क्या मायावती पर बन रही है फिल्म? विद्या बालन को कास्ट किए जाने की चर्चा

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बॉलीवुड में राजनेताओं की रियल लाइफ पर बन रही फिल्मों की कड़ी में एक और नाम शामिल हो गया है. डॉ. मनमोहन सिंह, बाल ठाकरे, एनटी रामाराव, नरेंद्र मोदी और जयललिता के बाद अब देश में दलित राजनीति को ताकतवर बनाने वाली मायावती के जीवन ने फिल्मकारों को आकर्षिक किया है.

सूत्रों के आधार पर पिंकविला ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी बॉयोपिक बन सकती है. इस फिल्म का निर्देशन सुभाष कपूर कर सकते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मायवती की बॉयोपिक के लिए बॉलीवुड एक्ट्रेस विद्या बालन को कास्ट किया जा सकता है. हालांकि जब इस सिलसिले में सुभाष कपूर से बात की गई तो उन्होंने खुद को लेकर आ रही ख़बरों को खारिज कर दिया.

वैसे अगर रिपोर्ट्स की बात सच साबित हुईं तो ये विद्या बालन के लिए बड़ा मौका होगा. बता दें विद्या बालन, फिलहाल एक वेब सीरीज पर भी काम कर रही हैं. इसमें वो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रोल निभा रही हैं.

बताने की जरूरत नहीं कि मायावती भारत की राजनीति में पिछले ढाई दशक से एक बड़ी ताकत के रूप में नजर आती रही हैं. उन्होंने अलग अलग टर्म में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है. उन्हें लेकर राजनीति में कई विवाद और आरोप भी हैं. अब ये देखने वाली बात होगी कि मायावती की बॉयोपिक बनती है तो उसमें उनकी जिंदगी के किन पहलुओं पर रोशनी डाली जाएगी.

इससे पहले सुभाष कपूर, ‘मोगुल’ नाम की बॉयोपिक पर काम करने वाले थे. लेकिन सुभाष पर मीटू के तहत आरोप लगा और उन्हें इस प्रोजेक्ट से हाथ धोना पड़ा.

साभार-आजतक

वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन

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अगस्त 2008 की एक सुबह हम चेन्नई से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर पहुंचे थे. दुनिया भर से आए दर्जनो अंतरिक्ष-पत्रकारों के बीच मैं गांव गली कवर करने वाला भी पहुंच गया था. भारत अपना पहला मून मिशन चंद्रयान का प्रक्षेपण करने वाला था. वहां दुनिया भर से आए ऐसे पत्रकार थे जो कई वर्षों से अंतरिक्ष प्रक्षेपण कवर कर रहे थे. यही उनका कार्यक्षेत्र भी था. वे भारत की कामयाबी को शक और हैरत से देख रहे थे. भारत की तरफ से दो चार ही अनुभवी पत्रकार थे. बाकी फ़ोटो खींच रहे थे और वीडियो बना रहे थे.

बहरहाल बारिश की बूंदें कुछ सेकेंड के लिए रूकी और उतनी ही देर में चंद्रयान अपने लक्ष्य की तरफ निकल गया. वह क्षण देखना और दर्शकों को दिखाना दोनों ही गर्व का था. उसके बाद हम सभी छत से उतर कर एक बड़े से सभागार में लाए गए, जहां चंद्रयान प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों ने हम सबको बताया. उस समय इसरो के प्रमुख जी माधवन थे. सैंकड़ों कैमरे के सामने देश के वैज्ञानिक देश से बात कर रहे थे. उसके बाद के कुछ दिनों तक वही वैज्ञानिक कई न्यूज़ चैनलों में जाकर अपनी कामयाबी के बारे में बता रहे थे.

2008 की कामयाबी मामूली नहीं थी. तब भी भारत में एक प्रधानमंत्री थे जिनका नाम मनमोहन सिंह था. उन्होंने बधाई दी और बाकी वैज्ञानिकों पर छोड़ दिया कि वे देश से संवाद करें. सैंकड़ों कैमरों के सामने इसरो के वैज्ञानिक थे. मनमोहन सिंह और उनसे पहले के किसी प्रधानमंत्री ने इसरो की कामयाबी को अपने चुनावी पोस्टर में इस्तमाल नहीं किया. बुधवार को मिशन शक्ति के सफल होते ही व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में मिसाइल की फ़ोटो के साथ नरेंद्र मोदी के पोस्टर बनकर चलने लगे थे.

यही नहीं 27 मार्च को जब भारत ने ए-सैट मिसाइल क्षमता का परीक्षण किया तो कैमरों के सामने से सारे वैज्ञानिक ग़ायब कर दिए गए. सिर्फ और सिर्फ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने थे. इस कामयाबी की एक ही तस्वीर जनता के बीच पहुंची है. राष्ट्र के नाम संबोधन वाली नरेंद्र मोदी की तस्वीर. उनके सहयोगी इसे फ़ैसला लेने वाली सरकार की कामयाबी बताते रहे. प्रक्षेपण और परीक्षण के समय जश्न मनाते वैज्ञानिकों की तस्वीरें भी नज़र नहीं आईं.

NDTV के आर्काइव में – 19 अप्रैल 2012 का एक वीडियो फ़ुटेज है. उस समय भारत ने लो-ऑरबिट में उपग्रह को मारने वाली मिसाइल अग्नि-V का सफल परीक्षण किया था. वीडियो में तब के DRDO के निदेशक जश्न मनाते दिख रहे हैं. 27मार्च 2019 को भी DRDO के निदेशक पद पर डॉ. जी सतीश रेड्डी विराजमान हैं मगर वे मीडिया से ग़ायब थे. उनकी टीम ग़ायब थी. उनकी जगह DRDO से रिटायर और इस समय नीति आयोग के सदस्य बन चुके विजय सारस्वत मीडिया में इसके बारे में ज्ञान दे रहे थे. मौजूदा चेयरमैन और वैज्ञानिक देश के सामने से ग़ायब रहे. एक रिटायर किया हुआ चेयरमैन ज्ञान दे रहा था ताकि वह इसी बहाने यूपीए सरकार पर टिप्पणी कर सके कि उसने मिशन शक्ति की अनुमति नहीं दी. बाद में इन्हीं के बयान के सहारे अरुण जेटली बीजेपी मुख्यालय में कांग्रेस पर हमला कर रहे थे. मौजूदा चेयरमैन यह बात नहीं कह सकते थे क्योंकि चुनाव के कारण आचार संहिता लागू है.

जबकि इसी वी के सारस्वत ने 10 फ़रवरी 2010 को कहा था कि भारत के पास उपग्रह को मार गिराने वाली मिसाइल क्षमता है लेकिन वह असली उपग्रह को मार कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन नहीं करेगा. भारत इसकी ज़रूरत महसूस नहीं करता क्योंकि इससे अंतरिक्ष में कचरा पैदा होता है. इन कचरों से अंतरिक्ष में उपग्रहों के सिस्टम को नुक़सान पहुंचता है. उस समय DRDO चीफ़ रहते हुए वी के सारस्वत ने जो कहा मान लिया गया. आज वही नीति आयोग के सदस्य बनकर सारस्वत यूपीए सरकार को निशाना बना रहे हैं. आप इनके बयान को इंटरनेट में सर्च कर सकते हैं. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की तरह वी के सारस्वत ने भी आचार संहिता का उल्लंघन किया है.

ज़ाहिर है यह राजनीति है. इसरो और रक्षा अनुसंधान का इस्तमाल नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं. उनका राष्ट्र के नाम संबोधन करना और कुछ नहीं बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करना था. वे पुलवामा के बाद ऐसा कुछ चाहते थे जिससे पांच साल की नाकामी पर चर्चा और सवाल ग़ायब हो जाएं. जो संवाददाता उज्ज्वला योजना की ख़ामियों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं कर पाते वही बुधवार को दिन भर अंतरिक्ष विज्ञान के एक्सपर्ट बन गए. उनकी रिपोर्टिंग में विज्ञान कम था. मोदी का गुणगान था और विपक्ष का उपहास.

सितंबर 2014 से इसरो देश के नाम पर भाजपा और नरेंद्र मोदी की राजनीति का केंद्र बन गया था जब मंगलयान के समय प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद वैज्ञानिकों के बीच मौजूद थे. उसी दिन तय हो गया था कि भारत की वैज्ञानिक कामयाबी वैज्ञानिकों की नहीं होगी, प्रधानमंत्री मोदी की होगी. चीन ने भी इस क्षमता का परीक्षण किया मगर उसने टीवी पर आकर दुनिया को नहीं बताया. यही परंपरा रही है. अंतरिक्ष विज्ञान की कामयाबी वैज्ञानिकों पर छोड़ दी जाती है. लेकिन अब यह सब मोदी के लिए प्रोपेगैंडा का हिस्सा भर हैं.

चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन की जांच कर रहा है. आयोग के क़ानूनी सलाहकार रहे मेंदीरत्ता ने ‘द प्रिंट’ से कहा है कि उन्होंने आचार संहिता लागू होने के बाद किसी प्रधानमंत्री को कभी ऐसा करते नहीं देखा. प्रधानमंत्री ने संबोधन में ऐसे बहुत से शब्दों का प्रयोग किया है जिनका इस्तमाल अपने राजनीतिक मंचों पर करते रहे हैं. यह मामला चुनाव आयोग का इम्तिहान है. मुझे संदेह है कि आयोग कुछ करेगा. वह बहाने ढूंढ लाएगा. क्या हम एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग का समापन देख रहे हैं? समापन का सीधा प्रसारण!

साभार- NDTVइंडिया इसे भी पढ़ें-अब ट्रेन से अयोध्या जाएंगी प्रियंका गांधी

अलविदा रमणिका गुप्ता: आपने सार्थक जीवन जीया, समाज को बहुत कुछ दिया

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जानी मानी कवि, कथाकार एवं चिंतक तथा पत्रकार रमणिका गुप्ता का जन्म 22, अप्रैल 1930 को पटियाला रियासत के सुनाम गांव में हुआ. उन्हें बचपन से ही स्वतंत्राता आंदोलन के प्रति भारी लगाव था. वे बचपन से ही मुखर और दबंग थी और शोषण का खुलकर विरोध करती थीं. वे पटियाला के संभ्रात बेदी कुल में पैदा हुई. उनके पिता स्वर्गीय डाक्टर लेफ्टीनेन्ट कर्नल प्यारेलाल बेदी थे. रमणिका गुप्ता की शिक्षा विक्टोरिया कॉलेज पटियाला में आई.ए. तक हुई. जब वे आई.ए. में पढ़ती थीं तो विक्टोरिया कॉलेज फॉर वूमेन, पटियाला में आई.एन.ए. (सुभाष चन्द्र बोस की फौज) के समर्थन में उन्होंने अपने कॉलेज में हड़ताल कराने का प्रयास भी किया था. इस पर कॉलेज में उनकी केनिंग भी की गई थी. रमणिका जी अरूणा आसफअली और गांधी की अनन्य भक्त रहीं. रमणिका जी साहित्य, कविता, अभिनय, नृत्य के साथ-साथ खेल-कूद में भी शिरकत करती थीं. वे कॉलेज की चैम्पियन, नेटबॉल की कैप्टन होने के साथ-साथ वाद-विवाद में भी बहुत हिस्सा लेती थीं.

इस कम उम्र में भी उन्होंने 1946-47 में देश के बंटवारे के क्रम में जो भूमिका अपनाई वह व्यवस्था के प्रतिरोध की थी. उन्होंने 14 साल की उम्र में ही खादी पहननी शुरू कर दी थी. उन्होंने दंगों का विरोध किया और जिन मुसलमान लड़कियों को दंगाई जबरदस्ती उठा कर ले गए थे उनके संबंध में सार्वजनिक तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्रा गुरुमुख सिंह मुसाफिर और डॉ. सुशीला नैयार के समक्ष महारानी पटियाला की उपस्थिति में कहा कि रियासत के अफसरों के घरों में वे लड़कियां हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि उनको पटियाला रियासत के बाहर अम्बाला शहर में मामा के यहां भेज दिया गया. विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने बेदी कुल की होने के बावजूद वेद प्रकाश गुप्ता, जो अंबाला में उनके मामा की मातहती में सहायक नियोजन पदाधिकारी थे, से 1948 में अन्तर्जातीय प्रेम-विवाह सिविल-मैरिज विधि से किया.

उनके मात-पिता और संबंधियों ने इसका कड़ा विरोध किया लेकिन उन्होंने वही किया जो उन्हें उचित लगा. शादी के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बी.ए., एम.ए. तथा बी.एड. की परीक्षाएं पास की.

उनका जीवन, संघर्ष का वृत्तांत है और उनका लेखन उस वृत्तांत का प्रतिबिंब. अपना जीवन समाज सेवा में न्योछावर कर चुकीं रमणिका गुप्ता की एक संघर्षशील छवि है. जहां वे सामाजिक परिवर्तन, बराबरी और भाईचारे के अपने सपने को साकार करने में कार्यरत थीं, वहीं वे दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, मजदूरों, किसानों और खेतिहर मज़दूरों के अधिकार के लिए निरंतर तत्पर रहती थीं. धार्मिक, जातीय व रूढ़ियों को दूर करने हेतु वे दृढ़ संकल्प थीं. वे सांप्रदायिक सद्भाव की मुहिम एक अभियान के रूप में चलाती रही थीं. उन्होंने चीन-भारत युद्ध के समय नागपुर जा कर सिविल डिफेन्स का प्रशिक्षण भी लिया. धनबाद में वृहद कवि सम्मेलन का आयोजन टैबेल्यू, कविता-पाठ और नृत्य के शो पेश करके देश के रक्षा-कोष हेतु हजारों रुपए का कोष संग्रह करवाया. खतरा उठा कर भी हर प्रकार के अन्याय का विरोध करना उनकी आदत थी. वे कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी में सक्रिय थीं और इस पार्टी की ओर से कोयला खानों की मजदूर यूनियन की अध्यक्ष व सी.आई.टू. झारखण्ड की उपाध्यक्ष थीं. वे सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक के साथ-साथ राजनीतिक-आर्थिक दायरों में एक साथ और समान तत्परता से सक्रिय थीं.

झारखंड के कोयलांचल में उनका पर्दापण 1960 में हुआ जब उनके पति वेदप्रकाश गुप्ता सहायक लेबर कमिश्नर के रूप में धनबाद आए. उनके साथ रमणिका गुप्ता भी आईं जो तब तक बी.एड़ तथा हिंदी में एम.ए. कर चुकी थीं. वे दो लड़कियों और एक लड़के की मां भी बन चुकी थीं. दरअसल धनबाद में ही उन्होंने सक्रिय रूप से राजनीति में प्रवेश किया और एक नेतृत्वकारी भूमिका अदा की. पहले वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में रहीं और उस पार्टी द्वारा संचालित अभियानों और आंदोलनों के नेतृत्व किया.

1965 में उनके पति वेदप्रकाश गुप्ता का तबादला कानपुर हुआ तो उन्हें धनबाद छोड़कर पति एवं बाल-बच्चों के साथ जाना ठीक नहीं लगा. वस्तुतः वे वहीं अपना कार्यक्षेत्रा बना चुकी थीं. धनबाद में वे समाज-सेवा से भी जुड़ीं तथा बच्चों की बालवाड़ी और महिलाओं का प्रशिक्षण केन्द्र खोला, जिसमें वे महिलाओं को काम भी दिलाती थीं ताकि वे कुछ आर्थिक उर्पाजन भी कर सकें. उन्होंने सोशल वैलफेयर बोर्ड के तहत 5 गांवों में सेंटर भी खोलें.

उनके द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ उनके जीने के सृजन और लिखने के सृजन के बीच सेतु की तरह है. यह पत्रिका अपने नाम से ही आम आदमी की युद्धरत स्थिति उजागर करती है. उनके साहित्य में उनके जीवन की ललक है. उन दिनों उनकी कविताµ‘रंग-बिरंगी तोड़ चूड़ियां हाथों में तलवार गहूंगी मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी’ बहुत लोकप्रिय हुई थी.

1967 में बिहार में पड़े अकाल के दिनों में वे सक्रिय रहीं और कई गांवों में लंगर चलाए.

1967 में रमणिका जी कच्छ आंदोलन में गईं. जार्ज फर्नाडीज के साथ दो बार गिरफ्तार हुईं. आंदोलन में उन्हें इतनी मार लगी थी कि वे बेहोश हो गईं.

1968 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मांडू क्षेत्रा से चुनाव लड़ीं जो एक उपचुनाव था. ये सीट राजा कामख्या नारायण ने खाली की थी. चुनाव के दरम्यान ही उन्होंने गोमिया में पानी की लड़ाई लड़ी. मांडू क्षेत्रा पानी की कमी वाला क्षेत्रा रहा है. उस समय मांडू क्षेत्रा में गोमिया, माण्डू एवं चुरचू प्रखंड थे. चुरचू का थोड़ा भाग छोड़कर बाकी सब खनन् क्षेत्रा था. वे केवल 700 वोटों से चुनाव हारीं जबकि उस सीट पर कांग्रेस के मंत्रियों तक की जमानत जब्त हो जाया करती थी. उन्होंने जनता से जो वायदा किया था, उन्होंने उसे निभाया और मांडू में ही रह गईं. टाटा की वेस्ट बोकारो कोलयरी में लड़ कर मजदूरों के बच्चों के लिए हाई स्कूल का भवन बनवाया और स्कूल चलवाया. पानी देने एवं छोटानागपुर के आदिवासियों के जंगल के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और लाठा-छावन और जलावन की जबरदस्त लड़ाई भी सन् 1969 में ही उन्होंने छेड़ी और सफल हुईं.

मांडू क्षेत्रा के पहला चापाकल बंजी गांव में टाटा ने लगवाया जो अब भी इस आंदोलन का गवाह है. पानी के आंदोलन के चलते जनता उन्हें ‘पानी की रानी’ कहने लगी. लाठा, छावन, जलावन के लिए ‘कूप’ की और जल-जंगल-जमीन के अधिकार तथा डिमॉर्केशन में जोती गई जमीन रैयत को वापिस दिलाने की लड़ाई में वे पुराने हजारीबाग जिले के आदिवासियों को जेल भरो अभियान में साथ लाने में सफल हुईं. आठ हजार एकड़ जमीन के करीब मुक्त कराई गई. जंगल के सिपाहियों द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे जुल्म के खिलाफ, उन्होंने ‘घूस नहीं अब घूसा देंगे’ का आंदोलन वहां की आदिवासी जनता को साथ लेकर चलाया. पतरातू स्वांग और खुदगड्डा में पानी का आंदोलन भी चलाया. कोलमाइंस में ‘कोयला श्रमिक संगठन’ के नाम से यूनियन बनाई. राजा और टाटा की खदानों में यूनियन बनाकर माफिया और ठेकेदारों के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्ष भी किया और कई बार शारीरिक तौर पर प्रताड़ित भी हुईं. उन दिनों एन.सी.डी.सी. की सरकारी कोयला खदानों में झाडू लगाने वाले स्वीपर भी राजस्थान से लाए जाते थे. इसके विरोध में स्वांग और कथारा कोलयरी में 1969 में ही उन्होंने स्थानीय लोगों के रोजगार की लड़ाई शुरू की जिसमें भारी संख्या में लोग जेल गए.

यूनियन के माध्यम से उन्होंने ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ राजाराम गढ़ की केदला-झारखंड की खदानों में भीषण संघर्ष छेड़ा और ठेकेदारों, लठैतों, माफिया का सामना कर, मजदूरों के अधिकार दिलाए. लोकसभा की याचिका-समिति के सामने भी उन्होंने याचिका दायर की.

हमारा काम क्या है, लिख कर दो/ हमारा नाम क्या है लिखकर दो/ वेतन क्या है लिखकर दो/ हम कौन हैं लिखकर दो – के नारे मजदूरों को दिए जो पूरे कोयला क्षेत्रा में गूंज उठे. इन मांगों को लेकर उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. रैलीगढ़ा और कुजु क्षेत्रा की खदानों में खदानों के मालिकों और ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा तो ठेकेदारों, पहलवानों ने इन पर जानलेवा हमला किया, जिसमें इनका बायां हाथ और कालरबोन टूट गई. लाठियों के इक्कीस घाव शरीर पर लगे तथा भाला से आंख का ऊपरी हिस्सा कट गया. इन पर कई बार जानलेवा हमले हुए और एक लम्बा संघर्ष छिड़ गया. इन्होंने सदैव किसान व मजदूरों को मिलाकर लड़ाईयां लड़ीं. हड़ताल के दौरान मजदूर आठ आना चौका पर मिट्टी काटते रहे. वे चूहे की बिलों से धान चुनकर लाते और वही उबाल कर खाते रहे पर हारे नहीं, झुके नहीं. केदला माइंस के राष्ट्रीयकरण के लिए उन्होंने वृहद संघर्ष छेड़ा. केदला माइंस में लगभग सवा साल तक हड़ताल चली और तब जाकर कहीं खदानें सरकारी हुईं.

कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद वे अपील कमेटी की मैम्बर बनीं और हजारों लोगों को नौकरी दिलाई, जिसमें महिलाएं भी थीं. पर महिलाओं की नौकरी में काफी दिक्कत हुई. अधिकांश स्त्रा-कामगारों की छंटनी कर दी गई. वे 1972-73 एवं 1974-79 तक में कांग्रेस की तरफ से बिहार विधान परिषद की सदस्य (एम.एल.सी.), कांग्रेस पार्टी की हजारीबाग जिला की अध्यक्ष, बी.पी.सी.सी तथा ए.आई.सी.सी. की सदस्य भी रहीं. 1977 में स्थानीय लोगों को कांग्रेस का टिकट न दिए जाने के विरोध में उन्होंने हजारीबाग जिला की कांग्रेस का अध्यक्ष पद एवं ए.आई.सी.सी. की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और लोकदल के टिकट पर 1979 में एम.एल.ए. चुनी गईं. उनके भीतर पूर्ण परिवर्तन की छटपटाहट ने अंततः उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवाद) के संगठन में पहुंचा दिया.

उन्होंने विस्थापितों के सवाल पर 1980 के अगस्त में आंदोलन छेड़ा और 2000 लोगों को लेकर जेल गईं, जिसमें भारी संख्या में महिलाएं भी गिरफ्तार हुईं. सब लोग दो माह जेल में रहे. बिहार सरकार के साथ समझौता होने के कारण उन्हें और उनके सभी साथियों पर केस समाप्त कर उन्हें छोड़ दिया गया. विस्थापितों को 3 एकड़ पर नौकरी की बजाय चूल्हा परती एक नौकरी अथवा जमीन के बदले जमीन, पुनर्वास एवं विस्थापित महिलाओं को भी मुआवजा एवं नौकरी में हिस्से की तथा खदानों के 10 किलोमीटर के क्षेत्रा के भीतर (कोल माइंस के ईदगिर्द) सामुदायिक विकास एवं कल्याण योजना बनाने की मांग भी रखी गई.

विस्थापितों को आंदोलन के साथ-साथ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में तीन अलग-अलग मुकदमे भी दायर किए जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोजगार व पुनर्वास की योजना बनाने के लिए कोल इंडिया को आदेश दिया और पुनर्वासµयोजना लागू होने तक सुप्रीम कोर्ट ने कोल इंडिया को काम पर रोक के स्थगना-आदेश भी दिए.

रमणिका जी द्वारा किसानों के साथ मिलकर एक और रिट-पैटीशन दायर की गई. ये सभी केस 1981 से 1997 तक सुप्रीम कोर्ट में चले. इन 16 वर्षों के दौरान श्रीमती गुप्ता ने किसानों और मजदूरों के आंदोलनों के बल पर सरकार को कई सुधार करने के लिए मजबूर किया. सर सिफ्टन द्वारा 1908 में किए गए सर्वे के अनुसार टांड जमीन की मुआवजा दर मात्रा रु. 2/- प्रति एकड थी. इनके आंदोलन की वजह से यह दर 30 हजार रुपए कहीं-कहीं इसके भी अधिक राशि तक प्रति एकड तक पहुंच गई. देरी करने के एवज में सूद की राशि भी अलग से दी जाने लगी.

गांव वालों को रोजगार न देकर स्वैच्छिक अवकाश के नाम पर मजदूरों के बदले, खासकर औरतों के बदले उनके द्वारा किसी व्यक्ति को भी नौकरी देने के प्रवाधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और इस योजना को रद्द करवाया. हालांकि कोलइण्डिया ने बाद में बीमारी के नाम पर 9.4.3 के तहत स्वैच्छिक अवकाश की नीति चालू रखी और छटनी जारी रही, पर इस स्थानादेश के कारण तत्काल स्त्रा, आदिवासी व दलित मजश्दूरों की नौकरियां काफी हद तक बच गईं.

इन्होंने विस्थापित खेतिहर, भूमिहीन एवं हाशिए वाले किसानों के लिए कोड़कर राईट की लड़ाई भी बिहार सरकार से जीती, जिसके चलते गैरमजुरआ जमीनों पर भी किसानों को कोलइंडिया में नौकरी मिली. जहां-जहां उन्होंने संघर्ष किए वहां-वहां गांव उजड़ने से बच गए. सुप्रीम कोर्ट ने विस्थापित स्त्रा को भी नौकरी देने का आदेश दिया.

1985 में सिंगरौली क्षेत्रा में मजदूरों और किसानों के आंदोलन के सिलसिले में उन्हें लगभग एक साल तक भूमिगत भी रहना पड़ा,फलतः वे हृदय रोग की शिकार हो गईं.

इन्होंने चतरा में दलित स्त्रियों के डोले पहली रात बाबू साहबों के घर जाने की प्रथा के खिलाफ भी आवाजश् उठाई. 1975 में जंगलों में उगे महुए गाछों को पहलवानों के कब्जे से मुक्त करवाकर ग्रामीणों के महुआ चुनने के अधिकार को लागू करवाया.

उन्होंने 1975 में अर्न्तराष्ट्रीय महिला सम्मेलन बर्लिन में और आई.सी.एफ.टी.यू. मैक्सिको की अन्तर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में मजदूरों की ओर से प्रतिनिधित्व किया. 1984 में रूस में पीस मिशन के डेलिगेशन का नेतृत्व किया. 1987 में यूगेस्लावाकिया तथा नार्वे और 1993 में फिलीपींस, तथा 1994 में क्यूबा में उन्होंने सी.आई.टी.यू. की ओर से भारतीय मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया. 2000 में द्वितीय विश्व दलित सम्मेलन में भाग लिया.

उम्र के प्रभाव को अस्वीकार करते हुए वे अभी भी ओजस्विता के साथ विषमता के विरुद्ध सख्त प्रहार करती थीं. उन्हें धर्म, जाति यहां तक कि लिंग के प्रभाव से मुक्त माना जा सकता है. वे भविष्य की स्त्रा मालूम पड़ती हैं; वह स्त्रा जिसकी उपलब्धि हेतु वर्तमान स्त्रा समुदाय संघर्षरत है. रमणिका गुप्ता अपने लेखन में ‘बहु जुठाई’ जैसी सड़ी गली रस्म, आदिवासी दलितों के प्रति सवर्णों का भेदमूलक जातिपरक व्यवहार तथा शोषण और स्त्रियों के यौन शोषण के विरुद्ध संघर्ष को उकेरा है. हेंदेगढ़ा में कुर्मियों की पंचायत प्रेम करने वाले दलित लड़के को मार देती है और उसकी प्रेमिका को लुकाठी से दाग देती है तो रमणिका गुप्ता के शब्द उनकी कविताओं और कहानियों चीख उठते हैं. इसी तरह जब वे मजदूरों की समस्याओं को लेकर प्रबन्धन को चुनौती देती थीं. तो उनके लेखन में उनके अनुभव कई विधाओं में मुखरित हो जाते थे और इन तबकों को अपनी बुलन्द आवाज में वे आह्वान कर प्रेरित करती थीं.

साभार- लोकवाणी इसे भी पढ़ें-मायावती ने ‘गरीबी हटाओं’ के नारे पर बीजेपी और कांग्रेस पर साधा निशाना

जाति की वजह से नहीं मिली निरहुआ को कुर्सी, भाजपा पर भड़के प्रशंसक

नई दिल्ली। 27 मार्च को राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण दो तस्वीरें काफी कुछ कह गई. एक तस्वीर कांग्रेस पार्टी के दिल्ली ऑफिस की थी तो दूसरी भाजपा के लखनऊ दफ्तर की. दोनों घटनाएं भी महत्वपूर्ण थी. दिल्ली में हिन्दी फिल्म अभिनेत्री उर्मिला मांतोडकर ने कांग्रेस पार्टी को ज्वाइन किया तो दूसरी ओर लखनऊ में भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने भाजपा का दामन थामा. दोनों पार्टी दफ्तरों में दिग्गज नेता मौजूद थे, जिन्होंने इन दोनों फिल्मी कलाकारों को पार्टी की सदस्यता दी. हालांकि इस मौके की जारी की गई तस्वरों ने एक बड़ा सवाल उठा दिया है.

कांग्रेस दफ्तर में पार्टी की सदस्यता लेने के लिए मौजूद उर्मिला मंतोडकर को काफी सम्मान मिला. पार्टी के नेताओं ने उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया और उन्हें नेताओं की कतार के ठीक बीच में बैठाकर उन्हें वेलकम किया. लेकिन लखनऊ से दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को बैठने को कुर्सी तक नहीं मिली. ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पांडे और ठाकुर जाति के राजनाथ सिंह के बेटे और नोएडा के विधायक पंकज सिंह ठाठ से बैठे हैं. कुछ और अंजाने चेहरों को भी कुर्सियां नसीब हो गई लेकिन पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले निरहुआ को पार्टी ने कुर्सी देने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया, जबकि सारा तामझाम भोजपुरी सुपरस्टार को पार्टी ज्वाइन कराने के लिए ही था. ये वही निरहुआ हैं, जिनके जरिए भाजपा आजमगढ़ में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चुनौती देने की योजना बना रही है.

ऐसे ही व्यवहार से पार्टी ज्वाइन करने पहुंचे उत्तर प्रदेश व्यापार मंडल के नेता संजय गुप्ता वहां से लौट गए. उनका कहना है कि अगर बीजेपी ज्वॉइन करने से पहले ये हालत है तो ज्वॉइन करने के बाद क्या होगा.

निरहुआ की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उनके प्रशंसकों ने भाजपा को निशाने पर लिया है.

राहुल यादव ने ट्विटर पर लिखा है- आज़मगढ़ से उठने वाले को यहां बैठने की सीट भी नही मिली. जियो राजा #निरहुआ, पहले ही दिन #निहुरा दिए गए.

रजनीश यादव ने लिखा- आज़मगढ़ से उठने वाले को यहां बैठने की सीट भी नही मिली। जियो राजा #निरहुआ, पहले ही दिन #निहुरा दिए गए।

चंदन यादव ने लिखा है- असली चौकिदार है … खड़ा होइके ही चउकिदारी करे के पड़ी बाऊ #Nirahua उर्फ #DineshLalYadav

तमाम लोग भाजपा के इस कदम को पिछड़ी जाति के निरहुआ का अपमान बता रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा के इस व्यवहार के पीछे पार्टी नेताओं का जातीय दंभ नहीं है?

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फिल्मी चेहरों की शरण में राजनीतिक दल

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नई दिल्ली। मार्च के आखिरी हफ्ते में एक के बाद एक कई फिल्मी सितारों ने राजनीति में कदम रखा. 27 मार्च को खबर आई कि भोजपुरी इंडस्ट्री के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ बीजेपी में शामिल हो गए हैं. तो वहीं छम्मा-छम्मा गर्ल के नाम से मशहूर उर्मिला मंतोडकर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. एक खबर क्रिकेट की दुनिया से भी आई जब पूर्व भारतीय क्रिकेट सितारा गौतम गंभीर ने भाजपा ज्वाइन कर लिया.

लखनऊ में 27 मार्च को भोजपुरी फिल्म अभिनेता रवि किशन और दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने यूपी के मुख्यमंत्री CM योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. चर्चा है कि दोनों अभिनेताओं को पूर्वांचल से बीजेपी का टिकट मिल सकता है. कहा जा रहा है कि रवि किशन को गोरखपुर से और निरहुआ को आजमगढ़ से टिकट मिलने के आसार हैं. दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ मूल रूप से गाजीपुर के गांव टंडवा से हैं. पूर्वांचल के एक और स्टार मनोज तिवारी पहले से ही भाजपा में हैं और उनके पास दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. तो भाजपा मे ही हेमामालिनी भी लंबे समय से हैं. एक बार फिर से वह मथुरा से भाजपा की उम्मीदवार होंगी.

कलाकारों को राजनीति का यह चस्का सबसे पहले दक्षिण में लगा, जहां कई कद्दावर नेताओं ने न सिर्फ राजनीति में कदम रखा बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बनें. दक्षिण से ही 2019 के चुनाव में एक और जाने-माने चेहरे ने हुंकार भर दी है. हालांकि किसी पार्टी में शामिल होने की बजाय उसने चुनाव में निर्दलीय उतरने का फैसला किया है. दक्षिण भारत से लेकर हिंदी फिल्मों तक में अपने अभिनय क्षमता का लोहा मनवा चुके प्रकाश राज ने बेंगलूरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है.

तो उधर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने फिल्मी सितारों को साथ लेकर लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना लिया है. मुनमुन सेन, शताब्दी रॉय और दीपक अधिकारी जैसे फिल्मी सितारों के साथ ही इस बार खबर है कि टीएमसी ने मिमी चक्रबर्ती और नुसरत जहां जैसी कलाकारों को भी चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर ली है. खबरों के मुताबिक मिमी जादवपुर, नुसरत बशीरहाट, शताब्दी बीरभूम, मुनमुन आसनसोल और दीपक घाटल लोकसभा सीट से किस्मत आज़माने वाले हैं.

एक के बाद एक फिल्मी सितारों का राजनीति की दुनिया में कदम रखने से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या लोगों का राजनेताओं पर से भरोसा उठता जा रहा है? और सभी दलों के लिए फिल्मी सितारें चुनाव जीताऊ कैंडिडेट बन गए हैं. एक सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दलों का लक्ष्य महज अपने सीटों की गिनती को बढ़ाना है, चाहे वो जो जीता कर ले आए?

अंतरिक्ष में एयर स्ट्राइक का असली सच यह है

2019 में किसकी सरकार बनेगी यह तो चुनाव के नतीजों के बाद साफ होगा, लेकिन उसके पहले दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल जारी है. यह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके ब्रांड नरेन्द्र मोदी 2019 के चुनाव में जीत के लिए एयर स्ट्राइक पर निर्भर हैं. ऐसे में मोदी के एयर स्ट्राइक को चुनौती देने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने NYAY स्कीम की घोषणा कर दी. इस योजना के मुताबिक कांग्रेस की सरकार बनने पर देश के तकरीबन पांच करोड़ गरीबों के खाते में सलाना 72 हजार रुपये डालने की बात कही जा रही है. इससे  बैकफुट पर आई भाजपा ने अबकी बार अंतरिक्ष में एयर स्ट्राइक का दांव चल दिया है.

कांग्रेस की सरकार में वित्त मंत्री रहे पी. चिदंबरम जब एक प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा घोषित NYAY स्कीम कैसे लागू होगी… यह बता रहे थे, उसी के आस-पास नरेंद्र मोदी ने एयर स्ट्राइक की खबर दे दी. भारत ने अंतरिक्ष के भीतर एक सेटेलाइट को मार कर गिरा दिया. इसी सूचना को लेकर मोदी देश की जनता के बीच मन की बात कहने आ गए. पहले उन्होंने ट्विट किया कि वो बड़ी खबर सुनाने वाले हैं, जिसके बाद फिर उन्होंने अंतरिक्ष में सेटेलाइट मारने की खबर सुनाई. ऐसा कर मोदी एक बार फिर से एयर स्ट्राइक के भरोसे चुनावी बढ़त लेने के मूड में हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका असर चुनावों में भी होगा?

दरअसल यह वास्तव में एक बड़ी खबर है कि भारत ने यह उपलब्धि हासिल की है. अमेरिका, चीन और रूस के बाद भारत चौथा ऐसा देश बन गया है, जो अंतरिक्ष में किसी सेटेलाइट को माकर गिरा सकता है. देश के वैज्ञानिकों को इसके लिए बहुत बधाई. संभवतः परमाणु परीक्षण के बाद यह दूसरी बड़ी उपलब्धि है. लेकिन यहां सवाल राजनीति का है, तो चुनावों में इसका कितना असर होगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जनता को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस एंटी सैटेलाइन हथियार की बात कही, ऐसा करने का माद्दा भारत के पास 2012 से ही था. DRDO के तत्कालीन प्रमुख वीके सारस्वत ने 2012 में ही दावा कर दिया था कि भारत के पास दुश्मन सैटेलाइट को मार गिराने के सभी जरूरी तकनीक मौजूद हैं. तो ऐसा नहीं है कि यह वर्तमान सरकार की कोई बड़ी उपलब्धि है जो उसने बीते पांच साल में हासिल किया है. निस्संदे यह भारत सरकार की उपलब्धि है, जिसमें कांग्रेस की सरकार को भी क्रेडिट जाता है. लेकिन अगर इसे मोदी जी या भाजपा अपनी उपलब्धि कहते हैं तो ऐसा बिल्कुल नहीं है.

भले ही यह मोदी सरकार की निजी उपलब्धि नहीं है लेकिन इस परीक्षण का चुनावी फायदा लेने के लिए भाजपा और उसके नेता एयर स्ट्राइक का मुद्दा एक बार फिर से गरमाने में लग गए हैं.

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नही रही आदिवासी-दलितों और महिलाओं के संघर्ष का चेहरा

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नई दिल्ली। हिंदी की लोकप्रिय साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता रमणिका गुप्ता का मंगलवार को निधन हो गया. उन्होंने दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दोपहर तीन बजे अंतिम सांस ली. वह 89 वर्ष की थीं.

22 अप्रैल 1930 को पंजाब में जन्मी रमणिका ने आदिवासी व दलित साहित्य को नया आयाम दिया. वह साहित्य, समाज सेवा और राजनीति कई क्षेत्रों से जुड़ी हुई थीं.

वह सामाजिक सरोकारों की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक थीं. उन्होंने स्त्री विमर्श पर बेहतरीन काम किया.

वह देश की वामपंथी प्रगतिशील धारा की प्रमुख रचनाकार थीं. उन्होंने मजदूर आंदोलन से अपने साहित्य को धार दी. उन्होंने झारखंड के हजारीबाग के कोयलांचल से मजदूर आंदोलनों को साहित्य के जरिए राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने का काम किया.

नारी मुक्ति के साथ झारखंड समेत देश के आदिवासी साहित्यिक स्वर को व्यापक समाज में लाने के उनके विशिष्ट योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

उनके आदिवासी एवं दलित अधिकारों से लेकर स्त्री विमर्श पर कई किताबें, कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं. रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे और आपहुदरी’ बहुत लोकप्रिय हैं. वह कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं.

उनकी मशहूर कृतियों में ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’, ‘तुम कौन’, ‘तिल-तिल नूतन’, ‘मैं आजाद हुई हूं’, ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’, ‘भला मैं कैसे मरती’, ‘आदम से आदमी तक’, ‘विज्ञापन बनते कवि’, ‘कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का’,‘दलित हस्तक्षेप’, ‘निज घरे परदेसी’, ‘सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘कलम और कुदाल के बहाने’, ‘दलित हस्तक्षेप’, ‘दलित चेतना- साहित्यिक और सामाजिक सरोकार’, ‘दक्षिण- वाम के कठघरे’ और ‘दलित साहित्य’, ‘असम नरसंहार-एक रपट’, ‘राष्ट्रीय एकता’, ‘विघटन के बीज’ प्रमुख हैं.

उनका उपन्यास ‘सीता-मौसी’ और कहानी संग्रह ‘बहू जुठाई’ भी खासा लोकप्रिय रहा.

सामाजिक आंदोलनों के लिए पहचानी जाने वाली रमणिका विधायक भी रहीं. उन्होंने बिहार विधानपरिषद और विधानसभा में विधायक के रूप में काम किया है. वह इसके अलावा ट्रेड यूनियन नेता के तौर पर भी काम कर चुकी हैं. वह चुनावी राजनीति से अलग होने के बाद भी मजदूर यूनियन से जुड़ी रहीं.

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मायावती ने ‘गरीबी हटाओं’ के नारे पर बीजेपी और कांग्रेस पर साधा निशाना

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने बुधवार को एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस पर निशाना साधा है. उन्होंने गरीबों और किसानों के मामले में दोनों को एक ही थाली के चट्टे-बट्टे बताया है. मायावती ने ट्वीट किया, “सत्ताधारी बीजेपी का कांग्रेस पार्टी पर आरोप कि उसका गरीबी हटाओ-2 का नारा चुनावी धोखा है, यह सच है, परन्तु क्या चुनावी धोखा व वादाखिलाफी का अधिकार केवल बीजेपी के पास ही है? गरीबों, मजदूरों, किसानों आदि के हितों की उपेक्षा के मामले में दोनों ही पार्टियां एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं.”

गौरतलब है इससे पहले बसपा मुखिया ने भाजपा सरकार पर नोटबंदी को लेकर हमला बोला था. इसके कारण कामगार बेरोजगार होकर गांव में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं.

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गुड्डू पंडित (फोइल फोटो)

लखनऊ। लोकसभा चुनाव के लिए हर राजनैतिक दल की एक ही ख्वाहिश है, किसी भी तरह ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी जीतना. इसके लिए हर पार्टी सीट जीताऊ उम्मीदवार पर दांव लगा रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए बहुजन समाज पार्टी ने आखिरी वक्त पर फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार आखिरी वक्त में बदल दिया. खबर है कि इस सीट पर बसपा ने राजवीर सिंह का टिकट काटकर भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित को टिकट दे दिया है.

 फतेहपुर सीकरी से दिल्ली के राजवीर सिंह ने बसपा प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया था. हालांकि पार्टी की ओर से उन्हें बी फॉर्म नहीं दिया गया था. इसके बाद अचानक गुड्डू पंडित का नाम चर्चा में आ गया. मंगलवार को ही गुड्डू पंडित अपना नामांकन दाखिल करेंगे क्योंकि आज नामांकन का अंतिम दिन है. गुड्डू पंडित दबंग छवि के नेता हैं. उन पर कई केस भी दर्ज हैं. गुड्डू पंडित समाजवादी पार्टी में भी रह चुका है.

गौरतलब है कि फतेहपुर सीकरी सीट को लेकर काफी उहापोह रही है. पहले बसपा ने इस सीट से रामबीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय को यहां से प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन सीमा उपाध्याय ने इस सीट पर समीकरण पक्ष में नहीं होने की बात कहते हुए यह सीट छोड़ दी. इसके बाद प्रत्याशी के तौर पर राजवीर सिंह का नाम आया. लेकिन ऐन आखिरी वक्त में गुड्डू पंडित को टिकट देने की बात सामने आई है.

गोरखपुर-बस्ती मंडल में दांव पर होगी बसपा की साख

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में गोरखपुर और बस्ती मंडल में बहुजन समाज पार्टी की कड़ी परीक्षा है. पार्टी इन दोनों मंडलों की नौ लोकसभा सीटों में से छह पर चुनाव मैदान में है. सीटों के बंटवारे में बसपा के हिस्से में बस्ती, संतकबीरनगर, डुमरियागंज, बांसगांव, देवरिया व सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र बसपा के हिस्से में आया है.

इन सभी सीटों को जीतने के लिए बसपा पूरा जोर लगा रही है. पार्टी ने इन सीटों पर खास रणनीति बनाई है. सूचना के मुताबिक मायावती और अखिलेश यादव की संयुक्त रैली 13 मई को गोरखपुर में प्रस्तावित है. इस रैली में गोरखपुर, महाराजगंज व कुशीनगर के लोकसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ता शामिल होंगे. इस संयुक्त रैली के अलावा बसपा प्रमुख मायावती दो अन्य रैलियों को अकेले संबोधित करेंगी. खबर है कि बहनजी बांसगांव लोकसभा क्षेत्र व सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में अकेले रैली करेंगी. रैली का कार्यक्रम 14 अप्रैल को तय होन की बात सामने आई है.

टिकट ना मिलने से अब जोशी हुए खफा

सत्ता में बने रहने के लिए भारतीय जनता पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. 2019 की जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी चुन-चुनकर उम्मीदवारों को टिकट दे रही है. लेकिन इसी वजह से बीजेपी के दिग्गज ही पार्टी से खफा हो गए हैं. बताया जा रहा है कि लालकृष्ण आडवाणी की तरह ही बीजेपी ने वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को टिकट ना देने का मन बनाया है. जब पार्टी की ओर से संगठन महासचिव रामलाल ने उन्हें इस बात की जानकारी दी तो इस पर वह खफा हो गए.

दरअसल, सोमवार को बीजेपी के संगठन महासचिव रामलाल ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से मुलाकात की थी. रामलाल ने मुरली मनोहर जोशी से कहा कि पार्टी ने डिसाइड किया है कि आपको चुनाव नहीं लड़वाया जाए. रामलाल ने कहा कि पार्टी चाहती है कि आप पार्टी ऑफिस आकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करें.

हालांकि, पार्टी की इस अपील को मुरली मनोहर जोशी ने सीधे तौर पर नकार दिया. जोशी ने कहा कि ये पार्टी के संस्कार नहीं हैं, अगर हमें चुनाव ना लड़वाने का फैसला हुआ है तो कम से कम पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को हमें आकर सूचित करना चाहिए. मुरली मनोहर जोशी ने साफ कहा कि वह पार्टी दफ्तर आकर इसकी घोषणा नहीं करेंगे.

आपको बता दें कि इससे पहले बीजेपी दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी का गांधीनगर से टिकट कटने पर काफी बवाल हुआ था. गांधीनगर से अब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ रहे हैं. आडवाणी का टिकट कटने पर शत्रुघ्न सिन्हा समेत कांग्रेस के नेताओं ने भी सवाल खड़े किए थे.

गौरतलब है कि इससे पहले भी रामलाल ने ही लालकृष्ण आडवाणी, कलराज मिश्र से मुलाकात कर और शांता कुमार, करिया मुंडा से फोन पर बात करके उन्हें टिकट ना देने के फैसले के बारे में जानकारी दी थी. तब भी रामलाल ने इन नेताओं को सूचित किया था कि वह अपनी ओर से चुनाव ना लड़ने का ऐलान करें.

लेकिन लालकृष्ण आडवाणी भी मुरली मनोहर जोशी की तरह तैयार नहीं हुए. सूत्रों की मानें तो आडवाणी ने भी मुरली मनोहर जोशी की तरह रामलाल से कहा था कि पार्टी हमें चुनाव में टिकट नहीं देना चाहती है तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को खुद आकर पार्टी के फैसले की जानकारी देनी चाहिए.

श्रोत- आजतक इसे भी पढ़ें-उत्तर भारत में सवर्ण वर्चस्व विरोधी बहुजन राजनीति के प्रणेता मान्यवर कांशीराम

दलित दंपत्ति व पुत्र के साथ मारपीट में सजा

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झांसी। विशेष न्यायाधीश एससी एसटी एक्ट शकील अहमद खां की अदालत ने दलित दंपती व पुत्र के साथ गाली गलौच, मारपीट कर जान से मारने की धमकी देने का दोष सिद्ध होने पर तीन लोगों को तीन – तीन साल की सजा व अर्थदंड लगाया है.

सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता बीके राजपूत के अनुसार थाना गरौैठा इलाके में रहने वाले एक व्यक्ति ने तहरीर देते हुए बताया था कि उसके पुत्र ने 25 मार्च 2002 को छेड़खानी का मुकदमा दर्ज कराया था. 26 मार्च को गांव के ही हरिदास पुत्र वंशीधर, लालता, अखिलेश, झरपोटे उर्फ बृजेश कुमार पुत्रगण मक्खन लाल लोधी ने उक्त मुकदमे में राजीनामा करने का दबाव बनाते हुये जान से मारने की धमकी दी. मना करने पर एक राय होकर लाठी-डंडा से उसे, उसकी पत्नी व पुत्र को पीटकर जान से मारने की धमकी दी. इस घटना में तीनों घायल हो गए थे. पुत्र का पैर फ्रेक्चर हो गया था. पुलिस ने मामला दर्ज कर विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में पेश किया. मुकदमा दौरान अभियुक्त अखिलेश की मौत हो गई. न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों व गवाहों के आधार पर अभियुक्त हरिदास, लालता व झरपोटे उर्फ बृजेश कुमार को धारा 506 व धारा 3 (1)10 एससी/एसटी एक्ट में तीन- तीन साल की सजा और एक – एक हजार रुपये जुर्माना लगाया. अर्थदंड अदा न करने पर एक – एक माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

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गठबंधन के लिए दलित-मुस्लिम मतों को बचाना बड़ी चुनौती

भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा-बसपा और रालोद पहली बार इस लोकसभा चुनाव में प्रदेश में एकसाथ आए हैं. मगर, गठबंधन के लिए अपनी रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने की राह आसान नहीं है. राज्य में दलित, मुस्लिम और जाट मतों को बचाना गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती होगी. इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस जहां लगातार प्रयास कर रही है, वहीं भाजपा ने भी दलित और जाट समुदायों का साथ पाने के लिए खास रणनीति बनाई है.

कांग्रेस की बात करें तो सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उसने मुस्लिम प्रत्याशियों को भी चुनावी रण में उतारा है. इसके साथ ही भीम आर्मी के सहारे भी कांग्रेस दलितों में सेंध लगा रही है. कांग्रेस का मानना है कि दलित और मुस्लिम उनका ही वोट बैंक है, जिसे वह फिर से अपने साथ जोड़ना चाहती है.

वहीं, जाट और दलित मतदाताओं में सेंध लगाने के लिए भाजपा ने भी पूरी बिसात बिछा रखी है. इन दोनों ही वर्गों के बीच भाजपा की ओर से लगातार कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. जाट और दलित नेताओं को भाजपा ने संगठन में अहम पद देने के साथ ही कुछ नेताओं को राज्यसभा में भी भेजा है. इतना ही नहीं इन वर्गों के पार्टी नेताओं को अपने समुदायों के बीच भेजकर उन्हें केंद्र सरकार की लाभकारी योजनाओं का हवाला देकर भी वोट पक्के करने की कोशिश की जा रही है.

26 साल पहले भी सपा-बसपा की दोस्ती रंग लाई थी

सपा और बसपा के बीच सियासी दोस्ती 26 साल पहले भी रंग लाई थी. 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गई थी. वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा और सत्ता पर काबिज हुए. मगर, जून 1995 में हुए बहुचर्चित गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों दलों की दोस्ती टूट गई.

बसपा का सफर

14 अप्रैल 1984 को कांशी राम ने बसपा का गठन किया. उनके बाद मायावती ने इस पार्टी की कमान संभाली. मायावती उस दौरान दिल्ली में शिक्षिका थी. उन्होंने नौकरी छोड़कर राजनीतिक सफर की शुरुआत की. बसपा का पहला चुनाव चिन्ह चिड़िया था, लेकिन 1989 तक इस चुनाव चिन्ह पर उसे कोई जीत नहीं मिली. बाद में हाथी के निशान पर जीत मिलने पर बसपा ने हाथी को ही अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह बना लिया. मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रहीं. मगर, 2014 के लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी.

बसपा का इतिहास

चुनावी वर्ष          जीती सीटें (लोकसभा)         मिले मत (प्रतिशत में) 2014                   00                                19.77 2009                   20                                27.42 2004                   19                                24.67 1999                   14                                22.08 1998                   04                                20.90 1996                   06                                20.61

सपा का सफर

समाजवादी पार्टी (सपा) का गठन 4 अक्तूबर 1992 को हुआ था. मुलायम सिहं यादव ने जनता परिवार से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई. उन्होंने पहली बार बसपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें वह मुख्यमंत्री बने. 2012 में चुनाव जीतने पर मुलायम सिंह ने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया. पिछले लोकसभा चुनाव में सपा पांच सीटों पर ही जीत दर्ज करा सकी थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गई.

सपा का इतिहास

चुनावी वर्ष      जीती सीटें (लोकसभा)      मत मिले (प्रतिशत में) 2014               05                           22.35 2009               23                           23.26 2004               35                           26.74 1999               26                           24.06 1998               20                           28.70 1996               16                           20.84

श्रोत- हिन्दुस्तान.कॉम Read it also-2014 में चायवाला और अब चौकीदार, मायावती ने नरेंद्र मोदी पर साधा निशाना

वादाफरामोशी: जब तोप मुकाबिल हो, किताब निकालो….

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इसलिए कि अखबार जब तोप का बारूद बन जाए, तो निशाना जनता को ही बनना है. सूचित नागरिक ही सचेत नागरिक होता है और सचेत नागरिक ही सशक्त राष्ट्र बनाता है.

तो सूचित कहां से हो? उन अखबारों से जिनके लिए सच वही है, जो सत्ता कहे. या फिर उन स्वनामधन्य पत्रकारों से, जिनकी पत्रकारिता का आधार ही उनकी कुंठा और अवधारणा है. या फिर उन पत्रकारों से जो अपने स्टूडियो में बैठ ज्ञान गंगा बहाते हुए दूसरे पत्रकारों को गाली देते है कि आज मीडिया में सूचना नहीं सिर्फ भाव है. आखिर, अन्धविरोध और अन्धविश्वास में आखिर फर्क ही क्या रह गया है?

मान लिया कि सरकारी सच ही यथार्थ है और बाकी सब भ्रम. तो ठीक है. आप इस किताब “वादाफरामोशी” को पढिए. जानिए उस सच को, जो सरकारी है. सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है. अब कुछ को इस बात से भी आपत्ति हो सकती है कि आरटीआई तो ब्लैकमेलिंग का हथियार होता है. तो भाई ब्लैकमेल भी तो वही होता है जिसकी ढाढी में तिनका हो.

यह किताब क्यों पढे? ये किताब आप इसलिए भी पढे ताकि आप अपने पर्सेप्शन को एक दिशा दे सके, जो फिलहाल एक अनगाइडेड मिसाइल बना हुआ है. ये किताब सत्ता की चेरी बन चुकी सच के साथ आपको एक साक्षात्कार कराने का मौका देती है, इसलिए भी इसे पढे. यह जानने के लिए भी इसे पढे कि लोकतंत्र में जब नेता को नायक/रहनुमा का दर्जा देंगे तो आपके साथ क्या-क्या हो सकता है? जैसे कभी हमने इन्दिरा को दुर्गा बना कर अपने लिए मुसीबत मोली थी. ये किताब आपको एक नागरिक के तौर पर आपके जानने के हक को भी पारिभाषित करती है. यह बताती है कि आप व्हाट्स एप्प यूनिवर्सिटी के आकडों के बजाए उन आकडों पर विश्वास करे जो खुद सरकार ने मुहैया कराए है. वजाहत साहब ने जो भूमिका लिखी है, वह इस पुस्तक के उद्धेश्य को काफी सटीक तरीके से बताती है.

कुछ लोगों को इस बात से भी दिक्कत हो सकती है कि मोदी सरकार के सिर्फ 5 साल के कार्यकाल का ही हिसाब क्यों है इस किताब में? तो इसका जवाब ये है कि अव्वल तो इसमें कुछ ऐसी भी योजनाएं है जो यूपीए काल से चली आ रही है. दूसरा ये कि जब 70 साल की भारत दुर्दशा (जिसे मैं नहीं मानता) के लिए एक राजनीतिक दल को दोषी मान ही लिया गया है तो फिर हम भी वही काम करते तो क्या अनोखा करते? एक पत्रकार के तौर पर तो हमें यही पता है कि सत्ता से, सरकार से सवाल किया ही जाना चाहिए, जो हमने किया? आप भी कीजिए. अपने राज्य की सरकारों/आने वाली केन्द्रीय सरकारों से सवाल पूछिए. सवाल नहीं पूछेंगे तो जवाब नहीं मिलेगा. और सही सवाल नहीं पूछेंग तो सही जवाब नहीं मिलेगा. तो तय कीजिए कि आपके जीवन के लिए, आपके देश के लिए सही सवाल क्या है? यह तय करने में भी यह किताब आपकी मदद करेगी.

कुछेक मित्रों को इस बात से भी दिक्कत हो सकती है कि किताब का विमोचन अरविंद केजरीवाल से क्यों करवाया गया? तो, मित्र अरविन्द अभी 5 साल से राजनीति में है. हमने उन्हें 15 सालों से भी ज्यादा समय तक आरटीआई पर काम करते हुए देखा है. ये देखा है कि किस जूनून से उन्होंने हर बार जनता के इस अधिकार की रक्षा के लिए सडक पर लडाई लडी. आरटीआई पर आधारित एक किताब के विमोचन के लिए हमारे पास उनसे और वजाहत हबीबुल्लाह साहब से बेहतर नाम कोई और नहीं था. और इस बात पर तो मैं फिलहाल चर्चा भी नहीं करना चाहता कि किस-किस को हमने बुलाने की कोशिश की और किस-किस ने क्यों-क्यों हमें मना कर दिया.

अंत में, कल 24 मार्च को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में पुस्तक विमोचन-परिचर्चा के अवसर पर इतने पुराने मित्र, गुरु, शुभेच्छू मिले कि मन गदगद हो गया. उनका आशीर्वाद, उनकी शुभकामनाओं से इतना अभिभूत हूं कि उन्हें धन्यवाद बोल कर उनके प्रेम को कमतर नहीं बना सकता. मैं उनके इस स्नेह से नि:शब्द हूं.

तो आप सभी मित्रों से सादर अनुरोध है, इस किताब को पढिए. आलोचना कीजिए, समालोचना कीजिए. सबका स्वागत है.

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UP: मॉर्निंग वॉक पर निकले बसपा नेता की हत्या

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लोनी। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दिल्ली-यूपी बॉर्डर थाना क्षेत्र की उत्तरांचल विहार कॉलोनी में बदमाशों ने सोमवार सुबह मॉर्निंग वॉक करने जा रहे बहुजन समाज पार्टी नेता शब्बर ज़ैदी की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. बदमाशों ने घर से महज 100 मीटर की दूरी पर इस वारदात को अंजाम दिया. पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज कर बदमाशों की तलाश में जुट गई है.

मिली जानकारी के मुताबिक, बसपा नेता शब्बर ज़ैदी (55) बेहटा हाजीपुर गांव में रहते थे. सोमवार सुबह करीब छह बजे वह मॉर्निंग वॉक के लिए घर से बाहर निकले थे. वह सहज भाव से मॉर्निंग वॉक कर रहे थे, तभी घर से महज 100 मीटर दूर पहले से घात लगाए बैठे बदमाशों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी.

बताया जा रहा है कि गोलियां लगने से उनकी मौके पर मौत हो गई. लोगों की सूचना पर मौके पर पहुंची पुलिस ने शव पोस्टमार्टम को भेज दिया है. बॉर्डर थाना प्रभारी शैलेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि बदमाशों की तलाश की जा रही है.

इस घटना से शिया समाज के लोगों में रोष है. जानकारी मिलने पर समाज के सैकड़ों लोग मौके पर एकत्र हुए और घटना पर विरोध प्रकट किया. बसपा नेता शब्बर की पत्नी का नाम शहनाज है, जबकि तीनों बेटियों के नाम शदब, निगार और फराह हैं. बहुजन समाज पार्टी के नेता शब्बर जैदी 2007 में लोनी नगर पालिका का चेयरमैन का चुनाव भी लड़ चुके थे.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हत्या की यह वारदात सोमवार सुबह 6:20 की है, जब शब्बर जैदी मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे. घर से महज 100 मीटर दूरी पर एक बदमाश बाइक पर सवार होकर खड़ा था, जबकि कुछ बदमाश पास ही खड़ी स्विफ्ट कार में सवार थे. इस बीच बाइक और कार में सवार बदमाशों ने शब्बर को घेर लिया, इसके बाद बाइक सवार बदमाश उन्हें 20 मीटर तक घसीट कर ले गए फिर उन्हें गोली मार दी. छह गोलियां सीने के ऊपर मारी गईं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई. हत्या के तरीके को देखकर कहा जा रहा है कि यह राजनीतिक के साथ निजी दुश्मनी का भी नतीजा हो सकती है.

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IPL 2019: रिषभ पंत ने की चौकों-छक्कों की बरसात

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मुंबई। रिषभ पंत को पिछले कुछ सालों से टीम इंडिया में महेंद्र सिंह धोनी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है. पंत ने अपने शानदार प्रदर्शन के जरिए भारतीय टेस्ट टीम में अपनी जगह पक्की कर ली है और सफेद जर्सी में लगातार धोनी के बनाए रिकॉर्ड्स को तेजी से अपने नाम कर रहे हैं. लेकिन सीमित ओवरों की क्रिकेट में वो अभी धोनी की जगह लेने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं. उन्हें टीम इंडिया में सीमित ओवरों की क्रिकेट में अब तक जो मौके मिले वो चयनकर्ताओं के साथ-साथ प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. ऐसे में एक बार फिर उनके सामने अपनी काबीलियत साबित करने का आईपीएल के रूप में शानदार मौका है. जहां किया शानदार प्रदर्शन उनके लिए आगामी वर्ल्डकप के लिए टीम इंडिया के दरवाजे खोल देगा. इस राह पर चलते हुए उन्होंने आईपीएल के 12वें सीजन का आगाज वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई के खिलाफ धमाकेदार अंदाज में किया और चौकों छक्कों की बारिश करते हुए रिकॉर्ड्स की झड़ी लगा दी.

टूटा धोनी का 7 साल पुराना रिकॉर्ड

रविवार को पंत ने दिल्ली कैपिटल्स के लिए सीजन के पहले मैच में 27 गेंदों में नाबाद 78 रन की पारी खेलकर विश्वकप की टीम में शामिल होने के लिए अपना दावा पेश कर दिया. अपनी इस पारी के दौरान उन्होंने 7 चौके और 7 गगनचुंबी छक्के जड़े. यानी 70 रन उन्होंने केवल चौकों छक्कों के जरिए बनाए. अपनी पारी के 8 रन उन्होंने केवल दौड़कर लिए. मुंबई के गेंदबाजों की जमकर धुनाई करते हुए उन्होंने अपना अर्धशतक 18 गेंदों में पूरा किया. इसके साथ ही उन्होंने धोनी का एक और रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. रिषभ अब मुंबई के खिलाफ आईपीएल में सबसे तेज अर्धशतक जड़ने वाले बल्लेबाज बन गए हैं. साल 2012 में धोनी ने मुंबई के खिलाफ 20 गेंदों में अर्धशतक जड़ा था. रिषभ की पारी की सबसे रोचक बात यह रही कि उन्होंने शुरुआती 5 गेंद में केवल 1 रन बनाए थे इसके बाद अगली 13 गेंदों में ताबड़तोड़ रन बनाते हुए अर्धशतक पूरा कर लिया.

आईपीएल पारी में सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट

पंत की 27 गेंद पर 78 रन की पारी आईपीएल इतिहास की 20 गेंद की चौथी सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट वाली चौथी पारी बन गई. पंत ने 288.89 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए. 20 गेंदों से ज्यादा गेंद खेलने के बाद सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट से रन बनाने वाले खिलाड़ियों की सूची में पहले पायदान पर सुरेश रैना हैं. रैना ने किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ साल 2014 में 348 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए थे. उस मैच में उन्होंने 25 गेंद पर 87 रन की पारी खेली थी. इस सूची में दूसरे पायदान पर यूसुफ पठान(327.27) और तीसरे पर इशान किशन(295.24) हैं.

आईपीएल पारी में सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट( 20+ गेंद) खिलाड़ी            स्कोर          बनाम          वेन्यू             साल सुरेश रैना        87(25)       पंजाब         वानखेड़े         2014 यूसुफ पठान     72(22)       हैदराबाद      इडेन गार्डन्स   2014 इशान किशन    62(21)       कोलकाता    इडेन गार्डन्स    2018 रिषभ पंत        78*(27)     मुंबई         वानखेड़े          2019

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस तारीख से शुरू होगी एडमिशन की प्रक्रिया

नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन की प्रक्रिया अप्रैल में शुरू हो जाएगी. अंडर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमफिल और पीएचडी में एडमिशन की प्रक्रिया 15 अप्रैल से शुरू हो जाएगी. इस साल एडमिशन की प्रक्रिया 1 महीने पहले शुरू हो रही है. अंडर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमफिल और पीएचडी कोर्स में एडमिशन की प्रक्रिया 7 मई को समाप्त होगी. एडमिशन के लिए अप्लाई करने वाले स्टूडेंट्स को अपने एप्लीकेशन फॉर्म में सुधार करने का मौका दिया जाएगा. स्टूडेंट्स 20 मई से अपने एप्लीकेशन फॉर्म में सुधार कर पाएंगे.

डीयू में दाखिले के लिए एक्स्ट्रा को-करिकुलर एक्टिविटीज और स्पोर्ट्स फिटनेस ट्रायल 20 मई से शुरू होगा. इन ऑप्शन के माध्यम से एडमिशन कट ऑफ जारी होने से पहले शुरू हो जाएगा. डीयू के सभी कॉलेजों में स्पोर्ट्स और एक्स्ट्रा-करिकुलर कोटा के तहत 5 प्रतिशत सीटें रिजर्व है. इस बार अगर स्टूडेंट अपनी स्ट्रीम बदलता है तो उसके 2 फीसदी अंक ही काटे जाएंगे. जबकि पहले ऐसा करने पर स्टूडेंट्स के 5 फीसदी अंक काटे जाते थे.

बता दें कि पिछले साल दिल्ली यूनिवर्सिटी (Delhi University) की 60 हजार सीटों पर ए़डमिशन के लिए 3 लाख के करीब स्टूडेंट्स ने आवेदन किया था. पिछले साल यूनिवर्सिटी ने 9 कट ऑफ लिस्ट जारी की थी. दिल्ली यूनिवर्सिटी की पहली कट ऑफ लिस्ट आने के बाद उसके विभिन्न कॉलेजों में 11,000 से ज्यादा स्टूडेंट्स ने एडमिशन लिया था.

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महागठबंधन के लिए कांग्रेस ने खड़ी की मुश्किल

नई दिल्ली। 2019 के सियासी संग्राम में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने का जो अभियान कांग्रेस लेकर चली थी, खासकर यूपी में वो बिखरता नजर आ रहा है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी जिस तरह से टिकटों का बंटवारा कर रही है, वह महागठबंधन के लिए मुश्किल पैदा करने वाला है. कांग्रेस ने जिस तरह टिकटों के बंटवारे में मुस्लिम प्रत्याशियों को तरजीह दी है, वह दलित-यादव-मुस्लिम समीकरण के भरोसे उत्तर प्रदेश की 78 सीटें फतह करने का सपना देखने वाली सपा-बसपा गठबंधन के लिए परेशान करने वाला है. इससे बहुजन समाज पार्टी के लिए ज्यादा मुश्किलें दिखाई दे रही हैं.

कांग्रेस की ओर से जारी उम्मीदवारों की लिस्ट में मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर और अमरोहा चार ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं, जिसने कांग्रेस की मंशा बता दी है. इन सभी जगहों पर कांग्रेस ने कद्दावर मुस्लिम चेहरों को मौका दिया है. कांग्रेस पार्टी ने मुरादाबाद से जाने-माने शायर इमरान प्रतापगढ़ी, बिजनौर से नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सहारनपुर से इमरान मसूद और अमरोहा से राशिद अलवी को टिकट दिया गया है. ये चारों सिर्फ प्रत्याशी भर नहीं हैं, बल्कि इनकी अपनी अलग खास पहचान भी है. इमरान प्रतापगढ़ी मशहूर शायर हैं और जनता के बीच उनका क्रेज काफी है. नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी मायावती के राइट हैंड कहे जाते थे, और यूपी के कुछ खास क्षेत्रों में मुस्लिमों के बीच उनकी पैठ से इंकार नहीं किया जा सकता. तो वहीं इमरान मसूद पश्चिम यूपी में कांग्रेस के सबसे मुखर चेहरे के तौर पर उभरे हैं. इसी तरह राष्ट्रीय प्रवक्ता होने के नाते राशिद अलवी पूरे देश में अपनी पहचान रखते हैं. अल्वी एक दौर में बसपा में भी रह चुके हैं.

इन चारों सीटों के समीकरण को देखें तो गठबंधन के लिए विपरीत परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं. इन चारों लोकसभा क्षेत्रों में मुसलमान वोट निर्णायक भूमिका में है. मुरादाबाद सीट पर वह 45 फीसदी, बिजनौर सीट पर 38 फीसदी, सहारनपुर सीट पर 39 फीसदी और अमरोहा सीट पर37 फीसदी मुस्लिम वोट हैं. मुरादाबाद में तो अब तक इस सीट पर हुए 17 चुनावों में से 11 बार मुस्लिम प्रत्याशियों ने बाजी मारी है. जहां तकसहारनपुर सीट की बात है तो राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले इमरान मसूद को 2014 में मोदी लहर के बाजवूद 34 फीसदी वोट मिले थे, जबकि बीजेपी से जीतने वाले राघव लखनपाल को 39 फीसदी मत प्राप्त हुए थे. ऐसा की कड़ा मुकाबला अमरोहा सीट पर भी होता दिख रहा है. जेडीएस छोड़कर बसपा में शामिल हुए कुंवर दानिश अली अमरोहा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, इसी सीट पर कांग्रेस ने राशिद अल्वी को उतारकर उनकी चुनौती बढ़ा दी है. ऐसे में इन दोनों की लड़ाई में बीजेपी को भी बड़ा मौका मिल सकता है.

अब सवाल यह है कि कांग्रेस आखिर महागठबंधन और खासकर मायावती को नुकसान क्यों पहुंचाना चाहती है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस ऐसा एक खास रणनीति के तहत कर रही है. चर्चा यह भी है कि जिस तरह बसपा प्रमुख मायावती कांग्रेस पर एक के बाद एक हमले कर रही थीं, उससे खार खाए कांग्रेस ने भी उन जगहों पर बसपा को घेरना शुरू कर दिया है, जहां वह बड़े नामों को उतार सकती है. अब बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस की इस नीति से महागठबंध और खासकर बसपा को नुकसान होगा या फिर बसपा अपनी रणनीति के जरिए अपने प्रत्याशियों की नैया पार लगाने में कामयाब होगी. या फिर कहीं बसपा और कांग्रेस की इस लड़ाई में कहीं भाजपा तो बाजी नहीं मार ले जाएगी. एक बड़ा सवाल यह भी है कि कहीं कांग्रेस की इस रणनीति का प्रभाव पूरे उत्तर प्रदेश में न हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह महागठबंधन के लिए खतरे ही घंटी होगी.

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12वीं के बाद क्या करें? CBSE ने सुझाए 113 कॅरियर ऑप्शन

नई दिल्ली। 12वीं के बाद नए कोर्सेज को एक्सप्लोर करने में स्टूडेंट्स की मदद के लिए सीबीएसई ने स्टेम और नॉन स्टेम कोर्सेज की लिस्ट जारी की है. न्यू एज कोर्सेज के बारे में जरूरी जानकारी जैसे ऐरॉनॉटिकल इंजिनियरिंग, रोबॉटिक्स, साइबर सिक्यॉरिटी, फॉरेस्ट्री, क्यूरेशन लिबरल स्टडीज आदि भी सीबीएसई के ऑफिशल पोर्टल cbse.nic.in पर जारी की गई है.

जिसका लिंक हम आपको शेयर कर रहे है-http://cbse.nic.in/newsite/attach/Compendium%20of%20Courses%20after%20+2.pdf

सीबीएसई की चेयरपर्सन अनीता करवाल ने अपने बयान में कहा, ‘बोर्ड ने स्टूडेंट्स के लिए कोर्सेज का संग्रह तैयार किया है, ताकि उन्हें अलग-अलग कोर्स, इंस्टीट्यूट्स के बारे में जानकारी मिल सके.’ इस लिस्ट में 113 कॅरियर ऑप्शन उपलब्ध हैं जिनमें ऐस्ट्रोनॉमी और ऐस्ट्रोफिजिक्स, फ्लोरीकल्चर/हॉर्टीकल्चर, फिशरीज, स्पीच लैंग्वेज और हियरिंग, कॉस्ट एंड वक्र्स अकाउंट, इंस्ट्रुमेंटेशन इंजीनियरिंग, फूड टेक्नोलॉजी जैसे कोर्स शामिल हैं.

अनीता करवाल ने कहा कि यह सब करने के पीछे का उद्देश्य स्टूडेंट्स में पर्याप्त जिज्ञासा पैदा करना है. बता दें कि इस संग्रह में भारत की करीब 900 यूनिवर्सिटीज और 41 हजार कॉलेजों की जानकारी है. इसमें एलिजबिलिटी क्राइटेरिया और अलग-अलग कोर्सेज की लिस्ट भी शामिल है.

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आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर रोडवेज बस में लगी आग, 4 की मौत

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सोमवार देर रात तकरीबन दो बजे दिल्ली से लखनऊ जा रही रोडवेज बस में आग लग गई. बस में आग लगते ही यात्रियों में चीख़पुकार मच गई. जब तक बस में सवार यात्री उतर पाते तब तक एक बच्चा एक महिला सहित 4 यात्री जिंदा जल गए. घटना की जानकारी पाते ही जिले के आला अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं. फायर ब्रिगेड और डॉक्टरों की टीम को मौके पर बुला लिया गया है.

दिल्ली के आनंद विहार से लखनऊ के आलमबाग जा रही रोडवेज बस में आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे पर माइलस्टोन 77 के निकट अचानक आग लग गई. आग लगने से बस पूरी तरह जलकर राख हो गई. घटना की जानकारी मिलते ही डीएम पीके उपाध्याय, एसपी अजय शंकर राय, एएसपी ओमप्रकाश सिंह, सीओ करहल राकेश पांडेय भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. चिकित्सकों की टीम भी मौके पर बुला ली गई.

घटना की जानकारी पाकर करहल मैनपुरी से पहुची फायर ब्रिगेड की गाड़ियों ने आग पर काबू पाया. लेकिन तब तक बस जलकर पूरी तरह राख हो गई. इस दौरान ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई.

बस में कितने यात्री थे इसकी कोई जानकारी नहीं हो सकी है. आग लगने के कारणों का भी अभी पता नहीं चला है. हालांकि शॉर्ट सर्किट से आग लगने की बात फिलहाल सामने आई हैं. सीओ सिटी का कहना है बस अंदर से पूरी तरह बंद है. बस काटने के लिए कटर मंगाने के प्रयास किए जा रहे हैं. इसके बाद ही मरने वालों की संख्या का ठीक से पता चल सकेगा.

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