दलितों और आदिवासियों की ख़बर मीडिया में तभी छपती है जब कोई उत्पीड़न होता है। जालोर में इंद्र कुमार मेघवाल की हत्या की ख़बर मीडिया में खूब रही। इतना स्थान मीडियम इनके शिक्षा, विकास व नौकरी आदि के लिए मिली होती तो लाखों का उत्थान हो जाता।करोडों दलित बच्चों का वजीफा नही बढ़ा, मिलता है तो बहुत बाद में । लाखों बच्चों की स्कालरशिप का गबन हो जाता है। लाखों करोड़ के स्पेशल कॉम्पोमेंट प्लान और ट्राइबल सब प्लान के पैसे का दुरपयोग होता रहता है। लाखों सरकार में पद खाली हैं। मीडिया में ऐसे मुद्दे को स्थान कहां मिलता है। जो मीडिया सामाजिक और राजनैतिक नेताओं का अच्छे काम को स्थान नही देती वही उत्पीड़न होने पर ही क्यों सक्रिय होती है? जालौर की घटना को मीडिया ने इतना जगह दिया कि लाखों लोग बिना संगठित पहुंच गए । जालौर अपवाद नहीं है बल्कि और उत्पीड़न के मामले में भी ऐसा होता है । कई घटनाएं ऐसी भी होती हैं कि नजर से बच जाती हैं भले ही बहुत संगीन हो। कई बार न चाहते हुए भी कवर करना पड़ता है जब ख़बर किसी एक जगह चल जाए।
सबसे आश्चर्य की बात है कि दलित सक्रियता इसी समय दिखती है। ऐसा इसी समय क्यों दिखती है यही यक्ष प्रश्न है। कभी एक जज बनाने या कुलपति के लिए क्यों नही इकठ्ठे होते । एक जज के कलम से पूरा आरक्षण प्रभावित हो जाता है। एक विश्व विद्यालय के कुलपति से कितने प्राध्यापक भर्ती किए जा सकते हैं और छात्रों का तो भला होगा ही। भारत का सचिव या यूपीएससी का सदस्य या चेयरमैन के लिए कभी दलित सक्रियता नही दिखती जिससे करोड़ों के जीवन में परोक्ष या अपरोक्ष भला हो सकता है। दलित – आदिवासी को लगभग वैसे मंत्रालय दिए जाते हैं जो ज्यादा भला नही कर सकते। राजनैतिक दल संगठन ऐसे पद नही देते जिससे अपने समाज का भला हो सकता है। जो सासंद या विधायक इनके लड़े उसके पीछे क्यों नहीं खड़े होते ? जब पार्टी ऐसे लोगों का पत्ता काट देती है तो कोई दलित सक्रियता नही दिखती।
दलित खुद के जातिवाद करने पर गर्व करते हैं। शायद ही कोई कथित दलित सक्रियता वाला हो जो जाति के संगठन से परोक्ष या अपरोक्ष से न जुड़ा हो। एक जाति दूसरे से लड़ते रहते हैं।पंजाब में चुनाव हुआ मज़हबी दलित नाममात्र का वोट दिया क्योंकि चन्नी रविदासी थे। खुद तो जातिवाद करें तो ठीक और जट सिख जट करें तो गलत । बहुजन अंदोलन के पहले भले ही चेतना काम थी लेकिन उपजातिवाद कम था । कहा गया कि जो अपनी जाति को जोड़ेगा वो पाएगा । फिर क्या था निकल पड़े जाति के नेता अपनी अपनी जाति को संगठित करने के लिए और किए भी। जब टिकट और सम्मान नहीं मिला तो अपनी जाति का वोट लेकर दूसरे दुकान पहुंच गए। जो भी कीमत लगी समझौता कर लिया । कुछ न से कुछ भी भला और जाति इतने पर बौरा जाति है और दनादन वोट डाल देती। छाती चौड़ी हो जाती है और उस पार्टी के लिए झंडा डंडा उठा लेते हैं। थोड़े से लालच के चक्कर में एक दलित की जाति दूसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती है।
हरियाणा में ए और बी का इतना गहरा अंतर्विरोध है कि दबंग और शोषण करने वाली जाति से हाथ मिला लेंगे लेकिन एक दूसरे को फूटी आंख से देखने को तैयार नहीं हैं।
इनके जातीय सम्मलेन की बातें जानें तो आश्चर्य होगा। व्यवस्था के अनुसार जो जातियां सबसे नीचे पायदान पर हैं वो भी गला फाड़ फाड़ कर भाषण करेगें कि हमें अपनी जाति पर गर्व है। जब इन्हे गर्व है तो राजपूत और बनिया को अपने जाति पर क्यों न गर्व हो ? खुद करें जातिवाद तो गर्व की बात है जब ब्राम्हण करें तो जातिवाद । जब तक यह चलेगा जालौर, हाथरस और उन्नाव जैसी घटनाएं होती रहेंगी। उत्पीड़न का श्रोत जनतंत्र में नही बल्कि सामाजिक व्यवस्था है। सामाजिक व्यवस्था ज्यों का त्यों बनी रहे तो सरकार किसी की भी हो उत्पीड़न नही रुकेगा। जनत्रंत्र की ताकत जब ढीली हो जाती है तो उत्पीड़न हो जाता है। जाति व्यवस्था का भेदभाव और उत्पीड़न हिस्सा है। संविधान के कारण भेदभाव कम हुआ है और जहां संवैधानिक प्रवधान निष्क्रिय हुए वहीं पर जालौर जैसा कांड हो जाता है।
बहुजन अंदोलन था डॉ अंबेडकर के विचाराधारा के खिलाफ लेकिन लोग समझे कि यही सामाजिक न्याय, जाति का उन्मूलन और एकता है। इसे ऐतिहासिक ठगी या नासमझी कहा जाए। बाबा साहेब हिंदू धर्म तक जाति से मुक्ति के लिए छोड़ दिए। हमारे सारे नेता हिन्दू धर्म में ही मरे कुछ अपवाद को छोड़कर। बाबा साहब के संघर्ष का प्रतिफल जैसे आरक्षण और अन्य सुविधाएं तो लेने में कोई देरी नही। छात्र जीवन से ही लेने लगते हैं और जब बौद्ध धर्म अपनाने की बात आए तो बुढ़ापे का इंतजार । बुद्ध धर्म तो आरक्षण लेने से पहले ले लेना चाहिए ताकि जातिवादी संस्कार से मुक्त हो जाएं। खुद जातिवादी संस्कार में रहकर जाति के खिलाफ लड़ रहे हैं। खुद जाति उन्मूलन न करें और सवर्णों से कहें कि वो जातिवाद न करें।
जब तक मेघवाल , बेरवा, बलाई, खटीक, चमार , महार, मतंग रहेंगे तो एकता कहां होगी और बिना एकता के अन्याय से लड़ कैसे पाएंगे? जिन संस्कारों के कारण अत्याचार हो रहा है उसी को माने तो सामाजिक व्यवस्था मजबूत रहेगी और उत्पीड़न होता रहेगा , हैं कभी कम कभी ज्यादा होता रहेगा। दलित पीएम और सीएम भी बन जाएं तो उत्पीड़न बंद नही जाएगा और कम हो सकता है। दलित उत्पीड़न की घटना से किसी राजनैतिक दल को फायदा हो सकता है । जो लोग दर्द और सहानुभूति प्रकट करने जालोर गए , उनका नाम मीडिया में छप गया और नेता बन जाने का अवसर मिल जाए लेकिन दलितों के शोषण को रोकने का उपाय यह नही। ऐसे घटना का विरोध होना चाहिए और हुआ भी लेकिन स्थाई समाधान खोजना होगा।


विगत 21 अगस्त को दिल्ली के गाँधी पीस फाउंडेशन में दलित साहित्यकार इकट्ठा हुए। देश के कई हिस्सों से पहुंचे ये साहित्याकर दलित लेखक संघ के रजत जयंती वर्ष का समारोह मनाने इकट्ठा हुए थे। इस दौरान एक दिवसीय वार्षिक अधिवेशन का आयोजन हुआ, जिसमें तमाम साहित्यकारों एवं लेखकों ने अपनी बात रखी। पूरे दिन के इस कार्यक्रम में मुख्य तौर पर चौथी राम यादव, डॉ. रामचंद्र, अनिता भारती, रजनी अनुरागी, राजेश कुमार, अजमेर सिंह काजल, कवितेंदु इंदू, प्रियंका सोनकर, बिनील विस्वास, चंद्रकांता, प्रेमचंद गांधी, स्नेहलता नेगी आदि साहित्यकारों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में दिल्ली सरकार में सामाजिक न्याय विभाग के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम और दिल्ली विवि के हिन्दू कॉलेज के असि. प्रोफेसर डॉ. रतन लाल भी मौजूद रहें।
अमेरिका में रहने वाले अंबेडकरवादियों के संगठन अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर विदेशी जमीन पर नया इतिहास बनाने जा रही है। और इसकी आधारशिला संगठन ने अपने 10वें स्थापना दिवस के मौके पर 23 जुलाई 2022 को रख दी। इस दिन संगठन द्वारा अंबेडकर मेमोरियल का पहली ईंट रख दी गई। खास बात यह रही कि यह पहली ईंट भारत के मध्य प्रदेश स्थित महू में बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मस्थान से लाई गई थी। इस शानदार मौके के गवाह अमेरिका के 12 राज्यों से आए लगभग 200 अंबेडकरवादी बने। बहुजन नायकों के जयकारे के बीच पहला पत्थर अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के मौजूदा अध्यक्ष संजय कुमार ने रखा। यह पूरा प्रोजेक्ट डेढ़ मिलियन डालर यानी 15 लाख अमेरिकी डॉलर का है। रुपये में बात करे तो यह प्रोजेक्ट तकरीबन 12 करोड़ रुपये का है।
बताते चलें कि अंबेडकर मोमोरियल बनाने का बजट डेढ़ मिलियन यानी वन एंड हाफ मिलियन डालर है। यह मेमोरियल सेंटर के मुख्यालय पर बनना है जो कि अमेरिका के वशिंगटन डीसी में स्थित है। यह अंबेडकर मेमोरियल अमेरिका में बाबासाहेब का पहला स्मारक होगा। बता दें कि पिछले एक दशक से यह संगठन भारत में मानवाधिकार और समानता के लिए काम कर रहा है।
हत्या के चार महीने से ज्यादा बीतने के बावजूद राजस्थान के युवा जितेन्द्र मेघवाल को इंसाफ नहीं मिलने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने जितेन्द्र को इंसाफ दिलाने को लेकर मोर्चा खोल दिया है। बहुजन समाज पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने बीते 30 जुलाई को जितेन्द्र मेघवाल के घर पहुंच कर उनके परिवार से मुलाकात की और जितेंद्र मेघवाल के आश्रितों को भी उदयपुर के कन्हैया लाल हत्याकांड की तर्ज पर 50 लाख रुपये का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की।
We live in a rented house. And sometimes there are problems with it. Especially when leaving one house and looking for another house. Sumit Chauhan and Azra Praveen Said. Sumit, a journalist by profession, comes from a Dalit background and Azra is a Muslim. Because of this, the problems of both increase more.
Sarvind, who is a geoscientist in ONGC and gets a handsom amount of salary, his experience has also not been normal. After living in two societies, he has now bought his own flat. But their experiences have been more or less the same everywhere.
On 23rd July 2022, AIC celebrated the 10th anniversary of the founding of the organization in a big way. On the occasion, AIC also conducted the ground-breaking ceremony of the Ambedkar Memorial by installing the first brick specially brought from Babasaheb’s birthplace, Mhow, India, at the AIC premises. This marks the beginning of the Dr. Ambedkar Memorial project. The ground breaking ceremony was attended by more than 200 Ambedkarites from across 12 states in the USA and also from India.
Sanjay Kumar, President of AIC, in a statement said, “It was overwhelming to see people marching together around the property with energetic Jai Bhim slogans while the brick was in transition. The brick was mounted by Ambedkarites of various faiths and ethnicities, demonstrating how AIC wants to embrace diversity. It was very encouraging to witness enthusiastic youth participating in large numbers. Thank you all, Let’s continue this momentum, together we will make our dreams (FIRST Memorial of Babasaheb in the USA) come true. Likewise any other building, Memorial will not just be built of wood and bricks, it will be built from the emotion of millions of Babasaheb followers worldwide.”

आदिवासी समाज से आने वाली द्रौपदी मुर्मू देश की पंद्रहवीं राष्ट्रपति निर्वाचित हो गई हैं। चुनाव आयोग ने उन्हें जीत का सर्टिफिकेट जारी कर दिया है। इसके साथ उन्हें चारों ओर से बधाई मिलने लगी है। उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री रह चुकी बसपा प्रमुख मायावती ने द्रौपदी मुर्मू को बधाई दी है। बहनजी ने ट्विट कर लिखा-
मुर्मू ने ओडिशा में पार्षद के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरु किया था। वह 1997 में रायरंगपुर अधिसूचित क्षेत्र परिषद में पार्षद बनीं। साल 2000 से 2004 तक वह ओडिशा की बीजद-बीजेपी गठबंधन सरकार में मंत्री रहीं। वह झारखंड की राज्यपाल भी रह चुकी हैं। 2015 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इस पद पर वह 2021 तक रहीं। राष्ट्रपति चुनाव में वह भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की उम्मीदवार थीं।
गुजरात के बनासकांठा की एक पंचायत का फरमान 30 जून को वायरल हुआ है। इस फरमान में कहा गया है कि मुस्लिम फेरीवालों से सामान नहीं खरीदना है। जो ऐसा नहीं करेगा उस पर 5100 रुपये जुर्माना लगाया जाएगा। हालांकि इस मामले में पुलिस कार्रवाई करने की बात कह रही है।
घटना गुजरात के बनासकांठा वाघासन समूह की ग्राम पंचायत का है। पंचायत के लेटरपैड पर जारी इस फरमान में मुस्लिम फेरीवालों से सामान खरीदने पर जुर्माने की बात कही गईं थी। इसमें कहा गया हे कि वाघासन गांव के दुकानदारों को उदयपुर में टेलर की हत्या को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के फेरीवालों से सामान नहीं खरीदना चाहिए। इसे पंचायत के लेटरपैड पर जारी किया गया है और इस पर पूर्व सरपंच माफीबेन पटेल के हस्ताक्षर और मोहर है। इस लेटर में कहा गया है-
‘अगर किसी दुकानदार को मुस्लिम व्यापारियों से सामान लेते हुए देखा गया तो उस पर 5100 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और वो पैसा गोशाला को दिया जाएगा।’
ये लेटर जब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ तो प्रशासन ने इस पर संज्ञान लिया। दूसरी ओर बनासकांठा
प्रशासन की ओर से 2 जुलाई को कहा गया था कि वाघासन समूह की ग्राम पंचायत का वायरल हो रहा लेटर पैड आधिकारिक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, बनासकांठा जिला विकास अधिकारी स्वप्निल खरे ने कहा कि लेटर पैड पर जिस व्यक्ति ने हस्ताक्षर हैं, उसके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि सरपंच पद अभी खाली है। इसके लिए चुनाव होना है और फिलहाल, पंचायत वर्तमान में एक प्रशासक के अधीन है। खरे ने कहा, इस पर प्रशासक ने एक स्पष्टीकरण जारी किया है। इसमें कहा गया है कि (पहले) जारी किया गया पत्र निराधार है और किसी को भी इसका पालन करने की जरुरत नहीं है। अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की बात भी कहीं गईं थी।
उसी तरह की ऐक और घटना गुजरात के बनासकांठा के सेद्रासना गांव 3 जुलाई को सामने आई है। सेद्रासना गांव में पोस्टर लगाए गए हैं, जिसमें कुछ पोस्टरों की तस्वीरें भी सामने आई हैं जिसमे लिखा गया है-
‘व्यापार के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों को इस गांव में आना सख्त मना हे,हिंदू राष्ट्र का सेद्रासण गांव.
लेकिन 4 जुलाई को सेद्रासण गांव के सरपंच ने कहा कि पोस्टर और बैनर रात को दस बजे के बाद अपरिचित व्यक्ति द्वारा लगाया गया है क्योंकि रात दस बजे तक वो गांव में मौजूद थे, तब तक कुछ भी नहीं था। सुबह मुझे ख़बर मिलते ही मैंने पोस्टर और बैनर हटा दिया है। अब आगे कोई इश्यू ना बने इसके लिए में भी चिंतित हूं।
लेकिन जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों के बारे में सरपंच से सवाल किया गया तो उन्होंने उसपर कोई जवाब नहीं दिया। इन दोनों दोनो घटना पर प्रशासन कार्रवाई करने की बात कर रहा है लेकिन अभी तक इस संबध में कोई भी कारवाई नहीं हुई है।
युवा आदिवासी लेखक-विचारक एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ को दलित-आदिवासी एवं पिछड़े समाज के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए ‘‘हरिचाँद ठाकुर-गुरुचाँद ठाकुर सम्मान’’ से सम्मानित किया गया है। हावड़ा, पश्चिम बंगाल स्थित रामगोपाल मंच सभागार में मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ (मक्कम) की प. बंगाल ईकाई,बाबासाहेब डॉ. बी.आर.अम्बेडकर मिशन, हुगली, भारतीय दलित साहित्यकार मंच (प.बं.) तथापश्चिम बंगाल सफाई कर्मचारी एकता संघ द्वारा 17 जून को संयुक्त रूप से आयोजित एक भव्य अभिनंदन समारोह में डॉ सुनील को यह सम्मान प्रदान किया गया।
चुनाव आयोग ने देश में नए राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर तारीख का एलान कर दिया है। 18 जुलाई को देश के 15वें राष्ट्रपति के लिए मतदान होगा और 21 जुलाई को देश को नया राष्ट्रपति मिल जाएगा। लेकिन क्या आपको पता है कि भारत का राष्ट्रपति कैसे चुना जाता है? इस वीडियो में हम आपको राष्ट्रपति के चुने जाने की प्रक्रिया, उनके अधिकार और योग्यता सहित तमाम जानकारी देंगे। साथ ही यह भी बताएंगे कि राष्ट्रपति चुनाव में सांसद और विधायक का क्या महत्व होता है।
कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव
राष्ट्रपति का निर्वाचन इलेक्टोरल कॉलेज के द्वारा किया जाता है। इसके सदस्य लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य के अलावा सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं। यानी राष्ट्रपति के मतदान में लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और राज्यों के विधायकों को वोट करने का अधिकार होता है। ध्यान रहे कि राष्ट्रपति चुनाव में एमएलसी यानी विधान परिषद के सदस्यों और लोकसभा एवं राज्यसभा में नामित सदस्यों को वोट का अधिकार नहीं होता।
हर राज्य के विधायकों की वैल्यू अलग-अलग होती है
दिलचस्प बात यह है कि इन सभी के मतों का मूल्य अलग-अलग होता है। लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के वोट का मूल्य एक समान होता है और विधानसभा के सदस्यों का अलग होता है। विधायकों के वोटों का मूल्य राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होता है।
वर्ष 1952 में हुए पहले राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक संसद सदस्य के मत का मूल्य 494 था। तब से अलग-अलग परिस्थियों में यह बढ़ता रहा। इस चुनाव में एक सांसद के वोटों की वैल्यू 700 होगी। इसके पहले यह 708 था, लेकिन जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश होने से और वहां विधायक नहीं होने से वोटों का मूल्य घट गया है। एक समय यह 702 भी रह चुका है।
जहां तक विधायकों के वोटों के मूल्य का सवाल है तो यह प्रदेश की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होता है। जैसे देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट का मूल्य 208 है। इसी तरह बिहार के एक विधायक के वोट की वैल्यू 173 है। तो सबसे कम जनसंख्या वाले प्रदेश सिक्किम के वोट का मूल्य मात्र सात। यानी की अगर यूपी का एक विधायक वोट डालेगा तो उसकी गिनती सीधे 208 होगी और वहीं सिक्किम का एक विधायक वोट डालेगा तो उसकी गिनी सात होगी। इसी आधार पर आप राज्य के विधायकों के मूल्य का आंकलन कर सकते हैं। मतदान के वक्त बैलेट पेपर पर पहली, दूसरी और तीसरी पसंद का जिक्र किया जाता है। इसके बाद जिसकी जीत होती है उसकी घोषणा की जाती है।
क्या कार्यकाल खत्म होने के बाद राष्ट्रपति का राजनीतिक जीवन थम जाता है
राष्ट्रपति के बारे में एक धारणा यह भी है कि राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद उनका राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। वो चाहे तो किसी भी तरह से राजनीतिक जीवन में रह सकते हैं। लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद स्वाभाविक है कि वो सांसद या विधायक या राज्यपाल बनना पसंद नहीं करेंगे, क्योंकि ये सब तो राष्ट्रपति के नीचे के पद हैं।
राष्ट्रपति के अधिकार
राष्ट्रपति के अधिकारों की बात करें तो भले वह सरकार के कैबिनेट और प्रधानमंत्री की मंजूरी से काम करते हैं लेकिन कोई भी अधिनियम उनकी मंजूरी के बिना पारित नहीं हो सकता। वो वित्त बिल को छोड़कर किसी भी बिल को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं। राष्ट्रपति का मूल कर्तव्य संघ की कार्यकारी शक्तियों का निर्वहन करना है। फौज के प्रमुखों की नियुक्ति भी वो करते हैं।
राष्ट्रपति उम्मीदवार की योग्यता
राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की उम्र और योग्यता की बात करें तो राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को भारत का नागरिक होना चाहिए। उनकी उम्र कम से कम 35 साल होनी चाहिए। और इसके साथ इलेक्टोरल कॉलेज के पचास प्रस्तावक और पचास समर्थन करने वाले होने चाहिए।
राष्ट्रपति को पद से कैसे हटाया जा सकता है
राष्ट्रपति को उसके पद से महाभियोग के ज़रिये हटाया जा सकता है। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य को चौदह दिन का नोटिस देना होता है। इस पर कम से कम एक चौथाई सदस्यों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं। इसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होती है। अब तक हुए राष्ट्रपति चुनावों को देखें तो नीलम संजीव रेड्डी अकेले राष्ट्रपति हुए जो निर्विरोध चुने गए थे और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अकेले राष्ट्रपति थे जो दो बार चुने गए।
यह भी उन गरीब कबीरपंथीओं की तरह कहते हैं कि अपने अनुभव से अपनी साधना से अंतर्मन को साफ करो, अपना दीपक खुद जलाओ यह बुद्ध का मार्ग है। लेकिन यह लोग यह नहीं देखते गौतम बुद्ध स्वयं बुद्धत्व प्राप्ति के पहले ही अपने जीवन में कितना बड़ा बदलाव लाए थे। सुख सुविधा का जीवन छोड़कर कष्ट का मार्ग चुना,अपना भोजन अपना पहनावा अपने मित्र अपनी सोच अपनी दिनचर्या सब बदल डाली। लेकिन आज के अधिकांश कबीरपंथी और बौद्ध मित्र नाम साधना या फिर विपस्सना मे ही लगे रहते हैं। वे अपने घर अपने बीवी बच्चों को अपने परिवार को, उनके त्योहारों उनके कर्मकांड इत्यादि को बदलने की कोशिश नहीं करते।जैसे कबीर की सामाजिक क्रांति को भ्रष्ट करने के लिए दुनिया भर के शास्त्रीय महापंडित रहस्यवादी गीत गाते हैं, उसी तरह गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति को नष्ट करने के लिए दाढ़ी वाले बाबा लोग गौतम बुद्ध को बड़ा रहस्यवादी बताते हैं। ये एक ही खेल के दो चेहरे हैं। दुर्भाग्य से भारत के कबीरपंथी और बौद्ध धर्म इस खेल में गहराई तक फंसे हुए हैं। ये लोग कबीर और बुद्ध को ढंग से पेश करते हैं जैसे कि उनका अपने समाज राजनीति अर्थव्यवस्था स्त्रियों की स्थिति गरीबों की स्थिति इत्यादि से कोई संबंध ही नहीं रहा है।