संविधान के 70 साल बाद भी  मैला ढोता भारत

 जिस देश में संविधान को लागू हुए 70 वर्ष हो गए हों और फिर भी उस देश के नागरिक मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य में लगे हों तो उस देश के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है। हम भले ही मंगलयान और चंद्रयान भेज कर गदगद होते रहें, अपनी पीठ थपथपाते रहें पर इससे देश की अंदरूनी वास्तविकता बदल नहीं जाएगी। इसका भी क्या लाभ कि एक तरफ हम स्वच्छ भारत अभियान चलाते रहें और दूसरी ओर देश के नागरिक मानव मल-मूत्र अपने हाथों से साफ़ करते रहें और ढोते रहें। हमारा संविधान हमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। फिर भी देश की आबादी का एक तबका अभी भी शुष्क शौचालयों से मानव मल साफ़ करके अपनी जीविका चला रहा है। यह न केवल देश के लिए बल्कि देश के सभ्य नागरिकों के लिए भी शर्मनाक है।

क्यों जारी है देश में मानव मल ढोने की अमानवीय प्रथा

मानव मल ढोने की अमानवीय प्रथा इस देश के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले पांच हजार सालों से ये बदस्तूर जारी है। समाज का एक समुदाय इस प्रथा का इतना आदी हो चुका है कि वह स्वयं कहने लगा है की यह हमारा काम है। विडंबना यह है कि जो समुदाय हमारी साफ़-सफाई करके हमें स्वच्छ रखता है, हमें बीमारियों से बचाता है, वही हमारी नजर में नीच है, घृणास्पद है। क्यों है ऐसा? क्योंकि हमारे समाज में हजारों सालों से छुआछूत की प्रथा रही है। भेदभाव की प्रथा रही है। बाद में 1950 में देश में जब संविधान लागू हुआ तब इसके अनुच्छेद 17 में छुआछूत या अस्पृश्यता का अंत संविधान के स्तर पर हुआ पर समाज में यह अभी भी विद्यमान है। आज़ादी के 74 साल बाद भी देश का एक तबका हाथ से मानव मल साफ़ करने में लगा है जाहिर है उसके लिए ये आज़ादी बेमानी है।

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 26 जनवरी के दिन हम पूरी  दुनिया को अपनी समृद्धि, अपना गौरव दिखाते हैं। पर इस मैला प्रथा को कारपेट के नीचे छिपाते हैं जबकि लाखों सफाई कर्मचारी इस अमानवीय प्रथा में लगे हैं। हम अपने विकास की ऐसी-ऐसी झांकी दिखाते हैं कि विश्व हमारे वैभव पर मुग्ध हो जाता है। हमारे शक्ति प्रदर्शन पर हैरान होता है। हम अपनी इस उज्जवल छवि पर इतराते हैं। पर कभी नहीं सोचते कि हमारे जैसा ही इंसान मानव मल साफ़ करने और ढोने का काम कर रहे हैं। हम उन्हें देखते हैं तो घृणा से मुहं फेर लेते हैं।

कैसे हो इस  मैला प्रथा का खात्मा

मैला प्रथा को खत्म करने की नीयत भारत की सरकारों की नहीं लगती। गौरतलब है कि किसान आन्दोलन के दौरान अब तक 60 से 70 किसान मर चुके हैं पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक शब्द तक नहीं बोला। इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी के अब तक के शासन काल में अनेक सफाई कर्मचारी सीवर सफाई के दौरान दम घुटने से अपनी जान गवां चुके हैं। पर प्रधानमंत्री ने एक शब्द भी नहीं बोला। इन दलितों और गरीबों की वे भला क्यों चिंता करें ये कोई अडानी या अम्बानी तो हैं नहीं। प्रशासन के लिए मैला प्रथा कोई मुद्दा ही नहीं है। कुछ प्रशासनिक अधिकारी तो यह तक कहते हैं कि सफाई का काम सफाई समुदाय नहीं करेगा तो कौन करेगा। इनका तो ये काम ही है। हां, देश के प्रधानमंत्री दिखावे और वोट के लिए इस समाज के पैर जरूर धो सकते हैं।

 मैला प्रथा उन्मूलन पर सरकार ने औपचारिकतावश दो-दो क़ानून बनाए हैं। एक वर्ष 1993 में और दूसरा 2013 में। इन कानूनों के अनुसार मैला प्रथा दंडनीय अपराध है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से मैला ढुलवाने का काम करवाता है तो वह कानून के अनुसार अपराधी है। उसके लिए दो साल की जेल और दो लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। पर अभी तक इस प्रकार के किसी अपराधी को कोई सजा नहीं मिली। क्यों? कारण साफ़ है प्रशासन का उदासीन रवैया। यक्ष प्रश्न यही कि फिर कैसे मिटेगी मैला प्रथा? इसके लिए सरकार पर दबाब बनाना जरूरी है। कैसे बनेगा यह दबाब? इसके लिए देश के संवेदनशील नागरिकों को पहल करनी होगी। हर स्तर पर दबाब बनाना होगा – संसद से सड़क तक।

सफाई कर्मचारी  आंदोलन की पहल

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सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने भी यह माना है कि एक लाख से अधिक सफाई कर्मचारी (जिनमे अधिकांश महिलायें हैं) शुष्क शौचालय साफ़ करने में लगे हैं। सटीक डेटा तो सरकार के पास भी नहीं है। सरकार की स्वीकार्यता के बावजूद शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने और सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास करने में सरकार रुचि नहीं ले रही है। ऐसे में सफाई कर्मचारी आंदोलन ने 100 दिन 100 जिलों में शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने के लिए सरकार पर दबाब बनाने की पहल की है। गौरतलब है कि सफाई कर्मचारी आंदोलन एक राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन है। इस अभियान के अंतर्गत  सफाई कर्मचारी आंदोलन के कार्यकर्ता शुष्क शौचालयों का सर्वे करते हैं। उन्हें साफ़ करने वाले सफाई कर्मचारियों का सर्वे करते हैं। फिर ज्ञापन तैयार कर उस जिले के जिला अधिकारी को देते हैं। ज्ञापन में वे शुष्क शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदलने और सफाई कर्मचारियों को इज्जतदार पेशों में पुनर्वास की मांग एम.एस. एक्ट 2013 के अंतर्गत करते हैं।

इसके लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन के कार्यकर्ता पदयात्रा, साइकिल यात्रा, मोटर साइकिल यात्रा और जीप यात्रा निकालने की भी तैयार कर रहे हैं। वे रैली निकालकर जिला अधिकारी को ज्ञापन सौंपते हैं। ज्ञापन में शुष्क शौचालयों की लोकेशन और उन्हें साफ़ करने वाली सफाई कर्मचारियों का विवरण होता है ताकि सरकार उन शौचालयों को जल चालित शौचालयों में बदल दे और सफाई कर्मचारियों का पुनर्वास कर दे। इस मामले में कार्यकर्त्ता शुष्क शौचालयों के मालिकों से मिलते हैं और उन्हें समझाते हैं कि वे शुष्क शौचालयों का इस्तेमाल न करें। इन्हें जल चालित में बदलवा लें।

संविधान में है गरिमा के साथ जीने का अधिकार

आज हम इक्कीसवीं सदी के तकनीक और आधुनिक समय में जी रहे हैं। शहर-शहर गाँव-गाँव घर-घर मोबाइल पहुँच गए हैं। संचार क्रांति ने इतिहास रच दिया है। लोग अन्तरिक्ष की सैर पर जाने लगे हैं। और एक हमारा सफाई कर्मचारी समुदाय है जो अभी भी अठारहवी सदी में जी रहा है। शुष्क शौचालयों से हाथ से मल-मूत्र साफ़ कर रही हैं हमारी महिलाएं!  जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार देश के हर नागरिक को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। गरिमापूर्ण आजीविका अपनाने का अधिकार है।

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सफाई समुदाय के लोगों को व्यवस्था ने अनपढ़ बनाए रखा। उन्हें आर्थिक दृष्टि से दीन-हीन रखा। सामाजिक दृष्टी से दलित रखा। राजनीति में इनका  प्रवेश वर्जित रखा। इन्हें सिर्फ वोट बैंक तक सीमित रखा। सांस्कृतिक दृष्टि से इन्हें अंधविश्वासों में डुबाए रखा। शराब पीना,  जुआ खेलना, भूत-प्रेतों में विश्वाश, दहेज़ प्रथा जैसी अनेक सामाजिक बुराइयों में जकड़े रखा। ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता ने इन्हें कथित उच्च जातियों का गुलाम बनाए रखा। जन्म से ही इन पर गंदे पेशे थोप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि आज के आधुनिक समय में भी यह समुदाय अत्यधिक पिछड़ा हुआ है। क्या इनकी इस दयनीय स्थिति के लिए हम सब जिम्मेदार नहीं हैं? आखिर कब तक ये मानव मल ढोने जैसी अमानवीय एवं घृणित प्रथा में लिप्त रहेंगे? इन्हें इनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए कौन पहल करेगा – सभ्य समाज? सरकार?? और कब???

डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य पर हिन्दू राष्ट्र का खतरा

 26 जनवरी आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में एक है। इसी दिन (26 जनवरी) 1950 को भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था और भारतीय संविधान को पूरी तरह लागू किया गया था। हालांकि 26 नवंबर 1950 को ही भारतीय संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर ने संविधान को संविधान सभा को सौंप दिया था और उसे संविधान सभा द्वारा स्वीकार भी कर लिया गया था, लेकिन भारतीय संविधान पूरी तरह से 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया। इसी दिन अतीत के उन सभी कानूनी प्रावधानों को खारिज करते हुए रद्द कर दिया गया, जो भारतीय संविधान से मेल न खाते हों, चाहे वे विभिन्न धर्मों के कानूनी दर्जा प्राप्त प्रावधान हों या ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के कानूनी प्रावधान हों।

 भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी भारत को एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। दुनिया में लोकतंत्र के दो रूप हैं- एक सिर्फ लोकतंत्र और दूसरा लोकतांत्रिक गणराज्य। पहले प्रकार के लोकतंत्र का उदाहरण ब्रिटेन है, जहां लोकतंत्र तो है, लेकिन वहां गणतंत्र नहीं है, जापान और स्पेन जैसे अन्य कई देश भी इसके उदाहरण हैं। इन देशों में राष्ट्राध्यक्ष राजा या रानी होते हैं। लोकतंत्रात्मक गणतंत्र का उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका और फ्रांस जैसे देश हैं, जहां राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष दोनों प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जनता द्वारा चुने जाते हैं। अमेरिका में राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष एक ही व्यक्ति होता है। 26 जनवरी 1950 को भारत ने लोकतांत्रिक गणराज्य का रास्ता चुना। सिर्फ लोकतंत्र होने का परिणाम यह है कि जहां ब्रिटेन और स्पेन में अभी भी राजा-रानी को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, भले ही वह कितना भी सीमित और औपचारिक क्यों न हो, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और भारत जैसे गणतंत्रात्मक लोकतंत्र में राजा-रानी के लिए कोई जगह नहीं है। इसका निहितार्थ यह है कि गणतांत्रिक लोकतंत्र में जन्म के आधार पर किसी को भी स्वाभाविक तौर पर बड़ा नहीं माना जाता है, न तो कोई विशेषाधिकार प्राप्त होता है और न ही किसी भी आधार पर राज्य का कोई पद किसी के लिए जन्म के आधार पर आरक्षित होता है।

 डॉ. आबेडकर के नेतृत्व में भारतीय संविधान सभा ने भी गणतंत्रात्मक लोकतंत्र का रास्ता चुना और जन्म-आधारित सभी प्रकार के विशेषाधिकारों और स्वाभाविक तौर पर बड़े होने के दावों को खारिज कर दिया। भारत में वर्ण-जाति व्यवस्था पूरी तरह से जन्म-आधारित विशेषाधिकार और अधिकार विहीनता पर टिकी हुई थी, जिसमें लिंग के आधार पर महिलाओं पर पुरूषों को भी विशेषाधिकार और वर्चस्व प्राप्त था। जन्म और लिंग-आधारित विशेषाधिकार ही ब्राह्मणवाद का मूलतत्व रहा है, इसको खारिज करते हुए डॉ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव डाली। उन्हें लोकतांत्रिक गणतंत्र कितना प्रिय था, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में जिस पार्टी की नींव डाली, उस पार्टी का नाम उन्होंने ‘द रिपब्लिकन (गणतांत्रिक) पार्टी ऑफ इंडिया’रखा।

इस साल 26 जनवरी 2021 को भारतीय गणतंत्र के 70 वर्ष पूरे हो जाएंगे। डॉ. आंबेडकर ने यह उम्मीद की थी कि भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव धीरे-धीरे मजबूत होती जाएगी और यह काफी हद तक हुई भी। जिसका परिणाम है कि वैचारिक तौर पर वर्ण-जाति की पक्षधर आर.एस.एस.-भाजपा को भी अपनी जरूरतों एवं मजबूरियों के चलते ही सही भारत राज्य के राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) के रूप में दलित समाज से आए एक व्यक्ति को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन इस प्रतीकात्मक उपलब्धि के बावजूद भी डॉ. आंबेडकर का भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य गंभीर खतरे में है और इस पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस पर सबसे बड़ा खतरा हिंदू राष्ट्र का खतरा है। जिसके संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि “अगर हिंदू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।”- (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338) हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य के भारत के स्वप्न को धूल-धूसरित करता है। जहां लोकतांत्रिक गणतंत्र में जन्म-आधारित छोटे-बड़े के लिए कोई स्थान नहीं होता, न ही कोई व्यक्ति पुरूष होने के चलते महिलाओं पर किसी प्रकार से वर्चस्व का दावा कर सकता है, वहीं हिंदू राष्ट्र की पूरी परिकल्पना जन्मगत श्रेष्ठता एवं निम्नता और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व पर आधारित है, जिसे किसी भी रूप में डॉ. आंबेडकर अपने लोकतांत्रिक गणराज्य में जगह देने के लिए तैयार नहीं थे। पुरुषों के वर्चस्व से महिलाओं की स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष के बीच समता के लिए उन्होंने हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया और मूलत: यही प्रश्न उनके लिए नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने का मूल कारण बना। इसके साथ हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिंदूओं के वर्चस्व एवं विशेषाधिकार का दावा करती है। धार्मिक वर्चस्व एवं विशेषाधिकार के लिए भी डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य में कोई जगह नहीं थी। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिंदू धर्म एक ऐसी राजनैतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः लोकतंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और/या नाजी विचारधारा जैसा ही है। अगर हिंदू धर्म को खुली छूट मिल जाए-और हिंदुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है- तो वह उन लोगों को आगे बढ़ने ही नहीं देगा जो हिंदू नहीं हैं या हिंदू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दमित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है” (सोर्स मटियरल आन डॉ. आंबेडकर, खण्ड 1, पृष्ठ 241, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)।

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उपरोक्त उद्धरण में डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में हिंदू राष्ट्र को पूर्णत: लोकतंत्र विरोधी और मुसलमानों के अलावा अन्य सभी दमित वर्गों के लिए खतरा मान रहे हैं। डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य की परिकल्पना और हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना दो बिलकुल विपरीत ध्रुव हैं, दोनों के बीच कोई जोड़ने वाला सेतु नहीं है, यदि हिंदू राष्ट्र फलता-फूलता है, तो डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य खतरे में है। फिलहाल भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य के सम्मुख हिंदू राष्ट्र का गंभीर खतरा आ उपस्थित हुआ है, इस खतरे से भारतीय गणतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है, जो लोकतांत्रिक गणतंत्र की डॉ. आंबेडकर और संविधान सभा के अन्य सदस्यों की परिकल्पना के साथ खड़ा है।

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डॉ. आंबेडकर लोकतांत्रिक गणराज्य को एक राजनीतिक व्यवस्था के साथ सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में भी देखते थे। सामाजिक व्यवस्था का उनका मूल आधार समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर टिका हुआ था। उन्होंने अपनी किताब ‘जाति के विनाश’में साफ शब्दों में कहा है कि मेरा आदर्श समाज समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित है। समाज के सभी सदस्यों के बीच बंधुता कायम करना उनका लक्ष्य रहा है। बंधुता की यह अवधारणा उन्होंने गौतम बुद्ध से ग्रहण किया था। आधुनिक युग में फ्रांसीसी क्रांति का भी नारा स्वतंत्रता, समता और भाईचारा ही था। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि बंधुता के बिना लोकतांत्रिक गणराज्य सफल नहीं हो सकता है और न ही बंधुता-आधारित राष्ट्र या देश का निर्माण हो सकता है। भारत में बंधुता के मार्ग में दो बड़ी बाधाएं उन्हें दिखी- सामाजिक और आर्थिक। सामाजिक असमानता का भारत में दो आधार स्तंभ रहे हैं और हैं- वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं पर पुरुषों का वर्चस्व। उनका मानना था कि वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के बिना सामाजिक समता और स्वतंत्रता हासिल नहीं की जा सकती है और बिना समता और स्वतंत्रता के बंधुता कायम नहीं हो सकती है। उन्होंने बार-बार रेखांकित किया है कि बंधुता सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों के बीच कायम हो सकती है, जो समान और स्वतंत्र हों। यानी बंधुता की अनिवार्य शर्त समता और स्वतंत्रता है। डॉ. आंबेडकर की किताब ‘जाति का विनाश’बंधुता के लिए सामाजिक समता और स्वतंत्रता की अनिवार्यता को स्थापित करती है और उन सभी चीजों के विनाश का आह्वान करती है, जो सामाजिक असमानता की जनक वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करती हो। जिसमें हिंदू धर्म और वे सभी हिंदू धर्मग्रंथ दोनों शामिल हैं, जो वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करते हैं।

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यूरोप-अमेरिका के पूंजीवादी समाज के अपने निजी अनुभव और अध्ययन के आधार पर डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि आर्थिक असमानता के रहते हुए बंधुता कायम नहीं हो सकती है। सामाजिक समता के साथ आर्थिक समता भी बंधुता की अनिवार्य शर्त है। यूरोप-अमेरिका में काफी हद तक सामाजिक समता थी, लेकिन पूंजीवादी आर्थिक असमानता के चलते बंधुता का अभाव डॉ. आंबेडकर को दिखा। आर्थिक समता के लिए उन्होंने राजकीय पूंजीवाद की स्थापना का प्रस्ताव अपनी किताब ‘राज्य और अल्पसंख्यक में रखा। उन्होंने कृषि भूमि के निजी मालिकाने को पूरी तरह खत्म करने और उसका पूरी तरह राष्ट्रीयकरण करने का प्रस्ताव इस किताब में किया है। इसके साथ उन्होंने सभी बड़े और बुनियादी उद्योग धंधों को भी राज्य के मालिकाने में रखने का प्रस्ताव किया है। कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण के माध्यम से ही आर्थिक समता हासिल की जा सकती है, यह डॉ. आंबेडकर के चिंतन का एक बुनियादी तत्व है। सामाजिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद है और आर्थिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा पूंजीवाद है। इन्हीं दोनों तथ्यों को ध्यान में रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद को कामगारों के सबसे बड़े दो दुश्मन घोषित किए।

डॉ. आंबेडकर की नजर में लोकतांत्रिक गणराज्य की अनिवार्य शर्त सामाजिक एवं आर्थिक समता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने संविधान सभा के समक्ष संविधान प्रस्तुत करते समय कहा था कि हमने राजनीतिक समता तो हासिल कर ली है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक समता हासिल करना अभी बाकी है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम सामाजिक और आर्थिक समता हासिल करने में असफल रहे तो राजनीतिक समता भी खतरे में पड़ जाएगी। आज भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य गंभीर खतरे में है। एक तरफ हिंदू राष्ट्र की परियोजना के नाम पर नए सिरे से नए रूप में वर्ण-जाति व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश चल रही है और सामाजिक समता के डॉ. आंबेडकर के स्वप्न को किनारे लगाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक संपदा और सार्वजनिक संपत्ति को विभिन्न रूपों में कार्पोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है और इस तरह से डॉ. आंबेडकर के राजकीय समाजवाद के स्वप्न का खात्मा किया जा रहा है।

डॉ. आंबेडकर की बंधुता की जड़ें बुद्ध धम्म में थीं। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि “सकारात्मक तरीके से मेरे सामाजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है- मुक्ति, समानता और भाईचारा। मगर, कोई यह न कहे कि मैंने अपना दर्शन फ्रांसीसी क्रांति से लिया है। बिलकुल नहीं। मेरे दर्शन की जड़ें राजनीतिशास्त्र में नहीं, बल्कि धर्म में हैं। मैंने उन्हें… बुद्ध के उपदेशों से लिया है…। (क्रिस्तोफ़ जाफ्रलो, पृ. 159) वे बंधुता-आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए बुद्धमय भारत की कल्पना करते थे। बुद्धमय भारत उनके लिए वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित वैदिक, सनातन, ब्राह्मणवादी और हिंदू भारत का विकल्प था। बुद्धमय भारत उनके समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित भारत के स्वप्न का एक अन्य आधार स्तंभ था। डॉ. आंबेडकर के प्रयासों के चलते भारतीय गणराज्य के बहुत सारे प्रतीकों में बौद्ध प्रतीकों को शामिल किया गया। जैसे- राष्ट्रीय ध्वज में धर्मचक्र, प्राचीन भारत के बौद्ध सम्राट अशोक के सिंहों को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में मान्यता देना और राष्ट्रपति भवन की त्रिकोणिका पर एक बौद्ध सूक्ति को उत्कीर्ण करना। संविधान में भी उन्होंने बौद्ध धम्म के कुछ बुनियादी तत्वों को समाहित किया। इस संदर्भ में उन्होंने स्वयं लिखा है- “मैं भी हिंदुस्तान में सर्वांगीण पूर्ण तैयारी होने पर बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाला हूं। संविधान बनाते समय उस दृष्टि से अनुकूल होने वाले कुछ अनुच्छेदों को मैंने उसमें अंतर्भूत किया है।”(धनंजय कीर, पृ.457) उन्होंने बौद्ध धम्म को वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता, समता और बंधुता की भावना पर खरा पाया। जिसमें ईश्वर और किसी पारलौकिक दुनिया के

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लिए कोई जगह नहीं थी। न तो उसमें किसी अंतिम सत्य का दावा किया गया था और न ही कोई ऐसी किताब थी, जो ईश्वरीय वाणी होने का दावा करती हो।

गणतंत्रात्मक भारत, बंधुता-आधारित भारत और बुद्धमय भारत डॉ. आंबेडकर के सपनों के भारत के तीन बुनियादी तत्व थे, लेकिन इन तीनों तत्वों को तभी हासिल किया जा सकता है, जब भारतीय जन प्रबुद्ध बनें। प्रबुद्ध भारत की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए उन्होंने 4 फरवरी 1956 को ‘प्रबुद्ध भारत’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। प्रबुद्ध व्यक्ति एवं समाज वही हो सकता है, जो वैज्ञानिक चेतना से लैश हो और हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसता हो तथा आलोचनात्मक दृष्टि से देखता हो। डॉ. आंबेडकर स्वयं बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रबुद्ध व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे हर चीज को एक समाज वैज्ञानिक की दृष्टि से आलोचनात्मक नजरिए से देखते थे और तर्क की कसौटी पर कसते थे। जो कुछ भी उनकी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, उसे वे खारिज कर कर देते थे। उन्होंने बौद्ध धम्म को भी तर्क की कसौटी पर कसा और आलोचनात्मक नजरिए से देखा और उसे नया नाम ‘नवयान’ दिया।

आर.एस.एस. और कार्पोरेट (ब्राह्मणवाद-पूंजीवाद) के गठजोड़ से बन रहा वर्तमान भारत डॉ. आंबेडकर के गणतंत्रात्मक, बंधुता-आधारित, बुद्धमय और प्रबुद्ध भारत की परिकल्पना से पूरी तरह उलट है। हमें डॉ. आंबेडकर की संकल्पना के भारत के निर्माण के लिए इस गठजोड़ का पुरजोर विरोध करना चाहिए और स्वतंत्रता, समता और बंधुता आधारित गणतंत्रात्मक भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ लग जाना चाहिए।

जब राजभवन भी झोपड़ी बन जाए : माता प्रसाद का जीवन

  20 जनवरी 2021 को सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, लेखक, राजनेता और अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ.माता प्रसाद का लखनऊ का एसजीपीजीआई, लखनऊ में निधन हो गया। माता प्रसाद का जन्म जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्टूबर 1924 को हुआ था। साल 1942-43 में मछलीशहर से उन्होंने हिंदी-उर्दू में मिडिल परीक्षा पास की। गोरखपुर के एक स्कूल से ट्रेनिंग के बाद वह यहां के मड़ियाहूं के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। इस दौरान उन्होंने गोविंद, विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की। उन्हें लोकगीत और गाने का शौक था। उनकी कुशलता को देखते हुए उन्हें 1955 में जिला कांग्रेस कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया।

 माता प्रसाद जिले के जौनपुर के शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधायक रहे। वे 1980 से 1992 करीब 12 वर्ष तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी सरकार में वह राजस्व मंत्री रह चुके थे। केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने 21 अक्टूबर 1993 को माता प्रसाद को अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया था। इसके अलावा वह भारत सरकार की अनेक समितियों में भी रहे।

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साहित्यकार राज्यपाल  वे कभी रुके नहीं, कभी थके नहीं, जब भी दिखे हाथ में एक फोल्डर वाली फ़ाइल, उसमें कुछ पत्रिकाएँ, कुछ किताबें और टाइप कराने के लिए कुछ लेख लिए हुए ही विधायक निवास, दारुल सफा हजरतगंज लखनऊ में मिले। मैं उनसे कभी इत्मीनान से बात नहीं कर पाया लेकिन लखनऊ की साहित्यिक और सांस्कृतिक सम्मेलनों में उनको कई बार सुना और देखा। इन साहित्यिक और सांस्कृतिक सम्मेलनों में कभी वह वक्ता के तौर पर और कभी श्रोता के रूप में उपस्थित रहते। एक बड़े राजनेता और सार्वजनिक जीवन को जीते हुए उनके लिए पद- प्रतिष्ठा, बड़ा-छोटा, आगे की कुर्सियां-पीछे की कुर्सियां– यह सब मायने नहीं रखता था। उन्हें बड़े पदों पर होने और रहने का गुमान भी नहीं था। माता प्रसाद के जीवन में जो भी था, उसमें व्यक्तिगत कुछ था ही नहीं। जो भी था वह पूरे समुदाय के लिए सार्वजानिक था।

 हमारे लिए वे क्यों महत्वपूर्ण हैं? समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के कारण जब मैंने शोधछात्र के रूप में एम.फिल. समाज विज्ञान की डिग्री हेतु डिजर्टेशन लिखने के लिए विषय का चुनाव किया तो ‘उत्तर प्रदेश में दलित प्रस्थिति और आरक्षण’ पर काम करना शुरू किया। इस दौरान तमाम तरह के साहित्य की छानबीन करने के बाद कुछ हाथ नहीं लग रहा था। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था जब आँकड़े ही नहीं हैं तो इस काम को आगे कैसे बढ़ाया जाये? यह स्थिति हिन्दी पट्टी खासकर उत्तर प्रदेश में एक निराशाजनक स्थिति की तरफ इशारा है कि सरकारों के तमाम तरह के दावों के बावजूद लोगों-समुदायों की जानकारी का आंकड़ा ही नहीं है। यह स्थिति सरकार, राजनेताओं, नौकरशाही के नजरिये और कार्यों की प्राथमिकताओं को उजागर करती है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या और वह कर क्या रहे हैं? जब राज्य और सरकार की पहुँच समाज सबसे जरूरतमंद व्यक्ति और अंतिम तबके तक होनी चाहिए तो उनके पास आंकड़ा ही नहीं है। यही स्थिति अकादमिक जगत में भी देखने को मिली, तमाम तरह के साहित्य की छानबीन करने के बाद बहुत कुछ हाथ नहीं लगा क्योंकि हमारे विश्वविद्यालय और शिक्षक इस तरह के शोध कार्यों से बहुत दूर रहे हैं। फिर इसके बाद बड़ी मशक्कत के बाद मुझे माता प्रसाद की एक किताब उत्तर प्रदेश की दलित जातियों का दस्तावेज हाथ लगी। इस पतली सी किताब में उन्होंने उत्तर प्रदेश की दलित जातियों की सामजिक-आर्थिक सांस्कृतिक प्रस्थिति का शोधपूर्ण तरीके से वर्गीकरण किया था।

यहां क्लिक कर बहुजन साहित्य आर्डर करें सामाजिक विज्ञान का विद्यार्थी होने की वजह से मेरा जोर इस किताब पर अधिक इसलिए है क्योंकि दलित समुदायों पर जो लोग शोध कार्य कर रहे हैं, मैंने जितना भी देखा है इस किताब का सन्दर्भ हमेशा ही देखने को मिल जाता है। इस किताब को देखने पर लगता है कि एक ही किताब में एक साथ कितनी सारी सूचनाएं सम्मिलित की गई हैं। सरकारों, नौकरशाही और अकादमिक जगत ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं तो यह काम माता प्रसाद जी ने किया था। जो समाज विज्ञान के लिए और हम सबके लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह है।

झोपड़ी से राजभवन : जब राजभवन भी झोपड़ी बन जाए माता प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा ‘झोपड़ी से राजभवन’ नाम से लिखी है। जो लोग उनके अरुणाचल प्रदेश में राज्यपाल (1993 से 1999) रहते हुए अरुणाचल प्रदेश घूमकर आये है, वे लोग यह किस्सा सुनाते हैं कि राजभवन के दरवाजे साहित्यकारों, लेखकों, विद्वानों और संस्कृतिकर्मियों के लिए हमेशा खुले रहते थे। इसलिए इस किस्से को जिस तरह से मैंने सुना है या जानता हूँ तो मैं यह कहता हूँ कि झोपड़ी से राजभवन तो माता प्रसाद जी की अपनी कहानी है लेकिन जब माताप्रसाद जी ने राज्यपाल रहते हुए सभी के साथ इतना सादगीपूर्ण और सरल व्यवहार किया हो और जब झोपड़ी से निकले लेखकों, साहित्यकारों, विद्वानों के लिए राजभवन के दरवाजे खुले रहते थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस ‘पे बैक टू सोसायटी’ की बात की थी, उसके लिए माता प्रसाद जी ने अपना जीवन लगा दिया। लखनऊ की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में वह हमेशा ही सबके साथ होते। उन्होंने एक लेखक बुद्धिजीवी के रूप में दलित साहित्य और दलित अन्दोलन को अपनी किताबों में दर्ज किया है। सार्वजानिक जीवन की नैतिकताओं के पतन की आजकल जो कहानियाँ और खबरे सुनने को मिलती हैं, उनमें माता प्रसाद जी का सार्वजानिक जीवन सुकून देता है। अपनी आत्मकथा में वह लिखते हैं: ‘सन् 1957 ई. में प्रथम बार जब मैं विधानसभा का चुनाव लड़ने लगा तो मेरे पास कुछ भी पैसा नहीं था। श्रीमती जी के चार- पाँच चाँदी के गहने को बेचा गया जिससे पौने पाँच सौ रुपये मिले। इसी रुपये से जमानत राशि 125 रूपये जमा की गई। श्रीमती जी के गहने एक बार जो गए तो आज तक मैं उन्हें बनवा न सका। कभी- कभी इसका उलाहना सुनना पड़ता है। उस समय हमारे समाज में यह प्रवृत्ति चल रही थी कि पढ़े -लिखे लोगों की स्त्रियाँ यदि अशिक्षित हैं तो उन्हें छोड़कर दूसरी पढ़ी-लिखी लड़की से विवाह कर लेते रहे । इनमें अध्यापक नेता व दूसरे कर्मचारी भी थे। मैं समझता हूँ यह बहुत खराब बात थी। जब हम कुछ नहीं थे, अनपढ़ पत्नी ने मजदूरी करके घर का सारा काम करते हुए कष्ट उठाया। हमारे लोग पढ़-लिखकर ऊँचे स्थान पर पहुँच गये तो उस पत्नी का बहिष्कार कर देते हैं, इससे उनके मन पर क्या गुजरती होगी? यह विचारने की बात है। मेरा तो विश्वास है मैं जो कुछ हूँ समाज में जो कुछ सम्मान मिला है, वह मेरी पत्नी के ही त्याग तपस्या का परिणाम है।

ऐसे थे माता प्रसाद जी।

दलित लेखक जयप्रकाश कर्दम झोपड़ी से राजभवन के ब्लर्ब पर लिखते है कि… ‘झोपड़ी से राजभवन’ माता प्रसाद जी की राजनीतिक जीवन यात्रा का वृतांत भर नहीं है अपितु यह आत्मकथा अभाव और उत्पीड़न के शिकार दलित समाज की पीड़ा, दर्द, संघर्ष, स्वाभिमान और जिजीविषा की कहानी है।

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भारत में दलित जागरण और उसके अग्रदूत: दलित अन्दोलन के इतिहास और वर्तमान का लेखा जोखा प्रस्तुत करती हुई माता प्रसाद जी यह किताब उनके लिए जो लोग दलित अन्दोलन के इतिहास और उसके नेतृत्व पर शोधपूर्ण कार्य कर रहे हो। समाज विज्ञान का विद्यार्थी होने के तौर पर और सामाजिक अन्दोलनों की विचारधारा और नेतृत्व के अध्ययन में रूचि होने नजरिये से मेरे लिए यह किताब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह है। इसलिए इसकी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। दलित आन्दोलन के इतिहास को समेटे इस किताब में भारत के अलग-अलग राज्यों के दलित अन्दोलन और उसके प्रमुख नेतृत्व का विवरण भी प्रस्तुत करती है। इस किताब की विषय सूची को देखकर लगता है कि यह किसी अकादमिक संस्थान के विद्वान ने शोधपूर्ण तरह से लिखी है। यह प्राक्कथन के साथ कुल मिलाकर 20 भागों में विभाजित की गयी है। इसमें माता प्रसाद जी ने दलित आन्दोलन की पृष्ठभूमि से लेकर अलग-अलग राज्यों में दलितों की स्थिति की राज्यवार जानकारी के साथ ही और राज्यों के जनपद स्तर पर कार्यरत कार्यकर्ताओं, दलित संगठनों, संस्थाओं का विवरण को सम्मिलित करने के साथ ही वह इसको और अधिक विस्तृत करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में दलितों की भागीदारी को प्रमुखता के साथ सम्मिलित करते हैं। इस किताब में भारत की आदिवासी जातियों के विवरण और उनके मुक्ति संघर्षों का विवरण भी शामिल है। इस किताब के अंतिम अध्याय में माता प्रसाद जी ने दलित साहित्य के विवरण को विस्तार पूर्वक जगह दी है जिसमें उन्होंने दलित साहित्य के उद्देश्यों के साथ ही राज्यवार दलित साहित्यकारों के विषय में विस्तारपूर्वक सामग्री को संजोया है।

माता प्रसाद जी के लेखन की गंभीरता उनकी हर पुस्तक में दिखती है चूँकि मेरे लिए यह लेखन समाज विज्ञान के नजरिये से एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य वाला लेखन है जो भारतीय समाज और उसकी सामाजिक संरचना की भीतरी कड़ियों की कमजोरी को उजागर करता है। इसलिए मैं माता प्रसाद जी को एक समाज विज्ञानी और उनके लेखन को समाज विज्ञान की कोटि में रखता हूँ। चूँकि एक लेख में बहुत सारी जानकारी देना और किताबों के विषय में सम्पूर्ण विवरण को प्रस्तुत करना एक मुश्किल कार्य है इसलिए मैं माता प्रसाद जी के साहित्य और रचना संसार के विवरण की एक सूची दे रहा हूँ।

माता प्रसाद का रचना संसार

 माता प्रसाद का एक लेखक के तौर रचना संसार बहुत ही व्यापक रहा जिनमें उन्होंने काव्य खण्ड, नाटक, आत्मकथा के साथ ही अनेक किताबों का सम्पादन भी किया। लोकगीतों में वेदना और विद्रोह के स्वर, हिंदी साहित्य में दलित काव्य धारा, भारत में दलित जागरण और उसके अग्रदूत, भारत में सामाजिक परिवर्तन के प्रेरणास्रोत (भाग-1), भारत में सामाजिक क्रांति के प्रेरणास्रोत (भाग-2), उत्तरांचल व उत्तर प्रदेश की दलित जातियों का दस्तावेज, दलित साहित्य में प्रमुख विधाएं, अन्तहीन बेड़ियां, स्वतंत्रता के बाद लखनऊ की, दलित-शोषित विभूतियां, उत्तर प्रदेश के संदर्भ में चमार जाति का इतिहास, प्रतिशोध, जातियों का जंजाल, दिल्ली की गद्दी पर खुसरो भंगी, राजनीतिक दलों में दलित एजेण्डा, एकलव्य (खण्ड काव्य), दलितों का दर्द। भीम शतक, घुटन, परिचय सतसई, अछूत का बेटा, महादानी राजा बलि (नाटक), धर्म के नाम पर धोखा, उत्तर भारत में दलित चेतना के प्रथम, अग्रदूत स्वामी अछूतानंद हरिहर, तड़प मुक्ति की, वीरांगना झलकारी बाई (नाटक), वीरांगना उदा देवी पासी (नाटक) उनकी आदि प्रमुख रचनायें हैं।

माता प्रसाद जी की उपलब्धियां:

राजनीतिक कार्य: 1. 1957-1977 ई. तक (पांच बार) उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य। 2. 1980-1992 ई. तक (दो बार) उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य। 3. 1988-1989 में उत्तर प्रदेश में राजस्व मंत्री। 4. 21 अक्टू. 1993 से 13 मई 1999 ई. तक अरुणाचल प्रदेश में राज्यपाल एवं पूर्वोत्तर परिषद के चेयरमैन रहे।

विशेष: 1. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर फिल्म निर्माण स्कृप्ट समिति के चेयर मैन, (भारत सरकार द्वारा 1994 में नामित) जब्बार पटेल ने उसी आधार पर डॉ. अम्बेडकर फिल्म बनाई है। 2. सन् 1996 ई. में पंचम विश्व हिंदी सम्मेलन, 1996, ट्रिनीडाड टुवैको (लैटिन अमेरिका) में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया। 3. पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर ने डी.लिट् की मानाद उपाधि 7 फरवरी 1998 ई. में प्रदान की। 4. आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य। 5. सन् 2000 में द्वितीय विश्व दलित साहित्यकार सम्मेलन, यू.के. में मुख्य अतिथि। 6. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा साहित्य भूषण, 2003. 7. त्रिरत्न सम्मान, समता बुद्ध विहार, नई दिल्ली, 2007. 8. दलित साहित्य की प्रवृत्तियों के संदर्भ में माता प्रसाद के सृजनात्मक साहित्य का अनुशीलन विषय पर डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा द्वारा श्रीमती सध्या अग्रवाल को पी- एच.डी. (2003) में मिली। 9. माता प्रसाद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा सुश्री बिन्दु कनौजिया को पी- एच.डी. (2007) में मिली। 10. अन्य गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।

मैं उनके सम्पूर्ण जीवन को नहीं जानता हूँ लेकिन जो सुना, देखा और उनकी किताबों के माध्यम से उनको जाना, उसके विषय में मैंने यह बातें आपसे साझा की हैं। अंतिम बात यही है कि उनका जो भी था वह सार्वजानिक था और उस झोपड़ी में रहने वाले समाज का था उस समाज के लिए अंतिम समय तक समर्पित रहा। अब वह किताबों और लेखन के मध्यम से हमेशा ही उस समाज में मौजूद रहेंगे जिसकी बेहतरी का सपना वे हमेशा देखते रहे।

(नोटः सभी तस्वीरें के लिए क्रेडिट- सम्यक प्रकाशन)

पूर्व राज्यपाल, एमएलए, एमएलसी, मंत्री, लेखक माता प्रसाद जी नहीं रहें

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 राजनीति में सादगी के प्रतीक, पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार माता प्रसाद जी का बीती रात (मंगलवार, 19 जनवरी 2021) परिनिर्वाण हो गया। वह तकरीबन 97 वर्ष के थे। वह बढ़ती उम्र के कारण लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे और पीजीआई लखनऊ में उनका इलाज चल रहा था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। आम तौर पर उन्हें अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल के रूप में जाना-जाता था। वह नारायण दत्त तिवारी की सरकार में 1988 से 1989 तक राजस्व मंत्री भी रहे।

राजनीति में सादगी के प्रतीक, पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार माता प्रसाद के निधन की खबर मिलते ही देश भर में मौजूद उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौर गई। उनका जन्म जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्तूबर 1924 को हुआ। उनके पिता का नाम जगरूप राम था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वर्ष 1942-43 में मछलीशहर से हिंदी-उर्दू में मीडिल परीक्षा पास की थी। गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल से ट्रेनिंग के बाद जिले के मड़ियाहूं ब्लॉक क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गोविंद, विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की।

 अध्यापन काल में ही ये लोकगीत लिखना और गाना इनका शौक हो गया था। इनकी कार्य कुशलता को देखते हुए इन्हें 1955 में उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया। वो जिले के शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधायक रहे। 1980 से 1992 तक 12 वर्ष तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे।

देश की नरसिंह राव सरकार ने 21 अक्तूबर 1993 को इन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया और 31 मई 1999 तक ये राज्यपाल रहे। राज्यपाल पद पर रहे। उनके बारे में एक बात विख्यात है। जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे, तो उन्होंने माता प्रसाद जी से पद छोड़ने को कहा लेकिन उन्होंने आडवाणी की मांग को दरकिनार कर दिया था।

सादगी की प्रतिमूर्ति रहे माता प्रसाद ने राजनेताओं को आईना दिखाया है आज के दौर में जहां एक बार विधायक या मंत्री बनते ही नेतागण गाड़ी बंगले के साथ लाखों-करोड़ों में खेलने लगते हैं। वही पांच बार विधायक, दो बार एमएलसी, नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में उत्तरप्रदेश के राजस्व मंत्री और राज्यपाल रहे माता प्रसाद पैदल या रिक्शे पर बैठे बाजार से सामान खरीदते देखे जाते थे। पैदल चलना उनको बहुत पसंद था।

 साहित्यकार के रूप में थी खास पहचान

माता प्रसाद जी की पहचान साहित्यकार के रूप में भी थी। उन्होंने अपने जीवन में कई रचनाएं की। एकलव्य खंडकाव्य, भीम शतक प्रबंध काव्य, राजनीति की अर्थ सतसई, परिचय सतसई, दिग्विजयी रावण जैसी काव्य कृतियों की रचना की। साथ ही उन्होंने अछूत का बेटा, धर्म के नाम पर धोखा, वीरांगना झलकारी बाई, वीरांगना उदा देवी पासी, तड़प मुक्ति की, धर्म परिवर्तन प्रतिशोध, जातियों का जंजाल, अंतहीन बेड़ियां, दिल्ली की गद्दी पर खुसरो भंगी जैसे नाट्य भी लिखे थे। उन्होंने अपने जीवन में तकरीबन 50 पुस्तकें लिखी। इनकी आत्मकथा “झोपड़ी से राजभवन तक” है।

(फोटो क्रेडिट- सम्यक प्रकाशन)

वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने किया आगाह, ये लोग न लगवाएं वैक्सीन

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कोविड वैक्सीन को लेकर अलग-अलग तरह की खबरें आना लगातार जारी है। इसके सुरक्षित होने, साइड इफेक्ट होने और नहीं होने आदि को लेकर तरह-तरह की खबरें आ रही है। ऐसे में खुद वैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक सामने आई है और उसने कई अहम जानकारियां साझा की है। भारत बायोटेक ने फैक्टशीट जारी करके बताया है कि किस बीमारी या अवस्था में लोगों को कोरोना वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए।

भारत बायोटेक के मुताबिक- यदि किसी बीमारी की वजह से आपकी इम्युनिटी कमजोर है या आप कुछ ऐसी दवाएं ले रहे हैं, जिससे आपकी इम्युनिटी प्रभावित होती है तो आपको कोवैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए।

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भारत बायोटेक के मुताबिक, ये लोग कोवैक्सीन न लगवाएं-

  • जिन्हें एलर्जी की शिकायत रही है.
  • बुखार होने पर न लगवाएं.
  • जो लोग ब्लीडिंग डिसऑर्डर से ग्रस्त हैं या खून पतला करने की दवाई ले रहे हैं
  • गर्भवती महिलाएं, या जो महिलाएं स्तनपान कराती हैं.
  • इसके अलावा भी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर मामलों में नहीं लगवानी चाहिए, जिसके बारे में पूरी जानकारी वैक्सीनेशन ऑफिसर को देनी चाहिए.बहुजन साहित्य आर्डर करें, घर बैठे किताब पाएं भारत बायोटेक का कहना है कि जब आप वैक्सीन लगवा रहे हों तो ऐसी बातों की जानकारी आपको वैक्सीनेशन ऑफिसर को देनी चाहिए। यदि किसी बीमारी की वजह से आपकी नियमित दवाएं चल रही हैं तो इसकी जानकारी भी आपको देनी चाहिए, यानी वैक्सीन लगवाने से पहले अपने बारे में आपको पूरी जानकारी देनी होगी। भारत बायोटेक ने साइड इफैक्ट पर मुआवजे का ऐलान किया है। फैक्टशीट के मुताबिक, कोवैक्सीन के लगाए जाने पर अगर किसी लाभार्थी को कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या होती है अथवा वैक्सीन का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता तो उसे सरकारी अस्पताल में देखरेख की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। इतना ही नहीं, गंभीर प्रतिकूल घटना के लिए मुआवजा भी प्रदान किया जाएगा।
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बसपा को बड़ा झटका, अब इस नेता ने 400 समर्थकों के साथ थामा सपा का हाथ

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 बहुजन समाज पार्टी के पुराने नेताओं की गिनती दिनों-दिन कम होती जा रही है। आए दिन बसपा के किसी न किसी नेता का किसी दूसरी पार्टी का दामन थामने की खबर आ रही है। खास बात यह है कि बसपा से सबसे ज्यादा नेता समाजवादी पार्टी की ओर जा रहे हैं। अब मेरठ में बसपा को बड़ा झटका लगा है। बसपा के पूर्व विधायक योगेश वर्मा ने अपनी पत्नी सुनीता वर्मा के साथ शनिवार (16 जनवरी) को लखनऊ में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। योगेश वर्मा ने अपने साथ मेरठ के आधा दर्जन पार्षदों के साथ समाजवादी पार्टी ज्वॉइन की है। उनके साथ करीब 400 समर्थकों ने भी सपा की सदस्यता ली। इस दौरान मौजूद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस जॉइनिंग को ऐतिहासिक बताया।

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बसपा से निष्कासित पूर्व विधायक योगेश वर्मा ने पहले ही एलान किया था कि 16 जनवरी को महापौर पत्नी सुनीता वर्मा के साथ सपा का दामन थामेंगे। वहीं चार पूर्व विधायकों और एक दर्जन पार्षदों के भी सपा में शामिल होने की संभावना थी, जो शनिवार को पूरी हो गई। इस पूरी कवायद में सपा नेता अतुल प्रधान ने अहम भूमिका निभाई।

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गौरतलब है कि योगेश वर्मा बसपा के दिग्गज नेता माने जाते थे। वह हस्तिनापुर से 2007 में विधायक रह चुके हैं। 2012 के चुनाव में बसपा से निष्कासित होने के बाद पीस पार्टी से चुनाव लड़े थे। दूसरे नंबर पर रहने के बाद उन्होंने बसपा में वापसी की और 2017 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे। योगेश को 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद अक्तूबर में योगेश को पत्नी सहित पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।

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संविधान की शपथ लेकर आदिवासी जोड़े ने की शादी, देखने उमड़े हजारों लोग

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 अंबेडकरी आंदोलन दिनो-दिन बढ़ता जा रहा है। दलित समाज के अलावा अब आदिवासी समाज और पिछड़ा समाज भी इस आंदोलन से जुड़ने लगा है। लोग हर मौके पर इस समाज के उद्धारक बाबासाहब आंबेडकर को याद कर रहे हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश में एक आदिवासी जोड़े ने संविधान और बाबासाहब डॉ. आंबेडकर को साक्षी मानकर एक-दूसरे का हाथ थामा।

यह शानदार खबर मध्य प्रदेश के खरगौन से आई है। यहां आदिवासी समाज के युवक इकराम आरसे और नाइजा ने शादी के मंडप में संविधान की शपथ लेकर साथ मिलकर नया जीवन जीने की घोषणा की। यह शादी जिले के भगवानपुरा क्षेत्र के ग्राम ढाबला में हुई। इस जोड़े ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, बिरसा मुंडा और क्रांतिकारी टंट्या मामा को साक्षी मानकर संविधान की शपथ ली।

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जानकारी के मुताबिक युवक इकराम पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर हैं। इकराम के मुताबिक, “वे शहर में एक वर्ष पहले एक विवाह समारोह में शामिल हुए थे। इस समारोह में उन्होंने युवक-युवती को संविधान की शपथ लेकर वैवाहिक जीवन की शुरूआत करते हुए देखा था। इसके बाद उनके मन में भी यही विचार घर कर गया और उन्होंने भी तय कर लिया कि वह अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत भी संविधान की शपथ लेकर करेंगे। जब शादी तय हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी को भी अपनी इच्छा बताई।” खास बात यह है कि जहां तमाम लड़कियां अपनी शादी में भव्य आयोजन चाहती हैं, वहीं नाइजा उनके प्रस्ताव पर बहुत खुश दिखीं।

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यह शादी 15 जनवरी को संपन्न होने की जानकारी है। यह शादी इस मायने में भी खास है क्योंकि आदिवासी समाज भी अब बाबासाहब आंबेडकर के योगदान को समझने और मानने लगा है। विवाह के रस्म का समापन बुद्ध वंदना से हुआ। इस शादी में आस-पास के क्षेत्र के तमाम बुद्धिजीवी मौजूद रहें।

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कोरोना वैक्सीन पर पहले ही दिन बवाल

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 कोरोना वायरस के खिलाफ भारत में टीकाकरण शुरू हो गया है। 16 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी ने खुद पहले चरण के टीकारण की शुरुआत की। हालांकि उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद पहली वैक्सीन लेकर देशवासियों को वैक्सीन के प्रति सुरक्षा का भरोसा दिलाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देश के सबसे बड़े अस्पताल दिल्ली के एम्स में सबसे पहले एक सफाईकर्मी को टीका लगाया गया।

भारत में पहले ही चरण में 3 करोड़ लोगों का टीकाकरण होना है। केंद्र सरकार के मुताबिक, पहले दिन कुल 3006 वैक्सींनेशन सेंटर्स पर तीन लाख से ज्याकदा हेल्थ वर्कर्स को पहली डोज दी गई। हर सेंटर पर एक दिन में औसतन 100 लोगों को वैक्सीन लगाई जाएगी। लेकिन वहीं कई जगहों से विवाद की खबरें भी आ रही है। दिल्ली के एक और बड़े सरकारी अस्पताल, डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टरों ने वैक्सीन पर सवाल उठाते हुए टीका लेने से इंकार कर दिया है। आरएमएल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट को पत्र लिखकर कोवैक्सीडन की बजाय कोविशील्डस वैक्सीन लगवाने की मांग की है। इस पत्र में रेजिडेंट डॉक्टरों की ओर से कहा गया है कि-

‘हम सभी आरडीए आरएमएल अस्पताल के सदस्य हैं। हमें जानकारी मिली है कि आज अस्पताल में कोरोना वैक्सीन लगाने का अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान सभी को सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड के बजाय भारत बायोटेक (Bharat Biotech) की बनी कोवैक्सीन लगाई जा रही है। हम आपको ध्यान दिलाना चाहते हैं कि कोवैक्सीन के सभी ट्रायल पूरे नहीं होने की वजह से कुछ आशंकाएं हैं। इसे भारी संख्या में लगा भी दिया जाए तो इससे वैक्सीेनेशन का लक्ष्य भी पूरा नहीं होगा। ऐसे में आपसे अपील है कि हम सभी को कोवैक्सीन की बजाय कोविशील्ड वैक्सीन लगाई जाए।’

दरअसल आज (16 जनवरी) से शुरू हुए इस टीकाकरण अभियान में दोनों ही वैक्सीन लगाई जा रही हैं। यहां तक कि एम्स में भी भारत बायोटेक की कोवैक्सीकन ही लगाई गई है। दूसरी ओर वैक्सीन को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों से अलग खबरें आ रही है। नॉर्वे ने दावा किया है कि वैक्सीन लगाए जाने के बाद यहां 23 लोगों की मौत हो गई है। हालांकि नॉर्वे ने अपने दावे में कहा कि वैक्सीनेशन के बाद मारे गए लोग बुजुर्ग थे। हालांकि भारत के भीतर जिस तरह राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टरों ने वैक्सीन को लेकर सवाल उठाया है और कोवैक्सीन की जगह कोविशील्ड लगाने की मांग की है, उससे कोरोना वैक्सीन को लेकर विवाद बढ़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी से भूपेंद्र सिंह मान के इस्तीफे के मायने

 सुप्रीम कोर्ट ने तीन, कृषि कानूनों पर विचार करने के लिए जिन चार सदस्यों की कमेटी का गठन किया था, उसके एक सदस्य भूपेंद्र सिंह मान ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा कि “वे हमेशा पंजाब और किसानों के साथ खड़े हैं। एक किसान और संगठन का नेता होने के नाते वह किसानों की भावना जानते हैं। वह किसानों और पंजाब के प्रति वफादार हैं। किसानों के हितों से कभी कोई समझौता नहीं कर सकते। वह इसके लिए कितने भी बड़े पद या सम्मान की बलि दे सकते हैं। मान ने पत्र में लिखा कि वह कोर्ट की ओर से दी गई जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, अतः वह खुद को इस कमेटी से अलग करते हैं।”
प्रश्न यह है कि आखिर चार सदस्यों में- भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह मान, शेतकारी संगठन (महाराष्ट्र) के अध्यक्ष अनिल घनवत, अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान दक्षिण एशिया के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी में से सिर्फ भूपेंद्र सिंह मान ने ही क्यों इस्तीफा दिया?
इस तथ्य से हम सभी वाकिफ हैं कि तीन कृषि बिलों को किसान विरोधी, जनविरोधी और देश विरोधी मानने वालों तक, इस कमेटी के गठन के बाद यह साफ संदेश गया था कि यह कमेटी तीन कानूनों पर मुहर लगाने के लिए बनाई गई है और इसके माध्यम से इन तीन कानूनों को सुप्रीमकोर्ट वैधता प्रदान करना चाहता है।
मोदी भक्त और कार्पोरट परस्त लोगों को छोड़कर अधिकांश लोगों को यह संदेश गया था कि पहले से ही तीन कृषि कानूनों के समर्थक लोगों की कमेटी बनाने का मतलब बिल्लियों को दूध की रखवाली सौंपना था।
मान के इस्तीफे का मुख्य कारण-
शायद ही कोई इस बात इस इंकार कर सके कि वर्तमान किसान आंदोलन के अग्रिम मोर्चा के अग्रिम योद्धा पंजाबी किसान, विशेषकर सिख किसान हैं। वही इस आंदोलन के वैनगार्ड (हिरावल दस्ता) हैं। भले ही घोषित तौर न कहा गया हो, लेकिन यह बात साफ थी कि भूपेंद्र सिंह मान को सिख चेहरे के तौर कमेटी में रखा गया था और इस माध्यम सिखों के बीच के किसी व्यक्ति से तीन कृषि कानूनों को जायज ठहराने की जुगत लगाई गई थी।
यहीं सुप्रीमकोर्ट और सरकार चूक भी गई। उन्हें यह नहीं पता था कि यह किसान आंदोलन पंजाब के किसानों के अस्तित्व के साथ पूरे पंजाबी समाज, विशेषकर सिख समाज के आन-बान-शान का भी प्रतीक बन गया है। इस संघर्ष (युद्ध) को वे अपने संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत के साथ जोड़कर देख रहे हैं। वे इस आंदोलन को नानक के साथ राजा रणजीत सिंह, बलिदानी सिख गुरुओं की परंपरा, गदर आंदोलन के रणवांकुरों, कर्तार सिंह सराभा और भगतसिंह के साथ जोड़कर देख रहे हैं। वे अब तक इस आंदोलन में शहीद हुए किसानों को अपनी शहीदी परंपरा के साथ जोड़कर देख रहे हैं, जो शहादत उन्होंने अन्यायी-अत्याचारी शासकों से संघर्ष करते अपने मान-सम्मान और स्वाभिमान के लिए दी थी। वे प्रधानमंत्री मोदी को भी एक अत्याचारी-अन्यायी शासक के रूप में देख रहे हैं, जो देश-दुनिया के कार्पोरेट के हितों के नुमाइंदा है।
इसके साथ यहां इस तथ्य को रेखांकित कर लेना जरूरी है कि इस आंदोलन को देश-विदेश के पूरे सिख का समुदाय तन-मन-धन से समर्थन प्राप्त हैं। वे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर भी पूरी तरह इस आंदोलन के साथ एकजुट हैं। अपने बीच के सारे बंटवारों को फिलहाल लांघकर और एकहद तक तोड़कर। ऐसे समय में यदि सिख समुदाय का कोई चेहरा इन तीन कृषि कानूनों की वकालत के लिए गठित कमेटी का सदस्य बनता और इस आंदोलन को तोड़ने की सरकार और सुप्रीमकोर्ट की कवायद का हिस्सा बनता, तो उस व्यक्ति को सिख समुदाय और किसानों के साथ गद्दारी करने वाले के रूप में देखा जाता।
 सिख समुदाय में सामूहिकता और एकजुटता की जबर्दस्त भावना पाई जाती है और राष्ट्रीयता ( संस्कृति, भाषा, धर्म और ऐतिहासक विरासत आदि से बनी) की भावना भी उतनी ही प्रबल है,जिनती देशभक्ति की भावना। किसान आंदोलन ने इस सामूहिकता और एकुजटता की भावना को और ऊंचाई और गहराई दी है। ऐसे समय जो कोई व्यक्ति उनके भीतर से इस सामूहिकता और एकजुटता की भावना को तोड़ने की कोशिश करेगा। उसे सिख समुदाय कभी माफ नहीं करेगा। उसे हमेशा गद्दार के रूप में याद किया जाएगा। उसे यह समुदाय हमेशा-हमेशा के लिए किनारे लगा देगा। इसका प्रमाण मान के इस्तीफे में भी मिलता है,जिसमें उन्होंने पंजाब और किसानों के प्रति अपनी वफादारी घोषित की है।
फिलहाल सरकार और सुप्रीमकोर्ट की मिलीभगत (ऐसे आरोप लग रहे हैं) का उपकरण बनकर और गद्दारों की पंक्ति में शामिल न होकर भूपेंद्र सिंह मान ने सिख परंपरा की लाज रखी है, और इस देश के किसानों की नजर में भी गद्दार होने से बच गए हैं। फिलहाल इस कदम के लिए उन्हें सलाम!

बसपा कार्यकर्ताओं ने मनाया बहन मायावती का जन्मदिन, बहनजी ने की बड़ी घोषणा

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  जनवरी की 15 तारीख बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती का जन्मदिन होता है। इस मौके पर बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने देश भर में बहनजी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया। अपने पिछले कई जन्मदिन की तरह इस साल भी बसपा प्रमुख ने  “मेरे संघर्षमय जीवन एवं बी.एस.पी. मूवमेन्ट का सफरनामा, भाग-16” के हिन्दी और अंग्रेजी वर्जन का विमोचन किया। इस पुस्तक की लेखक बसपा प्रमुख मायावती खुद हैं।

 इस दौरान बसपा प्रमुख मायावती ने एक बड़ी राजनीतिक घोषणा करते हुए कहा कि बसपा आगामी उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। उन्होंने उत्तराखंड चुनाव भी अकेले लड़ने की घोषणा की। यह अपने आप में बड़ी घोषणा इसलिए है क्योंकि माना जा रहा था कि बसपा प्रमुख मायावती भाजपा को रोकने के लिए कुछ छोटे दलों को बसपा के साथ गठबंधन में शामिल करेंगी। खासतौर पर इसके लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का नाम चर्चा में था, जिसके साथ बसपा ने बिहार चुनाव में गठबंधन किया था।

 अपने जन्मदिन पर मीडिया के लिए जारी बयान में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बार फिर जहां किसान आंदोलन का समर्थन किया और सरकार से किसानों की मांगें मान लेने की मांग की तो वहीं एक राजनैतिक घोषणा में उन्होंने कहा कि यदि केन्द्र व यूपी की वर्तमान भाजपा सरकार कोरोना वैक्सीन ‘फ्री’ में नहीं देती है, तो बी.एस.पी की सरकार बनने पर इन्हें यह सुविधा ‘फ्री’ में ही दी जायेगी। बहन कुमारी मायावती ने अपना जन्मदिन मनाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं का आभार जताया। बताते चलें कि बसपा कार्यकर्ता पिछले कई सालों से बसपा प्रमुख के जन्मदिवस को जनकल्याणकारी दिवस के तौर पर मनाते हैं।

महिला सशक्तिकरण की प्रतीक मायावती : संघर्ष और चुनौतियाँ

mayawati  भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की संख्या गिनी-चुनी ही हैं। उनमें से एक नाम सुश्री मायावती का आता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस उम्र में महिलाएं अपना जीवन ठीक से नहीं चला पाती हैं उस उम्र में मायावती सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारत में जाति व्यवस्था के दुष्चक्र से बाहर आ पाना पत्थर पर सर मारने जैसा है। मायावती एक दलित समुदाय से आती हैं ऐसे में वह जातीय संघर्ष करते हुए अपना रास्ता स्वयं बनाती हैं। उनके शासनकाल में उत्तरप्रदेश में दलितों व महिलाओं की स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई देता था। वह अपने छोटे-बड़े कार्यकाल को मिलाकर कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं।

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देश की सियासत में कई बार किंगमेकर की भूमिका निभाने वाली मायावती एक सशक्त महिला की मिसाल हैं। एक ऐसी नेत्री, जिसे कभी देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने ‘लोकतंत्र का चमत्कार (miracle of Democracy)’ कहा था। जिसने सियासी रूप से देश के सबसे ताकतवर सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के तमाम स्थापित समीकरणों को ध्वस्त करके रख दिया था जिसके बाद देश की राजनीति में दलित चेतना के नए युग का सूत्रपात हुआ। मायावती पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। 1995 में गठबंधन की सरकार बनाते हुए मायावती मुख्यमंत्री बनीं थी, उस समय तक मायावती राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनी थीं। मायावती ने अपना पहला चुनाव साल 1984 में उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। इसके बाद दूसरी बार साल 1985 में उन्होंने बिजनौर और फिर 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा। साल 1989 में मायावती को बिजनौर से जीत हासिल हुई। मायावती पहली बार साल 1994 में राज्यसभा सांसद बनीं। उन्होंने अपने जीवन में उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे कार्य किये, जिसके कारण उनके फॉलोवर उन्हें ‘आयरन लेडी’ के नाम से बुलाते हैं।

   बहन मायावती ने अपने करियर की शुरुआत 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से LL.B की डिग्री लेकर किया। उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन का कार्य भी किया था। सन् 2003 में मायावती को मुख्यमंत्री के रूप में, पोलियो उन्मूलन में उनकी पहल के लिए यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और रोटरी इंटरनेशनल द्वारा पॉल हैरिस फेलो पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। मायावती को राजर्षि शाहू मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा राजर्षि शाहू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 2008 में, फोर्ब्स ने मायावती को दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में 59 वें स्थान पर रखा। वह 2007 में न्यूज़ वीक की शीर्ष महिला की सूची में शामिल की गईं। 2009 में न्यूज़ वीक के एक लेख ने उन्हें बराक ओबामा के रूप में वर्णित किया गया और प्रधान मंत्री के लिए एक संभावित उम्मीदवार बताया गया। टाइम पत्रिका ने मायावती को 2007 के लिए भारत की 15 सबसे प्रभावशाली शख्सियत की सूची में शामिल किया।

      इन सबके बावजूद भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण के तौर पर मायावती का नाम बहुत कम लिया जाता है। मायावती को सिर्फ इस रूप में ही नहीं देखना चाहिए कि वह एक महिला मुख्यमंत्री थी। अथवा कई बार कि राज्यसभा सदस्य रही थीं। मायावती उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो अपने पैरों पर खड़े होने कि जद्दोजहद में लगी हैं। मायावती का जन्म एक बेहद सामान्य से दलित (उपजाति जाटव चमार) परिवार में हुआ था। उनके पिता पोस्ट ऑफिस में कर्मचारी थे और माताजी गृहणी थीं। ऐसे सामान्य से घर से निकलकर मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक कार्य था। अपने जीवनकाल में मायावती को अनेकों जातिगत भेदभावों व अन्य प्रकार कि सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होने उत्तर प्रदेश में दलितों व महिलाओं के सशक्तिकरण के अनेकों कार्य किए। कई जगह बालिका विद्यालय व अनेकों योजनाएं चलाकर महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य किया।

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 मायावती की एक खासियत यह भी है कि इन्होंने मान्यवर कांशीराम के सानिध्य और मार्गदर्शन में राजनीति में अपनी पहचान स्वयं बनाई। इनका पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। पिताजी का सपना था कि बेटी एक आईएएस ऑफिसर या वकील बनकर देश की सेवा करे। लेकिन मायावती कि दृढ़ इच्छा, स्पष्ट वाक्पटुता और मान्यवर कांशीराम के मार्गदर्शन में वो राजनीति की ओर आईं। इस बारे में मायावती ने कहा था ‘मैंने राजनीति में आने का जो फ़ैसला किया तो मुझे दूसरे नेताओं की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली। हमारे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है, दूर-दूर तक हमारे रिश्ते नातों में भी कोई राजनीति में नहीं है।’ लेकिन बिना राजनीतिक विरासत के भी मायावती ने देश की सियासत खलबली मचा दी।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम इनकी भाषण कला से इतने प्रभावित हुए थे कि इन्हें राजनीति में आने की सलाह दे डाली। मायावती और कांशीराम के के रिश्ते बेहद विनम्र थे। कांशीराम ने उनके प्रथम भाषण को सुनकर ही उनके राजनीतिक जीवन की भविष्यवाणी कर दी थी। दरअसल इस मुलाक़ात से एक दिन पहले मायावती दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में भाषण दे रही थीं… मायावती ने मंच से ही कांग्रेसी नेता राजनारायण को दलितों को बार-बार ‘हरिजन’ कहने पर बुरी तरह लताड़ा था। एक 21 साल की लड़की का ऐसा रुख़ देखकर ही मान्यवर कांशीराम साहब मायावती से इतने प्रभावित हो गए थे कि सीधे उनके घर जाकर उनसे अपने साथ साथ काम करने का अनुरोध किया।

उन दोनों के संबंधों का ज़िक्र पत्रकार नेहा दीक्षित ने ‘कारवां’ पत्रिका में मायावती पर छपे अपने लेख में किया है। दीक्षित लिखती हैं, “जब कांशीराम अपने हुमायूं रोड वाले घर में आए तो मायावती को वहां रहने के लिए कोई कमरा नहीं दिया गया। जब कांशीराम भारतीय राजनीति के दिग्गजों से अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर मंत्रणा कर रहे होते थे, तो मायावती घर के पिछवाड़े के आंगन में दरी पर बैठ कर ग्रामीण इलाकों से आने वाले कार्यकर्ताओं के साथ बात कर रही होती थीं। कांशीराम अपने घर के फ़्रिज को ‘लॉक’ कर चाबी अपने पास रखते थे। उन्होंने मायावती और अपने दूसरे सहयोगियों को निर्देश दे रखे थे कि फ़्रिज से उन लोगों को ही कोल्ड ड्रिंक ‘सर्व’ किया जाए जिनसे वो अपने ड्राइंग रूम में मिलते हैं।” मायावती और कांशीराम साहब के रिश्ते को लेकर भी सवाल उठते रहे। अक्सर उनके चरित्र पर भी दाग़ लगाने की कोशिश की गई। लेकिन इससे मायावती विचलित नहीं हुईं। एक इंटरव्यू में मायावती ने इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था ‘जब कोई त्याग करके आगे बढ़ता है तो विरोधियों के पास एक ही मुद्दा होता है, कैरेक्टर को लेकर बदनाम करना। मान्यवर कांशीराम जी को मैं अपना गुरु मानती हूँ और वो मुझे अपना शिष्य मानते हैं।’

आज के समय में महिलाओं को मायावती को अपने आइकन के तौर देखने की जरूरत है। मायावती ने अपने शासनकाल में उन तमाम दलित, बहुजन नायकों की तस्वीरों व मूर्तियों को स्थापित किया जो नेपथ्य से पीछे थे या गुमशुदा थे। उन्होंने बहुजन राजनीति की नई इबारत लिखी। पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन नायकों को दुबारा स्थापित करने का श्रेय मायावती को ही जाता है। वैसे तो बहुजन राजनीति में पुरे देश में मायावती के नाम के बिना अधूरा है लेकिन बात उत्तरप्रदेश की राजनीति की करें तो वो मायावती के जिक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती है। उस समय मायावती को यूपी में दलितों के लिए आइकन के रूप देखते थे जो आज भी बरकरार है।

 भारत में आरक्षण एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत विश्वविद्यालयों में सरकारी पदों और सीटों का एक प्रतिशत पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, मायावती ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में आरक्षण का समर्थन किया, जिसमें कोटा और धार्मिक अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों जैसे समुदायों को शामिल किया गया। अगस्त 2012 में एक बिल को मंजूरी दी गई थी जो संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करती है ताकि राज्य की नौकरियों में पदोन्नति के लिए आरक्षण प्रणाली का विस्तार किया जा सके। जाति के दंश को इस रूप में भी समझा सकता है कि आप बहुत अच्छे हैं, कोई कमी नहीं है आपमें। जाति पता चलते ही आप बुरे हो जाते हैं। आप कामचोर हो जाते हैं, आपकी सारी ‘मेरिट’ ख़त्म हो जाती है और आप आरक्षण का फ़ायदा लेकर हर जगह घुसपैठ करने वाले बन जाते हैं। मायावती ने इन सबको धता बताते हुए अपनी पहचान स्वयं बनाई। मायावती के करियर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा “लोकतंत्र का चमत्कार” कहा गया है। लाखों दलित समर्थक उन्हें एक आइकन के रूप में देखते हैं और उन्हें ‘बहन जी’ के रूप में संदर्भित करते हैं।50 बहुजन नायक पुस्तक खरीदें

      मायावती स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने एकबार अपने पिता से पूछ लिया था कि क्या मैं भी बाबा साहब की तरह काम करूँ तो मेरी भी पुण्यतिथि उनकी तरह मनाई जाएगी। यह सुनकर उनके पिता हतप्रभ रह गए थे। गौरतलब है कि उनके पिताजी ने बाबा साहब कि जीवनी मायावती को पढ़ने के लिए दिया था। यहीं से मायावती बाबा साहब को अपना आदर्श मनाने लगी थी। राजनीति में आने के बाद उनके पिताजी ने उनसे दूरियाँ बना ली थी। मायावती ने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था ताकि वह बहुजन समाज की सेवा कर सकें।

      मायावती को अपने जीवनकाल में यहाँ तक की सांसद बन जाने के बाद भी जातीय भेदभाव सहने पड़े। अजय बोस ‘बहनजी : अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावती’ में लिखते हैं, “जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित सभ्रांत महिला सांसदों के लिए मज़े की चीज़ हुआ करते थे। वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है। उनमें से एक ने एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा ‘परफ़्यूम’ लगा कर सदन में आया करें।” सफाई को लेकर उनका व्यवहार धीरे-धीरे बदल गया। मायावती के नज़दीकी लोगों के अनुसार बार-बार उनकी जाति का उल्लेख और उनको ये आभास दिलाने की कोशिश कि दलित अक्सर गंदे होते हैं, का उन पर दीर्घकालीन असर पड़ा। उन्होंने हुक्म दिया कि ‘उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा।’ मायावती की जीवनी लिखने वाली कारंवा पत्रिका की पत्रकार नेहा दीक्षित ने भी अपने लिखे एक लेख ‘द मिशन – इनसाइड मायावतीज़ बैटल फ़ॉर उत्तर प्रदेश’ में लिखा था, “मायावती में सफ़ाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोछा लगवाती हैं।”

      मायावती होना एक गर्व की निशानी भी है। मायावती भारतीय महिला राजनीति में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी लाई हैं। अपने कार्यकाल में हमेशा कड़े फैसले लेने व उसको क्रियान्वित करके दिखने की क्षमता सुश्री मायावती में थी। मायावती का मुख्यमंत्री बनना इस बात का संकेत भी है कि हाशिये कि महिलाओं को यदि अवसर दिया जाए तो वह समाज व देश कि सेवा में आमूलचूल परिवर्तन लाने में सक्षम हैं। मायावती द्वारा किया गया कार्य हाशिये के समाज के लिए एक इतिहास बन गया है। आज भारत की कोई भी हाशिये के वर्ग की महिला मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकती है। यह ताकत उसे मायावती से मिलती है। अपने राजनीतिक जीवन में तमाम असहमतियों व सफलता-असफलता के बावजूद मायावती भारतीय राजनीति की एकमात्र दलित राजनेता हैं जिन्हें आप पूरी तरह से नकार नहीं सकते हैं। विरोध के बावजूद उनके किए कार्यों का बखान तो करना ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की दलित महिलाएं जो कभी पुरुषों के आज्ञा के बगैर घर से बाहर नहीं निकलती थी वह मायावती के राजनीतिक रैलियों में बड़े आदर के साथ मायावती का कटाउट या उनका मुखौटा लिए हिस्सा लेती हैं।

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मायावती के होने से हाशिये के समाज की महिलाओं के अंदर एक चेतना आई है। मायावती अपने शासनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया और अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है। जो मायावती को उनकी ज़िन्दगी में एक सफल राजनेता बनाता है। मायावती अभी तक अविवाहित है जो की उनके किये कार्यो के प्रति लगन और उनके सिद्धांतो को दर्शाता है। हमारे देशवासियों को ऐसी महिला राजनेता पर गर्व होना चाहिए। मायावती ने अपनी चौथे कार्यकाल में बहुजन इतिहास को जीवित करने के लिए भी काफ़ी काम किया। मायावती ने बहुजन नायक-नायिकाओं के सम्मान में ऐतिहासिक काम कर दिखाया। जिन बहुजन नायक-नायिकाओं को इतिहास में कभी उचित सम्मान नहीं मिला था, मायावती ने उनकी शानदार प्रतिमाएँ लगाकर बहुजन समाज से उनका परिचय कराया।

प्रो. विवेक कुमार द्वारा संपादित, राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पुस्तक खरीदें

      मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते। वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे। मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है। जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है। वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं। अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है। दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है। भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक बहुजन महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।’

बुलंदशहर के मनीष को बड़ी सफलता, बहुजन युवाओं के लिए प्रेरणा बने

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 बुलंदशहर। आमतौर पर यह देखने में आता है कि दलित समाज के युवा छोटी नौकरियों के पीछे भागते हैं और सामाजिक एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वह बड़े सपने देखने से डरते हैं। लेकिन गांवों से निकल कर शहर पहुंच चुके इस समाज की दूसरी पीढ़ी के युवा तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में झंडा गाड़ रहे हैं। वो ऐसे विभागों और क्षेत्रों में बहुत रहे हैं, जहां अब तक इस समाज के युवाओं की मौजूदगी नहीं के बराबर थी। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के मनीष कुमार सिंह ने एक बड़ी सफलता हासिल की है।

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शहर के यमुनापुरम के निवासी और एलआईसी में डीओ के पद पर कार्यरत बीरेन्द्र सिंह के पुत्र मनीष का चयन भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र मुंबई में हुआ है। यह भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत आता है। मनीष का चयन ग्रुप ए में हुआ है और उनका पद वैज्ञानिक अधिकारी (Scientist) के पद पर हुआ है। मनीष के पिता बीरेन्द्र सिंह अंबेडकरवादी हैं और उन्होंने अपने सभी बच्चों को बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के पदचिन्हों पर चलते हुए उच्च शिक्षा के लिए अक्सर प्रेरित किया है। मनीष सिंह ने अपनी सफलता का श्रेय बहुजन नायकों के संघर्ष और अपने परिवार एवं मित्रों के सहयोग को दिया है।

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गौरतलब है कि मनीष सिंह की यह सफलता पूरे वंचित समाज के युवाओं के लिए प्रेरणा देने वाली है। मनीष की यह सफलता यह भी बताती है कि वंचित तबके के युवा अगर ठान लें तो हर क्षेत्र में परचम फहरा सकते हैं। मनीष की यह सफलता बहुजन युवाओं को बड़े ख्वाब देखने के लिए भी प्रेरित करने वाला है।

क्या किसान आंदोलन को तोड़ने की सरकार की कवायद का हिस्सा बन रहा है सुप्रीमकोर्ट?

 कभी-कभार के अपवादों को छोड़कर भारत के सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश निर्णायक फैसले वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, जमींदारों-भूस्वामियों के हितों की रक्षा और पूंजीवाद के पक्ष की ओर झुकते मिले हैं यानि सुप्रीकोर्ट अपरकॉस्ट, मर्दों, सामंतो-भूस्वामियों और पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करता रहा है। इन वर्चस्वशाली समूहों के विपरीत सुप्रीमकोर्ट ने भी तभी फैसले दिए, जब उसे जन दबाव का सामना करना पड़ा या इस बात की आशंका पैदा हुई कि उसके किसी फैसले से भारी जनाक्रोश पैदा हो सकता है, जो वर्चस्वशाली समुदायों के लिए खतरा बन सकता है।
2014 के बाद तो धीरे-धीरे सुप्रीमकोर्ट खुले तौर पर हिदू राष्ट्र निर्माण और कार्पोरेट हितों की रक्षा का सबसे बड़ा टूल
(उपकरण) बनता दिखा। एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले, रामजन्मभूमि मामला, नागरिकता (संशोधन) कानून 2019, आर्थिक आधार पर आरक्षण (सवर्ण आरक्षण, 124 वां संविधान संशोधन 2019) और संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति पर सुप्रीम कोर्ट का रूख इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं।
धीरे-धीरे एक और काम सुप्रीम कोर्ट करने लगा है, वह है सरकार के जनविरोधी और राष्ट्र विरोधी निर्णयों और संविधान संशोधनो को वैध ठहराना। इसका बड़ा सबूत राफेल कांड पर सरकार के निर्णय पर मुहर, अमित शाह का केस देख रहे, जज लोया की मृत्यु पर फैसला, शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, भीमा कोरेगांव षडयंत्र के नाम पर मनमानी गिरफ्तारियों और गिरफ्तार लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार उसका रवैया आदि हैं।
पिछले दिनों कई मामले आए, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की राह आसान की। अकारण नहीं है, किसानों के साथ आठवें दौर की बात-चीत में सरकार ने किसानों को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए कहा। किसान आंदोलन के मुद्दे पर सतही रूप में सुप्रीम कोर्ट जितना भी सरकार के खिलाफ दिख रहा हो और किसानों के साथ हमदर्दी भरी टिप्पणियां कर रहा हो, लेकिन टिप्पणियों के बीच की पंक्तियां और सुप्रीमकोर्ट द्वारा बताए जा रहे समाधान के उपाय इस बात के प्रमाण हैं कि सुप्रीम कोर्ट देश के इतिहास के सबसे बड़े जनांदोलन में से एक वर्तमान किसान आंदोलन को तोड़ने और तितर-बितर करने की सरकार की मंशा का एक उपकरण बनने जा रहा है। जिस किसान आंदोलन के निशाने पर कार्पोरेट और उनके हिंदू राष्ट्रवादी नुमांइंदे नरेंद्र मोदी हैं और जो किसान आंदोलन देश को नई दिशा देने की कूबत रखता है।
सुप्रीम कोर्ट और सरकार की मिलीभगत से तैयार इस मंशा को किसान आंदोलन के नेता बखूबी समझ रहे हैं, इसलिए उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया है कि वे सरकार और किसानों के बीच सुप्रीम कोर्ट को मध्यस्थ के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। यही लोकतांत्रिक तरीका है, फैसला सीधे राजसत्ता और जनता के बीच के संवाद से लिया जाए। इसलिए किसानों का रूख पूर्णतया लोकतांत्रिक वसूलों- मूल्यों के अनुसार है।
इस जनांदोलन की हार देश के जनतंत्र और जनता के हितों के लिए एक और बहुत बड़ा धक्का होगी। यदि सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप जनहित में नहीं, सत्ता के दीर्घकालिक हित में कर रहा है, क्योंकि यह जनांदोलन सरकार को कानून वापस लेने के लिए बाध्य करने की क्षमता रखता है।

मूल निवासी श्रमण धर्मों की जरूरत और उनका उभार

  महाराष्ट्र के कुछ बौध्द परिवारों ने मिलकर यह बौध्द मंदिर बनाया है। यह असल में बोधगया के महाबोधि मंदिर की प्रतिकृति है। यह बहुत उत्साहवर्धक बात है, इस तरह की पहल पूरे भारत में होनी चाहिए। अब समय आ गया है कि पूरे भारत मे बौद्ध धर्म सहित अन्य प्राचीन श्रमण धर्मों का बड़े पैमाने पर प्रचार होना चाहिए। आर्यों के आगमन के पूर्व एवं आर्यों की भारत विजय के दौरान व बाद मे जन्मे या बने हुए मूल निवासी श्रमण धर्मों को फिर से उभरने का समय आ गया है। अब जनजातीय समाज, शूद्र (ओबीसी) समाज और अन्य अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों को अपने मौलिक धर्मों और परंपराओं की तरफ लौटना चाहिए। याद रखिए कि सरकारें और और नीतियां शून्य में नहीं जन्मतीं। हर सरकार और उसकी किसानों, मजदूरों या महिलाओं से जुड़ी हर नीति एक विशेष धर्म-दार्शनिक परम्परा से आती है। इसीलिए नई सरकारें, नई नीतियां चाहिए तो नए धर्म और दर्शन का विकल्प भी निर्मित करना होगा। असल सवाल यह है कि आपकी मौजूदा सत्ता या सरकार किस धर्म दर्शन से संचालित है?

क्या उसमे इंसान के श्रम की इज्जत करने का कोई संस्कार है? क्या उसमे महिलाओं के शरीर और उनके मन की स्वतंत्रता का सम्मान करने की कोई परंपरा है? क्या आपकी सरकार के नुमाइंदों की धार्मिक शिक्षाओं में मनुष्य को मनुष्य समझने की परंपरा है? अगर है तो आप उनसे उम्मीद कर सकते हैं और अगर नहीं है तो आपको सरकारों और सरकार की नीतियों का विकल्प निर्मित करने के लिए सबसे पहले समाज मे धर्म दर्शन का विकल्प भी खड़ा करना होगा। कल्पना कीजिए कि पूरे भारत में एक ही कंपनी की मोबाईल व इंटरनेट सेवा है तब क्या होगा? तब निश्चित ही वह मोबाईल कंपनी एकाधिकार या मोनोपॉली चलाएगी। तब वह अपनी शर्तों पर अपने दूसरे धंधों-व्यापारों को फैलाने के लिए सारे प्रपंच करेगी। फिर धीरे धीरे वह मोबाइल और इंटरनेट सेवा के जरिए समाज मे और गहरे पैठ बनाएगी।

यह हम सब देख चुके हैं। खेल (क्रिकेट) और तेल (खाद्य तेल और पेट्रोल) के रास्ते अब इन्होंने रेल को हथियाने का प्लान बना लिया है। इसके बाद अब आपके गाँव खेत खलिहान तक इनकी नीतियाँ पहुँच रही हैं। इन्हीं नीतियों के खिलाफ किसान दिल्ली की सीमा पर जमे हुए हैं। एक कंपनी की मोनोपॉली की तरह ही एक विचारधारा और एक धर्म की मोनोपॉली भी खतरनाक होती है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में तो यह और भी जरूरी है कि अनेकों धर्मों की उपस्थिति सांकेतिक रूप से ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी बनी रहे। इसीलिए कम से कम भारत के SC/ST और OBC को अपने प्राचीन श्रमण धर्मों की घोषणा और पालन शुरू कर देना चाहिए। इस तरह नए धर्म-दार्शनिक विचारों के प्रसार के साथ मनुष्य को मनुष्य समझने वाली परंपराओं का प्रचार करना होगा। जो परंपरा श्रम करने वाले मनुष्यों या महिलाओं को अछूत या नीच घोषित करती है उसके मुकाबले में महिलाओं की सृजन शक्ति और किसानों मजदूरों के श्रम का सम्मान करने वाली परंपराओं को लाना होगा। प्राचीन भारत की सभी श्रमण परम्पराएं आर्यों के धर्म की तुलना मे अधिक समतावादी और मानवीय रही हैं। भारतीय श्रमण परंपराओं में ईश्वर या सनातन आत्मा जैसा कोई अंधविश्वास नहीं होता है।

अब समय आ गया है कि शुरुआत करते हुए कम से कम बौद्ध धर्म को बड़े पैमाने पर भारत में फैलाया जाए। एक मोबाइल कंपनी की दादागिरी को संतुलित करने के लिए अन्य कंपनियों का होना जरूरी है। ठीक इसी तरह एक विशेष तरह की विश्वदृष्टि और विचारधारा या धर्म दर्शन के समानांतर अन्य धर्म और दर्शनों की सख्त आवश्यकता है। यही मूल रूप से भारत का वास्तविक चरित्र रहा है जिसे बीते कुछ समय मे बहुत नुकसान पहुंचा है। अब भारत के बहुजनों को वैकल्पिक राजनीति के समानांतर वैकल्पिक धर्मों की खोज व प्रचार को एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की तरह हाथ मे लेना चाहिए। हालांकि यह पहल आरंभ हो चुकी है, इसमे और ऊर्जा और गति की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई तीनों कृषि बिल पर रोक

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केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए तीनों कृषि कानून के लागू होने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने आज (मंगलवार 12 जनवरी 2021) को ये फैसला सुनाया, साथ ही अब इस मसले को सुलझाने के लिए कमेटी का गठन कर दिया गया है। सरकार और किसानों के बीच लंबे वक्त से चल रही बातचीत का हल ना निकलने पर सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला लिया। शीर्ष न्यायालय द्वारा चार सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। इस कमेटी में भारतीय किसान यूनियन के जितेंद्र सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ) और अनिल शेतकारी शामिल हैं।

माना जा रहा है कि अदालत के इस रुख से जहां सरकार की बदनामी होने से बच गई है, वहीं किसानों के आंदोलन की  जीत हुई है। लेकिन अब इस पर भी ध्यान देना होगा कि सरकार समिति क्या फैसला करती है और वह किसानों को कितना मंजूर होता है। एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि फिलहाल सरकार कहीं समिति के बहाने किसानों के आंदोलन को उलझाने में तो नहीं लगी है। गौरतलब है कि किसानों के समर्थन में देश भर से लोग जुड़ते जा रहे थे।

असम में कड़ाके की ठंड में मिसिंग जनजाति के लोग क्यों दे रहे हैं धरना

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असम के तिनसुकिया बोरगुरी इलाके में बीते 21 दिसंबर से दो गांवों के 1480 लोग कड़ाके की ठंड में धरने पर बैठे हुए हैं। ठंड ने दो प्रदर्शनकारियों की जान ले ली है, बावजूद इसके लोग धरने से उठने को तैयार नहीं है। इंसानियत को शर्मसार करती एक सच्चाई यह भी है कि इनकी फिक्र न तो सरकार को है, न ही स्थानीय प्रशासन को। जिन दो गांवों के लोग धरने पर हैं, उस गांव का नाम- लाइका और दोधिया है। ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट में स्थित डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क के मुख्य क्षेत्र में मिसिंग जनजाति के ये दो वन गाँव बीते 70 सालों से बसे हुए है। लेकिन राष्ट्रीय उद्यान होने के कारण वहां लोगों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी सरकारी योजनाओं को बंद कर दिया गया है। ऐसे में इन दोनों गांवों के लोग पिछले कई सालों से स्थायी पुनर्वास की मांग को लेकर आंदोलन करते आ रहे हैं। लेकिन अब इनकी मांग है कि जबतक सरकार किसी दूसरी ज़मीन पर इन्हें स्थायी तौर पर बसा नहीं देती ये धरना स्थल पर ही रहेंगे। कड़ाके की इस ठंड में प्रदर्शन स्थल पर अबतक दो महिलाओं की मौत हो चुकी है जबकि कई लोग लगातार बीमार पड़ रहे हैं। एक प्रदर्शनकारी दमयंती अपने विरोध और दर्द को मिसिंग जनजाति का एक गीत गाकर बयां करती हैं तो पास बैठी महिलाएं रोने लगती हैं। वो कहती हैं कि हमारा कोई ठिकाना नहीं है और हमें नहीं पता इस शिविर में हमारा आगे क्या होगा? हम ज़िंदा भी रहेंगे या नहीं। हमारे साथ सरकार क्या करेगी, जिस तरह ब्रह्मपुत्र का पानी बह रहा है उसे पता नहीं वो कहां जाकर गिरेगा, ठीक वैसा ही हमारा जीवन हो गया है।


बीबीसी संवाददाता दिलीप शर्मा की रिपोर्ट के आधार पर, फोटो क्रेडिट- दिलीप शर्मा बीबीसी

 

सुप्रीम कोर्ट में कृषि बिलः सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी रुख पर निराशा जताई, क्या SC खारिज करेगी किसान बिल?

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 जब यह साफ दिख रहा है कि किसान आंदोलन को हल निकालने के लिए सरकार तैयार नहीं है, अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। किसान जहां इस बिल को रद्द करने पर अड़े हैं तो सरकार इसमें कोई बदलाव करने के मूड में नहीं है। ऐसे में अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर है। पिछले 47 दिन से किसानों का आंदोलन जारी है। आज (11 जनवरी) शीर्ष अदालत में किसानों का पक्ष मशहूर वकील प्रशांत भूषण रख रहे हैं। इसके अलावा भी अलग-अलग किसान संगठनों के अपने वकील है।

जो खबर आई है, उसके मुताबिक इस बिल पर सुनवाई के दौरान अपनी प्रतिक्रिया में चीफ जस्टिस ने कहा कि जिस तरह से प्रक्रिया चल रही है, हम उससे निराश हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से दो टूक कहा कि इन कानूनों को अमल में लाने पर केंद्र रोक लगाएं, वरना कोर्ट खुद ऐसा कर देगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि “हम फिलहाल इन कृषि कानूनों को निरस्त करने की बात नहीं कर रहे हैं, यह एक बहुत ही नाजुक स्थिति है। हमें नहीं मालूम की आप (केंद्र) हल का हिस्सा हैं या फिर समस्या का लेकिन हमारे पास एक भी ऐसी याचिका नहीं है, जो कहती हो कि ये कानून किसानों के लिए फायदेमंद हैं।” शीर्ष अदालत ने आंदोलन के दौरान कुछ लोगों की खुदकुशी और बुजुर्ग और महिलाओं के भी इस आंदोलन में शामिल होने का संज्ञान लिया।

सुनवाई के दौरान किसान संगठनों ने कानूनों की वजह से होने वाले नुकसान के बारे में कोर्ट को बताया। एक-एक बात बारीकी से बताई। यह भी बताया गया कि किस तरह से उन्हें आंदोलन करने पर मजबूर किया गया।  जहां तक अदालत का सवाल है तो वह इस बिल को तभी रद्द कर सकती है, जब उसे यह लगेगा कि यह बिल संविधान के खिलाफ है। किसानों का पक्ष इसे किस तरह अदालत में संविधान विरोधी बताता है, यह देखना होगा।

एक किसान संगठन और वकील एमएल शर्मा ने चुनौती दी है। शर्मा ने याचिका में कहा है कि केंद्र सरकार को कृषि से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है। कृषि और भूमि राज्यों का विषय है और संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 (राज्य सूची) में इसे एंट्री 14 से 18 में दर्शाया गया है। यह स्पष्ट रूप से राज्य का विषय है। इसलिए इस कानून को निरस्त किया जाए।

कृषि बिल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अब तक के रुख पर बात करें तो 16 दिसंबर 2020 को कोर्ट ने कहा था कि किसानों के मुद्दे हल नहीं हुए तो यह राष्ट्रीय मुद्दा बनेगा। वहीं 6 जनवरी 2021 को अदालत ने सरकार से कहा कि स्थिति में कोई सुधार नहीं, किसानों की हालत समझते हैं। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन जजों की के समक्ष सोमवार को ये सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने कहा है कि यदि सर्वोच्च अदालत किसानों के हक में फैसला देता है तो उन्हें आंदोलन करने की जरूरत नहीं रहेगी।

हार्वर्ड युनिवर्सिटी में लेक्चर देंगे हेमंत सोरेन, करेंगे आदिवासी मुद्दों पर बात

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 दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में से एक अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन वहां के वर्तमान और पुराने छात्रों को लेक्चर देंगे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ‘आदिवासी अधिकार, सतत विकास और कल्याणकारी नीतियों’ पर अपना व्याख्यान देंगे। दरअसल हावर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा ‘एनुअल इंडिया कांफ्रेस’ का आयोजन किया जाता है। इस बार कोविड होने के कारण ये कार्यक्रम ऑनलाइन ही किया जा रहा है। हावर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा किए जाने वाले इस कार्यक्रम की ये 18वीं श्रृंखला है। इसी प्रोग्राम में एक लेक्चर देने के लिए हेमंत सोरेन को आमंत्रित किया गया है। इस बाबत छात्रों ने हेमंत के लिए एक पत्र लिखा, जिसे हेमंत सोरेन ने स्वीकार कर लिया है। हावर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा आयोजित किए जा रहे इस 18वें ‘वार्षिक भारत सम्मेलन’ का आयोजन 2021 की 19 फरवरी से 21 फरवरी तक किया जाना है। इसी बीच 20 फरवरी के दिन हेमंत सोरेन अपना व्याख्यान देंगे। गौरतलब है कि ‘वार्षिक भारत सम्मेलन’ भारत पर केंद्रित एक बड़ा फोरम है जिसपर पूरी दुनियाभर के छात्रों और बुद्धजीवियों की नजर रहती है। यह भी गौरतलब है कि साल 2020 के ‘हार्वर्ड इंडिया कांफ्रेंस’ में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास भी हिस्सा ले चुके हैं, जहां उन्होंने ‘कॉस्ट एंड मीडिया’ विषय पर अपनी बात रखी थी। अशोक दास के साथ इस पैनल में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, न्यूयार्क की पत्रकार यशिका दत्त और हिन्दुस्तान टाइम्स के ध्रुवो ज्योति भी शामिल थे। इसके मोडरेटर हार्वर्ड युनिवर्सिटी के पोस्ट डाक्ट्रेट फेलो सूरज येंगड़े थे।

सरकार और किसानों के बीच बैठक फिर बेनतीजा, किसानों का बड़ा ऐलान

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 केंद्र सरकार और किसानों के बीच कृषि बिल को लेकर मामला उलझता जा रहा है। आज दोनों पक्षों के बीच 8वें दौर की बातचीत हुई, लेकिन एक बार फिर बैठक बेनतीजा ही रही। आलम यह हो गया कि बैठक में सरकार की ओर से शामिल तीनों मंत्री बैठक से बाहर निकल कर चले गए। बैठक में कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर और उनके साथी मंत्री किसानों से बातचीत में शामिल थे।

8वें दौर की बैठक कुछ अलग थी। अब तक हुई शांति पूर्ण बैठक में आज किसान नाराज हो गए। खबर है कि एक समय ऐसा आया जब सरकारी नुमाइंदों और किसानों के बीच बहस होने लगी। ऐसे में एक वक्त बैठक में शामिल तीनों मंत्री बैठक से निकल गए। तीनों कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग पर अड़े किसान ने सरकार से बड़ी घोषणा करते हु दो टूक कहा कि उनकी ‘घर वापसी’ तभी होगी जब वह इन कानूनों को वापस लेगी। लेकिन सरकार ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और कानून में बदलाव करने की बात कही। इसके बाद बैठक में बहस का दौर शुरू हो गया। इस दौरान सरकार ने दावा किया कि कई राज्यों में किसानों ने इन कानूनों का अच्छा मानते हुए इन्हें स्वीकार कर लिया है। आपको भी पूरे देश का हित समझना चाहिए। लेकिन किसान सरकार को ही कठघरे में खड़ा करने लगे।

मुक्ता साल्वेः सावित्रीबाई फुले की ऐसी शिष्या, जिनका विचार ज्ञानोदय अखबार ने छापा था

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 सुनो बता रही हूं कि हम मनुष्यों को गाय, भैंसों से भी नीच माना है, इन लोगों ने, जिस समय बाजीराव का राज था, उस समय हमें गधों के बराबर ही माना जाता था। आप देखिए, लंगड़े गधे को भी मारने पर उसका मालिक भी आपकी ऐसी-तैसी किए बिना नहीं रहेगा लेकिन मांग-महारों को मत मारो ऐसा कहने वाला भला एक भी नहीं था। उस समय दलित गलती से भी तालिमखाने के सामने से अगर गुज़र जाए तो गुल-पहाड़ी के मैदान में उनके सिर को काटकर उसकी गेंद बनाकर और तलवार से बल्ला बनाकर खेल खेला जाता था‌”

यह दलितों के अधिकारों की बात करने वाली आधुनिक युग की पहली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे के शब्द हैं। इनके शब्दों में वेदना और आक्रोश साफ झलकते हैं। मुक्ता सावित्रीबाई और ज्योतिबाई फुले की पाठशाला की छात्रा थीं। मुक्ता क्रांतिवीर लहूजी साल्वे की पोती थीं, जो महाराष्ट के क्रांतिकारी हुआ करते थे। लहूजी ने महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले को लड़कियों के सबसे पहले स्कूल को खुलवाने में मदद की थी और उनका यह स्कूल 1 जनवरी 1848 पुणे में खुला था। 15 फरवरी 1855 को मात्र 14 साल की उम्र में उन्होंंने अपने निबंध में पेशवा राज (ब्राह्मणों का राज) में दलितों की स्थिति को शब्दों में व्यक्त किया था। उन्होंने इनके के दुखों, चुनौतियों और निवारण के उपायों के संबंध में विस्तृत निबंध लिखा था, जिसे मराठी पत्रिका ज्ञानोदय ने सर्वप्रथम ‘मांग महाराच्या दुखविसाई’ शीर्षक से दो भागों में प्रकाशित किया था। पहला भाग 15 फरवरी 1855 तथा दूसरा भाग 1 मार्च 1855 को प्रकाशित हुआ था। 5 जनवरी 2021 को उन्हीं मुक्ता सालवे की 177 वीं जयंती है। उन्हें नमन।

  • प्रस्तुतिः रंजन देव