मोहम्मद अज़ीज को रवीश कुमार की श्रद्धांजलि

गानों की दुनिया का अज़ीम सितारा था,मोहम्मद अज़ीज़ प्यारा था. काम की व्यस्तता के बीच हमारे अज़ीज़ मोहम्मद अज़ीज़ दुनिया को विदा कर गए. मोहम्मद रफ़ी के क़रीब इनकी आवाज़ पहचानी गई लेकिन अज़ीज़ का अपना मक़ाम रहा. अज़ीज़ अपने वर्तमान में रफ़ी साहब के अतीत को जीते रहे या जीते हुए देखे गए. यह अज़ीज़ के साथ नाइंसाफ़ी हुई. मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ बंद गले की थी मगर बंद गली से निकलते हुए जब चौराहे पर पहुँचती थी तब सुनने वाला भी खुल जाता है. एक बंद गिरह के खुल जाने की आवाज़ थी मोहम्मद अज़ीज़ की. यहीं पर मोहम्मद अज़ीज़ महफ़िलों से निकल कर मोहल्लों के गायक हो जाते थे. अज़ीज़ अज़ीमतर हो जाते थे.

एक उदास और ख़ाली दौर में अज़ीज़ की आवाज़ सावन की तरह थी. सुनने वालों ने उनकी आवाज़ को गले तो लगाया मगर अज़ीज़ को उसका श्रेय नहीं दिया. अपनी लोकप्रियता के शिखर पर भी वो गायक बड़ा गायक नहीं माना गया जबकि उनके गाने की शास्त्रीयता कमाल की थी. अज़ीज़ गा नहीं सकने वालों के गायक थे. उनकी नक़ल करने वाले आपको कहीं भी मिल जाएँगे. उनकी आवाज़ दूर से आती लगती है. जैसे बहुत दूर से चली आ रही कोई आवाज़ क़रीब आती जा रही हो. कई बार वे क़रीब से दूर ले जाते थे.

फिल्म ‘सिंदूर’ के गाने में लता गा रही हैं. पतझड़ सावन बसंत बहार. पाँचवा मौसम प्यार का, इंतज़ार का. कोयल कूके बुलबुल गाए हर इक मौसम आए जाए. गाना एकतरफ़ा चला जा रहा है. तभी अज़ीज़ साहब इस पंक्ति के साथ गाने में प्रवेश करते हैं. ‘ लेकिन प्यार का मौसम आए. सारे जीवन में एक बार एक बार.’ अज़ीज़ के आते ही गाना दमदार हो जाता है. जोश आ जाता है. गाने में सावन आ जाता है.

चौंसठ साल की ज़िंदगी में बीस हज़ार गाने गा कर गए हैं. उनके कई गानों पर फ़िदा रहा हूँ. ‘मरते दम तक’ का गाना भी पसंद आता है. छोड़ेंगे न हम न तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक. सुभाष घई की फ़िल्म ‘राम लखन’ का गाना ‘माई नेम इज़ लखन’ उस दौर को दमदार बनाया गया था. इस गाने ने अनिल कपूर को घर-घर का दुलारा बना दिया. मोहम्मद अज़ीज़ अनिल कपूर में ढल गए थे. यह उनके श्रेष्ठतम गानों में से एक था.

मोहम्मद अज़ीज़ को काग़ज़ पर सामान्य गीत ही मिले लेकिन उन्होंने अपने सुरों से उसे ख़ास बना दिया. और जब ख़ास गीत मिले उसे आसमान पर पहुँचा दिया. महेश भट्ट की फिल्म ‘नाम’ का गाना याद आ रहा है. ये आँसू ये जज़्बात, तुम बेचते हो ग़रीबों के हालात बेचते हो अमीरों की शाम ग़रीबों के नाम. मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ ही उस वक़्त के भारत के कुलीन तबक़े को चुनौती दे सकती थी. बहुत ख़ूब दी भी . उनकी आवाज़ की वतनपरस्ती अतुलनीय है. आप कोई भी चुनावी रैली बता दीजिए जिसमें ‘कर्मा’ फ़िल्म का गाना न बजता हो. रैलियों का समां ही बँधता है मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ से.’ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हमवतन हमनाम हैं, जो करें इनको जुदा मज़हब नहीं, इल्ज़ाम है. हम जिएंगे और मरेंगे, ऐ वतन तेरे लिए दिल दिया है, जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए .’

हमने हिन्दी प्रदेशों की सड़कों पर रात-बिरात यहाँ वहाँ से निकलते हुए अपनी कार में मोहम्मद अज़ीज़ को ख़ूब सुना है. उनके गानों से हल्का होते हुए गाँवों को देखा है, क़स्बों को देखा है. तेज़ी से गुज़रते ट्रक से जब भी अज़ीज़ की आवाज़ आई, रगों में सनसनी फैल गई. अज़ीज़ के गाने ट्रक वालों के हमसफ़र रहे. ढाबों में उनका गाना सुनते हुए एक कप चाय और पी ली. उनका गाया हुआ बिगाड़ कर गाने में भी मज़ा आता था. फिल्में फ्लाप हो जाती थीं मगर अज़ीज़ के गाने हिट हो जाते थे.

विनोद खन्ना अभिनीत ‘सूर्या’ का गाना सुनकर लगता है कि कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो है. इस गाने को सुनते हुए अक्सर लगता रहा कि तमाम तकलीफ़ों को मिटाने ‘सूर्या’ आ रहा है. सूर्या के आते ही सब ठीक हो जाएगा. नाइंसाफ़ी से लड़ते रहना है. सुबह होगी. बाद की पढ़ाई ने समझा दिया कि मसीहा कभी नहीं आता. किसी एक के आने से सब ठीक नहीं होता है. यह सच है कि मैंने ‘सूर्या’ के इस गाने को असंख्य बार सुना है. सोचता रहता हूँ कि मुंबई के गीत लिखने वालों ने कितनी ख़ूबी से ऐसे गाने पब्लिक स्पेस में अमर कर दिए. इस गाने को आप किसी किसान रैली में बजा दीजिए, फिर असर देखिए.

जो हल चलाए, उसकी जमीं हो ये फ़ैसला हो,आज और यहीं हो अब तक हुआ है,पर अब न होगा मेहनत कहीं हो, दौलत कहीं हो ये हुक्म दुनिया के नाम लेकर आएगा सूर्या एक नई सुबह का पैग़ाम लेकर आएगा सूर्या आसमां का धरती को सलाम लेकर आएगा सूर्या

अज़ीज़ साहब हम आपके क़र्ज़दार हैं. आपके गानों ने मुझे नए ख़्वाब दिए हैं. लोग कहते थे कि आपकी आवाज़ लोकल है. शुक्रिया आपके कारण मैं लोकल बना रहा. मुझे इस देश के गाँव और क़स्बे आपकी आवाज़ के जैसे लगते हैं. दूर से क़रीब आते हुए और क़रीब से दूर जाते हुए. हिन्दी फ़िल्मों के गाने न होते तो मेरी रगों में ख़ून नहीं दौड़ता. आपने कई चाट गानों को सुनने लायक बनाया. कई गानो को नहीं सुने जा सकने लायक भी गाया. राम अवतार का एक गाना झेला नहीं जाता है. ‘फूल और अंगारे’ का गाना आज भी सुनकर हँसता हूँ और आपको सराहता हूँ.

तुम पियो तो गंगाजल है ये हम पीये तो है ये शराब पानी जैसा है हमारा ख़ून और तुम्हारा ख़ून है गुलाब सब ख़्याल है सब फ़रेब है अपनी सुबह न शाम है तुम अमीर हो ख़ुशनसीब हो मैं ग़रीब हूँ बदनसीब हूँ पी पी के अपने ज़ख़्म सीने दो मुझको पीना है पीने दो मुझको जीना है जीने दो

मोहम्मद अज़ीज़ मेरे गायक हैं. रफ़ी के वारिस हैं मगर रफ़ी की नक़ल नहीं हैं. हालांकि उनमें रफ़ी की ऊँचाई भी थी लेकिन वे उन अनाम लोगों की ख़ातिर नीचे भी आते थे जिनकी कोई आवाज़ नहीं थी. अज़ीज़ के कई गानों में अमीरी और ग़रीबी का अंतर दिखेगा. हम समझते हैं कि गायक को गाने संयोग से ही मिलते हैं फिर भी अज़ीज़ उनके गायक बन गए जिन्हें कहना नहीं आया. जो आवाज़ के ग़रीब थे. जिन्हें लोगों ने नहीं सुना. उन्हें अज़ीज़ का इंतज़ार था और अज़ीज़ मिला. आपने हिन्दी फ़िल्मों के गानों का विस्तार किया है. नए श्रोता बनाए. आप चले गए. मगर आप जा नहीं सकेंगे. लोग मर्द टांगे वाला गाते रहेंगे, इसलिए कि इस गाने को कोई कैसे गा सकता है. ‘आख़िर क्यों’ का गाना कैसे भूल सकता हूँ. यह गाना आपको रफी बनाता है.

एक अंधेरा लाख सितारे एक निराशा लाख सहारे सबसे बड़ी सौग़ात है जीवन नादां है जो जीवन से हारे बीते हुए कल की ख़ातिर तू आने वाला कल मत खोना जाने कौन कहाँ से आकर राहें तेरी फिर से सँवारे

अज़ीज़ की बनाई रविशों पर चलते हुए हम तब भी गुनगुनाया करेंगे जब आप मेरे सफ़र में नहीं होंगे. जब भी हम अस्सी और नब्बे के दशक को याद करेंगे, अज़ीज़ साहब आपको गुनगुनाएँगे. आपका ही तो गाना है. ‘देश बदलते हैं वेष बदलते नहीं दिल बदलते नहीं दिल, हम बंज़ारे.’ हम बंज़ारों के अज़ीज़ को आख़िरी सलाम.

रवीश कुमार देश के जाने-माने टीवी पत्रकार हैं.

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1857 क्रांति के सूत्रधार थे मातादीन वाल्मीकि

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1857 की क्रांति को घोषित तौर पर पहला स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध माना जाता है. भारतीय इतिहासकारों द्वारा इस पूरी क्रांति का श्रेय मंगल पांडे को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस क्रांति के सूत्रधार मातादीन भंगी थे. माना जाता है कि मातादीन भंगी मूलतः मेरठ के रहने वाले थे. लेकिन रोजी-रोटी के लिए इनके पूर्वजों ने यूपी के कई शहरों की खाक छानी और एक समय बंगाल में जाकर बस गए. उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे पढ़-लिख नहीं पाए थे, क्योंकि हिन्दू धर्म व्यवस्था एक भंगी को पढ़ने का अधिकार नहीं देती थी. हालांकि मातादीन के पुरखे शुरू से ही अंग्रेजों के संपर्क में आने से सरकारी नौकरी में रहे थे. अतः शीघ्र ही मातीदीन को भी बैरकपुर फैक्ट्री में खलासी की नौकरी मिल गई. यहां अंग्रेज सेना के सिपाहियों के लिए कारतूस बनाए जाते थे. अंग्रेजी फौज के निकट रहने के कारण मातादीन के जीवन पर उसका खासा असर पड़ा था. अनुशासन, संयम, स्वाभिमान, स्पष्टवादिता आदि गुण उन्होंने सैनिकों की संगत से ही पाए थे.

मातादीन को पहलवानी का भी शौक था. वह इस मल्लयुद्ध कला में दक्षता हासिल करना चाहते थे, लेकिन अछूत होने के कारण किसी भी हिन्दू उस्ताद ने उन्हें अपना शागिर्द नहीं बनाया. वह हर हिन्दू उस्ताद के अखाड़े में मल्लयुद्ध की कला सीखने के लिए जाते लेकिन वहां से उन्हें निराश लौटना पड़ता था. वहां उनसे वही सलूक किया जाता जो एक वक्त में द्रोणाचार्य के आश्रम में आदिवासी वीर तीरंदाज एकलव्य के साथ हुआ था. लेकिन कहते हैं कि जहां चाह होती है वहां राह भी निकल ही आती है. आखिरकार मातादीन की मल्लयुद्ध सीखने की इच्छा पूरी हुई और एक मुसलमान खलीफा इस्लाउद्दीन जो पल्टन नंबर 70 में बैंड बजाते थे, मातादीन को मल्लयुद्ध सिखाने के लिए राजी हो गए. अपनी लगन की बदौलत मातादीन ने उस्ताद इस्लाउद्दीन से मल्लयुद्ध के सभी गुर सीख लिए थे. अब वह एक कुशल मल्लयुद्ध योद्धा बन चुके थे. इस कला की वजह से ही अब लोग उन्हें पहचानने लगे थे.

इसी मल्लयुद्ध कला की बदौलत ही मातादीन की दोस्ती मंगल पाण्डे से हुई थी. मंगल पाण्डे स्वयं भी मल्लयुद्ध के शौकीन थे. एक कुश्ती प्रतियोगिता में मंगल पाण्डे मातादीन का सुदृढ़ शरीर और कुश्ती का बेहतरीन प्रदर्शन देख कर गदगद हो गए. इस्लाउद्दीन के अखाड़े और मातादीन के नाम की वजह से मंगल पाण्डे ने उसकी छवि एक मुस्लिम पहलवान की बना ली थी. मातादीन को यह भनक लग चुकी थी कि मंगल पांडे उन्हें मुसलमान समझ रहा है, सो सीधी बात कहने के आदि मातादीन ने मंगल पाण्डे को अपनी जाति भी बता दी. इसके बाद मातादीन के प्रति मंगल पांडे का व्यवहार बदल गया था.

एक दिन गर्मी से तर-बतर, थके-मांदे, प्यासे मातादीन ने मंगल पाण्डे से पानी का लोटा मांगा. मंगल पाण्डे ने इसे एक अछूत का दुस्साहस समझते हुए कहा, ‘अरे भंगी, मेरा लोटा छूकर अपवित्र करेगा क्या?’ प्रतिउत्तर में मातादीन ने मंगल पांडे को ललकार दिया और कहा कि पंडत, तुम्हारी पंडिताई उस समय कहा चली जाती है जब तुम और तुम्हारे जैसे चुटियाधारी गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से काटकर बंदूकों में भरते हो.’ मातादीन की ये बातें मंगल पाण्डे तक ही सीमित नहीं रही बल्कि एक बटालियन से दूसरी बटालियन, एक छावनी से दूसरी छावनी तक फैलती चली गई. इन्हीं शब्दों ने सेना में विद्रोह की स्थिति बना दी. 1 मार्च, 1857 को मंगल पाण्डे परेड मैदान में लाईन से निकल बाहर आया और एक अधिकारी को गाली मार दी. इसके बाद विद्रोह बढ़ता चला गया. मंगल पाण्डे को फांसी पर लटका दिया गया. जो गिरफ्तार हुए उनमें मातादीन प्रमुख थे. मातादीन को भी अंग्रेज ऑफिसर ने फांसी पर लटका दिया.

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अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है

कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए, बनवास भेजे गए, लौट कर आए तो वहां राज भी किया, उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया, जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है, जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं. जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है. जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है. जहां भरत रहे वहां मंदिर है. हनुमान मंदिर है. कोप भवन है. सुमित्रा मंदिर है. दशरथ भवन है. ऐसे बीसीयों मंदिर हैं. और इन सबकी उम्र 400-500 साल है. यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा.

अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है. उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया! कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे. शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी. दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी. निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी, सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद! अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे. लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई. तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को. बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे मांग के खाइबो मसीत में सोइबो. और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली. राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा! कहीं लिखा क्यों नहीं!

अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं. मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं. उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर.. राम पर चढ़ते रहे. मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं. ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे. सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा. 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे. जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?

अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है. उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता. सब आते हैं. एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया. क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है! जाने कौन.

छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया. वहां ताले पड़ गए. आरती बंद हो गई. लोगों का आना जाना बंद हो गया. बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते होंगे कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया?

अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी

– सोशल मीडिया पर घूम रहा यह लेख साभार

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महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस: ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता है

ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमे एक से दूसरे पायदान तक विक्सित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं. ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं.

अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के उठाये कदमों को एकसाथ रखकर देखें. दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है. समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है. और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं.

ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीती निवारण –इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था. न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था. और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी. क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं.

इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है. ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है. इसलिए नही कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँती पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा.

ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा. जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं. नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं. फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है.

आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है.

इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है. इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है.

यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है. जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया. ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी. यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है.

इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है.ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है.एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना इस प्रष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है। Sanjay Shraman Jothe

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ऊना दलित पीड़ितों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख मांगी इच्छा मृत्यु

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ऊना मामले के एक दलित पीड़ित ने मंगलवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खत लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की है. पीड़ित ने कहा कि गुजरात सरकार ने उनसे किया कोई भी वादा पूरा नहीं किया है. उन्होंने कहा कि उनमें से एक 7 दिसंबर से दिल्ली में आमरण उपवास करेगा.

अपने परिवार की ओर से लिखते हुए वशराम सरवइया (28) ने लिखा है कि उस वक्त मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल द्वारा किए किसी भी वादे को गुजरात सरकार ने पूरा नहीं किया है. “उन्होंने कहा था कि हर एक पीड़ित को 5 एकड़ भूमि दी जाएगी, पीड़ितों को उनकी योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरी दी जाएगी और मोटा सामढियाला को एक विकसित गांव में बदल दिया जाएगा. घटना हुए दो साल और चार महीने हो गए लेकिन सरकार ने अपना कोई भी वादा पूरा नहीं किया और न ही वादे पूरा करने की कोई कोशिश की.”

वशराम, उनके छोटे भाई, पिता और मां उन्हीं 8 दलितों में शामिल थे जिन्हें गौ रक्षकों ने गिर सोमनाथ जिले के ऊना तालुका के मोटा सामढियाला गांव में 11 जुलाई, 2016 को पीटा था. हमलावरों ने इस परिवार पर गौ हत्या करने का आरोप लगाया था. लेकिन बाद में पुलिस की जांच में पता चला कि वह मरे हुए जानवरों के शवों से चमड़ा निकालने का काम करते हैं. उनके साथ मारपीट की वीडियो पूरे देश में वायरल हो गई थी. जिसके बाद राज्य में दलितों ने विरोध प्रदर्शन भी किया. वशराम का कहना है कि ये उनका पैतृक व्यवसाय है.

वशराम ने लिखा है, “हम पशुओं की खाल बेचने का काम करते थे और उसे छोड़ने के बाद आजीविका के लिए कुछ नहीं बचा. यह संभव है कि भविष्य में हम भूख से मर जाएं. हम अपने मामले को बोलकर और लिखकर कई बार पेश कर चुके हैं लेकिन गुजरात सरकार ने हमारी किसी भी परेशानी की ओर कोई ध्यान नहीं दिया.” उनका कहना है कि उन्हें और बाकी पीड़ितों को बहुत दुख है कि सरकार ने दलितों के खिलाफ दर्ज 74 मामलों को वापस नहीं लिया. ये मामले घटना के बाद राज्य में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान दर्ज हुए थे. उन्होंने खत में लिखा है, “पुलिस ने आंदोलन के दौरान दलितों के खिलाफ कई झूठे मामले दायर किए थे.” 10वीं तक पढ़े लिखे वशराम का कहाना है कि वो और उनका परिवार अब अपना जीवन खत्म करना चाहते हैं. उन्हें सरकार की ओर से कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई है. गवाहों को कोर्ट तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पुलिस ने कुछ नहीं किया और आरोपियों को भी बेल मिल गई.

उन्होंने खत में आगे लिखा है, “सरकार हमारी मांगों को पूरा करने में नाकाम रही है. हम बहुत दुखी हैं. हम अब आगे जीना नहीं चाहते इसलिए हम इच्छा मृत्यु की इजाजत मांग रहे हैं.”

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‘इनेलो-बसपा गठबंधन चट्टान की तरह मजबूत’

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इसराना। बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारती ने कहा कि भाजपा की सरकार झूठे वायदों के सहारे सत्ता में आई थी. प्रदेश की जनता भाजपा के झूठ को समझ चुकी है. प्रदेश में बसपा और इनेलो का गठबंधन चट्टान की तरह मजबूती से खड़ा है. गठबंधन का एक ही नारा है. किसान का बेटा सीएम और गरीब की बेटी देश की पीएम बनेगी. प्रकाश भारती नौल्था में बसपा कार्यालय के उद्‌घाटन व ज्वॉइनिंग कार्यक्रम पर आयोजित जनसभा को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान रेलवे में कार्यरत रामचंद्र अलाड़िया अपने हजारों समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हो गए. इस मौके पर गुरमुख सिंह, प्रदेश सचिव रामकुमार वाल्मीकि, जिला अध्यक्ष सतबीर पांचाल, सुनीता सभरवाल, इनेलो युवा जिला अध्यक्ष नवीन नैन, लखपत रोड़, जसमेर लोचभ, आजाद नौल्था, कुमारी अनीता व ललित कुमार उपस्थित रहे.

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गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में बापसा ने लहराया परचम

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गांधीनगर। गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर के स्टूडेंट कौंसिल चुनाव में बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन (BAPSA) के प्रत्याशी बिरेंद्री ने स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज से भारी मतों से अपनी जीत दर्ज की है. बता दें कि यह चुनाव विश्वविद्यालय में इस बार सिर्फ तीन स्कूल में कराया गया बाकि के स्कूलों में डीन द्वारा नॉमिनेटेड कैंडिडेट आते हैं. इसमें स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज सबसे अहम् माना जाता है. ऐसे समय में अगर बिरसा, आंबेडकर और फुले जैसे विचारधारा वाला संघठन जीते तो और भी दिलचस्प हो जाता हैं. बिरेंदी ने कुल 80 वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पल्लवी दास (21वोट) और एक स्वतंत्र उम्मीदार रजनी (21 वोट) को करारी शिकस्त दी हैं.

बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन के सदस्यों का कहना है कि यह उनका पहला छात्र संगठन चुनाव हैं जब उनके कोई उम्मीदार इस चुनाव में हिस्सा लिया और इतने ज्यादा वोटों से जीते. उन्होंने बताया कि इस चुनाव में उनको लेफ्ट (LDSF) संगठन ने फासीवादी ताकतों को शिक्षण संस्थानों में रोकने तथा यूनिवर्सिटी में प्रजातंत्र स्थापित करने में सहयोग देने के लिए अपना समर्थन दिया. उन्होंने बताया कि यह जीत संविधान को मानने वालों की जीत हैं.

बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन के अध्यक्ष हवालदार भारती ने बताया कि बापसा इस विश्वविद्यालय में 15 नवंबर 2017 को ठीक एक साल पहले स्थापित हुआ और आज उन तमाम सामाजिक न्याय पसंद छात्रों की आवाज बनकर काम कर रही हैं. भारती ने बताया कि यह सिर्फ बापसा की जीत नहीं हैं यह जीत बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर, शाहूजी महाराज, ज्योतिबाफुले, माता सावित्रीबाई फुले, फ़ातिमा शेख़, पेरियार, गुरु घासीदास और कबीरदास जैसे उन तमाम बहुजन नायकों की विचारधारा की जीत हैं जिन्होंने भारतभूमि पर सामाजिक न्याय के लिए अपने जीवन के अंतिम समय तक कार्य कियें.

इस चुनाव में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ से एक और बहुजन छात्र लक्ष्मण चेट्टी ने भीं अपने स्वतंत्र उम्मीदारी से चुनाव जीत लिया. वहीं स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज़ लिटरेचर एंड कल्चरल स्टडीज से भी एक स्वतंत्र उम्मीदवार मनोहर कुमार ने अपनी जीत दर्ज की.

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26/11 मुंबई हमलों की मुख्य गवाह देविका का दर्द

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मुंबई। मुंबई में 18 जवानों और 166 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब तो फांसी पर टंग गया, मगर जाते-जाते उसने बांद्रा के गर्वमेंट कॉलोनी में रहने वाली 19 वर्षीय देविका रोटवानी की जिंदगी को बदल कर रख दी. देविका ही वह मुख्य गवाह हैं, जिनकी गवाही को अदालत ने मान्य किया और कसाब को फांसी की सजा सुनाई.

2006 में मां को खो चुकी देविका तब मात्र नौ साल की थी, जब उसने कसाब को आंखों के सामने सीएसटी स्टेशन पर खून की होली खेलते हुए देखा था. देविका बताती हैं, ‘आंतकी कसाब ने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी है. दुनिया हमें कसाब की बेटी तक कहने लगी, जो मुझे बहुत बुरा लगता है.’

देविका बताती हैं, ‘उस शाम मैं अपने पिता नटवरलाल रोटवानी और छोटे भाई जयेश के साथ बड़े भाई भरत से पुणे मिलने जा रही थी. हमलोग सीएसटी के प्लैटफॉर्म 12 पर खड़े होकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. अचानक लोगों के चीखने, चिल्लाने और भागो-भागो की आवाजें आने लगीं. बीच-बीच में गोलियों की तेज आवाजें और धमाके सुनाई देने लगे. पिता ने मेरा हाथ पकड़ा और भीड़ के साथ भागने की कोशिश करने लगे. मगर अचानक मुझे गोली लगी और मैं वहीं गिर पड़ी.

वह कहती हैं, ‘जब आंखें खुलीं, सामने एक व्यक्ति को हंसते हुए लोगों पर गोलियां चलाते हुए देखा. वह कसाब था, जो अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था. कुछ देर बाद मैं फिर बेहोश हो गई और होश आने पर खुद को पहले कामा और बाद में जेजे अस्पताल में पाया. सौभाग्य से पिता और भाई को गोली नहीं लगी थी. मगर, जेजे अस्पताल में ढाई महीने तक चले इलाज के दौरान मेरे साथ-साथ दूसरे जख्मियों के ड्रेसिंग बदलने के चक्कर में भाई बीमार हो गया. उसके गले में संक्रमण हो गया, जबकि मेरे पैरों की छह बार सर्जरी करानी पड़ी. थोड़ा सामान्य होने पर हमलोग मुंबई से राजस्थान चले गए.’

बकौल देविका, ‘अचानक एक दिन मुंबई पुलिस का फोन आया कि आप कसाब के खिलाफ अदालत में गवाही देंगी? पहले तो उस आतंकी का खौफनाक चेहरा आंखों के सामने आते ही मैं सहम गई, मगर उसकी बर्बरता और खूंखार हंसी से लबरेज गोलीबारी ने हौसला बढ़ा दिया. मैंने गवाही देने के लिए हामी भर दीं. वैसाखी के सहारे में अदालत में पहुंची, जहां मेरे सामने तीन लोगों को पहचान के लिए लाया गया. उनमें से एक कसाब भी था. मैं जज के सामने उसको पहचान गई. दिल तो किया की वैसाखी उठाकर उस पर हमला कर दूं, मगर चाहकर भी कर नहीं पाई.’

कसाब पर गवाही देने के बाद देविका का जीवन बदल गया. वह कहती हैं, ‘कसाब की पहचान लिए जाने की बातें जब मीडिया से होते हुए रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक पहुंचीं, तो सब का रवैया बदल गया. मेवे के कारोबारी पिता को होलसेलरों ने माल (मेवा) देना बंद कर दिया. स्कूल वालों में मेरा नाम काट दिया. पड़ोसियों ने दूरी बना ली. कर्जा देने को कोई तैयार नहीं था. लोगों को डर था कि कहीं आंतकवादी उनके घरों, दुकानों या रिश्तेदारों पर हमला न कर दें. मेरी हालत गुनहगार जैसी हो गई, मगर पिता और भाई ने मेरा हौसला बढ़ाए रखा, क्योंकि मैं देश के लिए काम कर रही थीं. एक एनजीओ की मदद से सातवीं में दाखिला मिल गया.’

देविका बताती हैं कि कारोबार बंद होने से आर्थिक तंगी आ गई. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को ट्वीट कर स्थिति बताई. मंत्रालय के चक्कर काटें, लेकिन किसी ने मदद नहीं की. बड़े भाई की आमदनी से घर खर्च चल रहा है. फोर्ट स्थित सिद्धार्थ कॉलेज से 11वीं की पढ़ाई कर रही देविका आईपीएस बनने का सपना देख रही हैं. मगर, उसे मलाल है कि उसने किसके लिए यह कदम उठाया, जिसके चलते आज उसका परिवार न घर का रहा है, न घाट का. हालांकि, दर्जनों ‘अवॉर्ड’ उसे देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं.

देविका बताती हैं, ‘जेजे अस्पताल में उसका इलाज काफी लंबा चला. मां के नहीं रहने पर भाई और पिता देखभाल करते थे. इसलिए वे बांद्रा (ईस्ट) के कदम चॉल स्थित भाड़े के घर नहीं जाते थे. मकान मालिक को लगा कि देविका और उसके परिजन आतंकी हमले में मारे गए हैं. इसलिए उन्होंने देविका के परिजन की खोजबीन किए बिना उसके सामान बेच दिए, जिसमें जिंदगी भर की जमा-पूंजी और दस्तावेज रखे हुए थे. सामान के नाम पर बस एक पेटी मिली, जो खाली थी.

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‘बाहुबली 2’ का रिकॉर्ड तोड़ ‘बधाई हो’ ने छठे हफ्ते कर दिखाया यह कारनामा

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नई दिल्ली। आयुष्मान खुराना की छोटे बजट की फिल्म ‘बधाई हो’ ने भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म ‘बाहुबली: द कन्क्लूजन’ को भी पीछे छोड़ दिया है. बॉक्स ऑफिस इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, ‘बधाई हो’ ने छठे वीकएंड पर सबसे ज्यादा कमाई करने का रिकॉर्ड अपने नाम किया है. फिल्म ने छठे वीकएंड पर 3.75 करोड़ रुपये बटोरे हैं, जबकि ‘बाहुबली 2’ अपने छठे वीकएंड पर 3.35 करोड़ रुपये का कलेक्शन कर पाई थी. आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा की इस फिल्म ने अब तक 130 करोड़ रुपये का बिजनेस कर लिया है. 30 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म छठे हफ्ते तक 135 करोड़ रुपये कमा सकती है.

‘बधाई हो’ ने पहले हफ्ते 65.33 करोड़ रुपये कमाए. दूसरे हफ्ते इसका कलेक्शन 27.56 करोड़ रुपये रहा. तीसरे वीक फिल्म के खाते में 15.22 करोड़ और चौथे हफ्ते 10.43 करोड़ रुपये आए. पांचवे वीक में फिल्म ने 7.63 करोड़ का कारोबार किया और छठे वीकएंड पर इसकी कमाई 3.75 करोड़ रुपये रही है. फिल्म अब तक 129.92 करोड़ रुपये का जबरदस्त बिजनेस कर चुकी है.

बता दें, ‘बधाई हो’ फिल्म आयुष्मान खुराना पर आधारित हैं, जिनकी खुद की उम्र शादी करने की है लेकिन इस उम्र में जब उनकी मां बनीं नीता गुप्ता प्रेग्नेंट हो जाती है तो उनकी जिंदगी में खलबली मच जाती है. ‘बधाई हो’ में आयुष्मान खुराना की जोड़ी ‘दंगल’ गर्ल सान्या मल्होत्रा  के साथ बनी है. फिल्म में नीता गुप्ता के पति का किरदार गजराज राव ने निभाया है.

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पीएम मोदी का ‘भय’ और सीजेआई गोगोई से गुपचुप मुलाकात! देखें तस्वीर

नई दिल्ली। हाल के दिनों में कई बातें ऐसी हुई हैं जो देश के इतिहास में पहली बार हुई हैं। कुछ अच्छी, कुछ बुरी और कुछ बहुत बुरी। कल एक मुलाकात हुई है जो खास है और ऐतिहासिक भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सुप्रीम कोर्ट में मुलाकात। मुलाकात खास इस लिहाज से कि सुप्रीम कोर्ट में मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगोई से प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात थी और ऐतिहासिक इस लिहाज से देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री सुप्रीम कोर्ट में आये थे।

प्रधानमंत्री मोदी रविवार रात साढ़े नौ बजे सुप्रीम कोर्ट में आये थे, मौका था विधि दिवस की पूर्व संध्या पर कोर्ट द्वारा आयोजित भोज जो BIMSTEC देशों यानि बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड के जजों के लिए आयोजित किया गया था।

आपको ये खबर कहीं प्रमुखता से नहीं दिखी होगी और न ही हर समय कैमरे के सामने रहने वाले प्रधानमंत्री जी की फ़ोटो दिखी होगी। मुझे एक वेब पोर्टल के सौजन्य से प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की एक तस्वीर मिली है। आप लोगों से साझा कर रहा हूँ।

इसकी वजह ये थी कि न तो हमें यानि सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले रिपोर्टर्स को बताया गया और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) कवर करने वाले पत्रकारों को। इसकी वजह क्या रही होगी हम और आप केवल अनुमान लगा सकते हैं!

मैं कोई अपना अनुमान आपसे साझा करूँ उससे पहले एक ‘क्रांतिकारी’ एडवोकेट की बात साझा करता हूँ। एक दिन पहले उस एडवोकेट का फोन आया कि ‘क्या आपको पता है कि प्रधानमंत्री सुप्रीम कोर्ट आ रहे हैं! क्यों आ रहे हैं! उनको क्यों आना चाहिए! रफेल डील मामले में प्रधानमंत्री के खिलाफ दायर पेटिशन पर जब मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है, प्रधानमंत्री को सुप्रीम कोर्ट क्यों आना चाहिए!’

एक साथ इतने सवाल सुनकर मैं इरिटेट हो गया, झुंझलाते हुए कहा ‘ तो क्या हो गया! BIMSTEC के जजों के लिए भोज में प्रधानमंत्री के शामिल होने में समस्या क्या है! प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं आ सकते!’ एडवोकेट का जवाब था ‘आजतक तो विधि दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री कभी नहीं आये! आखिर आज क्यों! जिस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप पर मुख्यन्यायाधीश की बेंच सुनवाई कर रही है, भ्रष्टाचार का आरोप खुद प्रधानमंत्री के खिलाफ हो… ऐसे में प्रधानमंत्री को मुख्यन्यायाधीश से कोर्ट में आकर मुलाकात क्यों करनी चाहिए?’

अब इस तस्वीर को देखकर सोच रहा हूँ कि एडवोकेट की बात बेवजह नहीं थी! न्यायपालिका में कार्यपालिका के दखल का आरोप पुराना है। और हाल के दिनों में तो जजों ने भी खुले में आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये इस बात को साबित भी किया है। हाल में ये भी हुआ कि एक मुख्य न्यायाधीश को लेकर विपक्ष ने महाभियोग लाने की कोशिश भी किया था। दीपक मिश्रा को बीजेपी और सरकार का सीजेआई साबित करने की हरसंभव कोशिश की गई और कुछ हद तक ऐसी इमेज बन भी गई!

अब पीएम और सीजेआई के मुलाकात की इस तस्वीर को देखिए। कल को रफेल मामले में मोदी सरकार को क्लीन चिट मिल जाती है तो लोग क्या कहेंगे! क्या इस फोटो को आधार बनाकर माई लार्ड और सरकार के रिश्ते पर सवाल नहीं उठाएंगे! न्यायपालिका की गरिमा के लिए मुलाकात की ये तस्वीर अच्छी नहीं कही जाएगी माई लार्ड!

साभार- भड़ास4मिडिया Read it also-कांग्रेस की वजह से प्रदेश और देश में भाजपा की सरकारें: मायावती

संविधान के मकसद को नाकाम करने में मोदी ही नंबर-1 पीएम है.

आज 26 नवम्बर है: संविधान दिवस ! 1949 में आज ही के दिन बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने राष्ट्र को वह महान संविधान सौपा था, जिसकी उद्देश्यिका में भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने की घोषणा की गयी थी.

किन्तु संविधान सौंपने के एक दिन पूर्व अर्थात 25 नवम्बर, 1949 को उन्होंने इसे लेकर संसद के केन्द्रीय कक्ष से राष्ट्र को चेतावनी भी दिया था. उन्होंने कहा था- ’26 जनवरी, 1950 को हम राजनीतिक रूप से समान किन्तु आर्थिक और सामाजिक रूप से असमान होंगे. जितना शीघ्र हो सके हमें यह भेदभाव और पृथकता दूर कर लेनी होगी. यदि ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग इस भेदभाव के शिकार हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा देंगे, जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.’ हमें यह स्वीकारने में कोई द्विधा नहीं होनी चाहिए कि स्वाधीन भारत के शासकों ने डॉ.आंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी की प्रायः पूरी तरह अनेदखी कर दिया,जिसके फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, का भीषणतम साम्राज्य आज भारत में कायम हो गया है:अल्पजन जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी तबके का धर्म के साथ अर्थ-ज्ञान और राज-सत्ता पर 90 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है,जो इस बात का प्रमाण है कि संविधान अपने उद्देश्यों को पूरा करने में प्रायः पूरी व्यर्थ हो चुका है.

यही कारण है आजकल वंचित वर्गों के असंख्य संगठन और नेता आरक्षण के साथ संविधान बचाने के लिए रैलियां निकाल रहे हैं: भूरि-भूरि सेमीनार आयोजित कर रहे हैं. आज के इस खास दिन संविधान बचाने के नाम पर पूरे देश में सैकड़ों सेमीनार आयोजित किये गए होंगे, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

बहरहाल यह सवाल किसी को भी परेशान कर सकता है कि आजाद भारत के शासकों ने भयावह आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे तथा लोगों को तीन न्याय –सामाजिक,आर्थिक ,राजनीतिक- सुलभ कराने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाया? इस सवाल का बेहतर जवाब खुद बाबा साहेब आंबेडकर ही दे गए थे. उन्होंने कहा था,’संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो ,अगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे तो यह बुरा साबित होगा. अगर संविधान बुरा है,पर उसका इस्तेमाल करने वाले अच्छे होंगे तो बुरा संविधान भी अच्छा साबित होगा.’ जिस बेरहमी से अबतक आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की समस्या तथा तथा तीन न्याय की उपेक्षा हुई है, हमें अब मान लेना चाहिए कि हमारे संविधान का इस्तेमाल करनेवाले लोग अच्छे लोगों में शुमार करने लायक नहीं रहे. अगर ऐसा नहीं होता तो वे आर्थिक और सामाजिक विषमता से देश को उबारने तथा सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक न्याय सुलभ करने के लिए संविधान में उपलब्ध प्रावधानों का सम्यक इस्तेमाल करते,जो नहीं हुआ.

आखिर क्यों नहीं आजाद भारत के शासक अच्छे लोग साबित हो सके,यह सवाल भी लोगों को परेशान कर सकता है.इसका जवाब यह है-‘चूंकि सारी दुनिया में ही आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) के लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से ही होती रही है और इसके खात्मे का उत्तम उपाय सिर्फ लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक- का वाजिब बंटवारा है, इसलिए आजाद भारत के शासक, जो हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग से रहे, समग्र –वर्ग की चेतना से दरिद्र होने के कारण इसके खात्मे की दिशा में आगे नहीं बढ़े. क्योंकि इसके लिए उन्हें विविधतामय भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों के मध्य शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा कराना पड़ता और ऐसा करने पर उनका वर्गीय-हित विघ्नित होता, अतः वे स्व-वर्णीय हित के हाथों विवश होकर डॉ.आंबेडकर की अतिमूल्यवान चेतावनी तथा संविधान की उद्देश्यिका की अनदेखी कर गए और विषमता के खात्मे तथा तीन न्याय सुलभ करने के लायक ठोस नीतियां बनाने की बजाय गरीबी हटाओ,लोकतंत्र बचाओ,राम मंदिर बनाओ,भ्रष्टाचार मिटाओ इत्यादि जैसे लोक लुभावन नारों के जरिये सत्ता अख्तियार करते रहे .

उधर बाबा साहेब की सतर्कतावाणी की अवहेलना के फलस्वरूप गणतंत्र के विस्फोटित होने का सामान धीरे-धीरे तैयार होता रहा.आज पौने दो सौ जिलों तक नक्सलवाद का विस्तार;सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली; महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर हमारा बांग्लादेश,नेपाल और पाकिस्तान जैसे पिछड़े राष्ट्रों से पीछे रहना; तेज विकास के दौर में 84 करोड़ से अधिक लोगों का 20-25 रूपये रोजाना पर गुजर-बसर और कुछ नहीं, बारूद के वे ढेर हैं जिसे अगर सम्यक तरीके से निष्क्रिय नहीं किया गया तो निकट भविष्य में हमारे लोकतंत्र का विस्फोटित होना तय है. बहरहाल यहां लाख टके का सवाल पैदा होता है, जब संविधान के सदुपयोग के लिहाज से आजाद भारत के तमाम शासक अच्छे लोगों में उत्तीर्ण होने में विफल रहे तो वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी को किस श्रेणी में रखा जाय? क्योंकि वे संविधान और आंबेडकर-प्रेम के मामले में बहुत आगे निकल चुके हैं.

जहां तक संविधान के प्रति श्रद्धा का सवाल है, इस मामले में 26 नवम्बर, 2015 एक खास दिन बन चुका है है. उस दिन मोदी ने बाबा साहेब डॉ.भीमराव आंबेडकर की 125 वीं जयंती वर्ष को स्मरणीय बनाने के लिए 26 नवम्बर को ‘संविधान दिवस’ घोषित करने के बाद 27 नवम्बर को लोकसभा में राष्ट्र के समक्ष एक मार्मिक अपील करते हुए कहा था –‘26 नवम्बर इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है. इसे उजागर करने के पीछे 26 जनवरी को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं है. 26 जनवरी की जो ताकत है, वह 26 नवम्बर में निहित है, यह उजागर करने की आवश्यकता है. भारत जैसा देश जो विविधताओं से भरा हुआ देश है, हम सबको बांधने की ताकत संविधान में है, हम सबको बढाने की ताकत संविधान में है और इसलिए समय की मांग है कि हम संविधान की सैंक्टिटी,संविधान की शक्ति और संविधान में निहित बातों से जन-जन को परिचित कराने का एक निरंतर प्रयास करें. हमें इस प्रक्रिया को एक पूरे रिलीजियस भाव से, एक पूरे समर्पित भाव से करना चाहिये. बाबा साहेब आंबेडकर की 125 वीं जयंती जब देश मना रहा है तो उसके कारण संसद के साथ जोड़कर इस कार्यक्रम(संविधान दिवस ) की रचना हुई. लेकिन भविष्य में इसको लोकसभा तक सीमित नहीं रखना है. इसको जन-सभा तक ले जाना है. इस पर व्यापक रूप से सेमिनार हो, डिबेट हो, कम्पटीशन हो, हर पीढ़ी के लोग संविधान के संबंध में सोचें, समझें और चर्चा करें. इस संबंध में एक निरंतर मंथन चलते रहना चाहिए और इसलिए एक छोटे से प्रयास का आरंभ हो रहा है.’

इतना ही नहीं उस अवसर पर संविधान निर्माण में डॉ.आंबेडकर की भूमिका की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्होंने यहां तक कह डाला था -‘ अगर बाबा साहब आंबेडकर ने इस आरक्षण की व्यवस्था को बल नहीं दिया होता, तो कोई बताये कि मेरे दलित, पीड़ित, शोषित समाज की हालत क्या होती? परमात्मा ने उसे वह सब दिया है, जो मुझे और आपको दिया है, लेकिन उसे अवसर नहीं मिला और उसके कारण उसकी दुर्दशा है. उन्हें अवसर देना हमारा दायित्व बनता है-‘ उनके उस भावुक आह्वान को देखते हुए ढेरों लोग उम्मीद कर रहे थे कि वे आने वाले दिनों में कुछ ऐसे ठोस विधाई एजेंडे पेश करेंगे जिससे संविधान के उद्देश्यिका की अबतक हुयी उपेक्षा की भरपाई होगी: समता तथा सामाजिक न्याय की डॉ.आंबेडकर की संकल्पना को आगे बढाने में मदद मिलेगी.

किन्तु जिस तरह सत्ता में आने के पहले प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15 लाख रूपये जमा कराने का उनका वादा जुमला साबित हुआ, उसी तरह उनका डॉ.आंबेडकर और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता दिखाना भी जुमला साबित हुआ.

उनके कार्यकाल में 1 प्रतिशत टॉप की आबादी जो दौलत सन 2000 में 37 प्रतिशत बढ़कर 2016 में 58.5 प्रतिशत तक पहुंची थी, वह सिर्फ एक साल , 2017 में 73 प्रतिशत पहुँच गयी. आज टॉप की 10 प्रतिशत आबादी का 90 प्रतिशत से ज्यादा धन-दौलत पर कब्ज़ा हो चुका है.जो सरकारी नौकरियां अरक्षित वर्गों , विशेषकर दलितों के बचे रहने का एकमात्र स्रोत थी, वह ख़त्म हो चुकी है, इसका खुलासा खुद मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी 5 अगत , 2018 को कर दिया. उन्होंने उस दिन कहा कि सरकारी नौकरिया ख़त्म हो चुकी हैं , इसलिए अब आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है. जाहिर है मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों के कारण ही आरक्षण लगभग कागजों की शोभा बनकर रह गया है. मोदी ने न सिर्फ अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के हित में रेलवे स्टेशनों, हॉस्पिटलों आदि को निजीक्षेत्र में देने में सर्वशक्ति लगाया है, बल्कि देश की पांच दर्जन टॉप की यूनिवर्सिटियों को स्वायत्तता प्रदान कर उन्हें निजी हाथों में देने का भी उपक्रम चलाया है. धर्म-सत्ता पर विशेशाधिकार युक्त वर्ग का पहले से शतप्रतिशत कब्ज़ा था ही, आज उनकी सवर्णपरस्त नीतियों के चलते इस वर्ग का अर्थ-सत्ता, राज सत्ता, ज्ञान-सत्ता पर भी 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका.

ऐसे में अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर औसतन 90 प्रतिशत से ज्यादे कब्जे के फलस्वरूप संविधान की उद्देश्यिका में वर्णित तीन न्याय- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक- पूरी तरह सपना बन चुका जो इस बात संकेतक है कि संविधान अपने मूल उद्देश्य में विफल हो चुका है. और आज की तारीख में इस विफलता में मोदी की भूमिका का आंकलन करते हुए यह खुली घोषणा की जा सकती है कि संविधान के उद्देश्यों को व्यर्थ करने वालों में प्रधानमंत्री मोदी ही टॉप पर रहेंगे.

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मायावती ने राम मंदिर पर दिया बड़ा बयान

नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने शनिवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीएम नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को सत्ता में रहते हुए लगभग पांच साल पूरे होने वाले हैं और लोकसभा 2019 का चुनाव भी नजदीक आ गया है, लेकिन पीएम मोदी ने सत्ता में आने से पहले लोगों से जो वादे किए थे उनमें से 50 फीसदी वादा उन्होंने पूरा नहीं किया. इसलिए पीएम मोदी और बीजेपी के लोगों को यह पता चल गया है इस बार वो सत्ता में नहीं आने वाले.

उन्होंने कहा कि बीजेपी वादा पूरा नहीं कर पाई हेै और  छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव में  बुरी तरह पिछड़ रही है, 2019 में होने वाले चुनाव में अपनी हार तय मान रही है इसी लिए वो फिर से राम मंदिर के मुद्दे का राग अलाप रही है. राम मंदिर को हमेशा से वो चुनावी मुद्दा बनाते रहे हैं. अगर भावनाएं अच्छी होती तो राम मंदिर के लिए पांच साल का भी इंतजार नहीं करना होता. उन्होंने कहा कि राम मंदिर पर आजकल जो भी वीएचपी और शिवसेना कर रही है, वो इनकी ही साजिश है.

बसपा प्रमुख मायावती ने भीम आर्मी के चंद्रशेखर के उस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने की बात कही थी. मायावती ने कहा कि भीम आर्मी और बहुजन यूथ फॉर मिशन 2019 जैसे संगठन विपक्ष के इशारों पर भोले-भाले लोगों को बहकाने का काम कर रहे हैं. ऐसे संगठन बसपा के बढ़ते कदम में रोड़ा हैं. उन्होंने कहा कि बसपा को मालूम चला है कि ऐसे संगठन हमारे विपक्ष द्वारा पर्दे के पीछे से चलाए जा रहे हैं. जो लोग भी बसपा विरोधी संगठनों को चला रहे हैं वह दलित कालोनियों में रहने वाले हमारे भोले- भाले लोगों को बता रहे हैं कि वह मायावती को प्रधानमंत्री बनाएंगे.

बसपा के कार्यकर्ताओं को इन संगठनों से सावधान रहने की जरुरत है, क्योंकि ऐसे संगठन हमारे नाम पर लोगों की भावनाओं के साथ खेल रहे हैं. उन्होंने कहा कि बसपा सभी धर्मो और जातियों की पार्टी है. व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे संगठन बन रहे हैं. इस तरह के संगठन चलाने वाले लोग लोगों से अपना व्यवसाय चलाने और अपने कार्यक्रमों में लोगों को इकट्ठा करने के लिए कह रहे हैं.

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एमपी और छत्तीसगढ़ में तीसरी ताकत बनने की आस में जुटी बसपा

लखनऊ। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य मुकाबला भले ही बीजेपी-कांग्रेस के बीच हो लेकिन बीएसपी तीसरी ताकत बनने की उम्मीद से मैदान में है. कर्नाटक में एक सीट जीतकर सरकार में शामिल होने के बाद से बीएसपी का हौसला और बढ़ गया है. यही वजह है कि पार्टी ने इन राज्यों में पूरी ताकत झोंक दी है. चुनाव प्रचार की कमान खुद मायावती ने अपने हाथ ले ली है और लगातार रैलियां कर रही हैं. पार्टी का मानना है कि कुछ सीटें जीतकर कांग्रेस और बीजेपी को अकेले सत्ता में आने से रोक दें तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी.

कर्नाटक की तर्ज पर जोगी से गठबंधन

कर्नाटक में बीएसपी ने जेडीएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. वहां बीजेपी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी और कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी लेकिन बहुमत किसी के पास नहीं था. ऐसे में कांग्रेस ने जेडीएस का मुख्यमंत्री बनवाकर मिलीजुली सरकार बनवा दी. उसमें बीएसपी के एक मात्र विधायक को भी मंत्री बनाया गया. उसे ही ध्यान में रखते हुए मायावती ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और बीजेपी से अलग हटकर अजित जोगी की पार्टी जनता छत्तीसगढ़ के साथ गठबंधन किया है. वहां पिछले चुनाव में बीजेपी के पास 49 और कांग्रेस के पास 39 सीटें थीं. बीएसपी की कोशिश है कि बीजेपी की कुछ सीटें भी कम होती हैं और उनका गठबंधन कुछ सीटें ले आता है तो कर्नाटक जैसी स्थिति बन सकती है.

एमपी में पिछली बार थीं चार सीटें

मध्य प्रदेश में कई साल से बीजेपी सरकार है. कांग्रेस पिछली बार दूसरे नंबर की पार्टी थी. बीएसपी ने 4 सीटें जीती थीं. बीएसपी को उम्मीद है कि इस बार बीजेपी और कांग्रेस में कांटे का मुकाबला हो सकता है. ऐसे में बीएसपी कुछ सीट बढ़ाने में कामयाब हो गई तो यहां भी सरकार बनने में पेंच फंस सकता है. ऐसे में बीएसपी के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है.

मायावती खुद छत्तीसगढ़ में छह रैलियां कर चुकी हैं और मध्य प्रदेश में आठ रैलियां की हैं. राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर मध्य प्रदेश के प्रभारी हैं. वह कई महीने पहले से वहीं डटे हैं. इसके अलावा अन्य कार्यकर्ता और नेता भी वहां घर-घर प्रचार कर रहे हैं. खासतौर से सीमावर्ती जिलों में यहां के कार्यकर्ता मध्य प्रदेश के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर प्रचार कर रहे हैं.

अब राजस्थान में रैलियां

बीएसपी प्रमुख मायावती अब राजस्थान में सभाएं करेंगी. वहां बीएसपी 200 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है. हालांकि यहां उनकी सभाओं का कार्यक्रम अभी जारी नहीं किया गया है.

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आदि महोत्सव में आदिवासी कलाकारों ने देश-दुनिया को लुभाया

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में फैले मॉल संस्कृति के जाल के बीच स्थित ‘दिल्ली हॉट’ कला और संस्कृति के कद्रदानों के लिए एक अलग दुनिया है. इसी दिल्ली हॉट में आदिवासी कला और संस्कृति से परिचय कराने के लिए भारत सरकार की ओर से आदि महोत्सव का आयोजन किया गया है. यह महोत्सव 16 नवंबर से शुरू है और 30 नवंबर तक चलेगा. इस महोत्सव में अपने हुनर का प्रदर्शन करने के लिए देश भर से 600 कलाकार पहुंचे हैं.

यहां वो तमाम रंग देखने को मिलेंगे जो इस देश के मूलनिवासी आदिवासी समाज ने रचा है. इनकी कला की समझ पहुंचने वाले लोगों को दातों तले उंगुलियां दबाने पर मजबूर कर दे रही है. मसलन ओडिसा का कला, जिसे पोथि चित्रा या पटचित्रा कहा जाता है, छत्तीसगढ़ की गोंड कलाकृति औऱ मध्य प्रदेश का बैगा ट्राइबल आर्ट ऐसी अनोखी कला है, जिसे देखकर हर कोई हैरत में पर जा रहा है. इस महोत्सव में पूरे देश की आदिवासी संस्कृति एक साथ मौजूद है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश के हर हिस्से से आदिवासी कलाकार अपनी कला का रंग बिखेरने पहुंचे है. खास बात यह रहा कि हर कला की अपनी एक कहानी थी, जो स्थानीय आदिवासी समाज की कला के प्रति दीवानगी को भी दिखाता है.

इस महोत्सव के आयोजन की बात करें तो यह भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय और सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया है. इसका उद्घाटन उपराष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू ने किया. उद्घाटन सत्र के दौरान जनजातीय कार्य मंत्री जुआल ओरांव ने इसे आदिवासी संस्कृति, क्राफ्ट, नृत्य संगीत, व्यापार और खानपान का उत्सव कहा. इसमें शामिल होने के लिए आदिवासी कलाकारों को तमाम सुविधाएं भी दी गई हैं. सारा खर्च ट्राइफेड उठाता है. इस महोत्सव की ब्रांड एंबेसडर वर्ल्ड चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज मैरीकॉम हैं.

यह महोत्सव सिर्फ कलाकारों के लिए ही मौका नहीं है, बल्कि यह खरीददारों को भी देश की आदिम कला से परिचित करा रहा है. इसमें उमड़ रही भीड़ इस बात को साबित कर रही है कि आदिवासी कला को लेकर लोगों में जबरदस्त क्रेज है. दरअसल इस महोत्सव के तीन रंग हैं. आदिवासी कला, आदिवासी संस्कृति और आदिवासी व्यंजन. इस महोत्सव में पहुंचने वाले कला प्रेमियों को आदिवासी व्यंजनों से मुखातिब कराने के लिए 20 राज्यों से 80 आदिवासी शेफ मौजूद हैं, जबकि 200 कलाकारों के साथ 14 ट्राइबल डांस ग्रुप यहां बने एक विशेष मंच पर हर रोज अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. 15 दिनों के इस महोत्सव में देश की राजधानी में आदिवासी समाज को अपनी कला और संस्कृति को दुनिया के सामने रखने का मौका मिला है, तो वहीं कला संस्कृति के कद्रदानों को भी देश की आदि संस्कृति को समझने का मौका मुहैया कराया है.

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मेरठ में एक के बाद एक कई दलितों की हत्या

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मेरठ। उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिले मेरठ में एक के बाद एक कई दलितों की हत्या हुई है. पिछले कुछ महीनों में पांच दलितों की हत्या की खबर है. तुर्रा यह है कि इन तमाम हत्याओं के बावजूद प्रशासन अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाया है. घटनाक्रम के मुताबिक दो अप्रैल, 2018 भारत बन्द आन्दोलन के दौरान मेरठ के कचहरी पूर्वी गेट पर अकुंज जाटव नामक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. पुलिस ने आज तक भी केस नहीं खोला है. दूसरी घटना 04 अप्रैल, 2018 को फाजलपुर निवासी गोपी पारिया नामक युवक की सरेआम हत्या कर दी गई, जिसकी एफ. आई. आर. भी पुलिस ने अपने हिसाब से लिखी, पांच नामजदों में से पुलिस ने एक अभियुक्त की अभी तक गिरफ्तारी नहीं की है जिसका अपराध स0 390/18 थाना कंकरखेड़ा, मेरठ है. तीसरी घटना 04 मई, 2018 मोहकमपुर निवासी 22 वर्षीय विकास को उसकी प्रेमिका के घरवालों ने अपने घर बुलाकर जबरन जहर पिला दिया जिसकी उपचार के दौरान मौत हो गई. विकास के परिजनो ने चार लोगों के विरूद्ध मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन पुलिस ने आज तक भी एक भी अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं की है जिसका अपराध स0 278/2018 थाना टी.पी. नगर, मेरठ है. चौथी घटना दिनांक 09 अगस्त, 2018 उल्लेदपुर निवासी रोहित जाटव नामक युवक की गांव के ही कथित सवर्णों द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. रोहित के पिता ने गांव के ही नौ लोगों के विरूद्ध नामजद मुकदमा पंजीकृत कराया था, पुलिस ने अभी तक कुल 4 यवकों की गिरफ्तारी की है. पांच अभियुक्त पुलिस की पकड़ से अभी भी दूर है जिसका अपराध स0 230/18 थाना गंगा नगर, मेरठ है और उलटा पुलिस ने पीड़ित परिवार के विरुद्ध सगींन धाराओं में मकदमा दर्ज कर दिया. जबकि पांचवा मर्डर लंगूर स्वामी किशन लाल जाटव का है जिस की एफ आई आर तक दर्ज नहीं हुई है. पीड़ित परिवारों का आरोप है कि पुलिस उनकी एक नहीं सुन रही है और लगातार इस मामले में लीपापोती की कोशिश की जा रही है. पीड़ित परिवारों का आरोप सरकार को कठघरे में खड़ा करती है.

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समाजवादी पार्टी और मुस्लिम हित: मिथ या हक़ीक़त

आईये आज समाजवादी गुफ्तगू की जाये वह भी उत्तर प्रदेश के समाजवाद की. यह बात सबको मालूम है कि उत्तर प्रदेश में समाजवाद का मतलब समाजवादी पार्टी. अगर मैं यह सवाल करूँ कि क्या समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव मुस्लिमों के मसीहा हैं? तो शायद आप लोग चुप हो जायें. लेकिन अगर में यह कहूँ कि मुलायम सिंह यादव मुस्लिमों के राकस्टार हैं तो हर तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ेगी.

कितना अजीब है ना. दुनिया में हर प्रकार के प्रॉफ़ेशन/ कार्य से जुड़ा हुआ आदमी चैम्पियन तब कहीं जा कर बनता है जब वह आंकड़ों/ अचिवमेंट की एक लंबी फेहरिस्त (List)बना दे. उदाहरण के तौर पर सचिन तेंदुलकर इसलिये क्रिकेट का राक स्टार है कि उसने इस प्रॉफ़ेशन/ खेल में आंकड़ों की एक सीरीज खड़ी कर दी है. इसी प्रकार सेरेना विलियम्स या रोजर फ़ेडरर अपने प्रॉफ़ेशन/ खेल के राक स्टार हैं क्योंकि उन्होने अपने चुने हुये प्रॉफ़ेशन/ खेल में आंकड़ो का पहाड़ खड़ा कर दिया है. इसी तरह अभिनेता आमिर खान बॉलीवुड का राक स्टार है क्योंकि कि उसने अपनी एक के बाद एक आने वाली फिल्मों के ज़रिये एक नये प्रकार की परिभाषा गढ़ने की कामयाब कोशिश की है. अगर यहाँ सिर्फ इस तरह के उदाहरणों को दर्ज किया जाये तो एक दिलचस्प और आँखों मे चमक पैदा करनी वाली रिपोर्ट तैयार हो जायेगी.

कहना यह है कि ऊपर की लाइनों में दिये गये उदाहरणों में अगर कोई एक चीज़ कामन है, तो वह है किसी ख़ास प्रॉफ़ेशन/ कार्य में निपुण होना यानि क़ाबिल होना. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो पूरी दुनिया के सामने संबन्धित प्रॉफ़ेशन/ कार्य में शामिल लोगों की पहचान का एक सीधा सा हवाला उनकी क़ाबिलियत एवं चुने गये एरिया में उनके द्वारा स्थापित किये गये नये नये कीर्तिमानों के चमकते आंकड़ें हैं.

इस प्रस्तावना के बाद अब आते हैं आज के विषय की तरफ यानि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के मुस्लिमों का राक स्टार होने या नहीं होने के सवाल पर. हमारे हिसाब से तो मुलायम सिंह यादव पर मुस्लिमों का राक स्टार होने का बोझ बे मतलब डाला जा रहा है. हमारा मत बिल्कुल साफ और सीधा है. भाई! माननीय मुलायम सिंह यादव के पास किस चीज़ की कमी है कि वो मुस्लिमों का सहारा या मदद लें.

उनके हाथ में एक बड़ी राजनैतिक पार्टी है जिसके दम पर वह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कई बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनका दबदबा और राजनैतिक इच्छा शक्ति इतनी मज़बूत है कि जम्हूरीनिज़ाम (DemocraticSystem) में भीअपने बेटे को मुख्यमंत्री बना देते हैं. जबकि हम सब जानते हैं कि डेमोक्रेसी में ‘’राजा और उसके बाद उसका बेटा राजा’’जैसा सिस्टम नहीं होता फिर भी समाजवादी पार्टी के संस्थापक अपने बेटे को इसके विपरीत जा कर मुख्यमंत्री बनाते हैं. अब आप ही बताइये कि जब अखिलेश यादव बिना किसी दिक़्क़त के पूरे पाँच साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहते हैं तो उन्हे या उनकी पार्टी को “ऊल जलूल हरकत करने वाले,असभ्य, गैर पढ़े लिखे और बेगारी को आतुर” मुस्लिमों की ज़रूरत कहाँ पड़ी? भाई जब मुख्यमंत्री पिता के बाद बेटा भी मुख्यमंत्री बन जाये तो ऐसी पार्टी को जुम्मन और लड्ड्न की चौखट का मुँह देखने की क्या ज़रूरत ?

पर क्या किया जाये, हमारे मिलने जुलने वालों में विविधता बहुत है. इसलिये बहुत बार ऐसा होता है कि उम्र दराज़ नगर वासियों की संगत में मेरा जैसा आदमी भी ज़बान की ज़ोर पर मुलायम सिंह यादव को मुस्लिमों का राक स्टार मानने के लिये विवश किया जाता है. यह लोग मेरे इतने करीब हैं और इससे कहीं ज़्यादा मासूम कि अखिलेश यादव को भी वही सारी उपाधि देते नज़र आते हैं जो उनके पिता श्री को 1990 के बाद से दे रखा है. इसको भी स्वीकार करने के लिये हमें विवश किया जाता है. अन्यथा मेरे जैसा इंसान किसी को राक स्टार या चैम्पियन तभी मानता है जब वह आंकड़ों/ सफलताओं से मुझे अपना हम ख्याल बना ले. जैसा कि इस आर्टिकल की शुरू की लाईनों में मैने उदाहरणों के ज़रिये बताया है.

आज के डिजिटल दौर में सुचनाओं की उपलब्धता भी एक विकराल समस्या ही मानी जानी चाहिये. यह बात इसलिये कह रहा हूँ कि मैं इस उपलब्धता की अधिक्ता का मारा हुआ हूँ. आप कहेंगे कि जब दुनिया इस उपलब्धता को अवसर या प्रसाद मान रही है तो आपको क्या हो गया है. सच बात तो यह है कि मैं अपने नगर वासियों को यह समझाने में लगा था कि आप लोग मुलायम सिंह यादव पर ज़बरदस्ती मुस्लिमों का राक स्टार होने का बोझ लादे जा रहे हैं. और नहले पे दहला यह है कि उनके बेटे अखिलेश यादव को भी वही सारी उपाधि दिये जा रहे हैं. मैंने ज़ोर दे कर कहा कि आप लोग इस तरह कि उपाधियों के ज़रिये समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उनके परिवार के साथ ज़्यादती कर रहे हैं क्योंकि वो लोग कभी इसे स्वीकारनहीं करते हैं.

इतने में एक साहब विकीपीडीया पेज खोले हुवे मोबाइल हाथ में लिये सामने आये और तेज़ आवाज़ मे कहा कि पढ़िये इसे. मैं मजबूर इंसान पढ़ने लगा, चौंकने वाली बात थी इसलिये आप भी पढ़िये. “समाजवादी पार्टी एक राजनैतिक दल है.यह 4 अक्तूबर 1992 को स्थापित किया गया. इसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री और देश के डिफेंस मिनिस्टर रह चुके हैं….समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में आधारित है. इसके समर्थन में बड़े पैमाने पर ओबीसी,दलित ,शोषित विशेष रूप से मुलायम सिंह की अपनी जाति और मुसलमानों पर आधारितहै”.

ऊपर के पैराग्राफ को तेज़ आवाज़ में पढ़ने का नुक़सान यह हुआ कि आखिरी लाइन आते ही नगर वासियों का जोश आसमान पर पहुँच गया. अब में क्या करता, वो लोग बोल रहे थे कि देखिये विशेष रूप से यादवों और मुसलमानों को इस पार्टी का समर्थक बताया गया है. मैं असहाय इंसान मुलायमवाद से अखिलेशवाद तक का सफर तय कर चुकी भीड़ के सामने चुप्पी साधे खड़ा था. हालांकि यह स्थिति देर तक नही रही लेकिन इतने कम समय मे ही मुझे अपनी स्थिति का अंदाज़ा हो गया था.

मैं भी आसानी से हार मानने वाला नहीं था इसलिये हौसला जुटाया और बैकफूट से फ्रंटफूट पर आ गया. भीड़ मे से ही एक साहब का मोबाइल उधार लिया उत्तर प्रदेश विधान परिषद की वेबसाइट को सबके सामने खोला. भला हो इस वेबसाइट के बनाने वालों का जिन्होंने दलों के नाम से इस सदन के सदस्यों की लिस्ट को सामने ही रखा है. हमने भी नगर वासियों का आज़माया हुआ नुस्खा उन्ही पर इस्तेमाल किया और विकिपीडिया की आखिरी लाइन समाजवादी पार्टी के मुख्य समर्थक यादव और मुसलमान हैं को दोहराते हुये कहा कि देखिये आप लोग इस लिस्ट मे कहाँ हैं?

फिर क्या था समाजवादी पार्टी कि तरफ से विधान परिषद मे भेजे जाने वाले 55 सदस्यों मे से 17 सदस्य यादव निकाल आये और सिर्फ 6 सदस्य मुस्लिम. यह देखने के बाद बहुतों के चेहरे के हाव भाव बदल गये. कुछ को यकीन नही हुवा तो उन्होने अपने अपने मोबाइल मे इस सदन की लिस्ट देखी तो किसी ने कहा कि यह कैसे हो सकता है जबकि हमने हमेशा समाजवादी पार्टी को अपना वोट दिया और मुलायम सिंह यादव को अपना रहनुमा मानते रहे हैं. ज़्यादा जागरूक लोगों ने कहा कि अखिलेश तो आबादी के अनुपात मे रिज़रवेशन की माँग करते हैं परंतु अपनी पार्टी में इसके विपरीत? अखिलेश ने ही 2011 के मेंफेस्टो में 18 प्रतिशत मुस्लिम रिज़रवेशन का वादा भी किया था. ज़ाहिर है कि यह रिज़रवेशन आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े मुस्लिमों को मिलना था जिनकी आबादी मुस्लिमो की कुल आबादी का 14 से 16 प्रतिशत मानी जाती है. यह तो समाजवादी पार्टी की मुस्लिमों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी है. तभी किसी ने फिर विकिपीडिया के आखिरी लाइन यादव और मुस्लिम इस पार्टी के मुख्य समर्थक हैं, को दोहराया.

यक़ीन मानिये मासूम जनता के इस तरह के सवालों ने मेरे जैसे मायूस इंसान में भी एक नई उमंग पैदा कर दिया था. लोहा गरम देख कर मैंने भी दबदबे के साथ कहा कि आप लोगों को पता है कि उत्तर प्रदेश में आपके समाज की आबादी कितनी है? उत्साहित लोगों ने मेरी तरफ देखा तो मैंने 2011 की जनगणना के हिसाब से लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होना बताया. अब लोगों ने खुद ही हिसाब लगाना शुरू कर दिया कि आबादी के हिसाब से उनकी हिस्सेदारी कितने प्रतिशत बनती है और अब तक उनको कितना हिस्सा दिया गया है.

अपनी आबादी का सही प्रतिशत जानने के बाद नगर वासियों के अंदर जो मैंने जिज्ञासा देखी तो उससे अंदाज़ा हुआ कि यह वही लोग हैं जिन्होंने कांशीराम को यह कहते हुये सुना है कि जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी. इन लोगों ने अखिलेश को भी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी मांगते हुवे सुना है. उनके जोशीले चेहरों को देखने के बाद मेरी यह ग़लत फहमी भी दूर हो गयी कि लोग कुछ करना नही चाहते या बदलाव नही चाहते.

आंकड़ो को पेश करते ही आबादी के अनुपात में नुमाइन्दगी का मामला बहुत कम समय मे ही एक गंभीर सवाल बन गया. बात यहाँ तक पहुंची कि मुझे अपनी पहली वाली बात पर दोबारा विचार करना पड़ा कि डिजिटल दौर में सूचनाओं की आसान उपलब्धता को समस्या कहना शायद सही नही है. क्योंकि मेरे घर कि तरफ कदम बढ़ाने से पहले ही कई लोगों ने बहुत क़ायदे से सूचनायें इकट्ठा कर ली थी और सवाल कर रहे थे कि लगभग 9 प्रतिशत यादव आबादी और 17 विधान परिषद सदस्य यादव जाति से ?

अब मेरे घर जाने का वक़्त हो चुका था लेकिन चलने से पहले कुछ बातें साफ हो गयी थीं. पहली तो यह कि जिस जनता को लोग ना समझ मानते हैं अगर उन्हे स्थिति का सही अनुमान हो जाये तो बड़े बड़े होशियार की होशियारी को बेकार करने मे देर नहीं लगेगी. दूसरी यह कि डिजिटल दौर मे सामने आने वाले सोशल मीडिया को सही दिशा मे मोड़ दिया जाये तो जनता 19 प्रतिशत आबादी पर 6 सदस्य और 9 प्रतिशत पर 17 सदस्य के आंकड़ों की मदद से वर्तमान के राक स्टारों/ चैम्पियनों का बोझ उतार देगी. यह भी संभावना है कि लोग इसी तरीक़े को अपनाते हुवे पहले के राक स्टारों से भी अपने अधिकारों का हिसाब मांगने लगें. शायद इसी तरह शोषित लोगों को पता चले कि उन्होने बहुत से लोगों पर ग़लत भरोसा किया था और उन्हे अपना राक स्टार वगैरह कहा था.

मैं निजी तौर पर भारत जैसे देश में इस तरीक़े को ParticipativeDemocracy का अहम हिस्सा मानता हूँ क्योंकि यहाँ बनने वाले हर तरह के चुनावी समीकरण में सभी दल,सत्ताधारी दल को हटा कर खुद स्थापित होना चाहते हैं और एक बड़े तबक़े को ब्यवस्था एवं राजकाज से दूर रखना चाहते हैं. वैसे भी जम्हूरियत में स्थायित्व या किसी दल विशेष के एक छत्र अधिकार को अच्छा संकेत नही माना जाता है.

अब देखते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को अभी भी कोई राक स्टार चाहिये या आबादी के अनुपात में नुमाइन्दगी.

ज़ुबैर आलम

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25 को सवाई माधोपुर आएंगी बसपा सुप्रीमो मायावती

सवाई माधोपुर। बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती 25 नवम्बर को सवाई माधोपुर आएंगी. इस दौरान वह सवाई विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी हंसराज मीना के लिए सभा कर मतदाताओं से बसपा को वोट देने का आह्वान करेंगी. यह जानकारी बसपा के राज्यसभा सांसद एवं मुख्य कोऑर्डिनेटर अशोक सिद्धार्थ ने पत्रकार वार्ता के दौरान दी.

इस मौके पर राजस्थान के कोऑर्डिनेटर हरिसिंह तेंगुरिया, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश मीना आदि उपस्थित थे. इस दौरान बसपा सांसद सिद्धार्थ ने बताया कि प्रदेश की कई सीटों बसपा के भाजपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों से सीधा मुकाबला है. सवाई जिले की चारों विधानसभा सीटों पर बसपा ने उम्मीदवार खड़े किए हैं. 25 नवंबर को दोपहर 12:30 बजे इंदिरा मैदान में सभा को संबोधित करेंगी. इसके बाद करौली में सभा को संबोधित करेंगी.

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Women’s World T20: सेमीफाइनल में बाहर हुई टीम इंडिया

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एंटीगा। सर विवियन रिचर्डस स्टेडियम में शुक्रवार को खेले गए आईसीसी महिला वर्ल्ड टी20 के दूसरे सेमीफाइनल में भारतीय टीम को इंग्लैंड के हाथों 8 विकेट से हार का सामना करना पड़ा है. भारत ने टॉस जीतकर 19.3 ओवरों में सभी विकेट गंवाकर 112 रन बनाए. जवाब में इंग्लैंड ने सिर्फ दो विकेट गंवाकर 17.1 ओवर में 116 रन बनाकर मैच अपने नाम कर लिया.

इंग्लैंड की ओर से नतेली स्कीवर ने 54 और एमी जोंस ने 53 रन बनाए. भारत की ओर से राधा यादव और अंजू पाटिल ने एक-एक विकेट लिया. रविवार को फाइनल में इंग्लैंड का सामना ऑस्ट्रेलिया से होगा जिसने पहले सेमीफाइनल में गत चैंपियन वेस्ट इंडीज को हराकर लगातार पांचवीं बार फाइनल में जगह बनाई है.

113 रनों का लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और सिर्फ चार के स्कोर पर ही उसकी सलामी बल्लेबाज टैमी ब्यूमोंट सिर्फ एक रन बनाकर आउट हो गईं. उन्हें राधा यादव की गेंद पर अरुंधति रेड्डी ने कैच किया. इसके बाद डेनियल वॉट 8 रन बनाकर दीप्ति शर्मा का शिकार बनीं.

इस तरह 5 ओवरों में 24 पर इंग्लैंड को दो विकेट गिर चुके थे और भारत को यहां थोड़ी उम्मीद जगी थी लेकिन विकेटकीपर एमी जोन्स और नताली स्कीवर ने भारतीय गेंदबाजों को कोई मौका नहीं दिया और 92 रनों की नाबाद साझेदारी करते हुए अपनी टीम को जीत दिला दी. जोन्स ने 47 गेंदों पर तीन चौकों और एक छक्के की मदद से 53 और स्कीवर ने 39 गेंदों पर 5 चौकों की मदद से 53 रन बनाए.

इससे पहले, स्मृति मंधाना (34) ने भारतीय टीम को अच्छी शुरूआत दी लेकिन वह अधिक देर तक मैदान पर नहीं टिक सकीं. सोफी एक्लेस्टोन ने 43 के स्कोर पर स्मृति को पविलियन का रास्ता दिखाया. टीम के खाते में 10 रन ही जुड़ पाए थे कि सलामी बल्लेबाज तान्या भाटिया (11) भी पविलियन लौट गईं. उन्हें हीथर नाइट की गेंद पर नटाली स्कीवर ने कैच आउट किया.

जेमिमाह रोड्रिगेज (26) ने कप्तान हरमनप्रीत कौर (16) के साथ टीम की पारी को संभालने की कोशिश की. दोनों ने 36 रनों की साझेदारी कर टीम को 89 के स्कोर तक पहुंचाया लेकिन इसी स्कोर पर टैमी ब्यूमाउंट और एमी जोन्स ने जेमिमाह को रन आउट कर भारतीय टीम का तीसरा विकेट भी गिरा दिया.

हरमनप्रीत ने इसके बाद भारतीय टीम की अनुभवी बल्लेबाज वेदा कृष्णमूर्ति (2) के साथ टीम को मजबूत करने की कोशिश की लेकिन क्रिस्टी जॉर्डन ने इस योजना को विफल कर दिया. जॉर्डन ने 93 के स्कोर पर वेदा को जोन्स के हाथों कैच आउट कर पविलियन भेजा. 16वें ओवर की पहली गेंद पर वेदा का विकेट गिरा और इसी ओवर की आखिरी गेंद पर क्रिस्टी ने हरमनप्रीत को भी पविलियन का रास्ता दिखा दिया.

छठे विकेट के लिए दीप्ति शर्मा (7) और डेलन हेमलता (1) मैदान पर उतरीं लेकिन इंग्लैंड टीम की कप्तान नाइट ने यहां भारतीय टीम को बड़ा झटका दिया. उन्होंने 99 के कुलयोग पर पहले हेमलता को और उसके बाद इसी स्कोर पर अनुजा पाटिल को पवेलियन की राह दिखाई. अनुजा खाता भी नहीं खोल पाई थीं. भारतीय टीम ने 100 का आंकड़ा पार करने से पहले ही अपनी सात बल्लेबाजों को गंवा दिया.

इसके बाद दीप्ति का साथ देने आईं राधा यादव (4) भी अधिक समय तक मैदान पर नहीं टिक पाईं और 104 के स्कोर पर रन आउट होकर पविलियन लौट गईं. भारतीय टीम के खाते में आठ रन ही जुड़ पाए थे कि सोफी ने इस मैच में अपने दूसरे विकेट के रूप में अरुणधति रेड्डी (6) को आउट किया.

रेड्डी का विकेट 112 के स्कोर पर गिरा और इसी स्कोर पर इंग्लैंड की गेंदबाजों ने दीप्ति को भी रन आउट कर भारतीय टीम की पारी समाप्त कर दी. इंग्लैंड के लिए

गौरतलब है कि भारतीय टीम ने इस वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल से पहले तक हर मैच में एकतरफा प्रदर्शन किया, लेकिन आज उसका सामना उस टीम से था, जिसने एक साल पहले भारत को वनडे विश्व कप का खिताब जीतने से रोका था.

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बड़े मकसद के लिए छोटी कुर्बानी, मायावती की यही है चुनावी रणनीति की कहानी

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छत्तीसगढ़ चुनावों के दौरान बसपा प्रमुख मायावती से जब यह सवाल पूछा गया कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वह भाजपा या कांग्रेस में से किसका समर्थन करेंगी तो उन्होंने बेहद साफगोई से जवाब दिया कि दोनों में किसी का भी नहीं. उनके अनुसार ऐसा कुछ करने के बजाय वह विपक्ष में बैठना पसंद करेंगी. मायावती का आरोप है कि इन दोनों दलों में से किसी ने भी दलितों, गरीबों और वंचितों के लिए कुछ नहीं किया. इन दोनों दलों से समान दूरी बनाते हुए उन्हें नागनाथ और सांपनाथ बताना बसपा के संस्थापक कांशीराम का सिद्धांत था. मायावती उसे ही दोहरा रही हैं. हालांकि कांशीराम और मायावती, दोनों ने समय-समय पर अपने इस सिद्धांत से समझौता भी किया. मायावती अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बना चुकी हैं और उसी दौरान उन्होंने दलितों के लिए काफी काम भी किए हैं. आंबेडकर ग्राम जैसी अवधारणा ने उसी दौरान आकार लिया.

बहरहाल मायावती का हालिया बयान कई सवालों को समेटे हुए है. मसलन क्या यह रणनीति छत्तीसगढ़ चुनाव तक ही सीमित है या 2019 के चुनाव को लेकर चल रही महागठबंधन की कवायद में भी वह कांग्रेस से दूरी बनाकर रखेंगी? संभव है कि ऐसा ही हो, क्योंकि वह ऐसे ही संकेत दे रही हैं और मायावती से गठजोड़ की पींगें बढ़ा रहे सपा के अखिलेश यादव भी इन दिनों कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं. हालांकि हालात को देखते हुए उन्हें कांग्रेस को साथ में लेना पड़ सकता है. फिर भी यदि ऐसा नहीं हुआ तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-रालोद गठजोड़ मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है. मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखा जाए तो ऐसा परिदृश्य भाजपा के लिए फायदेमंद होगा.

छत्तीसगढ़ में बसपा और अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के रूप में उभरा तीसरा ध्रुव भाजपा का ही काम आसान कर रहा है. मध्य प्रदेश में भी बसपा कांग्रेस के मतों को ही विभाजित करेगी. हालांकि यह भी संभव है कि सत्ता विरोधी रुझान के कारण यह बिखराव बहुत ज्यादा न हो. मायावती की रणनीति में उत्तर प्रदेश से बाहर के राज्यों में सशक्त हस्तक्षेप एक महत्वपूर्ण पहल है. वैसे भी देश के लगभग प्रत्येक राज्य में दलित समाज है तो मायावती की कोशिश उनमें पैठ बनाकर उसे चुनाव में भुनाने की है. इसके लिए वह छोटे दलों से गठजोड़ भी कर रही हैैं. कर्नाटक में भी उन्होंने जद-एस के साथ गठबंधन किया था. वहां बसपा का एक उम्मीदवार जीता भी. इसी विधायक को पार्टी ने दबाव बनाकर मंत्री भी बनवा दिया. कर्नाटक के इसी प्रयोग को मायावती दूसरों राज्यों में भी दोहरा रही हैं. इससे बसपा को कई फायदे होंगे. एक तो पार्टी को चुनावी चर्चा में जगह मिलेगी. दूसरा, अखिल भारतीय मौजूदगी के साथ ही मत प्रतिशत भी बढ़ेगा. तीसरा, पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा बनाए रखने में मदद मिलेगी जिस पर बीते कुछ चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद सवाल उठने लगे हैैं. इस लिहाज से कर्नाटक के बाद उन्होंने इन तीनों राज्यों में वही दांव चला है.

हालांकि मप्र और छत्तीसगढ़ में बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन की इच्छुक थी, लेकिन वह जितनी सीटें मांग रही थी कांग्रेस उतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी. इससे बात बनने से पहले ही बिगड़ गई और मायावती को चुनाव में तीसरे पक्ष के रूप में उतरना पड़ा. हालांकि इन चुनावों में पार्टी की भूमिका वोटकटवा की ही होगी, लेकिन यह उसके लिए कोई अपमानजनक स्थिति नहीं है. बसपा का राजनीतिक दर्शन ही यह है कि पहले हारेंगे और फिर हराएंगे. अपने इसी दर्शन के दम पर बसपा ने 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर किया था.

चुनाव में हारने की अपनी इसी ताकत को बसपा ने सियासी सौदेबाजी के अहम हथियार के रूप में विकसित कर धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक पूंजी बढ़ाई. फिर मुख्य परिदृश्य में उभरकर मतदाताओं में विश्वास जगाया और फिर विजेता बनकर उत्तर प्रदेश में राज किया. मौजूदा चुनावों में बसपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जो भी है वह पाना ही है. उत्तर प्रदेश से सटे मध्य प्रदेश के इलाकों में बसपा का अच्छा प्रभाव है. रीवांचल, चंबल और मुरैना क्षेत्र में भी बसपा प्रभावी संगठन है. हालांकि शेष मध्य प्रदेश में उसकी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है, फिर भी उसके पास छह प्रतिशत से ज्यादा मत हैं. इसी तरह छत्तीसगढ के बिलासपुर, जांजगीर संभाग और महाराष्ट्र की सीमा से लगे राज्यों के हिस्सों में भी उसकी मौजूदगी है. वैसे भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में दलित मतदाताओं का कुछ न कुछ आधार होता है. ऐसे में बसपा अपने सघन प्रभाव वाले क्षेत्रों में जीत भी दर्ज कर सकती है.

कई क्षेत्रों में वोटकटवा की भूमिका भी उसके राजनीतिक प्रभाव में उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकती है. छत्तीसगढ़ में जोगी की पार्टी का साथ भी बसपा को फायदा पहुंचा सकता है, क्योंकि जोगी की आदिवासियों के बीच गहरी पैठ है. इसीलिए ये दोनों मिलकर दलित-आदिवासी एकता का नारा भी बुलंद कर रहे थे. छत्तीसगढ में दलित आदिवासी मूलत: कांग्रेस का जनाधार रहे हैं. उसमें इस गठजोड़ द्वारा लगाई गई सेंध शायद कांग्रेस पर भारी पड़े. हालांकि राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में बहुत मेहनत की है, लेकिन वहां कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है.

पिछले विधानसभा चुनावों से पहले नक्सलियों ने राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व का सफाया कर दिया था. तिस पर बसपा-जनता कांग्रेस गठजोड़ ने उसे और कमजोर किया. छत्तीसगढ़ के उलट मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज नेता हैं. लिहाजा वहां कांग्रेस की जड़ों को कमजोर करना बसपा के लिए उतना आसान नहीं होगा. मायावती की रणनीति इन प्रांतों में अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव साबित कर 2019 के संसदीय चुनाव में बनने वाले महागठबंधन में अपना दावा मजबूत कर सीटों के बंटवारे में ज्यादा सीटें हासिल करने की है. वहीं अगर चुनाव बाद गठबंधन की सरकार बनती है तब वह सत्ता में अधिक हिस्सेदारी के लिए दबाव बना सकती हैं.

यह आम धारणा है कि मायावती के मन में प्रधानमंत्री पद की आकांक्षा है. अगर छोटे-छोटे दल मिलकर सरकार बनाते हैं तो उस स्थिति में मायावती प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावा ठोक सकती हैं. फिलहाल ऐसे ही आसार लग रहे हैं कि गठबंधन पहले राज्य स्तर पर बनेगा और फिर केंद्रीय स्तर पर उसका विकसित स्वरूप आकार लेगा. राज्यों के स्तर पर बनने वाले इन गठबंधनों में कई जगह कांग्रेस भी शामिल रहेगी, लेकिन वरिष्ठ नहीं, कनिष्ठ सहयोगी के रूप में. कांग्रेस जिन राज्यों में मजूबत स्थिति में हैं उनके साथ इन राज्यों में कनिष्ठ भूमिका के रूप में अपने प्रदर्शन से केंद्र में खुद को मजबूती दे सकती है. इस बीच यह भी देखना होगा कि फिलहाल कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने की बात करने वाली मायावती इस नीति पर कहां तक खरी उतरती हैं, क्योंकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं.

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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव : ‘यहां दलित राजनीति नहीं बल्कि दलितों के ख़िलाफ़ राजनीति है’

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कामनीबाई गवई

”वो हमसे वोट लेते हैं, चुनाव जीतते हैं, लेकिन बदले में वो हमें क्या देते हैं? कुछ नहीं. वो हमें कुछ नहीं देते. हम गोबर के कीड़ों जैसे हैं. अंबेडकर बाबा बोलकर गए थे कि गोबर के कीड़ों की तरह मत रहो लेकिन ये लोग हमें ऐसे रहने का मजबूर करते हैं.”

मध्य प्रदेश के महू शहर में रहने वाली कामनीबाई गावई अपने हालातों को कुछ इस तरह बयां करती हैं. मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इससे पहले जनता का हाल जानने की कड़ी में हम महू शहर में रुके. महू में डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म हुआ था. कामिनीबाई हाट मैदान के पास दलित-आदिवासी इलाके में रहती हैं जो महू शहर के मध्य में है. इस इलाके का नाम बुद्ध नगर है.

यहां पर एक-दूसरे सटे आधे से एक फुट चौड़े और 10-12 मीटर लंबे पांच घर हैं. असल में वहां घर ही नहीं हैं बल्कि ये 100-150 वर्ग फीट की कच्ची झोपड़ियां हैं. इनमें से एक या दो घरों को अपवाद कह सकते हैं. किसी भी घर में खिड़की नहीं है. छतों पर ढकी परतों के कोनों से थोड़ी धूप आ जाती है. इन घुटन भरे कमरों में बदबू आती रहती है. 70 साल की कामिनीबाई अंबेडकर की जन्मस्थली को देखने के लिए अपने पति के साथ महू आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं. वह यहां पर 50 सालों से ज़्यादा समय से रह रही हैं. उनके बच्चों की शादी भी यहीं हुई है. उनकी बहू, दामाद और पोते-पोतियां हैं.

अंधेरे में घर और ज़िंदगी

वह पतली गलियों से होते हुए मुझे अपने घर लेकर गई. उनके छोटे से कमरे में अंधेरा था और कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था. जब मैंने बहुत ध्यान से देखा तो वहां उनकी बेटी और बेटी के बच्चे चारपाई पर बैठे थे. बेटी छुट्टियों में अपनी मां के घर आई हुई थीं. फिर मैंने और देखने की कोशिश की तो एक गैस सिलिंडर और चारपाई के पास स्टोव, कुछ बर्तन और रस्सी पर टंगे कपड़े नज़र आए. वहीं, बाबा साहेब अंबेडकर की फोटो भी लगी थी.

कामनीबाई कहती हैं, ”मैं कूड़ा उठाकर पैसे कमाती हूँ. मेरी बेटी यहां आई है लेकिन मेरे पास ​उसे साड़ी दिलाने के पैसे नहीं है. मुझे उधार लेना पड़ेगा लेकिन ब्याज़ चुकाने में बहुत मुश्किल आती है. मुझे उसे साड़ी देनी होगी इसलिए अब सोच रही हूं कि कहीं और से पैसे मिल जाएं.” ऐसे हालात में जीने वालों में यहां ​कामनीबाई अकेली नहीं हैं. हर कोई यहां ऐसी ही ज़िंदगी जी रहा है. अधिकतर लोग कूड़ा बीनकर और घरों में सफाई का काम करके ही घर चलाते हैं. इसके बाद हम स्थानीय दलित नेता मोहनराव वाकोड़े के पास गए और लोगों के इस हाल के बारे में बात की.

उन्होंने कहा, ”यहां लोगों की स्थिति दयनीय है. वहां कोई नहीं जाता. उन्हें कई योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है लेकिन यहां उसका नामोनिशान तक नहीं है. यहां रहने वाले लोग इंदौर शहर की सफाई करते हैं और इंदौर देश का सबसे साफ शहर है लेकिन कोई भी इन लोगों का ध्यान नहीं रखता.”

डॉ. भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली

दलितकोई मुद्दा ही नहीं

महू शहर की कुल जनसंख्या एक लाख है जिनमें से 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति से हैं. इन 15 प्रतिशत में से करीब 5000 महाराष्ट्र से आप्रवासी हैं जो महू में रहने लगे हैं. अधिकतर आप्रवासी अकोला या उसके आसपास के इलाकों से हैं.

महू में कामनीबाई और अन्य दलितों की बदहाली, मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की झलक देती है. दूसरे राज्यों के मुक़ाबले मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की ख़ास जगह नहीं है. बीजेपी और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दलितों के लिए कई वादे किए हैं. लेकिन, असल चुनावी अभियान में दलित मुद्दा केंद्र में तो छोड़ो उसके आसपास भी नहीं है.

स्थानीय अख़बार ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ के संपादक प्रकाश हिंदुस्तानी कहते हैं, ”इस क्षेत्र में दलित राजनीति अपने आप में पिछड़ी हुई है. इस राज्य में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसी दलित राजनीति नहीं होती. यहां ग्रामीण और कृषि संबंधी मुद्दे प्रमुख हैं. आदिवासियों की जनसंख्या ज़्यादा है. यहां तक कि भानुसिंह सोलंकी जैसा सिर्फ़ एक नेता उप-मुख्यमंत्री के पद पर पहुंच पाया है. और किसी को ऐसी सफलता नहीं मिली.”

पिछले विधानसभा चुनावों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के चार विधायक जीते थे. ​पार्टी को सिर्फ 6.5 प्रतिशत वोट मिले थे. प्रकाश हिंदुस्तानी मानते हैं, ”अनुसूचित जाति के लोग चुप रहने वाले मतदाता हैं. वह आमतौर पर सामने नहीं आते हैं लेकिन पोलिंग के दौरान पूरी तरह काम करते हैं. ‘सपाक्स’ और ‘जयास’ यहां उभरकर आए हैं लेकिन बीएसपी को अब भी बढ़त हासिल है.”

क्या है सपाक्स और जयास

‘सपाक्स’ का मतलब है ‘सामान्य, पिछड़ा-वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण समाज’. यह सेवानिवृत्त हो चुके सरकारी अधिकारियों का संगठन है. उन्होंने पदोन्निति में आरक्षण के विरोध में ओबीसी और अल्पसंख्यकों को इकट्ठा किया था. इस संगठन ने भी आने वाले चुनाव में उम्मीदवार उतारे हैं. ‘सपाक्स’ एक तरह से ‘अजाक्स’ के विरोध में बनाई गई है. अजाक्स राज्य सरकार में काम करने वाले अनुसूचित जाति के अधिकारियों का संगठन है.

वहीं, ‘जयास’ का मतलब है ‘जय आदिवासी शक्ति संगठन’. इस संगठन ने आदिवासी इलाकों से आदिवासियों को एकजुट करने की कोशिश की है. लेकिन, संगठन इन चुनावों में कांग्रेस से गठबंधन कर रहा है. लेकिन ‘जयास’ के विरोध में कोई अनुसूचित जाति का संगठन क्यों नहीं है? हमने ये सवाल स्थानीय एससी नेता जी.डी. जारवाल से पूछा.

उन्होंने कहा, ”बड़ी पार्टियों के नेताओं ने दलित नेतृत्व को दबाया है. कई बार दलित नेता ख़ुद को सिर्फ़ अपनी पार्टी तक सीमित कर लेते हैं. वह समाज के मुक़ाबले पार्टी के प्रति ज़्यादा समर्पित रहते हैं.” जारवाल ख़ुद कांग्रेस के लिए काम करते हैं. हमने उनसे पूछा कि एक दलित नेता होने के नाते क्या उन पर भी यही बात लागू होती है क्योंकि उन्होंने भी चुनाव नहीं लड़ा है.

इस पर जारवाल कहते हैं, ”कई बार आर्थिक मुश्किलें होती हैं. एक संगठन को बनाने के लिए पैसे की जरूरत होती है. हम कहां से इतने पैसे लाएंगे? यह गरीब समाज है. परिवार में सिर्फ़ एक ही सदस्य कमाने वाला होता है. अगर आर्थिक हालत मजबूत होते हैं तो लोगों को दूसरी चीजों पर ध्यान देने और संगठन बनाने के लिए ज़्यादा समय मिलता है. बाकी जो लोग आर्थिक रूप से मजबूत हैं वो इन लोगों और ऐसी जगहों पर जाना नहीं चाहते.”

जारवाल इसके बारे में और बताते हैं, ”राज्य में दलित समुदाय तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है. पहली श्रेणी में वो लोग हैं जो आरक्षण से मिली स्थायी नौकरी या स्थिर ज़िंदगी ​जी रहे हैं. दूसरी श्रेणी में वो हैं जिन्हें शिक्षा मिल रही है और तीसरी श्रेणी मजदूरी करने वालों की है.”

”पहली श्रेणी को किसी संगठन या अभियान से कोई लेना-देना नहीं है. दूसरी श्रेणी को अपने करियर की ज़्यादा चिंता है इसलिए वो ऐसे संगठन या अभियान का हिस्सा नहीं बनते. वहीं, तीसरी श्रेणी अपनी रोजी-रोटी का इंतज़ाम ही करती रह जाती है. अब ऐसे हालात में कैसे कोई संगठन या नेता पनप सकता है?”

जारवाल एक और बात की तरफ ध्यान दिलाते हैं. वह कहते हैं, ”मध्य प्रदेश में दलित समुदाय कई जातियों में बंटा हुआ है. समुदाय में कोई एक संगठित आवाज़ नहीं है. कुछ अनुसूचित जातियां जैसे महार, अहीर, जाटव, बर्वा, कोरी, खटिक, रेगर, मालवीय बलाई बड़ी जातियां हैं. लेकिन, उनमें एकजुटता व सामंजस्य नहीं है और न ही कोई उस दिशा में कोशिश करता है.”

क्या सोचता है दलिता युवा

इस सामाजिक ढांचे के साथ मध्य प्रदेश में दलित राजनीति की क्या स्थिति है? एक दलित युवक विवेक मुराडे कहते हैं, ”यहां कोई दलित राजनीति नहीं है बल्कि दलितों के ख़िलाफ़ राजनीति की जाती है. नेता अपने दलित पड़ोसियों को ही देखने नहीं जाना चाहते.”

बर्वा जाति से आने वाले विवेक के पास एमकॉम की डिग्री है और वह एक फाइनेंस कंपनी में काम कर रहे हैं. उन्हें हर महीने 15 हजार रुपये तनख़्वाह मिलती है. वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने परिवार में पहले व्यक्ति हैं.

विवेक एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां लोगों के बीचे कोई भेदभाव न हो और सबके साथ एक-सा व्यवहार किया जाए. सबके लिए समान नियम हों.

विश्लेषक क्या कहते हैं

महू में डॉ. बीआर आंबेडकर यूनिवर्सिटी में कुलपति डॉ. सीडी नाईक कहते हैं, ”इस राज्य में दलितों का कोई संगठन नहीं है. कुछ संगठन हैं भी तो उनके नेता अन्य दलों के साथ सौदेबाजी में व्यस्त रहते हैं. कुछ उभरते नेता सौदेबाजी में माहिर हैं.”

लेकिन डॉ. नाईक को लगता है कि ये हालात तेजी से बदल रहे हैं. बिरसा मुंडा, तांत्या भिल्ला जैसे आदिवासियों के प्रतिमानों की तरह भीमराव आंबेडकर भी यहां आदर्श हैं. दलित युवा आदिवासियों के साथ काम रहा है. शिक्षित युवा सोचता है कि उसे अपना नेतृत्व खुद बनाना है इसिलए वो अब सक्रिया हो गए हैं.

डॉ. नाईक कहते हैं, ”इस राज्य के दलित युवाओं में जिस जोश की कमी थी वो अब पूरी हो रही है. डॉ. आंबेडकर का कहना था, शिक्षित हों , संगठित हों और लड़ें. इसे लागू होने में अभी समय लगेगा. लेकिन, मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है. कोई नहीं कह सकता कि ये कब उभरकर सामने आएगी लेकिन ​निकट भविष्य में एक संगठन जरूर आएगा.”

साभार- बीबीसी हिन्दी इसे भी पढ़ें-बौद्ध रीति रिवाजों से शादी करेगें दलित