वंचितों के हक की लड़ाई लड़ने वाले हैनी बाबू की गिरफ्तारी के मायने

Written By-प्रमोद रंजन दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के अध्यापक हैनी बाबू मुसलीयारवेटिल थारायिल (हैनी बाबू, 54 वर्ष) को नेशनल इन्विस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार कर लिया है। एनआईए ने कहा है कि उन्हें भी भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया है। इस प्रकार, वे इस मामले में गिरफ्तार होने वाले 12 वें बुद्धिजीवी हो गए हैं, जिनमें से कम से कम आधे पिछड़े अथवा दलित समुदाय से आते हैं। इस मामले में पहले गिरफ़्तार होने वालों में  रोना विल्सन, शोमा सेन, सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, महेश राउत, पी वरवर राव, सुधा भारद्वाज, वरनोन गोंसालविस, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबडे और अरुण फेरेरा शामिल हैं। उपरोक्त में से कई की तरह हैनी बाबू का भी भीमा-कोरेगांव में आयोजित यलगार परिषद के कार्यक्रम से कोई सीधा संबंध नहीं था। न वे इसके आयोजकों में थे, न वहां आमंत्रित थे, न ही उनका इस आयोजन से कोई जुड़ाव था। लेकिन उनकी गिरफ्तारी इस मामले में दिखाई गई है। हालांकि अगर ऐसा कोई जुड़ाव होता, तब भी वह कोई अपराध नहीं था। भीमा-कोरे गांव में हर साल होने वाला वह आयोजन भारत की सबसे वंचित आबादी के आत्मसम्मान का आयोजन रहा है, जो हमारे देश में सामाजिक-लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया का संकेत है। लेकिन जिस तरह से उसे शहरी मध्यमवर्ग के समक्ष देशद्रोही गतिविधि के रूप में प्रसारित किया गया, वह अपने आप हैरतअंगेज़ और बहुत खौफनाक है। हैनी बाबू को छह दिन लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार करने के बाद एनआईए ने प्रेस को कहा है कि आरोपी हैनी बाबू नक्सली गतिविधियों और माओवादी विचारधारा का प्रचार कर रहे थे और इस मामले में गिरफ्तार अन्य अभियुक्तों के साथ सह-साजिशकर्ता थे। इससे पहले, जून 2018 में पुणे पुलिस ने कहा था कि भीमा-कोरेगांव मामले में  गिरफ्तार रोना विल्सन से एक पत्र (संभवत: पंपलेट) बरामद किया गया है, जिसमें  “एक संदिग्ध अंडर कवर माओवादी नेता” कॉमरेड साई (जीएन साई बाबा) के लिए समर्थन जुटाने की अपील की गई है। पुलिस का कहना था कि चूंकि उस पत्र में एक जगह “कामरेड एच.बी.” का उल्लेख है, इसलिए उन्हें संदेह है कि वे एच.बी. – हैनी बाबू ही हैं। इसी सबूत के आधार पर सितंबर, 2019 में पुणे पुलिस ने हैनी बाबू के नोएडा स्थित घर पर छापा मारा था तथा उनका लैपटॉप, पेन ड्राइव, ईमेल एकाउंट का पासवर्ड व दो किताबें और साई बाबा की रक्षा और रिहाई की मांग के लिए गठित समित द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकाएं जब्त की थीं। पुलिस द्वारा जब्त की गई दो किताबें थीं From Varna to Jati: Political Economy of Caste in Indian Social Formation (यलवर्थी नवीन बाबू) और  Understanding Maoists: Notes of a Participant Observer from Andhra Pradesh (एन. वेणुगोपाल)। इनमें से पहली किताब जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के विद्यार्थी रहे  यलवर्थी नवीन बाबू की एम.फिल. की थिसिस है, जिसे उन्होंने पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है, जबकि दूसरी किताब आंध्रप्रदेश के माओवादी आंदोलन का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करती है। विभिन्न अखबारों में प्रकाशित एनआईए के बयानों से जाहिर है कि हैनी बाबू की गिरफ्तारी का आधार जीएन साई बाबा की रक्षा और  रिहाई के लिए गठित समिति में सक्रियता के कारण हुई है, जिसका भीमा-कोरेगांव की घटना से कोई संबंध नहीं है। इसलिए इस प्रकरण में यह समझना आवश्यक है कि साई बाबा और हैनी  बाबू का सामाजिक और बौद्धिक रिश्ता क्या है। केरल के हैनी बाबू दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के एसोसिएट प्रोफेसर हैं जबकि आंध्रप्रदेश के साईबाबा भी आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने तक इसी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। शारीरिक रूप से 90 प्रतिशत अक्षम साई बाबा को 2014 में प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मार्च, 2017 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिला न्यायालय ने साई बाबा, जेएनयू के शोधार्थी हेम मिश्र और पत्रकार प्रशांत राही को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसके बाद से वे जेल में बंद हैं। हैनी बाबू “राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए समिति” के प्रेस सचिव हैं। इस नाते वे साई बाबा की रिहाई के जारी होने वाली अपीलों, प्रदर्शनों आदि में भी सक्रिय रहते थे। इससे संबंधित उनके प्रेस नोट निरंतर मीडिया-संस्थानों को मिलते थे। मार्च, 2019 में साई बाबा की रक्षा और बचाव के लिए  एक 17 सदस्यीय समिति का गठन किया गया था, जिसमें प्रोफेसर एके रामकृष्णन, अमित भादुड़ी, आनंद तेलतुंबडे, अरुंधति राय, अशोक भौमिक, जी. हरगोपाल, जगमोहन सिंह, करेन गेब्रियल, एन रघुराम, नंदिता नारायण, पीके विजयन, संजय काक, सीमा आजाद, कृष्णदेव राव, सुधीर ढवले, सुमित चक्रवर्ती और विकास गुप्ता थे। हालांकि इस समिति के सदस्यों में हैनी बाबू का नाम नहीं था, लेकिन यह सच है कि वे साई बाबा के बिगड़ते स्वास्थ्य और उन्हें जेल में दी जा रही प्रताड़ना से लगातार चिंतित थे। संभवत: इसी  समिति ने साई बाबा के मामले से संबंधित जानकारी देने वाली वे पुस्तकाएं प्रकाशित की थीं, जिन्हें  हैनी बाबू के घर पर छापे के दौरान पुलिस ने जब्त किया था। दक्षिण भारत से आने के नाते, एक ही यूनिवर्सिटी, एक ही विषय का शिक्षक होने के नाते भी हैनी बाबू का साई बाबा के पक्ष में खड़ा होना होना अनूठी बात नहीं थी। लेकिन उनके बीच एक और रिश्ता था, जिस पर एनआईए की नजर भले ही रही हो, लेकिन जिस तबके के लिए वे काम करते रहे हैं, उनमें से अधिकांश को इससे कोई लेना-देना नहीं है। साई बाबा और हैनी बाबू अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आते हैं तथा इस तबके को उसका जायज हक दिलाने के लिए इन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी है। आंध्रप्रदेश के अमलापुरम् में जन्मे जीएन साई बाबा का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा था, उनके घर में बिजली तक नहीं थी। छुटपन में उनके पिता के पास तीन एकड़ जमीन थी, जिसमें धान की फसल लहलहाया करती थी, लेकिन साई बाबा के 10 वीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही वे खेत कर्ज देने वाले साहूकार की भेंट चढ़ गए थे। विलक्षण मेधा के धनी साई बाबा ने अपनी पढ़ाई फ़ेलोशिप और पत्नी वसंथा (उस समय मित्र) के सहयोग से पूरी की थी। वसंथा से उनकी मित्रता 10 वीं कक्षा में ही गणित का होम-वर्क करते समय हुई थी। साई बाबा कॉलेज में नामांकन के लिए वसंथा द्वारा उपलब्ध करवाए गए टिकट के पैसे से जब पहली बार हैदराबाद गए तो उन्होंने पहली बार ट्रेन देखी। बचपन से लेकर युवावस्था का एक लंबा चरण पार हो जाने तक उनके पास व्हील चेयर तक नहीं थी और वे घुटनों के बल पर जमीन पर घिसट कर चला करते थे। 2003 में दिल्ली आने के बाद उन्होंने पहली बार व्हील चेयर खरीदी। दिल्ली ने उन्हें बहुत कुछ दिया। उनकी प्रतिभा पर देश-विदेश के अध्येताओं की नजर गई और उनके शोध-पत्रों को विश्व के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर जगह मिली। उन्होंने इस दौरान पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के लिए आवाज उठाना जारी रखा तथा कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में जारी विभिन्न आंदोलनों में भागीदारी की। एक अखबार को दिए गए साक्षात्कार में साई बाबा ने बताया था कि हैदराबाद में मेरा राजनीतिक जीवन मंडल आयोग और आरक्षण की लड़ाई से शुरू हुआ। जिसमें वसंथा  भी उनके साथ शामिल थीं। उसी दौरान मार्च, 1991 में उन्होंने विवाह भी किया। वह लड़ाई वे आजीवन लड़ते रहे। इसी प्रकार हैनी बाबू ने भी अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की अनेक  बड़ी लड़ाईयां, जिस प्रकार बिना किसी आत्मप्रचार के, बहुत धैर्य और परिश्रम से लड़ीं और जीतीं वह अपने आप में एक मिसाल है। उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 2006 में ही 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर दिया गया था, लेकिन  2016 तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों ने अन्य पिछड़ा वर्गों के विद्यार्थियों का नामांकन नहीं करने के लिए अघोषित रूप से तरह-तरह के नियम बना रखे थे। नतीजा यह होता था कि सामान्य वर्ग में ओबीसी के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का नामांकन तो दूर, 27 प्रतिशत आरक्षित सीटों में आधी से अधिक सीटें भी खाली रह जाती थीं तथा उन पर बाद में सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों का नामांकन कर लिया जाता था। हैनी बाबू ने इसे रोकने के लिए दलित एवं पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदायों के अध्यापकों और विद्यार्थियों के फोरम एकैडमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिसके तहत सक्रिय रहते हुए अथक परिश्रम किया। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सैकड़ों आवेदन किए, अपील पर अपीलें की और उन आंकड़ों का संधान कर दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरक्षण की स्थिति की वह तस्वीर पेश की, जिसे देखकर हम सब हैरान रह गए। उन दिनों मैं बहुजन मुद्दों पर केंद्रित एक मासिक पत्रिका का संपादन किया करता था। हमने अपनी पत्रिका में उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़ों को प्रकाशित करते हुए शीर्षक दिया था – “ओबीसी सीटों की लूट”! ओबीसी आरक्षण के नाम पर केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में सरकार ने विद्यार्थियों की भर्ती 54 प्रतिशत बढ़ा दी थी, ताकि अनारक्षित वर्ग को जाने वाली सीटों में कमी न हो और उन्हें इसके लिए सैकड़ों करोड़ रूपए का अनुदान भी मिला था, लेकिन हैनी बाबू द्वारा जमा किए गए आंकड़े साफ तौर पर बता रहे थे इसका फायदा वास्तव में द्विज समुदाय से आने वाले विद्यार्थियों को हो रहा था और अन्य पिछड़ा वर्ग के हजारों विद्यार्थियों को साल दर साल उनके वाजिब हक से वंचित किया जा रहा था। हैनी बाबू द्वारा जमा किए गए इन आंकड़ों को उनके संगठन ने ओबीसी की राजनीति करने वाले नेताओं तक पहुंचाया, जिससे उसकी गूंज संसद में भी पहुंची। हैनी बाबू की इस मुहिम में उनके संगठन के एक और पिछड़े वर्ग से आने वाले शिक्षक केदार मंडल निरंतर शामिल रहते थे। केदार भी साई बाबा की तरह शारीरिक रूप से अक्षम हैं। दो वर्ष पहले उन पर भी हिंदू भावनाओं के अपमान के आरोप में मुकदमा दर्ज करवाया गया था तथा उन्हें नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। हैनी बाबू द्वारा संकलित उन आंकड़ों के प्रकाश में आने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों के लिए ओबीसी सीटों की लूट जारी रखना संभव नहीं रह गया। 2016 के बाद से हर साल दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग के हजारों अतिरिक्त विद्यार्थी देश के दिल्ली यूनिवर्सिटी के विभिन्न प्रतिष्ठित कॉलेजों में नामांकन पाकर अपना भविष्य संवार रहे हैं। लेकिन उनमें से बहुत कम को ही हैनी बाबू के नाम की भी जानकारी होगी। इसी प्रकार 2018 में जब केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए आरक्षण रोस्टर में बदलाव कर दिया गया, जिससे दलित व अन्य पिछड़ा वर्ग की हजारों सीटें कम हो गईं तो उसके विरोध को व्यवस्थित करने में हैनी बाबू का बहुत बड़ा योगदान था। इन संघर्षों ने उन्हें आरक्षण संबंधी जटिल नियमों का इनसाक्लोपीडिया बना दिया था। जिसे भी इससे कोई भी जानकारी चाहिए होती, वह उन्हें ही फोन लगाता और वे हरसंभव जानकारी देते। उन्होंने उस दौरान विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा जारी विज्ञापनों में दलित, ओबीसी और आदिवासी सीटों की गणना करके बताया कि किस प्रकार रोस्टर में होने वाला यह परिवर्तन इन वर्गों के हितों पर भारी कुठराघात है। उस लड़ाई में भी बहुजन तबक़ों की जीत हुई और सरकार को आरक्षण बहाल करने के लिए नए नियम बनाने पड़े। बहरहाल, हैनी बाबू और साई बाबा जैसे लोगों द्वारा किए गए संघर्ष और उनकी प्रताड़ना का एक और ऐसा पहलू है, जिस पर प्राय: नजर नहीं जाती। साई बाबा के मामले पर नजर रखने वाले अनेक पत्रकारों ने लिखा है कि उन्हें जिस प्रकार आजीवन कारावास की सजा हुई वह अपने आप में न्यायपालिक का एक “इतिहास” है। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ था कि किसी मामले में पुलिस द्वारा लगाई गई सभी की सभी धाराओं को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया और मामले में आरोपित सभी व्यक्तियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि साई बाबा जैसे लोग उस कमजोर सामाजिक समुदाय का हिस्सा थे, जिसमें इस प्रकार की लड़ाइयों में अपने लोगों के साथ खड़ा होने की क्षमता नहीं है। साई बाबा के मामले को नजदीक से देखने वाले पी. विक्टर विजय ने अपने एक लेख में लिखा है कि प्रोफेसर साई बाबा ने अपने श्रम और मेधा से बहुत मूल्यवान बौद्धिक पूंजी का निर्माण किया, लेकिन वह उनकी लुटी-पिटी सामाजिक पूंजी से मेल नहीं खाती थी। वे देशी-विदेशी अकादमिक दायरे में सबसे संतुलित और तीक्ष्ण विचारों वाले बौद्धिक के रूप में जाने जाने लगे थे। लेकिन  उनके समुदाय के पास वास्तव में उतनी सामाजिक पूंजी थी ही नहीं, जितनी कि इस प्रकार की सक्रियता के लिए आवश्यक होती है। यही कारण था कि वे समान आरोपों में समय-समय पर फंसाए जाते रहे  द्विज बौद्धिकों की तुलना में उन्हें अपनी जनपक्षधर सक्रियता की बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ी। साई बाबा को मुकदमे के दौरान कानूनी-परामर्श की कमी का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में इसके लिए बहुत कोशिश की, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उनके प्रयास एक सीमा से आगे जाने में असमर्थ थे। हैनी बाबू की गिरफ्तारी पर विचार करते हुए हमें इन पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए। बहुजन तबके से आने वाले अन्य लोगों की ही तरह उन्हें भी समान आरोपों से घिरे अनेक लोगों की तुलना में अधिक आर्थिक, नैतिक और कानूनी संबल की आवश्यकता होगी।
[फारवर्ड प्रेस नामक पत्रिका के प्रबंध संपादक रहे प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और आधुनिकता के विकास  में रही है। पेरियार के लेखन और भाषणों का उनके द्वारा संपादित संकलन तीन खंड में हाल ही में प्रकाशित हुआ है।  संपर्क: 9811884495, janvikalp@gmail.com   

टॉपर है डॉ. आंबेडकर की नई पीढ़ी

पिछले कुछ दिनों से आप सोशल मीडिया पर घूमती कुछ तस्वीरों को देख रहे होंगे। देश के तमाम राज्यों और जिले से टॉपरों की सूची में शामिल ये नाम गर्व करने वाले हैं। ये वो नाम हैं, जिन्होंने हाल ही में आए दसवीं और 12वीं की परीक्षाओं में टॉप किया है। कुछ ने अपने राज्य में तो कईयों ने अपने जिलों में। खास बात यह है कि इसमें कुछ नाम ऐसे भी शामिल हैं, जिन्होंने तमाम अभाव और गरीबी के बावजूद लाखों मेरिटधारियों को पछाड़ दिया है।

बात देश के टॉपर से शुरू करते हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले तुषार कुमार सिंह ने सीबीएसई (CBSE) बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में सौ प्रतिशत अंक हासिल कर देश भर में टॉप किया है। तुषार ने 500 में से 500 अंक हासिल किए हैं। उनके माता पिता दोनों प्रोफेसर हैं। तुषार ने दो साल पहले 10वीं की परीक्षा में भी 97 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। तुषार दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए कोर्स में दाखिला लेकर सिविल सेवा की तैयारी करना चाहते हैं। खास बात यह है कि तुषार के पिता ने अपने बच्चों को आंबेडकरवाद का पाठ पढ़ाया है और पूरा परिवार अंबेडकरवादी है। अब आपको झारखंड ले चलते हैं। झारखंड में लीजा उरांव सीबीएसई की 10वीं की परीक्षा में पूरे झारखंड में टॉपर बनी हैं। उन्होंने 99 फीसद अंक हासिल किया हैं। लीजा को इंग्लिश में 99, हिदी में 100, मैथ में 98, साइंस में 99, सोशल साइंस में 98 और आइटी में 100 अंक मिले हैं। कटहल मोड़ की रहने वाली लीजा उरांव के पिता दशरथ उरांव और माता संयुक्त कच्छप दोनों टीचर हैं। माता-पिता और नानी लीजा के प्रेरणास्रोत हैं। लीजा के दिल में अपने समाज के लिए काफी दर्द है, और वह उसकी बेहतरी के लिए काफी कुछ करना चाहती हैं। परिणाम आने के बाद स्थानीय मीडिया से बातचीत में लीजा ने कहा कि वह आगे चलकर आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ना चाहती हैं। लीजा भी तुषार की तरह सिविल सर्विस में जाना चाहती हैं। झारखंड बनने के बाद यह पहला मौका है जब आदिवासी समाज का कोई बच्चा स्टेट टॉपर बना है। अब पंजाब चलिए। पंजाब में इन दिनों जसप्रीत कौर का नाम चर्चा का विषय है। जसप्रीत ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में टॉप किया है। जसप्रीत ने अपनी मेहनत के बूते 99.5 प्रतिशत अंक हासिल किया है। जसप्रीत ने 450 अंकों में से 448 अंक हासिल किया है। बेहद गरीबी में पलने वाली जसप्रीत के पिता एक नाई हैं, और लोगों के बाल काटते हैं। जसप्रीत ने न तो कोई ट्यूशन किया और न ही उन्हें गाईड करने वाला ही कोई था, बावजूद इसके कड़ी मेहनत के बूते जसप्रीत ने यह मुकाम हासिल किया और बता दिया की नामुमकिन कुछ भी नहीं। जसप्रीत का सपना उच्च शिक्षा का है। वह एम.ए और एम.फिल के बाद इंग्लिश की टीचर बनना चाहती हैं। जसप्रीत के पिता बलदेव सिंह पिछले 24 साल से नाई का काम करते हैं। मां मनदीप कौर गृहणी हैं। परिवार गरीबी में जीता है। जसप्रीत ने 10वीं में 79 प्रतिशत अंक हासिल किया था। तब उन्हें पता था कि उनके पिता ट्यूशन कराने में सक्षम नहीं हैं, सो उन्होंने कड़ी मेहनत की, खुद पर भरोसा रखा और 12वीं में अव्वल आईँ। पंजाब के बाद राजस्थान में भी एससी समाज के युवा ने परचम लहराया है। राजस्थान बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन, अजमेर द्वारा जारी 12वीं के परिणाम में प्रकाश फुलवारिया टॉपर बने हैं। प्रकाश 99.20 प्रतिशत लाते हुए 500 नंबरों में 496 अंक हासिल कर टॉपर बने हैं। प्रकाश की तैयारी इतनी शानदार थी कि 496 अंक आने के बावजूद वो असमंजस में हैं कि उनके 4 नंबर क्यों कट गए। उनके पिता का नाम चन्ना राम और मां का नाम संतोष देवी है। अब प्रकाश के नंबरों पर नजर डालते हैं। अपनी मेहनत के बूते प्रकाश ने हिन्दी में 100 अंक, इंग्लिश में 99 अंक, पोलिटिकल साइंस में 98, हिस्ट्री में 100 और हिन्दी साहित्य में 99 अंक हासिल किया है। प्रकाश के पिता चनणाराम कमठा एक मजदूर हैं। प्रकाश आईएएस बनना चाहते हैं। जिलों में भी बाबासाहेब के बच्चों ने शानदार सफलता हासिल की है। हरियाणा की प्रेरणा दयाल ने हरियाणा शिक्षा बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में गुरुग्राम जिले की टापर बनी हैं। प्रदेश में उनका स्थान पांचवा है। प्रेरणा ने 500 अंकों में से 493 अंक हासिल किए हैं। प्रेरणा का परिवार अंबेडकरवादी है। प्रेरणा आगे कानून की पढ़ाई कर जज बनना चाहती हैं। प्रेरणा के आदर्श बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर हैं। उन्हीं के पद चिन्हों पर चलते हुए प्रेरणा देशहित में और महिलाओं के उत्थान की दिशा में काम करना चाहती हैं। प्रेरणा के पिता राम किशोर दयाल और मां सीमा दयाल हैं। प्रेरणा के बड़े पिता आर. के दयाल तो अम्बेडकरी आंदोलन में खासे सक्रिय हैं। गुरुग्राम जिले में ही साईकिल रिपेयर करने वाले पिता की बेटी मीनू ने जिले में दूसरा स्थान हासिल किया है। तो दूसरी ओर यूपी के मेरठ जिले में आयुषि राज 99.2 प्रतिशत अंक हासिल कर जिले में टॉपर बनी हैं।

मैंने जिन बच्चों का भी जिक्र किया, उनमें दो बातें कॉमन है। पहली बात सभी टॉपर हैं। किसी ने प्रदेश में तो किसी ने अपने जिले में टॉप किया है। दूसरी बात सब के सब एससी-एसटी समाज के बच्चे हैं, जिन्हें आमतौर पर अंडरमेरिट मान कर खारिज कर देने का रिवाज रहा है। लेकिन इन बच्चों में कईयों ने अभाव के बीच सफलता हासिल कर बता दिया है कि वो बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के वंशज हैं, जिन्हें दुनिया विद्वान मानती है। वो ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के वंशज हैं, जिन्होंने शिक्षा को सबसे ऊपर रखा था। खासबात यह भी है कि इन टॉपर्स में लड़के भी हैं, लड़कियां भी हैं। और तमाम युवा बाबासाहेब सहित बहुजन नायकों को अपना आदर्श मानते हैं। साफ है कि यह बाबासाहेब आंबेडकर के समाज की नई पीढ़ी है, जिसने मौका मिलते ही साबित कर दिया है कि मेरिट किसी के घर की बपौती नहीं होती, बस मौका मिलना चाहिए।

हां, एक बार और, समाज को जसप्रीत और ऐसे ही अन्य मेधावी बच्चे जो अभाव में हैं, उनकी मदद को आगे आना चाहिए।

हिंदी पट्टी में पेरियार

पेरियार के मूल तमिल लेखन का हिंदी अनुवाद अभी तक उपलब्ध नहीं था, इस कारण उनकी वैचारिकी से हिंदी क्षेत्रों के दलित-बहुजन आंदोलन का उस तरह का सघन और सक्रिय रिश्ता विकसित नहीं हो पाया, जैसा कि डॉ. आम्बेडकर और बहुत हद तक जोतिराव फुले से हो सका है। इस कमी को बहुजन साहित्य के अध्येता प्रमोद रंजन ने पेरियार पर केंद्रित तीन पुस्तकों की ऋंखला का संपादन कर पूरा किया है, जिन्हें  राजकमल प्रकाशन समूह ने प्रकाशित किया है। 5 अगस्त को अयोध्या में राम-मंदिर के निर्माण के लिए भूमि-पूजन  होना है। उससे ठीक पहले आई इन किताबों, विशेषकर पेरियार कीसच्ची-रामायणके प्रकाशन को  सांप्रदायिक शक्तियों को प्रगतिशील व दलित-बहुजन समाज के एक सशक्त उत्तर के रूप में भी देखा  जा रहा है। यही कारण है कि इन किताबों के बाजार में आते ही हिंदी की द्विजवादी बौद्धिक दुनिया भड़क उठी है।  हम यहां ‘दलित-दस्तक’ के पाठकों के लिए पुस्तक श्रृंखला के संपादक प्रमोद रंजन की एक इससे संंबंधित टिप्पणी और पुस्तक का संपादकीय उपलब्ध करवा रहे हैं। रंजन ने अपनी टिप्पणी में हिंदी और अंग्रेजी अखबारों के पेरियार संबंधी अज्ञान पर प्रकाश डाला है तथा पेरियार का विरोध करने वाले लेखकों की खबर ली है। संपादक, दलित-दस्तक
Written By- प्रमोद रंजन ‘हिंदी पट्टी में पेरियार’ विषय पर बात करनी हो तो, एक चालू वाक्य को उलट कर कहने पर बात अधिक तथ्यगत होगी। वह यह कि पेरियार के विचार हिंदी की दुनिया में परिचय के मोहताज हैं! उत्तर भारत, दक्षिण भारत के महान सामाजिक क्रांतिकारी, दार्शनिक और देश एक बड़े हिस्से में सामाजिक-संतुलन की विधियों और राजनीतिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाले ईवी रामासामी पेरियार (17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) के बौद्धिक योगदान के विविध आयामों से अपरिचित हैं। यह सुनने में अजीब है, लेकिन सच है। जबकि स्वयं पेरियार चाहते थे कि उनके विचार उत्तर भारत के प्रबुद्ध लोगों तक पहुंचे। उन्होंने अपने जीवनकाल में उत्तर भारत के कई दौरे किए और विभिन्न जगहों पर भाषण दिए। इस दौरान उन्होंने अपने कुछ लेखों व एक पुस्तक को हिंदी में प्रकाशित करने का अधिकार भी उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख बहुजन कार्यकर्ताओं, क्रमशः चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु और ललई सिंह को दिए थे। लेकिन वह बात न हो सकी, जो पेरियार चाहते थे। उत्तर भारत में आज भी पेरियार को मुख्य रूप से नास्तिक और हिंदी विरोधी के रूप में जाना जाता है। यह गलत तो नहीं, लेकिन उनका एकांगी चित्रण अवश्य है। उन्होंने धर्म के आधार पर होने वाले शोषण की कड़ी आलोचना की, लेकिन उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाया। डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने का उन्होंने स्वागत किया और उसे ऐतिहासिक दिन बताया। इसी तरह उनका हिंदी-विरोध सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का विरोध था, जिसने बाद के वर्षों में दक्षिण और उत्तर भारत में राजनीतिक संतुलन बनाया और देश की अखंडता को संभव किया। वे हिंदी भाषा के विरोधी नहीं थे। इन चीजों से इतर पेरियार ने विवाह संस्था, स्त्रियों की आजादी, साहित्य के महत्ता और उपयोग, भारतीय मार्क्सवाद की कमजोरियों, गांधीवाद और उदारवाद की असली मंशा और पाखंड आदि पर जिस मौलिकता से विचार किया है, उसकी आज हमें बहुत आवश्यकता है। वे अपने काल तक ही सीमित नहीं थे, उनसे दृष्टि निरंतर भविष्य पर बनी रही। विज्ञान और तकनीक भी उनके प्रिय विषय थे। यही कारण है कि आज के उत्तर सूचना-युग में भी हम उनकी भविष्यवाणियों को फलीभूत होते देख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी क्षेत्र के सामाजिक आन्दोलनों व अकादमियों में समाज के वंचित तबकों से बड़ी संख्या में लोग आए हैं। वे सिर्फ ‘नास्तिक पेरियार’ से परिचित हैं। हालांकि उनके इस रूप के प्रति नई पीढ़ी में जबरदस्त आकर्षण भी है। लेकिन उसने वस्तुत: पेरियार को पढ़ा नहीं है। इस पीढ़ी के पास पेरियार के विचारों के बारे में कुछ सुनी-सुनाई, आधी-अधूरी बातें ही हैं। यह स्वभाविक है क्योंकि हिंदी में अब तक पेरियार का साहित्य उपलब्ध नहीं था। सकते में डाल देने वाली इस कमी का अहसास मुझे वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनाें मैं नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहा था। अपने एक लेख के लिए मुझे ई.वी. रामासामी पेरियार के विचारों को जानने की जरूरत महसूस हुई। लेकिन, यह जानकर हैरानी हुई कि ‘सच्ची रामायण’ के अतिरिक्त उनका कोई भी साहित्य हिंदी में उपलब्ध ही नहीं है। 1970 में चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने ‘ई.वी. रामासामी पेरियार नायकर’ नाम पेरियार के कुछ लेखों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था। वह भी अनुपलब्ध था। ‘सच्ची रामायण’ का जो अनुवाद उपलब्ध था, वह भी शुद्ध नहीं था। अंग्रेजी से मिलान करने पर साफ पता चल रहा था कि कई हिस्सों का अनुवाद ही नहीं किया गया है तथा कई स्थानों पर अनुवादक/प्रकाशक ने अपनी भावनाओं का समावेश कर दिया है। इस दिशा में खोजबीन करने पर सच्ची रामायण के हिंदी में प्रचार-प्रसार और राजनीतिक उपयोग-उपेक्षा के बारे कुछ अन्य रोचक जानकारियां भी मिलीं। राम-कथा की व्याख्या पर केन्द्रित पेरियार की रामायण मूल रूप से तमिल में 1944 में छपी थी। तमिल में इसका नाम था – ‘रामायण पातिरंगल (रामायण के चरित्र)’ अंग्रेजी में यह 1959 में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से किन्हीं रामाधार ने किया था; जो 1968 में प्रकाशित हुआ। हिंदी में इसे अर्जक संघ से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक ललई सिंह (1 सितंबर, 1911- 7 फरवरी, 1993) ने प्रकाशित किया था। बाद के वर्षों में वे स्वयं भी अपने प्रशंसकों के बीच ‘पेरियार ललई सिंह’ और उत्तर भारत के पेरियार के नाम से जाने गए। उन्होंने सिर्फ इसे प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी कोई कसर नहीं छोड़ी, जिससे राम-पूजक उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया। दिसंबर, 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस किताब को (सिर्फ हिंदी अनुवाद नहीं) हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में प्रतिबंधित कर दिया और हिंदी अनुवाद की प्रतियां जब्त कर ली। ललई सिंह यादव ने इसके खिलाफ लंबी न्यायिक लड़ाई लड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर, 1976 के अपने फैसले में इस किताब पर प्रतिबंध को गलत बताया एवं जब्त की गई प्रतियां ललई सिंह को लौटाने का निर्देश दिया। लेकिन, कोर्ट के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ से प्रतिबंध नहीं हटाया। 1995 में प्रदेश में पेरियार को अपने प्रमुख आदर्शों में गिनने वाले कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सत्ता में आई, तब जाकर इससे प्रतिबंध हटा। उस समय बसपा कांशीराम के हाथ में थी और वे दलित-ओबीसी नायकों का राजनीतिक उपयोग करने की रणनीति पर काम कर रहे थे। लेकिन पेरियार के विचार तब भी हिंदी भाषी जनता तक नहीं पहुंच सके। कांशीराम की मुख्य प्रतिबद्धता दलित समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी के प्रति थी। उन्होंने पेरियार मेला का भी आयोजन किया। नायकों की मूर्तियों की स्थापना, मेलों का आयोजन आदि शीघ्र फल देने वाले बहुत महत्वपूर्ण काम थे। लेकिन कांशीराम से इन नायकों के मूल विचारों को जनता तक पहुंचाने का बीड़ा उठाने की उम्मीद करना अतिरेक ही कहा जाएगा। यह बीड़ा साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे समतावादी कार्यकर्ताओं को उठाना चाहिए था। लेकिन यह नहीं हुआ। यही कारण था कि, 2007 में जब उत्तर प्रदेश में ‘सच्ची रामायण’ का एक बार फिर जोरदार विरोध हुआ था, तब बसपा को पेरियार से कन्नी काटनी पड़ी। विरोधियों के प्रश्नों का उसके पास सैद्धांतिक उत्तर नहीं था। उस समय भी बसपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में थी और मायावती ही मुख्यमंत्री थीं। अक्टूबर, 2007 में भारतीय जनता पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर आरोप लगाया कि वह सरकार के सहयोग से ‘सच्ची रामायण’ का प्रचार-प्रसार कर रही है तथा बड़े पैमाने पर इसकी बिक्री की जा रही है। उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था। इसलिए यह मामला मीडिया में भी खूब गूंजा। भाजपा विधानमंडल दल के नेता ओमप्रकाश सिंह का कहना था कि हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में न माने। इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का उत्तर अप्रत्याशित था। मायावती ने कहा कि ‘‘बसपा तथा सरकार का पेरियार की सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा मामले का राजनीतिकरण कर रही है।’’ भाजपा के विरोध और बसपा द्वारा पेरियार से रणनीतिक दूरी बना लेने की इस घटना का एक आश्चर्यजनक पक्ष भी था; जिसका पता इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर से लगता है। पत्रकार अलका पांडेय ने 7 नवंबर, 2007 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपनी खोजी रिपोर्ट में लिखा कि,जिससच्ची रामायणके लिए भाजपा और बसपा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही थीं उसकी प्रति न भाजपा के पास उपलब्ध है, न ही बसपा के पास। बसपा का सारा साहित्य बेचने वालेबहुजन चेतना मंडपके पास भी यह किताब उपलब्ध नहीं है।’’ भाजपा इस दौरान कई जगहों पर ‘सच्ची रामायण’ के दहन का आयोजन कर रही थी। लेकिन, जलाने के लिए भी पार्टी के पास किताब की प्रति नहीं थी। उसने जिस किताब का दहन किया, वह किताब के कथित आपत्तिजनक अंशों की फोटोकॉपी थी।”  अखबार  ने अपनी पड़ताल में पाया कि सिर्फ बसपा से जुड़े स्टॉलों पर ही नहीं, बल्कि पूरे लखनऊ में किसी भी दुकान परसच्ची रामायणउपलब्ध नहीं है।’’ लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेतायूनिवर्सल बुक सेलरने भी अखबार को बताया कि “‘सच्ची रामायणकभी बिक्री के लिए उपलब्ध ही नहीं थी। वस्तुत: ‘बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज इंप्लाइज फेडरेशन’ (बामसेफ) से जुड़े ‘मूलनिवासी प्रचार-प्रसार केंद्र’ तथा ‘आंबेडकर प्रचार समिति’ आदि ने ‘सच्ची रामायण’ की लाखों प्रतियां अपने समर्थकों-कार्यकर्ताओं के बीच वितरित की थीं। लेकिन, इसकी पहुंच न तो विश्वविद्यालयों तक हो सकी थी, न ही उन दुकानों तक, जहां कथित ‘मुख्यधारा’ की किताबें पढ़ने वाले लोग जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। एक ओर बहुजन तबकों को ज्ञान की कथित मुख्यधारा से दूर रखने की कोशिश की जाती है, दूसरी ओर इन तबकों के पास उपलब्ध ज्ञान और उनके नायकों की यह सचेत उपेक्षा की जाती है। बहरहाल, इन स्थितियों से चिंतित होकर मैंने वर्ष 2014 में ही तमिलनाडु निवासी विश्वविद्यालय में अपने सहपाठी मनीवन्नन मुरुगेसन और तमिल पत्रिका कत्तारू के सदस्य टी. थमराईकन्नन   के साथ मिलकर पेरियार ग्रंथावली हिंदी में लाने की योजना बनाई थी। थोड़े विषयांतर का खतरा मोल लेते हुए भी, उपरोक्त तमिल पत्रिका की विशिष्टता का उल्लेख कर देना यहां प्रासंगिक होगा। कोयंबटूर से प्रकाशित ‘कात्तारू’अपने कलेवर, विषयों के चुनाव आदि में यह एक श्रेष्ठ और गंभीर मासिक पत्रिका है, जो आज भी नियमित प्रकाशित हो रही है। उत्तर भारत से जो साहित्यिक – वैचारिक अथवा  दलित-बहुजन मुद्दों पर केंद्रित लघु पत्रिकाएँ निकलती हैं, उनमें से अधिकांश के पीछे प्राय: कोई एक व्यक्ति मिशनरी भाव से जुड़ा होता है। कुछ मामलों में तो पत्रिका के माध्यम से स्वनामधन्य हो जाने की ख्वाहिश भी काम कर रही होती है। लेकिन, कोयंबटूर में ‘कात्तारू’ की युवा टीम इससे बिलकुल अलग है। ‘कात्तारू’ में किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं प्रकाशित होता है। सारा काम ‘टीम’ की ओर से किया जाता है। सबसे अधिक हैरान करने वाली बात है पत्रिका के प्रकाशन स्थल के निकटवर्ती गांव-कस्बों के परिवारों का इससे जुड़ाव। उस वार्षिकोत्सव के दौरान  ‘टीम कात्तारू’ ने मुझे बताया कि इससे आसपास के गांवों के लगभग 500 परिवार जुड़े हैं, जिनके अनुदान से यह चलती है। सम-सामयिक मुद्दों की इस  पत्रिका में कुछ पृष्ठ इन परिवारों में होने वाले जन्मदिन, विवाह व अन्य छोटी-बड़ी उपलब्धियों, शोक समाचार आदि के संक्षिप्त समाचारों व तस्वीरों के लिए सुरक्षित हैं। हिंदी की लघु पत्रिकाओं में इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। पत्रिका के जिस समारोह में मैं शामिल हुआ था, उसमें पुरुषों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में किशोरियां, युवतियां, बहुएं, बच्चे, बुजुर्ग महिलाएं भी सक्रिय भागीदारी कर रहीं थीं। वे विविध वैचारिक मुद्दों पर सवाल पूछ रहीं थीं और वक्ताओं के भाषणों के बाद हस्तक्षेप कर रहीं थीं। पेरियार ने अपने आन्दोलन को महिलाओं से जोड़ने पर बहुत बल दिया था, जिसका असर उस समारोह में दिख रहा था। इसके विपरीत, आज उत्तर भारत के सारे जातिवाद-विरोधी आन्दोलन मुख्य रूप से सिर्फ पुरुषों के आन्दोलन हैं। जो महिलाएं इन आन्दोलनों में हमारे कंधे-से-कंधा मिला सकती थीं, उन्हें भी हमने विवश कर दिया है कि वे हमारे पुरुषवाद के विरोध में अपना अलग आन्दोलन चलाएँ। उत्तर भारत का ‘दलित स्त्रीवाद’ इसी का परिणाम है। बहरहाल, पेरियार को हिंदी में लाना इतना आसान नहीं था। धारा के खिलाफ जाने वाले कामों में ऐसे अप्रत्याशित विघ्न आ खड़े होते हैं, जिनसे पार पाना बहुत कठिन होता है। अंतत: कोविड:19 के इस दौर में पेरियार के विचार हिंदी में तीन पुस्तकों की ऋंखला के रूप में प्रकाशित हो गए हैं। इनमें संबंधित विषयों पर पेरियार के लेख और भाषण हैं। इसके अतिरिक्त सभी खंडों में संबंधित विषय के अध्येताओं के आलोचनात्मक लेख तथा पेरियार के जीवन का वर्ष वार लेखाजोखा दिया गया है। आज ये किताबों जिस रूप में प्रकाशित हो रही है, उसमें कई लोगों की भूमिका रही है। ललई सिंह द्वारा प्रकाशित सच्ची रामायण का अंग्रेजी संस्करण से मिलान और पुनः पूरी पुस्तक का नया और सटीक अनुवाद, तमिल भाषा के शब्दों के सही भावार्थ को समझने के लिए तमिल भाषी साथियों से निरंतर  संपर्क एक बहुत श्रम साध्य काम था, जिसे मित्र अशोक झा ने अपनी अनेक व्यस्तताओं के बीच पूरी प्रतिबद्धता से पूर्ण किया। कंवल भारती, ओमप्रकाश कश्यप युवा शोधार्थी धर्मवीर गगन के परामर्शों ने इस किताब को समृद्ध किया है। पेरियार की विलक्षण अध्येता व्ही.गीता, ब्रजरंजन मणि, टी मार्क्स, ललिता धारा, विद्याभूषण रावत, देवीना अक्षयवर, पूजा सिंह, संजय जोठे और ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन’ के निदेशक मित्र संजीव चंदन ने न सिर्फ इसमें अपना रचनात्मक योगदान दिया, बल्कि इसके प्रकाशन के दौरान आई बाधाओं को दूर करने में भी साथ खड़े रहें। इन मित्रों के लिए आभार शब्द तो पर्याप्त नहीं ही होगा। उम्मीद करता हूं कि अनेकानेक मित्रों के सहयोग से तैयार यह पुस्तक हिंदी पाठकों के लिए उपयोगी साबित होगी और हम अब कह सकेंगे कि पेरियार हिंदी पट्टी में भी परिचय के मोहताज नहीं हैं!
(राजकमल समूह द्वारा प्रकाशित पेरियार पुस्तक ऋंखला के संपादकीय का संपादित अंश) राजकमल समूह द्वारा  प्रकाशित पेरियार पुस्तक श्रंखला की तीन पुस्तकें
  1. धर्म और विश्वदृष्टि
  2. जाति व्यवस्था और पितृसत्ता
  3. सच्ची रामायणसंपादक : प्रमोद रंजन
    (यह दोनों किताब आप बहुजन बुक्स की वेबसाइट से बुक कर सकते हैं। सच्ची रामायण एवं धर्म और विश्व दृष्टि  पुस्तक बुक करने के लिए किताबों के नाम पर क्लिक करिए।

कोरोना काल में विस्थापित मज़दूरों के बच्चे

Written By- पूजा मारवाह जब कोविड-19 से संबंधित काम करने वाली एक सहायता समूह के सदस्य ने सात साल की बच्ची आशा (बदला हुआ नाम) से मुलाकात की तो उस समय वह अपने चार साल के भाई की सुरक्षा कर रही थी। क्योंकि उसके माता पिता कहीं खाने की व्यवस्था करने गए हुए थे और वह बच्ची बहुत ही धैर्य के साथ उनके लौटने का इंतज़ार कर रही थी। उस बच्ची ने सहायता समूह के सदस्य को बताया कि वह लोग बिहार के किसी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले मज़दूर हैं। सड़क निर्माण करने वाले मज़दूरों का यह छोटा सा समूह अब उत्तर प्रदेश के कौशांबी की एक कच्ची आबादी में अस्थाई रूप से निवास कर रहा है, जहां कोरोना के बाद उन्हें दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से उपलब्ध पा रही है। उन्हें अपने गांव वापस लौटने की भी उम्मीद नहीं है। “हमारे पास खाने के पैसे भी नहीं हैं, हम गांव कैसे जा सकते हैं?” सात साल की इस बच्ची का बहुत आसान जवाब था, लेकिन इसके पीछे कई गंभीर सवाल छुपे हुए थे। जिसका जवाब उस सहायता समूह के सदस्य के पास नहीं था। कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए देश भर में लगाए गए लॉक डाउन और उसके बाद की परिस्थितियों ने बहुत सारी ज़िंदगियों को बदल कर रख दिया है। विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे परिवारों को इसने सबसे अधिक प्रभावित किया है। लॉक डाउन के दौरान ज़रूरतमंदों को राशन और स्वास्थ्य किट उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही संस्था ‘चाइल्ड राइट्स एंड यू’ ऐसी बहुत सी कहानियों की गवाह बनी, जो सुनने वालों के दिल को झकझोर कर रख देती है। हम सभी जानते हैं कि लॉक डाउन के दौरान अस्थाई और विस्थापित मज़दूरों के पास जीवन यापन का कोई माध्यम नहीं बचा था। काम बंद हो जाने के कारण उनके पास एक वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया था। इस कठिन समय में उनके बच्चों की मानसिक स्थिति क्या रही होगी, इसका शायद ही किसी ने अंदाज़ा लगाने का प्रयास किया होगा। माता पिता के साथ विस्थापन के दौरान बच्चों को सबसे अधिक खाने पीने की जद्दोजहद करनी पर रही है। उनके सामने न केवल भूख और प्यास का मसला था बल्कि अपने छोटे भाई बहनों को संभालने की ज़िम्मेदारी भी उठानी पड़ रही थी। इस दौरान उन्हें उनकी उम्र और क्षमता के अनुरूप भोजन तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। लॉक डाउन के कारण स्कूलों के बंद होने से गरीब बच्चों को दोपहर का मिलने वाला पौष्टिक भोजन भी बंद हो गया। जिससे इस अवधि में कुपोषण के बढ़ने की संभावनाओं ने भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इतना ही नहीं कोरोना की अफरातफरी में बच्चों को समय पर लगने वाले टीके भी नहीं मिल सके हैं जो भविष्य में उन्हें खतरनाक बिमारियों से बचा सकता था। समेकित बाल विकास कार्यक्रम योजना (आईसीडीएस) और स्वास्थ्य केंद्र कोरोना की रोकथाम के नाम पर पिछले कुछ महीनों से बंद पड़े हैं। जिसके कारण पोलियो वैक्सीन, समय पर लगने वाले टीके, आयरन की गोलियां तथा गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं तथा उनके बच्चों को दिए जाने वाले पोषण योजना जैसे अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम ठप्प हो गए हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया और खून की कमी तथा बच्चों में कुपोषण की समस्या पर काबू पाने की मुहिम को झटका लग सकता है। इससे भारत को कुपोषण मुक्त करने का लक्ष्य और भी दूर हो जाने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। लॉक डाउन के कारण गरीब बस्तियों में सामाजिक स्तर पर साफ़ सफाई नहीं होने से टायफायड तथा पानी से होने वाली अधिकतर बिमारियों के बढ़ने की आशंका भी बढ़ गई है। बहुत अफ़सोस की बात है कि बच्चों को भी काम के लिए विस्थापित होना पड़ता है। पढ़ने लिखने की उम्र में इन्हें बाल मज़दूरी करनी पड़ती है। लेकिन काम के बाद अक्सर इन बच्चों को उनका पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है। बल्कि कई बार इन्हें काम पर लगाने वाले ठेकेदार और बिचौलिए इनका पैसा हड़प जाते हैं। ऐसी कठिन परिस्थिति में इन बच्चों की सुरक्षा को सबसे अधिक खतरा रहता है। क्योंकि इनसे काम करवाने वाले मालिक बाल श्रम कानून से बचने के लिए इनका नाम मज़दूरों की लिस्ट में शामिल नहीं करते हैं। यही कारण है कि अक्सर इन तक पहुँचना और उन्हें इस दलदल से बाहर निकालना किसी भी संस्था के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। अपने परिवार के दुखों को देख कर इस परिवेश में रहने वाले बच्चों के व्यक्तित्व और स्वभाव में सामान्य बच्चों की तुलना में काफी अंतर होता है। कई बार ऐसे बच्चे यौन शोषण का भी आसानी से शिकार हो जाते हैं। वहीँ मानव तस्कर के चुंगल में भी इनके फंसने की संभावनाएं बहुत अधिक बनी रहती है। लगातार विस्थापन के कारण इन बच्चों की शिक्षा सबसे अधिक प्रभावित होती है। ज़्यादातर बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाते है। ऐसे में या तो परिवार वालों के साथ मज़दूरी की आग में झोंक दिए जाते हैं या फिर गलत संगत में आकर अपराध और नशे की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। मानसिक रूप से अत्यधिक दबाब के कारण ऐसे वातावरण में पलने वाले बच्चे बहुत जल्द कमज़ोर और विपक्षित अवस्था में भी पहुँच जाते हैं। बार बार विस्थापन के कारण मज़दूरों के बच्चों की शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित होती है। बहुत सारे बच्चों का स्कूलों में नामांकन तो होता है लेकिन माता पिता के विस्थापन के कारण अधिकतर बच्चे स्कूल का मुंह तक देख नहीं पाते हैं। वर्तमान परिस्थिति में लॉक डाउन के बाद विस्थापित मज़दूरों के बच्चों की स्कूल से दूरी और भी बढ़ गई है। लॉक डाउन के कारण घर की आर्थिक स्थिति खराब होने तथा ऑनलाइन क्लास की सुविधा से वंचित होने के कारण यह बच्चे मज़दूरी की अंधेरी दुनिया में धकेल दिए जायेंगे। इसमें सबसे अधिक शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चे प्रभावित होंगे। लॉक डाउन के सबब ऑनलाइन सुविधा नहीं होने के कारण गरीब बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है, इनमें विस्थापित मज़दूरों के बच्चों की संख्या लगभग शत प्रतिशत है। हालांकि लॉक डाउन के कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की प्रभावित होती शिक्षा को सामान्य स्तर पर लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई प्रकार की योजनाओं पर काम कर रही हैं। इनमें कम्युनिटी रेडियो और संचार के दूसरे अन्य माध्यमों का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन फिर भी लगातार विस्थापित होने वाले बच्चों तक इन माध्यमों की पहुँच बहुत कम मुमकिन हो पाती है। वर्तमान में बच्चों की शिक्षा और उनके सर्वांगीण विकास की सबसे अधिक आवश्यकता है। इसके साथ साथ उनके पोषण और शारीरिक विकास के लिए भी ठोस योजनाओं पर अमल करने की ज़रूरत है ताकि उन्हें हर तरह से स्वस्थ्य और विकार रहित जीवन प्रदान किया जा सके। ऐसे में मदद के दौरान उन तक पहुँचाए जा रहे राहत सामग्रियों में दूध, प्रोटीन और अन्य पौष्टिक आहारों को अधिक से अधिक उपलब्ध कराये जाने की ज़रूरत है। हमें इस बात को समझना होगा कि बिना पका हुआ खाना उनके लिए बहुत अधिक लाभकारी साबित नहीं होगा क्योंकि विस्थापितों के लिए आसानी से रसोई घर की उपलब्धता को सुनिश्चित बनाना मुमकिन नहीं है। इसके अतिरिक्त विस्थापित मज़दूरों और उनके बच्चों के लिए साफ़ सफ़ाई तथा शौचालयों की व्यवस्था भी ज़रूरी है। इसके लिए राज्य स्तर से लेकर ब्लॉक और पंचायत स्तर तक विस्थापित मज़दूरों के लिए बनाये गए अस्थाई बस्तियों में विशेष व्यवस्था करने की ज़रूरत है। विशेष रूप से इस मामले में लड़कियों के लिए ख़ास इंतज़ाम करने की ज़रूरत है ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के यौन शोषण से बचाया जा सके। इतना ही नहीं, युवावस्था में प्रवेश करने वाली विस्थापित मज़दूरों की बच्चियों के शारीरिक और मानसिक विकास पर ख़ास ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्हें न केवल माहवारी संबंधी सही मार्गदर्शन करने की ज़रूरत है बल्कि कम उम्र में शादी करने से बचाना भी बहुत बड़ी चुनौती होती है। अब समय आ गया है कि विस्थापित होने वाले बच्चों के जीवन में भी रौशनी फैलाई जाये। उन्हें भी अन्य बच्चों की तरह शिक्षा प्राप्त हो। उनके लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध हो तथा समय पर स्वास्थ्य के टीके मिल सकें। यह बहुत बड़ा चैलेंज है, जिसे कोई भी संस्था अकेले पूरा नहीं कर सकती है। इसके लिए सरकार और प्रशासन को स्थानीय स्तर पर मिल कर काम करने की ज़रूरत है क्योंकि एक आम बच्चों की तरह लगातार विस्थापन का दंश झेल रहे मज़दूरों के बच्चों को भी सभी सुविधाएं पाने का हक़ है और यह हक़ उन्हें हमारा संविधान देता है।
लेखिका पूजा मारवाह चाइल्ड राइट्स एंड यू “क्राई” की सीईओ हैं।

No End to Humiliation of Dalits Even After Death

Written By- Subhash Gatade Does anybody still remember the Dalits of Chakwara, a village around 50km from Jaipur in Rajasthan, who had launched a struggle to gain access to the pond in their village? It is more than 18 years since the Dalits, supported by human rights organisations, won that fight for water. Their undertaking had echoes with the historic struggle launched by Dr BR Ambedkar in March 1927 at Chavdar tank at Mahad to assert the equal rights of Dalits to water. It is well known to most people that while animals were allowed to use the water of this tank in present-day Raigad district of the state, the Dalits were not. Anand Teltumbde has described the events of this satyagraha in his book, Mahad: The Making of the First Dalit Revolt, published by Navayana in 2016. But what happened at Chakwara after the Dalits started using the village pond is hardly known: the upper castes slowly stopped using the water from the pond once the Dalits gained access to it, saying it had become “impure”. Enraged by the assertion of the Dalits and keen to humiliate them for it, they dug up the village sewer and directed the waste water to their own village pond. There is no change in the status quo there. Read Full Story

यूपी में 2007 का करिश्मा दोहरा सकती है बसपा, बशर्ते…

क्या उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के लिए एक बार फिर जमीन तैयार हो रही है। क्या आने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव में बसपा को एक बार फिर से ब्राह्मण समाज का साथ मिल सकता है। यह सवाल उत्तर प्रदेश की हालिया घटनाओं के कारण उठ रहा है। विकास दूबे मामले में एक नाबालिक युवक का एनकाउंटर और अब गाजियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या के बाद लोगों का गुस्सा और भड़क गया है। कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के बहाने जब पूरे ब्राह्मण समाज को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था, बसपा प्रमुख मायावती ने पूरे ब्राह्मण समाज पर निशाना साधने वालों की आलोचना की थी। इन दोनों घटनाओं से उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण समाज में योगी सरकार को लेकर काफी गुस्सा है। जहां तक पत्रकार हत्याकांड की बात है तो पुलिस से शिकायत के बावजूद पुलिस ने अपराधियों पर कोई कार्रवाई नहीं की, इससे उत्साहित गुंडों ने पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी। इसको लेकर योगी सरकार की काफी आलोचना हो रही है। लखनऊ में तो पत्रकारों ने मीडियाकर्मियों पर बढ़ती हिंसा के मामले में कड़ा विरोध दर्ज कराया था। तो दूसरी ओर विकास दूबे के मामले में 14 साल के एक नाबालिग युवक के इनकाउंटर को भी ब्राह्मण समाज अन्याय बता रहा है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय के लोगों के बीच भी योगी सरकार को लेकर तेजी से गुस्सा फैलता जा रहा है। यूपी में मुख्यमंत्री योगी जिस तरह से ठाकुरवाद को बढ़ा रहे हैं, और ब्राह्मणों को दरकिनार कर रहे हैं, उससे ब्राह्मण समाज में रोष है। ऐसे में ब्राह्मण समाज उत्तर प्रदेश में भाजपा का विकल्प तलाशने में जुटा हुआ है। अब जरा पीछे आते हैं तो वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने बिना गठबंधन चुनाव लड़ा था और अपने बलबूते सत्ता हासिल की थी। इसके पीछे अनुसूचित जातियों व जनजातियों के साथ सर्वसमाज को जोड़ने का प्रयोग माना जाता रहा है। हालिया घटनाक्रम के बाद प्रदेश में एक बार फिर से 2007 जैसी स्थिति बनने की पूरी संभवना है। हालांकि यहां एक बात साफ है कि ब्राह्मण वोटर योगी सरकार से नाराज हैं, न कि भाजपा से। लेकिन लोकतंत्र में हर राज्य का चुनावी गणित अलग होता है। और यूपी के चुनावी गणित में योगी ब्राह्मण समाज के निशाने पर हैं। ऐसे में सवाल यह है कि योगी से नाराज वोटर किस ओर जाएंगे। क्या वह बिना कोशिश के ही खुद बसपा के पीछे खड़े हो जाएंगे? जाहिर है नहीं। क्योंकि जमीनी हकीकत से समाजवादी पार्टी भी वाकिफ है और अखिलेश यादव लगातार ब्राह्मण अत्याचार का मुद्दा उठा रहे हैं। यही नहीं सपा के कई अन्य नेता भी सोशल मीडिया पर ब्राह्मण अत्याचार की बात को जोर-शोर से उठा रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी नाराज ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कितनी गंभीर कोशिश करती है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है। लेकिन इसकी संभावना जताई जा रही है कि अगर बसपा ने ईमानदारी से कोशिश की और ब्राह्मणों को जोड़ने की रणनीति पर गंभीरता से काम किया तो प्रदेश में एक बार फिर से 2007 की स्थिति दोहराई जा सकती है। लेकिन सवाल यही है कि बसपा को कोशिश करनी होगी, और कोशिश में ईमानदारी होनी चाहिए।

अयोध्या में बौद्ध पक्ष को अदालत की फटकार कितनी जायज

देश की अदालत सबके लिए है। शायद यही वजह है कि अदालतों को भी तीन स्तरों पर बांटा गया है, ताकि एक जगह न्याय मिलने से रह जाए और अदालत से ही कोई गलती हो जाए तो दूसरी या तीसरी जगह न्याय हासिल किया जा सके। लेकिन न्याय पाने के लिए अपील दो लोगों को भारी पर गई। जब शीर्ष अदालत ने उनकी जनहित याचिका को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि उसे बेकार और बकवास तक कह दिया और तो और याचिकाकर्ताओं पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया। मामला अयोध्या के रामजन्मभूमि स्थल से जुड़ा है। आप सबको याद होगा पिछले दिनों रामजन्म भूमि के समतलीकरण के दौरान तमाम अवशेष सामने आए थे। खुदाई में जो अवशेष मिले थे, वो तमाम बौद्ध धर्म से मिलते-जुलते थे। बौद्ध धर्म में विशेष महत्व रखने वाले अशोक धम्म चक्र और कमल का फूल जैसे अवशेष की तस्वीरें सामने आई थी। इसके बाद तमाम बौद्ध विद्वान इसे बौद्ध धर्म का अवशेष बताते हुए एक बार फिर से अयोध्या को बौद्ध नगरी साकेत बताने लगे। पिछले कई वर्षों से अयोध्या के बौद्ध स्थल होने का दावा बौद्ध धम्म को मानने वाले करते रहे हैं। इस खुदाई में मिले अवशेष के बाद मामले ने फिर से जोर पकड़ा। इसके बाद बिहार के दो बौद्ध भिक्खुओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की और रामजन्मभूमि को खोदने और खुदाई के दौरान सामने आने वाली कलाकृतियों की सुरक्षा करने की मांग की। अवशेषों की सुरक्षा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में किए जाने की मांग थी। इसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट में आज यानि कि 20 जुलाई को सुनवाई हुई। जिस पर जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने लगभग भड़कते हुए न सिर्फ इस याचिका को बेकार, तुच्छ तक कहा, बल्कि बिल्कुल कठोर रुख अपनाते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। और इस रकम को एक महीने के भीतर जमा करने का फरमान सुना दिया। दोनों को यह कह कर भी डांट लगाई गई कि अदालत याचिकाकर्ता संगठनों की सीबीआई जांच के आदेश देगी। सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने कहा कि आप जनहित के नाम पर ऐसी बेकार याचिकाएं कैसे दायर कर सकते हैं। आप दंड के भागी हैं। आप पर इसलिए जुर्माना लगाया जा रहा है ताकि ऐसी गलती आप दोबारा न करें। दरअसल कोर्ट इस मामले में पहले से ही याचिका होने के बावजूद नई याचिका लाए जाने से नाराज थी। तीन जजों की इस खंडपीठ में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस कृष्णा मुरारी थे। दरअसल हुआ यह कि रामजन्मभूमि स्थल के समतलीकरण के दौरान कई अवशेष मिले थे। इसके बाद बिहार से आये दो बौद्ध मतावलंबियों ने राम जन्मभूमि पर अपना दावा बताया था। इसमें से एक भंते बुद्धशरण केसरिया भी थे। बुद्धशरण केसरिया का कहना है कि “अयोध्या में बन रहे राममंदिर निर्माण के लिए हुए समतलीकरण के दौरान बौद्ध संस्कृति से जुड़ी बहुत सारी मूर्तियां, अशोक धम्म चक्र, कमल का फूल एवं अन्य अवशेष मिलने से स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान अयोध्या बोधि‍सत्व लोमश ऋषि की बुद्ध नगरी साकेत है। अयोध्या मसले पर हिंदु मुस्लिम और बौद्ध तीनों पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी लेकिन सारे सबूतों को दरकिनार कर एकतरफा फैसला हिंदुओं के पक्ष में राम जन्मभूमि के लिए दे दिया गया। इसके लिए हमारे संगठन ने राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट समेत कई संस्थाओं को पत्र लिखकर वास्तविक स्थि‍ति से अवगत कराया।’ अब फिर मूल सवाल पर आते हैं। सवाल है कि क्या यह मामला इतना छोटा था कि इस मुद्दे पर एक बार फिर से अदालत का ध्यान आकर्षित करना अपराध हो गया। क्या भारत और दुनिया भर में मौजूद बौद्ध धम्म में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों की भावनाएं कोई मायने नहीं रखती। क्या अवशेष की तस्वीरें सामने आने के बाद और उसके बौद्ध धम्म से संबंधित होने के बाद भी बौद्ध धम्म में आस्था रखने वालों को अपने ही देश की अदालत से न्याय की मांग नहीं करनी चाहिए थी। सवाल कई हैं। आप भी इस बारे में जरूर सोचिएगा।

अन्नाभाऊ साठेः ऐसे दलित साहित्यकार, जिनकी रचनाओं का 27 भाषाओं में हुआ अनुवाद

दलित समाज में जन्में बहुत से ऐसे रत्न हैं, जिनके बारे में देश को नहीं पता। या तो वह क्षेत्र विशेष तक सीमट कर रह गए हैं या फिर समाज के हीरो बनकर। जबकि उनकी काबिलियत ऐसी है कि बड़े से बड़ा बुद्धिजीवी उनके सामने धाराशायी हो जाए। उनकी प्रसिद्धी सीमट कर रह गई तो सिर्फ और सिर्फ उनकी जाति की वजह से। अन्नाभाऊ साठे ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिनको देश के भीतर उनके कद के मुताबिक मान-सम्मान नहीं मिला। आज भी देश तो क्या खुद दलित-बहुजन समाज के ज्यादातर लोग उनकी महानता से अनभिज्ञ हैं। 18 जुलाई (1969)को उनकी पुण्यतिथि यानी परिनिर्वाण दिवस है। उनका जन्म 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के वाटेगांव में हुआ था। वह महज 48 साल जिए, लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने इतना शानदार साहित्य रचा कि उसकी धमक दुनिया के 27 देशों तक में पहुंची। जी हां, अन्नभाऊ साठे की रचनाओं का दुनिया की 27 भाषाओं में अनुवाद हुआ। वह सबसे ज्यादा रुस में प्रचलित थे। कहा जाता है कि उनकी वजह से भारत और रुस के संबंध बेहतर हुए।
Anna Bhau Sathe
रूस में पंडित नेहरू, राजकपूर और अन्नाभाऊ साठे खासे लोकप्रिय थे। एक बार जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जब रूस के दौरे पर गए तो लोगों ने उनसे अन्नाभाऊ साठे के बारे में पूछ लिया। पंडित नेहरू असमंजस में पड़ गए कि वो कौन है, जिसके बारे में लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं जानता हूं कि नहीं। प्रधानमंत्री नेहरू ने तुरंत भारतीय दूतावास से पता करने को कहा कि महाराष्ट्र में अन्नाभाऊ साठे कौन हैं, तब जाकर दूतावास ने उन्हें अन्नाभाऊ के बारे में जानकारी मुहैया कराई। विचारधारा के नाम पर वह मार्क्सवादी विचारधारा के बेहद करीब थे। वह मजदूर आंदोलन से जुड़े रहे। हालांकि बाद के दिनों में उनपर बाबासाहेब आंबेडकर का भी काफी प्रभाव रहा वह मार्क्स के वर्ग संघर्ष के साथ सामाजिक न्याय के सिद्धांत को भी समझने लगे थे। उन्होंने अपनी एक चर्चित रचना बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को समर्पित भी की थी। उनके बारे में एक और जानकारी चौंकाने वाली है। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी। सांगली से मुंबई आने के बाद उन्होंने फिल्मों के पोस्टर और दीवारों पर लिखे प्रचार को देखकर पढ़ना सीखा। लिखना सीखने के बाद उन्होंने एक बार लिखना शुरू किया तो फिर जीवन के आखिर तक नहीं रुके। ‘फकीरा’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। 1959 में यह उपन्यास सामने आने के दो साल बाद ही सन् 1961 में उन्हें महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला। हाल तक इसके दो दर्जन संस्करण आ चुके हैं। फिल्मी दुनिया में भी वह काफी सक्रिय रहें। उनके लिखे तकरीबन आधे दर्जन से ज्यादा उपन्यासों पर फिल्म बन चुकी है। बलराज साहनी, ए.के हंगल, गीतकार कैफी आजमी से उनका करीबी नाता रहा। उन्हें भारत का ‘मैक्सिम गोर्की’ कहा जाता है। आज एक बार सोच कर देखिए, अगर वो सामान्य समाज में जन्में होते तो उनकी प्रसिद्धी चांद तक पहुंच गई होती।

उच्च शिक्षा में परसेंटेंज की दौड़ के खिलाफ अभिभावकों को आना होगा सामने

Written By- डॉ. राजकुमार फिलहाल परीक्षा परिणामों का वक्त है। दसवीं और 12वीं के नतीजे आ चुके हैं। यहां से बच्चे और अभिभावक भविष्य के सपने बुनना शुरु करते हैं। 12वीं पास कर चुके बच्चों पर प्रेशर ज्यादा होता है, क्योंकि यहीं से ‘अच्छे विश्वविद्यालयों’ में प्रवेश पाने की प्रतिस्पर्धा शुरू होती है। खास तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में अंकों के आधार पर एडमिशन ने देश भर में 12वीं के छात्रों एवं उनके अभिभावकों पर बेवजह का मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक दबाव बना दिया है। प्रवेश परीक्षा कराने से बहुत सी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है लेकिन विश्वविद्यालय एवं सरकार की न जाने कौन सी मजबूरी है कि छात्रों को गला काट प्रतिशत दौड़ से मुक्ति नहीं दिलाना चाहती। प्रवेश परीक्षा होने पर छात्र ज्ञान के लिए पढ़ेंगे, मात्र नम्बर प्राप्त करने के लिए नहीं। क्योंकि अब पूरी दुनिया यह समझ चुकी है कि योग्यता और मार्क्स का कोई सीधा संबंध नहीं है। चंद रईस परिवारों के बच्चे अपने खानदानी संसाधनों के बल पर 90-95 प्रतिशत तक अंक लाकर साधन विहिन अन्य करोड़ों छात्रों पर एक षडयंत्रकारी मनोवैज्ञानिक बढ़त बना लेते हैं। हालांकि यह भी एक सच है कि ये 90% वाले छात्र ग्रेजुएशन करने के बाद अधिकांशतः गुमनाम ग्रेजुएट बनकर करोड़ों की भीड़ में विलीन हो जाते हैं और ऐसे अनेको छात्र जो सुविधाओं के अभाव में राज्य बोर्डों से 50-60% अंक के साथ पास होते हैं, जीवन की दौड़ में में कहीं अधिक सार्थक एवं सफल मुकाम हासिल कर लेते हैं। कैसी विडंबना है कि ग्रेजुएशन में 60% मार्क्स प्राप्त करके भी आप IAS टॉप कर सकते हैं लेकिन 95% मार्क्स प्राप्त करके भी आपको आपकी पसंद का कॉलेज या कोर्स में दाखिला मिलने की कोई गारंटी नहीं है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि निक्कमी सरकारें देश में नये विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों की स्थापना तो कर नहीं सकती, और देश में जो दो चार पढ़ने योग्य संस्थान हैं वहां सबको एडमिशन मिल नहीं सकता, इसलिए ये प्रतिशत की चारदीवारी आम लोगों के बच्चों को इन शिक्षण संस्थानों में प्रवेश करने से रोकने के लिए तथा अपने सनातनी वर्चस्व को बचाने के लिए बड़ी बेशर्मी से खड़ी कर दी गई हैं। जिस तरह मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं कुछ अन्य कोर्सों में प्रवेश परीक्षाएं होती हैं उसी तरह BA, BCOM, BSC में भी प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश कराने की जरूरत है। निश्चित रूप से इससे शिक्षा का स्तर व्यापक रूप से सुधरेगा। जहां हर आर्थिक स्थिति वाले मां-बाप अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकें। हालांकि सर्वोत्तम स्थिति तो वह होगी जब हर पढ़ने के इच्छुक स्टूडेंट को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के सुलभ एवं समान अवसर उपलब्ध हों। देश भर के अभिभावकों को इस दिशा में गंभीरता से सोचने और आंदोलन करने की जरूरत है। आखिर दांव पर उनके बच्चों का भविष्य लगा है। और प्रतिशत की यह प्रतिस्पर्धा उनके बच्चों के भविष्य से खेल रही है।
इस आलेख के लेखक डॉ. राजकुमार दिल्ली विश्वविद्यलाय के दयाल सिंह कॉलेज में प्रोफेसर हैं। 

CBSE Topper तुषारः बात सिर्फ मेरिट की नहीं, मौके की भी होती है

मेरी ओ.पी. सिंह जी से बात हुई। ओ.पी. सिंह सीबीएसई बोर्ड की 12वीं की परीक्षा के टॉपर तुषार कुमार सिंह के पिता हैं। बुलंदशहर के साथी वीरेन्द्र सिंह के जरिए ओ.पी. सिंह से बात हो सकी। पिता उत्साहित थे। मौका खुशी का था भी। किसी का बच्चा जब टॉपर बन जाए तो कोई भी खुश होगा। अक्सर रिजर्वेशन और कम योग्यता का ताना सुनने वाले अम्बेडकरी समाज के तुषार की यह सफलता संभवतः मेरिट पर अपना एकाधिकार समझने वाले लोगों की आंखें खोले और वह इस बात को मानने लगें कि बात योग्यता से अधिक मौके  की होती है। तुषार कुमार सिंह ने सीबीएसई (CBSE) बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में सौ प्रतिशत अंक हासिल कर टॉप किया है। तुषार ने 500 में से 500 अंक हासिल किए हैं।  तुषार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले हैं। उनके माता पिता दोनों प्रोफेसर हैं। पूरा परिवार अम्बेडकरवादी है। तुषार ने दो साल पहले 10वीं की परीक्षा में भी 97 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। तुषार दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए कोर्स में दाखिला लेकर सिविल सेवा की तैयारी करना चाहते हैं। तुषार की इस सफलता से अम्बेडकरी समाज में खासा उत्साह है। लोग तुषार के घर पर पहुंच रहे हैं और उन्हें बधाई दे रहे हैं। तुषार के पिता डॉक्टर ओपी सिंह, खुर्जा के एनआरईसी कॉलेज में प्रोफेसर हैं जबकि मां किरण भारती इंटर कॉलेज में लेक्चरर हैं। तुषार एक आम युवा नहीं हैं। तुषार उस वर्ग में पैदा हुए हैं, जिसे सदियों से जलालत झेलनी पड़ी है। जिसके हर व्यक्ति को तमाम योग्यता के बावजूद आरक्षण वाला कह कर ताना मारा जाता है। हालांकि सीबीएसई की परीक्षा में आरक्षण नहीं होता जहां तुषार ने टॉप किया है। इस नाते संभव है कि तुषार को ऐसे ताने न सुनने पड़े। हो सकता है कि इसके बावजूद भी सुनना पड़े क्योंकि तुषार हर जगह मार्टशीट की तख्ती लटकाए नहीं घूम सकते। तुषार को यह बातें समझनी होगी। तुषार का दाखिला अब ग्रेजुएशन में होगा। वह युवावस्था की तरफ बढ़ चले हैं। तुषार के अंदर जो प्रतिभा है, वह ठान लें तो किसी भी क्षेत्र में सफल होने का माद्दा रखते हैं। वह सिविल सर्विस में जाना चाहते हैं तो अच्छी बात है, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि वह जिस समाज से ताल्लुक रखते हैं, उसका जब कोई प्रतिभाशाली युवा सामने आता है तो पूरा समाज उसकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देखता है। इस नाते वह अपने हर सपने में उस समाज के हित को भी साथ लेकर चलें जो समाज की धारा में बहुत पीछे छूटा हुआ है। मैं तुषार पर विचारधारा का बोझ नहीं डालना चाहता, लेकिन यह बेहतर होगा कि वह बहुजन महापुरुषों के मोटे-मोटे विचारों को समझें। उनके सपनों को समझे। वह अपने समाज से क्या उम्मीद रखते थे, इसको समझें। और इसे समझाने की जिम्मेदारी निस्संदेह तुषार के माता-पिता की है। ताकि तुषार की प्रतिभा का सही दिशा में उपयोग हो सके। और तुषार अपने भारत देश और भारत देश के आखिरी कतार में खड़े लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम कर सकें। तुषार को मिली सफलता उनको मिले मौके की वजह से भी थी। तुषार को डीपीएस जैसे बेहतर स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। तुषार के माता-पिता दोनों शिक्षक हैं, इससे भी उन्हें मदद मिली होगी। तुषार अपने जीवन में जो भी करें, उन्हें इस ओर सोचना चाहिए कि वह किस तरह उन लोगों के लिए मौके पैदा कर सकते हैं जिन्हें अभी तक मौका नहीं मिल सका है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर बहुत ज्ञानी थे। उन्होंने अपने ज्ञान का इस्तेमाल देश के गरीब और मौके से वंचित रहने वाले लोगों को अधिकार दिलाने के लिए किया और अमर हो गए। डॉ. आंबेडकर देश के हर छात्र का आदर्श होने चाहिए। तुषार को उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाएं। उनके माता-पिता को बधाई।
  • सस्नेह- अशोक दास (संपादक, दलित दस्तक)

राजस्थान की लड़ाई में सचिन पायलट कितने सही हैं

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला है। जिसमें वह कहते हैं- “राजनीति में जिनको अपनी औकात से अधिक, केवल किसी का बेटा बेटी होने के नाते मिल जाता है, उनमें धैर्य बहुत कम होता है। वे केवल मौके की ताक में रहते हैं। अवसरवाद उनकी असली विचारधारा बन जाता है। ऐसे लोग जहां रहते हैं, जमीनी नेताओं का हक ही मारते हैं। लेकिन राजनीतिक इतिहास में इनका वैसा ही उल्लेख होता है जैसा बारिश के दौरान बुलबुले का होता है। इतिहास काम करने वालों का बनता है, उछलकूद करने वालों का नहीं।” अरविंद सिंह ने सालों तक राजनीतिक पत्रकारिता की है, इस नाते राजनीति की अपनी उनकी एक समझ है। अपने इस पोस्ट में उन्होंने किसी नेता का नाम नहीं लिखा है, लेकिन संभवतः उनका इशारा सचिन पायलट की ओर है। सचिन पायलट, जो सुबह तक अपने साथ कांग्रेस के 30 विधायक होने का दावा कर रहे थे, उनके दावे की कलई खुल गई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने निवास पर 100 से ज्यादा विधायकों को जुटा कर साफ कर दिया कि बाजी सचिन पायलट के साथ से निकल चुकी है। राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सदस्य हैं। मौजूदा समय में कांग्रेस के 107 विधायक हैं। इसके अलावा उनके पास निर्दलीय और कुछ अन्य छोटे दलों के विधायकों का समर्थन मिलाकर यह नंबर 123 तक पहुंचता है। बहुमत के लिए 101 की जरूरत होती है। यानी की गहलोत के पास बहुमत के लिए विधायक हैं। तो क्या राजस्थान का सियासी ड्रामा खत्म हो गया है, जी नहीं। कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सचेत हैं और बैठक के बाद गहलोत सभी विधायकों को लेकर रिजार्ट पहुंच गए हैं। कांग्रेस पार्टी और अशोक गहलोत ऐसा कोई मौका नहीं आने देना चाहते हैं, जैसा कि मध्यप्रदेश में हुआ था। तो वहीं कांग्रेस पार्टी बहुमत लायक विधायक जुटाने के बावजूद सचिन पायलट को मनाने में जुटे हैं। राहुल और प्रियंका गांधी ने खुद पायलट से बात की है। तो सचिन पायलट के खेमे से खबर आ रही है कि उन्होंने अपने करीबियों के लिए गृह और वित्त विभाग मांगा है, साथ ही खुद को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाए रखने की मांग की है। हालांकि इस बार इस पूरे सियासी खेल में भाजपा पहले की तरह खुल कर सामने नहीं आई। हाल ही में भाजपा में गए पुराने कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ रविवार को सचिन पायलट की मुलाकात के बाद सरगर्मी बढ़ गई। समझा जा रहा था कि राजस्थान में भी मध्यप्रदेश जैसा कुछ होगा। लेकिन भाजपा ने इस बार हड़बड़ी नहीं दिखाई। संभवतः भाजपा पहले यह देख लेना चाहती थी कि सचिन पायलट जो दावा कर रहे हैं, वह कितना ठीक है। और भाजपा ने इसके लिए कांग्रेस की बैठक तक इंतजार किया। लेकिन क्या भाजपा बिल्कुल खामोश रही। जी नहीं, राजस्थान में सियासी संकट के बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबियों पर आयकर विभाग का शिकंजा कसना शुरू हो गया. विधायकों की बैठक के पहले ही आयकर विभाग के 200 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों ने दिल्ली और राजस्थान के कई जगहों पर छापेमारी की। यह छापेमारी अशोक गहलोत के करीबी धर्मेंद्र राठौड़ और राजीव अरोड़ा के ठिकानों पर की गई है। मजेदार यह था कि आयकर की टीम स्थानीय पुलिस की बजाय केंद्रीय रिजर्व पुलिस के सहारे यह छापेमारी कर रही है। कांग्रेस पार्टी ने पायलट परिवार को काफी तवज्जो दी। राजेश पायलट की कहानी जगजाहिर है। तो वहीं सचिन पायलट की मां और राजेश पायलट की पत्नी रमा पायलट कांग्रेस के टिकट पर सांसद रही हैं और विधायक भी। राजस्थान में आगे क्या होगा और सचिन पायलट क्या रुख अपनाते हैं, यह आने वाले एक दो दिनों में साफ हो जाएगा। हालांकि सचिन पायलट ने कांग्रेस को दुबारा सत्ता में लाने में जिस तरह पसीना बहाया है, उससे कोई भी इंकार नहीं कर रहा। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने पार्टी को जमीन पर मजबूत किया। सचिन पायलट को उम्मीद थी कि कांग्रेस आलाकमन उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री पद दिया। तब कहा गया कि पायलट अभी युवा हैं और उनके लिए और मौके आएंगे। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या अगर सचिन पायलट भाजपा में शामिल हो जाते हैं तो क्या भाजपा उन्हें कांग्रेस से ज्यादा तव्वजो देगी? क्या भाजपा में शामिल होने के बाद पायलट राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का सपना देख पाएंगे? क्या भाजपा के दूसरे नेता और वसुंधरा राजे इस पद से अपना दावा छोड़ देंगे। क्या भाजपा में रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बन पाएंगे। शायद नहीं। ऐसे में कांग्रेस को कमजोर कर पहले सिंधिया और अब सचिन पायलट क्या सिर्फ खुन्नस में अपनी उसी पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं, जिसने उनको उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष पद तक पहुंचाया?

दलित पैंथर, एक विश्लेषण

जब से मुझे दलित पैंथर आन्दोलन के विषय में पता चला। इसके बारे में और अधिक जानने की इच्छा मन में बढ़ती गई। मैंने इन्टरनेट, पत्रिकाओं, किताबों और कभी-कभी समाचार पत्रों में छपने वाले दलित लेखकों के लेखों में यह नाम पढ़ा था और यह भी कि कैसे इस आन्दोलन ने महाराष्ट्र में दलित समाज के विषयों को लेकर सरकार में खलबली मचा दी थी। इस आन्दोलन के विषय में अध्ययन सामग्री खोजते-खोजते मुझे अचानक इसके संस्थापकों में से एक रहे जे०वी० पवार द्वारा लिखी पुस्तक ‘दलित पैंथर- एक अधिकारिक इतिहास’ (मूलत: यह पुस्तक मराठी में लिखी गई है। बाद में जिसका अनुवाद मराठी से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से हिन्दी में अमरीश हरदेनिया ने किया है) मिली। जिसे मैंने बिना देर किये ऑनलाइन ऑर्डर कर लिया। किताब की भूमिका में जे०वी० पवार लिखते हैं कि उन्हें बहुत से लोगों ने अपनी आत्मकथा लिखने के लिये कहा। लेकिन उन्होंने अपनी आत्मकथा न लिखकर ‘दलित पैंथर’ की आत्मकथा लिखने को तरजीह दी। जिसका जुड़ाव उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। अमेरिकी निग्रो द्वारा नस्लभेद को लेकर 70 के दशक में चले ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रेरणा लेकर अपने एक सहयोगी नामदेव ढसाल (प्रसिद्ध मराठी साहित्यकार) के साथ मिलकर पवार ने सन् 1972 में दलित पैंथर की स्थापना की। (स्त्रोत- दलित पेंथर- एक अधिकारिक इतिहास, पृष्ठ सं० 19) दलित पैंथर आन्दोलन को लेकर दलित समाज खासकर दलित शब्द सुनकर नांक-भौं सिकोड़ने वाले हिन्दू दलितों में बहुत सी भ्रान्तियाँ है। जिसे दूर करने की आवश्यकता है। कुछ लोग इसे एक दलित साहित्यिक आन्दोलन के तौर पर देखते हैं जबकि ऐसा नहीं है। इस आन्दोलन से पूर्व भी दलित साहित्य का सृजन हो रहा था। कुछ इसे जातीय आन्दोलन के रूप में देखते हैं जबकि ऐसा नहीं है। यह आन्दोलन को शुरू करने वाले युवा हिन्दू धर्म का कोढ़ झेल रहे हिन्दू दलित नहीं अपितु उन्हें जाति के दलदल से बाहर निकालने वाले बौद्ध युवक थे। यह आन्दोलन महाराष्ट्र के बौद्ध युवाओं ने मिलकर शुरू किया था। जिससे धीरे-धीरे दलित हिन्दू भी जुड़ते चले गये। कुछ लोग दलित पैंथर आन्दोलन को प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन कहते हैं परन्तु यह भी पूर्ण रूप से सत्य नहीं। अवश्य यह आन्दोलन भारतीय संसद में 1970 में पेश इल्यापेरूमल समिति की रिपोर्ट जिसमें देश में हर दिन बढ़ते दलितों पर अत्याचार का वर्णन था तथा इस विषय में बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा छोड़ी उनकी राजनीतिक विरासत रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया का कुछ न कर पाने के बाद खड़ा हुआ (जो आपसी राजनीति की शिकार हुई क्योंकि इसमें कोई ईमानदार नेतृत्व नहीं था) आन्दोलन था। लेकिन इस आन्दोलन ने महाराष्ट्र राज्य में दलितों की सामाजिक स्थिति में बहुत परिवर्तन किया। दलितों को उनके ज़मीन पर हक़ दिलाने से लेकर महिलाओं की सुरक्षा तक के कार्य दलित पैंथर के एजेंडे में थे। कुछ लोग इसे राजनीतिक आन्दोलन भी कहते हैं। लेकिन यह आन्दोलन किसी भी प्रकार से राजनीति से प्रेरित नहीं था। यह आन्दोलन पूर्णरूप से सामाजिक व अम्बेडकरवादी आन्दोलन था। दलित पैंथर के विषय में फैली भ्रान्तियों का मुख्य कारण था 80 के दशक में चल रहे इस अम्बेडकरवादी आन्दोलन का मुख्यधारा के मनुवादी मीडिया द्वारा नकारात्मक प्रचार करना। संसाधनों की कमी के चलते दलित पैंथर स्वयं भी अपना किसी प्रकार का मीडिया खड़ा नहीं कर सका। क्योंकि इसके कार्यकर्ता बहुत ही गरीब पृष्ठभूमि से आते थे। दूसरी जगह इसी के समकालीन महाराष्ट्र में ऊभर रहे नये हिन्दुवादी संगठन शिवसेना अपनी उत्तेजक कार्यशैली के चलते भी हमेशा ऐसे नकारात्मक प्रचार से बचा रहा। क्योंकि इसका मुख्यधारा के मीडिया पर प्रभाव था। इसका अपना मीडिया भी स्थापित हुआ। अपितु इस प्रकार से मीडिया द्वारा नकारात्मक प्रचार करने के बावजूद भी इसे महाराष्ट्र के अम्बेडकरवादी युवाओं का अच्छा ख़ासा समर्थन मिला। एक रैली में जे०वी० पवार अपने कार्यकर्ताओं की संख्या 40000 बताते हैं, जिसे देखकर यह लगता है कि मीडिया का नकारात्मक प्रचार भी इस आन्दोलन का कुछ नहीं बिगाड़ सका था। दलित पैंथर की मीडिया में नकारात्मक छवि बनाये जाने के बावजूद भी यह अम्बेडकरवादी संगठन युवाओं में ख़ासा लोकप्रिय रहा। इसने देश के साथ-साथ विदेशो में भी ख्याति अर्जित की। भारत में गुजरात, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में अपनी पैठ बनाने के साथ-साथ लंदन में भी दलित पैंथर्स ऑफ़ इण्डिया के नाम से एक संगठन बना। वर्ष 2016 में जे०वी० पवार की ‘ब्लैक पैंथर्स’ की नायिका रही ऐंजिला डेविस से मुलाक़ात हुई और उन्होंने अपनी कृति ‘दलित पैंथर्स-एक अधिकारिक इतिहास’ का अंग्रेज़ी रूप उन्हें भेंट किया। पवार अपनी इस पुस्तक में लिखते हैं कि ब्लैक पैंथर की इस नायिका के नाम पर ही उन्होनें अपनी एक सुपुत्री का नाम रखा। कुछ ही वर्षों में साधारण से दिखने वाले इस अम्बेडकरवादी संगठन ने कुछ असाधारण काम किये। जिसमें पहला काम था दलितों पर होने वाले अत्याचारों को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाना। अधिकारिक रूप से इसकी स्थापना होने पर प्रेस विज्ञप्ति में हस्ताक्षर करने वालों में से एक पैंथर राजा ढाले थे, जिन्हें आगे चलकर बहुत प्रसिद्धि मिली। राजा ढाले के लेख जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर मिलने वाले दण्ड और एक दलित महिला को निर्वस्त्र घुमाये जाने पर मिलने वाले दण्ड पर तुलनाकर एक उत्तेजक लेख लिखा था। (स्त्रोत- दलित पैंथर- एक अधिकारिक इतिहास, पृष्ठ सं० 33) दलित पैंथर के साथ ही नामदेव ढसाल भी एक प्रखर वक्ता और एक ओजस्वी कवि के रूप में ऊभर रहे थे। महाराष्ट्र के दलित युवाओं में ढसाल का काफी प्रभाव था। परन्तु शुरू से ही उनका झुकाव साम्यवादी विचारों और कम्युनिस्टों की ओर था। ढसाल का उठना-बैठना कम्युनिस्टों के साथ होने से कई बार ‘पैंथर’ को अजीब सी स्थिति में भी डाल देता था। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि दलित पैंथर एक अम्बेडकरवादी आन्दोलन था। इसलिये यह आन्दोलन बाबा साहब के नक़्शेक़दम पर चला और इसने धर्मग्रन्थों का विरोध शुरू किया। दूसरी ओर महाराष्ट्र में ऊभरे रहे कट्टर हिन्दुवादी संगठन शिवसेना ने घोषणा की कि वह हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थों का अपमान बर्दाश्त नहीं केरगी। इसके चलते जातिगत अत्याचारों के स्त्रोत रहे एक ग्रन्थ को सार्वजनिक रूप से जलाने के चलते पैंथर कुछ कट्टरवादी संगठनों के निशाने पर आ गया। (स्त्रोत-दलित पैंथर- एक अधिकारिक इतिहास, पृष्ठ सं० 86) वरली की एक आमसभा को मंच से संबोधित कर रहे ‘राजा ढाले’ पर पत्थरबाज़ी होने से अफ़रातफ़री का माहौल हो गया और उस अफ़रातफ़री ने दंगे का रूप ले लिया। इस दंगे में ‘पवार’ ने अपने एक पैंथर ‘भागवत’, जिनके सिर पर आटा पीसने वाला पत्थर आकर लगा, को खो दिया। दंगे के बाद इस दंगे का मुख्य आरोपी पैंथर्स को ही बताया गया और पवार और उनके कई साथियों पर पुलिस द्वारा मुक़दमे चलाये गये। पवार अपनी इस पुस्तक में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री के दंगे अपने राजनीतिक हित साधने के लिये न रोकने का संदेह भी व्यक्त करते है। (देखे- पृ्ष्ठ 133, दलित पैंथर्स- एक अधिकारिक इतिहास) दलित एकता के नाम पर समाज को छलावा देता रिपब्लिकन दल स्वंय ही गुटों में बंट गया था। पैंथर्स अक्सर इसके नेताओं की सार्वजनिक मंचों से आलोचना करते थे। क्योंकि ये लोग न तो पार्टी और न समाज के लिये कुछ कर रहे थे। पार्टी से जुड़े रहने का इनका अर्थ केवल अपने निजी स्वार्थों की सिद्धि ही था। पवार अपनी इस पुस्तक में लिखते हैं कि कई बार कई वामपंथी लीडर उनसे मिलना चाहते थे और दलित पेैंथर को लेकर अपनी चिंता उनसे व्यक्त करते थे। पवार लिखते हैं कि ऐसा केवल इसी वजह से था कि वे लोग गरीब और सर्वहारा वर्ग में इसकी बढ़ती लोकप्रियता से चिंतीत थे और इस आन्दोलन को हथियाने का प्रयास समय-समय पर करते रहते थे। पवार स्वयं भी साम्यवादी विचारधारा के समर्थक नहीं थे। इसलिये वामपंथी दलित पैंथर के इस आन्दोलन को हथिया नहीं पाये। पवार अपनी इस पुस्तक में ‘गवई बंधुओं’ की आँखें निकालने के घटना के बारे में बताते है। जब उन्होंने गवई बंधुओं को न्याय दिलाने हेतु प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की। इसके लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री के महाराष्ट्र दौरे के समय उनके क़ाफ़िले को रोकने की योजना बनाई गई। परन्तु यह सूचना जैसे ही प्रशासन के पास पहुँची उनके हाथ-पैर फूल गये और प्रशासन ने गवई बंधुओं को एयरपोर्ट लांज में प्रधानमंत्री से मिलवाया। पवार द्वार प्रधानमंत्री से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की शिकायत करने पर मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी गवानी पड़ी। दलित पैंथर ने न केवल मनुवाद का विरोध किया अपितु इसने अम्बेडकरी विचारधारा की विरोधी विचारधारा गांधीवाद का भी विरोध किया। हरिजन शब्द पर आपत्ति जताते हुए इसके प्रयोग पर रोक की माँग की और महात्मा गांधी द्वारा लिखे गये ग्रन्थों का भी दहन किया। (देखे- पृष्ठ 205, दलित पेंथर-एक अधिकारिक इतिहास)

इस सबके बावजूद बाबा साहेब डॉ० भीमराव अम्बेडकर के सालों से बक्सों में बंद पड़े साहित्य को छपवाने को लेकर भी आन्दोलन चलाया। माईसाहब (बाबा साहब की दूसरी पत्नी) और भैय्यासाहब (बाबा साहब के पुत्र) को मनवाकर उन्हें बाबा साहब को छपवाने की अनुमति माँग सरकार से बाबा साहब के साहित्य को छपवाने में आने वाले खर्च को वहन करने के लिये भी प्रयास किया। पवार बताते हैं कि बाबा साहब द्वारा लिखा साहित्य प्रिंटिंग प्रेस से निकलते ही हाथो-हाथ बिक जाता था जिससे बाद में महाराष्ट्र सरकार को अच्छी आमदनी होने लगी।

दलित पैंथर के समाज में बढ़ते प्रभाव ने इसके कुछ कार्यकर्ताओं को पहचान के साथ-साथ ताक़त भी दी। जिसका कुछ कार्यकर्ताओं ने नज़ायज फ़ायदा उठाना शुरू कर दिया। कुछ कार्यकर्ता धन अर्जन करने लगे। कुछ अन्य दलों में समाज के दलित वर्ग के ठेकेदार बन बैठे और कुछ ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से पैंथर के नाम का इस्तेमाल अपने निजी स्वार्थ के लिये करने लगे। बस यहीं से इस आन्दोलन का पतन शुरू हो गया। (दलित पेंथर-एक अधिकारिक इतिहास, पृष्ठ सं० 231) तेज़ी से सफलता की ऊँचाई छूता यह आन्दोलन भी तेज़ी सी ही ख़त्म हुआ। सन् 1972 में शुरू हुआ यह आन्दोलन अपनी शैशवावस्था के पाँच साल ही जीवित रह पाया और 1977 में इस समाजिक संगठन को विघटित कर दिया गया। इसके विघटन का मूल कारण था, इसके नेतृत्व के कुछ लोगों का अति महत्वाकांक्षी होना। ढसाल का साम्यवाद की ओर झुकाव होना पैंथर में फूट का एक कारण था। क्योंकि ढाले और पवार साम्यवाद की विचारधारा में क़तई विश्वास नहीं करते थे। पवार लिखते हैं कि कुछ समय कम्युनिस्टों के साथ रहने बाद ढसाल फिर कांग्रेस में शामिल हो गये। जिस प्रकार से ब्लैक पैंथर्स अपने जन्म के बाद (1966-1969) केवल तीन वर्ष ही रह पाया। उसी प्रकार से दलित पैंथर्स भी अपने जन्म पाँच साल के बाद ही विघटित हो गया। इसका एक कारण यह भी है कि ऐसे विस्फोटक आन्दोलनों को अधिक समय तक जारी रखने के लिये बड़ी ताक़त की आवश्यकता होती है। पवार, ढाले और ढसाल के अलावा अनेक पैन्थर्स ऐसे भी थे, जिन्होंने इस आन्दोलन के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था और वे भी इस आन्दोलन की तरह दुनिया में अमर हो गये। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई इतने से छोटे समय में ही ऐसे कारनामे कर जाये कि वह इतिहास बन जाये। परन्तु भारत में दलित पैंथर ने यह कारनामा कर दिया। वह अपने छोटे से जीवनकाल में अपने अम्बेडकवादी आन्दोलन के चलते अमर हो गया। आज भी जब कभी दलितों, असहायों और वंचितो पर अत्याचार होते हैं और व्यवस्था उन अत्याचारों से उन्हें छुटकारा दिलाने में नाकाम होती है। तब इसी प्रकार की आन्दोलन की शुरुआत होती है।
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  • इस आलेख के लेखक पंकज टम्टा हैं। पंकज उत्तराखंड के अल्मोरा में रहते हैं। उनसे संपर्क- 7895906705 पर किया जा सकता है। 

जाति और धर्म तो छोटी बात, यूपी में अपराधियों के मंदिर कायम हैंं

कानपुर प्रकरण के बाद अपराधी की जाति और धर्म को लेकर बड़ी चर्चाएंं चली है। लेकिन सच यही है कि उसकी जाति भी होती है और धर्म भी। उसका परिवार भी होता है और रिश्तेदार भी। उसकी जाति के नेता भी होते हैं और अफसर भी। सजातीय पुलिस वाले भी उसकी मदद करते हैं। भले ही अपराधी अपनी ही जाति के लोगों की हत्या क्यों न करे लेकिन ऐसा होता है। और पुलिस इसमें खाद पानी डालने का काम करती रही है। पहले डाकू समस्या के दौरान यह समस्या एक अलग रूप में थी। वह समाप्त या लगभग न के बराबर रह गयी तो शहरी या देहाती इलाके के सफेदपोश अफराधियों में यह कहीं और वीभत्स रूप में दिख रही है।
बुंदेलखंड और विंध्य इलाके में सबसे अधिक सक्रिय रहे डाकू ददुआ ने सबसे अधिक ब्राह्रणों की हत्या की। चंबल घाटी में तमाम डाकू जातीय गर्व के तौर पर आज भी जनमानस में मौजूद हैं। आखिर क्या वजह है कि आज भी उत्तर प्रदेश के एक छोर पर मान सिंह का मंदिर कायम है, जिसके बेटे तहसीलदार सिंह भाजपा के टिकट पर मुलायम सिंह से चुनाव लड़े थे। वे खुद इस बात की पुष्टि करते थे कि उन्होंने 100 पुलिस वालों को मारा था। और क्या वजह है कि ददुआ का दूसरे छोर बुंदेलखंड में मंदिर है जिसके बेटे को समाजवादी पार्टी ने राजनातिक शक्ति दी। समर्पण के बाद चंबल के कई डाकुओं ने कांग्रेस का भी प्रचार किया। यही नहीं जब मुलायम सिंह ने फूलन देवी को टिकट दिया था तो भी मिर्जापुर में जाति ही देखी थी।
जाति और धर्म एक सच है। और हर राजनीतिक दल इसमें नंगा है। राष्ट्रीय दल थोड़ा बचे हैं लेकिन क्षेत्रीय दलों के कई कई नेता दुर्दांत अपराधियों को कुलदीपक जैसा बताने से गुरेज नहीं करते रहे हैंं। क्या कोई सरकार जातीय स्वाभिमान के प्रतीक डाकुओं के सम्मान में बने इन मंदिरों को बंद कराने का साहस कर पायी है।
कोई अपराधी बनता है तो उसके आसपास पहले यही तत्व सबसे आगे होते हैं। अगर नहीं होते हैं तो पुलिस उसके करीबी लोगों, घर परिवार और सजातीय गांव वालों पर ऐसा ठप्पा लगा देती है कि वे न चाह कर भी उनके साथ खड़े होते हैं, जैसे नक्सलियों के साथ आदिवासी खड़े हो जाते हैं। पुलिस की हिस्ट्रीसीट में संरक्षण देने वाले सजातीय लोगों का विवरण और गांवों का भी विवरण होता है।
एक दौर था जब अपराध में राजपूत,ब्राह्मण और मुसलमान आगे होते थे। चंबल घाटी को देखें तो 80 के दशक के बाद वे पीछे हो गए और दलित और पिछ़ड़ी जाति के गिरोह सबसे आगे हो गए। इस नाते जरूरी है कि अगर कोई अपराधी पैदा हो रहा है तो पुलिस उसकी जाति के लोगों को उसका संरक्षक मान कर सताना बंद करे। और अपराधियों का महिमा मंडित करना बंद करे। और राजनीतिक दल उनको टिकट और शक्ति देना बंद करें। वरना इस प्रदेश को बारूद के ढेर पर बैठने से कोई रोक नहीं सकेगा।
– इस आर्टिकल के लेखक अरविंद कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में राज्यसभा टीवी में हैं। यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है।

दो दलितों की हत्या कर डॉन बना था विकास दुबे

गकोेपकानपुर के इनामी आतंकी विकास दुबे को मार गिराये जाने के बाद भाजपा निशाने पर है। जिस फिल्मी अंदाज में विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ है, उस पर सवाल उठने लगे हैं। पुलिस चाहे जितनी सफाई दे, जो भी कहानी सुनाए, साफ पता चल रहा है कि विकास दुबे को मारने का पुलिस का पहले से ही प्लान था। और इसी वजह से इस पर तमाम सवाल भी उठ रहे हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर पुलिस विकास दुबे को अदालत में क्यों नहीं पेश करना चाहती थी। राहुल गांधी ने ट्विट में इसी सवाल को शायरी के जरिए कह दिया है। राहुल गांधी ने तंज किया है, “हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी उसकी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” तो अखिलेश यादव ने भी विकास दुबे के पिछले हफ्ते का कॉल डिटेल रिकार्ड सामने लाने की मांग की है। इस मामले पर अखिलेश काफी मुखर हैं। वह लगातार भाजपा को घेर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने भी सवाल उठाया है कि आखिर किसके भरोसे विकास दुबे मध्यप्रदेश में आया था। विकास दुबे ने अपराध की दुनिया में कदम दलितों का उत्पीड़न कर के रखा था। सबसे पहले उसने एक दलित व्यक्ति से मारपीट की थी। फिर वह 1992 में दो दलितों की हत्या कर चर्चा में आया था। तब उसे सवर्ण समाज के बीच काफी लोकप्रियता मिली थी। तब सवर्ण समाज को लगा था कि विकास दुबे ने दलितों को उनकी औकात दिखा दी है। सो वह रातो-रात अपने समाज के भीतर लोकप्रिय हो गया। फिर क्या था, उसकी लोकप्रियता सत्ता में बैठे लोगों तक भी पहुंची। क्योंकि सत्ता चलाने वालों को हर पांचवे साल लोगों के बीच आना होता है। बस फिर क्या था, विकास दुबे की लोकप्रियता को सत्ता में बैठे लोग भुनाना चाहते थे और विकास दुबे सत्ता का संरक्षण चाहता था। दोनों को मनचाही मुराद मिल गई। अब तक सब ठीक भी चल रहा था, लेकिन विकास दुबे का हौसला इतना बढ़ा की उसने पुलिसकर्मियों को ही निशाना बना डाला। उसने पुलिसकर्मियों को जिस तरह मार डाला, उससे हंगामा मच गया। हालांकि वह पहले भी एक नेता की हत्या कर चुका था, लेकिन तब सब कुछ ‘मैनेज’ हो गया और विकास दुबे का कुछ बहुत बुरा नहीं हो सका। दरअसल पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद जिस तरह इस मामले में पुलिसकर्मियों द्वारा ही मुखबिरी की बात सामने आई थी, उससे साफ था कि खाकी के बीच विकास दुबे की पहुंच अच्छी खासी थी। और ऐसा तभी होता है जब किसी अपराधी के सर पर खादी यानी नेताओं का हाथ हो। लेकिन अब तक बचते आ रहे विकास दुबे ने एक साथ दो गलतियां कर दी। एक तो पुलिसकर्मियों को मार डाला, तो दूसरा उसने जिन पुलिसकर्मियों को मारा, उसमें उसके स्वजातिय थे। ऐसे में अचानक से सत्ता से लेकर समाज तक में बैठे विकास दुबे के संरक्षकों का माथा ठनक गया। क्योंकि विकास दुबे खतरनाक बन चुका था। वह देश भर के निशाने पर आ गया था। अदालती ट्रायल में कई राज खुलने के आसार थे। क्योंकि विकास दुबे अपने राजनीतिक आकाओं से बचाने की गुहार लगाता और ऐसा नहीं करने पर वह राज से पर्दा उठाने की धमकी देता। यानी कुल मिलाकर विकास दुबे का रहना कईयों के लिए खतरनाक था। सवाल यह है कि क्या विकास दुबे का एनकाउंटर करवा कर सत्ता में बैठे उसके संरक्षकों ने इस कड़ी को ही खत्म कर दिया है?  

आषाढ़ी पूर्णिमा पर बुद्ध ने क्या उपदेश दिया, यहां पढ़िए

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने इस दिन 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग किया था। आषाढ़ पूर्णिमा को धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन सारनाथ में सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने सारनाथ जाकर इसिपत्तन मृगदाय वन में पंचवर्गीय भिक्खुओं को प्रथम धम्म प्रवचन दे कर धम्म चक्र प्रवर्तन सूत्र की देशना की थी। बुद्ध ने पांच परिव्राजकों को संबोधित करते हुए कहा- भिक्खुओं, जो परिव्रजित हैं उन्हें दो अतियों से बचना चाहिए, पहली अति है कामभोगों में लिप्त रहने वाले जीवन की, यह कमजोर बनाने वाला है। दूसरी अति है आत्मपीड़ा प्रधान जीवन की जो कि दुःखद होता है, व्यर्थ होता है और बेकार होता है। इन दोनों अतियों से बचे रहकर ही तथागत ने मध्यम मार्ग का अविष्कार किया है। यह मध्यम मार्ग साधक को अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाला है, बुद्धि देने वाला है, ज्ञान देने वाला है, शांति देने वाला है, संबोधि देने वाला है और पूर्ण मुक्ति अर्थात निर्वाण तक पहुंचा देने वाला है। यह मध्यम मार्ग आर्य आष्टांगिक मार्ग है। इस आर्य आष्टांगिक मार्ग के अंग हैं:-
  1. सम्यक् दृष्टि
  2. सम्यक् संकल्प
  3. सम्यक् वचन
  4. सम्यक् कर्मान्त
  5. सम्यक् आजीविका
  6. सम्यक् व्यायाम
  7. सम्यक् स्मृति
  8. सम्यक् समाधि
बुद्ध ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा- भिक्खुओं, पहला आर्यसत्य यह है कि जीवन में दुःख है- जन्म लेना दुःख है, बुढ़ापा आना दुःख है, बीमारी दुःख है, मुत्यु दुःख है, अप्रिय चीजों से संयोग दुःख है, प्रिय चीजों से वियोग दुःख है, मनचाहा न होना दुःख है, अनचाहा होना दुःख है, संक्षेप में पांच स्कंधों से उपादान (अतिशय तृष्णा का होना) दुःख है। अब हे भिक्खुओं, दूसरा आर्यसत्य यह है कि इस दुःख का कारण हैः राग के कारण पुनर्भव अर्थात पुनर्जन्म होता है, जिससे इस और उस जन्म के प्रति अतिशय लगाव पैदा होता है, यह लगाव काम-तृष्णा के प्रति होता है, भव-तृष्णा के प्रति होता है और विभव तृष्णा के प्रति होता है; अब हे भिक्खुओं, तीसरा आर्यसत्य है दुःख निरोध आर्यसत्य, इस तृष्णा को जड़ से पूर्णतः उखाड़ देने से इस दुःख का, जीवन-मरण का जड़ से निरोध हो जाता है। और अब हे भिक्खुओं, चौथा आर्यसत्य है दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख से मुक्ति का मार्ग), इस दुःख को जड़ से समाप्त किया जा सकता है और जिसके लिए तथागत ने आठ अंगों वाला आर्य आष्टांगिक मार्ग खोज निकाला है जो साधक को सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि हैं। इस प्रकार हे भिक्खुओं, इन चीजों के बारे में मैंने पहले कभी सुना नहीं था, मुझमें अंतर्दृष्टि जागी, ज्ञान जागा, प्रज्ञा जागी, अनुभूति जागी और प्रकाश जागा। बुद्ध ने अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा: हे भिक्खुओं जब मैंने अपनी अनुभूति पर इन चारों आर्य सत्यों को इनके तीनों रूपों के साथ, और उनकी बारह कड़ियों के साथ, पूर्ण रूप से सत्य के साथ जान लिया, पूरी तरह समझ लिया और पूरी तरह अनुभव कर लिया, उसके बाद ही मैंने कहा कि मैंने सम्यक् सम्बोधि प्राप्त कर ली है, इस तरह मुझमें ज्ञान की अंतर्दृष्टि जागी, मेरा चित्त सारे विकारों से मुक्त हो गया है। हे भिक्खुओं जब मैंने अुपने स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभवों से और पूर्ण ज्ञान और अंतर्दृष्टि के साथ इन चारों आर्यसत्यों को जान लिया, यह मेरा अंतिम जन्म है अब इसके बाद कोई नया जन्म नहीं होगा। बुद्ध के इन चार आर्यसत्यों और आर्य अष्टांगिक मार्ग को सुनकर कौंङन्न के धर्मचक्षु जागे और उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता है, जिसका उत्पाद होता है उसका व्यय होता है। कौंङन्न के चेहरे के भावों को देखकर बुद्ध ने कहा- कौंङन्न् ने जान लिया. कौंङन्न ने जान लिया. इसलिए कौंङन्न का नाम ज्ञानी कौंङन्न पड़ गया। बुद्ध के इस उपदेश से कौंङन्न के अंदर भवसंसार चक्र, धम्म चक्र में परिवर्तित हो गया, इसलिए इस प्रथम उपदेश को धम्मचक्र प्रवर्तन सुत्त कहते हैं। पांचों भिक्खुओ ने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया और उन पांच भिक्खुओं को अपना शिष्य स्वीकार करने की प्रार्थना की, बुद्ध ने उनको अपना शिष्य स्वीकार किया इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। बुद्ध ने यह उपदेश आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन दिया था, इसलिए बौद्धों में आषाढ़ पूर्णिमा पवित्र दिन माना जाता है। इस पूर्णिमा से भिक्खुओं का वस्सावास (वर्षावास/चातुर्मास) अर्थात मानसून के महीने में एक ही स्थान पर निवास करना) आरंभ होता है, इस दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाओं द्वारा महाउपोसथ व्रत रखा जाता है। बौद्ध विहारों में धम्म देशना के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इसके लेखक आनंद श्रीकृष्ण हैं। आनंद जी, बौद्ध चिंतक एवं साहित्यकार हैं।

बार-बार झूठ क्यों बोलते हैं बाबा रामदेव

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कोरोना वायरस की दवाई के लिए दुनिया भर के डॉक्टर अभी रिसर्च कर रहे हैं। हार्वर्ड से लेकर ऑक्सफोर्ड तक को कोशिशों के बाद भी इसमें सफलता नहीं मिली है। लेकिन भारत में बाबा रामदेव और पतंजलि ने दावा कर दिया है कि उन्होंने कोरोना की दवा बना ली है। बाबा रामदेव ने 23 जून की दोपहर 1 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बात का ऐलान किया कि पतंजलि कोरोना वायरस मरीजों को ठीक करने वाली ‘कोरोनिल’ दवा बनाने में कामयाब हो गई है। लेकिन रामदेव के दावे की हवा तुरंत तब निकल गई जब ‘कोरोनिल’ को लेकर आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद) और आयुष मंत्रालय दोनों ने पल्ला झाड़ लिया। मंत्रालय ने कहा कि बाबा रामदेव ने इस बारे में जरूरी नियमोँ का पालन नहीं किया। यह सकते में डालने वाली बात इसलिए थी क्योंकि ICMR और आयुष मंत्रालय के जिम्मे किसी भी नई दवा को प्रमाणित करने का अधिकार होता है। यानी कि बाबारामदेव और पतंजलि ने बिना सरकारी अनुमति और पुष्टि को ही दवा के नाम की घोषणा कर दी। और सिर्फ घोषणा ही नहीं कि बल्कि ‘कोरोनिल’ से सात दिन के अंदर 100 फीसदी रोगियों के रिकवरी का दावा भी किया। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से मंत्रालय को बताया गया कि ये क्लीनिकल ट्रायल जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च (नेम्स) में किया गया था। हालांकि पतंजलि का यह दावा तब झूठा साबित हुआ जब राजस्थान सरकार ने बाबा रामदेव के कोरोना की दवा कोरोनिल खोजने के दावे को फ्रॉड करार दे दिया। खुद राजस्थान के स्वास्थ मंत्री रघु शर्मा ने पतंजलि के इस दावे पर सवाल उठा दिया। तो वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च विश्वविद्यालय (नेम्स) में गुना कैंट को लेकर जाने वाले जयपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी भी बाबारामदेव के दावे को झूठा बताया। पतंजलि के एक और झूठ का पर्दाफाश खुद आयुष मंत्रालय ने किया। मंत्रालय के मुताबिक आयुष मंत्रालय में पतंजलि की ओर से जो रिसर्च पेपर दाखिल किया गया है, उसके अनुसार कोरोनिल का क्लीनिकल टेस्ट 120 ऐसे मरीजों पर किया गया है, जिनमें कोरोना वायरस के लक्षण काफी कम थे। पतंजलि के दावे पर क्या कहता है हमारा कानून
  • आयुष मंत्रालय के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार पतंजलि को आईसीएमआर और राजस्थान सरकार से किसी भी कोरोना की आयुर्वेद दवा की ट्रायल के लिए परमिशन लेनी चाहिए थी, मगर बिना परमिशन के और बिना किसी मापदंड के ट्रायल का दावा किया गया है, जो कि गलत है।
  • डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी एक्ट 2005 के तहत अगर कोई व्यक्ति गलत दावा करता है तो इसे दंडनीय अपराध माना जाता है। जहां तक कोरोनिल दवाई को लेकर दावे की बात है तो वो संबंधित कानूनी प्रावधान का उल्लंघन है।
  • कानून दवा बनाने के लिए लाइसेंस देता है, दावा करने के लिए नहीं। 100% क्योर के दावे के बाद DMA कानून (डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी एक्ट 2005) को आपत्ति इसी दावे पर है। जिसमें एक साल से सात साल तक की सजा हो सकती है।
  • ये वैश्विक महामारी है लिहाजा विदेशों में भी मुकदमे दर्ज हो सकते हैं। वैसे ही जैसे अमेरिका में चीन के खिलाफ हुए हैं।
  • इस तरह का प्रचार करना कि इस दवाई से कोरोना का 100 प्रतिशत इलाज होता है, ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 का उल्लंघन है.
इन तमाम खबरों के बीच बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोई व्यक्ति या संस्थान तमाम सरकारी नियमों की अनदेखी कर कोरोना एक गंभीर बीमारी के बारे में इतना गैर जिम्मेदार कैसे हो सकता है? और सरकार इन तमाम लापरवाहियों पर आंखें कैसे मूंद रख सकती है। क्या दुनिया के किसी जिम्मेदार देश में एक महामारी से संबंधित दवा बनाने के खोखले दावे पर संबंधित व्यक्ति या संस्था पर कोई कार्रवाई नहीं होती? लेकिन अगर भारत में रामदेव और पतंजलि के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये पर सरकार ने आंखे फेर रखी है तो बड़ा सवाल सरकार पर भी है। सवाल यह भी है कि बाबा रामदेव बार-बार झूठ क्यों बोलते हैं, और बार-बार बच कर कैसे निकल जाते हैं।

रामदेव और पतंजलि के 10 झूठ, जो देश से बोला गया

कोविड-19 यानि कोरोना को मिटाने का दावा करने वाले बाबा रामदेव की दवा कोरोनिल पर राजस्थान सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने तो रामदेव को चेतावनी दी है कि हमारी सरकार महाराष्ट्र में नकली दवाओं की बिक्री की अनुमति नहीं देगी। इन राज्यों ने कहा है कि केन्द्रीय आयुष मंत्रालय की स्वीकृति के बिना कोविड-19 महामारी की दवा के रूप में किसी भी आयुर्वेदिक औषधी का विक्रय नहीं किया जा सकता। तो वहीं उत्तराखंड के आयुर्वेद ड्रग्स लाइसेंस अथॉरिटी ने रामदेव को उनकी नई दवा कोरोनिल के लिए नोटिस जारी किया है। यह नोटिस दवा के संबंध में ग़लत जानकारी देने के लिए जारी किया गया है। दरअसल बाबारामदेव और पतंजलि ने अपनी दवा को बेचने और मुनाफा कमाने के लिए अपने उपभोक्ताओं से लेकर सरकार तक से झूठ बोला। आइए एक नजर डालते हैं रामदेव और पतंजलि के 10 बड़े झूठ पर। झूठ नंबर-1 बाबारामदेव और पतंजलि ने सबसे बड़ा झूठ आयुष मंत्रालय से बोला है। आयुष के संयुक्त निदेशक डॉ वाईएस रावत ने कहा कि हमने कोरोना की दवा के लिए कोई लाइसेंस ही जारी नहीं किया। दरअसल दिव्य फार्मेसी ने इम्युनिटी बूस्टर के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था और कोरोना की दवा बना दी। झूठ नंबर-2 रामदेव और पतंजलि ने न सिर्फ बिना सरकारी मंजूरी के दवा को लोगों के सामने पेश कर दिया। और बड़े-बड़े दावे कर दिए। जबकि इस तरह का प्रचार करना कि पतंजलि की दवाई से कोरोना का 100 प्रतिशत इलाज होता है, ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 का उल्लंघन है। झूठ नंबर-3 पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से मंत्रालय को बताया गया कि ये क्लीनिकल ट्रायल जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर (निम्स) में किया गया था, लेकिन राजस्थान के स्वास्थ मंत्री रघु शर्मा ने खुद पतंजलि के इस दावे पर सवाल उठा दिया। निम्स ने भी पतंजलि के दावे को गलत बताया। झूठ नंबर-4 सामान्य परिस्थितियों में किसी दवा को विकसित करने और उसका क्लिनिकल ट्रायल पूरा होने में कम से कम तीन साल तक का समय लगता है लेकिन अगर स्थिति अपातकालीन हो तो भी तमाम जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा कर किसी दवा को बाज़ार में आने में कम से कम दस महीने से सालभर तक का समय लग जाता है। लेकिन पतंजलि ने अचानक से एक गंभीर बीमारी की दवा को लांच कर दिया। यह आश्चर्यजनक था।  झूठ नंबर-5 पहले बाबा रामदेव कह रहे थे कि नाक में सरसों का तेल डालने से कोरोना मर जाएगा। अब कह रहे हैं कि कोरोनिल आने से कोरोना मर जाएगा। अगर सरसों का तेल कोरोना मार दे रहा था तो कोरोनिल खोजने की जरूरत क्यों पड़ी। यानी की सरसों तेल से कोरोना खत्म होने की बात झूठी थी। झूठ नंबर-6 पहले रामदेव कहते थे कि वे कई असाध्य रोगों का इलाज योग से कर सकते हैं, दवा की जरूरत नहीं है। वो प्राणायाम से आजीवन स्वस्थ रहने की बात कहते थे, फिर खुद ही दवा भी बेचने लगे। लेकिन खुद बीमार होने पर रामदेव अस्पताल में भर्ती हुए, न उनकी अपनी दवाएं काम आईं, न योग। झूठ नंबर-7 पहले बाबारामदेव चैनलों पर बताते थे कि मैगी, पास्ता आदि खाने के परिणाम बेहद गंभीर होते हैं, फिर बाबा खुद मैगी से लेकर मसाला तक सब बेचने लगे। इसका मतलब यह हुआ कि मैगी और पास्ता के बारे में गलत प्रचार कर रहे थे। यानी की झूठ बोल रहे थे। झूठ नंबर-8 बाबारामदेव ने एड्स का इलाज करने का दावा किया, ऐसी दवा बनाने का दावा किया जिससे महिलाएं सिर्फ पुत्र को जन्म दे सकती हैं। कैंसर के इलाज का भी दावा किया, लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इसकी निंदा की। केंद्र सरकार ने उन्हें नोटिस थमाया। यानी कि रामदेव कई मौकों पर अपने मुनाफे के लिए झूठ बोलते रहे हैं। झूठ नंबर-9 आयुष मंत्रालय के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार पतंजलि को आईसीएमआर और राजस्थान सरकार से किसी भी कोरोना की आयुर्वेद दवा की ट्रायल के लिए परमिशन लेनी चाहिए थी, मगर बिना परमिशन के और बिना किसी मापदंड के ट्रायल का झूठा दावा किया गया। झूठ नंबर-10 बाबारामदेव ने सात दिन के अंदर 100 फीसदी रोगियों के रिकवरी का दावा भी किया। एक ऐसी बीमारी जिसको लेकर जनता के मन में भारी डर बैठा हुआ है, उसके बारे में भ्रामक जानकारी देना उपभोक्ताओं यानि देश की जनता के साथ एक भद्दा मजाक और बड़ा झूठ है। इस घटनाक्रम में आयुष मंत्रालय द्वारा दिव्य फार्मेसी को जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है। मंत्रालय का कहना है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है तो लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है। तो दूसरी ओर आचार्य बालकृष्ण की ओर से आयुष मंत्रालय को कुछ कागजात भेजने की खबरें भी आ रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पतंजलि पर 420 यानी धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए। या फिर रामदेव और पतंजलि पहले की ही तरह सरकारी शह पर इस बार भी बच कर निकलने में कामयाब हो जाएंगे।

आरक्षण खत्म होने पर दलित जातियों पर पड़ने वाला सामाजिक प्रभाव क्या होगा?

Written By- पंकज टम्टा संभवतः ‘आरक्षण’ एक ऐसा विषय है, जिसने दलित जातियों को एक साथ बांध रखा है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षण के समाप्त होते ही दलित जातियों के बने गुटों के आपसी  रिश्तों में तनाव आ जाए। बाबा साहब और समाज के नाम पर एकजुट होने के चलते दलित जातियों ने केवल अपने जातीय संगठन ही बनाये। इसमें दोष वर्तमान पीढ़ी का नहीं। यदि इतिहास में देखा जाए तो हुआ यही है कि जो भी व्यक्ति सामाजिक और राजनैतिक रूप से सबल हुआ उसने अपनी जाति को संगठित किया। कुछ हद तक इसने समाज में कुछ एक खास दलित जातियों को उनकी खोई पहचान भी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। क्योंकि अस्पृश्यता का व्यवहार सभी जातियों के साथ अलग अलग तरह से होता था। इसलिए जो संगठित हो गए उनके साथ इसकी भयावयता कुछ कम हुई। यही कारण है कि दलित जातियों ने सजातीय संगठनों में एकजुट होना सही समझा। लेकिन आरक्षण एक ऐसा विषय बना जिसने सभी दलित जातियों और उनके संगठनों को एक मंच पर आने पर मजबूर किया। संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति के रूप में जाने जाने के बावजूद भी दलित जातियां सामाजिक रूप से एक नहीं हो पाई हैं। आज भी इन जातियों में सामाजिक विभेद बहुत बड़े स्तर पर दिखता है। संविधान बनने के इतने वर्ष बाद भी सामाजिक रूप से एक न हो पाना दलित समाज की सबसे बड़ी नाकामी है।

इस नाकामी से बचने के लिए क्या किया जाए?

दलित जातियों के नाम पर बने संगठन जैसे शिल्पकार चेतना मंच, टम्टा सभा, वाल्मीकि सभा, चमार संगठन, जाटव सभा आदि दलित जातियों में विभेद करने वाले संगठनों को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इस प्रकार के शब्दों में सामाजिक रूप से पहल करते हुए पाबंदी लगाई जाए। यदि ऐसा नहीं होगा तो इसका बहुत बड़ा खामियाजा पूरे दलित समाज को तब भुगतना पड़ेगा जब हमसे आरक्षण छीन जायेगा! आरक्षण के मुद्दे पर एक होने के चलते व सामाजिक रूप से अलग -अलग रहकर हम अपने विरोधी को एक ऐसा अवसर मुहैया करा रहे हैं जब वह एक तीर से दो शिकार कर सकता है। आरक्षण के खत्म होते ही, दलितों के जातियों के आधार पर बने संगठनों के बीच आपसी वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो जाएगी। जिसमें फिर दलित जातियों के संगठन आपस में ही एक दूसरे को खत्म करने से पीछे नहीं हटेंगे। क्योंकि फिर इनके पास कहने को केवल यही आत्मसम्मान बचेगा की दलित जातियों में कौन किससे बड़ा है। इस प्रकार के संभावित वर्ग संघर्ष या यूं कहें कि दलित जातियों के बीच होने वाले जातीय संघर्ष को टाला जा सकता है। इसके लिए करना यह है कि दलित जातियों के बीच पनप रही जातीय अहम की भावना का समूल अंत कर दिया जाए, और ऐसे शब्दों का विलोप हो जो दलित जातियों में जाति भेद करते हो। मेरा ताल्लुक उत्ताखंड से है। मुझे वहां एक शब्द हमेशा से चुभता है जो है ‘शिल्पकार। कुमाऊं के दलित समाज में अब इस शब्द का विलोप हो जाना चाहिए क्योंकि यह शब्द दलित जातियों में विभेद पैदा करता है। यह कुछ दलित जातियों को श्रेष्ठ और कुछ को निकृष्ट बताता है जबकि सवर्णों की दृष्टि में सभी दलित एक समान है और वे सभी से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी वे कर सकते हैं।

यदि जातीय विभेद के शब्द ना अपनाए तो फिर क्या करे?

आज दलित समाज को ऐसी शब्दावली की जरूरत है जो जातीय विभेद न पैदा करती हो। जैसे बाबा साहब आंबेडकर के नाम की तरह जातीय नाम की जगह स्थान विशेष के नामों का प्रयोग करना। जिनसे किसी भी प्रकार के छोटे बड़े व्यवसाय का पता नहीं चलता है। ऐसे नामों का भी प्रयोग किया जा सकता है जो सभी में समान रूप से स्वीकार हो। लेकिन ऐसे नामों की खोज सभी को एक साथ मिलकर, सामाजिक रूप से एक साथ आकर करनी होगी। महज आरक्षण के मुद्दे पर एकजुट दिखने वाले दलित समाज के बारे में यह सोच लेना की समाज एक हो गया है निरी मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं है। इससे आगे चलकर अगर समाज एक होता है तो सामाजिक रूप से एक होने के बहुत से फायदे समाज को मिलेंगे। लेकिन समाजिक रूप से एक दलित समाज तभी माना जाएगा, जब दलित वर्ग के हर जाति बिरादरी के लोगो में आपस में रोटी – बेटी के संबंध स्थापित करेंगे। वरना समाज लाख ढकोसला कर ले, सामाजिक एकता का जो द्वंद है वो समाज के सामने आज नहीं तो कल आ ही जायेगा।


इस आलेख के लेखक पंकज टम्टा सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

क्या इस पितृ दिवस से आप अपने बच्चों के नाम चिट्ठी लिखना शुरू करेंगे

  Written By- अरविंद सिंह आज अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस है। मैं ऐसी पीढ़ी से आता हूं जिसके पास अपने पिता की धरोहर के रूप में उनकी लिखी सैकड़ों चिट्ठियां हैं। उनको आज भी सहेज कर रखा है मैने। मौके बेमौके पढ़ता हूं तो लगता है जैसे वे मेरी तमाम चुनौतियों का जवाब तलाश देती हैं। कुछ में वैसी ही उलाहनाएं है जो मैं अपनी बेटी से करता हूं, कुछ में वैसी ही सराहनाएं हैं। कुछ में डांट फटकार है तो कुछ में ऐसी नसीहतें जो आज भी काम आ रही हैं। लेकिन संचार क्रांति के बीच जी रही हमारी नयी पीढ़ी ऐसी चिट्ठियों से वंचित है। लेकिन उसके लिए मैं उनको दोष नहीं देता। दोषी तो मैं खुद और हमारी पूरी पीढ़ी ही है। तो क्या इस पितृ दिवस से गाहे बगाहे ही सही अपने बच्चों को आप चिट्ठी लिखना आरंभ करेगे? 1980 में पिता से अलग होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय गया तो कोई सप्ताह न जाता होगा जिसमें उनकी कोई चिट्ठी न आती रही हो। मैं भी जवाब लिखता ही था। पिताजी की हैंडराइटिंग भी बहुत अच्छी थी और उनका हर पत्र केवल घर परिवार ही नहीं पूरे इलाके का अखबार सा भी होता था। कभी कुछ रोचक चिट्ठियां साझा करूंगा लेकिन फिलहाल प्रसंग अलग है। भारतीय डाक पुस्तक मैंने लिखी तो कई खंडों में भारतीय डाक सेवा की अधिकारी श्रीमती पी गोपीनाथ से काफी मदद मिली। बाद में वे इस विभाग की सचिव भी रहीं। एक दिन बंगलूरू में पढ़ रही अपनी बेटी को एक कार्ड में कुछ खास हिदायतें हाथ से लिख कर भेजी। कुछ दिनों बाद गयीं तो देखा कि उसने अपनी पढ़ाई के टेबुल के ठीक ऊपर करीने से लगा कर रखा था। यानि रोज देखती थी उसे। चिट्ठियों की अपनी ताकत है लेकिन हम लोगों ने ही अपने बच्चों के लिए चिट्ठी लिखना बंद कर दिया है और उसके महत्व से उनको कभी बताते नहीं तो वे क्या लिखेंगे। लेकिन दुनिया के तमाम हिस्सों में चिट्ठियों को लिखने लिखाने और एक दूसरे को चिट्ठियों से जानने समझने का आंदोलन सा चल रहा है। हम सभी चिट्ठियों की कीमत को जानते हैं। एक पिता के लिखे पत्र की कीमत और ताकत क्या होती है, यह हम सबको पता है। नौजवान साथियों को समझना होगा कि चिट्ठियां मोबाइल से कितनी ज्यादा ताकवर हैं। अभी भी उनको लिखना जारी रखा जा सकता है क्योंकि वैसी ताकत आज भी किसी औऱ विधा में नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह ने यह पोस्ट फेसबुक पर लिखी थी। वहां से साभार प्रकाशित।

फादर्स डे पर पत्रकार उर्मिलेश ने अपने किसान पिता को यूं किया याद

Written By- Urmilesh सुबह-सुबह आज ‘बाबू’ की याद आई। मां-पिता के गये वर्षों गुजर गये पर हर दुख-सुख में, कोई काम करते, खेत-खलिहानों की तस्वीरें देखते या उनसे होकर गुजरते, हंसते-बोलते या अपनी तरफ का कोई खास पकवान खाते हुए, वे अक्सर ही याद आते हैं। जब मैं बहुत दुखी होता हूं, तब तो वे जरूर याद आते हैं। ऐसा लगता है, मानो वो सामने खड़े हैं और मैं उनसे अपना दुख ‘शेयर’ कर रहा हूं या दुख को स्वयं ही बुलाने वाली अपनी गलती उनके सामने स्वीकार कर रहा हूं। आज कुछ यूं हुआ कि अपनी एक पूर्व-सहकर्मी की पोस्ट देखी। उन्होंने अपने सेवानिवृत्त पिता की बागवानी और साग-सब्ज़ियों के प्रति गहरे लगाव पर लिखा था। वह पढ़ते हुए मैं अपनी स्मृतियों के बेहद खूबसूरत गलियारे की सैर करने लगा। मैं गांव की उस खंड़ी में जा पहुंचा, जिसे मौसम-बेमौसम मेरे बाबू फूल-पौधों और साग-सब्जियों से भर देते थे। मेरे बाबू बहुत छोटे और साधारण किसान थे। कम रकबे वाले। संभवतः इसी के चलते उनको खेती से ज्यादा साग-सब्जी और फल-फूल उगाने का शौक पैदा हुआ होगा। खेती से किसी तरह हमारे छोटे से परिवार का काम भर चल जाता था। उन दिनों गांव के बाहर हमारी एक खंड़ी (अहाते के लिए भोजपुरी शब्द) थी। उसमें हमारे बाबू इतनी सब्जियां उगाते थे कि मोहल्ले के कई घरों के लोग खंड़ी से बेहिचक सब्जियां तोड़ ले जाते। किसी को कभी रोका नहीं जाता। सुबह और शाम, वहीं पर पिताजी की ‘बैठकी’ जमती थी। ‌घर से चाह (चाय के लिए भोजपुरी शब्द) बनवाकर ले आने की जिम्मेदारी यदा-कदा मैंने भी निभाई थी। ‘माई’ बड़का लोटा में चाय देतीं और कपड़े में लपेटकर मैं ले जाता ताकि हाथ न जले। हरी सब्जियों के खेत या कहीं भी उगी हुई हरी सब्जियां देखकर आज भी मुझे अपने दिवंगत बाबू तुरंत याद आ जाते हैं। मेरा जन्म यूपी के गाजीपुर जिले के एक बड़ी आबादी वाले गांव के एक बहुत मामूली और छोटे किसान परिवार में हुआ। हम दो ही भाई थे। हम दोनों अपने पिता जी को शुरू से आखिर तक ‘बाबू’ और माताजी को ‘माई’ कहते थे। मेरे बाबू सरजू सिंह यादव अपने पिता यानी मेरे बाबा(पूर्वांचल में आमतौर पर दादा को बाबा कहा जाता है) राम करन यादव के इकलौते पुत्र थे। बाबा का निधन बहुत कम उम्र में हो गया था। मेरी आजी का निधन भी बहुत जल्दी हो गया। इस तरह मेरे बाबू बचपन में ही ‘टुअर ‘(अनाथ) हो गये। हम दोनों भाइयों ने सिर्फ अपने बाबा-आजी का जिक्र ही सुना, कभी उनकी तस्वीर भी नहीं देखी। उन दिनों गरीब परिवार भला कहां से फोटो खिंचवाते और वो भी क्यों? पिता निरक्षर रहे क्योंकि उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल कौन भेजता। जब वह कुछ बड़े हुए तो संयुक्त खेतिहर-परिवार में जमीन-जायदाद में वाजिब हिस्सेदारी भी नहीं मिली। पर उन्होंने उसे मुद्दा नहीं बनाया। जब उनकी शादी हुई और मेरी मां उनके जीवन में आईं तो पिता के काका जी आदि यानी पूर्व के साझा परिवार वालों ने काफ़ी कहने-सुनने के बाद थोड़ी सी खेतिहर जमीन दी। वैसे साझा परिवार के पास भी ज्यादा ज़मीन-जायदाद नहीं थी। खेती-बाड़ी के अलावा पशुपालन से वे लोग भी किसी तरह जीवन बसर कर रहे थे। पर ले-देकर खाने-पीने का कोई कष्ट नहीं था। कथित बंटवारे और शादी के बाद हमारे बाबू और माई को काफी समय कष्ट में बिताने पड़े। लेकिन दोनों ने कभी छोटे-मोटे कष्टों की परवाह नहीं की। तरह-तरह के काम-धंधे करके जीवन को सहज और सुंदर बनाने में जुटे रहे। मज़े की बात कि ग़रीबी के बावजूद मेरे मां-पिता ने हमारे पूर्व के साझा परिवार वालों की तरह कभी भी दूध-दही नहीं बेचा। खंड़ी से सब्जियां और खेत से खाने-पीने भर अनाज पैदा होता रहा। पिता जब तक स्वस्थ रहें, खंड़ी में आलू, प्याज, टमाटर, बैंगन, नेनुआ, लौकी, तरोई, लतरा, भिंडी और करैला जैसी सब्जियां और समय-समय पर केला और पपीता जैसे फल भी पैदा होते रहे। अपनी छोटी साधारण गृहस्थी में बाबू और माई को संभवतः उनके जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली, जब मेरे बड़े भाई केशव प्रसाद ने यूपी बोर्ड से मैट्रिक पास किया। वह भी अच्छे अंकों के साथ। मेरे खानदान ही नहीं, संभवतः गांव में बसे हमारे समूचे समुदाय में मैट्रिक पास करने वाले वह पहले व्यक्ति बने। गांव के एक बेहद गरीब किसान के लिए यह बड़े सपने का पूरा होना था। मेरे माई-बाबू शुरू से ही खेत बढ़ाने या ईंटे का घर बनाने की बजाय हम दोनों भाइयों को अच्छी शिक्षा दिलाने का सपना बुनते थे। पता नहीं, शिक्षा और अक्षर-ज्ञान से वंचित हमारे खानदान और समूचे समुदाय में मेरे मां-पिता को अपने दोनों बच्चों को शिक्षित बनाने का ज्ञान या विचार कहां से मिला था? एक बार मैंने अपने पिता से यह सवाल पूछा भी। संभवतः तब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए अंतिम वर्ष में था। मेरे पिता ने तनिक गर्व के साथ कहा: ‘तोहार बोड़ भाई अब ‘परफेसर’ (लेक्चरर) बन गइलें, तोहरा के ‘जज’ बनावे क मन बा। अब तोहरा के आ तोहरा भैय्या के फैसला करेके बा कि एकरा खातिर का-का पढ़े के परी। इस कइसो होई।’ मैंने मुस्कराते हुए कहा, ‘भैय्या कलक्टर बनावे चाहत बांडन और तू जज कहत बाड़अ। आ, हमार मन कुछ औरिये कहत-आ।’ उन दिनों मैं किसी उच्च शिक्षण संस्थान में अध्यापकी करते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण के एक कार्यकर्ता के तौर पर जीवन बिताने का सपना बुन रहा था। वह बात कहने के बाद अपने पिता की आंखों में मैंने खुशी और गर्व की चमक देखी। फिर कुछ ही देर बाद देखा, चश्मा उतारकर वो आंखों में छलक पड़े अपने आंसुओं को पोंछ रहे हैं। इस हालत में देख मैं भी रो पड़ा। फिर वो मुझे पुचकारने लगे। लंबी कहानी है—लेकिन इसका एक सच ये है कि मैं अपने पिता का सपना पूरा नहीं कर सका। ज़ज नहीं बना। पर अब तक अपने पिता के उस सपने में निहित उनके इच्छित मूल्यों को जीने और उन पर अमल करने में जुटा रहा हूं। अन्याय और अत्याचार के हर खूंखार अंधड़ से जूझने और उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की हरसंभव कोशिश करता आ रहा हूं। जिन दिनों मेरे पिता का निधन हुआ, मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी के साथ MA और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU ) से M।Phil करने के बाद बेरोजगार था। कई विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में इंटरव्यू देकर लगभग निराश हो चुका था। एक इंटरव्यू बंगाल के एक विश्वविद्यालय में होना था, तब तक पिता के गुजर जाने की बुरी खबर मिली। मैं उन दिनों दिल्ली की एक सरकारी कॉलोनी के एक छोटे से कर्मचारी क्वार्टर में रहता था। जीवन-यापन के लिए पत्रकारिता (फ्रीलांस) और अनुवाद आदि का काम शुरू कर चुका था। किसी तरह रूपये-पैसे का जुगाड़ कर गांव‌ पहुंचा। भैय्या नजदीक थे, इसलिए वह पहले ही पहुंच चुके थे। आजीवन यह दुख मुझे सालता रहता है कि मैं उनके अंतिम समय तक रोजगार में नहीं रहा और अपनी इच्छानुसार उनकी अच्छी देख-भाल नहीं कर सका। पंद्रह बीस दिनों बाद गांव से दिल्ली लौटा तो मैंने फिर कभी किसी शिक्षण-संस्थान में लेक्चरशिप के लिए न तो कोई नया आवेदन किया और न ही कहीं इंटरव्यू देने गया। पत्रकारिता में औपचारिक तौर पर दाख़िल होने का फ़ैसला कर लिया था। उन दिनों एक फ्रीलांसर के तौर पर ‘जनसत्ता’, और ‘प्रतिपक्ष’ आदि में खूब लिखता था। पत्रकारिता ही करनी है, इस फैसले के बाद नौकरी की सबसे पहली कोशिश ‘जनसत्ता’ और ‘अमृत प्रभात’ में की थी। दोनों जगह सफल नहीं हुआ। ‘जनसत्ता’ में तो लिखित-परीक्षा लेने के बाद भी नौकरी नहीं मिली। शीर्ष निर्णयकारी-व्यक्ति ने नतीजे के बारे में पूछने पर बस इतना कहा: ‘लिखते रहिए।’ वो तो मैं पहले से ही लिख रहा था। कुछ ही समय बाद Times of India group के हिंदी अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ में नये पत्रकारों की नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षाएं हुईं। उन दिनों देश के प्रतिष्ठित पत्रकार राजेंद्र माथुर अखबार के प्रधान संपादक थे। बगैर तैयारी के परीक्षा में बैठ गया। बाद में रिजल्ट आया तो मुझे बताया गया कि जितने लोग (कुछ सौ) परीक्षा में बैठे थे, उनमें सफल अभ्यर्थियों के बीच मेरा दूसरा स्थान है। इस तरह पत्रकारिता की औपचारिक और संस्थागत शुरुआत सन् 1986 के अप्रैल महीने में ‘नवभारत टाइम्स’ के पटना संस्करण से ही हुई। इससे पहले कई छोटे-बड़े अखबारों और साप्ताहिकों के लिए जमकर लिखा या अंशकालिक तौर पर काम भी किया। ‘नवभारत टाइम्स’ में काम करते हुए ही मेरी पहली किताब ‘बिहार का सच’ (सन् 1991) में छपी। उसे अपने दिवंगत पिता को समर्पित किया। मेरे पास और था ही क्या, ‘बाबू’ की स्मृति को अपने पास सहेज कर रखने का।
यह संस्मरण वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने फादर्स डे के मौके पर अपने पिता को याद करते हुए फेसबुक पर लिखा है। उनके फेसबुक वॉल से साभार प्रकाशित।