क्या दलित वोटों की अनदेखी और मुस्लिम वोटों को जागीर समझने के कारण चूक गए तेजस्वी

अगर  भारतीय जनता पार्टी अपना मुख्यमंत्री आगे नहीं करती है और नीतीश कुमार पिछले चुनाव की तरह गठबंधन से भागते नहीं हैं तो बिहार चुनाव के नतीजों के बाद 125 सीटें जीतने वाली एनडीए की सरकार बनना तय दिख रहा है। जिस तेजस्वी यादव को बिहार के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जा रहा था, महागठबंधन के 110 सीटों पर रुक जाने के कारण उनको बड़ा झटका लगा है। ऐसे में अब इस पर चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर एनडीए की जीत और महागठबंधन के जीत के करीब पहुंच कर ठिठक जाने की वजह क्या है।

शुरुआती तौर पर महागठबंधन के 122 सीटों के मुहाने पर पहुंच कर रुक जाने की बड़ी वजह कांग्रेस को दी गई 70 सीटों को माना जा रहा है, जिसमें कांग्रेस सिर्फ 19 सीटें जीत सकीं। 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 41 सीटों पर लड़ी थी और उसने 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष का कहना है कि 70 सीटें भले मिलीं लेकिन आरजेडी ने वही सीट दी जहां एनडीए बहुत मज़बूत था।

दरअसल महागठबंधन अगर सत्ता हासिल करने से चूक गई है तो इसके पीछे उसका बसपा, ओवैसी और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी की अनदेखी करना भी एक बड़ा कारण सामने आया है। क्योंकि अगर राजद ने महागठबंधन में इन तीनों दलों को शामिल किया होता तो नतीजे कुछ और होते। भले ही उपेन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व में बना ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट जिसमें बसपा, रालोसपा और ओवैसी की AIMIM शामिल थी, ज्यादा सीटें नहीं जीत सकीं, लेकिन वो राजद को ज्यादा सीटें जीता जरूर सकती थी। गठबंधन में शामिल लेफ्ट पार्टियों को मिली सफलता भी यह बताती है कि जिन दलों का आधार समाज का सबसे कमजोर वर्ग रहा, उसके गठबंधन में शामिल रहने पर गठबंधन और दल दोनों को फायदा हुआ। तो एक बड़ा फैक्टर मुस्लिम मतदाता भी हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय जनता दल से पहले मुस्लिम उम्मीदवार पर भरोसा किया, चाहे वह किसी पार्टी से क्यों न खड़ा हो। क्योंकि जिस यादव-मुस्लिम गठजोड़ के बूते राजद बिहार की सत्ता में कई सालों तक काबिज रही, इस बार मुस्लिम मतदाताओं ने कुछ क्षेत्रों में गठबंधन का साथ नहीं दिया।

बिहार के सीमांचल क्षेत्र को मुस्लिमों का गढ़ माना जाता है। इसमें किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले आते हैं, जहां कुल 24 विधानसभा सीटें है। इन चार जिलों के मुस्लिम वोटों को देखें तो किशनगंज में करीब 70 फीसद, अररिया में 42 फीसद, कटिहार में 43 फीसद और पूर्णिया में 38 फीसद मुस्लिम वोटर हैं। AIMIM ने बिहार की 20 सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, जिनमें से 14 उम्मीदवार सीमांचल इलाके की सीटों पर हैं। यहां ओवैसी की पार्टी ने बसपा के समर्थन से मुस्लिम-दलित गठजोड़ के बूते अमौर, बैसी, जोकीहाट, कोचाधामन और बहादुरगढ़ की सीट जीत ली। इसमें पूर्णिया की अमौर सीट पिछले 36 सालों से जबकि बहादुरगंज सीट पिछले 16 सालों से कांग्रेस के पास थी। मिथिलांचल और कोसी में भी ओवैसी एक फैक्टर रहें और उन्होंने वहां की सीटों को प्रभावित किया।

जबकि बहुजन समाज पार्टी के साकारात्मक रुख के बावजूद राजद ने बसपा से गठबंधन करने से परहेज किया। खबर है कि राजद ने तब बसपा से संपर्क किया जब बसपा, ओवैसी और कुशवाहा ने अपने गठबंधन की घोषणा कर दी। उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाला ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के तरह RLSP ने 99, बसपा, ने 78, AIMIM ने 20 जबकि गठबंधन में शामिल तीन अन्य दलों ने 26 सीटों पर चुनाव लड़ा।

उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के खाते में भले कोई सीट ना आई हो लेकिन आरएलएसपी ने दिनारा, केसरिया सहित कई सीटों पर अपनी अच्छी उपस्थिति दर्ज कराई। तो बीएसपी ने यूपी से सटे बिहार के इलाकों में अपना दम दिखाया। पार्टी ने चैनपुर सीट पर जीत हासिल की। तो रामगढ़ सीट पर बीएसपी के अंबिका सिंह और आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर सिंह में कड़ा मुकाबला रहा, जहां बसपा का आरोप है कि उसे प्रशासन की मिली भगत से हरा दिया गया। गोपालगंज में बीएसपी दूसरे नंबर पर रही। इसके अलावा भोजपुर, शाहाबाद की कई सीटों पर भी बसपा मजबूती से लड़ी। वोट प्रतिशत की बात करें तो BSP को 1.49 प्रतिशत वोट, RLSP को 1.77 प्रतिशत वोट, जबकि AIMIM को 1.24 प्रतिशत वोट यानी मिला। यानी तीनो को मिलाकर कुल 4.50 प्रतिशत वोट मिले, जो इस काटे की टक्कर में काफी अहम साबित हुए हैं। हालांकि राष्ट्रीय जनता दल ने चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए है, जिनकी जांच चुनाव आयोग को जरूर करनी चाहिए।

पेंगुइन ने प्रकाशित की रामविलास पासवान की जीवनी

रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद अचानक से हर कोई उनके बारे में ज्यादा जानने की चाह रखने लगा। उन पर किताबें ढूंढ़ी जाने लगी। इसी बीच पेंगुइन रैंडम हाउस ने हाल ही में देश के कद्दावर नेता और राष्ट्रीय दलित राजनीति के प्रमुख हस्ताक्षर रामविलास पासवान की पहली अधिकृत जीवनी प्रकाशित कर दी है। रामविलास पासवान; संकल्प, साहस और संघर्ष नाम से लिखी गई इस जीवनी के लेखक वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव हैं और यह किताब नवंबर 2020 की शुरुआत में बाज़ार में आ गई है। यह किताब अभी ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर प्री-ऑर्डर के लिए उपलब्ध है।

रामविलास पासवान की इस जीवनी में बिहार के खगड़िया जिले के एक सुदूर गाँव शहरबन्नी से शुरू हुई उनकी जीवन और राजनीतिक यात्रा से लेकर, उनके व्यक्तिगत संघर्षों और उनके मूल्यों का विशद वर्णन है। यह जीवनी इस मायने में भी ख़ास है क्योंकि पासवान की जीवनी आज़ाद भारत के अहम कालखंड की राजनीतिक दास्तां भी साथ में बयाँ करती चलती है। इस किताब में पासवान के व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन के सफ़र के कई ऐसे अनछुए पहलुओं को समेटा गया है जो दुनिया की नज़रों से अभी तक ओझल रहे हैं। पासवान को ऐसा नेता माना गया जो सभी वर्गों और समुदायों में समान रूप से लोकप्रिय थे। अपने पाँच दशकों से भी ज़्यादा के राजनीतिक जीवन में पासवान ने कई अहम पदों की ज़िम्मेवारियाँ संभाली जिसमें रेलवे, संचार और सूचना तकनीक और केमिकल और फर्टिलाइज़र जैसे मंत्रालयों की जिम्मेवारियाँ भी शामिल थीं। अपनी मृत्यु से ठीक पहले वह मौजूदा केंद्र सरकार में खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री थे।

पासवान को लंबे समय से जानने वाले इस पुस्तक के लेखक और पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं कि उन्हें इस बात का गहरा दुख है कि पासवान इस पुस्तक को प्रकाशित होते हुए नहीं देख पाए, हालाँकि उन्होंने निधन के तीन महीने पहले इस पुस्तक की की मुद्रित पांडुलिपि शुरू से अंत तक पढ़ी थी और उन्होंने संतोष जाहिर करने के साथ इसकी तारीफ भी की थी। प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं, ‘यह पुस्तक पासवान जी के जीवन के चार पहलुओं को समेटती है। पहला, बिहार के एक अति पिछड़े गांव शहरबन्नी से शुरू हुआ उनका बचपन, पढ़ाई-लिखाई, और फिर उनका पारिवारिक जीवन। दूसरा, राजनीति में उनके प्रवेश से लेकर अभी तक की राजनीतिक यात्रा; तीसरा, समाजिक न्याय के लिए उनके द्वारा किया गया अनवरत संघर्ष और चौथा, उनकी प्रशासनिक क्षमता, प्रशासनिक फैसले और केंद्रीय मंत्री के तौर पर किए गए उनके कार्य’। उन्होंने आगे कहा, ‘इस किताब को लिखने के क्रम में मेरी छह साल में कई बार पासवान जी से बातचीत हुई। मैंने पासवान जी से जुड़े अनगिनत लोगों से साक्षात्कार किया, इनमें उनके राजनीतिक सहयोगियों, मंत्रालय में उनके साथ काम किए अधिकारियों के साथ उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं।’ पासवान की इस जीवनी पर बात करते हुए पेंगुइन रैंडम हाउस की पब्लिशर, इंडियन लैंग्वेजेज वैशाली माथुर कहती हैं, ‘मैं इस किताब के संपादन के समय इसके ब्यौरों और इसकी किस्सागोई में एक तरह से डूब गई थी, क्योंकि पासवानजी के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी। वे दलित समुदाय के सबसे महत्वपूण नेताओं में से एक थे और केंद्र में बिहार का अहम चेहरा थे। रामविलास पासवान जी की यह प्रामाणिक जीवनी उनके जीवन के सभी पक्षों पर प्रकाश डालती है’। 309 पन्नों की इस पुस्तक का मूल्य 399 रुपये है।

इस पुस्तक के लेखक प्रदीप श्रीवास्तव वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं और पत्रकारिता में तीन दशकों से ज़्यादा समय से सक्रिय हैं। उन्होंने जनसत्ता (इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप) के दिल्ली ब्यूरो में दो दशकों से ज़्यादा समय तक विशेष संवाददाता के रूप में काम किया और उसके बाद दैनिक सन्मार्ग में पाँच साल तक एसोशिएट एडिटर और उसके दिल्ली ब्यूरो के इंचार्ज रहे। इस पुस्तक के प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे प्रकाशन समूह है जो हर साल 250 से ज़्यादा पुस्तकों का प्रकाशन करता है और जिसके पास 3000 से ज़्यादा किताबों का एक बैकलिस्ट है। पेंगुइन के कई लेखकों को भारत रत्न और पद्म विभूषण भी मिल चुका है जो भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान हैं।

प्रेस रिलिज

पुस्तक समीक्षाः कब तक मैला साफ करोगे, तुम कब तक मारे जाओगे

पुस्तक समीक्षाः डॉ. पूनम तुषामड़

भारतीय समाज के सच को जानने-समझने के लिए उनकी पीड़ा को समझना आवश्यक है, जो समाज के अंतिम पायदान पर हैं या कहिए कि हाशिए पर हैं। वाल्मीकि समाज, जिसे कई संबोधनों से पुकारा जाता है उसकी पीड़ा और वेदना की साहित्य जगत के विमर्श में कम ही उपस्थिति रही है। इस समय जब पूरी दुनिया का समाज बदल रहा है और भारत में भी लोग अपने पारंपरिक पेशों को छोड़ कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं तब भी वाल्मीकि समाज के लोग अपने पारंपरिक पेशे को चुनने के लिए मजबूर हैं। यह पारंपरिक पेशा है हाथ से मैला साफ करना और गंदे नाले-नालियों और सड़कों की सफाई करना। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस समाज की पीड़ा लोगों के संज्ञान में लाया जाए ताकि उनके मसलों पर विचार-विमर्श हो। युवा रचनाकार और कवि नरेंद्र वाल्मीकि द्वारा संपादित पुस्तक “कब तक मारे जाओगे” इसी मकसद की प्राप्ति हेतु की गई एक पहल है। उन्होंने वाल्मीकि समाज के कवियों द्वारा लिखी जा रही समकालीन कविताओं को चुनकर एक संकलन के रूप में प्रकाशित किया है।

‘कब तक मारे जाओगे’ सिद्धार्थ बुक्स प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस कविता संग्रह का आवरण चित्र “कुंवर रविंद्र” द्वारा डिजाइन किया गया हैं। कविता संग्रह में 62 कवियों की 129 कविताएं शामिल हैं। जिससे संग्रह काफी अच्छा बन पड़ा हैं। संग्रह के फ्लैप पर सम्मानीय दलित साहित्यकार ‘जयप्रकाश कर्दम जी’ की महत्त्वपूर्ण टिप्पणी हैं, जिसमें वे कहते हैं कि “सत्ता एवं सम्पदा पर काबिज प्रभु वर्ग द्वारा धर्म के नाम पर किसी समुदाय को जन्मना अस्पृश्य घोषित कर उसे मल-मूत्र ढोने और सफाई कार्य करने के लिए बाध्य करना किसी भी सभ्य समाज के मस्तक पर एक बड़ा कलंक हैं”। आज इक्कीसवीं सदी में भी भारतीय गाँवों में दलितों और खासकर भंगी अथवा वाल्मीकि कहे जाने वाले समुदाय की यही स्थिति है। उसमें भी इस जाति की महिलाऐं तिहरे शोषण का शिकार हैं। इसका बेहद मार्मिक रूप कवि डी.के.भास्कर की कविता “एक रोटी के एवज में” से अंकित इन पंक्तियों में देखा जा सकता है।

दाई बनकर जनाती है बच्चे नाभि-नाल काटती है, नहलाती है मुँह में उंगली डाल, साफ़ करती है गला बाद में वही बड़ा होकर, साफ़ करता है गाला उसे गाली देकर …

इससे भी आगे की घृणा और मनोवृति की आसान शिकार होती हैं इन सेठ, साहूकारों के घरों में काम करने वाली महिलाऐं जिनके दर्द को अन्य नामों से पुकार कर इनसे घृणा करने वाले को इनका बलात्कार करते हुए किसी प्रकार की छूत महसूस नहीं होती ..दलित स्त्रियों की इस पीड़ा को इसी संग्रह में प्रकाशित कवि ‘हसन रजा’ की ‘साहूकार ‘नामक कविता से समझा जा सकता है :-

उसके घर की सफाई तो मैं /कर देती हूँ /पर उसकी उन नज़रों का मैल/साफ़ नहीं कर पाती/ जो पोंछा लगते वक्त मेरे सीने पर/ और झाड़ू लगते वक्त /मेरे पिछवाड़े पर टिकी रहती हैं /ये सब झेलते हुए भी / दुनिया वाले हम पर ही / कहर ढाते हैं /हमें कचरे वाली /और उन्हें साहूकार बुलाते हैं.

इस कविता में अभिव्यक्त सवाल अगर आज भी इस विवशता के साथ उठाया जा रहा है, तो ये विचारणीय है कि सामाजिक स्थितियां इन दलित स्त्रियों के लिए किस हद तक क्रूर हैं। कविता संग्रह ‘कब तक मारे जाओगे’ की कविताओं को पढ़ते हुए हम कह सकते हैं कि भिन्न-भिन्न कवियों की कविताएं होते हुए भी विषय में काफी समानता है। किसी को यह एक विषय का दोहराव भी लग सकता है। किन्तु इन कविताओं का एक दूसरा महत्वपूर्ण एवं सकारात्मक पक्ष भी है और वह है कि ये कविताएँ नहीं बल्कि सफाई पेशे से जुड़े समुदाय की महागाथा है। जहाँ सभी कविताओं के भिन्न होने पर भी उसमे व्यक्त वेदना और भाव वही है किन्तु इस संग्रह की अनेक कविताएं अपनी धारदार भाषा में तथाकथित स्वर्ण और सभ्य समझे जाने वाले समाज को सीधे ललकारती और चुनौती भी देती हैं।कवि राज वाल्मीकि की ग़ज़ल की कुछ पक्तियां देखें :

हमने जुल्म सही सदियों तक तू, इनको न समझ सका. समझ जाएगा तू भी प्यारे ,हम दलितों में रह कर देख. हम तो रोज़ गटर में घुस कर, नरक सफाई करते हैं. कैसा अनुभव है ये करना एक बार तो करके देख.

ये संग्रह भारतीय समाज की ढकी-छिपी जातिवादी सोच की परतों को उघाड़ फैंकता हैं। जहाँ समाज अपने ही समाज के एक समुदाय या जाति के प्रति इस कदर क्रूर है कि उसे उसके मानवीय मूल्यों से भी विमुख होकर जीने को मजबूर कर दिया है। इसी समाज व्यवस्था का दोहरा रूप और व्यवहार किसी संकट और माहमारी के समय कैसे बदल जाता है उस पर बेहद सटीक प्रश्न इस संग्रह की कई कविताओं में उठाए गए हैं जिनमें से डॉ. सुरेखा की कविता “सफाई सैनिक” बेहद सटीक व्यंग्यात्मकता के साथ प्रश्न करती है।

करते थे जो अपमान हर दिन आज गले में माला पहना रहे हैं क्या समझ गए हैं अहमियत इन की जो सफाई सैनिक पूजे जा रहे है ?

सम्मान जो आज मिल रहा है क्या कल बरक़रार रह पाएगा ?

सवाल और भी बहुत हैं जैसे भारत को विश्व गुरु बनाने वाली सत्ता कि नज़र में ये सफाई मजदूर समुदाय आखिर क्यों इंसान नहीं है ?.आधुनिक तकनीक के नाम पर रोज नए-नए उपकरणों की खोज और अनुसन्धान करने वाली कॉर्पोरेट कम्पनीज़ की नज़र में आज तक सीवरेज में जहरीली गैसों से मरने वालों के लिए कोई आधुनिक उपकरण तैयार करने का विकल्प क्यों नहीं है। एक सीवरेज वर्कर सफाई सैनिक की इसी पीड़ा को ‘दीपक मेवाती’ की कविता में देखा जा सकता है जहाँ वह मौजूदा सत्ता से सीधे सवाल करता है। :-

विज्ञान तरक्की कर बैठा है, पर उस पर कोई फर्क नहीं चाँद पर दुनिया जा बैठी है, पर उस पर कोई तर्क नहीं देह उसकी औज़ार बानी है, गंदे नालों की खातिर . मौत ने जीवन छीन लिया, सबके सु जीवन की खातिर.

इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए जो मुख्य मुद्दे नज़र आते हैं वे इन समाज के सफाई कर्मी की आत्मपीड़ा, उस पीड़ा से जन्मा आक्रोश, इस आक्रोश के चलते इस अपमानित जीवन से मुक्ति की छटपटाहट, पूरे संग्रह में इन कवियों ने अपनी दयनीय स्थितियों को रखते हुए उस से मुक्त होने के लिए शिक्षा और संघर्ष का मार्ग सुझाया है।

यह संग्रह जैसे ही प्रकाशित होकर आया इस पर लगातार अनेक कवियों की इतनी सारी महत्वपूर्ण और सुन्दर टिप्पणियां आई। जिसमें उन्होंने इस संग्रह की प्रशंसा करते हुए सकारात्मक टिप्पणियां एवं प्रतिक्रियाएं सोशल मिडिया एवं अन्य स्थानों पर दी। किन्तु कुछ साहित्यकारों का मत इनसे भिन्न भी रहा।इस संग्रह को लेकर उन्हें इसके किसी एक जाति विशेष अथवा समुदाय विशेष पर होने से ऐतराज़ था। उनका मानना था कि ‘दलितों में साहित्यिक स्तर पर विभेद उत्पन्न नहीं होना चाहिए’। यह बात सही हैं कि दलित एक इकाई हैं। एक वृहद् अम्ब्रेला हैं, जिसके अंतर्गत सफाई पेशे से जुडी सभी जातियां आती हैं, किन्तु ‘वाल्मीकि’ या ‘भंगी’ कही जाने वाली यह जाति अपने पर थोपी गई परंपरागत पेशेगत पहचान के चलते अपनी सहगामी जातियों के द्वारा भी भेदभाव एवं निम्न समझी जाती है। संभवतः यही कारण हैं कि वह अपनी एक अलग पहचान निर्मित करने की और अग्रसर हैं। जहाँ वह संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते हुए अपने महापुरुषों से प्रेरणा पाकर स्वयं को शिक्षित, जागरूक और चेतनशील बनाने की ओर बढ़ता दिखाई देता है। इस संग्रह की ऐसी अनेक कविताएं हैं जो ‘झाड़ू’ को ‘कलम’ तब्दील करने की बात करती हैं और सदियों से अपमानित जीवन को त्याग कर शिक्षित और सम्मानित जीवन और पेशे अपनाने की बात करती हैं.. जिनमें कोई एक सफाईकर्मी सदियों की गुलामी समाज में अपने संवैधानिक सामाजिक हकों के लिए आह्वान करता दिखता है। कवि श्याम किशोर बैचेन की ये कविता देखें..

झाड़ू छोड़ो कलम उठाओ परिवर्तन आ जाएगा शिक्षा को हथियार बनाओ परिवर्तन आ जाएगा दारू छोड़ो ज्ञान बढ़ाओ परिवर्तन आ जाएगा हर कीमत पर पढ़ो, पढ़ाओ परिवर्तन आ जाएगा

वाल्मीकि या भंगी कही जाने वाली ये जाति भी डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर को अपना आदर्श मानकर अपने अन्य जननायकों बुद्ध और फुले के विचारों को आत्मसात कर अपनी चेतना और अभिव्यक्ति का आधार बनाने लगी हैं। कविता संग्रह ‘कब तक मारे जाओगे’ में सम्मिलित कविताएं इन दलित रचनाकारों की इसी प्रकार की अभिव्यक्ति का सामूहिक प्रयास हैं।

प्रत्येक कवि की कविता में आपको अपने पुश्तैनी पेशों को त्याग कर, अपनी अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा और सम्मानित जीवन जीने की छटपटाहट स्वतः दिखाई देगी। इस संग्रह के शुरुआती पृष्ठों में पृष्ठ संख्या चार पर अंकित एक खूबसूरत चित्र जिसमें बांस की लम्बी झाड़ू को कलम के रूप में चित्रित करके उसके शीर्ष पर ताज दिखाया गया है, बेहद अर्थपूर्ण एवं आशान्वित करने वाला है। यह चित्र कानपूर (यू.पी.) के प्रख्यात लेखक देव कुमार जी की है। इसके पश्चात् अगले पृष्ठ पर सम्पादकिय है जिसमें संपादक नरेंद्र वाल्मीकि समाज में सफाई कर्मियों की दशा पर चिंतित होते हुए कहते हैं कहते हैं कि “सफाई कर्मियों के मात्र पैर धो देने से इस वर्ग का भला नहीं हो सकता है साहब ! इस समाज के सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान देना होगा “..

कोरोना जैसी महामारी के दौर में सफाई कर्मचारियों द्वारा दी गई अपनी अभूतपूर्व सेवाओं के लिए सरकार एवं लोगों द्वारा इन सफाई सैनिकों का सम्मान किये जाने पर व्यंग्य करते हुए सम्पादक कहते हैं कि “सफाई पेशे से जुड़े लोगों को अपने घरों की चौखट तक पर न चढ़ने देने वाले लोग आज कोरोना महामारी के दौर में सफाई कर्मचारियों को जगह-जगह फूलमाला पहनाकर सम्मानित कर रहे हैं। यहाँ संपादक ने समाज एवं सत्ता के दोगले व्यवहार पर सटीक प्रहार किया है। संग्रह के पृष्ठ आठ पर एक चित्र और अंकित है जिसमें एक सफाई कर्मचारी पिता अपने बच्चे को स्कूल की और ले जा रहा है और उसके पैरों में पड़ी पुश्तैनी पेशे की बेड़ी को शिक्षा की कलम के प्रहार से टूटते दिखाया गया है। ये है नवीन पीढ़ी की सोच जिसे जितनी खूबसूरती से युवा कवि ‘शिवा वाल्मीकि’ ने चित्रांकित किया है। वह अद्द्भुत है। इस संग्रह में उपयोग किये जाने वाले दोनों चित्रों के चयन का श्रेय युवा संपादक नरेन्द्र वाल्मीकि को ही जाता है।

इस संग्रह की कविताएं केवल सदियों से संतप्त अभिशप्त जीवन का आर्तनाद या विलाप भर नहीं हैं, बल्कि वे आधुनिक सोच लिए हुए एक स्वच्छ समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करने की ओर उन्मुख कदम हैं। इन कविताओं में जीवन का चुनौतीपूर्ण यथार्त भी है और बेहतर भविष्य का स्वप्न भी। घृणित पेशों का धिक्कार भी है और सम्मानित पेशों को अपनाने की ललकार भी। इस संग्रह में जाने-माने प्रख्यात कवियों के साथ-साथ आप का परिचय कई ऐसे युवा कवियों से भी होगा जिन्होंने शायद पहली बार कविताएं कहीं प्रकाशित कराई हैं जो बेहद खूबसूरत कविताएं हैं। जिनमे ‘रेखा सहदेव’ की ‘सम्मान’ कविता, देविंदर लक्की की ‘बस्स ! बहुत हुआ’ कविता, हसन रज़ा की ‘साहूकार’ अनिल बिडलान की मैं झाड़ू कहीं पर भूल जाऊं.. जैसी अनेक उत्कृष्ट कविताएं जो आपको अपमानित घृणित पेशों की बेड़ियों को तोड़ कर मुक्ति पथ की ओर लेकर जाती महसूस होंगी तथा अपनी निश्छल सपाट बयानी से इस क्रूर व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करती हैं…इस संग्रह में ऐसी अनेक कविताएं हैं, सभी का जिक्र यहाँ पर संभव नहीं है किन्तु यह कहा जा सकता है कि ये कविताएं निश्चित ही दलित साहित्य की वैचारिक ज़मी को एक उन्नत फलक प्रदान करती हैं।

देश के भिन्न-भिन्न राज्यों से सम्बंधित भंगी अथवा वाल्मीकि समुदाय के कवियों का साझा संकलन होने के कारण भाषा शैली और शिल्प पर बात यहाँ बेमानी है। पुस्तक में अनेक स्थानों पर शाब्दिक त्रुटियां रह गई हैं, किन्तु भंगी अथवा वाल्मीकि समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने वाले इस महत्वपूर्ण संग्रह की मुखर कविताओं के सामने वे नज़रअंदाज़ की जानी चाहिए

दलितों में भी दलित समाज की आधुनिक विचारशैली से गुंथी कविताओं का मिला-जुला संकलन है, “कविता संग्रह कब तक मारे जाओगे” जो समाज और व्यवस्था को तो कटघरे में ला कर सवाल खड़ा करता ही है। उसके अतिरिक्त समाज में सदियों से फैली अज्ञानता के अंधकार को चीर कर उसे डॉ. आंबेडकर के विचारों के आलोक में आगे बढ़ने की दिशा भी देता है। संपादक तथा संग्रह में शामिल सभी क्रांतिकारी कवियों को शुभकामनाएं।

पुस्तक : कब तक मारे जाओगे (काव्य संकलन) संपादक : नरेंद्र वाल्मीकि प्रकाशक : सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली पृष्ठ : 240 मूल्य : ₹150 वर्ष : 2020 इस लिंक से बुकिंग कर सकते हैं। 


समीक्षक

डॉ. पूनम तूषामड़ दिल्ली में एक दलित परिवार में जन्मीं डॉ. पूनम तूषामड़ ने जामिया मिल्लिया से पीएचडी की उपाधि हासिल की। इनकी प्रकाशित रचनाओं में “मेले में लड़की (कहानी संग्रह, सम्यक प्रकाशन) एवं दो कविता संग्रह ‘माँ मुझे मत दो’ (हिंदी अकादमी दिल्ली) व मदारी (कदम प्रकाशन, दिल्ली) शामिल हैं। संप्रति : आप आंबेडकर कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापिका हैं। मोबाइल : 9013893213

जानिए कौन हैं अमेरिका के होने वाले राष्ट्रपति जो बाइडेन

दुनिया सिमट गई है। दुनिया के एक छोड़ की खबर कुछ पलों में ही दुनिया के दूसरे कोने तक पहुंच जाती है। और बात जब अमेरिका की हो तो सभी इसके बारे में जानना चाहते हैं। फिलहाल अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चर्चा में है। अमेरिका में पिछले चार दिनों से वोटों की गिनती जारी है और अब साफ हो गया है कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन अमेरिका का नया राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी 270 इलेक्टोरल वोट को हासिल कर अमेरिका का नया राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। वाइट हाउस में जो बाइडेन की डेप्युअटी कमला हैरिस होंगी।

शपथ लेते वक्त जो बाइडेन की उम्र करीब 78 साल की होगी और वो अमेरिका के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति होंगे। तो आइए जानते हैं अमेरिका के नए राष्ट्रपति बनने जा रहे जो बाइडेन के बारे में। इस खबर में हम आपको यह भी बताएंगे कि व्हाइट हाउस में जो बाइडेन के रूप में नया राष्ट्रपति आने के बाद भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

जो बाइडेन यानी जोसेफ रॉबिनेट बाइडेन जूनियर का जन्म 20 नवंबर 1942 में पेन्सिलवेनिया राज्य के स्क्रैंटन में हुआ था। हालांकि वह बचपन में ही डेलवेयर चले गए थे। बाइडेन सिरैक्यूज़ यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लॉ के स्नातक हैं, स्नातक करने के एक साल बाद उन्होंने डेलावेयर बार परीक्षा पास की। उन्होंने काउंटी परिषद के लिए काफी अभ्यास किया। साल 1972 में जो बाइडेन डेलावेयर से सीनेट के लिए चुने गए। तब वो सबसे कम उम्र के सिनेटर में से एक बने। अमेरिकी सीनेट में रहते हुए बाइडेन ने न्यायपालिका समिति और विदेशी संबंध समिति में सेवा की, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में एक महत्वपूर्ण अनुभव का निर्माण किया।

हालांकि उनके राजनीतिक जीवन में और ज्यादा जानकारी देने से पहले हम आपको पहले उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताते हैं।

व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो बाइडन ने काफी तकलीफें झेली। 1972 में सीनेट चुने जाने के कुछ वक्त बाद ही एक कार एक्सीडेंट में उनकी पत्नी नीलिया और बेटी नाओमी की मौत हो गई, जबकि उनके बेटे हंटर और ब्यू गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्होंने अपने दोनों बेटों को अपनी बहन और उनके परिवार की मदद से बड़ा किया। साल 2015 में 46 साल की उम्र में बाइडेन के बड़े बेटे ब्यू की ब्रेन कैंसर से मौत हो गई थी। बाइडेन के छोटे बेटे हंटर की बात करें तो एक वकील और लॉबिस्ट के रूप में उनका करियर भ्रष्टाचार के आरोपों का निशाना रहा है।

हालांकि पहली पत्नी नीलिया की मौत के 5 साल बाद बाइडेन ने जिल से शादी कर ली। जिल और बाइडेन की एश्ली नाम की एक बेटी है, जिसका जन्म 1981 में हुआ था।

अब आते हैं जो बाइडेन के राजनीतिक कैरियर पर, राजनीतिक कैरियर की बात करें तो जो बाइेन डेलवेयर से 6 बार सीनेटर रह चुके हैं। बाइडेन राष्ट्रपति चुनाव की रेस में तीसरी बार उतरे हैं। उनकी पहली कोशिश 1988 के चुनाव के लिए थी, हालांकि तब उन्हें साहित्यिक चोरी के आरोप में पीछे हटना पड़ा था। उन्होंने अपनी दूसरी कोशिश 2008 के चुनाव के लिए की थी। बाइडेन को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का करीबी माना जाना है। वह ओबामा के कार्यकाल में 2008 से 2016 तक दो बार उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं। यही वजह है कि 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में बाइडेन की जीत के लिए ओबामा भी काफी जोर लगाते दिखें।

बाइडेन की 3 बड़ी प्राथमिकताएं हैं? जिसकी घोषणा उन्होंने तमाम भाषणों के दौरान की- (1) हेल्थ केयर से जुड़े ढांचे का विस्तार करना (2) शिक्षा में ज्यादा निवेश करना (3) सहयोगी देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देना

भारत को लेकर नीति यहां जब हम सहयोगी देशों की बात कर रहे हैं तो एक जरूरी सवाल यह भी है कि भारत को लेकर जो बाइडेन का रुख क्या रहेगा। भारत में बाइडेन को लेकर दो अलग तरह की बातें सामने आ रही हैं। या यूं कहें कि भारत के बुद्धिजीवी और विदेश नीति के जानकार दो धड़ों में बंटे नजर आ रहे हैं। एक धड़ा का कहना है कि बाइडेन के बयानों के अनुसार, वह जम्मू कश्मीर और एनआरसी-सीएए के कारण भारत से असंतुष्ट हैं। जबकि एक धड़े का मानना यह भी है कि अपनी विदेश नीति यानी फॉरेन पॉलिसी को लेकर बाइडेन का नजरिया बिलकुल अलग है। एक दूरदर्शी नेता होने के नाते बाइडेन अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को काफी गहराई से देखते हैं और वह किसी देश की आंतरिक नीति में ज्यादा दखल नहीं देते।

भारत के 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय-अमेरिकी समुदाय को संबोधित करते हुए बाइडेन ने कहा था कि अगर वह राष्ट्रपति चुनाव जीतते हैं तो भारत अपने क्षेत्र और अपनी सीमाओं पर जिन खतरों का सामना कर रहा है, वह उनसे निपटने में उसके साथ खड़े रहेंगे। वह भारत को अमेरिका के लिए ‘प्राकृतिक साझेदार’ मानते हैं। ओबामा के समय में भारत-अमेरिका के संबंध बेहतर हुए, ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि बाइडेन के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के संबंध ठीक रहेंगे। जो बाइडेन की सहयोगी के रूप में उपराष्ट्रपि के तौर पर भारतीय मूल की कमला हैरिस के होने से भी फर्क पड़ने की संभवना है। हमें भी उम्मीद करनी चाहिए भारत और अमेरिका के संबंध बेहतर होंगे और H1-B वीजा को लेकर लगाई गई रोक को अमेरिका वापस ले लेगा, जिससे अमेरिका में भारतीयों की नौकरी के द्वार फिर से खुल जाएंगे। हालांकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरा जोर लगाया था कि अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप की दुबारा वापसी हो, प्रधानंमत्री मोदी ने ट्रंप के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया था, लेकिन लगता है कि अब भारतीयों ने प्रधानमंत्री मोदी को सुनना कम कर दिया है। फिलहाल अमेरिकियों को नया राष्ट्रपति मुबारक।

बिहार में नीतीश और मोदी को पछाड़ने की राह पर तेजस्वी

बिहार से आ रही तस्वीरें यह बयान कर रही है कि इस बार बिहार में तेजस्वी तय है। चुनाव के नतीजे हालांकि 10 नवंबर को आने हैं, लेकिन सत्ता पक्ष की बेचैनी और महागठबंधन के पक्ष में बिहारवासियों की बढ़ती गोलबंदी यह बता रही है कि बिहार में इस बार बदलाव की संभावना काफी प्रबल है।

हालांकि एक विशेष विचारधारा और सत्ता के साथ खड़ा पूंजीवादी मीडिया का एक खेमा इस सच्चाई से मुंह चुरा रहा है लेकिन फायदे और नुकसान के मोह से मुक्त सोशल मीडिया के जरिए आ रही तस्वीरें साफ बता रही है कि नीतीश और भाजपा की सरकार खतरे में है। यहां तक की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेचैनी भरे बयानों से भी लग रहा है कि बिहार में एनडीए मुसीबत में है।

बिहार में दो चरणों का चुनाव हो चुका है और आखिरी चरण का चुनाव 7 नवंबर को होना है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चार बार बिहार आएं और इस दौरान उन्होंने 12 रैलियों को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने 23 अक्टूबर को बिहार में अपनी पहली रैली, जबकि 3 नवंबर को अपनी आखिरी रैली को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने बिहार में 23 अक्टूबर, 28 अक्टूबर, 01 नवंबर और 03 नवंबर को चुनावी जनसभाओं को संबोधित किया। इसे महज इत्तेफाक नहीं कहा जा सकता कि 28 अक्टूबर और 3 नवंबर को बिहार के दो चरणों के मतदान के दौरान भी मोदी बिहार में चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे थे। साफ है कि चुनाव के दिन प्रधानमंत्री मोदी का अन्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करना एनडीए और भाजपा का एजेंडा था।

अपने बिहार चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ट्विटर पर खासे सक्रिय रहें। 23 अक्टूबर से लेकर 4 नवंबर के बीच प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ 63 ट्विट बिहार चुनाव को लेकर किया। इनके ट्विट में बिहार चुनाव में पिछड़ने की बेचैनी साफ दिखी। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार की शुरुआत में विकास और सुशासन की बात करते रहें, लेकिन महागठबंधन की बढ़त और तेजस्वी यादव के पक्ष में बिहारवासियों का हुजूम देखकर धर्म और राष्ट्रवाद के अपने पसंदीदा पुराने एजेंडे पर लौट आएं।

23 अक्टूबर को अपनी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार, बिहारवासियों, विकास और लोकपर्व छठ की बात की। प्रधानमंत्री के 23 अक्टूबर के एक ट्विट को देखिए। इसमें पीएम मोदी कह रहे हैं-

“2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद, जितने समय बिहार को डबल इंजन की ताकत मिली, राज्य के विकास के लिए और ज्यादा तेजी से काम हुआ है। कोरोना के समय में भी गरीबों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एनडीए सरकार ने काम किया है।”

हालांकि 2014 के बाद केंद्र के सहयोग से बिहार में कौन-कौन सी क्रांति हुई, प्रधानमंत्री ने इस पर कुछ नहीं कहा। तो वहीं बिहार में चुनाव प्रचार खत्म करने के बाद पीएम मोदी ने जो ट्विट किया, उसमें वह विकास और सुशासन से हटते हुए जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगते दिखे। 3 नवंबर को बिहार में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन पीएम मोदी ने जो ट्विट किया, उसमें उन्होंने कहा,

“बिहार में जंगलराज लाने वालों के साथियों को भारत माता से दिक्कत है। कभी एक टोली कहती है कि भारत माता की जय के नारे मत लगाओ, कभी दूसरी टोली को इससे सिरदर्द होने लगता है। ऐसे लोग अब एकजुट होकर वोट मांग रहे हैं। अगर इन्हें भारत माता से दिक्कत है, तो बिहार को भी इनसे दिक्कत है।”

तो वहीं इसके अगले ही दिन उन्होंने एक और ट्विट कर बिहार के मतदाताओं से अपनी जाति की दुहाई दे डाली। बकौल पीएम मोदी,

“बिहार का गरीब आज आश्वस्त है कि उनके ही जैसा गरीबी में पैदा हुआ पिछड़े समाज का उनका सेवक आज दिल्ली में काम कर रहा है और यह सुनिश्चित कर रहा है कि एक भी गरीब भूखा न सोए। कोरोना के इस कठिन समय में उन्हें मुफ्त राशन और सहायता सुनिश्चित की जा रही है।”

तो वहीं अंतिम चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन 5 नवंबर की शाम को प्रधानमंत्री मोदी ने बिहारवासियों के नाम चार पन्नों की एक चिट्ठी ट्विट की है, जिसमें उन्होंने बिहारवासियों से तमाम वादे किये हैं। यह साफ बता रहा है कि एनडीए डरा हुआ है। यह डर इसलिए भी है क्योंकि भले नीतीश कुमार के स्वार्थ के चलते बिहार में एनडीए की सरकार बन गई हो, पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने महागठबंधन को ही चुना था। ऐसे में भाजपा बिहार को न जीत पाने के अपने दर्द को भुलाना चाहती है। नीतीश कुमार ने तो चुनाव प्रचार के आखिरी दिन इमोशनल कार्ड खेलते हुए कह दिया कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा।

प्रधानमंत्री के ये दावे कितने सही है, यह तो बिहार की जनता तय करेगी, लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बदलते बयानों से साफ है कि एनडीए के पास बिहारवासियों को बिहार के विकास के बारे में किये कामों को बताने के लिए कुछ खास नहीं है।

वहीं दूसरी ओर देखें तो जिस राष्ट्रीय जनता दल पर मुस्लिम और यादवों का दल होने का ठप्पा लगता रहा है, इस बार तेजस्वी यादव के

नेतृत्व में वह जाति धर्म से ऊपर उठकर मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है। बिहार के युवाओं को नौकरी देने और बेरोजगारी दूर करने के जिन मुद्दों को सामने रखकर महागठबंधन चुनाव मैदान में है, उसके सामने एनडीए मुंह के बल गिरता नजर आ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की घबराहट और नीतीश कुमार की छटपटाहट इस पर मुहर लगाता दिख रहा है।


अशोक दास दलित दस्तक के संपादक हैं। दलित दस्तक एक मासिक पत्रिका, यू-ट्यूब चैनल और वेबसाइट है। हमारे काम को सपोर्ट करिए। Google Pe और Phone Pe का नंबर 9711666056 है।

अर्णब की गिरफ्तारी पर पढ़िए रवीश कुमार ने क्या लिखा है

Written By- Ravish Kumar

मैं आज क्यों लिख रहा हूं, अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद क्यों नहीं लिखा? आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला संगीन है लेकिन सिर्फ नाम भर आ जाना काफी नहीं होता है। नाम आया है तो उसकी जांच होनी चाहिए और तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। एक पुराने केस में इस तरह से गिरफ्तारी संदेह पैदा करती है। महाराष्ट्र पुलिस को कोर्ट में या पब्लिक में स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बाद भी इस केस को बंद किया गया था? क्या राजनीतिक दबाव था? तब हम जान सकेंगे कि इस बार राजनीतिक दबाव में ही सही, किसी के साथ इंसाफ़ हो रहा है। अदालतों के कई आदेश हैं। आत्महत्या के लिए उकसाने के ऐसे मामलों में इस तरह से गिरफ्तारी नहीं होती है। कानून के जानकारों ने भी यह बात कही है। इसलिए महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह के कई ठोस कारण बनते हैं। जिस कारण से पुलिस की कार्रवाई को महज़ न्याय दिलाने की कार्रवाई नहीं मानी जा सकती। भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फांसी का फंदा डालने जैसा है। झूठे मामले में फंसाने से लेकर लॉक अप में किसी को मार मार कर मार देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता वसूल लेने और किसी को भी बर्बाद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। पेशेवर जांच और काम में इसका नाम कम ही आता है। इसलिए किसी भी राज्य की पुलिस हो उसकी हर करतूत को संदेह के साथ देखा जाना चाहिए। ताकि भारत की पुलिस ऐसे दुर्गुणों से मुक्त हो सके और वह राजनीतिक दबाव या अन्य लालच के दबाव में किसी निर्दोष को आतंकवाद से लेकर दंगों के आरोप में न फंसाए।

अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। ग़लत नहीं कहा जा रहा है। क्या दिल्ली पुलिस और यूपी की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में हमारी तरह ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। मुझे कुछ होगा तो अर्णब गोस्वामी एक लाइन नहीं बोलेंगे। अगर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ही ग़लत हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर आप भी अर्णब के केस में पुलिस के बर्ताव का सख़्त परीक्षण कीजिए ताकि सिस्टम दबाव और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है। डॉ कफ़ील ख़ान पर अवैध रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा कर छह महीने बंद रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि अवैध रूप से रासुका लगाई गई है। उक्त अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अर्णब गोस्वामी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक ने इस नाइंसाफी पर कुछ नहीं कहा। भारत में किनके राज में प्रेस की स्वतंत्रता अभी खत्म होकर मिट्टी में मिल चुकी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। आपको एक लाख बार बता चुका हूं। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करने वाले मंत्रियों के प्रधानमंत्री ने आज तक एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। बिल्कुल अन्वय नाइक और कुमुद नाइक की आत्महत्या के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। अन्वय नाइक की बेटी की कहानी बेहद मार्मिक है। इस बात की जांच आराम से हो सकती है कि अर्णब गोस्वामी ने अन्वय नाइक से स्टुडियो बनाकर पैसे क्यों नहीं दिए? 80 लाख से ऊपर का काम है तो कुछ न कुछ रसीदी सबूत भी होंगे। अन्वय नाइक की बेटी का कहना सही है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए लेकिन कानून को भी मर्यादा से ऊपर नहीं होना चाहिए। जांच की निष्पक्षता की मर्यादा अहम है। तभी लगेगा कि पारदर्शिता के साथ न्याय हो रहा है। राजनीतिक दबाव में केस का खुलना और केस का बंद होना ठीक नहीं है।

जब एनडीटीवी पर छापे पड़ रहे थे और एक चैनल को डराया जा रहा था तब अर्णब का कैमरा बाहर लगा था और लिंचमैन की तरह कवर किया जा रहा था। उनके कवरेज में एक लाइन प्रेस की स्वतंत्रता पर नहीं थी। उनका रिपोर्टर डॉ. रॉय के घर की दीवार फांदने का प्रयास कर रहा था। बीजेपी के मंत्री प्रवक्ता मेरा बहिष्कार करते हैं। एन डी टी वी की सोनिया वर्मा सिंह ने ट्विट कर अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। एनडीटीवी के अन्य सहयोगियों ने अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। ये फर्क है। जब 2016 में एन डी टी वी इंडिया को बैन किया जा रहा था तब प्रेस क्लब में पत्रकार जुटे थे। आप पूछ सकते हैं कि अर्णब और उनके बचाव में उतरे मंत्री लोग क्या कर रहे थे। जब विपक्ष के नेताओं पर छापे की आड़ में हमले होते हैं अर्णब हमेशा जांच एजेंसियों की साइड लेते हैं। अर्णब ने मोदी सरकार पर क्या सवाल उठाए हैं, बेरोज़गारी से लेकर किसानों के मुद्दे कितने दिखाए गए हैं यह सब दर्शकों को पता है। उल्टा अर्णब गोस्वामी सरकार पर उठाने वालों को नक्सल से लेकर राष्ट्रविरोधी कहते हैं। भीड़ को उकसाते हैं। झूठी और अनर्गल बाते करते हैं। वे कहीं से पत्रकार नहीं हैं। उनका बचाव पत्रकारिता के संदर्भ में करना उनकी तमाम हिंसक और भ्रष्ट हरकतों को सही ठहराना हो जाएगा। अर्णब की पत्रकारिता रेडियो रवांडा का उदाहरण है जिसके उद्घोषक ने भीड़ को उकसा दिया और लाखों लोग मारे गए थे। अर्णब ने कभी भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों का पक्ष नहीं लिया। पिछले चार महीने से अपने न्यूज़ चैनल में जो वो कर रहे हैं उस पर अदालतों की कई टिप्पणियां आ चुकी हैं। तब किसी मंत्री ने क्यों नहीं कहा कि कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है? जबकि मोदी राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को जिनती बार उभारा गया है उतना किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ। हर बात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बताई और दिखाई जाती है।

एक बार अर्णब हाथरस केस में योगी की पुलिस को ललकार कर देख लेते, मुख्यमंत्री योगी को ललकार कर देख लेते जिस तरह से वे मुख्यमंत्री उद्धव को ललकारते हैं तो आपको अंतर पता चल जाता कि कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है। उद्धव ठाकरे ने प्रचुर संयम का परिचय दिया है और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने भी जिनकी एक छवि मारपीट करने वालों की भी रही है। कई हफ्तों से अर्णब बेलगाम पत्रकारिता की हत्या करते हुए हर संवैधानिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा रहे थे। पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्विट किया है कि यूपी में पत्रकारों के खिलाफ 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। क्या अर्णब में साहस है कि वे अब भी योगी सरकार को ललकार दें इस मसले पर। जो आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं वो सीमा की बात करने लगेंगे और अर्णब पर रासुका लगा दी जाएगा डॉ कफील ख़ान की तरह। गौरी लंकेश की हत्या के मामले को अर्णब ने कैसे कवर किया था? या नहीं किया था? द वायर के संस्थापक हैं सिद्धार्थ वरदराजन। अर्णब गोस्वामी सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में क्या क्या कहते रहे हैं आप रिकार्ड निकाल कर देख सकते हैं मगर सिद्धार्थ वरदराजन ने उनकी गिरफ्तारी में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। निंदा की है। उसी तरह से कई ऐसे लोगों ने की है। अर्णब के पक्ष में उतरे बीजेपी की मंत्रियों और समर्थकों की लाचारी देखिए। वे सुना रहे हैं कि कहां गए संविधान की बात करने वाले। पत्रकार रोहिणी सिंह ने एक जवाब दिया है राकेश सिन्हा को। संविधान की बात करने वालों को आपने जेल भेज दिया है। कुछ को दंगों के आरोप में फंसा दिया है। इनकी समस्या ये है कि जिन्हें नक्सल कहते हैं, देशद्रोही कहते हैं उन्हीं को ऐसे वक्त में खोजते हैं। इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि कई लोगों ने एक नागरिक के तौर पर अर्णब की गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह फर्क साफ रखा है कि अर्णब पत्रकार नहीं है और न ही यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है।

न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी निंदा की है जबकि अर्णब इसके सदस्य तक नहीं है। अर्णब ने हमेशा इस संस्था का मज़ाक उड़ाया है। क्या न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन किसी ऐसे छोटे चैनल के पत्रकार की गिरफ्तारी पर बोलेगा जो उसका सदस्य नहीं है? ज़ाहिर है केंद्र सरकार अर्णब के साथ खड़ी है। अर्णब केंद्र सरकार के हिस्सा हो चुके हैं। अर्णब पत्रकार नहीं हैं। इसे लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता के हर पैमाने को ध्वस्त किया है। जिस तरह से पुलिस कमिश्नर को ललकार रहे थे वो पत्रकारिता नहीं थी। मैंने कल इस मामले पर कुछ नहीं लिखा क्योंकि प्राइम टाइम के अलावा कई काम करने पड़ते हैं। मैं लंबा लिखता हूं इसलिए भी टाइम चाहिए होता है। जब गिरफ्तारी की ख़बर आई तो मैं व्हाट्स एप पर था। फिर तुरंत कपड़े धोने चला गया। नील डालने के बाद भी बनियान में सफेदी नहीं आ रही थी। उससे जूझ रहा था तभी किसी का फोन आया कि चैनल खोलिए अर्णब गिरफ्तार हुए हैं। मैंने कहा कि उन्हीं जैसौं के कारण तो मेरे घर में न्यूज़ चैनल नहीं खुलता है। ख़ैर जब बनियान धोने के बाद पंखे की सफाई के लिए ड्राईंग रूम में आया तो चैनल खोल दिया। पंखे पर जमी धूल आंखों में गिर रही थी और मीडिया पर जमी धूल चैनल पर दिखने लगी। वैसे कुछ दिन पहले फेसबुक पर रिपब्लिक चैनल के मामले में एडिटर्स गिल्ड की प्रतिक्रिया पोस्ट की थी कि किसी एक पर आरोप है तो आप पूरे गांव पर मुकदमा नहीं कर सकते।

लेकिन मैं अर्णब का घर देखकर हैरान रह गया। रोज़ 6000 शब्द टाइप करके मैं गाज़ियाबाद के उस फ्लैट में रहता हूं जिसमें कुर्सी लगाने भर के लिए बालकनी नहीं है। अर्णब का घर कितना शानदार है। ईर्ष्या से नहीं कह रहा। मुझे किसी का भी अच्छा घर अच्छा लगता है। एक रोज़ किसी अमीर प्रशंसक ने घर आने की ज़िद कर दी और आते ही बच्चों के सामने कह दिया कि बस यही घर है आपका। हम तो सोचे कि आलीशान फ्लैट होगा। एक मोहतरमा तो रोने लगीं कि मेरा घर ले लीजिए। कोरोना के कारण जब घर से एंकरिंग करने लगा तो मेरे घर में झांकने लगे। उन्हें लगा कि रवीश कुमार शाहरूख़ ख़ान है। जल्दी उन्हें मेरे घर की दीवारों से निरशा हो गई। मैं ठीक ठाक कमाता हूं और किसी चीज़ की कमी नहीं है। मुझे अपना घर बहुत अच्छा लगता है। मेरी तेरह साल पुरानी कार को देखकर कई बार लोगों को लगा कि किसे बुला लिया अपनी महफिल में। वैसे ईश्वर ने सब कुछ दिया है। लोगों ने इतना प्यार दे दिया कि सौ फ्लैट कम पड़ जाएं उसे रखने के लिए। मैं अर्णब के शानदार घर के विजुअल के सामने असंगठित क्षेत्र के एक मज़दूर की तरह सहमा खड़ा रह गया। मैं क्या बोलता, मेरे बोले का कोई मोल है भी या नहीं। एक अदना सा पत्रकार एक चैनल के मालिक के लिए बोले, यह मालिकों का अपमान है। मैं तो बस अर्णब के घर की ख़ूबसूरती में समा गया। कल्पनाओं में खो गया। ड्राईंग रूम की लंबी चौड़ी शीशे की खिड़की के पार नीला समंदर बेहद सुंदर दिख रहा था। अरब सागर की हवाएं खिड़की को कितना थपथपाती होंगी। यहां तो क़ैदी भी कवि हो जाए। मुझे इस बात की खुशी हुई कि अर्णब के दिलो दिमाग़ में जितना भी ज़हर भरा हो घर कैसा हो, कहां हो, कैसे रहा जाए इसका टेस्ट काफी अच्छा है। उसमें सौंदर्य बोध है। बिल्कुल किसी नफ़ीस रईस की तरह जो अपने टी-पॉट की टिकोजी भी मिर्ज़ापुर के कारीगरों से बनवाता हो। मैं यकीन से कह सकता हूं कि अर्णब के अंदर सुंदरता की संभवानाएं बची हुई हैं। लेकिन सोचिए रोज़ समंदर के विशाल ह्रदय का दर्शन करने वाले एंकर का ह्रदय कितना संकुचित और नफ़रतों से भरा है।

अर्णब गोस्वामी जब भी जेल से आएं, अव्वल तो पुलिस उन्हें तुरंत रिहा करे, मैं यही कहूंगा कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने इस सुंदर घर को निहारा करें। इस सुंदर घर का लुत्फ उठाएं। सातों दिन कई कई घंटे एंकरिंग करना श्रम की हर अवधारणा का अश्लील उदाहरण है। अगर इस घर का लुत्फ नहीं उठा सकते तो मुझे मेहमान के रूप में आमंत्रित करें। मैं कुछ दिन वहां रहूंगा। सुबह उनके घर की कॉफी पीऊंगा। वैसे अपने घर में चाय पीता हूं लेकिन जब आप अमीर के घर जाएं तो अपना टेस्ट बदल लें। कुछ दिन कॉफी पर शिफ्ट हो जाएं। और हां एक चीज़ और करना चाहता हूं। उनकी बालकनी में बैठकर अरब सागर से आती हवाओं को सलाम भेजना चाहता हूं और बॉर्डर फिल्म का गाना फुल वॉल्यूम में सुनना चाहता हूं। ऐ जाते हुए लम्हों, ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो….मैं भी चलता हूं… ज़रा उनसे मिलता हूं… जो इक बात दिल में है उनसे कहूं तो चलूं तो चलूं…. और हां पुलिस की हर नाइंसाफी के खिलाफ हूं। चाहें लिखू या न लिखूं।


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वाल्मीकि जयंती के बहाने हिन्दूवाद

लेेखक- (कँवल भारती) उत्तरप्रदेश की भगवा दल वाली योगी सरकार ने हाथरस कांड से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए प्रत्येक जिले में वाल्मीकि-जयंती (31 अक्टूबर) सरकारी स्तर पर मनाने का निर्णय लिया था। राज्य सरकार के मुख्य सचिव आर. के. तिवारी ने मंडल आयुक्तों और जिला अधिकारियों को जो आदेश जारी किया था, उसमें कहा गया था कि महर्षि वाल्मीकि से संबंधित स्थलों व मंदिरों आदि पर अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ दीप प्रज्वलन, दीप-दान और अनवरत आठ, बारह या चौबीस घंटे का वाल्मीकि-रामायण का पाठ तथा भजन आदि का कार्यक्रम भी कराया जाए। निश्चित रूप से यह वाल्मीकियों को लुभाने की ऐसी शातिर चाल है, जो एक तीर से दो निशाने साधती है।

पहला निशाना यह कि जिस आदि कवि वाल्मीकि को सफाई कर्मचारी या मेहतर समुदाय अपना भगवान मानकर पूजता है, (हालाँकि इसे भी आरएसएस द्वारा ही उन पर थोपा गया है) वह योगी सरकार के इस निर्णय से खुश हो जायेगा कि सरकार उनके भगवान को इतना मान दे रही है, जबकि इस सरकार ने वाल्मीकि-जयंती की छुट्टी तक खत्म कर दी। दूसरा निशाना यह है कि इस आयोजन के द्वारा सफाई कर्मचारियों को आरएसएस के हिंदुत्व से जोड़ने का काम किया जायेगा। रामायण के पाठ का मतलब है राम और रावण की कथा का पाठ, अर्थात, यह बताना कि स्वयं विष्णु ने राम के रूप में जन्म लेकर धर्म-विरोधी रावण और अन्य राक्षसों का वध किया था। फिर उन्हें बताया जायेगा कि स्वच्छकार समुदाय धर्म का रक्षक है, समाज का रक्षक है और राष्ट्र का रक्षक है। उन्हें यह नहीं बताया जायेगा कि स्वच्छकार समुदाय को भी डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफ़ेसर बनकर विकास की मुख्य धारा में आना चाहिए, और इसके लिए उन्हें सफाई का गंदा पेशा छोड़कर सुशिक्षित होने की जरूरत है।drAmbedkar-valmikiSamaj योगी जी को भलीभांति मालूम है कि वाल्मीकि समुदाय की शिक्षा में क्या स्थिति है? वे यह भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी के नाम पर सिर्फ नगरपालिकाओं में सफाई कर्मचारी का पद ही उनके लिए है। झाड़ू ही उनकी नियति बना दी गई है। क्या वे इसी नियति के लिए बने हैं? क्या उन्हें उच्च शिक्षित होने का हक नहीं है? भाजपा ने उनके लिए पृथक आरक्षण का प्रावधान तो कर दिया, क्योंकि ऐसा करके उसने सफाई कर्मचारियों को बड़ी चतुराई से उन दलितों से अलग कर दिया, जो आंबेडकरवादी हैं, ताकि वे भी आंबेडकरवादी न बन जाएँ। लेकिन उनकी शिक्षा के विकास की दिशा में भाजपा सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। आखिर क्यों? जब उनके पास शिक्षा ही नहीं होगी, तो क्या पृथक आरक्षण का प्रावधान उन्हें बेवकूफ बनाना नहीं है?

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रामायण का अखंड पाठ और भजन-कार्यक्रम क्या हैं? इनका क्या मतलब है? क्या यह उसी तरह का ‘लटका’ नहीं है, जैसे आज़ादी के बाद के दशकों में ब्राह्मणों ने अपने धर्म की जड़ें मजबूत करने के लिए ‘कीर्तन’ नाम का एक नया लटका निकाला था। मुझे याद है, हमारी बस्ती में भी यह कीर्तन होता था। तब मेरी उमर दस-बारह साल की थी। अशिक्षित बस्ती थी, इसलिए मुझे भी कीर्तन अच्छा लगता था। कल जगदीश के घर में, आज हमारे घर में, तो परसों रामलाल के घर में यह कीर्तन होता था। यह क्यों होता था? इसका निहितार्थ जानने की वह मेरी उमर नहीं थी। पर जब मैंने 1975 में चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की किताब ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ पढ़ी, तो मैं समझा कि ब्राह्मणों ने यह कीर्तन का लटका क्यों निकाला था? अगर दलित वर्गों के एक भी घटक में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध क्रान्ति होती है, तो ब्राह्मणवाद बेचैन हो जाता है और उसका दमन करने के लिए तुरन्त प्रतिक्रांति आरम्भ कर देता है। उस समय ब्राह्मणों को डर था कि कहीं दलित-पिछड़ी जातियों में डॉ. आंबेडकर की क्रान्ति पैदा न हो जाए, इसलिए उन्होंने कीर्तन का लटका निकालकर दलित वर्गों को हिन्दू बनाने का उपक्रम शुरू कर दिया। जिज्ञासु ने लिखा था- ‘सारे देश में कीर्तन की धूम है। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक नगर-नगर, ग्राम-ग्राम, मुहल्ले-मुहल्ले कीर्तन-मंडलियां कायम हैं। घर-घर कीर्तन और अखंड कीर्तन का रिवाज चल पड़ा है। यहाँ तक कि सरकारी रेडियो द्वारा भी कीर्तन सुनाया जाता है। ।।।।और हरे रामा हरे कृष्णा की रट लगवाकर भोलीभाली जनता को ब्राह्मणों के गुड्डे ईश्वरों का अंध-भक्त बनाकर ब्राह्मणशाही धार्मिक साम्राज्य की हिलती हुईं जड़ें मजबूत की जाती हैं।’

हालाँकि, वाल्मीकि समुदाय को हिंदुत्व से जोड़े रखने के लिए आरएसएस पोषित कई संगठन उनके बीच बराबर काम कर रहे हैं। जो आरएसएस की भावना के अनुरूप काम कर रहा है, लेकिन उनके बीच कुछ आंबेडकरवादी संगठन भी काम कर रहे हैं, जो उन्हें सफाई का गंदा पेशा छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे उन्हें यह भी शिक्षा देते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे, जो सामंती कवि थे, उनका मेहतर समाज के साथ कोई भी संबंध नहीं है। वे उन्हें समझाते हैं कि जब तक तुम वाल्मीकि को अपना भगवान मानते रहोगे, तुम्हारा कोई उत्थान नहीं होगा, अत: तुम्हें जितनी जल्दी हो, वाल्मीकि को त्यागकर आंबेडकरवादी बनो। वाल्मीकि तुम्हें शिक्षित होने को नहीं कहते, वे तुम्हें सिर्फ ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले श्रीराम के पदचिन्हों पर चलने को कहते हैं। लेकिन डॉ. आंबेडकर तुम्हें अपने अधिकारों के लिए शिक्षित होने, संघर्ष करने और संगठित होने को कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप मेहतर समुदाय में वाल्मीकि के नाम पर चलाए जा रहे तथाकथित धर्म के विरोध में एक क्रान्ति की धारा भी समानांतर चल रही है। हाथरस-कांड के बाद इस आंबेडकरवादी धारा ने भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध मेहतर समुदाय में जबर्दस्त ध्रुवीकरण किया, जिसने आरएसएस को चौकन्ना कर दिया, और वह तभी से सफाईकर्मी समुदाय को हिन्दूवाद से जोड़े रखने का उपक्रम करने में सक्रिय हो गया। 31 अक्टूबर को मेहतर बस्तियों में सरकारी खर्चे पर वाल्मीकि-जयंती मनाना और रामायण का अखंड पाठ करना उसी उपक्रम के अंतर्गत था।

इसे मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि वाल्मीकि-जयंती पर वाल्मीकि के ग्रन्थ का पाठ होना चाहिए। पर आपत्ति इस बात पर है कि मेहतर बस्तियों में ही रामायण का पाठ क्यों होना चाहिए? यह पाठ उच्च जातियों की हिन्दू बस्तियों में क्यों नहीं हो रहा है? क्या रामायण पाठ की आवश्यकता केवल मेहतर समुदाय को ही है? दलितों में तो और भी बहुत सी जातियां हैं, पर क्या कारण है कि आरएसएस और भाजपा का दलित प्रेम सफाई-कर्मचारियों पर ही प्रकट हो रहा है? क्या इसलिए कि अन्य दलित जातियां वाल्मीकि को भगवान नहीं मानतीं? या इसलिए कि वे सफाई का कार्य नहीं करतीं? जाहिर है कि सवर्ण हिंदुओं को मेहतरों की जरूरत है, शौचालय साफ़ कराने के लिए, सड़कें साफ़ करने के लिए, और नाले और गटर साफ़ कराने के लिए दुनिया में भारत अकेला देश है, जहां गटर की सफाई के लिए सफाई कर्मचारियों से कराई जाती है, जिस तरह वे उनमें घुसकर सफाई करते हैं, वह जान-लेवा है और अब तक कई सौ लोग गटर में घुसकर मर चुके हैं। अन्य देशों में गटर की सफाई मशीनों से होती है, पर भारत में सफाई कर्मियों से इसलिए यह काम कराया जाता है कि मशीन महंगी पड़ती है, जबकि सफाई कर्मी बहुत ही सस्ता मजदूर है, जिसकी मौत की जिम्मेदारी भी सरकार की नहीं होती है। इसलिए उच्च हिंदुओं के लिए बहुत जरूरी है मेहतर समुदाय का अशिक्षित और गरीब बने रहना, क्योंकि शिक्षित होकर वे हिन्दू फोल्ड से बाहर निकल सकते हैं।

हमारे वाल्मीकि समुदाय के लोगों को, खासतौर से शिक्षित लोगों के लिए यह आत्ममंथन करने का समय है। क्या रामायण का पाठ उनकी जरूरत है? क्या रामायण का पाठ सुनने से उनकी सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हल हो जाएँगी? वे कब तक अपनी समस्याओं को नजरंदाज करते रहेंगे? क्या वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सफाई मजदूर बनकर रहना चाहते हैं? अगर नहीं तो आत्मचिंतन करें कि उन्हें अपने बेहतर भविष्य के लिए क्या चाहिए—झाड़ू या शिक्षा?अगर वे अपना और अपनी भावी पीढ़ियों का बेहतर भविष्य बनाना चाहते हैं, तो झाड़ू का त्याग करें, और शिक्षा को अपनाएं। हर स्थिति में अपने बच्चों को पढ़ाएं, उन्हें गंदे पेशे में न डालें। मैं अपने दलित भाइयों से यह भी अपील करूँगा कि वे आरएसएस की शाखाओं में जाना बंद करें। यह आपका हितैषी संगठन नहीं है, बल्कि आपको और आपके भविष्य को बर्बाद करने वाला संगठन है। यह ब्राह्मणों का संगठन है, जो भारत में हिन्दू-राज्य कायम करने के लिए काम कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य वर्ण व्यवस्था पर आधारित ब्राह्मण धर्म को मजबूत करना और अपने विरोधियों का नाश करना है। इसके विरोधी ईसाई और मुसलमान हैं, जिनके खिलाफ यह दलितों में नफरत पैदा करता है। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि आरएसएस मुख्य रूप से दलित-विरोधी संगठन भी है। यह दलितों की शिक्षा, उनके आरक्षण और उनके आर्थिक उत्थान का घोर विरोधी है। वाल्मीकि समाज जब तक आरएसएस के जाल से मुक्त नहीं होगा, तब तक वह अपना स्वतंत्र विकास नहीं कर सकता।


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बुद्ध से कुछ मांगना मत, कुछ नहीं मिलेगा

बुद्ध की मूर्ति के आगे कभी कुछ मांगना मत, कुछ नहीं मिलेगा। ना पूजा करना, ना प्रार्थना। ना हाथ फैलाना, न झोली। कोई दया की भीख मांगे या सुख का आशीर्वाद, कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि बुद्ध पुरुष हमें कुछ देते नहीं हैं। बुद्ध तो मनुष्य के भीतर सोए हुए चित्त को जगाते हैं, जो छिपा हुआ है उसे जागृत करते हैं। मनुष्य को उसकी अपार क्षमता का एहसास कराते हुए सभी को बुद्ध बनने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि हर व्यक्ति बुद्ध बनें और अपनी सुख शांति के लिए किसी के आगे दया की भीख नहीं मांगे। रास्ता लंबा है लेकिन चलना तो हमें ही पड़ेगा।

बुद्ध पुरुष न धन देते हैं न पद, न मान देते हैं न प्रतिष्ठा। इसलिए कभी गौतम बुद्ध की प्रतिमा के आगे प्रार्थना मत करना। उनकी प्रशंसा के मंत्र पढ़कर खुशामदी करने व फुसलाने की कोशिश बेकार जाएगी। धूपबत्ती, माला चढ़ाकर खुश करने या चापलूसी करने की कोशिश करेंगे तो सब व्यर्थ होगा, क्योंकि गौतम बुद्ध अब इस दुनिया में नहीं हैं। तो कोई लाख कोशिश करें कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

अब तो सिर्फ उनका बताया हुआ सत्य का मार्ग हैं, मानव कल्याण का धम्म है। चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग हैं। शील, समाधि और प्रज्ञा का मार्ग है। इसलिए आज कहीं कोई व्यक्ति बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाएं, बुद्ध को गाली देवे तो गुस्सा मत करना, क्योंकि बुद्ध न बुद्ध विहारों में है, न शास्त्रों में है, न मूर्तियों में।

बुद्ध से मिलना हो तो उनके मार्ग पर चलना पड़ेगा। बुद्ध तो व्यक्ति के आचरण में हैं, शीलों के पालन में झलकते है। बुद्ध के दर्शन तो ध्यान साधना द्वारा भीतर झांककर मन को निर्मल करने से होते हैं। बाहर भटकने से कुछ नहीं मिलेगा। हां! यदि ज्ञान, ध्यान और शील, समाधि व प्रज्ञा के मार्ग पर चलते हुए बुद्ध का रास्ता आनंद व सुखमय लगे, मानव कल्याण का लगे तो बुद्ध के प्रति श्रद्धा के साथ वंदन जरूर करना। कृतज्ञता जरूर प्रकट करना, कि हे! गौतम बुद्ध आप इस धरती पर आए और संपूर्ण मानव जगत का कल्याण कर गए।

प्रस्तुति: डॉ. एम. एल. परिहार, जयपुर

मध्यप्रदेश उपचुनाव: कौन बनेगा उपचुनाव का बादशाह

Written By- सम्राट बौद्ध 2018 के मध्यप्रदेश चुनाव के समय और चुनाव के बाद मीडिया ने एक बड़ा भ्रम खड़ा किया कि एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं और वे बीजेपी के खिलाफ वोट करेंगे। इस भ्रम का सबसे ज्यादा असर रहा ग्वालियर चंबल सम्भाग में जहां 2 अप्रैल 2018 को दलितों और सवर्णों के बीच कई जगह खूनी संघर्ष हुए और कई लोग मारे गए। इसी क्रम में नवम्बर 2018 में विधानसभा चुनाव होते हैं और परिणाम के रूप में ग्वालियर चंबल संभाग में बीजेपी लगभग समाप्त हो जाती है। इस बात को कुछ इस तरह समझिए कि इस चुनाव में पीएम मोदी ने ग्वालियर में सभा की जिसमें इस क्षेत्र के 22 प्रत्याशी मंच पर थे उनमें से केवल 1 प्रत्याशी मात्र 3000 वोट के अंतर से जीत हासिल कर पाया। इस परिणाम से मीडिया का फैलाया पहला भ्रम सत्य साबित होता है कि सवर्ण बीजेपी के खिलाफ हैं। इसीलिए बीजेपी इस क्षेत्र से समाप्त हो गई।

 एक और भ्रम मीडिया समानांतर रूप से चला रही थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के चुनाव प्रचार और मेहनत से ग्वालियर चंबल में कांग्रेस का इतना शानदार प्रदर्शन रहा है। कांग्रेस की जीत और कांग्रेस के सिंधिया को दिए जा रहे महत्व से यह भ्रम भी सत्य साबित ही हुआ और सिंधिया के साथ क्षेत्र में कई लोग ये मान बैठे की सिंधिया निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं पर अंत मे कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया और यहां से कांग्रेस के अंदर क्लेश की शुरुआत हुई। अंततः 2020 प्रारंभ होते ही सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस सरकार गिरा देते हैं। इन्ही सब भ्रम का परिणाम है वर्तमान मध्यप्रदेश का 28 सीट पर होने वाला उपचुनाव।

लेकिन जिन 2 भ्रम को मीडिया ने खड़ा किया उसके उलट जमीनी सच्चाई कुछ और थी।

पहला, बीजेपी से सवर्ण नाराज नहीं थे बल्कि 2 अप्रैल के दंगों के बाद जिस तरह प्रशासन का दमन दलितों ने सहा उससे दलित बीजेपी से नाराज जरूर थे इसके 2 प्रमाण हैं। पहला ग्वालियर चंबल के अलावा बाकी मालवा, निमाड़, बघेलखण्ड क्षेत्रों में बीजेपी को हमेशा जैसे वोट मिलते रहे हैं 2018 के चुनाव में भी वैसे ही मिले, बीजेपी मात्र  ग्वालियर चंबल में चुनाव हारी जहां लगभग हर सीट पर दलित 30 से 40% तक हैं।

दूसरा, ग्वालियर चंबल में बसपा बहुत बड़ा फैक्टर है, जहां की लगभग हर सीट पर बसपा पिछले 4 चुनाव में कभी ना कभी जीत चुकी है और 2018 के चुनाव में बसपा का हर सीट पर वोट घटा है जो सीधा कांग्रेस को गया। पिछली बार जहां बसपा की 4 सीट थी जिसमें से 3 ग्वालियर चंबल में ही थी। इस बार बसपा की कुल 2 ही सीट आई जिसमें से एक ही ग्वालियर चंबल से थी। इसका मुख्य कारण था की बसपा के एकदम कट्टर वोटर के मन मे भी यह बात थी कि अगर बसपा को वोट दिया तो बीजेपी जीत जाएगी ऐसे में पहला लक्ष्य बीजेपी को हराना था तो कांग्रेस ही एक मात्र विकल्प थी। इसके प्रमाण के तौर पर ग्वालियर के जिस चौहान प्याऊ पर 3 दलितों की मृत्यु हुई उस सीट (ग्वालियर पूर्व) को कठिन दिख रहे मुकाबले में कांग्रेस ने अप्रत्याशित रूप से 30000 से ज्यादा वोट से जीत लिया। दूसरा, भिंड जिले की जिस मच्छण्ड में 2 दलितों की हत्या हुई वह सीट (लहार विधानसभा) भी 50000 से ज्यादा वोट से कांग्रेस जीती, जबकि पिछले 3 चुनाव से बसपा इस सीट में दूसरे नम्बर पर रहती थी और मामूली अंतर से चुनाव हारती रही है जबकि 2018 के चुनाव में बसपा तीसरे नम्बर पर रही और बसपा प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाया। कमोबेश यही हाल मुरैना, दतिया जिले में भी रहा।

 दलित वोटों के एक मुश्त रूप से कांग्रेस के पास जाने से ग्वालियर चंबल में कांग्रेस का प्रदर्शन आश्चर्यजनक रहा।  चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया इस क्षेत्र में कांग्रेस के एक मात्र सर्वमान्य नेता थे तो इसका श्रेय उन्हें दिया गया। लेकिन यह भ्रम भी इसलिए गलत है कि वही ज्योतिरादित्य सिंधिया 2019 लोकसभा के आम चुनाव में 6 महीने बाद ही अपने परिवार की स्थाई गुना संसदीय सीट पर एक छोटे से बीजेपी के कार्यकर्ता के हाथों 2 लाख के करीब वोट से चुनाव हार गए। दूसरा 2013 के मध्यप्रदेश चुनाव में भी सिंधिया के पास 2018 के चुनाव की तरह कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष का पद था, तो 2013 या 2008 के चुनाव में सिंधिया निष्प्रभावी क्यों थे। यह मनुवादी मीडिया के फैलाये भ्रम थे कि मूल दलितों के बीजेपी के प्रति आक्रोश को मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया और सिंधिया को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया जिसका परिणाम आज के मध्यप्रदेश के उपचुनाव हैं।

अब आते हैं वर्तमान में हो रहे उपचुनाव पर

 कांग्रेस कभी एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभा ही नहीं पाई लेकिन कांग्रेस छोड़ने के बाद 21 अगस्त को पहली बार जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर आये तब एक अलग ही कांग्रेस उभर के सामने आई। वह शहर और क्षेत्र जो 300 से ज्यादा वर्ष से सिंधिया के साथ खड़ा था एकाएक सिंधिया के खिलाफ सड़कों पर उतर आया। पूरे ग्वालियर शहर में अफरा-तफरी का माहौल था। मैंने ग्वालियर में इससे बड़ा जनता का हुजूम पिछले 20 वर्ष में सड़कों पर नहीं देखा। जैसा दिल्ली में बैठे समीक्षक अंदाजा लगा रहे थे कि सिंधिया के जाने से कांग्रेस ग्वालियर चंबल में खत्म हो जाएगी उसके ठीक उलट ऐसा लग रहा था मानो कांग्रेस सिंधिया के जाने से एकदम जीवित हो उठी हो।

कमलनाथ पहली बार सिंधिया के जाने के बाद 18 सितंबर को ग्वालियर आये। पूरे ग्वालियर शहर में छह किलोमीटर से ज्यादा लम्बा जाम लगा था और महल तक गद्दार के नारे गूंज रहे थे। स्थानीय मीडिया ने इसे ग्वालियर शहर में अब तक का किसी नेता का सबसे भव्य स्वागत बताया। पूरे क्षेत्र में कांग्रेस के प्रति जबरदस्त माहौल है और कांग्रेस के लिए सिंधिया का विरोध करना बहुत आसान भी है। मसलन कांग्रेस जो गद्दारी का नारा लगा रही है वह ऐतिहासिक तौर पर कांग्रेस स्थापित कर सकती है।

 दूसरा, सिंधिया जो आरोप आज कांग्रेस पर लगा रहे हैं कि कांग्रेस ने कर्जमाफी की घोषणा को लागू नहीं किया, उसके प्रतिउत्तर में कम से कम 3 से 4 सभाएं तो ऐसी मुझे याद हैं जिनमें सिंधिया ने खुद किसानों को ऋणमाफी पत्र बांटे है। सिंधिया ऐसा कोई नया आरोप आज कांग्रेस पर नहीं लगा रहे जिसका जवाब कांग्रेस में रहते सिंधिया ने खुद ना दिया हो।  2018 के चुनाव में बीजेपी का मुख्य नारा था ‘माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज’, बीजेपी सिंधिया पर भूमाफिया होने का आरोप लगाती थी, उनके सामंतवाद पर, 1857 की क्रांति के प्रसंग पर बीजेपी सिंधिया को घेरती रही है और आज वही शिवराज और महाराज एक साथ हैं। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस बीजेपी के सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस के सिंधिया के भाषण ही चला दे तो कांग्रेस जो उन पर गद्दारी के आरोप लगा रही है वे सच साबित हो जाएंगे। पर कांग्रेस विपक्ष की राजनीति मध्यप्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी नहीं कर पा रही। एक ओर जहां मौजूदा उपचुनाव में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए पूरी 28 सीट जितनी है दूसरी तरफ बीजेपी को मात्र 8, तब भी आप चुनाव प्रचार से दोनों की स्थिति का आंकलन कर सकते हैं। जहां 24 दिनों में शिवराज सिंह जी ने 38 सभाएं की हैं वहीं कमलनाथ जी ने मात्र 19 सभाएं की। यहां शिवराज के साथ सिंधिया ने 25, तो नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 सभाएं की। (ये आंकड़े दिनांक 22 अक्टूबर तक के हैं।)

 कांग्रेस की तरफ से कमलनाथ के अलावा कोई दूसरा बड़ा प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर का नेता सक्रिय नहीं है। राहुल गांधी केरल में हैं और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में। यहां तक कि मुरैना में जहां गुर्जर वोट निर्णायक स्थिति में है, वहां वे सचिन पायलट की भी सभाएं सही से नहीं करा पा रहे हैं। जमीनी स्थिति हर सीट की ऐसी है कि बीजेपी और सिंधिया का जबरदस्त विरोध है। कांग्रेस के प्रति सहानुभूति है, दलित वोट पूरी ताकत से धोखा खाने के बाद भी भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस के साथ खड़ा है। जमीन पर जैसा माहौल है, उसको अगर कांग्रेस सही से उपयोग कर पाती तो ये बहुत बड़ी बात नहीं होती कि कांग्रेस पूरी 28 सीट बड़ी आसानी से जीत सकती है या कांग्रेस अपना हठ छोड़ के बसपा के साथ समझौता करती तो यह चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए मात्र औपचारिकता रह जाती, क्योंकि कम से कम 6 ऐसी सीट हैं इस चुनाव में जहां बसपा प्रत्याशी जीतने की स्थिति में दिख रहे हैं। इनमें मुरैना, जौरा, पोहरी, भांडेर, मेहगांव, डबरा प्रमुख हैं। अगर इन सीट पर बसपा जीतती नहीं है तो कम से कम कांग्रेस को तो हरा ही सकती है। पर कांग्रेस की निष्क्रियता और ठंडा चुनाव प्रचार उनकी हारने के प्रति ज़िद को दर्शाता दिखा। कौन कितने पानी में रहा, यह तो 10 नवंबर को चुनावी नतीजे आने के बाद साफ हो ही जाएगा।


लेखक सम्राट बौद्ध ग्वालियर के रहने वाले हैं। इन दिनों दिल्ली में रहते हैं और सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं।

किसानों के नाम रवीश कुमार का यह पत्र पढ़िए

सुना है आप सभी ने 25 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है. विरोध करना और विरोध के शांतिपूर्ण तरीके का चुनाव करना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है. मेरा काम सरकार के अलावा आपकी ग़लतियां भी बताना है. आपने 25 सितंबर को भारत बंद का दिन ग़लत चुना है. 25 सितंबर के दिन फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण बुलाई गई हैं. उनसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो नशा-सेवन के एक अतिगंभीर मामले में लंबी पूछताछ करेगा. जिन न्यूज़ चैनलों से आपने 2014 के बाद राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक घुट्टी पी है, वही चैनल अब आपको छोड़ कर दीपिका के आने-जाने से लेकर खाने-पीने का कवरेज़ करेंगे. ज़्यादा से ज़्यादा आप उन चैनलों से आग्रह कर सकते हैं कि दीपिका से ही पूछ लें कि क्या वह भारत के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती है या यूरोप के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती है. बस यही एक सवाल है जिसके बहाने 25 सितंबर को किसानों के कवरेज़ की गुज़ाइश बनती है. 25 सितंबर को किसानों से जुड़ी ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ बन सकती है. वर्ना तो नहीं.

रवीश कुमार की यह पूरी चिट्ठी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

ज्यादा मुनाफ़ा दे रहा जैविक खेती का सामूहिक प्रयास

Written By- सूर्यकांत देवांगन (भानुप्रतापपुर, कांकेर, छत्तीसगढ़)

देश में कृषि सुधार विधेयक पर जमकर घमासान मचा हुआ है। सरकार जहां इस विधेयक को ऐतिहासिक और किसानों के हक़ में बता रही है, वहीं विपक्ष इसे किसान विरोधी विधेयक बता कर इसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है। हालांकि संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद यह विधेयक अब राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा चुका है, जिनकी सहमति के बाद विधेयक लागू हो जाएगा। लेकिन इसके बावजूद विपक्ष इसके खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ है। इस संवैधानिक लड़ाई से अलग देश का अन्नदाता अपनी फसल को बेहतर से बेहतर बनाने में लगा हुआ है, ताकि देश में अन्न की कमी न हो। इतना ही नहीं अब किसान अपनी फसल के लिए रासायनिक खादों की जगह सामूहिक रूप से जैविक खेती को अपनाकर न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा रहा है बल्कि लोगों की सेहत को भी बेहतर बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

इसका अनोखा प्रयास छत्तीसगढ़ में कांकेर जिले के दुर्गूकोंदल ब्लाक स्थित गोटूलमुंडा ग्राम में देखने को मिल रहा है। जहां 450 से ज्यादा किसानों ने सामूहिक ऑर्गैनिक (जैविक) खेती को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया है। क्षेत्र में 9 प्रकार के सुगंधित धान चिरईनखी, विष्णुभोग, रामजीरा, बास्ताभोग, जंवाफूल, कारलगाटो, सुंदरवर्णिम, लुचई, दुबराज के अलावा कोदो, कुटकी, रागी और दलहन-तिलहन फसलों का भी उत्पादन किया जा रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और अच्छी गुणवत्ता की फसलों के लिए ग्राम गोटूलमुंडा में वर्ष 2016-17 में कृषि विभाग के सहयोग और किसानों की ‘स्वस्थ्य उगाएंगे और स्वस्थ्य खिलाएंगे’ की सोच के साथ छह गांवों के लगभग 200 किसानों ने ’किसान विकास समिति’ का गठन किया। इसके बाद नए तरीके से क्षेत्र में खेती करने की शुरूआत हुई। आदिवासी बहुल इलाके के इन किसानों की इच्छा शक्ति को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी समिति को हरित क्रांति योजना, कृषक समृ़िद्ध योजना तथा मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना जैसे योजनाओं से जोड़कर प्रशिक्षण के साथ अन्य सुविधाएं पहुंचाई हैं।

प्रारंभ में समिति के सभी किसानों ने आपस में चर्चा करके भूमि की विशिष्टता के आधार पर अपनी-अपनी जमीन पर एक सामान फसल लगाना शुरू किया। जिसके बाद खाद्य निर्माण का कार्य भी समिति के द्वारा ही किसानों ने स्वयं किया। उन्होंने गाय के गोबर, पेड़-पौधों के हरे पत्तों तथा धान के पैरा को जलाने की बजाय उसे एक साथ मिलाकर डिकंपोज (अपघटित) पद्धति से खाद बनाया। इसी तरह कीटों से रक्षा के लिए रासायनिक कीटनाशक के बजाय जैविक कीटनाशक करंज, सीताफल, नीलगिरी, लहसून, मिर्ची जैसे पौधों का प्रयोग किया। इनकी कड़वाहट ने कीटों को फसल से दूर रखा और उसका दुष्प्रभाव पौधों व जमीन पर भी नहीं पड़ा। पानी की समस्या दूर करने के लिए गांव के नाले को पंप से जोड़ा गया तो कहीं-कहीं पर ट्यूबवेल की भी खुदाई करवाई गई। जिससे क्षेत्र में पानी की समस्या भी खत्म हो गई। फसल तैयार होने तक समिति के द्वारा प्रत्येक किसान के खेत में जाकर जांच और समय-समय पर निगरानी की जाती है ताकि किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान समिति स्तर पर किया जा सके। फसल कटने के बाद किसान उत्पादित फसल को समिति में इकठ्ठा करके बाजार में या सरकार को एक साथ बेचते हैं, जिससे मिलने वाली राशि को आपस में बांट लेते हैं। इस तरह से जैविक खेती का यह तरीका सबसे अलग है और इसमें एक दूसरे की सहायता से खेती का सारा काम आसानी से समिति के माध्यम से संपन्न कर लिया जाता है।

गोटूलमुंडा के किसानों का मुख्य उत्पादन सुगंधित धान की 9 किस्म है जिसमें चिरईनखी, विष्णुभोग, रामजीरा, बास्ताभोग, जंवाफूल, कारलगाटो, सुंदरवर्णिम, लुचई, दुबराज शामिल है। लेकिन वर्तमान में कोदो, कुटकी, रागी की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है जो छतीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में उगाए जाने वाला आदिवासियों का मुख्य फसल है। कुछ सालों तक इन्हें ग्रामीणों का आहार माना जाता था लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों और औषधीय गुणों की वजह से अब देश-विदेश से इनकी मांग आ रही है। यही कारण है कि गोटूलमुंडा के ’किसान विकास समिति’ को सरकार की तरफ से 20 मीट्रिक टन कोदो चावल उत्पादन का टारगेट दिया गया है जिसकी सप्लाई विदेशों में की जाएगी। इस संबंध में ’किसान विकास समिति’ के समन्वयक डीके भास्कर ने बताया कि शुरूआत में समिति में 200 किसान जुडे़ थे, लेकिन जैविक खेती के इस प्रयोग से होने वाले फायदे को देखकर वर्ष 2020 में अब तक 456 किसान जुड़कर हमारे साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रासायनिक पदार्थों के उपयोग से पर्यावरण को नुकसान होता है जिसका ख़ामियाज़ा किसान से लेकर मिट्टी तक को भुगतनी पड़ती है और उसके लिए जिम्मेदार भी हम ही हैं। इसलिए हमारी समिति जैविक विधि से खेती कर रही है ताकि इसका फायदा पीढ़ी दर पीढ़ी मिल सके। समिति के अध्यक्ष घंसू राम टेकाम व समिति के अन्य किसान रत्नी बाई, धनीराम पद्दा, अर्जुन टेकाम, शांति बाई, मुकेश टूडो सहित सभी सदस्यों का कहना है कि हम खेती के लिए खाद, कीटनाशक, बीज निर्माण जैसे सभी काम आपस में मिलकर करते हैं, इसलिए खेती में हमारी लागत कम आती है जिसका हमें मुनाफा मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर के कृषि वैज्ञानिक बीरबल साहू का कहना है कि जैविक खेती ही प्राकृतिक खेती है जो प्राचीन समय में की जाती रही थी। जिसकी ओर हमारे किसान पुनः लौट रहे हैं। जैविक खेती को धीरे धीरे फायदे का सौदे के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है जिसमें हमारा उद्देेश्य किसानों को उनके उत्पादन की पहचान व उचित मूल्य दिलाना है। गोटूलमुंडा के किसानों के सुगंधित धान की डिमांड राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा है। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि हम उतना उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। बहरहाल, गोटूलमुंडा के किसानों को प्रति एकड़ धान की जैविक खेती में लागत लगभग 4 हजार रूपए आता है। जिसमें उत्पादन 10 से 12 क्विंटल धान का होता है, तो दूसरी ओर रासायनिक खेती में यही लागत 8 से 9 हजार के बीच है और उत्पादन 17 से 18 क्विंटल का हो रहा है। जबकि रासायनिक पद्धति से मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।

वास्तव में आज रासायनिक खेती की अपेक्षा जैविक उत्पादन की पहचान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है। जिससे किसानों को लाभ तो हो रहा है लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता है। जिससे किसान मायूस होकर फिर से रासायनिक खेती की तरफ लौटने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार को जैविक खेती की विभिन्न योजनाओं के अलावा उचित मूल्य दिलाने की दिशा में विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। (चरखा फीचर)

क्या युवाओं का विरोध भाजपा और मोदी को ले डूबेगा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 70 साल के हो चुके हैं। 17 सितंबर को उन्होंने जीवन के 71वें वर्ष में प्रवेश किया। इस मौके पर भाजपा कार्यकर्ता जब देश भर में उनके जन्मदिन के लड्डू बांट रहे थे, देश का आम युवा इस दिन को बेरोजगारी दिवस के रूप में मना रहा था। पीएम मोदी के जन्मदिन के मौके पर भारत में रात 12 बजे से ही #HappyBdayNaMo, #PrimeMinister #NarendraModiBirthday  सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने लगा। लेकिन दिन चढ़ते ही इसी के साथ दो और हैशटैग ट्विटर पर टॉप ट्रेंड में शामिल हो गया। वह था अंग्रेजी में #NationalUnemploymentDay  और हिन्दी में #राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस।

पंद्रह दिन के भीतर यह लगातार दूसरी बार है, जब पीएम मोदी की देश के युवाओं ने बैंड बजा दी है। इससे पहले मोदी के मन की बात को लाखों युवाओं ने डिसलाइक कर अपना विरोध जताया था। दरअसल पीएम मोदी को लेकर यह गुस्सा युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी और देश के बदतर होते आर्थिक हालात की वजह से है।

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आँकड़ों के अनुसार छह सितंबर वाले सप्ताह में भारत की शहरी बेरोज़गारी दर 8.32 फ़ीसदी के स्तर पर चली गई।

लॉकडाउन और आर्थिक सुस्ती की वजह से बड़ी संख्या में रोजगार ठप्प हो गए। इस दौरान लाखों लोगों की नौकरियां चली गई। सेंटर फ़ॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आकड़ों के मुताबिक़, लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोगों की नौकरी जा चुकी है। CMIE सीएमआईई के आंकलन के मुताबिक़, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां गंवा दी।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के क़रीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ या तो सरकार की उदासीनता या कोविड की वजह से गंवाई हैं। 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है। गुस्से की वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के लिए युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था भी भारी संकट का सामना कर रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार इस साल अप्रैल से जून की तिमाही में देश की जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पिछले 40 वर्षों में यह सबसे भारी गिरावट रही।

आर्थिक सुस्ती और बेरोज़गारी की ऊंची दर के बीच भारतीय युवा सरकार के प्रति अपनी नाराज़गी लगातार ज़ाहिर कर रहे हैं। इस नाराज़गी का असर भारतीय सोशल मीडिया पर साफ़ देखने को मिल रहा है।

छात्रों-युवाओं के गुस्से की वजह बेरोज़गारी के साथ-साथ एसएससी जैसी परीक्षाएँ तय समय पर न होने और नौकरियों के लिए तय समय पर नियुक्ति न होना भी है। बीते सालों में कई विभागों में सरकार ने तमाम विभागों में कई पदों को खत्म कर दिया, जिससे लाखों युवाओं की इन पदों पर नौकरी की उम्मीद खत्म हो गई। सरकार द्वारा निजीकरण के तरह अंबानी-अडाणी को फायदा पहुंचान से भी देश का मध्यम वर्ग काफी नाराज है। नाराजगी का आलम ऐसा था कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में युवाओं ने अपना मुंह काला कर मोदी का विरोध किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की मांग है कि जो वैकेंसी निकाली जाए उनकी परीक्षाएं जल्द हों और उनके परिणाम जल्दी आएं। इसके अलावा कई संस्थानों में बेतहाशा फ़ीस वृद्धि से भी छात्र परेशान हैं और सरकार से गुहार लगा रहे हैं। लेकिन युवाओं की इन मांगों को लेकर सरकार की उदासीनता ने मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं का गुस्सा और बढ़ा दिया है। यही वजह रही कि बीते नौ सितंबर को देश के तमाम राज्यों में युवाओं ने रात नौ बजकर नौ मिनट पर टॉर्च, मोबाइल फ़्लैश और दिए जलाकर सांकेतिक रूप से अपना विरोध ज़ाहिर किया था और रोजगार की मांग की थी।

हालाँकि भाजपा की आईटी सेल इसके पीछे काँग्रेस की साज़िश बता रहे हैं, लेकिन साफ है कि यह किसी राजनैतिक दल का विरोध नहीं, बल्कि आम देश के आम युवाओं का विरोध है, जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ ही संघ और भाजपा की धड़कन बढ़ा दी है। तो क्या नरेन्द्र मोदी की अलटी गिनती शुरू हो गई है? क्या आगामी चुनाव में मोदी और भाजपा की नौका किनारे आने से चूक जाएगी, या फिर सिर्फ राम मंदिर के बूते देश के लोगों को धर्म का अफीम चटा वह फिर से शासन में आने में सफल होगी। सवाल कई हैं, उम्मीद है कि 2024 के पहले इसी साल बिहार और फिर 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में इसका जवाब मिल जाएगा।

सामने आया मोदी सरकार का बहुजन विरोधी चेहरा

कोविड-19 के कारण मोदी सरकार ने बिना देश के लोगों को भरोसे में लिए जिस तरह अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी, देश भर में अफरा-तफरी मच गई। उस दौरान खासतौर पर रोज कमाने खाने वाले मजदूरों पर आफत आ गई थी। लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर बेघर और बिना रोजगार वाली स्थिति में आ गए थे,  कइयों को उनके घर से निकाल दिया गया। दहशत इतनी फैल गई थी कि लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल ही अपने घरों को चल पड़ें। इस दौरान ज्यादा पैदल चलने के कारण, या हार्ट अटैक के कारण या फिर रास्ते में एक्सिडेंट हो जाने जैसी वजहों से सैकड़ों लोगों की जान चली गई। कईयों की दुनिया उजड़ गई तो कई घरों से कमाने वाला बेटा चला गया। लेकिन सरकार ने इन पीड़ितों की कोई सुध नहीं ली।

संसद के मानसून सत्र में सोमवार 14 सितंबर को जब विपक्ष ने यह मुद्दा उठाया तो उस पर केंद्र की मोदी सरकार के मंत्री ने जो बयान दिया, उसने तो गरीबों के जले पर जैसे नमक डालने का काम किया। विपक्ष ने लोकसभा में मंत्रालय से पूछा कि क्या सरकार के पास अपने गृहराज्यों में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों का कोई आंकड़ा है? विपक्ष ने सवाल में यह भी पूछा था कि क्या सरकार को इस बात की जानकारी है कि इस दौरान कई मजदूरों की जान चली गई थी और क्या उनके बारे में सरकार के पास कोई डिटेल है? और क्या ऐसे परिवारों को आर्थिक सहायता या मुआवजा दिया गया है?

इस पर केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने प्रवासी मजदूरों की मौत पर अपने लिखित जवाब में बताया कि ऐसा कोई आंकड़ा मेंटेन नहीं किया गया है। ऐसे में मुआवजे का कोई सवाल नहीं उठता है।’

सरकार के जवाब पर विपक्ष की ओर से खूब आलोचना और हंगामा हुआ।

कांग्रेस नेता दिग्विजिय सिंह ने कहा कि यह हैरानजनक है कि श्रम मंत्रालय कह रहा है कि उसके पास प्रवासी मजदूरों की मौत पर कोई डेटा नहीं है, ऐसे में मुआवजे का कोई सवाल नहीं उठता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि या तो हम सब अंधे हैं या फिर सरकार को लगता है कि वो सबका फायदा उठा सकती है।’

तो वहीं कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी ने भी सरकार के इस बयान पर हमला बोला है। इस मुद्दे पर ट्वीट कर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा। उन्होंने लिखा-

‘मोदी सरकार नहीं जानती कि लॉकडाउन में कितने प्रवासी मज़दूर मरे और कितनी नौकरियां गईं। तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई? हां मगर दुख है सरकार पे असर ना हुई, उनका मरना देखा ज़माने ने, एक मोदी सरकार है जिसे खबर ना हुई।’

दरअसल लॉकडाउन के दौरान 1 करोड़ से ज्यादा प्रवासी मजदूर देशभर के विभिन्न हिस्सों से अपने गृह राज्य पहुंचे। ऐसे में सवाल है कि सबका साथ – सबका विकास का दावा करने वाली भाजपा की केंद्र सरकार के पास ऐसे पीड़ित मजदूरों का आंकड़ा नहीं होना क्या देश के गरीबों के साथ सरकार का धोखा नहीं है। क्या प्रधानमंत्री मोदी देश के गरीबों, बहुजनों को धोखा नहीं दे रहे हैं?

कर्पूरी ठाकुर के शागिर्द रघुवंश प्रसाद सिंह का निधन, ऐसा था व्यक्तित्व

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बिहार की राजनीति में बड़ा कद रखने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। रघुवंश प्रसाद सिंह के नाम का नाम हाल में राजद से इस्तीफा देने के कारण सुर्खियों में रहा। उन्होंने दिल्ली में एम्स के बिस्तर से चिट्ठी लिखकर अपना इस्तीफ़ा भेजा लेकिन लालू यादव ने उसे ख़ारिज करते हुए लिखा कि आप कहीं नहीं जा रहे। लेकिन रघुवंश जी ने लालू यादव की बात नहीं मानी। वह दुनिया छोड़ गए। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें याद करते हुए ट्विट किया है- ‘प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया? मैनें परसों ही आपसे कहा था आप कहीं नहीं जा रहे है. लेकिन आप इतनी दूर चले गए. नि:शब्द हूं. दुःखी हूं. बहुत याद आएंगे.’ रघुवंश बाबू बाहरी आवरण में एक गंवई नेता थे। लेकिन असल में वह एक विद्वान और सच्चे जन प्रतिनिधि थे। लालू यादव के पहले रघुवंश सिंह कर्पूरी ठाकुर के पीछे खड़े रहे। इसका जिक्र उन्होंने खुद अपने इस्तीफे में किया था। रघुवंश प्रसाद सिंह को बेहतर तरीके से बताने वाला यह लेख पढ़िए। 

भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही थी। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।

यह एक तथ्य है कि आखिरकार, हमारे पुलिस अधिकारी और कांस्टेबल समाज से आते हैं, और इसलिए पुलिस संगठन हमारे समाज की एक सच्ची प्रतिकृति हैं। यह सर्वविदित है कि हमारा समाज जाति, धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित है। इसलिए, जब व्यक्ति पुलिस बल में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने सभी पूर्वाग्रहों और द्वेष को अपने साथ ले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति जब सत्ता में आते हैं तो ये पक्षपात और मजबूत हो जाता है।

उनकी व्यक्तिगत पसंद और नापसंद, जातिगत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह उनके कार्यों को बहुत दृढ़ता से प्रभावित करते हैं। इन पूर्वाग्रहों को अक्सर उनके व्यवहार और कार्यों में उन स्थितियों में प्रदर्शित किया जाता है जहां अन्य जातियों या समुदायों के लोग शामिल होते हैं।

 1976 में जब मैं सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी), गोरखपुर के पद पर था, तब पुलिस में जातिगत भेदभाव की स्थिति मेरे सामने आई। बतौर एएसपी, मैं रिजर्व पुलिस लाइंस का प्रभारी था। एक मंगलवार, जो कि परेड दिवस था,  पुलिस मेस के निरिक्षण के दौरान मैंने पाया कि कुछ पुलिसवाले सीमेंटेड टेबल और बेंच पर भोजन कर रहे थे, जबकि कुछ भोजन करते समय जमीन पर बैठे थे। यह मुझे बहुत अजीब लगा। मैंने एक हेड कांस्टेबल को बुलाया और इस स्थिति के बारे में पूछताछ की। उसने मुझे बताया कि जो लोग बेंच पर बैठे हैं वे उच्च जाति के हैं और जो लोग जमीन पर बैठे हैं वे निम्न जाति के हैं।

पुलिस लाइन्स में जातिगत भेदभाव के इस ज़बरदस्त प्रदर्शन को देखकर मैं हैरान रह गया, और मैंने इस भेदभावपूर्ण प्रथा को समाप्त करने का फैसला किया। उस समय से, जब भी मैंने इसे देखा  तो मैंने पुलिसकर्मियों को जमीन पर बैठने के लिए डांटा और और उन्हें बेंचों पर बैठने के लिए कहा। हालाँकि मुझे अपने निर्देशों को एक से अधिक बार दोहराना पड़ा, लेकिन मैं अंततः अलग-अलग भोजन के भेदभावपूर्ण व्यवहार को बंद करने में सफल रहा।

संयोग से, उसी अवधि में, मुझे अपने बॉस द्वारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एससी और एसटी) के लिए आयुक्त द्वारा की गई टिप्पणियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया, जिन्होंने 1974 की एक रिपोर्ट में पुलिस मैसों में दलित वर्ग के लोगों को अलग बैठाने की जातिगत भेदभाव वाली प्रथा का उल्लेख किया था जोकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पुलिस लाइंस में व्याप्त था।

मैंने अपने बॉस को बताया कि यह सच था और मैंने इस प्रथा को हाल ही में समाप्त किया है। उन्होंने मुझसे कहा कि आप केवल यह उल्लेख कर दीजिये कि यह “अब प्रचलित नहीं है”। मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश  के अन्य जिलों के बारे में पता नहीं है लेकिन गोरखपुर में मैंने उस समय पुलिस के बीच जाति-आधारित अलगाव का अंत सुनिश्चित कर दिया था।

हालांकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयुक्त ने दशकों पहले इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को इंगित किया था, लेकिन यह चौंकाने वाला तथ्य है कि यह आज भी जारी है। कुछ समय पहले यह बताया गया था कि बिहार में अभी भी अलग-थलग खाने की प्रथा जारी है और बिहार पुलिस में उच्च और निम्न जाति के लोगों के लिए अलग-अलग बैरक हैं। दरअसल, पुलिस बल में,  इसकी संरचना के कारण,  उच्च-जाति के लोगों का वर्चस्व है और इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार बेरोकटोक जारी हैं।

यह केवल आरक्षण नीति के कारण है कि  निचली ’जातियों के कुछ व्यक्तियों, विशेष रूप से एससी और एसटी, को पुलिस बल में जगह मिली है। इसने बलों को अधिक धर्मनिरपेक्ष और प्रतिनिधि बना दिया है। हालांकि, अल्पसंख्यकों का अभी भी बहुत कम प्रतिनिधित्व है। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों में जाति, सांप्रदायिक और लैंगिक पक्षपात अभी भी काफी मजबूत हैं।

जैसा कि हम जानते हैं कि, यूपी में प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) के खिलाफ सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की लगातार शिकायतें मिलती रही हैं। मैंने इन शिकायतों में सचाई पाई थी जब मैं 1979 में 34 बटालियन पीएसी, वाराणसी के कमांडेंट के पद पर तैनात था। मुझे अपने लोगों को जाति एवं धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े थे. मैंने उन्हें हमेशा जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से ऊपर रहने की बात कही थी। मैं उनसे कहता था, “धर्म आपका निजी मामला है। जब आप अपनी वर्दी पहन लेते हैं, तो आप केवल पुलिसकर्मी होते हैं और कानून के अनुसार काम करने के लिए बाध्य होते हैं।”

मेरे निरंतर ब्रीफिंग और डीब्रीफिंग का उन पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा था, और मैं अपने कर्मचारियों को बहुत हद तक जाति एवं धर्म निरपेक्ष बनाने में सफल रहा था।

इस की परीक्षा 1991 में वाराणसी में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान हुयी। 1991 के आम चुनाव में, एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, श्री चंद दीक्षित, वाराणसी शहर से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। हमेशा की तरह, विहिप ने मुसलमानों को मतदान से दूर रखने के लिए एक सांप्रदायिक दंगा किया था। परिणामस्वरूप, कर्फ्यू लगा दिया गया।

अगले दिन समाचार पत्रों में समाचार दिखाई दिया कि पीएसी के लोगों ने मुस्लिम इलाके में लोगों को लूटने और पीटने का काम किया था। मैंने तुरंत जांच शुरू कर दी। अपनी जांच में मैंने पाया कि ये लोग पीएसी के नहीं थे बल्कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के थे, जिन्होंने मुस्लिम इलाके में लूटपाट, संपत्ति को नष्ट करने और बूढ़े पुरुषों और महिलाओं की बुरी तरह से पिटाई की थी। इससे पता चलता है कि सांप्रदायिक पूर्वाग्रह न केवल पीएसी में, बल्कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के बीच भी मौजूद थे। उन इलाकों से कोई शिकायत नहीं मिली जहां मेरी बटालियन के आदमी तैनात थे।

मैंने देखा है कि पुलिस के निचले रैंक का व्यवहार मुख्य रूप से उच्च रैंकिंग अधिकारियों के व्यवहार और दृष्टिकोण से प्रभावित रहता है। यदि उच्च श्रेणी के अधिकारियों में जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हैं, तो उनके अधीन कर्मचारियों के बीच में भी इसके समान रूप से होने की संभावना है। मैंने पुलिस सेवा के दौरान कई शीर्ष रैंकिंग पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अपनी जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित करते हुए देखा है।

सच्चाई यह है कि कई आईपीएस अधिकारी उच्चकोटि का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भी  निम्न ’जातियों और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं दिखाते हैं।

किसी के रवैये को बदलना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि इसमें खुद को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के लिए बहुत प्रयास करने की आवश्यकता होती है। सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को अक्सर तथाकथित  आतंकवाद के मामलों में स्पष्ट तौर से देखा जा सकता  है, जहां मुसलमानों को फर्जी तौर पर फंसाने की शिकायतें अक्सर होती रहती हैं जो वर्षों जेल में रहने के बाद उनके निर्दोष पाए जाने से सही पाई जाती हैं.

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, उच्च रैंकिंग अधिकारियों का अच्छा रोल मॉडल, निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के दृष्टिकोण और व्यवहार को बदलने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संबंध में मेरे प्रयासों को 1992 में एक बार फिर से परखने का मौका आया था जब राम मंदिर आंदोलन पूरे जोरों पर था।

एक दिन, बजरंग दल के लोगों ने वाराणसी शहर में राम मंदिर आन्दोलन के पक्ष में प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। उनका इरादा वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के परिसर में इकठ्ठा हो कर शहर में जुलुस निकलने का था। जिला प्रशासन ने इसे रोकने के लिए उनके मंदिर के गेट से बाहर आते ही उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी। उन्होंने आंदोलनकारियों को घेरने के लिए पीएसी के जवान लगा दिए थे और उन्हें बसों में भर कर ले जाना था।

सिटी एसपी और सिटी मजिस्ट्रेट मौके पर थे। जब आंदोलनकारी गेट से बाहर आए, तो ड्यूटी पर मौजूद अधिकारियों ने पीएसी के जवानों को उन्हें घेरकर बसों में बिठाने का आदेश दिया। लेकिन उनको जोरदार झटका लगा, जब पीएसी के लोग बिल्कुल नहीं हिले और आंदोलनकारी शहर की ओर बढ़ने लगे। इस पर पीएसी के दूसरे लोगों को सिटी कंट्रोल रूम से घटनास्थल पर ले जाना पड़ा। वहां पहुंचते ही उन्होंने आंदोलनकारियों को घेर लिया और बसों में डाल दिया। इस प्रकार, इन पीएसी वालों की त्वरित कार्रवाई के कारण शहर में संभावित गड़बड़ी से बचा जा सका।

 मुझे यह जानकर खुशी हुई कि पीएसी का यह बाद वाला समूह मेरी बटालियन का था। अन्य पीएसी के जिन लोगों ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था, वे दूसरी बटालियन के थे, जो अनुशासनहीनता के लिए कुख्यात थी। मेरे लोगों द्वारा इस त्वरित कार्रवाई की जिला प्रशासन द्वारा सराहना की गई और पहले वाले पीएसी के जवानों को ड्यूटी से हटा दिया गया। साफ था कि एक वर्दीधारी बल में नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है।

जैसा कि बीड़ (महाराष्ट्र) की आईपीएस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके के वीडियो से देखा जा सकता है कि यदि ऐसे अधिकारियों को अधिकार प्राप्त पद पर रखा जाता है तो उनके पक्षपातपूर्ण रूप से कार्य करने की अधिक संभावना रहती है। अतः ऐसे अधिकारियों पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। उन्हें ऐसे कर्तव्यों पर नहीं रखा जाना चाहिए जहां वे अपने पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित कर सकें।

अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की भर्ती करके पुलिस बल की संरचना को बदलना आवश्यक है ताकि इसे प्रतिनिधि और धर्मनिरपेक्ष बनाया जा सके। एससी / एसटी, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मुद्दों के बारे में उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए


लेखक एस.आर. दारापुरी एक पूर्व आईपीएस अधिकारी और आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

दयानाथ निगमः जिनका झोला ही उनके कार्यालय का पता था

– लेखक- आशाराम जागरथ

‘अम्बेडकर इन इंडिया’ के सम्पादक दयानाथ निगम अब हमारे बीच नहीं हैं। बाईपास सर्जरी करवा चुके निगम जी डायबटीज के भी मरीज थे। पिछले दिनों उनकी तबियत खराब हुई तो परिजनों ने लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भरती कराने का प्रयास किया जहाँ उनका रैपिड टेस्ट हुआ और वे कोरोना पॉजिटिव पाए गये। कहा जाता है कि मौजूद स्वास्थ्य व्यवस्था में उन्हें जगह नहीं मिल पाई और वे 04 सितम्बर, 2020 की शाम को निर्वाण को प्राप्त हो गये।

 तथागत गौतम बुद्ध की निर्वाण भूमि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर (तमकुही राज) में 10 फरवरी, 1950 को जन्मे दयानाथ निगम जी की स्कूली शिक्षा केवल मीडिल क्लास तक थी। लेकिन कम शिक्षा उनके मिशन में कोई अवरोध नहीं बन पाई। वे शोषितों-वंचितों, दलितों-पिछड़ों की आवाज बने। उन्होंने पत्रिकारिता के क्षेत्र को चुना और दलित पत्रकारिता में एक मुकाम हासिल किया। 1968 में अर्जक संघ की स्थापना की बाद निगम जी राम स्वरूप वर्मा के संपर्क में आये और उनके निकट सहयोगी बने। इसके बाद ही वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। वे अर्जक संघ के साप्ताहिक मुखपत्र में नियमित लिखते रहे। 1980 में ‘चेतना’ नाम से और 1981 में ‘क्रांति’ के नाम से निगम जी ने दस्तावेजी स्मारिकाएं निकालीं। पत्रकारिता के प्रति अपने प्रतिबद्ध सरोकारों और उसूलों के कारण वे हमेशा बेचैन रहते थे और इसी बेचैनी के तहत अंततः 14 अप्रैल 1999 ‘अम्बेडकर इन इंडिया’ मासिक पत्रिका शुरू की जो अम्बेडकरवादी मिशन की प्रमुख आवाज बनी जो बिना सरकारी विज्ञापनों के अनवरत प्रकाशित हो रही है। निगम जी ने अपने सम्पादनकाल में उसके कई विशेषांक निकाले जिनमें मुद्राराक्षस के सम्पादन में एक विशेषांक ‘ये तुम्हारा इतिहास, ये हमारा इतिहास’ काफी चर्चित रहा।

निगम जी ने कुछ दिनों तक गोरखपुर से प्रकाशित एक दैनिक में भी सांस्कृतिक गतिविधियों के संवाददाता के रूप में  काम किया। बताते चलें कि निगम जी रंगमंच के कलाकार भी थे। अर्जक संघ द्वारा आयोजित नाटकों में वे रोल अदा किया करते थे। वह एक अखबार से जुड़े थे। एक बार वह उस अखबार के सम्पादक जो एक ब्राहमण थे, के घर पर बैठे थे। संम्पादक जी हिन्दू धर्म में व्याप्त छूतछात पर ज्ञान बाँट रहे थे। पीने के लिये चाय आई। एक कांच के गिलास में, दूसरा पीतल के गिलास में। निगम जी ने जाने-अनजाने में पीतल का गिलास उठा लिया और चाय पीने लगे। सम्पादक जी के प्रवचन का स्वर बदल गया। निगम जी ने उनसे भी चाय पीने को कहा परन्तु सम्पादक महोदय ने कांच के गिलास को छुआ भी नहीं। निगम जी द्वारा चाय पीने के लिए बार-बार आग्रह करने पर सम्पादक महोदय झल्ला गये और बोले, “तुमने हमारा वाला गिलास जूठा कर दिया। अब ये गिलास मेरे किसी काम का नहीं। तुम इस गिलास को लेते जाओ।” बताते हैं कि निगम जी पीतल का गिलास तो ले आये, लेकिन संवाददाता की नौकरी वहीं छोड़ आये।

  ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका के पूर्व सम्पादक सुरेश उजाला उन्हें याद करते हुये कहते हैं कि हम दोनों को राम स्वरूप वर्मा का सानिध्य प्राप्त था। निगम जी लखनऊ के अर्जक कार्यालय में झोला टाँगे आते थे और अपने मिलनसार प्रवृत्ति तथा मृदुल स्वभाव के कारण सभी के चहेते थे। बचपन से ही समाज सेवा उनका लक्ष्य था। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नकले तो अपने तरुणाई में आरएसएस की शाखा में पहुँच गये। परन्तु रामस्वरूप वर्मा के प्रभाव में उन्होंने जान लिया कि दलित-वंचित और पिछड़े समाज के लिये आरएसएस के झोले में कुछ भी नहीं है। अत: उन्होंने अर्जक संघ का झोला टांग लिया। बाद में वे अर्जक संघ से विलग जरूर हुये किन्तु झोला अंत तक टंगा ही रहा। लोग जब उनसे पूछते थे कि अम्बेडकर इन इंडिया का कार्यालय कहाँ है तो उनका जवाब होता कि यही झोला ही पत्रिका का कार्यालय है।

 हमारी रचना, काव्य ग्रामगाथा ‘पाहीमाफी’ में अवधी समाज की प्रतिविम्बित विसंगतियों में दयानाथ निगम जी भोगा हुआ यथार्थ भी सम्मिलित है। नीचे दी गई अवधी कवितई की कथा तो रूपांतरित है किन्तु कथा का मूल पाठ गड्ढे में परोसा भोजन है जो निगम जी के बचपन का वो सच था जिसने उन्हें समाज से भेदभाव समाप्त करने के लिए उद्देलित किया- कसि कै दाँते काटी रोटी, दुई छूत – अछूत रहे साथी हे नीम ! छाँह मा तोहरे हम, खीसा सच बइठ सुने बाटी

 ‘मितऊ’ कै बैल तुराइ गवा, ‘छुतऊ’ साथे हेरै निकरे हेरत – हेरत संझा होइगै, घर लौटे बैल दुवौ पकरे ‘मितऊ’ बोले कि रुकि जात्या, कहवाँ जाब्या यहि राती मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा

 राती जब खाना खाय क् भवा, यक बड़ा अड़ंगा बाझि गवा टुटहा ज़स्ता वाला बरतन, पिछवारे कहूँ लुकाय गवा घर-मलकिन बोलीं काव करी, बनये हम हई दाल–रोटी उप्पर से दलियौ पातर बा, केरा कै पाता ना रोकी

हम कहत रहेन कि जाइ दियौ, तोहरे सब रोकि लिह्यौ वोकां यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा चुप रहौ कतौ ना करौ फ़िकर, अब्बै जुगाड़ कुछ करिबै हम बोले बुढ़ऊ बाबा अहीर, बुद्धी मा अबहूँ बा दमख़म

 फँड़ियाय कै धोती खटिया से, उतरे लइकै लमका खुरपा तनिका वहरी से पकरि लियौ, घुसकाइब ई छोटका तख्ता खोदिन यक बित्ता गड़हा वै, मड़हा के कोने भूईं मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा 

केरा कै पाता दोहरियाय, गड़हा मा हौले से दबाय तइयार अजूबा भै बरतन, बोले अब मजे से लियौ खाय वै रहे भुखान सवेरवैं कै, भुन भुनभुनाय मन्ने बोलिन इज्ज़त-बेलज्ज़त भूलि गये, मूड़ी नवाय बस खाय लिहिन 

‘मितऊ’ बोले बहिरे निकरा , ल्या पानी पिया अँजूरी मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा भिनसारे उठिकै लगे चलै, भैं’सिया खड़ी अफनात रही पितरी के बड़े ‘पराते’ मा, बसियान खाब ऊ खात रही

फिरु नज़र परी दालानी मा, वै आँख फारि कै देखअ थैं कानी कुतिया मल्लही येक, थरिया कै बारी चाटअ थै ना दुआ-बंदगी केहू से, चुपचाप चलि गये चुप्पे मा यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह, बचा बा पाहीमाफी मा

 निगम जी शोषित समाज दल तथा दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा) से विधानसभा का चुनाव भी लड़े लेकिन हार गये थे। बहुजन समाज पार्टी से भी उनका जुड़ाव रहा, परन्तु पत्रिका वे अपने मित्रों-सहयोगियों के सहारे ही निकालते थे। उनका कहना था कि साधारण इच्छुक लोग पत्रिका खरीदते भी हैं और पढ़ते भी हैं परन्तु साधन संपन्न लोग न पत्रिका खरीदते हैं और न पढ़ते हैं, हाँ, कुछ लोग सहयोग अवश्य कर देते हैं।

बेरोजगारी के खिलाफ देश भर में उठती आवाजें और मोदी पर हल्ला बोल

बेरोजगारी के खिलाफ देश भर में उठती आवाजें और मोदी पर हल्ला बोलबेरोज़गारी को लेकर पूरे देश में कई हलक़ों से आवाज़ें उठती रही हैं। बुधवार यानी 9 सितंबर को इसे लेकर रात 9 बजे 9 मिनट कैंपेन चलाया गया। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों में लाखों युवाओं ने अपने घरों में अंधेरा कर और मोमबत्ती जलाकर मोदी सरकार का विरोध किया। ये युवा ऐसा कर बेरोजगारी के खिलाफ मोदी सरकार का विरोध कर रहे थे। युवाओं का गुस्सा इस बात को लेकर था कि हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा कर मोदी सरकार मुकर गई है।

बेरोजगारी के खिलाफ इस आंदोलन को कई विपक्षी दलों का भी समर्थन मिला। महत्वपूर्ण बात यह रही कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्विटर पर #9बजे9मिनट टॉप ट्रेंड में रहा। देश भर के लाखों युवाओं और कई विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे लेकर ट्वीट करना शुरू कर दिया। यह हैशटैग कंगना रनौत को पीछे छोड़ते हुए टॉप ट्रेंड पर जा पहुँचा। बुधवार रात 11 बजे तक इस हैशटैग के साथ 10 लाख से ज़्यादा ट्विट किए जा चुके थे। सोशल मीडिया पर लोग तस्वीरों और पोस्ट के साथ इस हैशटैग का इस्तेमाल कर रहे थे। हजारों सोशल मीडिया यूजर ने अपने हाथों में मोमबत्ती लेकर तस्वीरें भी शेयर की।

सपा नेता अखिलेश यादव और राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी मोमबत्ती जलाकर युवाओं का साथ दिया। बिहार में तेजस्वी यादव ने अपनी मां और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के साथ इसको समर्थन किया तो यूपी में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्नी डिंपल यादव के साथ मोमबत्ती जलाई और युवाओं का समर्थन किया। अखिलेश यादव ने इसकी तस्वीर साझा करते हुए ट्विट किया।

आज आनेवाले कल के बदलाव का इतिहास लिख दिया सियासत के आसमान पर रोशनी से इंक़लाब लिख दिया।

आज युवाओं ने भाजपा के शासनकाल की उल्टी गिनती की शुरूआत कर दी है। हमने नौजवानों की ख़ातिर मोमबत्तियाँ जलाकर हमेशा की तरह आज भी उनका साथ दिया है और देते रहेंगे।

तो वहीं बेरोजगारी के विरोध में प्रदर्शन करते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और राबड़ी देवी ने लालटेन जलाई। RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “सबसे ज्यादा युवाओं की आबादी बिहार में है लेकिन हकीकत में बिहार बेरोजगारी का केंद्र बन चुका है।”

खास बात यह रही कि देश के तमाम हिस्सों से युवाओं ने रोजगार की मांग को लेकर अपनी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इसे देखते हुए साफ है कि बेरोजगारी को लेकर देश का युवा वर्ग पीएम मोदी की गोल-मोल बातों में अब और आने वाला नहीं है। युवाओं के गुस्से को देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में भाजपा सरकार के खिलाफ यह आंदोलन और बड़ा हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में पिछले कुछ सालों के दौरान 21 मिलियन नौकरियां गई हैं। बिहार में तो राजद ने बेरोजगारी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है।