जिस देश में संविधान को लागू हुए 70 वर्ष हो गए हों और फिर भी उस देश के नागरिक मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य में लगे हों तो उस देश के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है। हम भले ही मंगलयान और चंद्रयान भेज कर गदगद होते रहें, अपनी पीठ थपथपाते रहें पर इससे देश की अंदरूनी वास्तविकता बदल नहीं जाएगी। इसका भी क्या लाभ कि एक तरफ हम स्वच्छ भारत अभियान चलाते रहें और दूसरी ओर देश के नागरिक मानव मल-मूत्र अपने हाथों से साफ़ करते रहें और ढोते रहें। हमारा संविधान हमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। फिर भी देश की आबादी का एक तबका अभी भी शुष्क शौचालयों से मानव मल साफ़ करके अपनी जीविका चला रहा है। यह न केवल देश के लिए बल्कि देश के सभ्य नागरिकों के लिए भी शर्मनाक है।
क्यों जारी है देश में मानव मल ढोने की अमानवीय प्रथा
मानव मल ढोने की अमानवीय प्रथा इस देश के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले पांच हजार सालों से ये बदस्तूर जारी है। समाज का एक समुदाय इस प्रथा का इतना आदी हो चुका है कि वह स्वयं कहने लगा है की यह हमारा काम है। विडंबना यह है कि जो समुदाय हमारी साफ़-सफाई करके हमें स्वच्छ रखता है, हमें बीमारियों से बचाता है, वही हमारी नजर में नीच है, घृणास्पद है। क्यों है ऐसा? क्योंकि हमारे समाज में हजारों सालों से छुआछूत की प्रथा रही है। भेदभाव की प्रथा रही है। बाद में 1950 में देश में जब संविधान लागू हुआ तब इसके अनुच्छेद 17 में छुआछूत या अस्पृश्यता का अंत संविधान के स्तर पर हुआ पर समाज में यह अभी भी विद्यमान है। आज़ादी के 74 साल बाद भी देश का एक तबका हाथ से मानव मल साफ़ करने में लगा है जाहिर है उसके लिए ये आज़ादी बेमानी है।
यहां Click कर दलित दस्तक मासिक पत्रिका की सदस्यता लें26 जनवरी के दिन हम पूरी दुनिया को अपनी समृद्धि, अपना गौरव दिखाते हैं। पर इस मैला प्रथा को कारपेट के नीचे छिपाते हैं जबकि लाखों सफाई कर्मचारी इस अमानवीय प्रथा में लगे हैं। हम अपने विकास की ऐसी-ऐसी झांकी दिखाते हैं कि विश्व हमारे वैभव पर मुग्ध हो जाता है। हमारे शक्ति प्रदर्शन पर हैरान होता है। हम अपनी इस उज्जवल छवि पर इतराते हैं। पर कभी नहीं सोचते कि हमारे जैसा ही इंसान मानव मल साफ़ करने और ढोने का काम कर रहे हैं। हम उन्हें देखते हैं तो घृणा से मुहं फेर लेते हैं।
कैसे हो इस मैला प्रथा का खात्मा
मैला प्रथा को खत्म करने की नीयत भारत की सरकारों की नहीं लगती। गौरतलब है कि किसान आन्दोलन के दौरान अब तक 60 से 70 किसान मर चुके हैं पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक शब्द तक नहीं बोला। इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी के अब तक के शासन काल में अनेक सफाई कर्मचारी सीवर सफाई के दौरान दम घुटने से अपनी जान गवां चुके हैं। पर प्रधानमंत्री ने एक शब्द भी नहीं बोला। इन दलितों और गरीबों की वे भला क्यों चिंता करें ये कोई अडानी या अम्बानी तो हैं नहीं। प्रशासन के लिए मैला प्रथा कोई मुद्दा ही नहीं है। कुछ प्रशासनिक अधिकारी तो यह तक कहते हैं कि सफाई का काम सफाई समुदाय नहीं करेगा तो कौन करेगा। इनका तो ये काम ही है। हां, देश के प्रधानमंत्री दिखावे और वोट के लिए इस समाज के पैर जरूर धो सकते हैं।
मैला प्रथा उन्मूलन पर सरकार ने औपचारिकतावश दो-दो क़ानून बनाए हैं। एक वर्ष 1993 में और दूसरा 2013 में। इन कानूनों के अनुसार मैला प्रथा दंडनीय अपराध है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से मैला ढुलवाने का काम करवाता है तो वह कानून के अनुसार अपराधी है। उसके लिए दो साल की जेल और दो लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। पर अभी तक इस प्रकार के किसी अपराधी को कोई सजा नहीं मिली। क्यों? कारण साफ़ है प्रशासन का उदासीन रवैया। यक्ष प्रश्न यही कि फिर कैसे मिटेगी मैला प्रथा? इसके लिए सरकार पर दबाब बनाना जरूरी है। कैसे बनेगा यह दबाब? इसके लिए देश के संवेदनशील नागरिकों को पहल करनी होगी। हर स्तर पर दबाब बनाना होगा – संसद से सड़क तक।
सफाई कर्मचारी आंदोलन की पहल

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने भी यह माना है कि एक लाख से अधिक सफाई कर्मचारी (जिनमे अधिकांश महिलायें हैं) शुष्क शौचालय साफ़ करने में लगे हैं। सटीक डेटा तो सरकार के पास भी नहीं है। सरकार की स्वीकार्यता के बावजूद शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने और सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास करने में सरकार रुचि नहीं ले रही है। ऐसे में सफाई कर्मचारी आंदोलन ने 100 दिन 100 जिलों में शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने के लिए सरकार पर दबाब बनाने की पहल की है। गौरतलब है कि सफाई कर्मचारी आंदोलन एक राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन है। इस अभियान के अंतर्गत सफाई कर्मचारी आंदोलन के कार्यकर्ता शुष्क शौचालयों का सर्वे करते हैं। उन्हें साफ़ करने वाले सफाई कर्मचारियों का सर्वे करते हैं। फिर ज्ञापन तैयार कर उस जिले के जिला अधिकारी को देते हैं। ज्ञापन में वे शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने और सफाई कर्मचारियों को इज्जतदार पेशों में पुनर्वास की मांग एम.एस. एक्ट 2013 के अंतर्गत करते हैं।
इसके लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन के कार्यकर्ता पदयात्रा, साइकिल यात्रा, मोटर साइकिल यात्रा और जीप यात्रा निकालने की भी तैयार कर रहे हैं। वे रैली निकालकर जिला अधिकारी को ज्ञापन सौंपते हैं। ज्ञापन में शुष्क शौचालयों की लोकेशन और उन्हें साफ़ करने वाली सफाई कर्मचारियों का विवरण होता है ताकि सरकार उन शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदल दे और सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास कर दे। इस मामले में कार्यकर्त्ता शुष्क शौचालयों के मालिकों से मिलते हैं और उन्हें समझाते हैं कि वे शुष्क शौचालयों का इस्तेमाल न करें। इन्हें जल चालित में बदलवा लें।
संविधान में है गरिमा के साथ जीने का अधिकार
आज हम इक्कीसवीं सदी के तकनीक और आधुनिक समय में जी रहे हैं। शहर-शहर गाँव-गाँव घर-घर मोबाइल पहुँच गए हैं। संचार क्रांति ने इतिहास रच दिया है। लोग अन्तरिक्ष की सैर पर जाने लगे हैं। और एक हमारा सफाई कर्मचारी समुदाय है जो अभी भी अठारहवी सदी में जी रहा है। शुष्क शौचालयों से हाथ से मल-मूत्र साफ़ कर रही हैं हमारी महिलाएं! जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार देश के हर नागरिक को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। गरिमापूर्ण आजीविका अपनाने का अधिकार है।
यहां Click कर दलित दस्तक YouTube चैनल को सब्सक्राइब करिएसफाई समुदाय के लोगों को व्यवस्था ने अनपढ़ बनाए रखा। उन्हें आर्थिक दृष्टि से दीन-हीन रखा। सामाजिक दृष्टी से दलित रखा। राजनीति में इनका प्रवेश वर्जित रखा। इन्हें सिर्फ वोट बैंक तक सीमित रखा। सांस्कृतिक दृष्टि से इन्हें अंधविश्वासों में डुबाए रखा। शराब पीना, जुआ खेलना, भूत-प्रेतों में विश्वाश, दहेज़ प्रथा जैसी अनेक सामाजिक बुराइयों में जकड़े रखा। ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता ने इन्हें कथित उच्च जातियों का गुलाम बनाए रखा। जन्म से ही इन पर गंदे पेशे थोप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि आज के आधुनिक समय में भी यह समुदाय अत्यधिक पिछड़ा हुआ है। क्या इनकी इस दयनीय स्थिति के लिए हम सब जिम्मेदार नहीं हैं? आखिर कब तक ये मानव मल ढोने जैसी अमानवीय एवं घृणित प्रथा में लिप्त रहेंगे? इन्हें इनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए कौन पहल करेगा – सभ्य समाज? सरकार?? और कब???


डॉ. आबेडकर के नेतृत्व में भारतीय संविधान सभा ने भी गणतंत्रात्मक लोकतंत्र का रास्ता चुना और जन्म-आधारित सभी प्रकार के विशेषाधिकारों और स्वाभाविक तौर पर बड़े होने के दावों को खारिज कर दिया। भारत में वर्ण-जाति व्यवस्था पूरी तरह से जन्म-आधारित विशेषाधिकार और अधिकार विहीनता पर टिकी हुई थी, जिसमें लिंग के आधार पर महिलाओं पर पुरूषों को भी विशेषाधिकार और वर्चस्व प्राप्त था। जन्म और लिंग-आधारित विशेषाधिकार ही ब्राह्मणवाद का मूलतत्व रहा है, इसको खारिज करते हुए डॉ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव डाली। उन्हें लोकतांत्रिक गणतंत्र कितना प्रिय था, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में जिस पार्टी की नींव डाली, उस पार्टी का नाम उन्होंने ‘द रिपब्लिकन (गणतांत्रिक) पार्टी ऑफ इंडिया’रखा।
उपरोक्त उद्धरण में डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में हिंदू राष्ट्र को पूर्णत: लोकतंत्र विरोधी और मुसलमानों के अलावा अन्य सभी दमित वर्गों के लिए खतरा मान रहे हैं। डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य की परिकल्पना और हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना दो बिलकुल विपरीत ध्रुव हैं, दोनों के बीच कोई जोड़ने वाला सेतु नहीं है, यदि हिंदू राष्ट्र फलता-फूलता है, तो डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य खतरे में है। फिलहाल भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य के सम्मुख हिंदू राष्ट्र का गंभीर खतरा आ उपस्थित हुआ है, इस खतरे से भारतीय गणतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है, जो लोकतांत्रिक गणतंत्र की डॉ. आंबेडकर और संविधान सभा के अन्य सदस्यों की परिकल्पना के साथ खड़ा है।
यूरोप-अमेरिका के पूंजीवादी समाज के अपने निजी अनुभव और अध्ययन के आधार पर डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि आर्थिक असमानता के रहते हुए बंधुता कायम नहीं हो सकती है। सामाजिक समता के साथ आर्थिक समता भी बंधुता की अनिवार्य शर्त है। यूरोप-अमेरिका में काफी हद तक सामाजिक समता थी, लेकिन पूंजीवादी आर्थिक असमानता के चलते बंधुता का अभाव डॉ. आंबेडकर को दिखा। आर्थिक समता के लिए उन्होंने राजकीय पूंजीवाद की स्थापना का प्रस्ताव अपनी किताब ‘राज्य और अल्पसंख्यक में रखा। उन्होंने कृषि भूमि के निजी मालिकाने को पूरी तरह खत्म करने और उसका पूरी तरह राष्ट्रीयकरण करने का प्रस्ताव इस किताब में किया है। इसके साथ उन्होंने सभी बड़े और बुनियादी उद्योग धंधों को भी राज्य के मालिकाने में रखने का प्रस्ताव किया है। कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण के माध्यम से ही आर्थिक समता हासिल की जा सकती है, यह डॉ. आंबेडकर के चिंतन का एक बुनियादी तत्व है। सामाजिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद है और आर्थिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा पूंजीवाद है। इन्हीं दोनों तथ्यों को ध्यान में रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद को कामगारों के सबसे बड़े दो दुश्मन घोषित किए।
ब्राह्मणवादी और हिंदू भारत का विकल्प था। बुद्धमय भारत उनके समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित भारत के स्वप्न का एक अन्य आधार स्तंभ था। डॉ. आंबेडकर के प्रयासों के चलते भारतीय गणराज्य के बहुत सारे प्रतीकों में बौद्ध प्रतीकों को शामिल किया गया। जैसे- राष्ट्रीय ध्वज में धर्मचक्र, प्राचीन भारत के बौद्ध सम्राट अशोक के सिंहों को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में मान्यता देना और राष्ट्रपति भवन की त्रिकोणिका पर एक बौद्ध सूक्ति को उत्कीर्ण करना। संविधान में भी उन्होंने बौद्ध धम्म के कुछ बुनियादी तत्वों को समाहित किया। इस संदर्भ में उन्होंने स्वयं लिखा है- “मैं भी हिंदुस्तान में सर्वांगीण पूर्ण तैयारी होने पर बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाला हूं। संविधान बनाते समय उस दृष्टि से अनुकूल होने वाले कुछ अनुच्छेदों को मैंने उसमें अंतर्भूत किया है।”(धनंजय कीर, पृ.457) उन्होंने बौद्ध धम्म को वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता, समता और बंधुता की भावना पर खरा पाया। जिसमें ईश्वर और किसी पारलौकिक दुनिया के
गणतंत्रात्मक भारत, बंधुता-आधारित भारत और बुद्धमय भारत डॉ. आंबेडकर के सपनों के भारत के तीन बुनियादी तत्व थे, लेकिन इन तीनों तत्वों को तभी हासिल किया जा सकता है, जब भारतीय जन प्रबुद्ध बनें। प्रबुद्ध भारत की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए उन्होंने 4 फरवरी 1956 को ‘प्रबुद्ध भारत’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। प्रबुद्ध व्यक्ति एवं समाज वही हो सकता है, जो वैज्ञानिक चेतना से लैश हो और हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसता हो तथा आलोचनात्मक दृष्टि से देखता हो। डॉ. आंबेडकर स्वयं बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रबुद्ध व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे हर चीज को एक समाज वैज्ञानिक की दृष्टि से आलोचनात्मक नजरिए से देखते थे और तर्क की कसौटी पर कसते थे। जो कुछ भी उनकी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, उसे वे खारिज कर कर देते थे। उन्होंने बौद्ध धम्म को भी तर्क की कसौटी पर कसा और आलोचनात्मक नजरिए से देखा और उसे नया नाम ‘नवयान’ दिया।
20 जनवरी 2021 को सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, लेखक, राजनेता और अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ.माता प्रसाद का लखनऊ का एसजीपीजीआई, लखनऊ में निधन हो गया। माता प्रसाद का जन्म जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्टूबर 1924 को हुआ था। साल 1942-43 में मछलीशहर से उन्होंने हिंदी-उर्दू में मिडिल परीक्षा पास की। गोरखपुर के एक स्कूल से ट्रेनिंग के बाद वह यहां के मड़ियाहूं के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। इस दौरान उन्होंने गोविंद, विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की। उन्हें लोकगीत और गाने का शौक था। उनकी कुशलता को देखते हुए उन्हें 1955 में जिला कांग्रेस कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया।

कोविड वैक्सीन को लेकर अलग-अलग तरह की खबरें आना लगातार जारी है। इसके सुरक्षित होने, साइड इफेक्ट होने और नहीं होने आदि को लेकर तरह-तरह की खबरें आ रही है। ऐसे में खुद वैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक सामने आई है और उसने कई अहम जानकारियां साझा की है। भारत बायोटेक ने फैक्टशीट जारी करके बताया है कि किस बीमारी या अवस्था में लोगों को कोरोना वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन, कृषि कानूनों पर विचार करने के लिए जिन चार सदस्यों की कमेटी का गठन किया था, उसके एक सदस्य भूपेंद्र सिंह मान ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा कि “वे हमेशा पंजाब और किसानों के साथ खड़े हैं। एक किसान और संगठन का नेता होने के नाते वह किसानों की भावना जानते हैं। वह किसानों और पंजाब के प्रति वफादार हैं। किसानों के हितों से कभी कोई समझौता नहीं कर सकते। वह इसके लिए कितने भी बड़े पद या सम्मान की बलि दे सकते हैं। मान ने पत्र में लिखा कि वह कोर्ट की ओर से दी गई जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, अतः वह खुद को इस कमेटी से अलग करते हैं।”
जनवरी की 15 तारीख बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती का जन्मदिन होता है। इस मौके पर बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने देश भर में बहनजी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया। अपने पिछले कई जन्मदिन की तरह इस साल भी बसपा प्रमुख ने “मेरे संघर्षमय जीवन एवं बी.एस.पी. मूवमेन्ट का सफरनामा, भाग-16” के हिन्दी और अंग्रेजी वर्जन का विमोचन किया। इस पुस्तक की लेखक बसपा प्रमुख मायावती खुद हैं।
भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की संख्या गिनी-चुनी ही हैं। उनमें से एक नाम सुश्री मायावती का आता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस उम्र में महिलाएं अपना जीवन ठीक से नहीं चला पाती हैं उस उम्र में मायावती सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारत में जाति व्यवस्था के दुष्चक्र से बाहर आ पाना पत्थर पर सर मारने जैसा है। मायावती एक दलित समुदाय से आती हैं ऐसे में वह जातीय संघर्ष करते हुए अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं। उनके शासनकाल में उत्तरप्रदेश में दलितों व महिलाओं की स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई देता था। वह अपने छोटे-बड़े कार्यकाल को मिलाकर कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं।
मायावती की एक खासियत यह भी है कि इन्होंने मान्यवर कांशीराम के सानिध्य और मार्गदर्शन में राजनीति में अपनी पहचान स्वयं बनाई। इनका पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। पिताजी का सपना था कि बेटी एक आईएएस ऑफिसर या वकील बनकर देश की सेवा करे। लेकिन मायावती कि दृढ़ इच्छा, स्पष्ट वाक्पटुता और मान्यवर कांशीराम के मार्गदर्शन में वो राजनीति की ओर आईं। इस बारे में मायावती ने कहा था ‘मैंने राजनीति में आने का जो फ़ैसला किया तो मुझे दूसरे नेताओं की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली। हमारे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है, दूर-दूर तक हमारे रिश्ते नातों में भी कोई राजनीति में नहीं है।’ लेकिन बिना राजनीतिक विरासत के भी मायावती ने देश की सियासत खलबली मचा दी।
वर्गों और अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, मायावती ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आरक्षण का समर्थन किया, जिसमें कोटा और धार्मिक अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों जैसे समुदायों को शामिल किया गया। अगस्त 2012 में एक बिल को मंजूरी दी गई थी जो संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करती है ताकि राज्य की नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण प्रणाली का विस्तार किया जा सके। जाति के दंश को इस रूप में भी समझा सकता है कि आप बहुत अच्छे हैं, कोई कमी नहीं है आपमें। जाति पता चलते ही आप बुरे हो जाते हैं। आप कामचोर हो जाते हैं, आपकी सारी ‘मेरिट’ ख़त्म हो जाती है और आप आरक्षण का फ़ायदा लेकर हर जगह घुसपैठ करने वाले बन जाते हैं। मायावती ने इन सबको धता बताते हुए अपनी पहचान स्वयं बनाई। मायावती के करियर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा “लोकतंत्र का चमत्कार” कहा गया है। लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें ‘बहन जी’ के रूप में संदर्भित करते हैं।
मायावती के होने से हाशिये के समाज की महिलाओं के अंदर एक चेतना आई है। मायावती अपने शासनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया और अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है। जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है। मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके किये कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है। हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए। मायावती ने अपनी चौथे कार्यकाल में बहुजन इतिहास को जीवित करने के लिए भी काफ़ी काम किया। मायावती ने बहुजन नायक-नायिकाओं के सम्मान में ऐतिहासिक काम कर दिखाया। जिन बहुजन नायक-नायिकाओं को इतिहास में कभी उचित सम्मान नहीं मिला था, मायावती ने उनकी शानदार प्रतिमाएँ लगाकर बहुजन समाज से उनका परिचय कराया।
कभी-कभार के अपवादों को छोड़कर भारत के सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश निर्णायक फैसले वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, जमींदारों-भूस्वामियों के हितों की रक्षा और पूंजीवाद के पक्ष की ओर झुकते मिले हैं यानि सुप्रीकोर्ट अपरकॉस्ट, मर्दों, सामंतो-भूस्वामियों और पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करता रहा है। इन वर्चस्वशाली समूहों के विपरीत सुप्रीमकोर्ट ने भी तभी फैसले दिए, जब उसे जन दबाव का सामना करना पड़ा या इस बात की आशंका पैदा हुई कि उसके किसी फैसले से भारी जनाक्रोश पैदा हो सकता है, जो वर्चस्वशाली समुदायों के लिए खतरा बन सकता है।
केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए तीनों कृषि कानून के लागू होने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने आज (मंगलवार 12 जनवरी 2021) को ये फैसला सुनाया, साथ ही अब इस मसले को सुलझाने के लिए कमेटी का गठन कर दिया गया है। सरकार और किसानों के बीच लंबे वक्त से चल रही बातचीत का हल ना निकलने पर सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला लिया। शीर्ष न्यायालय द्वारा चार सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। इस कमेटी में भारतीय किसान यूनियन के जितेंद्र सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ) और अनिल शेतकारी शामिल हैं।
असम के तिनसुकिया बोरगुरी इलाके में बीते 21 दिसंबर से दो गांवों के 1480 लोग कड़ाके की ठंड में धरने पर बैठे हुए हैं। ठंड ने दो प्रदर्शनकारियों की जान ले ली है, बावजूद इसके लोग धरने से उठने को तैयार नहीं है। इंसानियत को शर्मसार करती एक सच्चाई यह भी है कि इनकी फिक्र न तो सरकार को है, न ही स्थानीय प्रशासन को।
जिन दो गांवों के लोग धरने पर हैं, उस गांव का नाम- लाइका और दोधिया है। ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट में स्थित डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क के मुख्य क्षेत्र में मिसिंग जनजाति के ये दो वन गाँव बीते 70 सालों से बसे हुए है। लेकिन राष्ट्रीय उद्यान होने के कारण वहां लोगों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी सरकारी योजनाओं को बंद कर दिया गया है। ऐसे में इन दोनों गांवों के लोग पिछले कई सालों से स्थायी पुनर्वास की मांग को लेकर आंदोलन करते आ रहे हैं। लेकिन अब इनकी मांग है कि जबतक सरकार किसी दूसरी ज़मीन पर इन्हें स्थायी तौर पर बसा नहीं देती ये धरना स्थल पर ही रहेंगे।
कड़ाके की इस ठंड में प्रदर्शन स्थल पर अबतक दो महिलाओं की मौत हो चुकी है जबकि कई लोग लगातार बीमार पड़ रहे हैं। एक प्रदर्शनकारी दमयंती अपने विरोध और दर्द को मिसिंग जनजाति का एक गीत गाकर बयां करती हैं तो पास बैठी महिलाएं रोने लगती हैं। वो कहती हैं कि हमारा कोई ठिकाना नहीं है और हमें नहीं पता इस शिविर में हमारा आगे क्या होगा? हम ज़िंदा भी रहेंगे या नहीं। हमारे साथ सरकार क्या करेगी, जिस तरह ब्रह्मपुत्र का पानी बह रहा है उसे पता नहीं वो कहां जाकर गिरेगा, ठीक वैसा ही हमारा जीवन हो गया है।
हावर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा आयोजित किए जा रहे इस 18वें ‘वार्षिक भारत सम्मेलन’ का आयोजन 2021 की 19 फरवरी से 21 फरवरी तक किया जाना है। इसी बीच 20 फरवरी के दिन हेमंत सोरेन अपना व्याख्यान देंगे। गौरतलब है कि ‘वार्षिक भारत सम्मेलन’ भारत पर केंद्रित एक बड़ा फोरम है जिसपर पूरी दुनियाभर के छात्रों और बुद्धजीवियों की नजर रहती है। यह भी गौरतलब है कि साल 2020 के ‘हार्वर्ड इंडिया कांफ्रेंस’ में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास भी हिस्सा ले चुके हैं, जहां उन्होंने
केंद्र सरकार और किसानों के बीच कृषि बिल को लेकर मामला उलझता जा रहा है। आज दोनों पक्षों के बीच 8वें दौर की बातचीत हुई, लेकिन एक बार फिर बैठक बेनतीजा ही रही। आलम यह हो गया कि बैठक में सरकार की ओर से शामिल तीनों मंत्री बैठक से बाहर निकल कर चले गए। बैठक में कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर और उनके साथी मंत्री किसानों से बातचीत में शामिल थे।
यह दलितों के अधिकारों की बात करने वाली आधुनिक युग की पहली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे के शब्द हैं। इनके शब्दों में वेदना और आक्रोश साफ झलकते हैं। मुक्ता सावित्रीबाई और ज्योतिबाई फुले की पाठशाला की छात्रा थीं।
मुक्ता क्रांतिवीर लहूजी साल्वे की पोती थीं, जो महाराष्ट के क्रांतिकारी हुआ करते थे। लहूजी ने महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले को लड़कियों के सबसे पहले स्कूल को खुलवाने में मदद की थी और उनका यह स्कूल 1 जनवरी 1848 पुणे में खुला था।
15 फरवरी 1855 को मात्र 14 साल की उम्र में उन्होंंने अपने निबंध में पेशवा राज (ब्राह्मणों का राज) में दलितों की स्थिति को शब्दों में व्यक्त किया था। उन्होंने इनके के दुखों, चुनौतियों और निवारण के उपायों के संबंध में विस्तृत निबंध लिखा था, जिसे मराठी पत्रिका ज्ञानोदय ने सर्वप्रथम ‘मांग महाराच्या दुखविसाई’ शीर्षक से दो भागों में प्रकाशित किया था। पहला भाग 15 फरवरी 1855 तथा दूसरा भाग 1 मार्च 1855 को प्रकाशित हुआ था। 5 जनवरी 2021 को उन्हीं मुक्ता सालवे की 177 वीं जयंती है। उन्हें नमन।