अगर ब्राह्मण को यहाँ पर खिलाया हुआ भोजन पितरों को पितृ लोक में पहुँच सकता है तो फिर एक यात्री को लम्बी यात्रा पर चलने से एक दिन पहले ब्राह्मण को बुला उतने दिनों का भोजन ठूंस ठूंस कर खिला देना चाहिए जितने दिन उसे यात्रा में लगने हैं। फिर उसे अपने साथ कोई भी राशन आदि लेकर चलने की ज़रुरत नहीं रहेगी।.. पढ़िए पितृ पक्ष के बारे में क्या कहते थे चार्वाक…
आज से पितृ पक्ष शुरू हो गया है। हिन्दू धर्म के मुताबिक इसमें पितरों यानी पूर्वजों के लिए पिंड दान किया जाता है। पितृ पक्ष के पीछे एक पौराणिक कथा है जो महाभारत में है। इस के अनुसार कर्ण जिसे महादानी कहा जाता है, के मरने पर जब उसकी आत्मा मृत्युलोक में पहुंची तो उसे वहां पर बहुत सा सोना चांदी तो मिला परन्तु कोई भोजन नहीं मिला। इसका कारण यह था कि कर्ण बहुत दानी था और उसने बहुत सोना चांदी तो दान में दिया था परन्तु कभी भी भोजनदान नहीं किया था। कथा के अनुसार उसने मृत्यु लोक के देवता यमराज से इसका कोई हल निकालने की प्रार्थना की। यमराज की कृपा से कर्ण इस पक्ष में पृथ्वी पर वापस आया। उसने भूखे लोगों को भोजन दान किया और फिर वापस पितृ लोक चला गया जहाँ उसका स्थान था। अतः अन्न दान या भोजन दान इस अनुष्ठान का मुख्य हिस्सा होता है। हिन्दू लोग इन दिनों में कठोर अनुशासन और अनुष्ठान करते हैं। इस पक्ष में लोग दाढ़ी नहीं बनाते और कोई आमोद प्रमोद नहीं करते। इस पक्ष में कोई खरीददारी नहीं की जाती और कोई धंधा शुरू नहीं किया जाता है। इसमें ब्राह्मणों को भोजन दान किया जाता है। इसके पीछे यह भी विश्वास है कि पृथ्वी पर किया गया भोजन दान पितरों तक पहुंचता है और उन की तृप्ति होती है। ऐसा विश्वास है इस पक्ष में किये गए अनुष्ठान से पूर्वजों की बिछड़ी हुयी आत्माओं को शांति मिलती है। इस के बदले में वे पिंडदान करने वालों को आशीर्वाद देती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन पितरों के लिए पिंडदान या श्राद्ध नहीं किया जाता उन्हें मृत्यु लोक में ठौर नहीं मिलता या उनकी गति नहीं होती और वे पृथ्वी पर इधर उधर भटकती रहती हैं। इस पक्ष में अपनों की बिछड़ी हुयी आत्माओं को याद किया जाता है और उनके लिए प्रार्थना की जाती है। इसीलिए इस पक्ष में कड़े अनुष्ठान और कर्म कांड का अनुपालन किया जाता है।
श्राद्ध और पिंडदान के बारे में शुरू से ही बहुत अलग अलग विचार रहे हैं। कुछ लोग इसे पितरों की तृप्ति के लिए आवश्यक मानते हैं और कुछ इसे ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बहाना मात्र। इस सम्बन्ध में चार्वाक जो कि अनात्मवादी थे, द्वारा की गयी आलोचना बहुत सशक्त है। चार्वाक जिसे ब्राह्मणों ने भोगवादी कह कर निन्दित किया था ने कहा है:
“मरने के बाद सब कुछ ख़त्म हो जाता है और कुछ भी शेष नहीं बचता। पिंडदान और श्राद्ध ब्राह्मणों द्वारा खाने पीने का बनाया गया ढकोसला है।” चार्वाक ने आगे कहा,” अगर ब्राह्मण को यहाँ पर खिलाया हुआ भोजन पितरों को पितृ लोक में पहुँच सकता है तो फिर एक यात्री को लम्बी यात्रा पर चलने से एक दिन पहले ब्राह्मण को बुला उतने दिनों का भोजन ठूंस ठूंस कर खिला देना चाहिए जितने दिन उसे यात्रा में लगने हैं। फिर उसे अपने साथ कोई भी राशन आदि लेकर चलने की ज़रुरत नहीं रहेगी। रास्ते में जब उसे भूख लगे तो उस ब्राह्मण को याद कर ले जिससे उस को खिलाया गया भोजन उस यात्री के पेट में स्वतः आ जायेगा।”
यह ज्ञातव्य है कि प्राचीन काल में सभी यात्राएं पैदल ही होती थीं और लोग अपना राशन पानी सर पर लेकर चलते थे और रास्ते में रुक कर अपना भोजन खुद बनाते थे क्योंकि दूसरों के हाथ का बना भोजन खाने से ‘जात’ (जाति) जाने का डर रहता था। नेपाल में तो जहाँ तक था कि अगर किसी उच्च जाति हिन्दू को बाहर जाकर अपनी जात से नीची जात वाले के हाथ का भोजन खाना पड़ जाये तो उस की जात चली जाती थी और वह अपने घर सीधा नहीं जा सकता था क्योंकि उसकी पत्नी उसे चौके में नहीं चढ़ने देती थी। इसलिए उसे घर जाने से पहले पुलिस के पास जाना पड़ता था और वहां पर जात जाने के कारण अर्थ दंड जमा करना पड़ता था और उस का प्रमाण पत्र लेकर ही वह अपने घर में जा सकता था। अब जहाँ तक अपने पूर्वजों को याद करने की बात है इस में कुछ भी आपतिजनक नहीं है परन्तु पितरों के नाम पर केवल ब्राह्मणों को ही खिलाना बहुत अर्थपूर्ण नहीं लगता। हाँ, अगर उन लोगों को खिलाया जाये जो भूखे नंगे हैं और अपना जीवनयापन खुद नहीं कर सकते हैं तो यह कल्याणकारी है। बुद्ध ने दान को बहुत महत्व दिया है क्योंकि संसार में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो अपनी आजीवका खुद नहीं कमा सकते। अतः जो सक्षम हैं उन्हें अपनी कमाई में से उन लोगों के लिए मानवीय आधार पर दान अवश्य देना चाहिए। दान के सम्बन्ध में बुद्ध ने आगे स्पष्ट किया है कि दान केवल सुपात्र को देना चाहिए कुपात्र को नहीं अर्थात दान उसे ही देना चाहिए जिसे उसकी ज़रुरत है। परन्तु देखा गया है कि अधिकतर दान अंध श्रद्धावश कुपात्रों को दिया जाता है सुपात्रों को नहीं। यह दान की मूल भावना के विपरीत है। क्या श्राद्ध और पिंडदान में कुछ ऐसा ही तो नहीं है?


पिछले महीने ही हमारी बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि माननीय राम स्वरूप वर्मा जी से इनका काफी नाता रहा है। अगस्त महीने में ही वर्मा जी की जयंती और परिनिर्वाण दोनो आता है। मैंने आग्रह किया कि आप एक लेख लिख दीजिये। उन्होंने लिखा, दलित दस्तक में छपा। 01 अगस्त को फोन आया कि लेख पढ़ कर बहुत फोन आ रहा है। मुझे भी पत्रिका भेज दीजिये। मैंने आज ही पत्रिका पोस्ट किया उनको और शाम को सूचना मिली कि दयानाथ निगम जी (संपादक, अम्बेडकर इन इंडिया) नहीं रहे। बड़ा झटका लगा।
31 जनवरी 2020 को दिल्ली में “मूकनायक के 100 साल: अम्बेडकरी पत्रकारिता के 100 साल” कार्यक्रम में हमने दयानाथ निगम जी को “मान्यवर कांशीराम पत्रकारिता सम्मान” से सम्मानित किया था। (नीचे लगी तस्वीर उसी कार्यक्रम की है।)
इतना बुजुर्ग होने के बावजूद वो अक्सर दिल्ली में आयोजित तमाम कार्यक्रमों में मिल जाते थे। “कैसे हैं संपादक जी,” ऐसे ही संबोधित करते। मैं कहता, “आप बड़े हैं, सिर्फ अशोक बोला करिये।” हँस कर कहते अरे आप बड़े संपादक हैं।
हमने आज एक जिंदादिल इंसान, बाबासाहेब का सच्चा सिपाही खो दिया। वो बहुत कम पढ़े थे, लेकिन बाबासाहेब के मिशन को लोगों तक पहुंचाने के लिए पत्रकारिता की राह चुनी। और आखिरी दम तक इस काम को करते रहे।
शांति स्वरूप बौद्ध के बाद एक और महान आंबेडकरवादी सरकारी दुर्व्यवस्था का शिकार हो कोरोना की बलि चढ़ गया। पूर्व मंडालायुक्त और सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता हरिशचंद्र जी से यह मर्माहत करने वाली सूचना मिली कि अंबेडकर इन इंडिया के संपादक दयानाथ निगम हमेशा-हमेशा के लिए हम सब को छोड़कर चले गए। वे लखनऊ में रहते रह रहे थे।
यह स्वाभाविक मौत नहीं हुई है। वे उत्तर प्रदेश की बदत्तर स्वास्थ्य व्यवस्था और योगी आदित्यनाथ की सरकार की लापरवाही के शिकार हुए हैं। कल शाम से ही उनकी स्थिति खराब होने लगी थी। परिजनों ने अस्पताल में भर्ती कराने के लिए प्रयास किया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि पहले कोरोना टेस्ट कराइए, फिर भर्ती लेंगे। पूरी रात परिजन भर्ती के लिए प्रयास करते रहे, लेकिन किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हो पाए।
लखनऊ में रह रहे पूर्व मंडालायुक्त हरिशचंद्र जी ने एडीएम से भी बात किया, लेकिन फिर भी उन्हें भर्ती के लिए अस्पताल में जगह नहीं मिल पाई। हरिशचंद्र जी के प्रयासों से आज उनका रैपिड़ टेस्ट हुआ, जिसमें कोरोना पाजटिव पाए गए। उसके बाद भी उन्हें किसी अस्पताल में जगह नहीं मिली। रात से ही उनका आक्सीजन लेबल गिरता जा रहा था। आखिरकार कुछ घंटों पहले (4 अगस्त की शाम) असमय वे हम लोगों को छोड़ हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।
लेखकः एस.आर दारापुरी आइपीएस (से.नि.)
मैं उत्तर प्रदेश का 1972 बैच का आइपीएस अधिकारी हूं। 2003 में आई.जी. (पुलिस) के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं मानवाधिकार, दलित अधिकार, आरटीआई, वन अधिकार अधिनियम, भोजन और शिक्षा का अधिकार आदि मुद्दों पर सक्रिय रहा हूं। मैं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, उत्तर प्रदेश का उपाध्यक्ष हूँ। मैं पूर्व में राष्ट्रीय अनुसूचि4 और 2019 में रॉबर्ट्सगंज (यूपी) निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा है। हमारा मुख्य काम उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जिलों के दलितों, आदिवासियों, किसानों और ठेका मजदूरों के बीच है। एक पार्टी के रूप में हमने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएएत जाति आयोग का सलाहकार रहा हूं। वर्तमान में मैं आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का राष्ट्रीय प्रवक्ता हूं। मैंने 201) का विरोध किया। हम मानते हैं कि वे भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के खिलाफ हैं। हमने 19 दिसंबर 2019 को लखनऊ में सीएए का शांतिपूर्ण विरोध करने का फैसला किया था।
21 दिसंबर को, मुझे हज़रतगंज थाने में शाम 5.30 बजे तक हिरासत में रखा गया और जेल की वैन में जेल ले जाया गया। मुझे शाम 7 बजे के आसपास रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मैंने पिछले मैजिस्ट्रेट को जो बताया था उसे दोहराया। लेकिन इस सज्जन ने कोई ध्यान नहीं दिया और मेरे 14 दिनों के जेल रिमांड पर हस्ताक्षर कर दिए।
उन्होंने कृपापूर्वक मुझसे कहा, “आपने खुद पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। निश्चित रूप से आप जानते होंगे कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है।” मैं लगभग 09.30 बजे जेल की बैरक में पहुँच गया।
आप देख सकते हैं कि 19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था लेकिन फिर भी मेरे खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के कारण मुझे फंसाया गया है। जैसा कि आपने सुना होगा कि योगी सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए हमारे नाम और पते और क्षति पूर्ती के लिए हमारे पोस्टर / होर्डिंग्स लगा दिए थे। इसने हमें न केवल बदनाम करने, बल्कि व्यक्तिगत हमलों के लिए भी प्रचारित किया है। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने योगी सरकार को अवैध रूप से लगाए गए होर्डिंग्स को हटाने का निर्देश दिया, लेकिन राज्य ने उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ कोई स्टे प्राप्त न हुए बिना भी इसका पालन करने से इनकार कर दिया। मार्च में मुझे रुo 64 लाख की रिकवरी का नोटिस दिया गया जबकि अब तक मेरा अपराध किसी भी अदालत में साबित नहीं हुआ है। मैंने मार्च के महीने में वसूली नोटिस के स्टे के लिए इलाहाबाद की लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर की थी लेकिन कई तारीखों के बाद भी अब तक कोई आदेश नहीं दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि तहसीलदार सदर, लखनऊ द्वारा जारी किया गया रिकवरी नोटिस अवैध है क्योंकि यह जिस धारा 143 (3) के तहत जारी किया गया है वह यूपी राजस्व संहिता में मौजूद ही नहीं है। इस बीच, राजस्व अधिकारी मेरे घर पर छापा मार रहे हैं, मेरी गिरफ्तारी और मेरी घर की संपत्ति को जब्त करने की धमकी दे रहे हैं।
Written By- Shailesh Narwade
“There is a huge gap of this kind of content. Only a few filmmaker are making such films. We met several people, who liked the projectbut not all of them are capable of funding it. We need support from like-minded people in India and abroad,” Shailesh added.
Veteran filmmaker Shyam Benegal’s ‘Manthan’ was the best example of crowdfunded film in India. Bollywood filmmaker Rajat Kapoor has also crowdfunded for his next film on Crowdera recently. Filmmaker Jyoti Nisha successfully raised over Rs 20 lakh for her documentary ‘Ambedkar: Then and Now’ on another crowdfunding platform.
जस्टिस कर्णन के मामले में चौंकाने वाली बात यह थी कि वह देश के पहले ऐसे हाईकोर्ट जज रहे हैं, जिनको सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की सजा सुनाई। यह तब हुआ जब जस्टिस काटजू और सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत वकील रामजेठमलानी जैसे कई लोग अदालत के खिलाफ बहुत कड़वी बातें कह कर भी बचकर निकल जाते रहे हैं। जबकि जस्टिस कर्णन ने देश की न्याय व्यवस्था को सुधारने की कोशिश की थी। देश की न्यायपालिका में बैठे कुछ करप्ट जजों की पोल खोलने को लेकर कवायद की थी। उन्होंने प्रधानमंत्री तक को इन तमाम बातों के बारे में चिट्ठी लिखी। लेकिन अदालत ने अपने भीतर झांकने और चीजों को दुरुस्त करने की बजाय जस्टिस कर्णन की कवायद को अदालत की अवमानना मानकर उनके खिलाफ मुकदमा शुरू कर दिया। जबकि जस्टिस कर्णन प्रकरण के कुछ महीने बाद ही सुप्रीम कोर्ट के कई जजों ने जब मीडिया के सामने आकर उन्हीं सवालों को उठाया तो सबने उनके हिम्मत की खूब सराहना की गई।
इस मामले के तुरंत बाद एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जिसने भारतीय न्याय प्रणाली पर एक बार फिर सवाल उठा दिया है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिकॉर्ड (NCRB) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों में पता चला है कि जेलों में बंद दलितों और आदिवासियों की संख्या उनकी आबादी के अनुपात से अधिक है। जबकि सवर्णों की बात करें तो इस जाति के लोग उनकी आबादी की अनुपात से कम संख्या में जेलों में हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिकॉर्ड (NCRB) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताकि 2019 के अंत में जेल में बंद कुल दोषियों में से 21.7 प्रतिशत दलित थे। वहीं विचाराधीन कैदियों में से 21 प्रतिशत अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं। वहीं जेल में बंद दोषियों में आदिवासी समाज के 13.6 प्रतिशत कैदी हैं जबकि विचाराधीन कैदियों का प्रतिशत 10.5 प्रतिशत हैं। अब हम इन दोनों समुदायों की आबादी की बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या में दलित समाज की आबादी 16.6 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जनजाति यानि आदिवासी समाज की आबादी 8.6 प्रतिशत है।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद साफ है कि एससी-एसटी समाज को सरकार द्वारा बेहतर कानूनी मदद नहीं मिल पाती, और न ही उनके पास इतने पैसे होते हैं कि वह खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए बेहतर वकील कर सकें। ऐसे में एक बार किसी मामले में उनका नाम आने के बाद वह कानूनी जटिलताओं में उलझ कर रह जाते हैं। या तो वह दोषी करार दिये जाते हैं या फिर विचाराधीन कैदी बन कर सालों जेल की सलाखों के पीछे रहने को मजबूर होते हैं।
जाति को लेकर सिर्फ आरक्षण की चर्चा करने की ट्रेनिंग सवर्ण परिवारों में अक्सर बचपन में ही दे दी जाती है. ऐसे बच्चों और बच्चियों के लिए समस्या जातिवाद नहीं, आरक्षण है, जबकि राष्ट्र निर्माताओ ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान जाति समस्या के इलाज के तौर पर इसलिए किया है, ताकि तमाम समुदायों, खासकर सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को राजकाज में हिस्सेदारी देकर उन्हें राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा बनाया जा सके.
ऐसे बच्चे जब जाति की बात आने पर फौरन आरक्षण की बात करने लगते हैं और सारी समस्याओं की जड़ इसे ही बताने लगते हैं, तो दरअसल वे अपनी जानकारी में कोई झूठ नहीं बोल रहे होते हैं. दरअसल इस मसले पर उनको सिर्फ यही तर्क सिखाया जाता है. सिखाने वालों में माता-पिता, रिश्तेदार, दोस्त आदि होते हैं, जो भारतीय स्थितियों में अक्सर अपनी ही जाति या अपने ही जाति समूह के होते हैं. कंगना रानौत जाति के बारे में जो बोल रही हैं, वह इस मायने में सच है कि इसके अलावा कोई सच उनको आज तक किसी ने बताया ही नहीं है.
द प्रिंट में प्रकाशित दिलीप मंडल के इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए
निषाद के इस बयान के बाद राम के मुद्दे को लेकर सियासी घमासान मच गया था। और चूंकि अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन से साफ है कि भाजपा यूपी से लेकर केंद्र तक अगला चुनाव राम के ही नाम पर लड़ेगी, राम को लेकर निषाद का बयान देना सपा मुखिया अखिलेश यादव को परेशान कर गया। जिसके बाद अखिलेश यादव के आदेश पर जुझारू नेता लोटन राम निषाद को पद से बर्खास्त कर दिया गया।
अब यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष के पास अपने मुद्दे नहीं हैं, और विपक्ष अब भाजपा और संघ के बनाए एजेंडे पर नाचता रहेगा? क्या यह मान लिया जाए कि उत्तर प्रदेश के विपक्ष के पास अपना ऐसा कोई थिंक टैंक नहीं है, जो सत्ता पक्ष को अपने बनाए मुद्दों पर घेर सके और प्रदेश की जनता को सत्ता पक्ष के खिलाफ मुद्दे दे सके।
जहां तक विचारधारा का सवाल है तो बहुजन दलों की सबसे बड़ी कमजोरी उनका अपनी बहुजन विचारधारा और संस्कृति को छोड़कर उधार की संस्कृति के बूते जीने की आदत रही है। बहुजन संस्कृति, जिसका अपना शानदार और गरिमापूर्ण इतिहास रहा है, ओबीसी नेतृत्व वाले राजनैतिक दल उससे कोसो दूर हैं। ये दल बहुजन विचारधारा के नाम पर अपने समाज के मतदाताओं को जोड़ने की बजाय सवर्णों की संस्कृति को ढोने में ही व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि ये दल ज्यादातर मौकों पर सत्ता पक्ष के मुद्दों पर खेल रहे होते हैं और अपनी लकीर नहीं खींच पाते।
अम्बेडकरी समाज से ताल्लुक रखने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के दिव्यांग तैराक सतेन्द्र सिंह लोहिया के पदकों की लिस्ट में एक और महत्वपूर्ण सम्मान जुड़ गया है। युवा एवं खेल मंत्रालय ने सतेन्द्र सिंह को तेनजिंग नौरगे नेशनल एडवेंचर अवार्ड (Tenzing Norgay National Award) 2019 देने की घोषणा की है। यह अवार्ड अर्जुन अवार्ड के समकक्ष होता है। आमतौर पर यह अवार्ड सेना के जवानों (जल, थल और वायु) को दिया जाता है। लेकिन खास बात यह है कि देश में पहली बार किसी पैरा खिलाड़ी को यह अवार्ड देने की घोषणा की गई है।
Written By- दयानाथ निगम
देश का सबसे बड़ा सूबा है उत्तर प्रदेश। इस प्रदेश ने कई नायकों को जन्म दिया। यही वह प्रदेश है, जहां से पिछड़े समाज को जगाने वाले नायक बड़ी संख्या में निकले। राम स्वरूप वर्मा का नाम उसमें प्रमुखता से शामिल है। यूपी के कानपुर देहात के गौरी करन गाँव में 22 अगस्त 1923 को एक साधारण कुर्मी किसान परिवार में रामस्वरूप वर्मा का जन्म हुआ। माता पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा ग्रहण करे, सो उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम०ए॰ और आगरा विश्विद्यालय से एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की। यह उस समय की बात है जब ब्रिटिश हुकूमत के कारण शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा का रास्ता प्रशस्त हो रहा था जिसका लाभ माननीय रामस्वरूप वर्मा को मिला। रामस्वरूप वर्मा की जयंती और परिनिर्वाण की तारीख चार दिनों के भीतर ही आती है। उनकी जयंती 22 अगस्त को होती है, जबकि परिनिर्वाण दिवस 19 अगस्त को होता है। इस नाते यह हफ्ता रामस्वरूप वर्मा जी के नाम होता है।
रामस्वरूप वर्मा संसोपा से सन् 1957 में कानपुर के रामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधान सभा के सदस्य चुने गये। इसके बाद 1967, 1969,1980,1989, और 1991 में सदस्य विधान सभा के चुनाव में विजयी रहे। माननीय वर्मा जी के तर्क के सामने विधान सभा में शासक जातियों की घिग्घी बंध जाती थी। सन 1967 की संबिदा सरकार में वर्मा जी डॉ॰ लोहिया की पार्टी संसोपा से जीतकर उ॰प्र॰ विधान सभा में पहुंचे। चौधरी चरण सिंह के मन्त्रीमण्डल के वह वित्त मन्त्री बनाये गये, जहां उन्होंने मुनाफे का बजट पेश किया। वर्मा जी ने उ॰प्र॰ विधानसभा में सभी धार्मिक स्थलों को सरकार के अधीन करने का बिल पेश किया। सवर्णों ने बिल का विरोध किया कि ऐसा करने से साम्प्रदायिकता बढ़ेगी। वर्मा जी ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा,
महामना रामस्वरूप वर्मा जी ने बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर के विचारों को प्रसारित करने का महान योगदान है ‘‘विचारों पर ताला और मूर्तियों पर माला’’ की चर्चा करते हुये बाबा साहब के विचारों को जन-जन तक ले जाने का प्रयास किया। वर्मा जी ने नारा दिया था, ‘मारेंगे मर जायेंगे हिन्दू नहीं कहलायेंगे।’ ब्राह्मणवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में रामस्वरूप वर्मा आजीवन संघर्ष करते रहे। लोहिया से वैचारिक मतभेद के कारण बाद के दिनों में उन्होंने संसोपा से अलविदा कर मूलनिवासी बहुजन समाज के शुभ चिन्तकों चौ॰ महाराज सिंह भारती, बाबू जगदेव प्रसाद, प्रो॰ जयराम प्रसाद सिंह, लक्ष्मण चौधरी, नन्द किशोर सिंह से सम्पर्क कर 7 अगस्त 1972 को शोषित समाज दल की स्थापना की और नारा दिया-
”देश का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा।
सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है।“
शोषितों का राज, शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा होगा।
– Written By- सुरेश कुमार
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सवर्णों की प्रताड़ना का बिंदु दलित समाज है। यह उच्च श्रेणी की मानसिकता वाला समाज दलितों पर अन्याय और जुल्म करने के मामले में इतिहास के पन्ने काले से काले करते आया है। अभी पिछले दिनों आगरा के अछनेरा तहसील के रायभा गांव में जिस तरह से एक दलित महिला के शव को उच्च जाति के सवर्णों ने श्मशान में अंतिम संस्कार नहीं करने दिया, उस से पता चलता है कि देश में जातिवाद की जड़े कितनी गहरी और अंदर तक धंसी हुई है। इस तरह की घटनाओं और सवर्णों का जातिगत भेदभाव दलितों को मनुकाल में ले जाकर धकेल देता हैं। उच्च श्रेणी के सवर्णों द्वारा दलितों को बार-बार याद दिलाया जाता है कि इस देश में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है। यहां तक दलितों लिये मरने के बाद दो गज जमीन उनकी नहीं है। कमाल की बात यह है कि संविधान और लोकतंत्रवादी व्यवस्था के भीतर भी सवर्णों का जातीय दंभ और उच्च श्रेणी की मानसिकता कमजोर होने के बजाय बलवती होती जा रही है।
दलितों को अपमानित करने वाली घटनायें समाज के सभी हलको में दिन प्रतिदिन घटती रहती है। अभी हाल में ही कानपुर देहात के मगतापुर गांव में दलित समाज के लोग सनातन कथा कराने के बजाय बौद्ध या भीम कथा करवा रहे थे। यह बात गांव के उच्च श्रेणी के लोगों को इतनी नगवार लगी कि उन्होंने पूरे गांव के दलितों की जमकर पिटाई कर दी थी। उच्च श्रेणी की मानसिकता और सामंती ठसक दलितों के संस्कृति क्षेत्र को भी नियंत्रण करने का उपक्रम करती आई है। बौद्ध कथा या बाबासाहब की कथा कराने से सवर्णों को लगता है की उनके वर्चस्व को चुनौती दी जा रही है। और, उनके नायकों और प्रतिमानों के समक्ष दलित अपने नायक या प्रमिमान क्यों स्थापित कर रहें है? दलित के नायक और प्रमिमान स्थापित न हो जाये इसलिए उनके संस्कृतिक क्षेत्र को नियंत्रित करने की कोशिस की जाती रही है। उच्च श्रेणी की मानसिकता और दंभ दलितों को मनुकाल की याद दिलाये रखने के लिये उनकों प्रताड़ित और अपमानित करने का उपक्रम करता रहता है।
मेरी एक मित्र मुंबई मे रहती हैं। लॉकडाउन से ठीक एक हफ्ता पहले एक लड़की ने उन्हे महाराष्ट्र के किसी गाँव से फोन किया। वह लड़की लगभग रोते हुए उनसे बोली कि मैं पीएचडी कर रही हूँ और बहुत परेशान हूँ। उसके पीएचडी गाइड ने बीते तीन सालों मे ना तो उसका प्रपोजल पढ़ा न पढ़ने के लिए कोई किताब या पेपर सजेस्ट किया ना ही मीटिंग के लिए टाइम दिया है। वह लड़की एक छोटे से गाँव से आती है, उसके माता पिता दूसरों के खेत पर मजदूरी करते हैं उसके सरनेम से ही पता चलता है कि वह तथाकथित नीचली जाति से आते है। गाइड महोदय इस बेचारी को तीन साल से टाल रहे हैं। अपने थीसिस चैप्टर के ड्राफ्ट लेकर उनके आगे पीछे डोलती रहती है लेकिन ‘महामहिम’ को देखने तक की फुरसत नहीं है।
यह लड़की आत्महत्या के विचारों से घिर गयी, बहुत उदास रहने लगी और फेसबुक पर उखड़ी-उखड़ी पोस्ट लिखने लगी। मेरी मित्र ने इस लड़की को हिम्मत बंधाई और आगे का रास्ता समझाया। यह लड़की ज्योतिबा फूले के विचारों पर पीएचडी कर रही है इसके गाइड महोदय ने अपने जमाने मे राजा राममोहन रॉय पर पीएचडी की है और वे ज्योतिबा या अंबेडकर को नहीं पढ़ना चाहते। रिसर्च कमेटी और पीएचडी गाइड समझाते रहे कि राममोहन रॉय पर शोध करो, लेकिन लड़की अड़ी रही। लेकिन अपने इस निर्णय का परिणाम उसे अब भुगतना पड़ रहा है।
हैं।
एसोसिएशन के मानद महासचिव आरवी अशोकन ने पत्र के माध्यम से कहा है, “डॉक्टरों को बीमार पड़ने पर अस्पताल में एडमिट किया जाना और बेड तथा दवाएं उपलब्ध कराया जाना हर हाल में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह महामारी डॉक्टरों की जान लेने के मामले में एक खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। ये डॉक्टर कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सबसे अगली क़तार के योद्धा हैं, एक डॉक्टर की जान पर खतरे का मतलब उस पर निर्भर हजारों मरीजों को असुरक्षा में डाल देना है।”
हमारा आत्ममुग्ध शीर्ष नेतृत्व व्यवस्था में किसी भी तरह की कमी की कोई बात स्वीकार करने को भी तैयार नहीं है, लेकिन हालात यह हैं कि कोरोना पॉजिटिव होने वाले लगभग सभी राजनेताओं और वीआईपी लोगों ने अपना इलाज प्राइवेट अस्पतालों में ही कराया है, और शायद इसीलिए उनके बीच मृत्युदर भी न के बराबर है, जबकि देश में अब तक लगभग 44 हजार गैर वीआईपी लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
अभी हाल में ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी संक्रमित होने के बाद राजधानी स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) या सफदरजंग जैसे सरकारी अस्पतालों के बजाय हरियाणा के गुरुग्राम स्थित पांच सितारा निजी अस्पताल मेदांता का चुनाव किया और यहां तक कि मेदांता में भी उनकी देखरेख के लिए साथ ही साथ एम्स के डॉक्टरों की भी ड्यूटी लग रही है। सवाल है कि ऐसा क्या हो गया कि खुद गृहमंत्री जी का अपनी ही व्यवस्था से विश्वास उठ गया?
एक अगस्त को तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित का कोविड टेस्ट प्राइवेट कावेरी अस्पताल में हुआ और पॉजिटिव आने पर वे प्राइवेट अपोलो अस्पताल में भर्ती हुए। इसी तरह से तमिलनाडु के ऊर्जा मंत्री पी थंगमानी, उच्चशिक्षा मंत्री केपी अनबालागन और सहकारिता मंत्री सेलुर के राजू ने भी कोविड होने के बाद सुख-सुविधाओं वाले प्राइवेट उस्पताल में ही भर्ती होना पसंद किया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपना कोविड का इलाज भोपाल के चिरायु प्राइवेट अस्पताल में और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा ने बंगलुरु के मणिपाल प्राइवेट अस्पताल में कराया। मध्य प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री राम खेलावन पटेल और सहकारिता मंत्री अरविंद सिंह भदोरिया ने भी अपने नेताजी का अनुसरण करते हुए अपना इलाज चिरायु अस्पताल में ही कराया। भाजपा के राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का इलाज भी गुड़गांव के मैक्स अस्पताल में हुआ।
सवाल है कि आखिर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था कब सुधरेगी। सवाल यह भी है कि देश के भीतर आम और खास के लिए अलग-अलग स्वास्थ सुविधाएं कब तक चलती रहेगी। सवाल यह भी है कि कोविड को हराने में जुटे डाक्टरों की सुविधाओं का इंतजाम कब हो सकेगा। और बड़ा सवाल यह भी है कि इस दौरान बीमार हो रहे डॉक्टरों के लिए सरकार विशेष इंतजाम कब करेगी।