कोई जिक्र नहीं किया.

रैली में मंच पर भीम आर्मी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे दद्दू प्रसाद, बामसेफ के अध्यक्ष वामन मेश्राम, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी मौजूद थे. रैली में देश के तमाम हिस्सों से शामिल होने के लिए युवा पहुंचे थे. खास बात यह देखने को मिली की रैली में 18 से 25 साल के युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी. अगर भीड़ के लिहाज से देखें तो इस रैली में 5 से 7 हजार लोगों ने हिस्सा लिया.

उत्तर भारत में सवर्ण वर्चस्व विरोधी बहुजन राजनीति के प्रणेता मान्यवर कांशीराम

बाबासाहब डा. अंबेडकर का मानना था कि भारत का इतिहास ब्राह्मण एवं बौद्ध संस्कृतियों के बीच संघर्ष का इतिहास है. 185 ई.पू. में ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध सम्राट बृहद्रथ की धोखे से हत्या किया तथा स्वयं राजा बन बैठा. इसने बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध भयंकर हिंसक अभियान छेड़ा. यहां तक कि बौद्ध भिक्षुओं का सिर काटकर लाने पर सोने की मुद्रायें पुरस्कार स्वरूप देने की राजज्ञा जारी किया. लेकिन केवल हिंसा और राजसत्ता पर अधिपत्य के बल पर बौद्ध संस्कृति को नष्ट करना संभव नहीं था. इसलिए ब्राह्मण धर्मग्रंथों की रचना की गयी. इन धर्मग्रंथों के माध्यम से बौद्ध संस्कृति के मूल्यों व जीवन पद्धति के विरुद्ध व्यापक प्रचार प्रसार किया गया तथा 11वीं व 12वीं सदी ई. तक आते-आते बौद्ध संस्कृति के साहित्य, इमारतें, स्तूप आदि को नष्ट कर दिया गया. लगभग 1000 वर्षों तक ब्राह्मण धर्मावलंबियों का बौद्ध भिक्षुओं तथा बौद्ध जनता के विरुद्ध रक्त रंजित अभियान चलता रहा. परिणामतः बौद्ध धर्म जिस धरती पर पैदा हुआ वहीं पर नष्ट कर दिया गया. मध्य काल में इस्लाम के आगमन एवं राजसत्ता पर इस्लाम के अनुयायियों के आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात् बौद्ध जनता को ब्राह्मणों के रक्तरंजित अभियान से थोड़ी राहत मिली लेकिन तब तक ब्राह्मणों का भारतीय समाज पर सामाजिक और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित हो चुका था और बौद्ध जनता शूद्र और अछूत के रूप में अपने स्वर्णिम अतीत को भूलकर अभिशप्त जीवन व्यतीत करने की आदी हो चुकी थी. फिर भी इस्लाम के आगमन तथा राजसत्ता पर ब्राह्मणों का आधिपत्य समाप्त होने के कारण बौद्ध संस्कृति के मूल्यों को स्थापित करने का आंदोलन प्रस्फुटित हुआ. संत रैदास तथा संत कबीर जैसे महापुरुष इसी दौर में पैदा हुए जिन्होंने ब्राह्मणों एवं ब्राह्मण धर्मग्रंथों को चुनौती दिया. इस आन्दोलन को तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने प्रभावहीन करने का भरपूर प्रयास किया. यूरोपीय पुनर्जागरण तथा अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् ब्राह्मणों की राजसत्ता पर पकड़ ढीली पड़ी लेकिन सामाजिक जीवन पर सांस्कृतिक वर्चस्व अभी भी कायम था.

आधुनिक भारत में महात्मा जोतिराव फुले ने इस तथ्य को रेखांकित किया है. गुलामगिरी की प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि ‘‘धर्म के नाम पर ब्राह्मण, शूद्र के किसी भी छोटे-बड़े काम में हस्तक्षेप करता है. घर, खेत-खलिहान या कोर्ट कचहरी कहीं भी जाये, ब्राह्मण वहां मौजूद होगा और किसी न किसी बड़े बहाने से वह अपपनी धूर्ततापूर्ण बुद्धि से उस शूद्र का जितना हो सके शोषण करेगा.’’ तथाकथित स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान डा. अंबेडकर ने ब्राह्मणों के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अछूतों के लिए विधायिका में पृथक निर्वाचक मंडल तथा दो मतों के अधिकार के साथ शिक्षा तथा सेवा क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग किया. गांधी को पृथक निर्वाचक मंडल और दो मतों का अधिकार स्वीकार्य नहीं था. इसलिए उन्होंने आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया फलस्वरूप पूना पैक्ट हुआ जिससे अछूतों की राजनीतिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाया. संविधान के मुख्य शिल्पकार होने के कारण डा. अंबेडकर, अछूतों सहित शूद्रों एवं महिलाओं को भी एक व्यक्ति एक मत तथा एक मत मूल्य दिलाने में सफल हुए. विधायिका, शिक्षा एवं सेवा क्षेत्र में अछूतों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी मिला तथा शूद्रों के लिए भविष्य में शिक्षा और सेवा क्षेत्र में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने हेतु अनुच्छेद 340 का प्रावधान किया गया. अर्थात लगभग 100 वर्षों के संघर्षों के पश्चात भारत की जनता पर 2000 वर्षों से स्थापित ब्राह्मणों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक वर्चस्व को तोड़ने का प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया. आधुनिक भारत में जोतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियाार रामास्वामी नायकर, डा. अंबेडकर के कार्यों तथा आंदोलन ने ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध धरातल तैयार किया जिसका प्रभाव भारत के पश्चिमी तथा दक्षिणी क्षेत्र में पड़ा भी लेकिन उत्तर भारत, जिसे ‘काउ बेल्ट’ कहते हैं, में ब्राह्मण वर्चस्व संविधान लागू होने के पश्चात भी जारी था. उत्तर भारत में जिस महापुरुष ने ब्राह्मण वर्चस्व को व्यवहारिक धरातल पर अर्थात् व्यवहारिक राजनीति में, सामाजिक जीवन में तथा सांस्कृतिक क्रियाकलापों में, चुनौती दी उस महापुरुष का नाम मान्यवर कांशीराम है.

मान्यवर कांशीराम ने 1984 में ‘बहुजन समाज पार्टी’ नामक राजनीतिक दल बनाकर भारतीय राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप प्रारंभ किया. इससे पूर्व कांशीराम ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति अर्थात् डी.एस.-4’ और ‘बैकवर्ड एंड माइनारिटीज कम्युनिटीज इम्प्लायज फेडरेशन अर्थात बामसेफ’ नामक सामाजिक संगठनों का सफल संचालन कर चुके थे. 15 मार्च 1934 में पंजाब प्रांत के गांव में खवासपुर में जन्मे कांशीराम ने 30 वर्ष की उम्र में 1964 में सरकारी नौकरी छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा था तथा लगभग 20 वर्षों के सक्रिय सामाजिक जीवन के पश्चात् 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने राजनीतिक दल का निर्माण किया. इन 20 वर्षों में कांशीराम ने रिपब्लिकन पार्टी से लेकर दलित पैंथर तक, लगभग सभी तरह के दलित आंदोलनों से संबंध रखा तथा समझने का प्रयास किया. उन्होंने महात्मा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज तथा डा. अंबेडकर के साहित्य का गहरा अध्ययन किया. वे पूरे देश में घूमते रहे. 1973 से ही दलित समाज के पढ़े-लिखे कर्मचारियों-अधिकारियों को जागरूक करने के उद्देश्य से उन्होंने पूरे देश में संगोष्ठियों का आयोजन किया. कहना न होगा कि 1973 से लेकर 1984 तक मान्यवर कांशीराम ने पूरे देश में एक वैचारिक आंदोलन खड़ा किया. इस आंदोलन का उद्देश्य भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति दलित तथा पिछड़े समाज को जागरूक करना था. इस लंबे वैचारिक अभियान ने न केवल सामाजिक व सांस्कृतिक जागरूकता पैदा किया बल्कि स्वयं कांशीराम भी अपनी वैचारिकी को परिपक्व और धारदार बनाने में सफल हुए. अपनी वैचारिकी एवं समझदारी को देश के सामने प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने ‘चमचा युग’ नामक पुस्तक 1982 में लिखा. इस पुस्तक में उन्होंने दलित-पिछड़ों के आंदोलन पर एक समालोचनात्मक दृष्टि डाली तथा अपने समय का मूल्यांकन किया. इस पुस्तक में उन्होंने कुछ मूलभूत तथ्यों को रेखांकित किया. जैसे-भारत की कुल जनसंख्या में 85 प्रतिशत लोग शोषित और उत्पीड़ित हैं और उनका नेता नहीं है. इस जनसंख्या में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग शामिल है. अनुसूचित जाति और जनजाति को संविधान में जो प्रतिनिधित्वव दिया गया है, संयुक्त निर्वाचक मंडल के कारण वह हिंदुओं का औजार अर्थात् चमचा बनकर रह गया है. वह अपने समाज का नेतृत्व करने में समर्थ नहीं है. अन्य पिछड़ी जातियों के लिए संविधान अनुच्छेद 340 का प्रावधान किया गया. इसके अंतर्गत काका कालेलकर आयोग तथा मंडल आयोग बनाये गये लेकिन अभी तक (1982) इन रिपोर्टों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. परिणामस्वरूपप 52 प्रतिशत जनसंख्या वाला अन्य पिछड़ा वर्ग राजनैतिक रूप से नेतृत्वविहिन है. उस समय हरियाणा विधान सभा की 90 सीटों में केवल एक विधायक अन्य पिछड़े वर्ग का था. 17 प्रतिशत से अधिक मुसलमान शासक जातियों, सवर्ण हिंदुओं की दया पर निर्भर हैं सांप्रदायिक दंगों का डर उन्हें सदैव सताता रहता है. ईसाई बेबस घिसट रहे हैं. सिक्ख सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बौद्ध तो अभी पहचान भी नहीं बना पाये हैं. यह परिस्थितियां स्वतः प्रमाणित करती है कि 85 प्रतिशत जनता राजनैतिक रूप से नेतृत्वविहिन है. राष्ट्रीय स्तर के 07 राजनैतिक दल तथा राज्य व क्षेत्रीय स्तर की अनेक पार्टियां शासक जातियों के कब्जे में है. वे नहीं चाहती कि इन 85 प्रतिशत शोषित उत्पीड़ित जनता के बीच से समर्थ और सक्षम नेतृत्व पैदा हो.

इसी पुस्तक में मान्यवर कांशीराम ने अनुसुचित जाति एवं जनजाति में एक छोटा ही सही लेकिन संभ्रांत वर्ग के उदय को रेखांकित किया है. राजनैतिक आरक्षण तथा नौकरियों में आरक्षण से कुछ लोगों की आर्थिक हैसियत सम्मानजनक जीवन जीने लायक हो गयी है लेकिन जाति के कारण उनको वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं. परिणामतः वे घुट-घुट कर जीवन जीने पर मजबूर हैं. उनमें कुछ लोग अभिजात्य व्यवसायिकता के शिकार भी हो चुके हैं. इनकी संख्या 20 लाख से अधिक हैं. इन्हीं पढ़े-लिखे लोगों पर डा. अंबेडकर ने अपने आंदोन का दायित्व सौंपा था लेकिन आज वे खुद अपने समाज से कटे हुए हैं. शेष समाज अपने जीवन यापन के लिए जमींदारों पर बहुत अधिक निर्भर है. उनके लिए उत्पीड़न से लड़ना संभव नहीं है, क्योंकि इसका विकल्प भुखमरी है. स्वतंत्रता के लिए थोड़ा सा आग्रह भी उन्हें बेरोजगार कर सकता है; जिससे वे डरते हैं. केवल शोषणकारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव ही उन्हें मुक्त कर सकता है. शासक जाति की सरकारों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. उत्पीड़ित ग्रामवासी अपने बूते पर बदलाव नहीं कर सकता तथा जो उत्पीड़ित संभ्रांत वर्ग कुछ करने की स्थिति में है व अधिसंख्य लोगों से अलग हो गया है. शहरी इलाकों की मलीन बस्तियां गांव में सामंत जमींदारों के सताये हुए लोग आकर रह रहे हैं यहां भी ये शोषण और उत्पीड़न के शिकार है.

इन 85 प्रतिशत शोषित पीड़ित जनता के बरक्स 15 प्रतिशत शासक जातियों की स्थिति की तुलना करने पर मामला और स्पष्ट होता है. कांशीराम का स्पष्ट मानना है कि अंग्रेजों के जाने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों को तो उनका हिस्सा मिला लेकिन अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों का हिस्सा सवर्णों ने विशेषकर ब्राह्मणों ने हड़प लिया. कांशीराम रेखांकित करते हैं कि ‘‘मंडल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल आबादी में अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिशत 52 है. दूसरी ओर ब्राह्मणों और क्षत्रियों की संख्या 8 व 9 प्रतिशत है. किन्तु वर्तमान संसद में, इन 8 से 9 प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व 52 प्रतिशत सांसद करते हैं, जबकि 52 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व 8 से 9 सांसद करते हैं. एक संसदीय लोकतंत्र में इस तरह के प्रतिनिधित्व से भारी अंतर पड़ता है. ब्राह्मणों की नौकरशाही पर कब्जे का जिक्र भी कांशीराम इस पुस्तक में करते हैं. उस समय केन्द्रीय कैबिनेट में 53 प्रतिशत ब्राह्मण, आई.ए.एस. अधिकारियों में 61 प्रतिशत ब्राह्मण भरे पड़े थे.

समकालीन परिस्थितियों के विश्लेषण के पश्चात कांशीराम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भले ही भारत 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्र हो गया तथा 26 जनवरी 1950 से लोकतांत्रिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, गणतांत्रिक राज्य के रूप में स्थापित हो गया है लेकिन अभी भी राज्य मशीनरी पर सवर्ण जातियों विशेषकर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित है. इन सवर्ण जातियों का हित अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों के शोषण एवं उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. अतः शासक जातियां कभी नहीं चाहती कि शोषित जातियों के अंदर से आत्मनिर्भर एवं प्रभावकारी राजनैतिक नेतृत्व उभरे. शोषित जातियों को अपने बीच से समर्थ एवं सक्षम नेतृत्व स्वयं पैदा करना होगा. एक ऐसा नेतृत्व जो अत्यधिक सक्षम, कल्पनाशील, रुचिशील, परिश्रमी और ज्ञानी हो तथा साथ ही साथ उसमें दूरदृष्टि धैर्य और लगन भी होनी चाहिए. यही नहीं, नेतृत्व को समझदार भी होना चाहिए उसमें उचित समझ का बोध और इस बड़े कार्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य सभी प्रासंगिक बोध भी होने चाहिए.

कांशीराम का मानना था कि सक्षम समाज ही सक्षम नेतृत्व पैदा कर सकता है. इसलिए उन्होंने बहुजन समाज बनाने की अवधारणा प्रस्तुत किया. यह समाज केवल अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों एवं अल्पसंख्यक समुदायों का गठबंधन भर नहीं होगा. बल्कि यह बहुजन चेतना से लैस होगा. ऐसा करने के लिए कांशीराम ने बाबासाहब अंबेडकर के तीन मंत्रों ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो एवं संघर्ष करो’ का सहारा लिया. उन्होंने कहा कि बहुजन समाज को अपने अधिकारों के प्रति व्यापक रूप से जागरूक करना पड़ेगा. इसी जागरूकता के क्रम में समाज को संगठित करने एवं संघर्ष के लिए तैयार का भी कार्य करना पड़ेगा. इस कार्य की जिम्मेदारी उन्होंने बहुजन समाज के शिक्षित एवं नौकरी पेशा वाले लोगों पर डाली और बामसेफ का निर्माण किया. उन्होंने कहा कि नौकरीपेशा वर्ग अपने उत्पीड़ित और शोषित समाज का कर्जदार है अब समय आ गया है कि यह वर्ग समाज को कर्ज चुकाये. उन्होंने पे बैक टू सोसायटी का नारा दिया. सक्षम और समर्थ नेतृत्व के लिए नेतृत्वकारी विचारधारा का होना भी आवश्यक था. इसके लिए मान्यवर कांशीराम ने महात्मा फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार रामास्वमी नायकर, नारायणा गुरु और डा. अंबेडकर के विचारों और कार्यों को आधार बनाया. उन्होंने फुले के सिद्धांत, ‘आर्य बाहर से भारत में आये और यहां के मूलनिवासियों को गुलाम बनाया’ को सामाजिक विश्लेषण का आधार बनाया. वे मानते हैं कि आर्यों के वंशज आज भी मूल निवासियों पर शासर कर रहे हैं. इस देश में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में जिसके मत ज्यादा होते हैं उसकी सरकार होती है. बहुजन समाज का 85 प्रतिशत मत है 85 प्रतिशत पर 15 प्रतिशत आर्य पुत्र शासन कर रहे हैं. इस आधार पर उन्होंने अपनी वैचारिकी विकसित की. इस वैचारिकी का मूल उद्देश्य बहुजन समाज की राजनीतिक चेतना बढ़ाना था.

कांशीराम का उद्देश्य मात्र राजनैतिक सत्ता की चाभी पर बहुजन समाज का कब्जा नहीं था. राजनैतिक सत्ता तो सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र है. मूल उद्देश्य सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन है जिससे भारत में संविधान के अनुरूप नये समाज का निर्माण हो सके. वे कहते हैं कि ‘हम सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए राजनैतिक शक्ति का इस्तेमाल करेंगे और परंपराओं, संस्कृतियों, व्यवसायों, धर्मों, जातियों तथा भाषाओं की विविधता को आत्मसात करते हुए हम सभी नागरिकों के प्रति आदर और सम्मान के आधार पर समाज को संगठित करेंगे.’ यह तभी संभव होगा जब राजसत्ता की चाभी बहुजन समाज के हाथ में हो. कांशीराम की सूझबूझ व नेतृत्व क्षमता के कारण ‘बहुजन समाज पार्टी’ को आंशिक सफलता मिली लेकिन इसका प्रभाव व्यापक था. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस और भाजपा लम्बे समय तक सत्ता से बाहर हो गये. प्रशासन तथा शासन में सवर्णों का वर्चस्व भी कुछ हद तक कमजोर पड़ा. लेकिन जल्दी ही बसपा ने अपने मूल एजेंडे ‘बहुजन समाज का निर्माण’ छोड़ दिया. परिणामस्वरूप 14 वर्षों के पश्चात उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा की वापसी हो गयी. मान्यवर कांशीराम अब हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनके कार्य और विचार धरोहर के रूप में हमारे पास हैं. यदि हम उनकी धरोहर को बचा पाये तो भविष्य में सवर्णों का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वर्चस्व टूट सकता है तथा भारत में सच्चे अर्थों में लोकतंत्र स्थापित हो सकता है.

डॉ. अलख निरंजन Read it also-लोकसभा चुनाव 2019: PM मोदी के खिलाफ खुद ताल ठोकेंगे भीम आर्मी के चंद्रशेखर!  

भीम आर्मी की आज दिल्ली में हुंकार रैली, शामिल होंगी कांशीराम की बहन

नई दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद शुक्रवार दिल्ली के बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती पर जंतर-मंतर से हुंकार भरेंगे. गुरुवार को मेरठ के आनंद हास्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद चंद्रशेखर दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. वो आज दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली में शिरकत करेंगे.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलित युवाओं के बीच तेजी से अपनी पहचान बनाने वाले भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुंकार भरेंगे. शुक्रवार को बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती है. बताया जा रहा है कि इस रैली में कांशीराम की बहन भी शामिल हो सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो चंद्रशेखर और मायावती के बीच दलितों की राजनीति करने के मुद्दे पर खींचतान बढ़ सकती है. बता दें कि मायावती कांशीराम की राजनीतिक को आगे बढ़ाने का दावा करती रही हैं.

गुरुवार को मेरठ के आनंद हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद चंद्रशेखर दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. भीम आर्मी प्रमुख ने गुरुवार को ही मेरठ से ऐलान कर दिया था कि वो शुक्रवार को दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली में हर हाल में शामिल होंगे. संगठन का दावा है कि उनकी अभी तक की सबसे बड़ी रैली शुक्रवार होगी. चंद्रशेखर के जेल से छूटने के बाद यह पहली बड़ी रैली हो रही है.

बता दें कि भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने सोमवार को बहुजन हुंकार रैली की शुरुआत की थी. ये यात्रा रविदास छात्रावास से शुरू होने वाली थी, लेकिन आचार संहिता लागू होने के कारण यात्रा की अनुमति नहीं दी गई. इसके बावजूद भी भीम आर्मी ने बहुजन हुंकार रैली की शुरुआत की लेकिन मंगलवार को देवबंद में प्रशासन ने उनकी रैली को रोक दिया.

यात्रा को रोकने जाने के बाद हुए हंगामे के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी.

प्रशासन ने चुनावी आचार संहिता उल्लघंन के चलते चंद्रशेखर को हिरासत में ले लिया था. लेकिन बाद तबियत बिगड़ जाने के चलते उन्हें को मेरठ के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने बुधवार को जाकर मुलाकात की थी.

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बसपा प्रत्याशियों की सूची तैयार, बसपा संस्थापक की जयंती पर ऐलान संभव

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश के शीर्ष पदाधिकारियों की गुरुवार को महत्वपूर्ण बैठक हुई. इस बैठक में पार्टी ने प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप दे दिया है. इस दौरान बसपा-सपा गठबंधन के जमीनी हकीकत की भी चर्चा की गई. कल 15 मार्च को बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जयंती और फिर 14 अप्रैल को बाबासाहेब आम्बेडकर की जयंती को लेकर भी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को निर्देश जारी किया गया है.

चुनाव को ध्यान में रखते हुए बसपा प्रमुख ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को दोनों महापुरुषों की जयंतियों को शालीनता से घर पर ही मनाये जाने का निर्देश दिया गया. बैठक के बाद जारी बयान में बसपा प्रमुख की ओर से कहा गया है कि फिलहाल तन, मन, धन से चुनाव जीतने की तैयारी जरूरी है, ताकि उनकी चाह के अनुसार सत्ता की मास्टर चाबी प्राप्त की जा सके.

अपने बयान में भाजपा पर निशाना साधते हुए बसपा प्रमुख ने कहा है कि बीजेपी की वर्तमान केन्द्र सरकार वास्तव में झूठे वायदों व वादाखिलाफी की सरताज निकली. इन्होंने हर प्रकार से केवल अपने ही अच्छे दिन लाने के प्रयास किये जबकि देश की 130 करोड़ आमजनता ज़बर्दस्त महंगाई, ग़रीबी, बढ़ती बेरोज़गारी आदि की मार से बुरी तरह से जुझती रही है.

बैठक में सुश्री मायावती ने पार्टी सदस्यों को सावधान किया कि सत्ताधारी बीजेपी केवल जातिवादी, साम्प्रदायिक व गरीब, मजदूर व किसान विरोधी पार्टी ही नहीं है बल्कि साम, दाम, दण्ड, भेद आदि अनेकों हथकण्डों आदि का इस्तेमाल करके चुनाव जीतने में विश्वास रखती है. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को सावधान रहने के निर्देश दिए. बसपा प्रमुख ने ई.वी.एम. पर भी खास ध्यान रखने की बात कही.

फिलहाल बहुजन समाज पार्टी चुनावी तैयारियों के अपने आखिरी चरण में है. और प्रत्याशियों की सूची जारी होते ही बसपा भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार है.

मायावती और अखिलेश यादव की साझा रैली का प्लॉन तैयार

नयी दिल्ली। लोकसभा चुनाव को लेकर कमर कस चुकी पार्टियां अब रैलियों का कार्यक्रम बनाने में जुट गई हैं. उत्तर प्रदेश में ढाई दशक के बाद एक फिर साथ आए बसपा और सपा में भी रैलियों को लेकर कार्यक्रम लगभग तय है. खबर है कि दोनों पार्टी के प्रमुख यानि की अखिलेश यादव और मायावती साझा रैली करने पर सहमत हो गए हैं. बुधवार 13 मार्च को बहनजी और अखिलेश यादव की बैठक में इस बात की चर्चा होने की भी खबर है.

 खबर है कि दोनों नेता जल्दी ही साझा रैली के लिए मैदान में होंगे. इस अभियान की शुरुआत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होगी. दोनों नेताओं के बीच तय हुआ है कि जमीन पर अपने कैडर को संकेत देने के लिए दोनों साथ में रैलियां करेंगे. अभी तक प्रेस कांफ्रेंस के अलावा दोनों नेता मंच पर साथ नहीं दिखे हैं. इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में अभी सरगर्मी नहीं दिख रही है. ऐसे में कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए दोंनों शीर्ष नेताओं ने यह फैसला किया है. साझा रैली होने की स्थिति में 1993 के बाद फिर से इतिहास दोहराया जाएगा. इससे पहले कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने साथ में रैलियां की थीं.

रैलियों के कार्यक्रम को लेकर जो बात सामने आ रही है, उसके मुताबिक सात चरणों में होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में दोनों नेता हर चरण दो-दो साझा रैलियां करेंगे. यानि कुल 14 साझा रैलियां देखने को मिल सकती हैं. हालांकि हर दौर के चुनाव के बाद स्थिति की समीक्षा होगी और जरूरत पड़ने पर जरूरत के मुताबिक और ज्यादा साझा रैलियों को लेकर सहमति बन सकती है.

BSP का अमेठी व रायबरेली से भी गठबंधन प्रत्याशी उतारने का मूड

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती कल मेरठ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की मेरठ में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर से मुलाकात पर नाराज हैं. अब वह इस मामले में बड़ा कदम उठाने के मूड में हैं. इस प्रकरण पर कल उन्होंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भेंट की.

मायावती अब रायबरेली और अमेठी संसदीय सीट पर भी सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार को उतारना चाहती हैैं. इस संबंध में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को अपने बंगले पर बुलाकर मायावती ने उनसे टिकटों पर पुनर्विचार करने को कहा है. कल उनके आवास पर लगभग डेढ़ घंटे की मुलाकात में होली के बाद संयुक्त चुनावी रैलियां करने पर भी विचार किया गया.

अब बदलती परिस्थितियों को देखते अमेठी और रायबरेली के अलावा कुछ अन्य सीटों पर भी सपा-बसपा प्रत्याशियों में बदलाव करने पर भी गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया. मुलाकात में कांग्रेस के प्रत्याशियों के उतारने से गठबंधन को होने वाले नुकसान पर भी चर्चा की गई. गठबंधन के प्रत्याशियों की सूची एक साथ जारी करने पर भी विचार किया गया. इस विचार विमर्श में राज्यसभा सांसद संजय सेठ भी थे. सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के रवैये से नाराज बसपा सुप्रीमो मायावती के प्रस्ताव से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहमत नहीं हैैं. उनका कहना था, ऐसा करने से गलत संदेश जाएगा और जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा.

गौरतलब है कि खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित युवाओं में चंद्र शेखर की पकड़ मानी जा रही है. ऐसे में दलित वोट बैैंक के बंटने से बसपा को होने वाले नुकसान की आंशका के मद्देनजर मायावती पहले ही चंद्र शेखर से किनारा कर चुकी हैैं.

संयुक्त प्रचार अभियान की रणनीति बनेगी

संयुक्त प्रचार अभियान चलाने की रणनीति के तहत होली पर्व के बाद दोनों दलों की जिलेवार साझा बैठक करने का भी फैसला लिया गया. उल्लेखनीय है कि सपा 11 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर चुकी हैं लेकिन बसपा गुरुवार को पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ बैठक के बाद अपनी सूची जारी कर सकती है. हालांकि, सोशल मीडिया पर बसपा की एक सूची वायरल है. जिसका बसपा ने न खंडन किया है और न ही पुष्टि की. यह भी माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच कुछ सीटों की अदला-बदली पर भी चर्चा हुई.

सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने बताया कि मुलाकात आगामी लोकसभा चुनाव के लिए होने वाली रैलियों, सभाओं और बैठकों के सिलसिले में थी. उन्होंने बताया कि चुनाव करीब आ रहे हैं. होली के बाद चुनाव प्रचार की पूर्णतया शुरूआत कर दी जाएगी. चौधरी ने बताया गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए दो सीटें छोडी हैं और ईमानदारी से पूरा समर्थन किया जाएगा. सपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका की भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर के साथ मुलाकात बसपा सुप्रीमो मायावती के फैसले की प्रतिक्रिया है.

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मेरठ में चंद्रशेखऱ से मिली प्रियंका तो लखनऊ में मायावती से मिलने पहुंचे अखिलेश

फाइल फोटो

लखनऊ। बुधवार का दिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण रहा. देर शाम अचानक प्रदेश में सियासी माहौल गरमा गया. एक तरफ कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखऱ आजाद से मिलने पहुंची तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अचानक बसपा प्रमुख मायावती से मिलने पहुंच गए. दोनों के बीच मुलाकात पहले से प्रस्तावित नहीं थी. इसके बाद एक अटकल यह लगाई जा रही है कि मेरठ में भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद से प्रियंका गांधी की मुलाकात के कारण हालात की समीक्षा को लेकर अखिलेश यादव बसपा प्रमुख से मिलने पहुंचे थे.

मेरठ के एक अस्पताल में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखऱ से मिलने पहुंची प्रियंका गांधी

बुधवार शाम अचानक लखनऊ में सियासी तूफान आ गया जब अखिलेश यादव बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के सीधे मायावती से मिलने लखनऊ के माल एवेन्यू आवास पर जा पहुंचे. मेरठ में प्रियंका गांधी के भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद से मिलने के बाद मायावती और अखिलेश यादव की मीटिंग बेहद ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है. दोनों नेताओं की मुलाकात की एक वजह यह भी देखी जा रही है कि बसपा अपने कैंडिडेट की लिस्ट गुरुवार को जारी करने जा रही हैं. माना जा रहा है कि उम्मीदवारों पर आखिरी मुहर लगाने के पहले दोनों की मुलाकात भी अहम है. हालांकि प्रियंका गांधी के चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात के दांव के बाद सपा और बसपा पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं.

चंद्रशेखर से प्रियंका गांधी की मुलाकात के बाद यूपी की सियासत में हड़कंप

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मेरठ के एक अस्पताल में
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखऱ से मिलने पहुंची प्रियंका गांधी

लखनऊ। मंगलवार को देवबंद में एक कार्यक्रम के दौरान धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप के बाद गिरफ्तारी औऱ फिर तबियत खराब होने के बाद मेरठ के अस्पताल में भर्ती चंद्रशेखर रावण से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की बुधवार शाम को मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश का सियासी पारा अचानक चढ़ गया. इस मुलाकात के बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के कांग्रेस में आने की अटकलें तेज हो गई हैं. यह चर्चा इसलिए भी जोर पकड़ रही है क्योंकि बसपा औऱ इसकी मुखिया मायावती ने चंद्रशेखर आजाद को अब तक कोई भाव नहीं दिया है. ऐसे में वह भी ठिकाना खोज रहे हैं.

इस मुलाकात के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया भी प्रियंका गांधी के साथ मौजूद थे. इस मुलाकात के बाद प्रियंका गांधी औऱ चंद्रशेखर आजाद का जो बयान आया है, वह भी नयी सियासत का संकेत दे रहा है. चंद्रशेखर से मिलने के बाद प्रियंका गांधी ने पत्रकारों से कहा कि ‘ये अहंकारी सरकार है जो युवा की आवाज कुचलना चाहती है. ये नौजवान हैं, रोजगार तो सरकार ने दिया नहीं, अगर संघर्ष कर रहे हैं तो करने दीजिए. ये सरकार नौजवान की आवाज उठाना नहीं चाहती है.’ प्रियंका गांधी ने इस मुलाकात के राजनीतिक मायने होने से इंकार किया.

तो दूसरी ओर प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद चंद्रशेखर आजाद ने प्रियंका गांधी को बहन बताया. भीम आर्मी प्रमुख ने कहा, “उन्होंने मेरी तबीयत के बारे में जाना. मैं बहुजन समाज में पैदा हुआ हूं और बहुजन समाज में ही मरूंगा. प्रधानमंत्री मोदी जहां से चुनाव लड़ेंगे, वहां से मैं भी लड़ूंगा. हम मोदी जी को हराएंगे और उन्हें गुजरात भेजेंगे. मैं गठबंधन को समर्थन दूंगा.’

हालांकि चंद्रशेखऱ आजाद ने एक बार फिर मायावती को सपोर्ट देने की बात दोहराई है. हालांकि अखिलेश यादव को लेकर उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें प्रोमोशन में आरक्षण पर अपना रुख साफ कर देना चाहिए. लेकिन इस मुलाकात से यह साफ है कि उत्तर प्रदेश में जमीन तलाश रही कांग्रेस पार्टी को चंद्रशेखर आजाद और भीम आर्मी के रूप में दलित वोटों को अपने पाले में खिंचने की एक नई उम्मीद दिख रही है.

15 मार्च को दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली की घोषणा

चंद्रशेखर आजाद ने 15 मार्च को दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली करने का ऐलान किया है. उन्होंने कहा, “15 मार्च को दिल्ली में बहुजन हुंकार रैली होगी. इसमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेंगे. चाहे जो इसे रोकने का प्रयास करे, अब यह रुकेगी नहीं.”

टिकट बेचने के आरोपों पर बोले उपेंद्र कुशवाहा- CBI करे मेरी जांच

लोकसभा चुनाव से पहले देश में राजनीति गरमा गई है और हर ओर बयानबाजी के साथ-साथ आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया है. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने खुद के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग उठाई है? ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्या हो गया कि पूर्व केंद्रीय मंत्री को खुद के खिलाफ ही सीबीआई जांच की मांग उठानी पड़ी है?

दरअसल, मंगलवार को राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के पूर्व नेता नागमणि और प्रदीप मिश्रा पार्टी का दामन छोड़कर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) में शामिल हो गए और इसके बाद एक-एक करके उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी जड़ दिए थे. 2014 में लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ रहे कुशवाहा ने इस बार पाला बदल लिया है और वह राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस और जीतन राम मांझी की पार्टियां मिलकर जेडीयू, बीजेपी और लोजपा की एनडीए को टक्कर दे रहे हैं.

सबसे पहले नागमणि ने उपेंद्र कुशवाहा के ऊपर पार्टी के पैसे की हेराफेरी का आरोप लगाया और उसके बाद प्रदीप मिश्रा ने कुशवाहा के ऊपर आरोप लगाया कि कैसे दो मौकों पर उन्होंने कुशवाहा के दिल्ली के संसद में स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में उनके निजी खाते में ₹90 लाख जमा करवाए.

प्रदीप शर्मा ने कहा कि उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा के लिए पिछले साल गांधी मैदान में शिक्षा सुधार रैली आयोजित की थी जिसमें उनके 55 लाख खर्च हुए. साथ ही प्रदीप शर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले 5 सालों में विभिन्न मौकों पर उन्होंने पार्टी के लिए ₹15 करोड़ खर्च किए हैं. प्रदीप मिश्रा ने यह भी कहा कि उन्होंने विभिन्न मौकों पर उपेंद्र कुशवाहा और उनके परिवार वालों के लिए दुबई, मलेशिया और सिंगापुर में विदेशी दौरों की व्यवस्था की.

हालांकि नागमणि और प्रदीप मिश्रा के आरोपों को खारिज करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने तंज कसते हुए कहा कि दोनों नेता अब जेडीयू में शामिल हो गए हैं इसीलिए उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहकर उनके खिलाफ सीबीआई की जांच करवा देनी चाहिए.

उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि वह खुद चाहते हैं कि उनके खिलाफ जो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उसका दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए और सच्चाई जनता के बीच आनी चाहिए.

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लोकसभा चुनाव 2019: PM मोदी के खिलाफ खुद ताल ठोकेंगे भीम आर्मी के चंद्रशेखर!

भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने बुधवार को ऐलान किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अपना प्रत्याशी उतारेंगे. उन्होंने कहा कि अगर कोई प्रत्याशी नहीं मिला तो वह खुद प्रधानमंत्री के खिलाफ मैदान में खड़े होंगे.

मेरठ से एक वीडियो जारी कर भीम आर्मी अध्यक्ष ने कहा कि उनका संगठन 15 मार्च को दिल्ली में एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन भी करने जा रहा है. उन्होंने कहा कि 15 मार्च को बहुजन हुंकार रैली दिल्ली में होगी. दिल्ली में 15 को बड़ा जनसैलाब उमड़ेगा. उन्होंने कहा कि जितना भी रोकने की कोशिश कर लिया जाए यह जनसैलाब रुकने वाला नहीं है.

इस दौरान उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी हमला बोला. उन्होंने कहा कि देवबंद में उनकी पदयात्रा को सीएम योगी के इशारे पर ही रोका गया. उन्होंने कहा कि हमारे पास पदयात्रा की अनुमति थी. लेकिन प्रशासन और सरकार इस बात को लेकर झूठ फैला रही है. बता दें बुधवार को पुलिस ने धारा 144 के तहत आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में उन्हें हिरासत में लिया था. बाद में तबीयत ख़राब होने की शिकायत पर उन्हें मेरठ ले जाया गया था.

चंद्रशेखर ने लोकसभा चुनाव में मायावती को पूर्ण समर्थन की बात भी कही. वहीं गठबंधन के सहयोगी सपा मुखिया अखिलेश यादव से भी सवाल किया. उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव को प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर अपना स्टैंड क्लियर करना चाहिए. उन्होंने मुलायम सिंह यादव द्वारा पीएम नरेन्द्र मोदी को लेकर लोकसभा में दिए गए बयान पर भी टिप्पणी की. चंद्रशेखर ने कहा कि मुलायम सिंह अपने बयानों से कंफ्यूज कर रहे हैं.

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पंजाब में बसपा ने चला बड़ा चुनावी दांव

पंजाब की राजनीति में अपने दखल को बेचैन बहुजन समाज पार्टी ने एक नया दांव चला है. पार्टी छह राजनीतिक दलों के उस गठबंधन में शामिल हो गई है, जिसे पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस का नाम दिया गया है. इस अलायंस में पंजाब एकता पार्टी, लोक इंसाफ पार्टी, पंजाब मंच, सीपीआई, रेवॉल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी ऑफ इंडिया और बहुजन समाज पार्टी शामिल है. पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस ने एकजुट होते हुए लोकसभा चुनाव में पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.

गठबंधन की 11 मार्च को हुई बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में पंजाब एकता पार्टी के नेता सुखपाल सिंह खैरा ने सात लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा भी कर दी है. संगरूर सीट को छोड़कर बाकी के 12 सीटों पर गठबंधन के घटक दलों में सहमति बन गई है. खैरा के मुताबिक बसपा को तीन, पंजाबी एकता पार्टी को तीन, लोक इंसाफ पार्टी को तीन, पंजाब मंच को एक, सीपीआई को एक और आरएमपीआई यानि रेवॉल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी ऑफ इंडिया को एक सीट दी गई है. जिन सीटों पर उम्मीदवार तय हो गए हैं, उनमें आनंदपुर साहिब सीट से बसपा ने विक्रम सिंह सोढी को उम्मीदवार बनाया है, जबकि दो अन्य आरक्षित सीटों पर होशियारपुर से बसपा के चौधरी खुशीराम और जालंधर से बलविंदर कुमार पार्टी के उम्मीदवार होंगे.

जबकि पंजाब एकता पार्टी की ओर से खडूर साहिब सीट पर परमजीत कौर खालड़ा, पंजाब मंच की ओर से पटियाला सीट पर डॉ. धर्मवीर गांधी, एलआईपी की ओर से फतेहगढ़ साहिब आरक्षित सीट से मनविंदर सिंह ग्यासपुरा, पीईपी यानि पंजाब एकता पार्टी की ओर से फरीदकोट आरक्षित सीट पर बलदेव सिंह जैतो का नाम फाइनल हो गया है.

बाकी की बची सीटों पर भी यह गठबंधन जल्दी ही लोकसभा क्षेत्रों और प्रत्याशियों के नाम की घोषणा करेगा.

गठबंधन के नेताओं का कहना है कि वे मुद्दों पर आधारित साफ सुधरी और जवाबदेह राजनीति के लिए दृढ़ हैं. उनका उद्देश्य केवल लोकसभा चुनाव में सीटें शेयर करना नहीं बल्कि पंजाब की लंबे समय से चली आ रही मांगों के लिए संघर्ष करना है.

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जन्मभूमि पंजाब में बसपा मान्यवर के समय से ही अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है. यह गठबंधन चुनाव को कितना प्रभावित करेगा और भाजपा और कांग्रेस को कितनी चुनौती दे पाएगा, यह चुनाव के नतीजे ही बता पाएंगे.

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मायावती का ऐलान, किसी राज्य में कांग्रेस के साथ कोई समझौता नहीं करेगी बसपा

नयी दिल्ली। चुनावों की घोषणा के बाद आज 12 मार्च को बसपा ने एक बड़ी बैठक कर चुनाव की समीक्षा की. इस बैठक में उत्तर प्रदेश को छोड़कर सभी प्रदेशों के प्रभारियों के साथ बसपा प्रमुख ने पहले अलग-अलग और फिर एक साथ सभी प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक की. इस दौरान बड़ा ऐलान करते हुए बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने साफ कर दिया कि पार्टी कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं करेगी.

इन बैठकों में उन राज्यों में भी पार्टी की तैयारियों की विशेष समीक्षा की गई जिन राज्यों में बी.एस.पी. पहली बार गठबंधन करके लोकसभा का आमचुनाव लड़ रही है. जैसे बी.एस.पी. व सपा का उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड व मध्य प्रदेश में भी आपसी समझ व सूझबूझ के साथ समझौता हुआ है जबकि हरियाणा व पंजाब राज्य में वहाँ कि स्थानीय पार्टी के साथ समझौता तय है. बैठक में एक बार फिर स्पष्ट किया गया कि बी.एस.पी. किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के साथ किसी भी प्रकार का, कोई भी चुनावी समझौता अथवा तालमेल आदि करके यह चुनाव नहीं लडे़गी. सुश्री मायावती जी ने अन्य बातों के अलावा बैठक में यह भी बताया कि बी.एस.पी. व सपा का गठबंधन दोनों तरफ से आपसी सम्मान व पूरी नेक नीयती के साथ काम कर रहा है और उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड व मध्य प्रदेश में यह फस्र्ट व परफेक्ट एलायन्स माना जा रहा है जो सामाजिक परिवर्तन की जरूरतों को भी पूरा करता है तथा बीजेपी को परास्त करने की क्षमता रखता है जिसकी देशहित में आज की आवश्यकता है. उन्होंने पार्टी के लोगों को ज़मीनी स्तर पर काम करके पार्टी को कैडर के आधार पर तैयार करने पर ज़्यादा बल देते हुये कहा कि बी.एस.पी. एक पार्टी के साथ-साथ परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के अधूरे कारवाँ को मंजिल तक पहुँचाने तथा उनके आत्म-सम्मान व स्वाभिमान का मूवमेन्ट भी है और यही हमारी भारतीय राजनीति में असली शक्ति व विशिष्ट पहचान है, जिसे जी-जान से काम करके हर हाल में बनाये रखना है. सुश्री मायावती जी ने बताया कि बी.एस.पी. से चुनावी गठबंधन के लिये कई पार्टियाँ काफी आतुर हैं, लेकिन थोड़े से चुनावी लाभ के लिये हमें ऐसा कोई काम नहीं करना है जो बी.एस.पी. मूवमेन्ट के हित में बेहतर नहीं है. बी.एस.पी. ने काफी कड़ा संघर्ष व अथक प्रयास करके ना बिकने वाला समाज बनाया है और चुनावी स्वार्थ के लिये कैसे अपने मूवमेन्ट को नुकसान होता हुआ देख सकती है. हालात के बदलने में देर नहीं लगते हैं और इसीलिये पार्टी के लोगों को पूरी हिम्मत से लगातार काम करते रहने की जरूरत है.

क्या बसपा को झटका देने की तैयारी में हैं सीमा और रामबीर उपाध्याय!

सीमा उपाध्याय और रामबीर उपाध्याय (फाइल फोटो)

अलीगढ़। अलीगढ़ और आस-पास के क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी के पुराने ब्राह्मण चेहरे रामवीर उपाध्याय और बसपा के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. सुगबुगाहट है कि आने वाले दिनों में उपाध्याय बसपा से अलग राह चुन सकते हैं. दरअसल यह कयास उनकी पत्नी सीमा उपाध्याय द्वारा फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट छोड़ने के कारण किया जा रहा है.

सीमा उपाध्याय को बसपा ने फतेहपुर सीकरी से टिकट दिया था. लेकिन चुनाव घोषित होने के बाद ऐन मौके पर उन्होंने आगरा के फतेहपुर सीकरी सीट छोड़ दी है. सीमा उपाध्याय 2009 में इसी सीट से बसपा के टिकट पर सांसद भी चुनी गई थी. 2014 में वह भाजपा प्रत्याशी चौधरी बाबूलाल से हार गई थीं. इस बार फिर बसपा ने उन्हें इसी सीट से टिकट दिया था, लेकिन उनका कहना है कि इस सीट पर चुनावी समीकरण और स्थितियां हमारे अनुकूल नहीं हैं. उन्होंने बसपा अध्यक्ष मायावती से अलीगढ़ सीट से चुनाव लड़ने की मांग की थी, लेकिन पार्टी सुप्रीमो ने इंकार कर दिया।

बसपा सूत्रों के मुताबिक बीते हफ्ते सीम उपाध्याय ने बसपा अध्यक्ष से मुलाकात की थी. इस दौरान उन्होंने अलीगढ़ की मांग की थी और सीकरी को कमजोर सीट बताया था. इस पर पार्टी नेतृत्व ने फटकारते हुए कहा कि अलीगढ़ में पार्टी प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं और सीकरी अगर कमजोर लगती है तो चुनाव न लड़ें.

हालांकि सीमा और उनके पति रामबीर उपाध्याय का कहना है कि वो बसपा में बने रहेंगे, लेकिन शहर में दूसरी ही चर्चा चल रही है. चर्चा यह है कि सीमा उपाध्याय फतेहपुर सीकरी से ही भाजपा से टिकट के जुगाड़ में हैं. अगर ऐसा होता है तो यह बसपा के लिए झटका होगा. यह भी साफ है कि सीमा उपाध्याय ने जो भी कदम उठाया है उसमें उनके पति रामबीर उपाध्याय की महत्वपूर्ण भूमिका होगी. यह भी बताते चलें कि रामबीर उपाध्याय के भाई मुकुल उपाध्याय ने भी पिछले दिनों बसपा से निकाले जाने के बाद भाजपा में शामिल हो गए थे. हालांकि दोनों भाईयों में मनमुटाव जगजाहिर है. बहरहाल राजनीति फायदे का खेल बन गया है कौन कब किसका दामन थाम ले, कोई नहीं कह सकता.

मध्यप्रदेश में BSP से दरकिनार चार दिग्गजों ने थामा कांग्रेस का हाथ

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कांग्रेस में शामिल होने के दौरान बसपा के पूर्व नेता

भोपाल। लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने के चार घंटे पहले मध्य प्रदेश में एक बड़ी राजनीतिक घटना घटी. बहुजन समाज पार्टी में रह चुके चार दिग्गज नेता जिनको पार्टी ने दरकिनार कर दिया था, कांग्रेस का दामन थाम लिया. इन नेताओं में बसपा से पूर्व सांसद देवराज सिंह पटेल, पूर्व विधायक और पूर्व प्रदेश प्रभारी सत्यप्रकाश, पूर्व प्रदेश प्रभारी प्रदीप अहिरवार और रीवा संभाग के प्रभारी देवदत्त सोनी शामिल हैं.

इनमें से सत्यप्रकाश ने हाल ही में बसपा से इस्तीफा दे दिया था, जबकि बाकी तीन नेताओं ने खुद ही किनारे लगा दिया था. सभी नेता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मुख्यमंत्री कमलनाथ की मौजूदगी में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने चारों नेताओं को सूत की माला और कांग्रेस के प्रतीक चिन्ह वाला गमछा पहना कर स्वागत किया.

गौरतलब है कि कांग्रेस का दामन थामने वाले चारो नेता बहुजन समाज पार्टी के गठन से ही इससे जुड़े थे. बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम के नेतृत्व में इन चारों ने मध्यप्रदेश में पार्टी के लिए काफी योगदान दिया है. लेकिन चुनाव से ठीक पहले बसपा ने इन नेताओं को दरकिनार कर दिया था. इससे आहत इन चारों नेताओं ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है.

चूरू में दलित युवक को निर्वस्त्र कर पीट-पीटकर मार डाला

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मृतक-हेतराम

राजस्थान के चूरू जिले में शनिवार देर रात एक दलित युवक को पीट-पीटकर मौत के घाट उतारने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. यह वारदात लालासर गांव की है जहां 26 वर्षीय दलित युवक (हेतराम) की लाठी- सरियों से बेरहमी से पिटाई की गई. पीड़ित को गंभीर हालत में अस्पताल में पहुंचाया गया जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पांच नामजद सहित 7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए जांच शुरू कर दी है.

चूरू के गांव भामासी के हेतराम की मौत के बाद उसके पिता झाबरमल ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है. झाबरमल के अनुसार हेतराम और अन्य लोग शनिवार को पशुओं की तलाश कर रहे थे. पशुओं की तलाश में वे लोग लालासर गांव तक पहुंच गए, वहां सूरजभान काम के बहाने से हेतराम को अपने घर ले गया और अन्य आरोपियों के साथ मिलकर उसे निर्वस्त्र कर लाठी-सरियों से पीटा. झाबरमल की इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया है. नामजद आरोपियों में सरपंच का नाम भी शामिल बताया जा रहा है.

हेतराम की हत्या के पीछे पुरानी रंजिश भी बताई जा रहा है. उधर, पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार हेतराम पशुओं को ढुंढ़ता हुआ जब लालासर गांव पहुंचा तो सुरजभान सिंह, भैरूसिंह और भागीरथ सिंह उसे जबरन अपने घर ले गए और पुरानी रंजिश के चलते लाठियों, सरियों से मारपीट करने लगे. बहरहाल दुधवाखारा थाना पुलिस ने सुरजभान सिंह, भैरूसिंह, भागीरथ सिंह, प्रेमसिंह, मूलाराम कस्वां सहित 7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

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