5 फरवरी यानी हिंदू कोड बिल दिवस, इसी दिन भारतीय महिलाओं की मुक्ति की शुरूआत हुई

0
1263

 डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड़ बिल (5 फरवरी 1951) के माध्यम से महिलाओं की मुक्ति और समानता का रास्ता खोलने की कोशिश किया था। उन्होंने ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को पूरी तरह से तोड़ देने का कानूनी प्रावधान प्रस्तुत किया। इसके तहत उन्होंने यह प्रस्ताव किया था कि कोई भी बालिग लड़का-लड़की बिना अभिवावकों की अनुमति के आपसी सहमति से विवाह कर सकता है। इस बिल में लड़का-लड़की दोनों को समान माना गया था।
इस बिल का मानना था कि विवाह कोई जन्म भर का बंधन नहीं है, तलाक लेकर पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो सकते हैं। विवाह में जाति की कोई भूमिका नहीं होगी। कोई किसी भी जाति के लड़के या लड़की से शादी कर सकता है। शादी में जाति या अभिवावकों की अनुमति की कोई भूमिका नहीं होगी। शादी पूरी तरह से दो लोगों के बीच का निजी मामला है। इस बिल में डॉ. आंबेडकर ने लड़कियों को सम्पत्ति में भी अधिकार दिया था।

यहां Click कर दलित दस्तक पत्रिका की सदस्यता लें

इस बिल को विरोध मे तत्कालिन राष्ट्रपति राजेंन्द्र प्रसाद, संघ परिवार और उसके संगठन सभी एकजुट हो गए और कहने लेकिन कि इससे तो हिंदुओं की सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, हिंदू संस्कृति का विनाश हो जायेगा। हिंदू संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और विरोध शुरू हो गया। नेहरू भी पीछे हट गए। आखिर आंबेडकर ने निराश होकर विधि मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

 आंबेडकर का मानना है कि हिंदू महिलाओं की दासता, दोयम दर्जे की स्थिति और गरिमाहीन अपमानजनक जीवन के लिए ब्राह्मणवाद जिम्मेवार है। महिलाओं के प्रति हिंदुओं के नजरिये का सबसे गहन और व्यापक अध्ययन डॉ. आंबेडकर ने किया है। 24 वर्ष की उम्र में 1916 में अपना पहला निबंध ‘भारत में जातियां: उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ (कॉस्ट इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट) शीर्षक से कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया था। इस निबंध में उन्होंने यह स्थापित किया था कि जाति को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त यह है कि स्त्रियों की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण कायम किया जाय। इसके लिए जरूरी था कि स्त्रियों को पूरी तरह पुरूषों की अधीनता में रखा जाय। इस निबंध में आंबेडकर ने लिखा है कि सजातीय विवाह की व्यवस्था के बिना जाति की रक्षा नहीं की जा सकती है, इसीलिए जाति से बाहर विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया। विशेषकर प्रतिलोम विवाह के संदर्भ में।
 सती प्रथा, विधवा प्रथा और बाल विवाह जैसी क्रूर प्रथाओं के जन्म के पीछे भी मुख्य वजह जाति की शुद्धता की रक्षा थी। जो कोई भी भारत में स्त्रियों के दोयम दर्जे के स्थिति को समझा चाहता है, उसका प्रस्थान बिन्दु यही निबंध हो सकता है। आंबेडकर अपने इस निबंध में यह स्थापित करते हैं कि जाति और स्त्री पर पुरूष का प्रभुत्व एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। आगे चलकर आंबेडकर ने इस विषय पर एक मुकम्मिल किताब लिखी कि भारत में महिलाओं की दासता और दोयम दर्जे की स्थिति के लिए ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार है। उस किताब का नाम है- ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’। इस किताब विस्तार से आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी शास्त्रों को उद्धृत करके बताते हैं कि कैसे हिंदू धर्मशास्त्र स्त्रियों की दासता और गरिमाहीन अपमानजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें

इस किताब में आंबेडकर लिखते हैं कि “भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक ऐसा युग था,जिसमें स्त्रियां सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थीं।….जनक और सुलभा, याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी आदि के संवाद यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति से पहले के युग में स्त्रियां ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी थीं।”

मनु और अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने स्त्रियों की पूरी तरह मूक पशु में बदल दिया। मनु का आदेश है कि पुरूषों को अपने घर की सभी महिलाओं को स्त्रियों को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए-
अस्वतंत्रा: स्त्रिया : कार्या: पुरूषौ: स्वैर्दिवनिशम्।
विषयेषु च सज्ज्न्त्य: संस्थाप्यात्मनों वशे।। ( 9,2 )
तुलसी दास भी कहते हैं कि नारी स्वतंत्र होकर विगड जाती है- ‘जिमि स्वतंत्र होई,बिगरहि नारी”
मनु स्त्रियों से इस कदर अविश्वास करते हैं, घृणा करते हैं कि वे लिखते हैं – “पुरूषों में स्त्रिया न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती हैं। सुरूप हो या कुरूष, जैसा भी पुरूष मिल जाय, उसी के साथ भोगरत हो जाती हैं” (मनु, 9,14 )।

यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। राम सीता के चरित्र पर विश्वास नहीं करते हैं और सीता से कहते हैं कि रावण ने अवश्य ही तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाय होगा (इसके विस्तार के लिए बाल्मिकि रामायण का उत्तरकांड देख लें।)

‘हिंदू नारी उत्थान और पतन शीर्षक’ अपनी इसी किताब में आंबेडकर यह भी प्रमाणों के साथ स्थापित करते हैं कि बौद्ध धम्म मे स्त्रियों को समानता का अधिकार प्राप्त था। इसके लिए वे थेरी गाथों का उद्धरण देते है और अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
1916 के अपने पहले निबंध से लेकर हिंदू कोड बिल पेश करते समय तक डॉ. आबेडकर, महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे। उनका यह मानना पूरी तरह सही था कि जैसे जाति के विनाश के साथ ही स्त्री मुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ होता है और इसके लिए ब्राह्मणवाद से पूरी तरह से मुक्ति अनिवार्य है। जाति और स्त्री की मुक्ति का प्रश्न एक दूसरे से जुड़ा है, यह सीख डॉ. आंबेडकर को अपने गुरू जाोतराव फुले से भी मिली थी।

दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिए
ध्यान रहे, इस कानून का व्यवहार में सर्वाधिक फ़ायदा सवर्ण महिलाओं को मिलना था, और मिला। भले ही उन्हें उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में अम्बेडकर के योगदान का कोई अहसास न हो। वर्तमान समय में बहुत सारी महिला अध्येता फुले और आंबेडकर के विचारों के आलोक में भारतीय पितृसत्ता को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहने लगी हैं। इनमें उमा चक्रवर्ती और शर्मिला रेगे ( अब नहीं रहीं) जैसी अध्येता शामिल हैं। इस विषय पर शर्मिला रेेगे की किताब ‘मनु का पागलपन’ ( मैडनेस ऑफ मनु ) जरूर ही पढ़ना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.