दलित कार्यकर्ता नौदीप कौर की हिरासत की दुनिया भर में निंदा

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 अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी मीनाक्षी एशले हैरिस ने अपने ट्वीट्स के माध्यम से भारत की दलित मजदूर कार्यकर्ता पर हिरासत में हुए अत्याचारों का मुद्दा उठाया है। मीनाक्षी हैरिस खुद एक वकील और लेखिका हैं जिनकी सोशल मीडिया पर बड़ी पहचान है। भारतीय किसान आंदोलन के पक्ष में ट्वीट करने के बाद बीजेपी की विचारधारा के लोगों ने उनकी तस्वीरे जलाकर प्रदर्शन किया था। इसके जवाब में मीनाक्षी ने लिखा कि सोचिए अगर मैं भारत में होती तो ये लोग मेरे साथ क्या करते? गौरतलब है कि नौदीप कौर एक दलित युवती है जो मजदूरों के अधिकारों के लिए “मजदूर अधिकार संगठन” के माध्यम से काम कर रही हैं। पंजाब के मुख्तसर की नौदीप ने पिछले महीने सिंघू बॉर्डर पर उन्होंने किसान आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन किया था जिस कारण उन्हे पुलिस ने 12 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया था। नौदीप की बड़ी बहन राजवीर कौर ने अपनी छोटी बहन की हिरासत के दौरान पुलिस द्वारा उस पर हिंसा और यौन शोषण का आरोप लगाया है।

दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार नागरिक द्वारा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र सुदे मुद्दे उठाना एक सुखद अनुभव है। माना जा रहा है कि अमेरिका की नई डेमोक्रेट सरकार भारत में कमजोर होते लोकतंत्र को लेकर खासी चिंतित है। मीनाक्षी हैरिस द्वारा इस प्रकार से किसान आंदोलन एवं दलित महिला कार्यकर्ता के पक्ष में ट्वीट करने पर भारत के दरबारी मीडिया और बीजेपी समर्थक नेताओं की तरफ से भद्दे कमेंट्स की बाढ़ या गयी है। इस प्रकार ये मुद्दे अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के चर्चा के केंद्र में आने लगे हैं। अपनी आक्रामक दुष्प्रचार की रणनीति पर चलते हुए बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं ने अमेरिकी सिलेब्रिटीज के ट्वीट्स पर अनावश्यक प्रतिक्रिया देकर इन मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय बना दिया है।

हरामी व्यवस्थाः मध्यप्रदेश के मंदसौर में दलित की बारात रोकी

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 मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के एक गाँव से दलित उत्पीड़न की खबर है। जिले में दलितों की बरात रोकने के मामले लगातार आ रहे हैं और शासन-प्रशासन इन मामलों पर लगाम लगाने में बेअसर साबित हो रहा है। सवर्ण समाज के जातिवादी गुंडों द्वारा दलितों की बरात रोकने सहित दलितों के परिवारों के अपमान करने और उन्हें डराने धमकाने की खबरें भी लगातार आ रही हैं। गौरतलब है कि हालिया मामले के पहले भी दो ऐसे ही मामलों में पुलिस की मदद से दलितों की बारात निकाली गयी थी।

इन दो मामलों के बाद ठीक ऐसा ही एक मामला मंदसौर के शामगढ़ थाना क्षेत्र के गुराडिया माता स्थान पर देखा गया है।शनिवार छह फरवरी की रात इस स्थान पर एक दलित समाज के युवक दीपक की बरात निकल रही थी। इसी दौरान रात साढ़े आठ बजे इस बारात को जातिवादी गुंडों ने बारात रोककर दलित परिवार के साथ मारपीट और अभद्रता की। दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया गया। पीड़ित दलित परिवार ने इन जातिवादियों के खिलाफ शामगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। हालांकि साकारात्मक बात यह रही कि शिकायत के आधार पर शामगढ़ पुलिस ने आठ नामजद आरोपियों के खिलाफ रविवार सात फरवरी को एफआईआर दर्ज की है। लेकिन पुलिस के सामने पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने की भी चुनौती है।

बीते कुछ दशकों में न केवल दलितों के खिलाफ जातीय उत्पीडन के मामले बढ़े हैं, बल्कि हालिया अनुभव बता रहा है कि शासन प्रशासन में दलितों बहुजनों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है। उत्पीड़न के मामले में फौरी राहत और न्याय नहीं मिल पाने या इसमें दिक्कत आने के कारण स्थानीय पुलिस, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग या फिर न्यायालय ही क्यों न हो, दलित-बहुजनों का इन संस्थाओं में विश्वास घटा जा रहा है। यह भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक बात है।

गौरतलब है कि यह विधानसभा क्षेत्र कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह डंग का है जो स्वयं सिख अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसके बावजूद उनके अपने इलाके में हाल ही में यहाँ इस तरह का यह दूसरा मामला आया है।

लालू यादव की तबीयत बिगड़ी, पूरा परिवार दिल्ली में मौजूद

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 रांची रिम्स से दिल्ली एम्स आने के बावजूद राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव की तबीयत में बहुत सुधार नहीं दिख रहा है। लालू प्रसाद पहले से हार्ट और किडनी की बीमारी से ग्रस्त हैं। निमोनिया होने के बाद उनकी स्थिति ज्यादा बिगड़ गई थी। उन्हें रांची से दिल्ली AIIMS रेफर किया गया था। जानकारी के अनुसार लालू प्रसाद की अभी स्थिति यह है कि निमोनिया की दवा तो चल रही है लेकिन जिस तेजी से सुधार की उम्मीद डॉक्टरों को है उस तेजी से सुधार नहीं हो पा रहा है। दवाओं का असर कम हो रहा है। इससे पूरे परिवार कि चिंता बढ़ी हुई है। फिलहाल तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव, राबड़ी देवी और मीसा भारती दिल्ली में ही मौजूद हैं।

 बिहार विधानसभा में रविवार को आयोजित शताब्दी समारोह में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को भी शामिल होना था। उम्मीद थी कि वे 7 फरवरी को दिल्ली से पटना लौट आएंगे। लेकिन लौटने का कार्यक्रम दो दिनों के लिए बढ़ा दिया गया। दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की तबीयत अभी ऐसी नहीं है कि उन्हें छोड़कर आया जा सके। बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने लालू प्रसाद यादव को रिहा करने के लिए आजादी पत्र लिखने का अभियान पटना में शुरू किया था। आगे लिखे गए पत्रों को राष्ट्रपति को भेजने के लिए वे आने वाले थे लेकिन पिता की खराब तबीयत की वजह से वे भी पटना नहीं आ पा रहे हैं।

राकेश टिकैत की किसान महापंचायत में पांच प्रस्तावित पारित, सरकार की मुश्किलें बढ़ी

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 कृषि बिल के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार जोर पकड़ता जा रहा है। जगह-जगह किसान महापंचायत कर किसानों को एकजुट किया जा रहा है। 7 फरवरी रविवार को हरियाणा के दादरी स्थित कितलाना टोल प्लाजा पर किसान महापंचायत का आयोजन किया गया। इस महापंचायत में पंद्रह हजार से अधिक किसान मौजूद रहे। महापंचायत को संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत, दर्शनपाल सिंह और बलबीर सिंह राजेवाल ने संबोधित किया। महापंचायत में हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर-प्रदेश की 50 से अधिक खापों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। करीब ढाई घंटे चली महापंचायत में मंच से पांच प्रस्ताव पारित किए गए। इस दौरान किसान नेता राकेश टिकैत ने मंच से एलान किया कि किसानों की मांगें पूरी होने तक आंदोलन किसी भी सूरत में खत्म नहीं होगा। सरकार ये बात भली-भांति समझ ले। किसान महापंचायत की अध्यक्षता दादरी से निर्दलीय विधायक एवं सांगवान खाप-40 के प्रधान सोमबीर सांगवान ने की।

ये पांच प्रस्ताव हुए पास

  • कृषि कानून वापिस लिए जाएं और एमएसपी की गारंटी तय हो
  • किसानों पर जो झूठे मुकदमें दर्ज किए गए हैं वो रद्द होने चाहिए
  • दिल्ली परेड में गिरफ्तार युवाओं और किसानों की तुरंत रिहाई हो
  • दिल्ली हिंसा में किसानों के जो वाहन जब्त किए गए हैं उन्हें छोड़ा जाए
  • एनएच-152 डी के लिए अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा किसानों को मिले

कोविड टीकाकरण अभियान में जातिवाद की दुर्गंध

 कोविड-टीकाकरण के इस दौर में भी भारत की जाति-व्यवस्था ने एक बार फिर अपना घृणित चेहरा दिखाया है। कोविड-काल के शुरू में ही हम भारत का सांप्रदायिक चेहरा देख चुके हैं, जब एक तबक़े ने वायरस के प्रसार के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया था। भारत में कोविड का पहला टीका अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दिया गया। इसके लिए एम्स ने अपने सफ़ाई कर्मचारी मनीष कुमार को चुना। मनीष की जाति का कहीं उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन इस बात की लगभग शत-प्रतिशत दावे के साथ कही जा सकती है कि मनीष दलित या पिछड़े समुदाय से आते हैं क्योंकि भारत में सफ़ाई कर्मचारियों का लगभग शत-प्रतिशत उन दलित और पिछड़ी जातियों से आता है जिन्हें जाति-व्यवस्था के अनुसार गंदगी-संबंधी कामों को करने के लिए उपयुक्त माना गया है। अनेक अध्ययनों में यह बात सामने आती रही है कि भारत में निम्न माने जाने वाले कामों में लगे अधिकांश लोग दलित अथवा पिछड़ी जाति से आते हैं।

मनीष को टीका लगाने के बाद ही अन्य ‘बड़े लोगों’, मसलन एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया और नीति आयोग के सदस्य वी.के. पॉल ने टीका लगवाया। जिस समय मनीष को टीका लग रहा था, उस समय भारत के स्वास्थ्य मंत्री वहीं मौजूद थे और तालियाँ बजा रहे थे। टीकाकरण के बाद ख़ुद मनीष भी टीवी पर कहते पाए गये कि ‘सब लोग तो डर ही रहे थे, इसलिए मैंने सर (अपने उच्चाधिकारी) को कहा कि सबसे पहले मुझे लगवाओ। अगर मुझे कुछ होगा तो सबको दिखेगा। अगर मुझे कुछ नहीं होगा तो अपने आप पीछे से सब बंदे टीका लगवाने आ जाएँगे”।

दर-अस्ल, सिर्फ़ भारत में ही नहीं, दिसंबर, 2020 में दुनिया के 15 देशों में हुए सर्वेक्षण में पाया गया था कि अधिकांश लोग कोविड का टीका लेने से हिचक रहे हैं। सिर्फ़ अमेरिका और इंग्लैंड में कोविड की वैक्सीन के प्रति विश्वास कुछ बढ़ा था, वह भी सिर्फ़ पहले की तुलना में, अन्यथा इन दोनों देशों में भी वैक्सीन पर बहुत कम लोगों ने विश्वास प्रकट किया। शेष 13 देशों में वैक्सीन पर भरोसा कम हुआ था। चर्चित मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ ने भी पिछले दिनों 2015 से 2019 के बीच वैक्सीन पर लोगों के भरोसे के संबंध में एक वैश्विक अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें बताया गया था कि वैक्सीन पर से दुनिया भर में लोगों का विश्वास कम हो रहा है।

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एक सर्वेक्षण के अनुसार नवंबर, 2020 तक भारत में 80 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो टीका लेना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या घटती गयी। दिसंबर में पाया गया कि भारत में महज़ 31 प्रतिशत लोग ही टीका लेना चाहते हैं। ग़ौरतलब है कि पिछले पखवाड़े में अनेक देशों में टीकाकरण अभियान शुरू हो चुका है, लेकिन अधिकांश जगहों पर इसे लेकर उत्साह नहीं है। इसके कारणों पर हम फिर चर्चा करेंगे।

लेकिन आपको याद होगा कि पहले सरकारें और फार्मा कंपनियाँ मीडिया में ऐसी भूमिका बाँध रही थीं मानो टीका लेने के लिए लोग उतावले हैं और मानो टीकाकरण केन्द्रों पर इतनी भीड़ उमड़ेगी कि उसे सँभालना मुश्किल हो जाएगा। कई जगहों पर तो टीका को लूट के भय से सुरक्षा बलों की देख-रेख में एक जगह से दूसरी जगह लेने जाए जाने की तस्वीरें प्रकाशित करवाई जा रही थीं, ताकि जनता में इनके प्रति उतावलापन जगाया जा सके। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो यहाँ तक कहा कि टीका पर पहला हक़ स्वास्थ कर्मियों, फ्रंटलाइन वर्कर्स और स्वच्छता कर्मियों का है। पहले चरण में सिर्फ़ इन्हें ही टीका दिया जाएगा। कोई सांसद-विधायक पंक्ति तोड़कर टीका लेने वालों की लाइन में नहीं लगेगा। भारतीय मीडिया में इसे ‘कोविड योद्धाओं’ के प्रति व्यापक उदारता के रूप में प्रदर्शित किया गया।

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लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही थी। असली बात यह थी कि लोग टीके के प्रति बहुत सशंकित हैं। 16 जनवरी, 2021 को भारत में वैक्सीनेशन अभियान शुरू हुआ तो उसे कई राज्यों में असफलता का मुँह देखना पड़ा। पहले चरण के टीकाकरण अभियान के तहत स्वास्थ्य कर्मियों, सफ़ाई कर्मचारियों और समाज में घुल-मिलकर काम करने वाले लोगों (फ्रंट लाइन वर्कर्स) को मुफ़्त टीका दिया जाना है। इनका ख़र्च सरकार वहन करेगी। जिन लोगों को टीका दिया जाना है, उनकी सूची तैयार की गयी है तथा सरकारी अमले को उन्हें टीकाकरण केन्द्रों तक आने के लिए प्रेरित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है। उनकी ट्रैकिंग के लिए तकनीक का भी व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद जिन लोगों के नाम सूची में हैं, उनमें से ज़्यादातर टीका लगवाने नहीं आ रहे।

अभी हमारे पास टीकाकरण अभियान के पहले दो दिन के कुछ आंकड़े उपलब्ध हैं। आन्ध्र प्रदेश में शुरू के दो दिनों में 58, 803 लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य था, जिनमें से सिर्फ़ 32,149 लोग ही टीका लेने पहुँचे। कर्नाटक में 21,658 में से महज़ 13, 408 लोग ही टीका केन्द्रों पर आये। असम में पहले दिन के टीकाकरण की सूची में 6,500 लोगों के नाम थे, जिनमें से सिर्फ़ 3, 528 लोग ही टीका केन्द्रों पर पहुँचे। तमिलनाडु और उड़ीसा में वैक्सीन का प्रतिशत ज़रूर कुछ ऊँचा रहा। लेकिन कहीं भी निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।

दिल्ली और महाराष्ट्र को कोविड का हॉट स्पॉट कहा जा रहा था, लेकिन महाराष्ट्र में भी 28,251 स्वास्थ कर्मियों की सूची में से महज़ 14,883 ही लोग टीकाकरण केन्द्रों पर आये। इसी प्रकार, दिल्ली में लगभग 50 प्रतिशत लोग टीका लगावाने पहुँचे ही नहीं। दिल्ली सरकार ने कहा है कि वह “लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु उपाय करेगी”। दिल्ली में तो राम मनोहर लोहिया अस्पताल के कुछ डाक्टरों ने दिए जा रहे वैक्सीन को लेकर सवाल तक उठाया।

मीडिया में भी यह सुगबुगाहट है कि टीका लेने के लिए डॉक्टर व अन्य स्वास्थ्य कर्मी नहीं आ रहे बल्कि ग़रीब स्वच्छता कर्मियों को आगे किया जा रहा है। हालांकि चूंकि मीडिया ने सरकार की ओर से आंखें बंद कर ली है, इसलिए इस पर चर्चा नहीं हो रही। सभी जानते हैं कि टीका पहले लेने का ख़तरा उठाने के लिए निम्न कही जाने वाली जातियों से आने वाले जिन स्वच्छता कर्मियों को आगे किया जा रहा है, वे सदियों से सामाजिक और आर्थिक दमन का शिकार रहे हैं। दलित-पिछड़े समुदाय से आने वाले इन लोगों को इस प्रकार खतरा लेने के लिए धकेले जाने का परिणाम क्या होता है, यह भी इस बीच देखने को मिला।

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जिन लोगों को शुरू के दो दिन में टीका लगा, उनमें से ‘कम से कम’ 447 लोगों पर वैक्सीन के दुष्प्रभावों की बात भी सरकार ने स्वीकार की। ये दुष्प्रभाव हाथ नहीं उठने से लेकर बेहोश हो जाने तक के रहे। कुछ लोगों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। इनमें से अधिकांश बहुत छोटे पदों पर काम करने वाले कर्मचारी, आशा वर्कर्स, वार्ड ब्वाय, सफाई कर्मचारी, आदि हैं।

एम्स में मनीष नाम को जो सफाई कर्मी भारत में कोविड का पहला टीका लेने वाले आदमी बने, उनका स्वास्थ्य तो ठीक रहा, लेकिन मनीष के साथ एम्स ने अपने कई अन्य निम्न स्तरीय कर्मचारियों को भी शुरू में ही टीका लेने के लिए तैयार किया था। इनमें से एक 22 वर्षीय सुरक्षा गार्ड को टीका लगते ही उसके पूरे शरीर में दाने निकलने लगे और वह खुजली से पागल होने लगा। उसे हृदय की गति असामान्य रूप से बहुत तेज़ महसूस होने लगी, साँस रुकने लगी तथा सिर दर्द से फटने लगा। उसे तुरंत आईसीयू में भर्ती किया गया जिससे उसकी जान बच सकी।

 इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वैक्सीन के बाद तीन लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि भारत सरकार ने उसे टीका से हुई मौत मानने से इनकार कर दिया, जबकि मृतकों के परिजनों ने कहा कि मृतक की तबीयत टीका लेने के तुरंत बाद बिगड़ी थी और वे पहले से स्वस्थ थे। सभी मृतक समाज के निम्न तबक़े से ही आते हैं जो बहुत कम पगार वाली नौकरियों में थे। इनमें से एक थे उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के ज़िला अस्पताल में ‘वार्ड ब्वॉय’ के रूप में काम करने वाले 46 वर्षीय महिपाल सिंह, दूसरे कर्नाटक के बेल्लारी ज़िले के स्वास्थ विभाग में निम्न-पद पर कार्यरत कर्मचारी नागराजू और तेलांगना निर्मल जिले के 42 वर्षीय एंबुलेंस ड्राइवर बिठ्ठल।

महिपाल सिंह को पहले से निमोनिया था। उनके बेटे ने मीडिया को बताया कि “वैक्सीन देने से पहले उनकी जाँच तक नहीं की गयी। वैक्सीन पड़ने के बाद वे हाँफने लगे। इसके बावजूद उनसे नाइट ड्यूटी भी करवाई गयी। नाइट ड्यूटी के दौरान ही उनकी तबीयत और बिगड़ने लगी। उनके हृदय की धड़कन बहुत तेज़ होने लगी तथा साँस रुकने लगी। उसके बाद वे घर लौट आये। घर पहुँचने पर उनकी तबीयत और ज़्यादा बिगड़ गयी। हम लोगों ने सरकारी एम्बुलेंस के लिए फ़ोन किया, लेकिन एम्बुलेंस आने में भी काफ़ी देर लग गयी। जब तक उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया, उनकी मौत हो चुकी थी”।

नागराजू की और विठ्ठल की भी यही कहानी रही। उनके परिजनों ने बताया कि कोरोना की वैक्सीन दिए जाने से पहले वे बिल्कुल स्वस्थ थे। वैक्सीन दिए जाने के कुछ घंटों बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। अगले दिन उनको सीने में दर्द और साँस लेने में परेशानी शुरू हो गयी। जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी। यानी अगर टीके से परेशानी नहीं भी है तो भी क्या वैक्सीनेशन से पहले बेहतर तरीके से उनकी जांच नहीं की जानी चाहिए, या फिर उन्हें पहले से कोई दिक्कत है या नहीं, उस पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए था?

सच्चाई यह है कि भारत का उच्च वर्ग, जो सामान्य तौर पर सामाजिक रूप से उच्च और शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे है, वह ‘इंतज़ार करो और देखो’ की नीति पर चल रहा है। उसके लिए वैक्सीन की राजनीति एक ऐसा समुद्र मंथन है जिसके बारे में वह अभी कुछ तय नहीं कर पा रहा है। इस मंथन से निकले कलश में अगर अमृत साबित होगा, तभी वह उसे ग्रहण करेगा, लेकिन उससे पहले शूद्रों-अतिशूद्रों (मूल हिन्दू मिथक के अनुसार असुरों-राक्षसों) को उसे चखकर देखना होगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

संस्मरण माता प्रसाद: जनता के राज्यपाल का जाना

 वरिष्ठ साहित्यकार और अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद जी का दिनांक 19 जनवरी, 2021 को रात में 12 बजे लखनऊ में निधन हो गया। 20 जनवरी की सुबह लखनऊ से माता प्रसाद जी के पुत्र एस.पी. भास्कर जी ने फोन पर यह दुःखद सूचना दी। ख़बर अप्रत्याशित नहीं थी इसलिए आश्चर्य नहीं हुआ। लगभग पन्द्रह दिन से वह कोमा में थे। कुछ दिन पहले ही भास्कर जी से फ़ोन पर बात हुई थी तो उन्होंने बताया था कि उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा है और शरीर के अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया है। कई वर्ष पहले से उनकी श्रवण शक्ति काफ़ी कम हो गयी थी और आवाज़ भी बैठने लगी थी। पिछले साल इलाहाबाद में एक कार्यक्रम में हम मिले थे तो बहुत मुश्किल से वह कुछ शब्द ही माइक के सामने बोल पाए थे। कुछ माह से उनकी आवाज़ लगभग बंद हो गयी थी। लेकिन उनका मस्तिष्क चेतन और सक्रिय था। हाथ भी काम करते थे। और वह लिख-पढ़ रहे थे।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें  एक स्कूल अध्यापक से राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले माता प्रसाद जी का राजनीतिक जीवन बहुत उज्जवल रहा। अपनी कार्यकुशलता के बल पर 1955 में ज़िला कांग्रेस कमेटी के सचिव बने। शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधान सभा सदस्य तथा 1980 से 1992 तक दो बार विधान परिषद के सदस्य रहे। 1988 से 1989 तक वह मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार में राजस्व मंत्री रहे। तत्पश्चात 1993 से 1999 तक वह अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल और पूर्वोत्तर परिषद के अध्यक्ष रहे। इसी दौरान जब्बार पटेल के निर्देशन में डॉ. अंबेडकर के जीवन पर बनी चर्चित फिल्म की स्क्रिप्ट निर्माण समिति के चेयरमैन माता प्रसाद थे। सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व भी उन्होंने किया था। अपनी उपलब्धियों से जौनपुर की ज़मीन को गौरव प्रदान करने वाले माता प्रसाद जी को वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, जौनपुर द्वारा मानद डी.लिट. की उपाधि से अलंकृत किया गया।

माता प्रसाद जी की गौरवपूर्ण जीवन यात्रा को देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने झोंपड़ी से राजमहल तक की यात्रा अत्यंत सादगी, सहजता और सम्मान के साथ सफलतापूर्वक पूरी की। मामूली से मामूली व्यक्ति से भी वह खुलकर मिलते थे और उनकी बात सुनते थे। जिस तरह उन्होंने राजभवन के दरवाज़े आम आदमी के लिए खोल दिए थे, वह जनता के राज्यपाल बन गए थे। माता प्रसाद जी से पहले अनेक राज्यपाल हुए और भविष्य में भी अनेक राज्यपाल होंगे। लेकिन हर कोई उनकी तरह जनता का राज्यपाल नहीं हो सकता। माता प्रसाद जी भले कांग्रेस में रहें, बाबासाहब अम्बेडकर जिस तरह की भ्रष्टाचार मुक्त, मूल्य-आधारित राजनीति के पक्षधर थे और जैसी राजनीति और राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा हमारा संविधान करता है, माता प्रसाद जी उस पर पूरी तरह खरे उतरने वाले राजनेता थे। स्वच्छ, नैतिक और मूल्य-आधारित राजनीति का वह सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण थे। 1999 में राज्यपाल के पद पर उनका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही तत्कालीन गृहमंत्री द्वारा उनसे पद छोड़ने को कहा गया तो माता प्रसाद जी ने विनम्रतापूर्वक त्याग-पत्र देने से इंकार कर दिया था। माता प्रसाद जी ने मुझे फ़ोन पर बताया था कि गृह मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी ने गृह मंत्री के निर्देश पर उनसे फ़ोन पर स्वास्थ्य आधार पर त्याग पत्र देने को कहा था। माता प्रसाद जी का अपना विवेक होगा और उनके अपने सलाहकार भी रहे होंगे, लेकिन उन्होंने इस बात का ज़िक्र करते हुए मुझसे परामर्श माँगा तो मैंने भी उनको यह सुझाव दिया था कि स्वास्थ्य आधार पर त्याग-पत्र नहीं देना चाहिए, यह राजनीतिक आत्महत्या होगी। बेहतर है कि गृह मंत्रालय को संदेश दे दिया जाए कि नए राज्यपाल की नियुक्ति कर दें, उनके आते ही मैं तत्काल राजभवन छोड़ दूँगा। माता प्रसाद जी ने यही स्टेण्ड अपनाया और दृढतापूर्वक इस स्टेण्ड के साथ रहे। नतीजा यह हुआ कि गृह मंत्रालय बैकफ़ुट पर आ गया और माता प्रसाद जी ने सम्माजनक रूप से अपना कार्यकाल पूरा किया।

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माता प्रसाद जी से परिचय तो 1990 के आसपास ही हो गया था। भारतीय दलित साहित्य अकादमी के एक आयोजन में दिल्ली में उनसे पहली मुलाकात हुई थी। उनको लोगों से अत्यंत सहजता से मिलते और बात करते हुए देखकर बहुत अच्छा लगा था। उम्र, अनुभव और पद, हर तरह से वह मुझसे बहुत बड़े थे, इसलिए उनके निकट जाने में मुझे संकोच हुआ था। लेकिन उनकी सहजता और मिलनसार प्रवृत्ति मुझे उनके समीप ले गयी। उनसे घनिष्ठता हुई 1995 के आसपास। और इतनी अधिक हुई कि उसके पश्चात उनकी जब भी कोई पुस्तक प्रकाशन के लिए तैयार होती, उसकी पांडुलिपि वह मुझे अवश्य दिखाते थे। यदि वह दिल्ली आ रहे होते तो ख़ुद ले आते थे और दिल्ली नहीं आ रहे होते थे तो पांडुलिपि डाक से भिजवा देते थे। उनकी कई पुस्तकें मैंने अतिश प्रकाशन से प्रकाशित करवायीं तथा बाद में सम्यक प्रकाशन के स्वामी शांतिस्वरूप बौद्ध जी से उनका परिचय कराया। सम्यक प्रकाशन से सम्पर्क होने के पश्चात उनकी लगभग समस्त पुस्तकें सम्यक प्रकाशन से ही प्रकाशित हुईं। वह जब भी दिल्ली आते थे, अपने आने की सूचना फ़ोन या पत्र से देते थे, और हम अवश्य मिलते थे। कोमा में जाने से सप्ताह भर पहले ही उन्होंने अपनी एक पुस्तक की पांडुलिपि मेरे पास प्रकाशित कराने हेतु भिजवायी थी, जिसे देखकर मैं शीघ्र ही प्रकाशक को भेजूँगा।

उनकी सहजता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सन, 2000 में चंडीगढ़ में दलित साहित्यकार सम्मेलन में भाग लेने के लिए माता प्रसाद जी ने आयोजकों द्वारा प्रदान की गयी सुविधा न लेकर मेरे साथ मेरी कार से चंडीगढ़ जाने को प्राथमिकता दी। अपरिचितों के लिए भी परिचित से, परायों के भी अपने, और हर उम्र के लोगों के साथ चलने और ढल जाने वाले माता प्रसाद जी अपने आप में सज्जनता, सहजता और विनम्रता की एक मिसाल थे। एक युग थे। बिहारीलाल हरित उनके हम उम्र और जीवित दलित रचनाकारों में सबसे वरिष्ठ थे, माता प्रसाद जी उनका सम्मान करते थे। हरित जी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘भीमायण’, ’जगजीवन ज्योति’ और ‘वीरांगना झलकारीबाई’ से, विशेष रूप से उनकी कवित्त शैली से वह बहुत प्रभावित थे। माता प्रसाद जी के लेखन को लेकर कई लोगों को शिकायत रहीं। लेखन के अलावा राजनीति को लेकर भी बहुत से लोगों ने उनकी आलोचना की। कारण यह था बसपा सुप्रीमो मायावती जी के ख़िलाफ़ घोसी (उत्तर प्रदेश) चुनाव क्षेत्र से लोक सभा का उनका चुनाव लड़ना। कुछ लोगों को इस बात को लेकर शिकायत रही कि वह मायावती के ख़िलाफ़ चुनाव क्यों लड़े। भूलना नहीं चाहिए कि माताप्रसाद जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे और स्वेच्छा से चुनाव क्षेत्र का चयन करने की हैसियत उनकी नहीं थी। हर राजनीतिक व्यक्ति लोकसभा का सदस्य बनना चाहता है, और जहाँ, जिस चुनाव क्षेत्र से पार्टी द्वारा टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा जाता है, वह वहीं से चुनाव लड़ता है। माता प्रसाद भी इसका अपवाद नहीं थे। उनको पार्टी ने ‘घोसी’ चुनाव क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया तो उनके लिए वहाँ से चुनाव लड़ने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। लेकिन उनके लिए मायावती के विरुद्ध चुनाव लड़ने का तात्पर्य मायावती का विरोधी होना नहीं था। अन्य मुद्दों के साथ-साथ इस मुद्दे पर भी मेरी उनसे व्यापक चर्चा हुई थी। उनका यही कहना था-‘हम नहीं चाहते थे बहन जी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना, लेकिन पार्टी ने कहा तो लड़ना पड़ा।’ उनके ये शब्द उनकी राजनीतिक विवशता को दर्शाते हैं। निजी स्तर पर वह मायावती को पसंद करते थे और उनका सम्मान करते थे।

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कांग्रेस की राजनीति में होने के कारण माता प्रसाद जी पर गांधीवाद का प्रभाव था, जो बहुत स्वाभाविक था। किंतु गांधीवाद को उन्होंने सामाजिक सद्भाव के लिए उपयोगी पाया और उस रूप में ही अपनाया। न तो उन्होंने गांधी द्वारा वर्ण-व्यवस्था की पक्षधरता को स्वीकार किया और न रामराज्य के समर्थक रहे। बाद में, विशेष रूप से जब से वह दलित साहित्य से जुड़े, उन पर गांधीवाद का प्रभाव कम हो गया था और वह आम्बेडकरवाद की ओर झुक गए थे।

उनकी चेतना में आए परिवर्तन का ही परिणाम था कि जहाँ उन्होंने ‘दिग्विजयी रावण’, ‘एकलव्य’ और ‘भीमशतक’ जैसी काव्यकृति, ‘उदादेवी’, ‘धर्म का काँटा’, ‘तड़प मुक्ति की’, ‘अछूत का बेटा’, ‘धर्म के नाम पर धोखा’, ’वीरांगना झलकारीबाई’, ‘धर्म परिवर्तन’, ‘अंतहीन बेड़ियां’ और ‘खुसरो भंगी’ जैसे नाटक लिखे, जो उनके इतिहास-बोध को प्रतिबिम्बित करते हैं। कवि और नाटककार होने के अलावा माता प्रसाद जी अच्छे गद्यकार भी थे। उन्होंने गद्य में भी कई पुस्तकें लिखीं। ‘जातियों का जंजाल’, ‘उत्तर प्रदेश की दलित जातियों का दस्तावेज़’, ’लोक-काव्य में वेदना और विद्रोह के स्वर’, ‘मनोरम भूमि अरुणाचल’ और पूर्वोत्तर भारत की लोक संस्कृति पर लिखित उनकी प्रमुख गद्य पुस्तकें हैं। ‘झोंपड़ी से राजमहल’ माता प्रसाद जी की सर्वाधिक चर्चित कृति उनकी आत्मकथा है।

राजनीतिक रूप से दलित प्रश्नों के प्रति कांग्रेस की उदासीनता अथवा निष्क्रियता के कारण वह कांग्रेस की दलित संबंधी नीतियों से अप्रसन्न रहते थे, लेकिन कांग्रेस से उनका मोह भंग नहीं हुआ था। इस बिंदु पर आकर वह बहुजन विचारधारा की राजनीति के समर्थक हो गए थे। राजनीति में शिखर तक पहुँचने के उपरांत माता प्रसाद जी की विशेष पहचान और प्रतिष्ठा साहित्यकार के रूप में थी। भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ अम्बेडकर राष्ट्रीय सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनाऊ द्वारा साहित्य भूषण सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मानों से सम्मानित माता प्रसाद जी ने लगभग पचास पुस्तकों का लेखन किया। वह स्वामी अछूतानंद, चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु और बिहारीलाल हरित की परम्परा के महत्वपूर्ण कवि और नाटककार थे। उन्होंने अछूतानंद, जिज्ञासु और हरित जी की परम्परा को आगे बढ़ाया।

विवादों और प्रतिवादों से मीलों दूर रहने वाले माता प्रसाद जी सदैव संवाद के पक्षधर रहे। न किसी लेखक संघ के साथ जुड़े और न किसी के प्रति दूरी बनायी। जब, जहाँ भी उनको आमंत्रित किया गया, जहाँ तक भी सम्भव हो सका, वह सभी आयोजनों में गए और अपनी तरह से ही अपनी बात रखी, इसीलिए वह सबके ‘अपने’ थे। (फोटो क्रेडिट- सम्यक प्रकाशन)

जानिए क्यों दलित महिलाओं की प्रेरणा स्रोत बनीं कविता देवी

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 दलित महिलाओं के खिलाफ आए दिन अत्याचार की खबर आती रहती हैं। इन सबके बीच उत्तर प्रदेश की दलित किसान परिवार में जन्मी कविता देवी ने ‘खबर लहरिया’ नाम से अपना खुद का ‘डिजिटल रुरल न्यूज़ नेटवर्क’ बनाया है। कविता देवी तीस दलित महिला रिपोर्टर्स की मदद से यह नेटवर्क चला रही हैं जिसके माध्यम से दलित-बहुजन समाज से जुड़े मुद्दे उजागर किए जा रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि कविता देवी ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की एकमात्र दलित सदस्य भी हैं। उत्तर प्रदेश के एक हरदोई जिले के सुरसा ब्लॉक के एक छोटे से गाँव ‘कुंजनपुरवा’ में जन्मी कविता की शादी मात्र बारह साल की उम्र में कर दी गयी थी। उन्होंने खुद अपनी मेहनत से पढ़ाई की और एक समाजसेवी संस्था के साथ महिला शिक्षा पर काम करती रहीं। कविता बतातीं हैं “जब मैं यह काम शुरू किया तो हर कोई मेरे खिलाफ था, मैंने अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए हर कदम पर संघर्ष किया।”

 कविता ने अपने इलाके में ‘महिला डाकिया’ नाम के बुन्देली न्यूजलेटर के लिए काम करते हुए पत्रकारिता सीखी। इसी दौरान कविता ने समाज के प्रति अपनी भूमिका की ताकत को किया। बाद में दिल्ली की समाज सेवी संस्था ‘निरंतर’ की मदद से उन्होंने ‘खबर लहरिया’ की शुरुआत की। यह पूरी तरह महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क है जो तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया द्वारा उपेक्षित खबरों की खबर लेता है। उनसे बार-बार पूछा जाता है कि आपके नेटवर्क में सिर्फ महिलायें क्यों हैं? इसपर कविता कहती हैं कि पत्रकारिता सहित दुनिया के सभी कामों में पुरुषों का दबदबा है, हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। कविता द्वारा शुरू किया गया यह ‘महिला न्यूज़ नेटवर्क’ भारत की दलित बहुजन महिलाओं के लिए एक मिसाल है। अतीत में माता सावित्रीबाई फूले ने बालिका शिक्षा और दलित-बहुजन समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी। माता सावित्री के पद-चिन्हों पर चलने वाली इस तरह की महिला नेत्रियों के कामों से बहुजन समाज में एक नई उम्मीद की रौशनी फैल रही है।

(फोटो क्रेडिट- www.thebetterindia.com)

किसान आंदोलन में शामिल हुई दलित महिला कार्यकर्ता का पुलिस पर बड़ा आरोप

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 नौदीप कौर नाम की एक दलित महिला मजदूर अधिकार कार्यकर्ता पर पुलिस हिरासत में कथित तौर पर हिंसा एवं यौन शोषण का मामला सामने आया है। ‘नौदीप कौर’ मजदूर अधिकार संगठन (MAS) की कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिंघू बॉर्डर पर किसान आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन के दौरान 12 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ़्तारी के बाद उनके परिवार द्वारा पुलिस पर उनके साथ हिंसा एवं यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। इस मामले पर तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया में कोई खबर नहीं आ रही है।

गौरतलब है कि पीड़िता पर आईपीसी सेक्शन 307 (हत्या की कोशिश) जैसा गंभीर आरोप लगाया गया है। उनके ऊपर तीन एफ आई आर दर्ज की गयी हैं। साथ ही दंगा भड़काने, घातक हथियार रखने, गैर कानूनी जमावड़ा करने, आपराधिक साजिश, शासकीय कर्मचारी के खिलाफ हिंसा इत्यादि जैसे आरोप लगाए गए हैं। पीड़िता के वकील ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर जानकारी दी है कि पीड़िता के निजी अंगों पर घाव एवं चोट के निशान हैं जो उनके खिलाफ यौन हिंसा के आरोप की पुष्टि करते हैं। नौदीप की बड़ी बहन राजीव कौर जो कि खुद एक छात्र-कार्यकर्ता हैं, और दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं, ने बताया है कि उनकी बहन की पुलिस हिरासत में बेरहमी से पिटाई की गयी है और पुरुष सिपाहियों द्वारा उनके कपड़े फाड़े गए हैं। यहाँ ध्यान देना होगा कि किसानों, मजदूरों के हक में आवाज बुलंद करने वाले कार्यकर्ता केंद्र सरकार के निशाने पर हैं। इसमें भी अगर वह कार्यकर्ता, पत्रकार या नेता दलित बहुजन समाज से आता/आती है तो उसके खिलाफ कहीं गंभीर षड्यन्त्रपूर्ण कार्यवाही की जाती है। नौदीप कौर का मामला भारत के मनुवादी शासन-प्रशासन सहित गोदी मीडिया की कार्यशैली को एक साथ उजागर करता है।

हिन्दू और हिन्दुत्व को बौद्धिक चुनौती देने वाले इतिहासकार प्रो. डी.एन. झा नहीं रहें

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 हिंदू धर्म और हिंदुत्व की राजनीति को खुली बौद्धिक चुनौती देने वाले प्रोफेसर डी. एन. झा (द्विजेंद्र नारायण झा) नहीं रहे। चार फरवरी को उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास का विशेषज्ञ माना जाता है। प्रोफेसर डीएन झा दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग में चेयरमैन रहें। उन्होंने हमेशा भारतीय इतिहास की खामियों को रेखांकित किया। जिन्होंने ‘मिथ ऑफ़ द होली काउ’ जैसी किताब लिखी जिसमें वे साबित करते हैं कि प्राचीन भारत में ब्राह्मण गोमांस खाते थे। इसके अलावा उन्होंने प्राचीन काल के स्वर्ण युग की अवधारणा को चुनौती दिया।

 उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि “ऐतिहासिक साक्ष्य ये कहते हैं कि भारतीय इतिहास में कोई स्वर्ण युग नहीं था। प्राचीन काल को हम सामाजिक सद्भाव और संपन्नता का दौर नहीं मान सकते। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी”। “गैर-ब्राह्मणों पर सामाजिक, क़ानूनी और आर्थिक रूप से पंगु बनाने वाली कई पाबंदियां लगाई जाती थीं। ख़ास तौर से शूद्र या अछूत इसके शिकार थे।” उन्होंने यह भी लिखा है कि “मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के आतंक और ज़ुल्म की बात और मुस्लिम शासकों को दानव के तौर पर पेश करने का दौर भी उन्नीसवीं सदी के आख़िर से ही शुरू हुआ था। क्योंकि उस दौर के कुछ सामाजिक सुधारकों और दूसरे अहम लोगों ने मुसलमानों की छवि को बिगाड़कर पेश करने को अपनी ख़ूबी बना लिया। जैसे कि दयानंद सरस्वती (1824-1883),  जिन्होंने अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में दो अध्याय इस्लाम और ईसाई धर्म की बुराई को समर्पित कर दिए। इसी तरह विवेकानंद (1863-1902) ने कहा कि, ‘प्रशांत महासागर से लेकर अटलांटिक तक पूरी दुनिया में पांच सौ साल तक रक्त प्रवाह होता रहा। यही है इस्लाम धर्म।”

 रामजन्म भूमि पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर उन्होंने लिखा, “ये फ़ैसला बहुसंख्यकवाद की तरफ़ झुका हुआ है। ये हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है।” उन्होंने लिखा कि “मौजूदा वक़्त में दलितों, ख़ास तौर से बौद्ध धर्म के अनुयायी दलितों के साथ जो दुश्मनी निभायी जा रही है, उसकी जड़ें हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था में हैं।” बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच के टकराव और  बौद्ध स्थलों पर हिंदुओं के कब्जे के बारे में उन्होंने लिखा कि “ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच की स्थायी दुश्मनी की झलक हमें दोनों ही धर्मों के ग्रंथों में मिलती है। इसके अलावा कई पुरातात्विक सबूत भी इस दुश्मनी की तरफ़ इशारा करते हैं, जो हमें ये बताते हैं कि किस तरह बौद्ध धर्म की इमारतों को ढहाया गया और उन पर क़ब्ज़ा कर लिया गया।”

उन्होंने लिखा कि “हक़ीक़त ये है कि भारत से बौद्ध धर्म के ग़ायब होने की बड़ी वजह ब्राह्मणवादियों का इसे अपना दुश्मन मानना और इसके प्रति उनका आक्रामक रवैया रहा। साफ़ है कि ब्राह्मण धर्म कभी बौद्ध धर्म की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर सका। इसलिए ये कहना ग़लत होगा कि हिंदू धर्म बहुत सहिष्णु है।” हिंदू  धर्म और हिंदुत्व की राजनीति को बौद्धिक चुनौती देने वाला एक योद्धा नहीं रहा, लेकिन उनकी अनके किताबें हमारे बीच हैं, जो हिंदुत्व की  राजनीति और वर्ण-जातिवादी हिंदू धर्म से संघर्ष के लिए हमारे हथियार हैं।

  • रिपोर्ट- डॉ. सिद्धार्थ के फेसबुक वॉल से

बहुजन बनाएंगे रिकार्ड, सौ फीट की बुद्ध प्रतिमा लगाने की तैयारी

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 दुनिया भर के बुद्ध प्रेमियों के लिए 30 जनवरी को कोलकाता से एक बड़ी खबर आई है। भारत की पहचान के सबसे बड़े प्रतीक भगवान बुद्ध के सबसे पवित्र मंदिर स्थल पर उनकी विशालाकाय मूर्ति स्थापित होने वाली है। बुद्ध की यह प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में है, जिसकी लंबाई 100 फुट है। इसका निर्माण कोलकाता में किया जा रहा है। इस बुद्ध प्रतिमा को इसी साल बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर 26 मई को स्थापित किया जाना है। यह प्रतिमा बिहार की बोध गया पवित्र नगरी में बुद्ध इंटरनेशनल वेलफेयर मिशन के मंदिर में स्थापित की जाएगी। लेटी हुई बुद्ध की मूर्ति विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसी लेटी हुई मुद्रा में भगवान बुद्ध का परिनिर्वारण हुआ था।

इस विशाल प्रतिमा का निर्माण कोलकाता के बदनगर के घोषापाड़ा इलाके में ‘नैनान बांधाब समिति’ मैदान में चल रहा है। मूर्ति बनाने वाले मुख्य शिल्पी श्री मिंटू पाल बताते हैं- “हमने मार्च 2019 में काम शुरू किया था लेकिन उसके बाद हमें कोविड-19 महामारी के कारण इसे रोकना रखना पड़ा। इस तरह चार महीने हमारा काम रुका रहा… हमने पिछले साल नवंबर में एक बार फिर से यह काम शुरू किया और हमें उम्मीद है कि प्रतिमा 26 मई से पहले तैयार हो जाएगी। इस समय कम से 22 कारीगर इस काम में लगे हुए हैं।’

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें निर्माण एवं स्थापना की सुविधा के लिए बुद्ध की मूर्ति का प्रत्येक हिस्सा अलग से बनाया जा रहा है और उन्हें बोधगया ले जाया जाएगा और फिर उन्हें जोड़कर भगवान बुद्ध की प्रतिमा को साकार किया जाएगा। भारत की सबसे बड़ी लेटी हुई बुद्ध की प्रतिमा के निर्माण की खबर से पूरे देश के ही नहीं दुनिया भर के बुद्ध प्रेमियों में खुशी की लहर है।

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5 फरवरी यानी हिंदू कोड बिल दिवस, इसी दिन भारतीय महिलाओं की मुक्ति की शुरूआत हुई

 डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल (5 फरवरी 1951) के माध्यम से महिलाओं की मुक्ति और समानता का रास्ता खोलने की कोशिश किया था। उन्होंने ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को पूरी तरह से तोड़ देने का कानूनी प्रावधान प्रस्तुत किया। इसके तहत उन्होंने यह प्रस्ताव किया था कि कोई भी बालिग लड़का-लड़की बिना अभिवावकों की अनुमति के आपसी सहमति से विवाह कर सकता है। इस बिल में लड़का-लड़की दोनों को समान माना गया था। इस बिल का मानना था कि विवाह कोई जन्म भर का बंधन नहीं है, तलाक लेकर पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो सकते हैं। विवाह में जाति की कोई भूमिका नहीं होगी। कोई किसी भी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर सकता है। शादी में जाति या अभिवावकों की अनुमति की कोई भूमिका नहीं होगी। शादी पूरी तरह से दो लोगों के बीच का निजी मामला है। इस बिल में डॉ. आंबेडकर ने लड़कियों को सम्पत्ति में भी अधिकार दिया था।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें इस बिल को विरोध मे तत्कालिन राष्ट्रपति राजेंन्द्र प्रसाद, संघ परिवार और उसके संगठन सभी एकजुट हो गए और कहने लेकिन कि इससे तो हिंदुओं की सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, हिंदू संस्कृति का विनाश हो जायेगा। हिंदू संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और विरोध शुरू हो गया। नेहरू भी पीछे हट गए। आखिर आंबेडकर ने निराश होकर विधि मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

 आंबेडकर का मानना है कि हिंदू महिलाओं की दासता, दोयम दर्जे की स्थिति और गरिमाहीन अपमानजनक जीवन के लिए ब्राह्मणवाद जिम्मेवार है। महिलाओं के प्रति हिंदुओं के नजरिये का सबसे गहन और व्यापक अध्ययन डॉ. आंबेडकर ने किया है। 24 वर्ष की उम्र में 1916 में अपना पहला निबंध ‘भारत में जातियां: उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ (कॉस्ट इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट) शीर्षक से कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया था। इस निबंध में उन्होंने यह स्थापित किया था कि जाति को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त यह है कि स्त्रियों की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण कायम किया जाय। इसके लिए जरूरी था कि स्त्रियों को पूरी तरह पुरूषों की अधीनता में रखा जाय। इस निबंध में आंबेडकर ने लिखा है कि सजातीय विवाह की व्यवस्था के बिना जाति की रक्षा नहीं की जा सकती है, इसीलिए जाति से बाहर विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया। विशेषकर प्रतिलोम विवाह के संदर्भ में।  सती प्रथा, विधवा प्रथा और बाल विवाह जैसी क्रूर प्रथाओं के जन्म के पीछे भी मुख्य वजह जाति की शुद्धता की रक्षा थी। जो कोई भी भारत में स्त्रियों के दोयम दर्जे के स्थिति को समझा चाहता है, उसका प्रस्थान बिन्दु यही निबंध हो सकता है। आंबेडकर अपने इस निबंध में यह स्थापित करते हैं कि जाति और स्त्री पर पुरूष का प्रभुत्व एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। आगे चलकर आंबेडकर ने इस विषय पर एक मुकम्मिल किताब लिखी कि भारत में महिलाओं की दासता और दोयम दर्जे की स्थिति के लिए ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार है। उस किताब का नाम है- ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’। इस किताब विस्तार से आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी शास्त्रों को उद्धृत करके बताते हैं कि कैसे हिंदू धर्मशास्त्र स्त्रियों की दासता और गरिमाहीन अपमानजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें

इस किताब में आंबेडकर लिखते हैं कि “भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक ऐसा युग था,जिसमें स्त्रियां सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थीं।….जनक और सुलभा, याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी आदि के संवाद यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति से पहले के युग में स्त्रियां ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी थीं।”

मनु और अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने स्त्रियों की पूरी तरह मूक पशु में बदल दिया। मनु का आदेश है कि पुरूषों को अपने घर की सभी महिलाओं को स्त्रियों को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए- अस्वतंत्रा: स्त्रिया : कार्या: पुरूषौ: स्वैर्दिवनिशम्। विषयेषु च सज्ज्न्त्य: संस्थाप्यात्मनों वशे।। ( 9,2 ) तुलसी दास भी कहते हैं कि नारी स्वतंत्र होकर विगड जाती है- ‘जिमि स्वतंत्र होई,बिगरहि नारी” मनु स्त्रियों से इस कदर अविश्वास करते हैं, घृणा करते हैं कि वे लिखते हैं – “पुरूषों में स्त्रिया न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती हैं। सुरूप हो या कुरूष, जैसा भी पुरूष मिल जाय, उसी के साथ भोगरत हो जाती हैं” (मनु, 9,14 )।

यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। राम सीता के चरित्र पर विश्वास नहीं करते हैं और सीता से कहते हैं कि रावण ने अवश्य ही तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाय होगा (इसके विस्तार के लिए बाल्मिकि रामायण का उत्तरकांड देख लें।)

‘हिंदू नारी उत्थान और पतन शीर्षक’ अपनी इसी किताब में आंबेडकर यह भी प्रमाणों के साथ स्थापित करते हैं कि बौद्ध धम्म मे स्त्रियों को समानता का अधिकार प्राप्त था। इसके लिए वे थेरी गाथों का उद्धरण देते है और अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। 1916 के अपने पहले निबंध से लेकर हिंदू कोड बिल पेश करते समय तक डॉ. आबेडकर, महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे। उनका यह मानना पूरी तरह सही था कि जैसे जाति के विनाश के साथ ही स्त्री मुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ होता है और इसके लिए ब्राह्मणवाद से पूरी तरह से मुक्ति अनिवार्य है। जाति और स्त्री की मुक्ति का प्रश्न एक दूसरे से जुड़ा है, यह सीख डॉ. आंबेडकर को अपने गुरू जाोतराव फुले से भी मिली थी। दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए ध्यान रहे, इस कानून का व्यवहार में सर्वाधिक फ़ायदा सवर्ण महिलाओं को मिलना था, और मिला। भले ही उन्हें उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में अम्बेडकर के योगदान का कोई अहसास न हो। वर्तमान समय में बहुत सारी महिला अध्येता फुले और आंबेडकर के विचारों के आलोक में भारतीय पितृसत्ता को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहने लगी हैं। इनमें उमा चक्रवर्ती और शर्मिला रेगे ( अब नहीं रहीं) जैसी अध्येता शामिल हैं। इस विषय पर शर्मिला रेेगे की किताब ‘मनु का पागलपन’ ( मैडनेस ऑफ मनु ) जरूर ही पढ़ना चाहिए।

 किसान आंदोलन के पक्ष में यूपी के दौरे पर प्रियंका गांधी

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 कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने किसान आंदोलन के बीच किसानों को नैतिक समर्थन देने का फैसला लिया है। वे आज 4 फरवरी सुबह ही किसान आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसान समर्थक एवं प्रदर्शनकारी श्री नवरीत के घर उत्तर प्रदेश के रामपुर जा रही हैं। नवरीत की मौत ट्रैक्टर परेड के दौरान के दौरान हो गयी थी। नवरीत किसान आंदोलन का समर्थन करने के लिए आस्ट्रेलिया से भारत आए थे।

किसान पक्ष का कहना है की उनकी मौत गोली लगने से हुई है लेकिन पुलिस का कहना है कि नवरीत की मौत ट्रैक्टर पलटने से लगी चोट के कारण हुई है। इस मुद्दे पर किसानों में भारी गुस्सा है और वे न्याय की मांग कर रहे हैं। इसी मुद्दे पर किसानों का दर्द साझा करने के लिए प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में रामपुर ज़िले के बिलासपुर के गांव डिबडिबा गाँव की तरफ निकल चुकी हैं। प्रियंका की इस अचानक होने वाली यात्रा के गहरे राजनीतिक मतलब निकाले जा रहे हैं।

बीते कुछ दिनों में किसान नेता राकेश टिकैत की भावुक अपील के बाद किसान आंदोलन में नई जान आ गयी है। टिकैत के आंसुओं से न केवल आंदोलन को संजीवनी मिल गयी है बल्कि एक सर्वमान्य नेता भी मिल गया है। इस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद अचानक हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लाखों-लाख किसान सरकार के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं। इस सबके बीच कांग्रेस ने राजनीतिक वातावरण में संभावित बदलाव को भांप लिया है।

जींद में मंगवार (3 फरवरी) को हुई किसान महापंचायत में हजारों किसानों को संबोधित करते हुए टिकैत ने कहा है कि ‘कानून वापसी नहीं हुई तो गद्दी वापसी होगी’। टिकैत की इस धमकी के बड़े राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के किसानों में सत्तारूढ़ केंद्र एवं राज्य सरकार के खिलाफ रुझान बन रहा है। राजनीतिक विश्लेषक यह कयास लगा रहे हैं कि इसी रुझान का लाभ लेने के लिए प्रियंका ने नवरीत की मौत के मुद्दे पर जमीन पर उतरने का फैसला लिया है।

बजट 2021 : मौत और अकाल के आहट पर चुप्पी

 भारत सरकार का बजट 2021 कोविड महामारी के साये में आया है। पिछले एक साल से दुनिया के अन्य देशों की तरह ही भारत का जन-जीवन लगभग थमा हुआ है। ग़रीब और मध्यम आय-वर्ग के लोगों में हाहाकार मचा हुआ है। करोड़ों लोग पूरी तरह बेरोज़गार हो गये हैं तथा लाखों-लाख लोगों को आय में भारी कमी का सामना करना पड़ा है। लॉकडाउन के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी भूख से संबंधित आँकड़ों के आधार पर ऑक्सफैम ने अनुमान लगाया था कि लॉकडाउन के कारण 2020  का अंत आते-आते  दुनिया में हर दिन 6 से 12 हजार अतिरिक्त लोगों की मौत होने लगेगी। मौत का यह तांडव शुरू हो चुका है और दिनों-दिनो चुपचाप यह अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है। ये लोग पिछले एक साल में बढ़ी ग़रीबी के कारण मर रहे हैं। जो कोविड से होने वाली मौतों के आधिकारिक आँकड़ों से भी बहुत ज़्यादा है।

दुनिया पर भयावह अकाल का काला साया मँडरा रहा है। इसे कोविड-19 अकाल कहा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य राहत एजेंसी (WEP) इस बारे में लगातार चेतावनी जारी कर रही है। कहा जा रहा है कि यह पिछली एक सदी के सबसे भयावह अकालों में से एक होगा, जो दुनिया के ग़रीब और विकासशील देशों  तथा युद्धग्रस्त इलाक़ों पर क़हर की तरह बरपेगा। इस अकाल में भूख के एक नये एपिक सेंटर के रूप में भारत के उभरने की आशंका है। भारत में क्या हालत हो चुकी है, इसका अनुमान दिसंबर, 2020 में हुए एक  सर्वेक्षण  से लगता है। इस  सर्वेक्षण के अनुसार भारत की आधी से अधिक आबादी को कोरोना-काल में पहले की तुलना में कम भोजन मिल रहा है। इनमें ज़्यादातर दलित और आदिवासी हैं। लेकिन इन सूचनाओं से  भी अधिक भयावह यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग, ग़रीबों के सर पर मँडराते मौत के इस साये से प्राय: निरपेक्ष है। भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया व शहरी पब्लिक स्फीयर्स में ग़रीबों की सड़ती हुई लाशों की बदबू नहीं पहुँच रही है। संभवत: सदियों से मौजूद सामाजिक असमानता की हमारी विरासत ने भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक असमानता और सामाजिक-अलगाव की खाइयों को इतना चौड़ा कर दिया है कि हम एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग व बेज़ार बने रह सकते हैं।

इस अलगाव की मौजूदगी भारत सरकार के इस साल के बजट और उस पर मीडिया में होने वाली चर्चाओं में भी दिख रही है। एक फरवरी को पेश किए गये बजट में भारत सरकार का ज़ोर इस पर है कि किस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को कोविड से हुए नुक़सान से उबारा जाए। इसके लिए देश की अनेक परिसंपत्तियों और संस्थाओं को निजी पूँजीपतियों के पास बेचने के प्रावधान किए गये हैं। सरकार के इन प्रावधानों पर ही मीडिया की चर्चाएँ केन्द्रित हैं। कुछ लोग इसे उचित, आवश्यक और पहले से चल रहे ‘आर्थिक सुधारों’ की अगली कड़ी मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इस सरकार को ‘देश बेच देने वाली सरकार’ कह रहे हैं। वित्त मंत्री ने अपने बजट-भाषण में कोविड-टीका की उपलब्धता तथा इसके लिए बजट में किए गये प्रावधानों का विस्तार से ज़िक्र किया और देश को डिज़िटल बनाने पर ख़ास बल दिया। चर्चा इसके भी पक्ष-विपक्ष में हो रही है। लेकिन इस बीच यह सवाल पूरी तरह ग़ायब है कि बजट में लॉकडाउन से उपजी भुखमरी और आसन्न अकाल का कोई ज़िक्र तक क्यों नहीं है?

इस बजट के आने से कुछ ही दिन पहले ऑक्सफेम ने ‘असमानता का वायरस’ (The Inequality Virus) नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कोविड-19 ने दुनिया के सभी देशों में असमानता को बहुत तेज़ी से बढ़ाया है। दुनिया के 1,000 धनकुबेरों (सुपर-रिच) की संपत्ति में इस दौरान बेहतहाशा वृद्धि हुई। दुनिया में जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई तो उन दिनों शेयर बाज़ार तेज़ी से लुढ़का, जिससे इन धनकुबेरों को थोड़े समय के लिए कुछ आभासी नुक़सान होता दिखा, लेकिन दुनिया में लॉकडाउन की समाप्ति से पहले ही इनकी संपत्ति न सिर्फ़ लॉकडाउन से पूर्व की स्थिति में पहुँच गयी3 बल्कि उन्होंने उस दौरान इतना धन बनाया, जितना पिछले कई सालों में नहीं कमा सके थे। धन का यह केन्द्रीकरण मुख्य रूप से दुनिया को डिज़िटल बनाने की क़वायदों के कारण संभव हो सका। स्वास्थ्य और वैक्सीन व कुछ अन्य क्षेत्रों में व्यापार करने वाले लोगों ने भी उस बीच ख़ूब पैसा बनाया। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान वैश्विक धनकुबेरों की संपत्ति 19 प्रतिशत बढ़ी। इस अवधि में दुनिया के सबसे अमीर आदमी जेफ बेजोस की संपत्ति में 185.5 बिलियन यूएस डॉलर की वृद्धि हुई। 18 जनवरी, 2021 तक एलोन मस्क की संपत्ति बढ़कर 179.2 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गयी थी। गूगल के संस्थापक सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज और माइक्रोसॉफ्ट के पूर्व सीईओ स्टीव बाल्मर जैसे अन्य टेक दिग्गजों की संपत्ति में मार्च 2020 के बाद से 15 बिलियन डॉलर की बढ़ोत्तरी हुई। ज़ूम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक युआन की संपत्ति इस दौरान बढ़कर 2.58 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गयी।

भारत में भी इस दौरान आर्थिक-क्षेत्र में कुछ ऐसा घटित हो रहा था, जिसका अनुमान किसी को नहीं था। लॉकडाउन के दौरान भारत के धनकुबेर अरबपतियों अपनी कमाई में अकूत वृद्धि कर रहे थे। कोविड राहत के नाम पर जहाँ सरकारी पैसा उनकी जेब में पहुँच रहा था, वहीं घरों में बंद आम जनता की जेब में बची-खुची रक़म भी निकलकर उन्हीं धनकुबेरों के पास पहुँच रही थी। भारत में इस समय 119 अरबपति हैं, जिनमें मुकेश अम्बानी, गौतम अडानी, शिव नादर, साइरस पूनावाला, उदय कोटक, अज़ीम प्रेमजी, सुनील मित्तल, राधाकृष्ण दामनी, कुमार मंगलम बिरला और लक्ष्मी मित्तल शामिल हैं। मुकेश अंबानी इस दौरान भारत और एशिया में सबसे अमीर व्यक्ति के रूप में उभरे। उन्होंने महामारी के दौरान 90 करोड़ प्रति घंटे कमाए जबकि देश में लगभग 24 प्रतिशत लोग लॉकडाउन के दौरान महज़ 3,000 प्रति माह कमा रहे थे।

इन 119 लोगों की समेकित संपत्ति में लॉकडाउन के दौरान 35 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। कुल मिलाकर इन लोगों ने इस दौरान लगभग 13 लाख करोड़ कमाये। यह रक़म कितनी है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इतने पैसे को अगर ग़रीबों में बाँटा जाए तो भारत के निर्धनतम लगभग 14 करोड़ लोगों में से हर एक को 94 हज़ार रूपये का चेक दिया जा सकता है। सिर्फ मुकेश अंबानी ने लॉकडाउन के दौरान जितना धन कमाया है, उससे अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत उन 40 करोड़ लोगों को कम से कम पांच महीने के लिए गरीबी रेखा के उपर रखा जा सकता है, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपनी नौकरियाँ गंवा दीं।

दूसरी ओर, इस अवधि में  भारत में 12 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी के कगार पर पहुँच गये। मध्यवर्ग के लिए बैंकों से लिया गया लोन चुकाना मुश्किल हो गया और लाखों परिवार क़र्ज़दाताओं की धमकियों से तंग आकर सामूहिक आत्महत्या करने तक का विचार कर रहे हैं। सरकार ने मध्य वर्ग द्वारा क़र्ज़ पर कुछ और समय के लिए मॉनेटेरियम दिए जाने की माँग को भी अनसुना कर दिया है। बजट से पूर्व इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले में सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता क़र्ज़दाताओं के प्रति दिखायी। सरकार ने कोर्ट में यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिये कि अगर वह मॉनेटोरियम का फै़सला करती है तो इससे बैंकों में पैसा लगाने वाले पूँजीपतियों का विश्वास सरकार में कमज़ोर होगा। परिणामस्वरूप दर्जनों परिवारों के सामूहिक आत्महत्या की ख़बरें इस बीच आयीं और लाखों परिवार बैंकों व अन्य क़र्ज़दाता संस्थाओं के एजेंटों की गालियाँ सुनने, मार खाने और सरे-बाज़ार अपमानित होने के लिए मजबूर हैं। भारत सरकार का यह बजट इन समस्याओं के बारे में भी पूरी तरह मौन है।

चुप्पी का हालिया इतिहास

सिर्फ़ सरकार ही नहीं, अख़बार भी चुप हैं। यह चुप्पी लगभग तीन दशक पुरानी है। 1990 में बाज़ार केन्द्रित उदार अर्थ-व्यवस्था के आगमन के बाद से ही धीरे-धीरे आर्थिक असमानता संबंधी सवालों को दरकिनार किया जाने लगा था। वर्ष 2000 तक भारत में सिर्फ़ 9 अरबपति थे, 2017 में इनकी संख्या बढ़कर 101 हो गयी थी और जैसा कि पहले ज़िक्र हुआ, आज इनकी संख्या 119 है। एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2017 में देश द्वारा उत्पादित कुल धन का 73 फ़ीसदी देश के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की जेब में पहुँच रहा था। 2018-19 के वित्तीय वर्ष में देश के संपूर्ण वार्षिक बजट में निर्धारित राशि से अधिक धन इन धनकुबेरों के पास था। कोविड नामक वैश्विक आपदा के दौरान ये धनकुबेर पूरी र्निलज्जता से न सिर्फ़ अपना ख़ज़ाना भरते रहे बल्कि इनकी संस्थाओं ने पर्दे के पीछे से कोविड के नाम पर भयादोहन का व्यापार चलाया। इन अरबपतियों के अतिरिक्त, आर्थिक और सामाजिक शीर्ष पर मौजूद भारत के 10 फ़ीसदी लोगों का क़ब्ज़ा देश की कुल संपदा का 77 फ़ीसदी हिस्से पर है। शेष 90 फ़ीसदी आबादी के पास महज़ 23 फ़ीसदी संपदा है। इस असमानता को कम करने का एक कारगर तरीक़ा ‘वेल्थ टैक्स’ लगाया जाना है। यानी, बहुत अमीर लोगों पर उनकी संपत्ति और कमाई के अनुसार कुछ अधिक कर लगाया जाए।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें आपको याद होगा कि महामारी के शुरू में ही भारतीय राजस्व सेवा के कुछ तेज़-तर्रार, संवेदनशील अधिकारियों ने इस प्रकार का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था। उस समय दिल्ली, मुंबई, सूरत जैसे औद्योगिक नगरों से प्रवासी मज़दूर गाँव की ओर पैदल जाने के लिए मजबूर हुए थे और चलते-चलते थकान के कारण उनमें से सैकड़ों लोगों की मौत की ख़बरें आ रही थीं। इस बीच ताज़ा हवा के झोंके की तरह एक ख़बर यह भी आयी कि भारतीय राजस्व सेवा के 50 अधिकारियों ने ‘आईआरएस एसोसिएशन’ के ट्विटर एकाउंट पर एक रिपोर्ट तैयार करने की सूचना दी है। उन अधिकारियों ने उसे ‘फ़ोर्स’ (राजकोषीय विकल्प और कोविड-19 महामारी के लिए प्रतिक्रिया) शीर्षक नाम दिया था।

यह एक प्रकार से उन अधिकारियों की ओर से व्यक्तिगत तौर पर सरकार को दिए जाने वाले सुझावों का एक ख़ाका था, जिसमें कहा गया था कि “ऐसे समय में तथाकथित अत्यधिक अमीर लोगों पर बड़े स्तर पर सार्वजनिक भलाई में योगदान करने का सबसे अधिक दायित्व है”। उन अधिकारियों ने अमीर लोगों के लिए आयकर की दर को बढ़ाने और एक निश्चित राशि से अधिक की कमाई करने वाले लोगों पर चार फ़ीसद का कोविड राहत सेस ( Covid-Relief Cess) लगाने की सिफ़ारिश की थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि  रिटर्न दाख़िल नहीं करने, स्रोत पर टैक्स (TDS) कटौती नहीं करने या उसे रोक कर रखने, फ़र्ज़ी नुक़सान के क्लेम के ज़रिये टैक्स देनदारी कम करके दिखाने के कई मामले सामने आते रहते हैं। ऐसे में एक करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक आय वाले लोगों पर 30 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत टैक्स लगाया जाए। इसके अलावा पाँच करोड़ से अधिक की सालाना आय वाले लोगों पर प्रॉपर्टी टैक्स या वेल्थ टैक्स लगाया जाए। 

वे अधिकारी न कम्युनिस्ट थे, न ही व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव चाहने वाले सामाजिक क्रांतिकारी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा था कि इस प्रकार का टैक्स थोड़े समय के लिए लगाया जा सकता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। ग़रीब और मध्यम वर्ग के हाथ में थोड़ा पैसा आ सकेगा और वाणिज्य-व्यापार की गाड़ी फिर से पहले की तरह दौड़ सकेगी। इस तरह की बातों की शुरुआत करना भी किस प्रकार एक नये सिलसिले को जन्म दे सकता है, इसे इन धनकुबेरों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।

‘फ़ोर्स’ की जानकारी सामने आते ही धन-पशुओं ने हडकंप मचा दिया। मीडिया में इन प्रस्तावों को अधिकारियों की अनुशासनहीनता कहा गया। अख़बारों में लेख लिखे गये, जिसमें बताया गया कि किस प्रकार इससे अमीर लोग भारत से नाराज़ हो जाएँगे और किस प्रकार इस प्रकार के प्रावधान से टैक्स की चोरी को बढ़ावा मिलेगा। सरकार भी तुरंत ही हरकत में आयी और इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ जाँच बिठाई गयी। आनन-फानन में  भारतीय राजस्व सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को इसके लिए दंडित करते हुए उनके पदों से हटा दिया गया। सरकार ने कहा कि इस प्रकार की बात उठाने वाले युवा अधिकारियों के दोष से ज़्यादा दोष उन वरिष्ठ अधिकारियों का है, जिन्होंने उन्हें इस प्रकार की रिपोर्ट तैयार करने के लिए उकसाया।5 वे अधिकारी थे- आयकर विभाग, दिल्ली के मुख्य आयुक्त प्रशांत भूषण, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के निदेशक प्रकाश दुबे और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के उत्तर पूर्व क्षेत्र के निदेशक संजय बहादुर।यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें

उन अधिकारियों की संवेदनशीलता, अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी को किसी ने नहीं सराहा। न उनके पक्ष में कोई संपादकीय लिखा गया, न ही टीवी चैनलों पर कोई बहस चली जिसमें यह सवाल उठाया जाता कि उन्होंने न तो सरकार की आलोचना की थी, न ही कोई टैक्स अपनी मर्ज़ी से लगा दिया था तो  क्या सरकार को सुझाव देना भी अनुशासनहीनता मानी जानी चाहिए? क्या अगर कोई अधिकारी ग़रीब या मध्यम वर्ग पर किसी प्रकार के टैक्स का सुझाव देता, तब भी उसे अनुशासनहीनता मानी जाती?

अख़बार ही नहीं, इन अधिकारियों के पक्ष में न तो सिविल सोसाइटी संगठन आया, न ही कोई जातीय-धार्मिक संगठन। न तो कम्युनिस्ट पार्टियाँ उनके पक्ष में बोलीं, न समाजवादी, और न ही आम्बेकरवादी-सामाजिक न्यायवादी। किसी ने आज तक उनकी तारीफ़ में यह तक नहीं कहा कि उन कर्मठ अधिकारियों ने हमारे स्वप्नदर्शी कम्युनिस्ट साथियों और आँकड़ों की भविष्यवाणियाँ करने वाले अर्थशास्त्रियों से पहले समझ लिया था कि आने वाले महीनों में किस प्रकार धन का केन्द्रीकरण और तेज़ होगा।

 यहां Click कर दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए बहरहाल, जिस प्रकार की नयी दुनिया का सपना ये धनकुबेर देखते हैं, उसमें जो एक चीज़ वे नहीं रखना चाहते हैं, वह है- सवाल। वे सवाल-विहीन दुनिया चाहते हैं। वे एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें सबके पास खाना, कपड़ा और छत हो। लेकिन यह सवाल न हो कि इतनी असमानता क्यों है, क्यों दुनिया के अधिकांश लोगों को जीवन भर ज़रूरत से ज़्यादा तनावग्रस्त रहना पड़ता है, अथवा यह कि क्यों किसी के चेहरे पर ख़ुशी नहीं दिखती? क्यों कुछ लोग रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं? क्यों कुछ मानव समुदाय चुपचाप खत्म होते जा रहे हैं?  अगर उनके सपनों से नयी दुनिया को बचाना है तो हमें हर क़ीमत पर ऐसे सवालों का वजूद बचाए रखना होगा, उनके ख़िलाफ़ जाने वाले हर विवेकसम्मत सवाल का स्वागत करना होगा, चाहे वे सवाल किसी भी ख़ेमे से उठ रहे हों।

संदर्भ 1. Oxfam Media Briefing, “The Hunger Virus: How Covid-19 Is Fuelling Hunger In A Hungry World” July 9, 2020 2. Shagun Kapil (2020) “COVID-19 lockdowns may be over but poor still go hungry”, Down to Earth, December 09 3. Reliefweb (2021) “The Inequality Virus: Bringing together a world torn apart by coronavirus through a fair, just and sustainable economy”, Jan 25 4. Esmé Berkhout, Nick Galasso, Max Lawson et al., “The Inequality Virus”, Oxfam, January 25, 2021 5. CNBC, “Taxes are likely to go up for the wealthy in these nine states”, SEP 25 2020 6. Washington state legislature Bill-HB 1406 – 2021-22 “Improving the equity of Washington state’s tax code by creating the Washington state wealth tax and taxing extraordinary financial intangible assets” 7.Americansfortaxfairness.org, “Washington Billionaires Got $151 Billion Richer Over First 10 Months of Pandemic, Their Collective Wealth Jumping Nearly One-Half”, February 2, 2021 8. “Finance Ministry Slams IRS Officers’ Proposal on Levying a COVID-19 Wealth Tax.” The Wire, 27 Apr. 2020, the wire.in/economy/finance-ministry-irs-officers-covid-19-wealth-tax.

यह लेख सर्वप्रथम दिल्ली से प्रकाशित वेबपोर्टल ‘जन ज्वार’ में उनके साप्ताहिक कॉलम नई दुनिया’ में प्रकाशित हुआ है।


नागरिकता संशोधन कानून पर सरकार ने कदम खींचा, संसद में दिया यह बयान

 ऐसे में जब देश भर में किसान आंदोलन की धमक पहुंच चुकी है, लगता है सरकार फिलहाल कोई दूसरा विवाद नहीं होने देना चाहती है। केंद्र की मोदी सरकार ने दो फरवरी को लोकसभा में कहा कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए), 2019 को लागू करने में और समय लगेगा। सरकार ने कहा है कि नियमों उपनियमों के निर्माण की तैयारी चल रही है। सरकार ने गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति को यह भी बताया कि उसने पूरे राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने के बारे में भी अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। यहाँ नोट करना चाहिए कि सीएए अधिनियम, 2019 को 12 दिसंबर, 2019 को अधिसूचित किया गया था और यह 10 जनवरी 2020 से लागू हुआ था। इस विवादित एक्ट के तहत नियम तैयार किए जा रहे हैं। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा को लिखित जवाब में कहा संबंधित नियमों को बनाने के लिए 9 अगस्त, 2021 तक का समय बढ़ा दिया है। बीते साल इस कानून के आते ही सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। आसाम राज्य का उदाहरण बताता है कि इस कानून से मुसलमानों की बजाय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों की नागरिकता एवं पहचान पर सबसे बुरा असर पड़ा है। इसीलिए बहुजन खेमे में यह धारणा बन चुकी है कि असल में यह कानून भारत के ओबीसी, दलितों एवं आदिवासियों सहित अल्पसंख्यकों के खिलाफ बनाया गया है। पिछले साल इस कानून के खिलाफ शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन पूरे देश में सुलग उठे थे। लॉकडाउन के कारण ये आंदोलन खत्म हो गए थे। लेकिन इस साल किसान आंदोलन ने सरकार को भारी चुनौती दी है जिसके कारण सरकार बैकफुट पर आ रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद इसी कारण सरकार की लोकप्रियता घट रही है और आगामी महीनों में विधानसाभा चुनावों के मद्देनजर सरकार नागरिकता संशोधन कानून को मुद्दा बनाकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती है।

फोटो क्रेडिट- नवभारत टाइम्स

किसान आंदोलन बना अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा, मोदी सरकार की भारी किरकिरी

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 किसान आंदोलन की खबरों को दबाने की सरकार एवं मनुवादी मीडिया की कोशिश को एक करारा झटका लगा है। भारत का किसान आंदोलन अब एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। किसान आंदोलन के मुद्दे पर ब्रिटेन की मशहूर पॉप स्टार रिहाना के ट्वीट के बाद यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। इसके अलावा ब्रिटेन के सिख सांसद तनमनजीत सिंह धेसी सहित अन्य मशहूर हस्तियों ने किसान आंदोलन के मुद्दे पर अपनी राय रखी हैं।

ब्रिटिश पॉप स्टार रिहाना ने अपने ट्विटर अकाउंट से अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी सीएनएन से किसान आंदोलन पर प्रकाशित हुई एक स्टोरी का लिंक शेयर किया है। लिंक शेयर करते हुए उन्होंने टिप्पणी की है “आख़िर हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?” इस ट्वीट के साथ उन्होंने हैशटैग #FarmersProtest भी लगाया है जिससे पूरी दुनिया में मौजूद रिहाना को फालो करने वाले उनके प्रशंसकों में भारत के किसान आंदोलन के बारे में जानने की होड़ लग गई है। आलम यह है कि रियाना के इस ट्वीट का भारी असर पड़ता दिख रहा है। ट्विटर पर रिहाना के 101 मिलियन फॉलोवर हैं।

 भारतीय किसान आंदोलन के नेताओं ने इस ट्वीट को लेकर खुशी जाहिर की है। किसान एकता मोर्चा (@Kisanektamorcha) ने अपने ट्विटर हैंडल से रिहाना को धन्यवाद करते हुए ट्वीट किया गया है। @Kisanektamorcha ने ट्वीट किया है “शुक्रिया रिहाना, किसानों के आंदोलन के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए। पूरी दुनिया देख पा रही है लेकिन सरकार क्यों नहीं देख पा रही?”

दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर पूरी दुनिया में नाम कमा चुकी ‘ग्रेटा थनबर्ग’ ने भी भारतीय किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए ट्वीट किया है। इससे साफ है कि अब दुनिया भर की नजर किसान आंदोलन पर है। और विदेशों तक में मोदी सरकार की किरकिरी शुरू हो गई है।

किसानों के मुद्दे पर राज्यसभा में संग्राम

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 राज्यसभा में किसानों के मुद्दे पर बुधवार संग्राम देखने को मिला। सदन की कार्यवाही शुरू होने के कुछ समय बाद ही आम आदमी पार्टी के तीन सांसदों को निलंबित कर दिया गया। आप के सांसद किसान आंदोलन के मुद्दे को उठाते हुए वेल में पहुंच गए। सभापति ने आप सांसदों के नारेबाजी व हंगामे को देखते हुए उन्हें निलंबित कर दिया। आप सांसदों को मार्शल के जरिये सदन से बाहर किया गया। तीनों सांसदों को सदन की कार्यवाही से दिनभर के लिए निलंबित किया गया।

 इससे पहले तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के आंदोलन के मुद्दे पर राज्यसभा की कार्यवाही को पांच मिनट के लिए स्थगित किया गया। कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर सभापति वेंकैया नायडू ने AAP के तीन सांसद संजय सिंह, सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को सदन से बाहर जाने नोटिस दिया। इसके बाद सहयोग ना मिलने पर तीनों सदस्यों को मार्शल बुलाकर सदन से बाहर किया गया। इस दौरान राज्यसभा अध्यक्ष वैंकैया नायडू के तेवर काफी सख्त रहें। उन्होंने आप सांसदों के रवैये को तानाशाही वाला बताया। इससे पहले कांग्रेस सांसद गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा ने किसान आंदोलन के मुद्दे को लेकर स्थगन की कार्यवाही स्थगित करने का नोटिस पेश किया। बसपा, सीपीआई, टीएमसी, डीएमके, सीपीआई-एम ने भी स्थगन प्रस्ताव रखा।

दक्षिण एशिया से आधी शताब्दी पीछे है अमेरिका

 20 जनवरी 2021, को कमला हैरिस ने अमेरिका की पहली महिला उप राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेकर एक प्रकार का इतिहास रचा। वो पहली अश्वेत, दक्षिण एशिया की महिला हैं जिन्हे यह सम्मान मिला है। यह अमेरिकियों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण हो सकता है। परन्तु अगर इस इतिहास का बारीकी से परीक्षण किया जाय तो यह अमेरिका के लोकतंत्र में इतना भी ऐतिहासिक क्षण नहीं है जितना अमेरिकी जश्न मना रहा है।संयुक्त राज्य अमेरिकादुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है। अगर हम यहाँ लोकतंत्र की शुरुआत 1788 से ही माने, जब अमेरिकी संविधान को राज्यों द्वारा अनुमोदित किया गया था तो हम पाएंगे की लोकतंत्र के 333 साल पुराने इतिहास में अमेरिका ने अभी तक एक भी महिला को राष्ट्र के सर्वोच्च पद के लिए नहीं चुना।

अमेरिका की इस सफलता को हम ज़्यादा बड़ा करके इसलिए भी नहीं आंक सकते क्योंकि दक्षिण एशिया की तुलना में अमेरिका की यह सफलता लगभग 60 साल बाद आई है। यहाँ यह याद रहे की दक्षिण एशिया के एक छोटे से उभरते हुए लोकतंत्र श्रीलंका (जिसे उस समय सिलौन कहा जाता था) में 1960 में एक महिला को राज्य के प्रमुख के रूप में शपथ दिलाई गई थी।

अमेरिका की तुलना में भारत को ही ले लें तो यहाँ भी 1966 अर्थात लगभग अर्ध-शताब्दी पहले एक महिला को राष्ट्र की चुनी हुई सरकार का लीडर बना दिया गया था। इतना ही नहीं दक्षिण एशिया के ही  पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी अमेरिका की तुलना में लगभग तीस वर्ष पहले 1988 और 1991 में  किसी महिला को देश के प्रमुखों के रूप में शपथ दिलाई गई थी। परन्तु आज भी अमेरिका के लोकतंत्र में देश के प्रमुख राष्ट्रपति के रूप में किसी महिला को शपथ नहीं दिलाई गयी है। इस आधार पर हम आसानी से कह सकते हैं कि विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र दक्षिण एशिया के लोकतांत्रिक देशों से कम से कम आधी शताब्दी पीछे है।

तथ्यात्मक दृष्टि एवं सटीक जानकारी के लिए दक्षिण एशिया में21 जुलाई 1960 को, सिरिमाओ भंडारनायके,  दुनिया की पहली महिला राष्ट्र प्रमुख बनीं। उन्होंने अपने देश पर तीन अलग-अलग अवसरों पर 17 साल तक शासन किया और इतिहास रचा। श्रीलंका के बाद भारत की इंदिरा गांधी जनवरी 1966 में सरकार की महिला प्रमुख बनी। उन्होंने भी 31 अक्टूबर 1984 को अपनी हत्या होने से पहले, विभिन्न अवसरों पर, लगभग 15 वर्षों तक देश पर शासन किया। इंदिरा गाँधी को अपने समय में अपने राजनैतिक दल पर पूरा अंकुश ही नहीं देश की राजनीति पर भी पूरा एकछत्र आधिपत्य था। क्या हम कमला हैरिस के बारे में ऐसा सोच सकते हैं।

दक्षिण एशिया में, पाकिस्तान में भी बेनजीर भुट्टो 2 दिसंबर 1988 को राज्य की प्रमुख बनीं। वास्तव में वे दुनिया के मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों में किसी भी राज्य की पहली महिला प्रमुख बनी जिन्होंने ऐसा कारनामा किया। वह 1993-1996 के दौरान दूसरी बार भी पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। दूसरी ओर, मुस्लिम वर्ल्ड में ही खालिदा जिया ने 20 मार्च 1991 को बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और 23 जून, 1996 को एक अन्य महिला, शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली दूसरी महिला बनीं। शेख हसीना वर्तमान समय में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाली बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं।

दक्षिण एशिया में राज्य की महिला प्रमुखों की विरासत को सिरिमाओ भंडारनायके की बेटी, चंद्रिका कुमारतुंगा ने आगे बढ़ाया, वो नवंबर 1995 में श्रीलंका की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं, लेकिन 1999 में उनकी हत्या के प्रयास के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी।यहां, भारत और नेपाल जैसे दक्षिण एशियाई देशों के प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित औपचारिक प्रमुखों के नामों का उल्लेख किया जाना भी समीचीन होगा।उदाहरण के लिए, प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने जुलाई 2007 में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में जबकि विद्या देवी भंडारी ने अक्टूबर 2015 में नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। क्या अमेरिका में अभी तक ऐसा संभव हुआ है? क्या अमेरिका में अश्वेत, लेटिनो, रेड इंडियन,  मुस्लिम और दक्षिण एशिया में दलित-आदिवासी, पासमंदा महिलाएँ सर्वोच्च पदों पर पहुँच सकती हैं?

अमेरिका और दक्षिण एशिया में महिलाओं का देश के सर्वोच्च पद पर चुने जाने के मध्य कुछ चुनौतियों को भी यहाँ रेकखांकित किया जाना सामाजिक आंदोलन एवं सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से आवश्यक है।एक ओर यदि अमेरिका को अपनी पहली महिला को राष्ट्र के सर्वोच्च पद के लिए निर्वाचित करने में सफल होना है, तो वहीं दूसरी ओर दक्षिण एशिया में एक आत्मनिर्भर महिला को देश के सर्वोच्च पद पर चुनाव में सफल होना बाकी है। यहां आत्मनिर्भर का तात्पर्य है बिना किसी भी राजनीतिक संरक्षण एवम् राजनैतिक परिवार की पृष्ठभूमि के।

हम जानते हैं कि दक्षिण एशिया में राष्ट्र की प्रमुख महिला के रूप मे चयनित महिलाओं ने अपने पिता या पति की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है। उदाहरण के तौर पर,1959 में सिरिमाओ भंडारनायके अपने पति स्व. आर. आर भंडारनायके की हत्या की सहानुभूति की लहर की सवारी करते हुए आईं। उसी कड़ी में 1981 में अपने पति की हत्या के बाद खालिदा जिया ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी को आगे बढ़ाया। इसी तरह, इंदिरा गांधी, बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना, सभी ने अपने पिता क्रमशः जवाहरलाल नेहरू, जुल्फिकार अली भुट्टो और शेख मुजीबुर रहमान, की विरासत को हीआगे बढ़ाया है। श्रीलंका में चंद्रिका कुमारतुंगा को तो माता और पिता दोनों की ही विरासत मिली।

समकालीन राजनीति, सामाजिक परिवर्तन, एवं सामाजिक आंदोलन के दृष्टिकोण से अगर हम अमेरिका और दक्षिण एशिया में महिलाओं के सर्वोच्च पद पर चयन का आंकलन करें तो हमे कुछ और विचारणीय बिंदु भी मिल जाएंगे। अमेरिका के सन्दर्भ में अभी पूर्ण रूप से अश्वेत एवंअश्वेत आंदोलन से- जैसे ब्लैक पैंथर्स से निकली हुई अश्वेत महिला का अमरीका की राजनीति में स्थापित होना बाकी है। कमला हैरिस उस अस्मिता का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

 यह सर्वविदित है कि पूरे अमेरिका के राष्ट्रपति में चुनावों में कमला हैरिस की माँ की दक्षिण एशियाई (भारतीय) और उनके पिता की जमैकन या आश्वेत छवि/ अस्मिता को ही उभार कर भारतीयों और एफ़्रो-अमेरिकन्स को डेमोक्रैटिक पार्टी की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया गया। परंतु अमेरिका में रह रहे  भारतीयों ने कमला हैरिस की माँ की तमिल ब्राह्मण अस्मिता से जोड़ कर अपने आप को नहीं देखा होगा ऐसा मानना अस्मिताओं के समाजशास्त्र के आधार पर सही नहीं होगा।अतः कही ना कहीं कमला हैरिस यद्यपि अमरीकी राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए तो दिखती हैं, परंतु वास्तविकता में वो बहिष्कृत, अश्वेत, ग़रीब आदि समजों का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

उसी प्रकार, श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों में जो भी महिला राजनैतिक पैदा हुई है वो भी उच्च वार्णीय/ वर्गीय समाज से ही संबंध रखती हैं। वो भी दलित, आदिवासी, पासमंदा समाज से नहीं आती। दक्षिण एशिया में, हमें यह विश्लेषण करना होगा कि क्या ये महिला नेता ने खुद दूसरी महिलाओं को अपने राजनीतिक दलों के प्रमुख रहते हुए प्रतिनिधित्व दिया था या दे रही हैं- जैसे- इंदिरा गाँधी, सिरिमाओ भंडारनायके,  बेनज़ीर भुट्टो, शेख हसीना, चंद्रिका कुमारतुंगा आदि। अगर नहीं तो हम इनका जश्न कैसे मना सकते हैं?

क्या विश्व का सबसे पुराना और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने-अपने देश की राजनीति के सार्वोच्च पदों पर बहिष्हकृत समाजों की महिलाओं को चयनित कर विश्व के अनेक देशों के लिए, विशेषकर दक्षिण एशिया के देशों के लिए, उदाहरण प्रस्तुत कर लोकतंत्र को और मजबूत करेगा? इंतजार रहेगा 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में।


तस्वीर साभार- पहली तस्वीर, गूगल, दूसरी तस्वीर- Photo Illustration by Minhaj Ahmed Rafi, वेबसाइट- Newsweek Pakistan, तीसरी तस्वीर- http://www.anindianmuslim.com

बीजेपी सरकार का नया बजट: बहुजन विरोधी बजट !

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 पुरानी कहावत है कि नाकाबिल औलादें काबिल बाप की संपत्ति को बढ़ाती नहीं बल्कि लुटाती हैं। आज की बीजेपी सरकार की नीतियाँ देखकर यह बात बहुत स्पष्ट होती जा रही है। हम देख पा रहे हैं कि आजादी के बाद बीते सत्तर सालों में जिन संस्थाओं, उद्योगों, सार्वजनिक परिसंपत्तियों आदि का निर्माण किया गया उसे बीजेपी सरकार एक एक करके निजी हाथों में बेच रही है। एक फरवरी को जारी आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सितारमण ने बहुत सारे सरकारी उपक्रमों एवं परिसंपत्तियों की हिस्सेदारी को निजी कंपनियों को बेचने (विनिवेशीकरण) की घोषणा की है। इस वित्त वर्ष में इस तरह से सरकारी संपत्ति निजी कंपनियों को बेचकर 2.1 लाख करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य रखा गया है।

वर्ष 2018-19 और 2019-20 के लिए यह लक्ष्य क्रमशः 80 हजार करोड़ एवं 1.05 लाख करोड़ रखा गया था। इस वर्ष के बजट में एलआईसी के शेयर्स को भी निजी हाथों में बेचने की योजना लागू की जानी है। इस बजट में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन एयर इंडिया, आईडीबीआई, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया, कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया, बीईएमएल और पवन हंस के निजीकरण कि योजना का घोषित की गई है। यहाँ ध्यान देना जरूरी होगा कि इन सार्वजनिक संस्थानों, विभागों में एवं औद्योगिक उपक्रमों में बड़ी संख्या में ओबीसी, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इनमें संविधान प्रदत्त आरक्षण का लाभ भी मिलता है जिससे भारत के करोड़ों गरीब बहुजनों को सही सामाजिक एवं आर्थिक प्रतिनिधित्व भी हासिल होता है। निजी कंपनियों के हाथों में जाने के बाद इन उद्योगों एवं संस्थानों आदि में बहुजनों को न तो आरक्षण का लाभ मिलेगा न ही श्रम कानूनों का कोई पालन होगा। इस प्रकार सरकार की मंशा निजीकरण द्वारा बहुजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को खत्म करने की है। इसी उद्देश्य से बीजेपी सरकार द्वारा निजीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है।

फोटो क्रेडिट- ऊपर की तस्वीर सोशल मीडिया से। तस्वीर सांकेतिक है

मोदी सरकार का नया बजट: विचित्र ‘चुनाव नीति’ और जनविरोधी ‘कबाड़ नीति’

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साल 2021-2022 के लिए आम बजट एक फरवरी को पेश हो गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट पेश करने के बाद से ही इसकी व्याख्या की जा रही है। बीजेपी सरकार द्वारा घोषित बजट में साफ नजर आ रहा है कि सरकार को पूरे भारत के आम नागरिकों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं की फिक्र नहीं है। ठीक से कहें तो यह एक यह एक ‘चुनावी बजट’ है। आने वाले चंद महीनों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल सहित पुद्दुचेरी में चुनाव होने वाले हैं। इन्हीं राज्यों के लिए इस बजट में कई सारे लोक-लुभावन प्रावधान किये गए हैं। इन प्रावधानों के जरिए इन राज्यों की जनता का मन मोहकर चुनाव जीतने की रणनीति बीजेपी सरकार के इस बजट में साफ नजर आ रही है। इन चुनावी राज्यों में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण या चाय बाग़ानों के श्रमिकों के कल्याण जैसी योजनाएं लाई जा रही हैं। अधिकांश आर्थिक एवं राजनीति विश्लेषक यह कह रहे हैं कि सिर्फ चुनावी राज्यों में निर्माण एवं कल्याण की योजनाओं की घोषणा करने का असल मकसद सिर्फ चुनाव जीतना है। इस प्रकार यह बजट आम जनता के फायदे के लिए नहीं बल्कि बीजेपी की चुनावी राजनीति के फायदे के लिए बनाया गया है। इस बजट में चार पहिया वाहनों के लिए एक नई और विचित्र कबाड़ नीति भी लाई जा रही है। इस नीति के अनुसार निजी चार पहिया वाहन 20 साल तक और व्यावसायिक वाहन 15 साल तक ही इस्तेमाल किये जा सकेंगे और इस अवधि के बाद इन्हे कबाड़ में शामिल करना होगा। असल में यह फैसला भी आम जनता की जेब पर बोझ डालकर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। नोटबंदी, जीएसटी एवं तालाबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में जो मंदी आई है उसे औटोमोबाइल उद्योग को इस तरह के नकली सहारा देकर ठीक करने की कोशिश की जा रही है।

जगदेव प्रसादः भागीदारी के सवाल को पुरजोर तरीके से उठाने वाले नायक

 भागीदारी की बात आज की नहीं है। इसका पूरा इतिहास है। आजाद भारत में पहली बार भागीदारी के सवाल पर बात संविधान की प्रस्तावना से शुरू हुई थी। उसके पहले अंग्रेजों ने सवाल उठाया था। मध्ययुग में रैदास ने उठाया(ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न, छोट-बड़े सब सम बसे, रैदास रहे प्रसन्न),इनके पहले बुद्ध के पास जा सकते हैं। उन्होंने भी समानता की बात की है। इस प्रकार बुद्ध पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भागीदारी की बात को उठाया था। आधुनिक काल में संविधान निर्माण करने वालों के मन में यह बात थी कि भारत में भागीदारी समान नहीं है। इसलिए उन्होंने संविधान में सामाजिक न्याय की बात की।

बुद्ध से चार्वाक, आजीवक, रैदास, फूले, शाहू आदि सब लोग लगातार भागीदारी का प्रश्न उठा रहे थे। इसी परंपरा को बाबा साहब आंबेडकर ने स्वीकार किया और अपने आंदोलन को आगे लेकर चले। इसी समय जगदेव प्रसाद (जन्म 2 फरवरी 1922- परिनिर्वाण- 5 सितंबर 1974) ने भी अपने दर्शन में इस परंपरा को समायोजित किया था।जगदेव बाबू को अलग करके देखने की जरूरत नहीं। वह इसी परंपरा का हिस्सा थे। वह 90 प्रतिशत की बात कर रहे थे। ‘दस का शासन 90 पर नहीं चलेगा’।’ जगदेव प्रसाद सहित हमारे सभी सामाजिक चिन्तक समस्या के मूल को समझ रहे थे। वह जान गए थे कि किसी भी देश की संरचना वहां के भूगोल और इतिहास के साथ जनमानस के सरोकरों से बनती है। भारत एक ऐसा देश है जहां जनमानस आपस में कई स्तरों पर विभाजित है। मसलन जाति-धर्म, ऊंच-नीच, छुआ-छूत, अमीर-गरीब आदि। यह विभाजन किसी की ‘जागीरदारी सोच’ को संरक्षण देता है तो किसी की ‘गुलामी और शोषण का कारण’ बनता है। इन कारणों की पड़ताल करने वालों की पहली पीढ़ी के व्यक्ति थे बाबू जगदेव प्रसाद। उनके पिता शिक्षक थे। परिवारिक स्तर बहुत उन्नत तो नहीं था, लेकिन शिक्षित होने के कारण हालात ठीक थे। अरवल के जिस कुर्था गांव (बिहार) में उनका जन्म हुआ था वहां सामंती मानसिकता वाले लोग उनके साथ जातिगत भेद-भाव करते थे। यह व्यवहार जगदेव प्रसाद को नागवार लगता था। जगदेव बाबू का परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था। आर्थिक आत्मनिर्भरता व्यक्ति को सबल बनाती है। सबलता से चेतना और स्वतंत्रता निर्मित होती है। जगदेव प्रसाद का ‘नई धोती पहनना’ और उस पर गांव के द्विज का सवाल उठाना, उनके जीवन को ही नहीं पूरे देश को दिशा दे गया। वह ऐसे चिंतक थे, जिसने बिना किसी पार्टी और स्वार्थ के मोह में फंसे शोषित समाज को एकजुट करने का प्रयास किया। उनका ‘विचार’ बहुजन की ‘नई पीढ़ी की वैचारिकी’ गढ़ रहा है। जगदेव प्रसाद अपने जीवन से सीख कर भ्रांतियों से बाहर निकले थे।उनके पिता जब बीमार पड़े तो डॉक्टर को दिखाने के बजाय उनकी तीमारदारी के लिए ‘देवी-देवताओं की उपासना’ की गई। लेकिन जब ‘देवता’ उनके पिता को नहीं बचा सके, तब आस्था और परंपरा के नाम पर होने वाले ढोंग से उनका भ्रम टूटा। तमाम पूजा-पाठ के बाद भी पिता नहीं रहे और उपरोहिता, पंडा आदि ने जगदेव प्रसाद को इसका दोषी बताया। उस मानसिकता के बारे में आप सोचिए जिसमें जगदेव प्रसाद के घर श्राद्ध के लिए आये पंडित ने यह आरोप लगाया था कि ‘जगदेव प्रसाद का कार्य है खेती-बारी करना और यह पढ़ाई कर रहा है।’ इसीलिए यह मौत हुई है। उस ब्राह्मण ने कहा था कि ‘जे अपन धरम छोड़ी ओकर यही हाल होई।’ जगदेव प्रसाद का यहां से जो मोहभंग हुआ, चेतना जगी, वही आज हमारे लिए चिंतन का केंद्र है। सत्ता और नेतृत्व का महत्व वह समझते थे। तभी पार्टी बनाकर सरकार बनाने तक पहुंचे।

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पिता की मृत्यु के बाद व्यवस्था से निराश जगदेव प्रसाद डॉ. रामस्वरूप वर्मा के ‘अर्जक संघ’ से जुड़ गए। अर्जक संघ से जुड़कर सांस्कृतिक जागरण का कार्य प्रारंभ किया। उनको समझ आ गया था कि अब सांस्कृतिक टकराहट राजनीतिक जागरूकता के साथ चलेगी। उन्होंने समझ लिया था कि समाज में बहुत ‘भेद-भाव’ है और इसकी परिकल्पना के पीछे ‘षडयंत्र’ है। उसको खत्म करने के लिए वह सक्रिय राजनीति में आये। यहां से उनके जीवन की धारा पूरी तरह बदल गई। अपने अनुभव से सीख लेकर सामाजिक न्याय को परिभाषित करते हुए वह कहते थे, ‘दस प्रतिशत शोषकों के जुल्म से छुटकारा दिलाकर नब्बे प्रतिशत शोषितों को नौकरशाही और ज़मीनी दौलत पर अधिकार दिलाना ही सामाजिक न्याय है।’ तभी उन्होंने जनता से आह्वान किया कि ‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।’ उनको पता था कि बदलाव की चाभी ‘मार्क्सवाद और समाजवाद में नहीं सत्ता के पास’ है। जबतक सत्ता में भागीदारी नहीं होगी, बदलाव नहीं आएगा।

व्यवस्था से टकराने के बाद जगदेव प्रसाद को यह समझ आ गया था कि सत्ता कुछ नहीं, बंदरबांट का ही दूसरा नाम है। पार्टी कोई भी हो, विचारधारा कोई भी हो, ज्यादातर कुछ लोगों के कब्जे में है और वही लोग उसका संचालन कर रहे हैं। मुखौटा अलग-अलग है, अंदर सब एक जैसे हैं। तभी उन्होंने ‘शोषित समाज दल’ नाम से अलग पार्टी बनाई। उस दौर में ‘समाजवाद और मार्क्सवाद का विचार समस्याओं के निदान का कैप्सूल’ बनाकर पेश किया जा रहा था। जगदेव प्रसाद शोषितों की समस्याओं का निदान समस्या की जड़ में जाकर करने के पक्ष में थे। उनका कहना था कि ‘आज का हिंदुस्तानी समाज साफ तौर पर दो भागों में बंटा हुआ है- दस प्रतिशत शोषक और नब्बे प्रतिशत शोषित। दस प्रतिशत शोषक बनाम नब्बे प्रतिशत शोषित की इज्जत और रोटी की लड़ाई हिंदुस्तान में समाजवाद या कम्यूनिज्म की असली लड़ाई है।’ उनकी नज़र में भारत का ‘असली वर्ग-संघर्ष’ यही था। उनके अनुसार इस ‘नग्न यथार्थ’ को नहीं मानने वाले ‘द्विज समाज के पोषक और जालफरेबी’ थे। आर्थिक असमानता और भागीदारी के अभाव को वह समझ गए थे। इस बात का खुलासा उन्होंने 31 जुलाई 1970 को अमरीकी अर्थशास्त्री एफ. टॉमसन को दिए साक्षात्कार में किया था। उन्होंने कहा था कि ‘अभी जो व्यवस्था है उसमें दलों का नहीं अपनी जातीय संरचना का समन्वय है। क्योंकि ‘समन्वय से शोषक को फायदा है’। लेकिन शोषित को समन्वय से नहीं ‘संघर्ष’ से फायदा होगा’। उन्होंने दो दलों की कार्यप्रणाली का उदाहरण देते हुए समझाया है कि किस तरह विभिन्न दलों और विचारधाराओं के नाम पर शोषितों को उलझाया जा रहा है और संविधान में किए गए प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह जो आपसी फूट है वह हमारी ताकत को संगठित नहीं होने देती। जगदेव प्रसाद अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे। वह जानते थे कि ‘हिंदुस्तान में आर्थिक गैरबराबरी के साथ सामाजिक गैरबराबरी भी है। सामाजिक गैबराबरी की लड़ाई इज्जत की लड़ाई है।उनका विश्वास था किसामाजिक क्रांति के बिना आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती।जब शोषितों के हाथ में सत्ता आएगी तब ‘आर्थिक गैरबराबरी’ खत्म होगी। हालांकि मंडल कमीशन के बाद उत्तरप्रदेश और बिहार में जिन दलों की सत्ता आयी, वह अर्जक और शोषित समाज के ही थे। उन लोगों ने भी काफी हद तक निराश ही किया। बहुजन व्यक्तियों द्वारा संचालित पार्टियों के दौर में भी ‘सत्ता का सुख और भोग’ उन लोगों ने ही किया, जिन पर सदियों से ‘शोषक’ होने का आरोप लगता रहा है।

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें जगदेव प्रसाद के विचार की उस जड़ को समझना जरूरी है जिसे वह 50 वर्ष पहले समझा रहे थे। सिर्फ समझा नहीं रहे थे, बल्कि उसे बिहार में अमल में ले आए थे। उनको साजिशन नहीं मारा गया होता तो संभव है कि आज की भारतीय राजनीति का परिदृश्य कुछ और होता। जब मुल्क आजाद हुआ तब यह उम्मीद लगाई गई थी कि ‘आजाद हिंदुस्तान में न कोई शोषित रहेगा और न कोई शोषक रहेगा और न कोई जुल्म बर्दाश्त करने वाला। बराबरी कायम होगी और हर इंसान को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।गैरबराबरी को देखते हुए बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘समता और समानता’ जैसे प्रावधान संविधान में करवाने की लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद भी भागीदारी नहीं मिली। कारण साफ है। जब आम चुनाव हुए और टिकट बंटवारे की बात आई तो उन्हीं ज़मींदारों/नवाबों को मौका दिया जो पहले शोषक थे। नतीजा यह हुआ कि पुरानी व्यवस्था आगे भी कायम रही।

 यहां Click कर दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए पश्चिम के देशों में जिस समानता की लड़ाई की शुरुआत हुई, वह अमीर-गरीब (बुर्जुआ-सर्वहारा) की लड़ाई थी। वहां सिर्फ अर्थ-भेद की समस्या थी। आर्थिक गैर बराबरी को ठीक करना था। भारत की स्थिति बिल्कुल अलग थी और है। यहां जाति प्रथा, ऊंच-नीच की भावना प्रबल है। अर्थात् ‘आर्थिक गैरबराबरी के साथ सामाजिक गैरबराबरी भी है। सामाजिक गैरबराबरी इज्जत की लड़ाई है। हमें विश्वास है, जबतक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तबतक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती।जगदेव बाबू का मानना था कि ‘जबतक शोषित समाज के हाथ में बागडोर नहीं आएगी तबतक आर्थिक गैरबराबरी नहीं मिटेगी।’ हिंदुस्तान का सर्वहारा हरिजन, आदिवासी, नीची जाति और पिछड़ी जाति के लोग हैं। यह आबादी में नब्बे प्रतिशत हैं। इनकी आजादी अभी तक नहीं आई है।

जगदेव प्रसाद का प्रयास इतने लंबे समय के बाद भी किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा तो इसका कारण यह है कि मान्यवर कांशी राम को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल (जातिवादी या बहुजन केंद्रित) इस भेद को नहीं समझ पाया। हालांकि कांशी राम का प्रयास भी उनके रहने तक ही था। उनके बाद के लोग ‘आत्म मुग्धता’ के कारण कांशी राम के विचारों को आगे नहीं बढ़ा सके। आगे न बढ़ा सकने के कारणों में एक प्रमुख कारण यह दिखता है कि शोषितों के बीच जो नेतृत्व उभरा उनमें मसीहा होने का बोध तो था लेकिन उस बोध को स्थायित्व देने वाला विचार बिल्कुल नहीं था। विचार होता तो लोगों को चेतना के सांचे में ढाला जा सकता था। स्वतंत्रता का बहुप्रतीक्षित इंतजार ख़त्म हो जाता, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। बहुजनों के नाम पर सत्ता पाने वाली पार्टियां भी कांग्रेस, वामपंथ और जनसंघ (अब बीजेपी) के ढर्रे को तोड़ नहीं सकीं। किसी न किसी रूप में वह भी पुरानी व्यवस्था का पोषक बनकर रह गईं। तमाम सुधारों के बाद भी सम्राट अशोक ने जिस व्यवस्था को सालों तक इस देश में चलाया, उसका आना अभी बाकी है। समाज में ‘वह चेतना ही नहीं आ सकी है जो शोषितों को स्वतंत्रता तक’ ले जा सके। हम बात इस उम्मीद के साथ कर रहे हैं कि वह आएगी।क्योंकि जबतक सबकी स्वतंत्रता नहीं आएगी, यह देश मुकम्मल राष्ट्र नहीं बनेगा।जब तक प्रतिनिधित्व नहीं होगा, कोई संस्था या राष्ट्र मुकम्मल नहीं होगा।प्रतिनिधित्व केवल संस्थानों में नहीं, उन सभी जगहों पर होना जरुरी है जहां से एक व्यक्ति में स्वतंत्रता का एहसास पैदा होता है। इनमें सत्ता, समानता, बंधुत्व, आर्थिक/सामाजिक गैरबराबरी आदि सब शामिल है। यही हमारे नायकों का सपना था।