वर्तमान बहुजन राजनीति की विवशता

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भारतीय राजनीति गजब दौर में है। यहां विपक्ष में कौन होगा, विपक्ष के मुद्दे क्या होंगे, और विपक्ष किस करवट बैठेगा, यह सारी बातें सत्ता पक्ष के लोग तय कर रहे हैं। देश में या किसी प्रदेश में चुनाव किस मुद्दे पर होंगे, यह केंद्र और भारतीय जनता पार्टी तय कर रही है। बाकी तकरीबन सभी विपक्षी दल उसी मुद्दे पर खेल रहे हैं। चूंकि यह खेल भाजपा का है, सो बाकी दल इसमें या तो उलझ जा रहे हैं, या फिर मुंह के बल गिर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भाजपा के इसी खेल में उलझ गई है। यही वजह रही कि पिछले दिनों भाजपा के ही एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए ब्राह्मणों को लुभाने के लिए सपा और बसपा ने प्रदेश में परशुराम की प्रतिमा बनाने का दावा कर दिया। दोनों दलों ने परशुराम भक्ति में कोई कसर नहीं छोड़ा। तो इसके बाद समाजवादी पार्टी ने हाल ही में एक ऐसा फैसला लिया है, जिससे एक बार फिर, उसकी रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।    हाल ही में समाजवादी पार्टी ने फिर से एक ऐसा फैसला लिया है, जिससे वह एक बार फिर से सत्ता पक्ष के एजेंडे पर खेलती हुई दिख रही है। समाजवादी पार्टी ने 24 अगस्त को पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष लोटन राम निषाद को पद से बर्खास्त कर दिया है। उनकी जगह राजपाल कश्यप को इस प्रकोष्ठ का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। लोटन राम निषाद को इसलिए पद से बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि निषाद ने राम के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। उन्होंने राम को काल्पनिक पात्र बताते हुए कहा था कि राम तो थे ही नहीं. जैसे फिल्मों और कहानियों में पात्र होते हैं, उसी तरह राम भी एक काल्पनिक पात्र मात्र हैं।
निषाद के इस बयान के बाद राम के मुद्दे को लेकर सियासी घमासान मच गया था। और चूंकि अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन से साफ है कि भाजपा यूपी से लेकर केंद्र तक अगला चुनाव राम के ही नाम पर लड़ेगी, राम को लेकर निषाद का बयान देना सपा मुखिया अखिलेश यादव को परेशान कर गया। जिसके बाद अखिलेश यादव के आदेश पर जुझारू नेता लोटन राम निषाद को पद से बर्खास्त कर दिया गया।
अब यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष के पास अपने मुद्दे नहीं हैं, और विपक्ष अब भाजपा और संघ के बनाए एजेंडे पर नाचता रहेगा? क्या यह मान लिया जाए कि उत्तर प्रदेश के विपक्ष के पास अपना ऐसा कोई थिंक टैंक नहीं है, जो सत्ता पक्ष को अपने बनाए मुद्दों पर घेर सके और प्रदेश की जनता को सत्ता पक्ष के खिलाफ मुद्दे दे सके।
जहां तक विचारधारा का सवाल है तो बहुजन दलों की सबसे बड़ी कमजोरी उनका अपनी बहुजन विचारधारा और संस्कृति को छोड़कर उधार की संस्कृति के बूते जीने की आदत रही है। बहुजन संस्कृति, जिसका अपना शानदार और गरिमापूर्ण इतिहास रहा है, ओबीसी नेतृत्व वाले राजनैतिक दल उससे कोसो दूर हैं। ये दल बहुजन विचारधारा के नाम पर अपने समाज के मतदाताओं को जोड़ने की बजाय सवर्णों की संस्कृति को ढोने में ही व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि ये दल ज्यादातर मौकों पर सत्ता पक्ष के मुद्दों पर खेल रहे होते हैं और अपनी लकीर नहीं खींच पाते।

ओबीसी नेतृत्व वाले तमाम राजनैतिक दल कई राज्यों में काफी मजबूत हैं। यह वर्ग खुद को सबसे बड़ी संख्या वाला वर्ग बताता है, जोकि सच भी है। इनकी सारी चुनावी राजनीति भी सिर्फ अपने वर्ग और अल्पसंख्यक समाज के बूते टिकी हुई है। बावजूद इसके क्या वजह है कि सपा और राजद जैसी पार्टियां यह नहीं सोच पाती कि पांच साल सत्ता की लड़ाई से दूर रह कर वह सिर्फ बहुजन संस्कृति और इतिहास के नाम पर बड़ी संख्या वाले इस पिछड़े वर्ग को एकजुट करेगी। क्योंकि अगर यह रणनीति सफल होती है तो यह बहुसंख्यक वर्ग अल्पसंख्यक मतों के सहारे प्रदेश और देश की सत्ता तक आसानी से पहुंच सकती है। यह तब है जबकि बिहार में लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी दोनों मुख्यमंत्री रहें, तो तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। इसी तरह यूपी में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव दोनों पिता-पुत्र सत्ता के शीर्ष मुख्यमंत्री पद पर रहें।
मान्यवर कांशीराम जी ने बहुजन समाज की सफल राजनीति कर यह साबित भी किया है कि बहुजन समाज के बूते राजनीति करना संभव है और इसके जरिए सत्ता में आया जा सकता है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर पिछड़े समाज के नेतृत्व वाले दल ऐसा क्यों नहीं सोच पाते? बहुजन समाज आखिर कब तक धार्मिक और राजनैतिक गुलाम बना रहेगा? आखिर वर्तमान बहुजन राजनीति इतनी विवश क्यों दिखती है?

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